(68) सन्यासोपनिषद
सन्यासोपनिषद-- यह उपनिषद दो अध्यायों में है और सामवेद से सम्बन्धित है। ॥ संन्यासोपनिषत् ॥ मंगलाचरण संन्यासोपनिषद्वेद्यं संन्यासिपटलाश्रयम् । सत्तासामान्यविभवं स्वमात्रमिति भावये ॥ अर्थ: संन्यासोपनिषद् के द्वारा जिसे जाना जाता है, जो संन्यासियों का आश्रय है, जो समस्त अस्तित्व का मूल स्वरूप है और जो केवल अपने शुद्ध आत्मस्वरूप में स्थित है—उसका मैं ध्यान करता हूँ। शान्तिपाठ ॐ आप्यायन्तु मामाङ्गानि वाक्प्राणश्चक्षुः श्रोत्रमथो बलमिन्द्रियाणि च । सर्वाणि सर्वं ब्रह्मोपनिषदं माहं ब्रह्म निराकुर्यां मा मा ब्रह्म निराकरोद् अनिराकरणमस्त्वनिराकरणं मेऽस्तु तदात्मनि निरते य उपनिषत्सु धर्मास्ते मयि सन्तु ते मयि सन्तु । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥ अर्थ: मेरे सभी अंग, वाणी, प्राण, नेत्र, कान, बल और इन्द्रियाँ पुष्ट हों। यह सम्पूर्ण जगत् ब्रह्म है और उपनिषद् भी ब्रह्म का ही प्रतिपादन करते हैं। मैं ब्रह्म का त्याग न करूँ और ब्रह्म मेरा त्याग न करे। मेरा ब्रह्म से सम्बन्ध कभी विच्छिन्न न हो। उपनिषदों में बताए गए धर्म मुझमें स्थित हों। मुझमें स्थित हों। ॐ शान्ति, शान्ति, शान्ति। अथ प्रथमोऽध्या...