(71) अव्यक्तोपनिषद

अव्यक्तोपनिषद--
 अव्यक्तोपनिषद् को अव्यक्तनृसिंहोपनिषद् भी कहा जाता है। यह सामवेद से सम्बद्ध वैष्णव उपनिषद् के रूप में सूचीबद्ध है और 108 उपनिषदों की मुक्तिका-सूची में इसका क्रमांक 68 मिलता है। उपलब्ध पाठ में सात खण्ड हैं।
॥ अव्यक्तोपनिषत् ॥
मंगलाचरण
स्वाज्ञानासुरराड्ग्रासस्वज्ञाननरकेसरी ।
प्रतियोगिविनिर्मुक्तं ब्रह्ममात्रं करोतु माम् ॥
अर्थ—
जो भगवान् नृसिंह अपने ज्ञानरूपी स्वरूप से अज्ञानरूपी असुरराज का नाश करते हैं, वे मुझे सभी द्वैत-विरोधों से रहित केवल ब्रह्मस्वरूप बना दें।
शान्तिपाठ
ॐ आप्यायन्तु ममाङ्गानि वाक्प्राणश्चक्षुः श्रोत्रमथो
बलमिन्द्रियाणि च ॥
सर्वाणि सर्वं ब्रह्मोपनिषदं माहं ब्रह्म निराकुर्यां
मा मा ब्रह्म निराकरोदनिराकरणमस्त्वनिराकरणं मेऽस्तु
तदात्मनि निरते य उपनिषत्सु धर्मास्ते मयि सन्तु ते मयि सन्तु ॥
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
अर्थ—
मेरे अंग, वाणी, प्राण, नेत्र, कान, बल और सभी इन्द्रियाँ पुष्ट हों। यह सम्पूर्ण जगत् ब्रह्म है। मैं ब्रह्म का त्याग न करूँ और ब्रह्म भी मुझसे दूर न हो। उपनिषदों में बताए गए धर्म और सत्य मेरे भीतर प्रतिष्ठित हों।
प्रथम खण्ड
सृष्टि से पूर्व ब्रह्म की अवस्था
हरिः ॐ । पुरा किलेदं न किञ्चन्नासीन्न द्यौर्नान्तरिक्षं न पृथिवी केवलं ज्योतीरूपमनाद्यनन्तमनण्वस्थूलरूपमरूपं रूपवदविज्ञेयं ज्ञानरूपमानन्दमयमासीत् ।
अर्थ—
सृष्टि के आरम्भ से पहले यहाँ कुछ भी नहीं था—न आकाश, न अन्तरिक्ष और न पृथ्वी। केवल प्रकाशस्वरूप, अनादि, अनन्त, न अणु और न स्थूल, अरूप होते हुए भी सभी रूपों का आधार, इन्द्रियों से अगोचर, ज्ञानस्वरूप और आनन्दमय ब्रह्म ही विद्यमान था।
परमेष्ठी की उत्पत्ति--
तदनन्यत्तद्द्वेधाभूद्धरितमेकं रक्तमपरम् ।
तत्र यद्रक्तं तत्पुंसो रूपमभूत् । यद्धरितं तन्मायायाः ।
तौ समगच्छतः । तयोर्वीर्यमेवमनन्दत् । तदवर्धत ।
तदण्डमभूद्धैमम् । तत्परिणममानमभूत् ।
ततः परमेष्ठी व्यजायत ॥
अर्थ—
वह एक ही तत्त्व दो रूपों में प्रकट हुआ—एक रक्तवर्ण और दूसरा हरितवर्ण। रक्त भाग पुरुष का और हरित भाग माया का प्रतीक बना। दोनों के संयोग से शक्ति उत्पन्न हुई, वह बढ़ी और स्वर्णमय अण्ड के रूप में परिणत हुई। उसी से परमेष्ठी की उत्पत्ति हुई।
परमेष्ठी का प्रश्न--
सोऽभिजिज्ञासत किं मे कुलं किं मे कृत्यमिति ।
तं ह वागदृश्यमानाभ्युवाच—
भो भो प्रजापते त्वमव्यक्तादुत्पन्नोऽसि व्यक्तं ते कृत्यमिति ।
अर्थ—
परमेष्ठी ने विचार किया—“मेरा मूल क्या है? मेरा कार्य क्या है?” तब अदृश्य वाणी ने कहा—“हे प्रजापति! तुम अव्यक्त से उत्पन्न हुए हो और तुम्हारा कार्य व्यक्त जगत् की सृष्टि करना है।”
किमव्यक्तं यस्मादहमासिषम् । किं तद्व्यक्तं यन्मे कृत्यमिति ।
उन्होंने पूछा—“अव्यक्त क्या है, जिससे मैं उत्पन्न हुआ? और व्यक्त क्या है, जो मेरा कार्य है?”
साब्रवीदविज्ञेयं हि तत्सौम्य तेजः 
यदविज्ञेयं तदव्यक्तम् । तच्चेज्जिज्ञाससि मावगच्छेति ।
अर्थ—
वाणी ने कहा—“हे सौम्य! वह तेज ऐसा है जिसे सामान्य ज्ञान से जाना नहीं जा सकता। जो इन्द्रियों और सामान्य बुद्धि से अगोचर है, वही अव्यक्त है। यदि तुम उसे जानना चाहते हो तो मुझे जानो।”
स होवाच कैषा त्वं ब्रह्मवाग्यदसि शंसात्मानमिति ।
सा त्वब्रवीत्तपसा मां विजिज्ञासस्वेति ।
स ह सहस्रं समा ब्रह्मचर्यमध्युवासाध्युवास ॥ १॥
अर्थ—
परमेष्ठी ने पूछा—“तुम कौन हो, हे ब्रह्मवाणी?” उसने कहा—“तपस्या द्वारा मुझे जानो।” तब परमेष्ठी ने एक हजार वर्षों तक ब्रह्मचर्य और तप का पालन किया।
द्वितीय खण्ड
आनुष्टुभी विद्या का दर्शन
अथापश्यदृचमानुष्टुभीं परमां विद्यां
यस्याङ्गान्यन्ये मन्त्राः । यत्र ब्रह्म प्रतिष्ठितम् ।
विश्वेदेवाः प्रतिष्ठिताः । यस्तां न वेद किमन्यैर्वेदैः करिष्यति ॥
अर्थ—
तब परमेष्ठी ने आनुष्टुभ छन्द में स्थित परम विद्या का दर्शन किया। जिसके अंग अन्य मन्त्र हैं और जिसमें ब्रह्म प्रतिष्ठित है तथा जिसमें समस्त देवता प्रतिष्ठित हैं। जो इस विद्या को नहीं जानता, उसके लिए अन्य वेदों को जानने का क्या लाभ?
नृसिंह का दर्शन
तां विदित्वा स च रक्तं जिज्ञासयामास ।
तामेवमनूचानां गायन्नासिष्ट ।
अर्थ—
उस विद्या को जानकर उसने उस रक्तस्वरूप पुरुष-तत्त्व को जानने की इच्छा की और उसी विद्या का गायन करते हुए साधना की।
सहस्रं समा आद्यन्तनिहितोङ्कारेण पदान्यगायत् ।
सहस्रं समास्तथैवाक्षरशः ।
अर्थ—
उसने एक हजार वर्षों तक आदि और अन्त में ओंकार से युक्त पदों का गायन किया और एक-एक अक्षर का भी उसी प्रकार ध्यान किया।
तब उसे दिव्य नृसिंह का दर्शन हुआ—
ज्योतिर्मयं श्रियालिङ्गितं सुपर्णरथं शेषफणाच्छादितमौलिं
मृगमुखं नरवपुषं शशिसूर्यहव्यवाहनात्मकनयनत्रयम् ।
अर्थ—
उसने प्रकाशमय भगवान् को देखा, जो श्री से आलिंगित थे; जिनका वाहन गरुड़ था; जिनके मस्तक पर शेषनाग का फण था; जिनका मुख सिंह का और शरीर मनुष्य का था तथा जिनके तीन नेत्र सूर्य, चन्द्र और अग्नि के समान थे।
नृसिंह-स्तुति
उग्रं वीरं महाविष्णुं ज्वलन्तं सर्वतोमुखम् ।
नृसिंहं भीषणं भद्रं मृत्योर्मृत्युं नमाम्यहम् ॥
अर्थ—
मैं उग्र, वीर, महाविष्णु, प्रकाशमान, सर्वमुखी, नृसिंह, भयंकर होते हुए भी कल्याणकारी और मृत्यु की भी मृत्यु—ऐसे भगवान् को प्रणाम करता हूँ।
उपनिषद् इन प्रत्येक विशेषणों का दार्शनिक अर्थ भी बताती है—‘उग्र’ उनके सिंहस्वरूप के कारण, ‘वीर’ उनकी शक्ति के कारण, ‘महाविष्णु’ उनके समस्त लोकों में व्यापक होने के कारण और ‘मृत्योर्मृत्युम्’ इसलिए कि वे मृत्यु को भी अतिक्रमित करने वाले हैं।
तृतीय खण्ड
व्यक्त का स्वरूप
भगवान् नृसिंह प्रजापति से कहते हैं—
अथ भगवांस्तमब्रवीत्प्रजापते प्रीतोऽहं किं तवेप्सितं तदाशंसेति 
अर्थ—
भगवान् ने कहा—“हे प्रजापति! मैं तुमसे प्रसन्न हूँ। तुम्हारी क्या इच्छा है?”
प्रजापति ने कहा—
भगवन्नव्यक्तादुत्पन्नोऽस्मि व्यक्तं मम कृत्यमिति पुराश्रावि ।
तत्राव्यक्तं भवानित्यज्ञायि व्यक्तं मे कथयेति ।
अर्थ—
“भगवन्! मैंने सुना है कि मैं अव्यक्त से उत्पन्न हुआ हूँ और व्यक्त जगत् की रचना करना मेरा कार्य है। मैंने जाना कि आप ही वह अव्यक्त हैं। अब मुझे व्यक्त का स्वरूप बताइए।”
भगवान् ने उत्तर दिया—
व्यक्तं वै विश्वं चराचरात्मकम् ।
यद्व्यज्यते तद्व्यक्तस्य व्यक्तत्वमिति ॥
अर्थ—
“चर और अचर से युक्त सम्पूर्ण विश्व ही व्यक्त है। जो प्रकट होता है, वही व्यक्त कहलाता है।”
जगत्-सृष्टि का उपाय
प्रजापति ने पूछा—
न शक्नोमि जगत्स्रष्टुमुपायं मे कथयेति ।
“मैं जगत् की रचना करने में समर्थ नहीं हूँ। मुझे इसका उपाय बताइए।”
भगवान् कहते हैं—
पुरुषः प्रजापते शृणु सृष्टेरुपायं परमं
यं विदित्वा सर्वं ज्ञास्यसि ।
सर्वत्र शक्ष्यसि सर्वं करिष्यसि ।
अर्थ—
“हे प्रजापति! सृष्टि का परम उपाय सुनो। इसे जानकर तुम सब कुछ जानोगे, हर जगह समर्थ होगे और सब कार्य कर सकोगे।”
फिर ध्यानयज्ञ का निर्देश है—
मय्यग्नौ स्वात्मानं हविर्ध्यायेत्तयैवानुष्टुभर्चा ।
ध्यानयज्ञोऽयमेव ॥
अर्थ—
“मुझमें स्थित अग्नि में अपने आत्मस्वरूप को हवि मानकर उसी आनुष्टुभ ऋचा के द्वारा ध्यान करो। यही ध्यानयज्ञ है।”
ध्यानयज्ञ की महिमा
एतद्वै महोपनिषद्देवानां गुह्यम् ।
न ह वा एतस्य साम्ना नर्चा न यजुषार्थो नु विद्यते ।
अर्थ—
यह देवताओं का महान् और गुप्त उपनिषद्-ज्ञान है। इसे जान लेने पर केवल साम, ऋक् या यजुः के बाहरी कर्मकाण्ड का अलग प्रयोजन शेष नहीं रहता।
य इमा वेद स सर्वान्कामानवाप्य सर्वांल्लोकाञ्जित्वा मामेवाभ्युपैति न स पुनरावर्तते य एवं वेदेति ॥ ३॥
अर्थ—
जो इस विद्या को जानता है, वह अपने सभी उचित अभिलाषित फल प्राप्त करके समस्त लोकों पर विजय पाता हुआ परमात्मा को प्राप्त करता है और फिर संसार में वापस नहीं आता।
चतुर्थ खण्ड
ध्यानयज्ञ द्वारा सर्वज्ञता
प्रजापतिस्तं यज्ञायं वसीयांसमात्मानं मन्यमानो मनोयज्ञेनेजे ।
सप्रणवया तयैवर्चा हविर्ध्यात्वात्मानमात्मन्यग्नौ जुहुयात् ।
सर्वमजानात्सर्वत्राशकत्सर्वमकरोत् ॥ ४॥
अर्थ—
प्रजापति ने अपने आत्मस्वरूप को यज्ञ के लिए श्रेष्ठ मानकर मनोयज्ञ किया। प्रणव अर्थात् ॐ सहित उसी ऋचा को हवि मानकर अपने आत्मस्वरूप का ध्यान किया और आत्मरूपी अग्नि में उसका अर्पण किया। तब वह सर्वज्ञ हुआ, सर्वत्र समर्थ हुआ और सब कुछ करने में समर्थ हुआ।
य एवं विद्वानिमं ध्यानयज्ञमनुतिष्ठेत्
स सर्वज्ञोऽनन्तशक्तिः सर्वकर्ता भवति ।
स सर्वांॅल्लोकाञ्जित्वा ब्रह्म परं प्राप्नोति ॥
अर्थ—
जो ज्ञानी इस ध्यानयज्ञ का आचरण करता है, वह सर्वज्ञ, अनन्त शक्ति से सम्पन्न और सर्वकर्ता बनता है। वह सभी लोकों को जीतकर परम ब्रह्म को प्राप्त करता है।
पंचम खण्ड
लोकों की सृष्टि
अथ प्रजापतिर्लोकान्सिसृक्षमाणस्तस्या एव विद्याया
यानि त्रिंशदक्षराणि तेभ्यस्त्रींॅल्लोकान् ।
अथ द्वे द्वे अक्षरे ताभ्यामुभयतो दधार ॥
अर्थ—
जब प्रजापति ने लोकों की रचना करनी चाही, तब उस विद्या के तीस अक्षरों से तीन लोकों की रचना की और दो-दो अक्षरों के द्वारा उन्हें दोनों ओर से धारण किया।
देवताओं की सृष्टि
तस्या एवर्चो द्वात्रिंशद्भिरक्षरैस्तान्देवान्निर्ममे ।
सर्वैरेव स इन्द्रोऽभवत् ।
तस्मादिन्द्रो देवानामधिकोऽभवत् 
य एवं वेद समानानामधिको भवेत् ॥
अर्थ—
उसी ऋचा के बत्तीस अक्षरों से उसने देवताओं की रचना की। उन्हीं सबके द्वारा वह इन्द्रस्वरूप हुआ। इसलिए इन्द्र देवताओं में श्रेष्ठ हुआ। जो इस रहस्य को जानता है, वह भी अपने समान लोगों में श्रेष्ठ होता है।
रुद्र, आदित्य और वसु
तस्या एकादशभिः पादैरेकादश रुद्रान्निर्ममे ।
तस्या एकादशभिरेकादशादित्यान्निर्ममे 
सर्वैरेव स विष्णुरभवत् ।
अर्थ—
उस विद्या के ग्यारह पदों से ग्यारह रुद्रों की और ग्यारह से ग्यारह आदित्यों की सृष्टि की। उन्हीं सबके द्वारा वह विष्णुस्वरूप हुआ।
स चतुर्भिश्चतुर्भिरक्षरैरष्टौ वसूनजनयत् ।
अर्थ—
चार-चार अक्षरों के द्वारा उसने आठ वसुओं की सृष्टि की।
वर्णों की सृष्टि
स तस्या आद्यैर्द्वादशभिरक्षरैर्ब्राह्मणमजनयत् ।
दशभिर्दशभिर्विट्क्षत्रे ।
तस्माद्ब्राह्मणो मुख्यो भवति ।
एवं तन्मुख्यो भवति य एवं वेद ।
तूष्णीं शूद्रमजनयत्तस्माच्छूद्रो निर्विद्योऽभवत् ॥
अर्थ—
उसने प्रारम्भिक बारह अक्षरों से ब्राह्मण, और दस-दस अक्षरों से वैश्य तथा क्षत्रिय की रचना बताई। इस प्रकार ज्ञान को प्रधानता दी गई है। शूद्र के विषय में पाठ उसे ‘निर्विद्य’ अर्थात् उस विशिष्ट विद्या से रहित बताता है।
दिन और रात
न वेदं इवा न नक्तमासीदव्यावृतम् 
स प्रजापतिरानुष्टुभाभ्यामर्धर्चाभ्यामहोरात्रावकल्पयत् ॥
अर्थ—
आरम्भ में न दिन था, न रात। प्रजापति ने आनुष्टुभ के दो अर्धर्चों से दिन और रात की व्यवस्था की।
चारों वेद और छन्द
ऋग्वेदमस्या आद्यात्पादादकल्पयत् ।
यजुर्द्वितीयात् । साम तृतीयात् ।
अथर्वाङ्गिरसश्चतुर्थात् ॥
अर्थ—
उसके प्रथम पाद से ऋग्वेद, दूसरे से यजुर्वेद, तीसरे से सामवेद और चौथे से अथर्वाङ्गिरस की रचना बताई गई है।
यदष्टाक्षरपदा तेन गायत्री ।
यदेकादशपदा तेन त्रिष्टुप् ।
यच्चतुष्पदा तेन जगती यद्द्वात्रिंशदक्षरा तेनानुष्टुप् ।
अर्थ—
आठ अक्षरों से गायत्री, ग्यारह से त्रिष्टुप्, चार पादों से जगती और बत्तीस अक्षरों से अनुष्टुप् छन्द की व्यवस्था बताई गई है।
सा वा एषा सर्वाणि छन्दांसि ।
य इमां सर्वाणि छन्दांसि वेद ।
सर्वं जगदानुष्टुभ एवोत्पन्नमनुष्टुप्प्रतिष्ठितं
प्रतितिष्ठति यश्चैवं वेद ॥ ५॥
अर्थ—
यह विद्या सभी छन्दों का आधार है। जो इसे जानता है, वह सभी छन्दों के रहस्य को जानता है। समस्त जगत् आनुष्टुभ से उत्पन्न और उसी में प्रतिष्ठित माना गया है।
षष्ठ खण्ड
स्त्री-पुरुष की सृष्टि
अथ यदा प्रजाः सृष्टा न जायन्ते प्रजापतिः कथं
न्विमाः प्रजाः सृजेयमिति चिन्तयन्नुग्रमितीमामृचं
गातुमुपाक्रामत् ।
अर्थ—
जब प्रजापति द्वारा उत्पन्न प्रजा आगे उत्पन्न नहीं हो रही थी, तब उन्होंने सोचा—“मैं इन प्रजाओं को आगे कैसे उत्पन्न करूँ?” और ‘उग्र’ नामक ऋचा का गायन आरम्भ किया।
ततः प्रथमपादादुग्ररूपो देवः प्रादुरभूत् एकः
श्यामः पुरतो रक्तः पिनाकी स्त्रीपुंसरूपः ।
अर्थ—
तब प्रथम पाद से उग्ररूप देवता प्रकट हुए—श्यामवर्ण, सामने से रक्तवर्ण, पिनाकधारी और स्त्री-पुरुष दोनों रूपों से युक्त।
तं विभज्य स्त्रीषु तस्य स्त्रीरूपं पुंसि च पुंरूपं व्यधात् ।
उभाभ्यामंशाभ्यां सर्वमादिष्टः । ततः प्रजाः प्रजायन्ते ॥
अर्थ—
उस एक रूप को विभाजित करके स्त्रियों में स्त्री-रूप और पुरुषों में पुरुष-रूप स्थापित किया गया। दोनों अंशों से प्रजा की उत्पत्ति होने लगी।
इन्द्र की कथा
इन्द्रो वै किल देवानामनुजावर आसीत् ।
तं प्रजापतिरब्रवीद्गच्छ देवानामधिपतिर्भवेति ॥
अर्थ—
इन्द्र देवताओं में कनिष्ठ माने जाते थे। प्रजापति ने उनसे कहा—“जाओ, देवताओं के अधिपति बनो।”
लेकिन देवताओं ने कहा—
अनुजावरोऽसि त्वमस्माकं कुतस्त्वाधिपत्यमिति ।
अर्थ—
“तुम तो हममें कनिष्ठ हो, फिर तुम्हें हमारा अधिपति क्यों माना जाए?”
इन्द्र प्रजापति के पास गए। तब प्रजापति ने उन्हें अभिषिक्त किया और शक्ति प्रदान की।
ततः सुदुर्निरीक्षोऽभवत् ।
तस्मै विद्यामानुष्टुभीं प्रादात् ।
ततो देवास्तमाधिपत्यायानुमेनिरे 
स स्वराडभूत् । य एवं वेद स्वराड् भवेत् ॥
अर्थ—
तब इन्द्र अत्यन्त तेजस्वी और दुर्निरीक्ष्य हो गए। प्रजापति ने उन्हें आनुष्टुभी विद्या प्रदान की। तब देवताओं ने उन्हें अपना अधिपति स्वीकार किया। वे स्वराज् हुए। जो इस ज्ञान को जानता है, वह भी स्वराज्—अपने ऊपर स्वयं शासन करने वाला—होता है।
पृथ्वी पर विजय
सोऽमन्यत पृथिवीमपि कथं अपां जयेयमिति ।
स प्रजापतिमुपाधावत् ।
अर्थ—
इन्द्र ने सोचा—“मैं पृथ्वी और जल पर कैसे विजय प्राप्त करूँ?” इसलिए वे प्रजापति के पास गए।
प्रजापति ने उन्हें विशेष आसन प्रदान किया और इन्द्र ने पृथ्वी पर विजय प्राप्त की।
ततः स उभयोर्लोकयोरधिपतिरभूत् ।
य एवं वेदोभयोलोकयोरधिपतिर्भवति ।
स पृथिवीं जयति ॥
अर्थ—
तब वह दोनों लोकों का अधिपति हुआ। जो इस रहस्य को जानता है, वह भी दोनों लोकों पर प्रभुत्व प्राप्त करता है और पृथ्वी पर विजय प्राप्त करता है।
आत्म-प्रतिष्ठा
यो वा अप्रतिष्ठितं शिथिलं भ्रातृवेभ्यो वसीयान्भवति
यश्चैवं वेद यश्चैवं वेद ॥ ६॥
इस पाठ का आशय है कि जो आत्म-प्रतिष्ठा से रहित और भीतर से शिथिल है, वह दूसरों से पीछे रह जाता है; जो इस ज्ञान को जानता है, वह आत्मबल और प्रतिष्ठा प्राप्त करता है।
सप्तम खण्ड
इस विद्या के अध्ययन का फल
य इमां विद्यामधीते स सर्वान्वेदानधीते ।
स सर्वैः क्रतुभिर्यजते । स सर्वतीर्थेषु स्नाति ।
अर्थ—
जो इस विद्या का अध्ययन करता है, मानो उसने सभी वेदों का अध्ययन कर लिया। मानो उसने सभी यज्ञ किए और सभी तीर्थों में स्नान किया।
स महापातकोपपातकैः प्रमुच्यते 
स ब्रह्मवर्चसं महदाप्नुयात् ।
अर्थ—
वह महापापों और उपपापों से मुक्त होता है तथा महान् ब्रह्मतेज प्राप्त करता है।
आब्रह्मणः पूर्वानाकल्पांश्चोत्तरांश्च वंशान्पुनीते ।
अर्थ—
वह अपने पूर्वजों और आगे आने वाली पीढ़ियों को भी पवित्र करने वाला होता है।
नैनमपस्मारादयो रोगा आदिधेयुः 
अर्थ—
विभिन्न प्रकार के रोग उसे आसानी से प्रभावित नहीं करते।
चिन्तितमात्रादस्य सर्वेऽर्थाः सिद्ध्येयुः ।
पितरमिवैनं सर्वे मन्यन्ते ।
राजानश्चास्यादेशकारिणो भवन्ति ॥
अर्थ—
उसकी उचित इच्छाएँ पूर्ण होती हैं। लोग उसे पिता के समान सम्मान देते हैं और राजा भी उसके आदेश का सम्मान करते हैं।
जीवन्मुक्ति
जीवन्मुक्तश्च भवति ।
देहान्ते तमसः परं धाम प्राप्नुयात् 
यत्र विराण् नृसिंहोऽवभासते तत्र खलूपासते ।
अर्थ—
वह जीवित रहते हुए ही मुक्त होता है। शरीर का अन्त होने पर अज्ञानरूपी अन्धकार से परे परम धाम को प्राप्त करता है, जहाँ विराट् नृसिंह का प्रकाश है।
तत्स्वरूपध्यानपरा मुनय आकल्पान्ते
तस्मिन्नेवात्मनि लीयन्ते । न च पुनरावर्तन्ते ॥
अर्थ—
जो मुनि उस परम स्वरूप के ध्यान में निरत रहते हैं, वे कल्प के अन्त में उसी आत्मतत्त्व में लीन हो जाते हैं और फिर संसार में वापस नहीं आते।
विद्या देने की मर्यादा
उपनिषद् अन्त में इस ज्ञान को योग्य शिष्य को ही देने की बात कहती है—
न चेमां विद्यामश्रद्दधानाय ब्रूयान्नासूयावते
नानूचानाय नाविष्णुभक्ताय नानृतिने नातपसे
नादान्ताय नाशान्ताय नादीक्षिताय नाधर्मशीलाय
न हिंसकाय नाब्रह्मचारिण इत्येषोपनिषत् ॥
अर्थ—
इस विद्या को ऐसे व्यक्ति को नहीं बताना चाहिए जिसमें श्रद्धा न हो, जो दोष-दृष्टि वाला हो, अध्ययनशील न हो, विष्णुभक्त न हो, असत्यवादी हो, तप न करता हो, इन्द्रियों को वश में न रखता हो, अशान्त हो, अनुशासनहीन हो, अधर्माचारी हो, हिंसक हो अथवा ब्रह्मचर्य का पालन न करता हो। यही इस उपनिषद् की शिक्षा है।
समापन शान्तिपाठ
ॐ आप्यायन्तु ममाङ्गानि वाक्प्राणश्चक्षुः श्रोत्रमथो
बलमिन्द्रियाणि च ॥
सर्वाणि सर्वं ब्रह्मोपनिषदं माहं ब्रह्म निराकुर्यां
मा मा ब्रह्म निराकरोदनिराकरणमस्त्वनिराकरणं मेऽस्तु
तदात्मनि निरते य उपनिषत्सु धर्मास्ते मयि सन्तु ते मयि सन्तु ॥
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
हरिः ॐ तत्सत् ॥
इत्यव्यक्तोपनिषत्समाप्ता ॥
यह उपलब्ध संस्कृत पाठ में दिया गया समापन है। 
अव्यक्तोपनिषद् का मुख्य संदेश
इस उपनिषद् का केन्द्र “अव्यक्त से व्यक्त की उत्पत्ति”, ब्रह्म, माया, नृसिंह-तत्त्व, ध्यानयज्ञ और अन्ततः आत्मज्ञान द्वारा मुक्ति है। इसका विशेष जोर बाहरी यज्ञ की अपेक्षा आत्मा को ही हवि मानकर ध्यानरूपी यज्ञ करने पर है।
-------×------×-------×-------×--

Comments

Popular posts from this blog

डा० सूर्य पाल सिंह का उत्कृष्ट व्यक्तित्व

---प्राणायाम से दिव्य शक्ति की प्राप्ति---

ऋगुवेद सूक्ति--(53) की व्याख्या