यजुर्वेद सूक्ति(14) की व्याख्या
यजुर्वेद सूक्ति(14) की व्याख्या "श्रोत्रंयज्ञेन कल्पताम्" यजुर्वेद--11/81 भावार्थ--हमारे कान शुभ वचनों को ग्रहण करने वाले बनें। वेदों में प्रमाण-- “हमारे कान शुभ/कल्याणकारी वचन सुनें और ग्रहण करें” इस विषय पर वेदों में कई प्रमाण हैं। सबसे प्रत्यक्ष प्रमाण ऋग्वेद 1.89.8 है। 1. ऋग्वेद 1.89.8 — सबसे स्पष्ट प्रमाण भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवाः। भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः। स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवांसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायुः॥ अर्थ: “हे देवो! हम अपने कानों से भद्र अर्थात् शुभ और कल्याणकारी बातों को सुनें, अपनी आँखों से शुभ देखें, स्वस्थ अंगों से युक्त होकर देवहितमय जीवन व्यतीत करें।” यह आपके भाव “हमारे कान शुभ वचनों को ग्रहण करने वाले बनें” का सबसे सीधा वैदिक प्रमाण है। 2. यजुर्वेद — श्रोत्र की सामर्थ्य के लिए प्रार्थना शुक्ल यजुर्वेद, वाजसनेयी माध्यन्दिन संहिता 9.21 में: आयुर्यज्ञेन कल्पतां प्राणो यज्ञेन कल्पतां चक्षुर्यज्ञेन कल्पतां श्रोत्रं यज्ञेन कल्पताम्। पृष्ठं यज्ञेन कल्पतां यज्ञो यज्ञेन कल्पताम्। प्रजापतेः प्रजा अभूम् स्वर्देवा अगन्मामृता अभूम॥ अर्थ में “श्रोत्रं यज्ञेन ...