(70) अक्षमालिकोपनिषद

अक्षमालिकोपनिषद---
इसका पूरा पाठ अपेक्षाकृत विस्तृत है और इसमें अक्षमाला के दस प्रकार, तीन सूत्र, अक्षरों की प्रतिष्ठा, मातृका-स्वरूप तथा जप के फल का विस्तार से वर्णन है।
॥ अक्षमालिकोपनिषत् ॥
मंगलाचरण
अकारादिक्षकारान्तवर्णजातकलेवरम् ।
विकलेवरकैवल्यं रामचन्द्रपदं भजे ॥
अर्थ:
‘अ’ से लेकर ‘क्ष’ तक सम्पूर्ण वर्णमाला जिसका शरीर है, और जो शरीर से परे कैवल्यस्वरूप है, उन श्रीरामचन्द्र के चरणों का मैं भजन करता हूँ।
शान्तिपाठ
ॐ वाङ्मे मनसि प्रतिष्ठिता मनो मे वाचि प्रतिष्ठितमाविरावीर्म एधि ।
वेदस्य म आणीस्थः श्रुतं मे मा प्रहासीरनेनाधीतेनारात्रान्सन्दधाम्यृतं वदिष्यामि सत्यं वदिष्यामि 
तन्मामवतु तद्वक्तारमवतु अवतु मामवतु वक्तारमवतु वक्तारम् ॥
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
अर्थ:
मेरी वाणी मेरे मन में प्रतिष्ठित हो और मेरा मन वाणी में प्रतिष्ठित हो। हे परमात्मन्! मेरे सामने प्रकट होकर मुझे ज्ञान प्रदान करें। वेद का अध्ययन मेरे लिए दृढ़ हो। मैंने जो सुना है वह मुझसे दूर न हो। इस अध्ययन द्वारा मैं दिन-रात सत्य का अनुसरण करूँगा और सत्य ही बोलूँगा। वह परमात्मा मेरी रक्षा करे और वक्ता की भी रक्षा करे।
अक्षमाला का रहस्य
हरिः ॐ ।
अथ प्रजापतिर्गुहं पप्रच्छ—
भो ब्रह्मन्! अक्षमालाभेदविधिं ब्रूहि इति ।
सा किं लक्षणा? कति भेदा अस्याः? कति सूत्राणि? कथं घटनाप्रकारः? के वर्णाः? का प्रतिष्ठा? कैषाधिदेवता? किं फलं चेति ॥
अर्थ:
प्रजापति ने भगवान् गुह से पूछा
“हे ब्रह्मन्! अक्षमाला के भेद और उसकी विधि बताइए। उसके क्या लक्षण हैं? उसके कितने प्रकार हैं? उसमें कितने सूत्र होते हैं? उसे किस प्रकार बनाया जाता है? उसके वर्ण कौन-कौन से हैं? उसकी प्रतिष्ठा कैसे होती है? उसकी अधिदेवता कौन है और उसका फल क्या है?”
भगवान् गुह का उत्तर
तं गुहः प्रत्युवाच—
प्रवाल-मौक्तिक-स्फटिक-शङ्ख-रजत-अष्टापद-चन्दन-पुत्रजीविकाब्जे रुद्राक्षा इति ।
आदिक्षान्तमूर्तिः सावधानभावा ।
अर्थ:
भगवान् गुह ने उत्तर दिया—
अक्षमाला के मणि प्रवाल (मूँगा), मोती, स्फटिक, शंख, चाँदी, अष्टापद (स्वर्ण), चन्दन, पुत्रजीविका, कमलबीज और रुद्राक्ष के होते हैं। यह ‘अ’ से ‘क्ष’ तक के अक्षरों के स्वरूप से सम्बद्ध है और इसे अत्यन्त सावधानी एवं श्रद्धा से ग्रहण करना चाहिए।
तीन सूत्र
सौवर्णं राजतं ताम्रं तन्मुखे मुखं तत्पुच्छे पुच्छं तदन्तरावर्तनक्रमेण योजयेत् ।
यदस्यान्तरं सूत्रं तद्ब्रह्म ।
यद्दक्षपार्श्वे तच्छैवम् ।
यद्वामे तद्वैष्णवम् ।
यन्मुखं सा सरस्वती ।
यत्पुच्छं सा गायत्री ।
यत्सुषिरं सा विद्या ।
या ग्रन्थिः सा प्रकृतिः ॥
अर्थ:
अक्षमाला में तीन प्रकार के सूत्र बताए गये हैं—स्वर्ण, रजत और ताम्र।
माला के भीतर स्थित सूत्र ब्रह्म का प्रतीक है। दाहिने भाग का सूत्र शैव, बाएँ भाग का वैष्णव माना गया है। माला का मुख सरस्वती, पूँछ गायत्री, भीतर का छिद्र विद्या और गाँठ प्रकृति का प्रतीक है।
ये स्वरास्ते धवलाः ।
ये स्पर्शास्ते पीताः ।
ये परास्ते रक्ताः ॥
अर्थ:
स्वर वर्ण श्वेत, स्पर्श वर्ण पीत और अन्य वर्ण रक्तवर्ण माने गये हैं। 
अक्षमाला की शुद्धि और प्रतिष्ठा
अथ तां पञ्चभिर्गन्धैरमृतैः पञ्चभिर्गव्यैस्तनुभिः शोधयित्वा पञ्चभिर्गव्यैर्गन्धोदकेन संस्नाप्य तस्मात्सोङ्कारेण पत्रकूर्चेन स्नपयित्वा षड्भिर्गन्धैरालिप्य सुमनःस्थले निवेश्याक्षतपुष्पैराराध्य प्रत्यक्षमादिक्षान्तैर्वर्णैर्भावयेत् ।
अर्थ:
इसके बाद माला को पाँच सुगन्धित द्रव्यों और पाँच गव्य पदार्थों से शुद्ध करना चाहिए। फिर गन्धयुक्त जल से स्नान कराकर, प्रणव अर्थात् ॐकार से अभिमन्त्रित करके, सुगन्धित द्रव्यों से लेपित करके शुभ स्थान पर स्थापित करना चाहिए। अक्षत और पुष्पों से पूजा करके ‘अ’ से ‘क्ष’ तक के अक्षरों का ध्यान करना चाहिए।
अक्षरों की प्रतिष्ठा
अब उपनिषद् ‘अ’ से ‘क्ष’ तक प्रत्येक अक्षर को एक-एक मणि में प्रतिष्ठित करने की विधि बताता है। प्रत्येक अक्षर के साथ उसका विशेष आध्यात्मिक गुण भी बताया गया है। 
ॐ अङ्कार मृत्युञ्जय सर्वव्यापक प्रथमेऽक्षे प्रतितिष्ठ ।
अर्थ: हे मृत्युञ्जय, सर्वव्यापक ‘अंकार’! प्रथम अक्ष में प्रतिष्ठित हों।
ॐ आङ्काराकर्षणात्मक सर्वगत द्वितीयेऽक्षे प्रतितिष्ठ ।
अर्थ: हे सर्वव्यापक ‘आंकार’, आकर्षणस्वरूप! दूसरे अक्ष में प्रतिष्ठित हों।
ॐ इङ्कार पुष्टिदाक्षोभकर तृतीयेऽक्षे प्रतितिष्ठ ।
अर्थ: हे ‘इंकार’, पुष्टि देने वाले और अक्षोभ्य स्वरूप! तीसरे अक्ष में प्रतिष्ठित हों।
ॐ ईङ्कार वाक्प्रसादकर निर्मल चतुर्थेऽक्षे प्रतितिष्ठ ।
अर्थ: हे ‘ईंकार’, वाणी को प्रसन्न और निर्मल करने वाले! चौथे अक्ष में प्रतिष्ठित हों।
ॐ उङ्कार सर्वबलप्रद सारतर पञ्चमेऽक्षे प्रतितिष्ठ ।
अर्थ: हे ‘उंकार’, समस्त बल प्रदान करने वाले! पाँचवें अक्ष में प्रतिष्ठित हों।
ॐ ऊङ्कार उच्चाटन दुःसह षष्ठेऽक्षे प्रतितिष्ठ ।
अर्थ: हे ‘ऊंकार’, बाधाओं को दूर करने वाले और दुर्जय स्वरूप! छठे अक्ष में प्रतिष्ठित हों।
ॐ ऋङ्कार संक्षोभकर चञ्चल सप्तमेऽक्षे प्रतितिष्ठ ।
अर्थ: हे ‘ऋंकार’, चेतना को गतिशील करने वाले! सातवें अक्ष में प्रतिष्ठित हों।
ॐ ॠङ्कार संमोहनकरोज्ज्वलाष्टमेऽक्षे प्रतितिष्ठ ।
अर्थ: हे ‘ॠंकार’, सम्मोहनकारी और उज्ज्वल स्वरूप! आठवें अक्ष में प्रतिष्ठित हों।
ॐ लृङ्कार विद्वेषणकर मोहक नवमेऽक्षे प्रतितिष्ठ ।
अर्थ: हे ‘लृंकार’, विद्वेष को दूर करने वाले! नौवें अक्ष में प्रतिष्ठित हों।
ॐ लॄङ्कार मोहकर दशमेऽक्षे प्रतितिष्ठ ।
अर्थ: हे ‘लॄंकार’, मोहकारी शक्ति वाले! दसवें अक्ष में प्रतिष्ठित हों।
ॐ एङ्कार सर्ववश्यकर शुद्धसत्त्व एकादशेऽक्षे प्रतितिष्ठ ।
अर्थ: हे ‘एंकार’, शुद्ध सत्त्वस्वरूप और सबको वश में करने वाले! ग्यारहवें अक्ष में प्रतिष्ठित हों।
ॐ ऐङ्कार शुद्धसात्त्विक पुरुषवश्यकर द्वादशेऽक्षे प्रतितिष्ठ 
अर्थ: हे ‘ऐंकार’, शुद्ध सात्त्विक और पुरुषों को वश में करने वाली शक्ति वाले! बारहवें अक्ष में प्रतिष्ठित हों।
ॐ ओङ्कार अखिलवाङ्मय नित्यशुद्ध त्रयोदशेऽक्षे प्रतितिष्ठ ।
अर्थ: हे ‘ओंकार’, समस्त वाणी के स्वरूप और नित्य शुद्ध! तेरहवें अक्ष में प्रतिष्ठित हों।
ॐ औङ्कार सर्ववाङ्मय वश्यकर चतुर्दशेऽक्षे प्रतितिष्ठ ।
अर्थ: हे ‘औंकार’, सम्पूर्ण वाङ्मय को वश में करने वाले! चौदहवें अक्ष में प्रतिष्ठित हों।
ॐ अङ्कार गजादिवश्यकर मोहन पञ्चदशेऽक्षे प्रतितिष्ठ ।
अर्थ: हे ‘अंकार’, गज आदि को वश में करने वाले और मोहन शक्ति वाले! पन्द्रहवें अक्ष में प्रतिष्ठित हों।
ॐ अःकार मृत्युनाशनकर रौद्र षोडशेऽक्षे प्रतितिष्ठ ।
अर्थ: हे ‘अःकार’, मृत्यु का नाश करने वाले रौद्र स्वरूप! सोलहवें अक्ष में प्रतिष्ठित हों।
क-वर्ग
ॐ कङ्कार सर्वविषहर कल्याणद सप्तदशेऽक्षे प्रतितिष्ठ ।
हे ‘कंकार’, समस्त विष को हरने वाले और कल्याण देने वाले! सत्रहवें अक्ष में प्रतिष्ठित हों।
ॐ खङ्कार सर्वक्षोभकर व्यापक अष्टादशेऽक्षे प्रतितिष्ठ ।
हे ‘खंकार’, व्यापक और सबको क्षुब्ध करने वाली शक्ति वाले! अठारहवें अक्ष में प्रतिष्ठित हों।
ॐ गङ्कार सर्वविघ्नशमन महत्तर एकोनविंशेऽक्षे प्रतितिष्ठ ।
हे ‘गंकार’, सभी विघ्नों को शांत करने वाले! उन्नीसवें अक्ष में प्रतिष्ठित हों।
ॐ घङ्कार सौभाग्यद स्तम्भनकर विंशेऽक्षे प्रतितिष्ठ ।
हे ‘घंकार’, सौभाग्य देने वाले! बीसवें अक्ष में प्रतिष्ठित हों।
ॐ ङङ्कार सर्वविषनाशकर उग्र एकविंशेऽक्षे प्रतितिष्ठ ।
हे ‘ङंकार’, समस्त विष का नाश करने वाले उग्र स्वरूप! इक्कीसवें अक्ष में प्रतिष्ठित हों।
च-वर्ग
ॐ चङ्कार अभिचारघ्न क्रूर द्वाविंशेऽक्षे प्रतितिष्ठ ।
हे ‘चंकार’, अभिचार का नाश करने वाले! बाईसवें अक्ष में प्रतिष्ठित हों।
ॐ छङ्कार भूतनाशकर भीषण त्रयोविंशेऽक्षे प्रतितिष्ठ ।
हे ‘छंकार’, भूतादि बाधाओं का नाश करने वाले! तेईसवें अक्ष में प्रतिष्ठित हों।
ॐ जङ्कार कृत्यादिनाशकर दुर्धर्ष चतुर्विंशेऽक्षे प्रतितिष्ठ ।
हे ‘जंकार’, कृत्या आदि बाधाओं का नाश करने वाले! चौबीसवें अक्ष में प्रतिष्ठित हों।
ॐ झङ्कार भूतनाशकर पञ्चविंशेऽक्षे प्रतितिष्ठ ।
हे ‘झंकार’, भूतबाधा का नाश करने वाले! पच्चीसवें अक्ष में प्रतिष्ठित हों।
ॐ ञङ्कार मृत्युप्रमथन षड्विंशेऽक्षे प्रतितिष्ठ ।
हे ‘ञंकार’, मृत्यु का मर्दन करने वाले! छब्बीसवें अक्ष में प्रतिष्ठित हों।
ट-वर्ग
ॐ टङ्कार सर्वव्याधिहर सुभग सप्तविंशेऽक्षे प्रतितिष्ठ ।
हे ‘टंकार’, समस्त व्याधियों को दूर करने वाले! सत्ताईसवें अक्ष में प्रतिष्ठित हों।
ॐ ठङ्कार चन्द्ररूप अष्टाविंशेऽक्षे प्रतितिष्ठ ।
हे ‘ठंकार’, चन्द्रमा के समान स्वरूप वाले! अट्ठाईसवें अक्ष में प्रतिष्ठित हों।
ॐ डङ्कार गरुडात्मक विषघ्न शोभन एकोनत्रिंशेऽक्षे प्रतितिष्ठ ।
हे ‘डंकार’, गरुड़स्वरूप, विषनाशक और शोभन! उनतीसवें अक्ष में प्रतिष्ठित हों।
ॐ ढङ्कार सर्वसंपत्प्रद सुभग त्रिंशेऽक्षे प्रतितिष्ठ ।
हे ‘ढंकार’, सभी सम्पत्तियाँ प्रदान करने वाले! तीसवें अक्ष में प्रतिष्ठित हों।
ॐ णङ्कार सर्वसिद्धिप्रद मोहकर एकत्रिंशेऽक्षे प्रतितिष्ठ ।
हे ‘णंकार’, सभी सिद्धियाँ प्रदान करने वाले! इकतीसवें अक्ष में प्रतिष्ठित हों।
त-वर्ग
ॐ तङ्कार धनधान्यादिसंपत्प्रद प्रसन्न द्वात्रिंशेऽक्षे प्रतितिष्ठ ।
हे ‘तंकार’, धन-धान्य आदि सम्पत्ति देने वाले! बत्तीसवें अक्ष में प्रतिष्ठित हों।
ॐ थङ्कार धर्मप्राप्तिकर निर्मल त्रयस्त्रिंशेऽक्षे प्रतितिष्ठ ।
हे ‘थंकार’, धर्म की प्राप्ति कराने वाले निर्मल स्वरूप! तैंतीसवें अक्ष में प्रतिष्ठित हों।
ॐ दङ्कार पुष्टिवृद्धिकर प्रियदर्शन चतुस्त्रिंशेऽक्षे प्रतितिष्ठ 
हे ‘दंकार’, पुष्टि और वृद्धि करने वाले! चौंतीसवें अक्ष में प्रतिष्ठित हों।
ॐ धङ्कार विषज्वरनिघ्न विपुल पञ्चत्रिंशेऽक्षे प्रतितिष्ठ ।
हे ‘धंकार’, विष और ज्वर का नाश करने वाले! पैंतीसवें अक्ष में प्रतिष्ठित हों।
ॐ नङ्कार भुक्तिमुक्तिप्रद शान्त षट्त्रिंशेऽक्षे प्रतितिष्ठ ।
हे ‘नंकार’, भुक्ति और मुक्ति प्रदान करने वाले शांत स्वरूप! छत्तीसवें अक्ष में प्रतिष्ठित हों।
प-वर्ग
ॐ पङ्कार विषविघ्ननाशन भव्य सप्तत्रिंशेऽक्षे प्रतितिष्ठ ।
हे ‘पंकार’, विष और विघ्न का नाश करने वाले! सैंतीसवें अक्ष में प्रतिष्ठित हों।
ॐ फङ्काराणिमादिसिद्धिप्रद ज्योतीरूप अष्टत्रिंशेऽक्षे प्रतितिष्ठ 
हे ‘फंकार’, अणिमा आदि सिद्धियाँ देने वाले ज्योतिस्वरूप! अड़तीसवें अक्ष में प्रतिष्ठित हों।
ॐ बङ्कार सर्वदोषहर शोभन एकोनचत्वारिंशेऽक्षे प्रतितिष्ठ ।
हे ‘बंकार’, सभी दोषों को हरने वाले! उनतालीसवें अक्ष में प्रतिष्ठित हों।
ॐ भङ्कार भूतप्रशान्तिकर भयानक चत्वारिंशेऽक्षे प्रतितिष्ठ ।
हे ‘भंकार’, भूतादि को शांत करने वाले! चालीसवें अक्ष में प्रतिष्ठित हों।
ॐ मङ्कार विद्वेषिमोहनकर एकचत्वारिंशेऽक्षे प्रतितिष्ठ ।
हे ‘मंकार’, विद्वेषियों को मोहित करने वाली शक्ति वाले! इकतालीसवें अक्ष में प्रतिष्ठित हों।
अन्तस्थ और ऊष्म वर्ण
ॐ यङ्कार सर्वव्यापक पावन द्विचत्वारिंशेऽक्षे प्रतितिष्ठ ।
हे ‘यंकार’, सर्वव्यापक और पवित्र स्वरूप! बयालीसवें अक्ष में प्रतिष्ठित हों।
ॐ रङ्कार दाहकर विकृत त्रिचत्वारिंशेऽक्षे प्रतितिष्ठ ।
हे ‘रंकार’, दाहकारी शक्ति वाले! तैंतालीसवें अक्ष में प्रतिष्ठित हों।
ॐ लङ्कार विश्वंभर भासुर चतुश्चत्वारिंशेऽक्षे प्रतितिष्ठ ।
हे ‘लंकार’, विश्व का भरण करने वाले और प्रकाशमान! चवालीसवें अक्ष में प्रतिष्ठित हों।
ॐ वङ्कार सर्वाप्यायनकर निर्मल पञ्चचत्वारिंशेऽक्षे प्रतितिष्ठ ।
हे ‘वंकार’, सबको पूर्णता देने वाले निर्मल स्वरूप! पैंतालीसवें अक्ष में प्रतिष्ठित हों।
ॐ शङ्कार सर्वफलप्रद पवित्र षट्चत्वारिंशेऽक्षे प्रतितिष्ठ ।
हे ‘शंकार’, सभी फल देने वाले पवित्र स्वरूप! छियालीसवें अक्ष में प्रतिष्ठित हों।
ॐ षङ्कार धर्मार्थकामद धवल सप्तचत्वारिंशेऽक्षे प्रतितिष्ठ ।
हे ‘षंकार’, धर्म, अर्थ और काम देने वाले धवल स्वरूप! सैंतालीसवें अक्ष में प्रतिष्ठित हों।
ॐ सङ्कार सर्वकारण सार्ववर्णिक अष्टचत्वारिंशेऽक्षे प्रतितिष्ठ ।
हे ‘संकार’, सभी कारणों के कारण और सभी वर्णों में व्याप्त! अड़तालीसवें अक्ष में प्रतिष्ठित हों।
ॐ हङ्कार सर्ववाङ्मय निर्मल एकोनपञ्चाशदक्षे प्रतितिष्ठ ।
हे ‘हंकार’, समस्त वाङ्मय के निर्मल स्वरूप! उनचासवें अक्ष में प्रतिष्ठित हों।
ॐ ळङ्कार सर्वशक्तिप्रद प्रधान पञ्चाशदक्षे प्रतितिष्ठ ।
हे ‘ळंकार’, सभी शक्तियाँ प्रदान करने वाले प्रधान स्वरूप! पचासवें अक्ष में प्रतिष्ठित हों।
ॐ क्षङ्कार परापरतत्त्वज्ञापक परंज्योतीरूप शिखामणौ प्रतितिष्ठ ।
अर्थ:
हे ‘क्षंकार’, पर और अपर तत्त्व का ज्ञान कराने वाले, परम ज्योति स्वरूप! शिखामणि में प्रतिष्ठित हों।
इस प्रकार ‘अ’ से ‘क्ष’ तक वर्णमाला को अक्षमाला के आध्यात्मिक शरीर के रूप में प्रतिष्ठित किया जाता है। 
अक्षमाला की देवताओं द्वारा प्रतिष्ठा
अथोवाच— ये देवाः पृथिवीपदस्तेभ्यो नमो भगवन्तोऽनुमदन्तु शोभायै पितरोऽनुमदन्तु शोभायै ज्ञानमयीमक्षमालिकाम् ।
अर्थ:
जो देव पृथ्वी में स्थित हैं, उन सबको नमस्कार। वे इस ज्ञानमयी अक्षमाला की शोभा और प्रतिष्ठा को स्वीकार करें। पितृगण भी इसकी शोभा को स्वीकार करें।
अथोवाच— ये देवा अन्तरिक्षसदस्तेभ्यः ॐ नमो भगवन्तोऽनुमदन्तु शोभायै पितरोऽनुमदन्तु शोभायै ज्ञानमयीमक्षमालिकाम् ।
अर्थ:
जो देव अन्तरिक्ष में निवास करते हैं, उन्हें नमस्कार। वे और पितृगण इस ज्ञानमयी अक्षमाला की प्रतिष्ठा को स्वीकार करें।
अथोवाच— ये देवा दिविषदस्तेभ्यो नमो भगवन्तोऽनुमदन्तु शोभायै पितरोऽनुमदन्तु शोभायै ज्ञानमयीमक्षमालिकाम् ।
अर्थ:
जो देव दिवि अर्थात् स्वर्गलोक में स्थित हैं, उन्हें नमस्कार। वे और पितृगण इस ज्ञानमयी अक्षमाला की शोभा को स्वीकार करें।
अथोवाच— ये मन्त्रा या विद्यास्तेभ्यो नमस्ताभ्यश्चोन्नमस्तच्छक्तिरस्याः प्रतिष्ठापयति ।
अर्थ:
जो मन्त्र और विद्याएँ हैं, उन सबको नमस्कार। उनकी शक्ति इस अक्षमाला में प्रतिष्ठित हो।
अथोवाच— ये ब्रह्मविष्णुरुद्रास्तेभ्यः सगुणेभ्य ॐ नमस्तद्वीर्यमस्याः प्रतिष्ठापयति ।
अर्थ:
जो सगुण ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र हैं, उन्हें नमस्कार। उनका सामर्थ्य इस अक्षमाला में प्रतिष्ठित हो।
अथोवाच— ये साङ्ख्यादितत्त्वभेदास्तेभ्यो नमो वर्तध्वं विरोधेऽनुवर्तध्वम् ।
अर्थ:
सांख्य आदि दर्शनों में जिन तत्त्वों का विवेचन हुआ है, उन सबको नमस्कार। वे साधना के मार्ग में अनुकूल होकर स्थित हों।
अथोवाच— ये शैवा वैष्णवाः शाक्ताः शतसहस्रशस्तेभ्यो नमोनमो भगवन्तोऽनुमदन्त्वनुगृह्णन्तु ।
अर्थ:
जो शैव, वैष्णव और शाक्त साधक हैं, उन सभी को बार-बार नमस्कार। वे इस साधना को स्वीकार करें और अनुग्रह प्रदान करें।
अथोवाच— याश्च मृत्योः प्राणवत्यस्ताभ्यो नमोनमस्तेनैतं मृडयत मृडयत ।
अर्थ:
मृत्यु से सम्बद्ध जो प्राणशक्तियाँ हैं, उन्हें भी बार-बार नमस्कार। वे कृपा करें, कल्याण करें।
अक्षमाला का ध्यान
पुनरेतस्यां सर्वात्मकत्वं भावयित्वा भावेन पूर्वमालिकामुत्पाद्यारभ्य तन्मयीं महोपहारैरुपहृत्य आदिक्षान्तैरक्षरैरक्षमालामष्टोत्तरशतं स्पृशेत् ।
अर्थ:
फिर इस अक्षमाला में सम्पूर्ण आत्मतत्त्व का भाव करते हुए, पूर्वविधि से माला की रचना करके, उसे महान् उपहारों से पूजित करके, ‘अ’ से ‘क्ष’ तक के अक्षरों के द्वारा १०८ बार अक्षमाला का स्पर्श करना चाहिए।
मन्त्र-मातृका के रूप में अक्षमाला
अथ पुनरुत्थाप्य प्रदक्षिणीकृत्यों नमस्ते भगवति मन्त्रमातृकेऽक्षमाले ।
हे भगवती अक्षमाले! हे मन्त्रों की मातृका! आपको नमस्कार।
सर्ववशङ्कर्यों नमस्ते भगवति मन्त्रमातृकेऽक्षमालिके ।
हे मन्त्र-मातृका अक्षमालिके! आपको नमस्कार।
शेषस्तम्भिन्यों नमस्ते भगवति मन्त्रमातृकेऽक्षमाले ।
हे भगवती मन्त्र-मातृका अक्षमाले! आपको नमस्कार।
उच्चाटन्यों नमस्ते भगवति मन्त्रमातृकेऽक्षमाले ।
हे भगवती मन्त्र-मातृका अक्षमाले! आपको नमस्कार।
विश्वामृत्यो मृत्युञ्जयस्वरूपिणि सकललोकोद्दीपिनि सकललोकरक्षाधिके सकललोकोज्जीविके सकललोकोत्पादिके ।
हे विश्व-मृत्यु से परे मृत्युंजयस्वरूपिणी! समस्त लोकों को प्रकाशित करने वाली, समस्त लोकों की रक्षा करने वाली और समस्त लोकों को जीवन देने वाली! आपको नमस्कार।
दिवाप्रवर्तिके रात्रिप्रवर्तिके नद्यन्तरं यासि देशान्तरं यासि द्वीपान्तरं यासि लोकान्तरं यासि सर्वदा स्फुरसि सर्वहृदि वाससि ।
हे दिन को प्रवर्तित करने वाली और रात को प्रवर्तित करने वाली! आप नदी, देश, द्वीप और लोकों के अन्तर तक जाती हैं। आप सर्वदा प्रकाशित होती हैं और प्रत्येक हृदय में निवास करती हैं।
नमस्ते परारूपे नमस्ते पश्यन्तीरूपे नमस्ते मध्यमारूपे नमस्ते वैखरीरूपे ।
हे परा-वाणी के रूप वाली, आपको नमस्कार। पश्यन्ती रूप वाली, आपको नमस्कार। मध्यमा रूप वाली, आपको नमस्कार। वैखरी रूप वाली, आपको नमस्कार।
सर्वतत्त्वात्मिके सर्वविद्यात्मिके सर्वशक्त्यात्मिके सर्वदेवात्मिके ।
हे समस्त तत्त्वों के स्वरूप वाली! समस्त विद्याओं के स्वरूप वाली! समस्त शक्तियों के स्वरूप वाली! समस्त देवताओं के स्वरूप वाली! आपको नमस्कार।
वसिष्ठेन मुनिनाराधिते विश्वामित्रेण मुनिनोपजीव्यमाने नमस्ते नमस्ते ॥
हे अक्षमाले! आपकी आराधना मुनि वसिष्ठ ने की और मुनि विश्वामित्र ने आपका आश्रय लिया। आपको बार-बार नमस्कार। 
अक्षमाला से मन्त्र-जप का फल
प्रातरधीयानो रात्रिकृतं पापं नाशयति ।
सायमधीयानो दिवसकृतं पापं नाशयति ।
तत्सायंप्रातः प्रयुञ्जानः पापोऽपापो भवति ।
एवमक्षमालिकया जप्तो मन्त्रः सद्यः सिद्धिकरो भवतीत्याह भगवान्गुहः प्रजापतिमित्युपनिषत् ॥
अर्थ:
जो इसका प्रातःकाल अध्ययन करता है, उसके रात्रि में किए हुए पाप नष्ट होते हैं।
जो सायंकाल इसका अध्ययन करता है, उसके दिन में किए हुए पाप नष्ट होते हैं।
जो प्रातः और सायं दोनों समय इसका प्रयोग करता है, वह पाप से मुक्त होता है।
भगवान् गुह ने प्रजापति से कहा— इस प्रकार अक्षमाला द्वारा जपा गया मन्त्र शीघ्र ही सिद्धि प्रदान करने वाला होता है।
समापन शान्तिपाठ
ॐ वाङ् मे मनसि प्रतिष्ठिता मनो मे वाचि प्रतिष्ठितमाविरावीर्म एधि 
वेदस्य म आणीस्थः श्रुतं मे मा प्रहासीरनेनाधीतेनाहोरात्रान्सन्दधाम्यृतं वदिष्यामि सत्यं वदिष्यामि ।
तन्मामवतु तद्वक्तारमवतु अवतु मामवतु वक्तारमवतु वक्तारम् ॥
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
हरिः ॐ तत्सत् ।
इत्यक्षमालिकोपनिषत्समाप्ता ॥
समाप्त। 
एक महत्वपूर्ण बात
इस उपनिषद् का विशेष महत्व यह है कि इसमें माला को केवल जप की गिनती का साधन नहीं, बल्कि सम्पूर्ण वर्णमाला के
५० अक्षर
स्वर — १६
अ आ इ ई उ ऊ ऋ ॠ ऌ ॡ ए ऐ ओ औ अं अः
व्यंजन — ३४
क ख ग घ ङ
च छ ज झ ञ
ट ठ ड ढ ण
त थ द ध न
प फ ब भ म
य र ल व
श ष स ह
ळ
कुल = १६ + ३४ = ५० अक्षर
की मन्त्रशक्ति, विद्या और वाणी की मातृका के रूप में देखा गया है। ‘अ’ से ‘क्ष’ तक के अक्षरों को माला के आध्यात्मिक शरीर में प्रतिष्ठित करने की इसकी कल्पना इसकी मुख्य विशेषता है। उपलब्ध पाठ इसे ऋग्वेदान्तर्गत अक्षमालिकोपनिषद् के रूप में भी सूचीबद्ध करता है। 
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