(72) एकाक्षरोपनिषद
एकाक्षरोपनिषद,--
यह कृष्ण यजुर्वेद की सामान्य उपनिषद् है। इसमें 13 मंत्र हैं।
॥ एकाक्षरोपनिषत् ॥
ध्यान/प्रारम्भिक श्लोक
एकाक्षरपदारूढं सर्वात्मकमखण्डितम् ।
सर्ववर्जितचिन्मात्रं त्रिपान्नारायणं भजे ॥
अर्थ:
मैं उस नारायण का ध्यान करता हूँ जो एकाक्षर (ॐ) में प्रतिष्ठित हैं, जो समस्त प्राणियों के आत्मस्वरूप, अखण्ड तथा सभी उपाधियों से रहित शुद्ध चैतन्यमात्र हैं।
शान्तिपाठ
ॐ सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु
सह वीर्यं करवावहै ।
तेजस्विनावधीतमस्तु मा विद्विषावहै ॥
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
अर्थ:
हे परमात्मन्! हम दोनों की रक्षा करें। हम दोनों का पालन करें। हम दोनों साथ मिलकर सामर्थ्यपूर्वक अध्ययन करें। हमारा अध्ययन तेजस्वी और फलदायक हो। हम परस्पर द्वेष न करें।
ॐ शान्ति! शान्ति! शान्ति!
मन्त्र १
हरिः ॐ
एकाक्षरं त्वक्षरेऽत्रास्ति सोमे
सुषुम्नायां चेह दृढी स एकः ।
त्वं विश्वभूर्भूतपतिः पुराणः
पर्जन्य एको भुवनस्य गोप्ता ॥ १॥
अर्थ:
वह एकाक्षर ॐ अक्षर अर्थात् अविनाशी परम तत्त्व में स्थित है। वह सोम में और इस शरीर की सुषुम्णा नाड़ी में भी दृढ़ रूप से स्थित एक ही परम तत्त्व है। वही सम्पूर्ण विश्व का उद्भवकर्ता, समस्त प्राणियों का स्वामी और सनातन पुरुष है। वही पर्जन्य के रूप में सम्पूर्ण संसार का रक्षक है।
मन्त्र २
विश्वे निमग्नपदवीः कवीनां
त्वं जातवेदो भुवनस्य नाथः ।
अजातमग्रे स हिरण्यरेता
यज्ञैस्त्वमेवैकविभुः पुराणः ॥ २॥
अर्थ:
हे परमात्मन्! आप समस्त ज्ञानी पुरुषों के लक्ष्य और मार्ग के आधार हैं। आप जातवेदस् अग्नि के रूप में सम्पूर्ण संसार के स्वामी हैं। सृष्टि के आरम्भ से पहले भी आप ही अजन्मा थे। आप ही हिरण्यरेता—सृष्टि के दिव्य बीजस्वरूप—हैं। यज्ञों द्वारा पूजित होने वाले वही एक सनातन सर्वशक्तिमान प्रभु हैं।
मन्त्र ३
प्राणः प्रसूतिर्भुवनस्य योनि-
र्व्याप्तं त्वया एकपदेन विश्वम् ।
त्वं विश्वभूर्योनिपारः स्वगर्भे
कुमार एको विशिखः सुधन्वा ॥ ३॥
अर्थ:
आप ही प्राण हैं, समस्त सृष्टि के उत्पत्ति-स्थान और कारण हैं। आपके एक पद—एक परम तत्त्व—से सम्पूर्ण विश्व व्याप्त है। आप ही विश्व को धारण करने वाले और सृष्टि के कारण से भी परे हैं। आप अपने भीतर सम्पूर्ण जगत् को धारण करने वाले एक कुमार, तेजस्वी और उत्तम धनुषधारी परम पुरुष हैं।
मन्त्र ४
वितत्य बाणं तरुणार्कवर्णं
व्योमान्तरे भासि हिरण्यगर्भः ।
भासा त्वया व्योम्नि कृतः सुतार्क्ष्य-
स्तवं वै कुमारस्त्वमरिष्टनेमिः ॥ ४॥
अर्थ:
आप उगते हुए सूर्य के समान तेजस्वी बाण को धारण करके आकाश के मध्य हिरण्यगर्भ के रूप में प्रकाशित होते हैं। आपके प्रकाश से आकाश प्रकाशित होता है। आप गरुड़-सदृश शक्तिशाली तथा कुमारस्वरूप, अविनाशी और कल्याणकारी परम तत्त्व हैं।
मन्त्र ५
त्वं वज्रभृद्भूतपतिस्त्वमेव ।
कामः प्रजानां निहितोऽसि सोमे ।
स्वाहा स्वधा यच्च वषट् करोति
रुद्रः पशूनां गुहया निमग्नः ॥ ५॥
अर्थ:
आप ही वज्र धारण करने वाले इन्द्र और समस्त भूतों के स्वामी हैं। प्राणियों में स्थित इच्छा-शक्ति भी आप ही हैं। यज्ञ में बोला जाने वाला स्वाहा, पितरों के लिए स्वधा और यज्ञ की वषट् क्रिया भी आप ही हैं। आप रुद्र के रूप में समस्त प्राणियों के भीतर गुप्त रूप से स्थित हैं।
मन्त्र ६
धाता विधाता पवनः सुपर्णो
विष्णुर्वराहो रजनी रहश्च ।
भूतं भविष्यत्प्रभवः क्रियाश्च ।
कालः क्रमस्त्वं परमाक्षरं च ॥ ६॥
अर्थ:
आप ही धाता और विधाता हैं; आप ही पवन, सुपर्ण, विष्णु और वराह हैं। आप ही रात्रि और उसके रहस्य हैं। भूतकाल, भविष्यकाल, समस्त उत्पत्ति और सभी क्रियाएँ आपसे ही हैं। आप ही काल हैं, काल की गति हैं और परम अक्षर—अविनाशी ब्रह्म—भी आप ही हैं।
मन्त्र ७
ऋचो यजूंशि प्रसवन्ति वक्त्रा-
त्सामानि सम्राड्वसुवन्तरिक्षम् ।
त्वं यज्ञनेता हुतभुग्विभुश्च
रुद्रास्तथा दैत्यगणा वसुश्च ॥ ७॥
अर्थ:
आपके मुख से ऋग्वेद की ऋचाएँ, यजुर्वेद के मन्त्र और सामवेद के साम प्रकट होते हैं। आप सम्राट् हैं, वसु हैं और अन्तरिक्षस्वरूप हैं। आप यज्ञ के नेता, यज्ञ में आहुति ग्रहण करने वाले अग्नि तथा सर्वव्यापक प्रभु हैं। रुद्र, दैत्यगण और वसु—इन सब रूपों में भी वही एक परम तत्त्व विद्यमान है।
मन्त्र ८
स एष देवोऽम्बरगश्च चक्रे
अन्येऽभ्यधिष्ठेत तमो निरुन्ध्यः ।
हिरण्मयं यस्य विभाति सर्वं
व्योमान्तरे रश्मिमिवांशुनाभिः ॥ ८॥
अर्थ:
वही देव आकाश में विचरण करने वाला और समस्त जगत् का नियन्ता है। वह अज्ञानरूपी अन्धकार को दूर करता है। उसी के कारण सम्पूर्ण जगत् स्वर्णमय प्रकाश से प्रकाशित दिखाई देता है, जैसे आकाश में सूर्य अपनी किरणों से प्रकाश फैलाता है।
मन्त्र ९
स सर्ववेत्ता भुवनस्य गोप्ता
ताभिः प्रजानां निहिता जनानाम्
प्रोता त्वमोता विचितिः क्रमाणां
प्रजापतिश्छन्दमयो विगर्भः ॥ ९॥
अर्थ:
वही परमात्मा सब कुछ जानने वाला और समस्त भुवनों का रक्षक है। उसी में सभी प्राणियों की शक्तियाँ निहित हैं। वह सबमें ओत-प्रोत है और समस्त क्रम तथा व्यवस्था का आधार है। वही प्रजापति और समस्त छन्दों में व्याप्त परम तत्त्व है।
मन्त्र १०
सामैश्चिदन्तो विरजश्च बाहूं
हिरण्मयं वेदविदां वरिष्ठम् ।
यमध्वरे ब्रह्मविदः स्तुवन्ति
सामैर्यजुर्भिः क्रतुभिस्त्वमेव ॥ १०॥
अर्थ:
आप ही सामवेद की अन्तिम सत्ता और निर्मल स्वरूप हैं। आपके बाहु हिरण्यमय शक्ति के प्रतीक हैं। आप वेद को जानने वालों में श्रेष्ठ परम तत्त्व हैं। यज्ञ में ब्रह्मज्ञानी पुरुष जिनकी स्तुति करते हैं, वे आप ही हैं। साम, यजुर्वेद तथा विभिन्न यज्ञ-कर्मों में पूजित परम सत्ता भी आप ही हैं।
मन्त्र ११
त्वं स्त्री पुमांस्त्वं च कुमार एक-
स्त्वं वै कुमारी ह्यथ भूस्त्वमेव ।
त्वमेव धाता वरुणश्च राजा
त्वं वत्सरोऽग्न्यर्यम एव सर्वम् ॥ ११॥
अर्थ:
आप ही स्त्री हैं, आप ही पुरुष हैं। आप ही कुमार और कुमारी हैं। आप ही पृथ्वी हैं। आप ही धाता, राजा वरुण, वर्ष (संवत्सर), अग्नि और अर्यमा हैं। अर्थात् संसार में जो कुछ भी रूप और सत्ता दिखाई देती है, वह उसी एक परम तत्त्व की अभिव्यक्ति है।
मन्त्र १२
मित्रः सुपर्णश्चन्द्र इन्द्रो रुद्र-
स्त्वष्टा विष्णुः सविता गोपतिस्त्वम् ।
त्वं विष्णुर्भूतानि तु त्रासि दैत्यां-
स्त्वयावृतं जगदुद्भवगर्भः ॥ १२॥
अर्थ:
आप ही मित्र, सुपर्ण, चन्द्र, इन्द्र, रुद्र, त्वष्टा, विष्णु और सविता हैं। आप ही गोपति—सभी प्राणियों के रक्षक—हैं। विष्णु के रूप में आप समस्त प्राणियों की रक्षा करते हैं। सम्पूर्ण जगत् आपसे आवृत है और आपके भीतर ही सृष्टि का मूल कारण स्थित है।
मन्त्र १३
त्वं भूर्भुवः स्वस्त्वं हि
स्वयंभूरथ विश्वतोमुखः ।
य एवं नित्यं वेदयते गुहाशयं
प्रभुं पुराणं सर्वभूतं हिरण्मयम् ॥ १३॥
अर्थ:
आप ही भूः, भुवः और स्वः—तीनों लोकों के स्वरूप हैं। आप स्वयंभू हैं और विश्वतोमुख—सभी दिशाओं में मुख वाले, अर्थात् सर्वव्यापक हैं। जो साधक नित्य उस हृदय-गुहा में स्थित, सनातन, सर्वशक्तिमान, समस्त प्राणियों में विद्यमान और प्रकाशस्वरूप परमात्मा को जानता है—
हिरण्मयं बुद्धिमतां परां गतिं
स बुद्धिमान्बुद्धिमतीत्य तिष्ठतीत्युपनिषत् ॥
अर्थ:
वह हिरण्मय, प्रकाशस्वरूप परमात्मा ही बुद्धिमानों की परम गति है। जो उसे जान लेता है, वह वास्तव में बुद्धिमान है और सामान्य बुद्धि की सीमाओं से परे उस परम सत्य में स्थित हो जाता है। यही उपनिषद् का रहस्य है।
समापन शान्तिपाठ
ॐ सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु
सह वीर्यं करवावहै ।
तेजस्विनावधीतमस्तु मा विद्विषावहै ॥
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
इत्येकाक्षरोपनिषत्समाप्ता ॥
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