ऋग्वेद सूक्ति--(74) की व्याख्या
ऋग्वेद सूक्ति--(74) की व्याख्या "तरणि:इत जयति" ऋग्वेद -7/32/9 भावार्थ --परिश्रमी ही सफल होता है। पूरा श्लोक अर्थ सहित ऋग्वेद मण्डल 7, सूक्त 32, मंत्र 9 का मूल पाठ इस प्रकार है— मा स्रेधत सोमिनो दक्षता महे कृणुध्वं राय आतुजे। तरणिरिज्जयति क्षेति पुष्यति न देवासः कवत्नवे॥ (ऋग्वेद 7.32.9) पदच्छेद मा । स्रेधत । सोमिनः । दक्षत । महे । कृणुध्वम् । राये । आतुजे । तरणिः । इत् । जयति । क्षेति । पुष्यति । न । देवासः । कवत्नवे । शब्दार्थ तरणिः = परिश्रमी, कर्मशील, सक्रिय पुरुष जयति = विजय प्राप्त करता है क्षेति = स्थिर होकर रहता है, सुरक्षित निवास पाता है पुष्यति = उन्नति करता है, समृद्ध होता है देवासः न कवत्नवे = देवता आलसी, कृपण या कर्महीन व्यक्ति का साथ नहीं देते। भावार्थ हे सोमयाग करने वालों! आलस्य मत करो, दक्ष और कर्मशील बनो तथा महान शक्ति के लिए प्रयत्न करो। परिश्रमी और सक्रिय व्यक्ति ही विजय प्राप्त करता है, स्थिरता पाता है और उन्नति करता है; देवता आलसी अथवा कर्महीन व्यक्ति का समर्थन नहीं करते। संक्षिप्त संदेश इस मंत्र का प्रसिद्ध सूत्र है— “तरणिर्जयति” — परिश्रमी व...