(73) ठीक करना है अन्नपूर्णोपनिषद





जी। मैंने इस बार अन्नपूर्णोपनिषद् के मूल स्रोत से प्रथम अध्याय के पूरे ५७ श्लोकों का पाठ जाँचकर लिया है। स्रोत में स्वयं प्रथम अध्याय ५७वें श्लोक पर समाप्त होता है। एक पाठगत विशेषता यह है कि उपलब्ध प्रति में १२वीं संख्या दो बार आती है और आगे संख्या-क्रम में पाठगत विसंगति है; मैंने मूल प्रति का क्रम यथावत रखा है। �
Sanskrit Documents +2
अन्नपूर्णोपनिषद्
प्रथम अध्याय — मूल संस्कृत पाठ एवं हिन्दी अर्थ
१
मूलपाठ—
हरिः ॐ निदाघो नाम योगीन्द्र ऋभुं ब्रह्मविदां वरम् ।
प्रणम्य दण्डवद्भूमावुत्थाय स पुनर्मुनिः ॥ १॥
हिन्दी अर्थ—
‘हरिः ॐ।’ निदाघ नामक योगियों में श्रेष्ठ मुनि ने ब्रह्मविदों में श्रेष्ठ ऋभु को दण्डवत् प्रणाम किया और भूमि से उठकर फिर उनसे निवेदन किया।
२
मूलपाठ—
आत्मतत्त्वमनुब्रूहीत्येवं पप्रच्छ सादरम् ।
कयोपासनया ब्रह्मन्नीदृशं प्राप्तवानसि ॥ २॥
अर्थ—
उन्होंने आदरपूर्वक पूछा—“हे ब्रह्मन्! मुझे आत्मतत्त्व का उपदेश दीजिए। ऐसी अवस्था आपने किस उपासना के द्वारा प्राप्त की है?”
३
मूलपाठ—
तां मे ब्रूहि महाविद्यां मोक्षसाम्राज्यदायिनीम् ।
निदाघ त्वं कृतार्थोऽसि श‍ृणु विद्यां सनातनीम् ॥ ३॥
अर्थ—
“मुझे उस महान विद्या का उपदेश दीजिए जो मोक्ष का साम्राज्य प्रदान करने वाली है।” ऋभु ने कहा—“हे निदाघ! तुम कृतार्थ हो। अब उस सनातन विद्या को सुनो।”
४
मूलपाठ—
यस्या विज्ञानमात्रेण जीवन्मुक्तो भविष्यसि ।
मूलश‍ृङ्गाटमध्यस्था बिन्दुनादकलाश्रया ॥ ४॥
अर्थ—
जिस विद्या के केवल ज्ञान से तुम जीवन्मुक्त हो जाओगे। वह विद्या मूल-शृङ्गाटक के मध्य स्थित, बिन्दु, नाद और कला पर आश्रित बताई गई है।
५
मूलपाठ—
नित्यानन्दा निराधारा विख्याता विलसत्कचा ।
विष्टपेशी महालक्ष्मीः कामस्तारो नतिस्तथा ॥ ५॥
अर्थ—
वह नित्य आनन्दस्वरूप, निराधार और प्रकाशमान है। उसे महालक्ष्मी आदि नामों से तथा विभिन्न मन्त्रात्मक रूपों में जाना जाता है।
६
मूलपाठ—
भगवत्यन्नपूर्णेति ममाभिलषितं ततः ।
अन्नं देहि ततः स्वाहा मन्त्रसारेति विश्रुता ॥ ६॥
अर्थ—
“हे भगवती अन्नपूर्णे! मेरी अभिलाषित वस्तु प्रदान करो; अन्न दो; स्वाहा।” यह मन्त्रसार के रूप में प्रसिद्ध है।
७
मूलपाठ—
सप्तविंशति वर्णात्मा योगिनीगणसेविता ॥ ७॥
अर्थ—
यह मन्त्र २७ वर्णों से युक्त तथा योगिनी-गणों द्वारा सेवित कहा गया है।
८
मूलपाठ—
ऐं ह्रीं सौं श्रीं क्लीमोन्नमो भगवत्यन्नपूर्णे
ममाभिलषितमन्नं देहि स्वाहा ।
इति पित्रोपदिष्टोऽस्मि तदादिनियमः स्थितः ।
कृतवान्स्वाश्रमाचारो मन्त्रानुष्ठानमन्वहम् ॥ ८॥
अर्थ—
“ऐं ह्रीं सौं श्रीं क्लीं—हे भगवती अन्नपूर्णे! नमस्कार है। मेरी अभिलषित वस्तु/अन्न प्रदान करो। स्वाहा।”
निदाघ कहते हैं—“इस प्रकार मेरे पिता ने मुझे यह मन्त्र उपदेश किया। तब से मैंने उसके नियमों का पालन किया और अपने आश्रम के आचार के साथ प्रतिदिन मन्त्र का अनुष्ठान किया।”
९
मूलपाठ—
एवं गते बहुदिने प्रादुरासीन्ममाग्रतः ।
अन्नपूर्णा विशालाक्षी स्मयमानमुखाम्बुजा ॥ ९॥
अर्थ—
इस प्रकार बहुत दिन बीत जाने पर मेरे सामने विशालाक्षी अन्नपूर्णा देवी प्रकट हुईं। उनका मुख कमल के समान था और वे मंद-मंद मुस्करा रही थीं।
१०
मूलपाठ—
तां दृष्ट्वा दण्डवद्भूमौ नत्वा प्राञ्जलिरास्थितः ।
अहो वत्स कृतार्थोऽसि वरं वरय मा चिरम् ॥ १०॥
अर्थ—
उन्हें देखकर मैंने भूमि पर दण्डवत् प्रणाम किया और हाथ जोड़कर खड़ा हो गया। देवी ने कहा—“वत्स! तुम कृतार्थ हो गए हो। शीघ्र अपना इच्छित वर माँगो।”
११
मूलपाठ—
एवमुक्तो विशालाक्ष्या मयोक्तं मुनिपुङ्गव ।
आत्मतत्त्वं मनसि मे प्रादुर्भवतु पार्वति ॥ ११॥
अर्थ—
विशालाक्षी देवी के ऐसा कहने पर मैंने कहा—“हे पार्वती! मेरे मन में आत्मतत्त्व का प्रकाश प्रकट हो।”
१२
मूलपाठ—
तथैवास्थिति मामुक्त्वा तत्रैवान्तरधीयत ।
तदा मे मतिरुत्पन्ना जगद्वैचित्र्यदर्शनात् ॥ १२॥
अर्थ—
“ऐसा ही हो”—यह कहकर देवी वहीं अन्तर्धान हो गईं। तब जगत् की विचित्रता को देखकर मेरे भीतर विचार उत्पन्न हुआ।
१२ (मूल प्रति में पुनः यही संख्या)
मूलपाठ—
भ्रमः पञ्चविधो भाति तदेवेह समुच्यते ।
जीवेश्वरौ भिन्नरूपाविति प्राथमिको भ्रमः ॥ १२॥
अर्थ—
यहाँ पाँच प्रकार के भ्रम दिखाई देते हैं। पहला भ्रम यह है कि जीव और ईश्वर अलग-अलग स्वरूप वाले हैं।
१३
मूलपाठ—
आत्मनिष्ठं कर्तृगुणं वास्तवं वा द्वितीयकः ।
शरीरत्रयसंयुक्तजीवः सङ्गी तृतीयकः ॥ १३॥
अर्थ—
दूसरा भ्रम यह है कि आत्मा में ही कर्तापन का गुण वास्तव में विद्यमान है। तीसरा भ्रम यह है कि तीन शरीरों से संयुक्त जीव वास्तव में उनसे बँधा हुआ है।
१४/१५ — मूल प्रति का क्रम
मूलपाठ—
जगत्कारणरूपस्य विकारित्वं चतुर्थकः ।
कारणाद्भिन्नजगतः सत्यत्वं पञ्चमो भ्रमः ।
पञ्चभ्रमनिवृत्तिश्च तदा स्फुरति चेतसि ॥ १५॥
अर्थ—
चौथा भ्रम यह है कि जगत् के कारणरूप ब्रह्म में विकार होता है। पाँचवाँ भ्रम यह है कि कारण से अलग यह जगत् वास्तव में सत्य है। इन पाँचों भ्रमों के निवृत्त होने पर चित्त में वास्तविक तत्त्वज्ञान का प्रकाश होता है।
१६
मूलपाठ—
बिम्बप्रतिबिम्बदर्शनेन भेदभ्रमो निवृत्तः ।
स्फटिकलोहितदर्शनेन पारमार्थिककर्तृत्वभ्रमो निवृत्तः ।
घटमठाकाशदर्शनेन सङ्गीतिभ्रमो निवृत्तः ।
रज्जुसर्पदर्शनेन कारणाद्भिन्नजगतः सत्यत्वभ्रमो निवृत्तः ।
कनकरुचकदर्शनेन विकारित्वभ्रमो निवृत्तः ।
तदाप्रभृति मच्चित्तं ब्रह्माकारमभूत्स्वयम् ।
निदाघ त्वमपीत्थं हि तत्त्वज्ञानमवाप्नुहि ॥ १६॥
अर्थ—
बिम्ब और प्रतिबिम्ब के उदाहरण से जीव-ईश्वर का भेदरूपी भ्रम दूर होता है। लाल वस्तु के पास रखे स्फटिक के उदाहरण से कर्तापन का भ्रम दूर होता है। घटाकाश और मठाकाश के उदाहरण से जीव के बन्धन का भ्रम दूर होता है। रस्सी में सर्प के भ्रम से कारण से पृथक् जगत् के सत्य होने का भ्रम दूर होता है। सोने और उससे बने आभूषण के उदाहरण से विकार का भ्रम दूर होता है।
इन बातों के बाद मेरा चित्त स्वयं ब्रह्माकार हो गया। हे निदाघ! तुम भी इसी प्रकार तत्त्वज्ञान प्राप्त करो।
�
Sanskrit Documents
१७
मूलपाठ—
निदाघः प्रणतो भूत्वा ऋभुं पप्रच्छ सादरम् ।
ब्रूहि मे श्रद्दधानाय ब्रह्मविद्यामनुत्तमाम् ॥ १७॥
अर्थ—
निदाघ ने प्रणाम करके आदरपूर्वक ऋभु से कहा—“मुझ श्रद्धावान् को उस अनुपम ब्रह्मविद्या का उपदेश कीजिए।”
१८
मूलपाठ—
तथेत्याह ऋभुः प्रीतस्तत्त्वज्ञां वदामि ते ।
महाकर्ता महाभोक्ता महात्यागी भवानघ ।
स्वस्वरूपानुसन्धानमेवं कृत्वा सुखी भव ॥ १८॥
अर्थ—
ऋभु प्रसन्न होकर बोले—“ऐसा ही हो। मैं तुम्हें तत्त्वज्ञान बताता हूँ। हे निष्पाप! तुम महान कर्ता, महान भोक्ता और महान त्यागी बनो। अपने वास्तविक स्वरूप का निरन्तर अनुसंधान करते हुए सुखी रहो।”
१९
मूलपाठ—
नित्योदितं विमलमाद्यमनतरूपं
ब्रह्मास्मि नेतरकलाकलनं हि किंचित् ।
इत्येव भावय निरञ्जनतामुपेतो
निर्वाणमेहि सकलामलशान्तवृत्तिः ॥ १९॥
अर्थ—
“मैं नित्य प्रकाशित, निर्मल, आदि और अनन्त स्वरूप वाला ब्रह्म हूँ; इसके अतिरिक्त कोई अन्य कल्पना नहीं है”—ऐसा भाव करो। निष्कलंक होकर सभी मलिन वृत्तियों को शांत करके निर्वाण को प्राप्त करो।
२०
मूलपाठ—
यदिदं दृश्यते किंचित्तत्तन्नास्तीति भावय ।
यथा गन्धर्वनगरं यथा वारि मरुस्थले ॥ २०॥
अर्थ—
जो कुछ भी दिखाई देता है, उसे परम सत्य मत मानो। उसका स्वरूप मरुस्थल में दिखाई देने वाले जल अथवा आकाश में दिखाई देने वाले गन्धर्वनगर के समान समझो।
२१
मूलपाठ—
यत्तु नो दृश्यते किंचिद्यन्नु किंचिदिव स्थितम् ।
मनःषष्ठेन्द्रियातीतं तन्मयो भव वै मुने ॥ २१॥
अर्थ—
जो इन्द्रियों और मन से दिखाई नहीं देता, जो किसी वस्तु के रूप में सीमित नहीं है और मन सहित छह इन्द्रियों से परे है, हे मुनि! उसी के स्वरूप में स्थित हो जाओ।
२२
मूलपाठ—
अविनाशि चिदाकाशं सर्वात्मकमखण्डितम् ।
नीरन्ध्रं भूरिवाशेषं तदस्मीति विभावय ॥ २२॥
अर्थ—
अविनाशी, अखण्ड, सर्वात्मस्वरूप, अनन्त चिदाकाश का ध्यान करो और दृढ़ता से जानो—“वही मैं हूँ।”
२३
मूलपाठ—
यदा संक्षीयते चित्तमभावात्यन्तभावनात् ।
चित्सामान्यस्वरूपस्य सत्तासामान्यता तदा ॥ २३॥
अर्थ—
जब किसी भी वस्तु की कल्पना न करने के अभ्यास से चित्त पूर्णतः क्षीण हो जाता है, तब शुद्ध चैतन्य के सामान्य स्वरूप की सत्ता का अनुभव होता है।
२४
मूलपाठ—
नूनं चैत्यांशरहिता चिद्यदात्मनि लीयते ।
असद्रूपवदत्यच्छा सत्तासामान्यता तदा ॥ २४॥
अर्थ—
जब चैतन्य किसी ज्ञेय-वस्तु के अंश से रहित होकर आत्मा में लीन होता है, तब वह अत्यन्त निर्मल और किसी वस्तु के विशेष रूप से रहित सत्ता-सामान्य के रूप में अनुभव होता है।
२५
मूलपाठ—
दृष्टिरेषा हि परमा सदेहादेहयोः समा ।
मुक्तयोः संभवत्येव तुर्यातीतपदाभिधा ॥ २५॥
अर्थ—
यह परम दृष्टि देहधारी और विदेह—दोनों प्रकार के मुक्त पुरुषों में समान रूप से हो सकती है। इसे तुर्यातीत पद कहा गया है।
२६
मूलपाठ—
व्युत्थितस्य भवत्येषा समाधिस्थस्य चानघ ।
ज्ञस्य केवलमज्ञस्य न भवत्येव बोधजा ।
अनानन्दसमानन्दमुग्धमुग्धमुखद्युतिः ॥ २६॥
अर्थ—
हे निष्पाप! यह अवस्था समाधि में स्थित और समाधि से बाहर आए ज्ञानी—दोनों में हो सकती है। अज्ञानी में ऐसी ज्ञानजनित अवस्था नहीं होती। ज्ञानी के मुख पर एक ऐसी शान्त आनन्दमयी आभा रहती है जो सामान्य सुख-दुःख से परे है।
२७
मूलपाठ—
चिरकालपरिक्षीणमननादिपरिभ्रमः ।
पदमासाद्यते पुण्यं प्रज्ञयैवैकया तथा ॥ २७॥
अर्थ—
दीर्घकाल तक मनन आदि के भ्रम का क्षय होने पर, केवल प्रखर प्रज्ञा के द्वारा वह पवित्र परम पद प्राप्त किया जाता है।
२८
मूलपाठ—
इमं गुणसमाहारमनात्मत्वेन पश्यतः ।
अन्तःशीतलया यासौ समाधिरिति कथ्यते ॥ २८॥
अर्थ—
जो इस समस्त गुणसमूह को ‘अनात्मा’ के रूप में देखता है और जिसका अन्तःकरण शांत और शीतल हो जाता है, उसकी उस अवस्था को समाधि कहा जाता है।
२९
मूलपाठ—
अवासनं स्थिरं प्रोक्तं मनोध्यानं तदेव च ।
तदेव केवलीभानं शान्ततैव च तत्सदा ॥ २९॥
अर्थ—
वासना-रहित और स्थिर मन को ध्यान कहा गया है। वही एकत्व का प्रकाश है और वही सदा की शान्ति है।
३०
मूलपाठ—
तनुवासनमत्युच्चैः पदायोद्यतमुच्यते ।
अवासगं मनोऽकर्तृपदं तस्मादवाप्यते ॥ ३०॥
अर्थ—
जिसमें वासनाएँ बहुत सूक्ष्म हो गई हैं, वह उच्चतम पद की ओर उन्मुख कहा जाता है। वासनारहित मन के द्वारा अकर्तापन का परम पद प्राप्त होता है।
३१
मूलपाठ—
घनवासनमेतत्तु चेतःकर्तृत्वभावनम् ।
सर्वदुःखप्रदं तस्माद्वासनां तनुतां नयेत् ॥ ३१॥
अर्थ—
घनी वासनाओं से युक्त चित्त ही ‘मैं कर्ता हूँ’ ऐसी भावना करता है। यही सभी दुःखों का कारण है। इसलिए वासनाओं को क्रमशः सूक्ष्म और क्षीण करना चाहिए।
३२
मूलपाठ—
चेतसा सम्परित्यज्य सर्वभावात्मभावनाम् ।
सर्वमाकाशतामेति नित्यमन्तर्मुखस्थितेः ॥ ३२॥
अर्थ—
मन से सभी पदार्थों में ‘मैं’ की भावना का पूर्ण त्याग कर देने पर, निरन्तर अन्तर्मुख रहने वाले साधक को सम्पूर्ण जगत् आकाश के समान व्यापक और असंग दिखाई देता है।
३३
मूलपाठ—
यथा विपणगा लोका विहरन्तोऽप्यसत्समाः ।
असंबन्धात्तथा ज्ञस्य ग्रामोऽपि विपिनोपमः ॥ ३३॥
अर्थ—
जैसे आकाश में उड़ने वाले पक्षी किसी स्थान से बँधे नहीं रहते, वैसे ही ज्ञानी का किसी स्थान से सम्बन्ध नहीं होता। इसलिए उसके लिए गाँव भी वन के समान असंग है।
३४
मूलपाठ—
अन्तर्मुखतया नित्यं सुप्तो बुद्धो व्रजन्पठन् ।
पुरं जनपदं ग्राममरण्यमिव पश्यति ॥ ३४॥
अर्थ—
जो भीतर से सदा आत्मा में स्थित है, वह चलता, पढ़ता या व्यवहार करता हुआ भी भीतर से सोए हुए समान शांत रहता है। वह नगर, जनपद और गाँव को वन के समान असंग भाव से देखता है।
३५–३६
मूलपाठ—
अन्तःशीतलतायां तु लब्धायां शीतलं जगत् ।
अन्तस्तृष्णोपतप्तानां दावदाहमयं जगत् ॥ ३५॥
भवत्यखिलजन्तूनां यदन्तस्तद्बहिः स्थितम् ॥ ३६॥
अर्थ—
जिसका अन्तःकरण शांत और शीतल हो जाता है, उसके लिए सम्पूर्ण जगत् भी शीतल प्रतीत होता है। जिनके भीतर तृष्णा की अग्नि जल रही है, उन्हें संसार दावानल के समान जलता हुआ प्रतीत होता है। सभी प्राणियों के लिए बाहर का संसार वास्तव में उनके भीतर की अवस्था का ही प्रतिबिम्ब बन जाता है।
३७
मूलपाठ—
यस्त्वात्मरतिरेवान्तः कुर्वन्कर्मेन्द्रियैः क्रियाः ।
न वशो हर्षशोकाभ्यां स समाहित उच्यते ॥ ३७॥
अर्थ—
जो भीतर आत्मा में ही आनन्दित रहता है और बाहर कर्मेन्द्रियों से अपने कार्य करता रहता है, तथा हर्ष और शोक के वश में नहीं होता, वही समाधिस्थ कहा जाता है।
३८
मूलपाठ—
आत्मवत्सर्वभूतानि परद्रव्याणि लोष्ठवत् ।
स्वभावादेव न भयाद्यः पश्यति स पश्यति ॥ ३८॥
अर्थ—
जो सभी प्राणियों को अपने समान और दूसरे के धन को मिट्टी के ढेले के समान देखता है, और ऐसा भय के कारण नहीं बल्कि स्वभावतः करता है—वास्तव में वही सही दृष्टि वाला है।
३९
मूलपाठ—
अद्यैव मृतिरायातु कल्पान्तनिचयेन वा ।
नासौ कलङ्कमाप्नोति हेम पङ्कगतं यथा ॥ ३९॥
अर्थ—
मृत्यु आज ही आ जाए या कल्पों के बाद आए—ज्ञानी कलंकित नहीं होता। जैसे कीचड़ में पड़ा हुआ सोना अपने स्वर्णत्व को नहीं खोता, वैसे ही आत्मज्ञानी की आत्मशुद्धि नष्ट नहीं होती।
४०
मूलपाठ—
कोऽहं कथमिदं किं वा कथं मरणजन्मनी ।
विचारयान्तरे वेत्थं महत्तत्फलमेष्यसि ॥ ४०॥
अर्थ—
‘मैं कौन हूँ? यह संसार क्या है? जन्म और मृत्यु कैसे होते हैं?’—इस प्रकार भीतर आत्म-विचार करो। ऐसा विचार करने से महान फल प्राप्त होगा।
४१
मूलपाठ—
विचारेण परिज्ञातस्वभावस्य सतस्तव ।
मनः स्वरूपमुत्सृज्य शममेष्यति विज्वरम् ॥ ४१॥
अर्थ—
जब तुम विचार के द्वारा अपने वास्तविक स्वरूप को जान लोगे, तब तुम्हारा मन अपनी कल्पित अवस्था छोड़कर बिना किसी मानसिक ताप के शान्त हो जाएगा।
४२
मूलपाठ—
विज्वरत्वं गतं चेतस्तव संसारवृत्तिषु ।
न निमज्जति तद्ब्रह्मन्गोष्पदेष्विव वारणः ॥ ४२॥
अर्थ—
हे ब्रह्मन्! जब तुम्हारा चित्त मानसिक ताप से मुक्त हो जाएगा, तब वह संसार की वृत्तियों में नहीं डूबेगा—जैसे हाथी छोटे-से गड्ढे के पानी में नहीं डूब सकता।
४३
मूलपाठ—
कृपणं तु मनो ब्रह्मन्गोष्पदेऽपि निमज्जति ।
कार्ये गोष्पदतोयेऽपि विशीर्णो मशको यथा ॥ ४३॥
अर्थ—
परन्तु दुर्बल और संकीर्ण मन छोटे-से गड्ढे में भी डूब जाता है—जैसे छोटा-सा मच्छर थोड़े-से पानी में भी डूब सकता है।
४४
मूलपाठ—
यावद्यावन्मुनिश्रेष्ठ स्वयं संतज्यतेऽखिलम् ।
तावत्तावत्परालोकः परमात्मैव शिष्यते ॥ ४४॥
अर्थ—
हे श्रेष्ठ मुनि! जैसे-जैसे मनुष्य स्वयं समस्त आसक्तियों और वस्तुओं का त्याग करता जाता है, वैसे-वैसे उसके सामने परमात्मा ही शेष रह जाता है।
४५
मूलपाठ—
यावत्सर्वं न संत्यक्तं तावदात्मा न लभ्यते ।
सर्ववस्तुपरित्यागे शेष आत्मेति कथ्यते ॥ ४५॥
अर्थ—
जब तक सबका त्याग नहीं किया जाता, तब तक आत्मा की पूर्ण प्राप्ति नहीं होती। सभी वस्तुओं की आसक्ति के त्याग के बाद जो शेष रहता है, वही आत्मा है।
४६
मूलपाठ—
आत्मावलोकनार्थं तु तस्मात्सर्वं परित्यजेत् ।
सर्वं संत्यज्य दूरेण यच्छिष्टं तन्मयो भव ॥ ४६॥
अर्थ—
आत्मा के साक्षात्कार के लिए इसलिए सभी आसक्तियों का त्याग करो। सबको दूर छोड़कर जो शेष रहे, उसी के स्वरूप में स्थित हो जाओ।
४७
मूलपाठ—
सर्वं किंचिदिदं दृश्यं दृश्यते यज्जगद्गतम् ।
चिन्निष्पन्दांशमात्रं तन्नान्यत्किंचन शाश्वतम् ॥ ४७॥
अर्थ—
यह जो कुछ भी दृश्य जगत् दिखाई देता है, वह चैतन्य के एक अंश का मात्र स्पन्दन है। इसके अतिरिक्त कोई दूसरी शाश्वत सत्ता नहीं है।
४८
मूलपाठ—
समाहिता नित्यतृप्ता यथाभूतार्थदर्शिनी ।
ब्रह्मन्समाधिशब्देन परा प्रज्ञोच्यते बुधैः ॥ ४८॥
अर्थ—
जो बुद्धि समाधि में स्थित, सदा तृप्त और वस्तुओं को उनके वास्तविक स्वरूप में देखने वाली है, उसे ज्ञानीजन ‘समाधि’ या परम प्रज्ञा कहते हैं।
४९
मूलपाठ—
अक्षुब्धा निरहंकारा द्वन्द्वेष्वननुपातिनी ।
प्रोक्ता समाधिशब्देन मेरोः स्थिरतरा स्थितिः ॥ ४९॥
अर्थ—
जो अवस्था किसी भी बात से विचलित नहीं होती, अहंकार से रहित है और सुख-दुःख आदि द्वन्द्वों में नहीं फँसती, जो मेरु पर्वत से भी अधिक स्थिर है—उसे समाधि कहते हैं।
५०
मूलपाठ—
निश्चिता विगताभीष्टा हेयोपदेयवर्जिता ।
ब्रह्मन्समाधिशब्देन परिपूर्णा मनोगतिः ॥ ५०॥
अर्थ—
जिस मनःस्थिति में आत्मतत्त्व का निश्चय हो गया है, कोई विशेष इच्छा नहीं रही और ‘यह त्याज्य है, यह ग्रहण करने योग्य है’ ऐसा भेद नहीं रहा—वही पूर्ण मनःस्थिति समाधि है।
५१
मूलपाठ—
केवलं चित्प्रकाशांशकल्पिता स्थिरतां गता ।
तुर्या सा प्राप्यते दृष्टिर्महद्भिर्वेदवित्तमैः ॥ ५१॥
अर्थ—
जब दृष्टि केवल चैतन्य के प्रकाश में स्थिर हो जाती है, तब वेद के श्रेष्ठ ज्ञाता महापुरुष जिस अवस्था को प्राप्त करते हैं, वह तुर्य अवस्था है।
५२
मूलपाठ—
अदूरगतसादृश्या सुषुप्तस्योपलक्ष्यते ।
मनोऽहंकारविलये सर्वभावान्तरस्थिता ॥ ५२॥
अर्थ—
यह अवस्था सुषुप्ति के समान दिखाई देती है, क्योंकि इसमें मन और अहंकार का लय हो जाता है; किन्तु इसके भीतर आत्मचैतन्य विद्यमान रहता है।
५३
मूलपाठ—
समुदेति परानन्दा या तनुः पारमेश्वरी ।
मनसैव मनश्छित्त्वा सा स्वयं लभ्यते गतिः ॥ ५३॥
अर्थ—
जिस परमेश्वरी अवस्था से परम आनन्द प्रकट होता है, मन के द्वारा ही मन का अतिक्रमण करके वह अवस्था स्वयं प्राप्त होती है।
५४
मूलपाठ—
तदनु विषयवासनाविनाश-
स्तदनु शुभः परमः स्फुटप्रकाशः ।
तदनु च समतावशात्स्वरूपे
परिणमनं महतामचिन्त्यरूपम् ॥ ५४॥
अर्थ—
उसके बाद विषयों की वासनाएँ नष्ट होती हैं। फिर परम और स्पष्ट आत्मप्रकाश प्रकट होता है। उसके बाद समता के कारण साधक अपने वास्तविक स्वरूप में ऐसा रूपान्तरण प्राप्त करता है जिसे सामान्य बुद्धि से समझना कठिन है।
५५
मूलपाठ—
अखिलमिदमनन्तमनन्तमात्मतत्त्वं
दृढपरिणामिनि चेतसि स्थितोऽन्तः ।
बहिरुपशमिते चराचरात्मा
स्वयमनुभूयत एव देवदेवः ॥ ५५॥
अर्थ—
जब चित्त दृढ़तापूर्वक आत्मतत्त्व में परिणत हो जाता है और बाहरी चंचलता शांत हो जाती है, तब यह सम्पूर्ण अनन्त आत्मतत्त्व—चर और अचर सभी का आत्मस्वरूप—स्वयं देवों के देव के रूप में अनुभव होता है।
५६
मूलपाठ—
असक्तं निर्मलं चित्तं युक्तं संसार्यविस्फुटम् ।
सक्तं तु दीर्घतपसा मुक्तमप्यतिबद्धवत् ॥ ५६॥
अर्थ—
आसक्ति से रहित और निर्मल चित्त ही वास्तव में योगयुक्त है और संसार से स्पष्टतः मुक्त है। इसके विपरीत, आसक्त चित्त वाला व्यक्ति बहुत तप करने पर भी अत्यन्त बँधा हुआ ही रहता है।
५७
मूलपाठ—
अन्तःसंसक्तिनिर्मुक्तो जीवो मधुरवृत्तिमान् ।
बहिः कुर्वन्नकुर्वन्वा कर्ता भोक्ता न हि क्वचित् ॥ ५७॥
अर्थ—
जिस जीव के भीतर की आसक्ति पूर्णतः समाप्त हो गई है और जिसका आचरण सहज एवं मधुर है, वह बाहर कर्म करे या न करे, वास्तव में न कर्ता है और न भोक्ता। वह आत्मस्वरूप में स्थित है।
प्रथम अध्याय का सार
इस प्रथम अध्याय में ऋभु–निदाघ संवाद के माध्यम से आत्मज्ञान का मार्ग बताया गया है। इसका क्रम बहुत महत्त्वपूर्ण है—
मन्त्र-उपासना → अन्नपूर्णा का साक्षात्कार → आत्मतत्त्व की याचना → पाँच भ्रान्तियों का निराकरण → आत्मविचार → वासनाक्षय → अन्तर्मुखता → समाधि → तुर्य → आत्मस्वरूप का अनुभव।
विशेष रूप से उपनिषद् कहता है कि “मैं कौन हूँ?” इस प्रश्न का गम्भीर विचार मनुष्य को आत्मस्वरूप तक ले जाता है; और जब भीतर की आसक्ति समाप्त हो जाती है, तब बाहरी कर्म करते हुए भी मनुष्य बन्धन से मुक्त रह सकता है। �
Sanskrit Documents +1
मूल स्रोत में प्रथम अध्याय का समापन भी स्पष्ट रूप से “इति प्रथमोऽध्यायः ॥ १॥” से होता है। �
Sanskrit Documents

जी। मैंने उपलब्ध संस्कृत पाठ से अन्नपूर्णोपनिषद् के द्वितीय अध्याय के सभी ४४ मंत्र/श्लोक का क्रम मिलाया है। यह अध्याय मुख्यतः संग-बन्धन, असंगता, जीवन्मुक्ति, तुरीय अवस्था, मन की शान्ति और ब्रह्मज्ञान का विवेचन करता है। �
Sanskrit Documents
॥ अन्नपूर्णोपनिषत् ॥
॥ द्वितीयोऽध्यायः ॥
१
निदाघ उवाच ।
सङ्गः कीदृश इत्युक्तः कश्च बन्धाय देहिनाम् ।
कश्च मोक्षाय कथितः कथं त्वेष चिकित्स्यते ॥ १॥
अर्थ:
निदाघ ने पूछा—संग किसे कहते हैं? जीवों को बाँधने वाला बन्धन क्या है? मोक्ष प्रदान करने वाला असंग क्या है? और इस बन्धन का उपचार किस प्रकार किया जा सकता है?
२
देहदेहिविभागैकपरित्यागेन भावना ।
देहमात्रे हि विश्वासः सङ्गो बन्धाय कथ्यते ॥ २॥
अर्थ:
देह और देही के भेद को भूलकर केवल शरीर को ही अपना स्वरूप मानना और उसी पर विश्वास रखना संग है। यही संग जीव के बन्धन का कारण बनता है।
३
सर्वमात्मेदमत्राहं किं वाञ्छामि त्यजामि किम् ।
इत्यसङ्गस्थितिं विद्धि जीवन्मुक्ततनुस्थिताम् ॥ ३॥
अर्थ:
जब साधक जानता है कि यह सब आत्मा ही है और पूछता है—“मैं क्या चाहूँ और क्या त्यागूँ?”—तो समझना चाहिए कि वह असंगता की स्थिति में स्थित है। यही जीवन्मुक्त की अवस्था है।
४
नाहमस्मि न चान्योऽस्ति न चायं न च नेतरः ।
सोऽसङ्ग इति सम्प्रोक्तो ब्रह्मास्मीत्येव सर्वदा ॥ ४॥
अर्थ:
“मैं यह सीमित व्यक्ति नहीं हूँ, मुझसे अलग कोई दूसरा नहीं है; यह भी नहीं और वह भी नहीं—मैं ब्रह्म हूँ।” इस निरन्तर अनुभूति को असंगता कहा गया है।
५
नाभिनन्दति नैष्कर्म्यं न कर्मस्वनुषज्जते ।
सुसमो यः परित्यागी सोऽसंसक्त इति स्मृतः ॥ ५॥
अर्थ:
जो न तो कर्महीनता की विशेष इच्छा करता है और न कर्मों में आसक्त होता है, जो हर परिस्थिति में सम रहता है और त्यागी है, वही असंग कहलाता है।
६
सर्वकर्मफलादीनां मनसैव न कर्मणा ।
निपुणो यः परित्यागी सोऽसंसक्त इति स्मृतः ॥ ६॥
अर्थ:
जो मन से ही सभी कर्मों के फल का त्याग कर देता है, केवल बाहरी कर्म छोड़ना ही जिसका लक्ष्य नहीं है, वही कुशल त्यागी और असंग कहलाता है।
७
असंकल्पेन सकलाश्चेष्टा नाना विजृंभिताः ।
चिकित्सिता भवन्तीह श्रेयः सम्पादयन्ति हि ॥ ७॥
अर्थ:
जब मन संकल्प-विकल्प से मुक्त होता है, तब उसकी अनेक प्रकार की चेष्टाएँ शान्त होने लगती हैं और साधक का कल्याण होता है।
८
न सक्तमिह चेष्टासु न चिन्तासु न वस्तुषु ।
न गमागमचेष्टासु न कालकलनासु च ॥ ८॥
अर्थ:
असंग पुरुष न कर्मों में आसक्त होता है, न चिंताओं में, न वस्तुओं में, न आने-जाने में और न समय की गणना में।
९
केवलं चिति विश्रम्य किंचिच्चैत्यावलंब्यपि ।
सर्वत्र नीरसमिह तिष्ठत्यात्मरसं मनः ॥ ९॥
अर्थ:
मन केवल चेतना में विश्राम करता है। कभी किसी विषय का थोड़ा-सा सहारा लेते हुए भी वह विषयों में रस नहीं लेता; उसका वास्तविक आनन्द आत्मा में ही रहता है।
१०
व्यवहारमिदं सर्वं मा करोतु करोतु वा ।
अकुर्वन्वापि कुर्वन्वा जीवः स्वात्मरतिक्रियः ॥ १०॥
अर्थ:
जीव संसार का व्यवहार करे या न करे, कार्य करे या न करे—यदि उसका आनन्द अपने आत्मस्वरूप में है, तो वह भीतर से मुक्त ही है।
११
अथवा तमपि त्यक्त्वा चैत्यांशं शान्तचिद्घनः ।
जीवस्तिष्ठति संशान्तो ज्वलन्मणिरिवात्मनि ॥ ११॥
अर्थ:
अथवा वह विषयों के अंश का भी त्याग करके शुद्ध चेतना में स्थित हो जाता है। तब जीव पूर्ण शान्त होकर अपने आत्मस्वरूप में ऐसे स्थित रहता है जैसे प्रकाशमान मणि स्वयं प्रकाशित रहता है।
१२
चित्ते चैत्यदशाहीने या स्थितिः क्षीणचेतसाम् ।
सोच्यते शान्तकलना जाग्रत्येव सुषुप्तता ॥ १२॥
अर्थ:
जब चित्त विषय-विचारों से रहित होकर क्षीण हो जाता है, तब जो अवस्था प्राप्त होती है उसे जाग्रत अवस्था में ही सुषुप्ति जैसी शान्त अवस्था कहा जाता है।
१३
एषा निदाघ सौषुप्तस्थितिरभ्यासयोगतः ।
प्रौढा सती तुरीयेति कथिता तत्त्वकोविदैः ॥ १३॥
अर्थ:
हे निदाघ! अभ्यास और योग से जब यह सुषुप्ति-जैसी शान्त अवस्था परिपक्व हो जाती है, तब तत्त्वज्ञानी उसे तुरीय अवस्था कहते हैं।
१४
अस्यां तुरीयावस्थायां स्थितिं प्राप्याविनाशिनीम् ।
आनन्दैकान्तशीलत्वादनानन्दपदं गतः ॥ १४॥
अर्थ:
तुरीय की अविनाशी अवस्था प्राप्त करके साधक ऐसा आनन्दमय हो जाता है कि वह सामान्य सुख-दुःख से परे चला जाता है।
१५
अनानन्दमहानन्दकालातीतस्ततोऽपि हि ।
मुक्त इत्युच्यते योगी तुर्यातीतपदं गतः ॥ १५॥
अर्थ:
जो साधक सामान्य आनन्द और महान् आनन्द—दोनों से परे, काल की सीमा से भी परे हो जाता है, वह तुर्यातीत कहलाता है और ऐसा योगी मुक्त कहा जाता है।
१६
परिगलितसमस्तजन्मपाशः
सकलविलीनतमोमयाभिमानः ।
परमरसमयीं परात्मसत्तां
जलगतसैन्धवखण्डवन्महात्मा ॥ १६॥
अर्थ:
जिस महात्मा के जन्म-जन्मान्तर के सभी बन्धन गल गए हैं और अज्ञानजनित अहंकार विलीन हो गया है, वह जल में घुले नमक की डली के समान परमात्मा की परम सत्ता में पूर्णतः लीन हो जाता है।
१७
जडाजडदृशोर्मध्ये यत्तत्त्वं पारमार्थिकम् ।
अनुभूतिमयं तस्मात्सारं ब्रह्मेति कथ्यते ॥ १७॥
अर्थ:
जड़ और चेतन के बीच जो वास्तविक तत्त्व अनुभवस्वरूप है, वही सार है और उसे ब्रह्म कहा जाता है।
१८
दृश्यसंवलितो बन्धस्तन्मुक्तौ मुक्तिरुच्यते ।
द्रव्यदर्शनसंबन्धे यानुभूतिरनामया ॥ १८॥
अर्थ:
दृश्य पदार्थों से चित्त का जुड़ना बन्धन है; उस बन्धन से मुक्त होना मोक्ष है। वस्तुओं के दर्शन और उनसे सम्बन्ध के बीच जो निर्मल अनुभूति है, उसी को पहचानना चाहिए।
१९
तामवष्टभ्य तिष्ठ त्वं सौषुप्तीं भजते स्थितिम् ।
सैव तुर्यत्वमाप्नोति तस्यां दृष्टिं स्थिरां कुरु ॥ १९॥
अर्थ:
उस निर्मल अनुभूति को आधार बनाकर सुषुप्ति जैसी शान्त स्थिति में स्थित रहो। वही आगे तुरीय अवस्था को प्राप्त करती है। इसलिए उस दृष्टि को स्थिर करो।
२०
आत्मा स्थूलो न चैवाणुर्न प्रत्यक्षो न चेतरः ।
न चेतनो न च जडो न चैवासन्न सन्मयः ॥ २०॥
अर्थ:
आत्मा न स्थूल है, न अणु; न प्रत्यक्ष दिखाई देने वाली वस्तु है, न उससे अलग कोई वस्तु। उसे सामान्य अर्थ में न केवल चेतन कहा जा सकता है, न जड़; वह असत् भी नहीं, बल्कि परम सत्य है।
२१
नाहं नान्यो न चैवैको न चानेकोऽद्वयोऽव्ययः ।
यदीदं दृश्यतां प्राप्तं मनः सर्वेन्द्रियास्पदम् ॥ २१॥
अर्थ:
आत्मा को सीमित “मैं” नहीं कहा जा सकता, न कोई दूसरा, न एक, न अनेक—वह अद्वैत और अविनाशी है। जो कुछ दिखाई देता है और जो मन तथा इन्द्रियों का विषय बनता है, वह आत्मा का सीमित स्वरूप नहीं है।
२२
दृश्यदर्शनसंबन्धे यत्सुखं पारमार्थिकम् ।
तदतीतं पदं यस्मात्तन्न किंचिदिवैव तत् ॥ २२॥
अर्थ:
दृश्य और दर्शन के सम्बन्ध से जो सुख अनुभव होता है, वह भी परम सत्य से परे है। परम पद इतना सूक्ष्म और विषयातीत है कि उसे किसी वस्तु के रूप में निर्धारित नहीं किया जा सकता।
२३
न मोक्षो नभसः पृष्ठे न पाताले न भूतले ।
सर्वाशासंक्षये चेतःक्षयो मोक्ष इतीष्यते ॥ २३॥
अर्थ:
मोक्ष आकाश के किसी लोक में, पाताल में या पृथ्वी पर कोई स्थान नहीं है। जब सभी आशाएँ और इच्छाएँ समाप्त होती हैं तथा चित्त की चंचलता समाप्त होती है, वही मोक्ष है।
२४
मोक्षो मेऽस्त्विति चिन्तान्तर्जाता चेदुत्थितं मनः ।
मननोत्थे मनस्यैष बन्धः सांसारिको दृढः ॥ २४॥
अर्थ:
यदि “मुझे मोक्ष मिले” यह विचार भी मन में एक नई इच्छा बनकर उठता है, तो वह मन को फिर बाँध देता है। मन से उत्पन्न यही संकल्प संसार-बन्धन को दृढ़ करता है।
२५
आत्मन्यतीते सर्वस्मात्सर्वरूपेऽथ वा तते ।
को बन्धः कश्च वा मोक्षो निर्मूलं मननं कुरु ॥ २५॥
अर्थ:
जो आत्मा सब सीमाओं से परे और फिर भी सब रूपों में व्याप्त है, उसमें बन्धन और मोक्ष का भेद कहाँ है? इसलिए मन के मूल संकल्प को ही समाप्त करो।
२६
अध्यात्मरतिराशान्तः पूर्णपावनमानसः ।
प्राप्तानुत्तमविश्रान्तिर्न किंचिदिह वाञ्छति ॥ २६॥
अर्थ:
जो अध्यात्म में आनन्द पाता है, जिसका मन शान्त और पूर्णतः पवित्र है और जिसे परम विश्राम प्राप्त हो चुका है, वह संसार में किसी वस्तु की इच्छा नहीं करता।
२७
सर्वाधिष्ठानसन्मात्रे निर्विकल्पे चिदात्मनि ।
यो जीवति गतस्नेहः स जीवन्मुक्त उच्यते ॥ २७॥
अर्थ:
जो व्यक्ति सभी का आधार, निर्विकल्प और शुद्ध चेतन आत्मस्वरूप में आसक्ति छोड़कर जीवन बिताता है, वही जीवन्मुक्त कहलाता है।
२८
नापेक्षते भविष्यच्च वर्तमाने न तिष्ठति ।
न संस्मरत्यतीतं च सर्वमेव करोति च ॥ २८॥
अर्थ:
वह भविष्य पर निर्भर नहीं रहता, वर्तमान में भी आसक्ति से नहीं टिकता और अतीत को लेकर व्यर्थ स्मरण नहीं करता। फिर भी वह अपने आवश्यक सभी कर्म करता रहता है।
२९
अनुबन्धपरे जन्तावसंसर्गमनाः सदा ।
भक्ते भक्तसमाचरः शठे शठ इव स्थितः ॥ २९॥
अर्थ:
ऐसे जीव का मन भीतर से असंग रहता है। भक्त के साथ भक्त जैसा, और छल करने वाले के साथ उसके स्वभाव के अनुसार व्यवहार करता है, लेकिन भीतर से आसक्त नहीं होता।
३०
बालो बालेषु वृद्धेषु वृद्धो धीरेषु धैर्यवान् ।
युवा यौवनवृत्तेषु दुःखितेषु सुदुःखधीः ॥ ३०॥
अर्थ:
वह बालकों के बीच बालक की तरह, वृद्धों के बीच वृद्ध की तरह, धीर पुरुषों के साथ धैर्यवान् और युवाओं के बीच युवा की तरह व्यवहार करता है। दुःखी लोगों के दुःख को भी समझता है।
३१
धीरधीरुदितानन्दः पेशलः पुण्यकीर्तनः ।
प्राज्ञः प्रसन्नमधुरो दैन्यादपगताशयः ॥ ३१॥
अर्थ:
वह धीर और बुद्धिमान है, भीतर से आनन्दमय है, मधुर स्वभाव का और शुभ आचरण वाला है। उसकी बुद्धि प्रसन्न है और उसके मन से दीनता तथा हीनभावना दूर हो गई है।
३२
अभ्यासेन परिस्पन्दे प्राणानां क्षयमागते ।
मनः प्रशममायाति निर्वाणमवशिष्यते ॥ ३२॥
अर्थ:
अभ्यास द्वारा प्राणों की चंचलता क्षीण होने पर मन भी शान्त हो जाता है। तब अंत में केवल निर्वाण की शान्त अवस्था शेष रहती है।
३३
यतो वाचो निवर्तन्ते विकल्पकलनान्विताः ।
विकल्पसंक्षयाज्जन्तोः पदं तदवशिष्यते ॥ ३३॥
अर्थ:
जहाँ से विकल्पों से युक्त वाणी भी लौट आती है, वहाँ जब मन के सभी विकल्प समाप्त हो जाते हैं, तब वही परम पद शेष रहता है।
३४
अनाद्यन्तावभासात्मा परमात्मैव विद्यते ।
इत्येतन्निश्चयं स्फारं सम्यग्ज्ञानं विदुर्बुधाः ॥ ३४॥
अर्थ:
अनादि और अनन्त प्रकाशस्वरूप परमात्मा ही वास्तव में विद्यमान है—इस दृढ़ और व्यापक निश्चय को ज्ञानीजन सम्यक् ज्ञान कहते हैं।
३५
यथाभूतार्थदर्शित्वमेतावद्भुवनत्रये ।
यदात्मैव जगत्सर्वमिति निश्चित्य पूर्णता ॥ ३५॥
अर्थ:
तीनों लोकों के वास्तविक स्वरूप को देखना यही है कि सम्पूर्ण जगत् आत्मा ही है। इस निश्चय से साधक पूर्णता को प्राप्त होता है।
३६
सर्वमात्मैव कौ दृष्टौ भावाभावौ क्व वा स्थितौ ।
क्व बन्धमोक्षकलने ब्रह्मैवेदं विजृम्भते ॥ ३६॥
अर्थ:
जब सब कुछ आत्मा ही है, तब किसी दूसरी वस्तु को देखने वाला कौन है? भाव और अभाव कहाँ हैं? बन्धन और मोक्ष की कल्पना कहाँ रह जाती है? वास्तव में सर्वत्र ब्रह्म ही प्रकाशित हो रहा है।
३७
सर्वमेकं परं व्योम को मोक्षः कस्य बन्धता ।
ब्रह्मेदं बृंहिताकारं बृहद्बृहदवस्थितम् ॥ ३७॥
अर्थ:
सब कुछ एक ही परम आकाशस्वरूप ब्रह्म है। तब मोक्ष किसका और बन्धन किसका? यह सम्पूर्ण विस्तृत जगत् ब्रह्म के ही व्यापक स्वरूप में स्थित है।
३८
दूरादस्तमितद्वित्वं भवात्मैव त्वमात्मना ।
सम्यगालोकिते रूपे काष्ठपाषाणवाससाम् ॥ ३८॥
अर्थ:
द्वैत की भावना को बहुत दूर छोड़कर अपने आत्मस्वरूप में स्थित हो जाओ। जब लकड़ी, पत्थर और वस्त्र आदि सभी के वास्तविक स्वरूप को ठीक प्रकार से देखा जाता है, तब उनमें मूलतः एक ही तत्त्व दिखाई देता है।
३९
मनागपि न भेदोऽस्ति क्वासि संकल्पनोन्मुखः ।
आदावन्ते च संशान्तस्वरूपमविनाशि यत् ॥ ३९॥
अर्थ:
वास्तव में थोड़ा भी भेद नहीं है। फिर तुम किस संकल्प की ओर उन्मुख हो रहे हो? जो तत्त्व आदि और अन्त दोनों में शान्त तथा अविनाशी है, उसी में स्थित रहो।
४०
वस्तूनामात्मनश्चैतत्तन्मयो भव सर्वदा ।
द्वैताद्वैतसमुद्भेदैर्जरामरणविभ्रमैः ॥ ४०॥
अर्थ:
वस्तुओं और आत्मा के इस वास्तविक सम्बन्ध को समझकर सदा उसी तत्त्वमय बने रहो। द्वैत-अद्वैत के भेद तथा जन्म-जरा-मरण के भ्रम से विचलित मत हो।
४१
स्फुरत्यात्मभिरात्मैव चित्तैरब्धीव वीचिभिः ।
आपत्करञ्जपरशुं पराया निर्वृतेः पदम् ॥ ४१॥
अर्थ:
जिस प्रकार समुद्र में असंख्य तरंगें उठती हैं, उसी प्रकार आत्मा ही अनेक चित्तों और जीवों के रूप में प्रकाशित होता है। इस सत्य को जानना परम शान्ति की ओर ले जाने वाला साधन है।
४२
शुद्धमात्मानमालिङ्ग्य नित्यमन्तस्थया धिया ।
यः स्थितस्तं क आत्मेह भोगो बाधयितुं क्षमः ॥ ४२॥
अर्थ:
जो व्यक्ति भीतर स्थित स्थिर बुद्धि से शुद्ध आत्मा को आलिंगन किए हुए अर्थात् आत्मस्वरूप में स्थित रहता है, उसे संसार के भोग कैसे विचलित कर सकते हैं?
४३
कृतस्फारविचारस्य मनोभोगादयोऽरयः ।
मनागपि न भिन्दन्ति शैलं मन्दानिला इव ॥ ४३॥
अर्थ:
जिसने गहन आत्म-विचार कर लिया है, उसके लिए मन, भोग और अन्य विकार शत्रु होकर भी कुछ नहीं कर सकते। जैसे हल्की हवा पर्वत को नहीं हिला सकती, वैसे ही वे ज्ञानी को विचलित नहीं करते।
४४
नानात्वमस्ति कलनासु न वस्तुतोऽन्त-
र्नानाविधासु सरसीव जलादिवान्यत् ।
इत्येकनिश्चयमयः पुरुषो विमुक्त
इत्युच्यते समवलोकितसम्यगर्थः ॥ ४४॥
अर्थ:
विचारों और कल्पनाओं में अनेकता दिखाई देती है, पर वास्तविकता में अनेकता नहीं है। जैसे विभिन्न तालाबों में दिखाई देने वाला जल मूलतः जल ही है, वैसे ही सभी विविध रूपों के भीतर एक ही तत्त्व है।
जिस पुरुष को इस सत्य का दृढ़ निश्चय हो गया है और जिसने वास्तविक अर्थ को सम्यक् रूप से देख लिया है, वही विमुक्त, अर्थात् मुक्त पुरुष कहलाता है।
॥ इति द्वितीयोऽध्यायः ॥ २॥ �
Sanskrit Documents
द्वितीय अध्याय का मूल संदेश
इस अध्याय का केन्द्रबिन्दु है—“संग ही बन्धन है और असंगता ही मुक्ति का मार्ग है।” उपनिषद् बाहरी संसार छोड़ने की अपेक्षा मन की आसक्ति, संकल्प, इच्छा और द्वैत-बुद्धि के क्षय को अधिक महत्वपूर्ण मानता है। अन्ततः साधक को यह दृढ़ ज्ञान होता है कि सर्वत्र एक ही आत्मतत्त्व/ब्रह्म है। �
Sanskrit Documents
यदि आप चाहें, अगला �⁠तृतीय अध्याय — पूरा मूलपाठ और प्रत्येक श्लोक का सरल हिन्दी अर्थ भी इसी प्रकार प्रस्तुत कर सकता हूँ।
जी। उपलब्ध मूल संस्कृत पाठ से मिलान करने पर अन्नपूर्णोपनिषद् का तृतीय अध्याय २४ श्लोकों का है। इसका मुख्य विषय माण्डव्य मुनि की साधना, इन्द्रिय-निग्रह, तुरीय अवस्था और परमात्मा में स्थित होने का वर्णन है। �
Sanskrit Documents
॥ अन्नपूर्णोपनिषत् ॥
॥ तृतीयोऽध्यायः ॥
१
विदेहमुक्तेः किं रूपं तद्वान्को वा महामुनिः ।
कं योगं समुपस्थाय प्राप्तवान्परमं पदम् ॥ १॥
अर्थ:
विदेहमुक्ति का स्वरूप क्या है? ऐसा कौन महान् मुनि हुआ जिसने किस योग का आश्रय लेकर परम पद प्राप्त किया?
२
सुमेरोर्वसुधापीठे माण्डव्यो नाम वै मुनिः ।
कौण्डिन्यात्तत्त्वमास्थाय जीवन्मुक्तो भवत्यसौ ॥ २॥
अर्थ:
सुमेरु पर्वत के पृथ्वी-प्रदेश में माण्डव्य नाम के एक मुनि थे। उन्होंने कौण्डिन्य से तत्त्वज्ञान प्राप्त करके जीवन्मुक्त अवस्था प्राप्त की।
३
जीवन्मुक्तिदशां प्राप्य कदाचिद्ब्रह्मवित्तमः ।
सर्वेन्द्रियाणि संहर्तुं मनश्चक्रे महामुनिः ॥ ३॥
अर्थ:
जीवन्मुक्ति की अवस्था प्राप्त करने के बाद एक समय उस महान् ब्रह्मज्ञानी मुनि ने सभी इन्द्रियों को भीतर समेटने और मन को पूर्णतः अन्तर्मुख करने का निश्चय किया।
४
बद्धपद्मासनस्तिष्ठन्नर्धोन्मीलितलोचनः ।
बाह्यानाभ्यान्तरांश्चैव स्पर्शान्परिहरञ्छनैः ॥ ४॥
अर्थ:
वे पद्मासन में स्थिर होकर बैठे, आँखें आधी बन्द रखीं और धीरे-धीरे बाहरी तथा आन्तरिक सभी विषय-स्पर्शों से अपने को अलग करने लगे।
५
ततः स्वमनसः स्थैर्यं मनसा विगतैनसा ।
अहो नु चञ्चलमिदं प्रत्याहृतमपि स्फुटम् ॥ ५॥
अर्थ:
इसके बाद उन्होंने अपने ही मन को स्थिर करने का प्रयास किया और अनुभव किया—“अहो! यह मन कितना चंचल है! विषयों से हटाने पर भी इसकी चंचलता स्पष्ट दिखाई देती है।”
६
पटाद्घटमुपायाति घटाच्छकटमुत्कटम् ।
चित्तमर्थेषु चरति पादपेष्विव मर्कटः ॥ ६॥
अर्थ:
मन एक वस्तु से दूसरी वस्तु पर, फिर तीसरी वस्तु पर उसी तरह उछलता रहता है जैसे बन्दर एक पेड़ से दूसरे पेड़ पर कूदता है। विषयों में भटकता हुआ चित्त अत्यन्त चंचल है।
७
पञ्च द्वाराणि मनसा चक्षुरादीन्यमून्यलम् ।
बुद्धीन्द्रियाभिधानानि तान्येवालोकयाम्यहम् ॥ ७॥
अर्थ:
मुनि विचार करते हैं—मन के साथ ये पाँच द्वार हैं—नेत्र आदि बुद्धीन्द्रियाँ। इन्हीं के माध्यम से मैं संसार को देखता और अनुभव करता हूँ।
८
हन्तेन्द्रियगणा यूयं त्यजताकुलतां शनैः ।
चिदात्मा भगवान्सर्वसाक्षित्वेन स्थितोऽस्म्यहम् ॥ ८॥
अर्थ:
“हे इन्द्रिय-समूह! अब धीरे-धीरे अपनी चंचलता छोड़ दो। मैं शुद्ध चिदात्मा हूँ और सबका साक्षी बनकर स्थित हूँ।”
९
तेनात्मना बहुज्ञेन निर्ज्ञाताश्चक्षुरादयः ।
परिनिर्वामि शान्तोऽस्मि दिष्ट्यास्मि विगतज्वरः ॥ ९॥
अर्थ:
उस सर्वज्ञ आत्मा के द्वारा नेत्र आदि इन्द्रियों को उनके वास्तविक स्वरूप में जान लिया गया। अब मैं पूर्ण शान्त हूँ, निर्वाण को प्राप्त हूँ और सौभाग्य से सभी मानसिक संतापों से मुक्त हूँ।
१०
स्वात्मन्येवावतिष्ठेऽहं तुर्यरूपपदेऽनिशम् ।
अन्तरेव शशामास्य क्रमेण प्राणसन्ततिः ॥ १०॥
अर्थ:
अब मैं निरन्तर अपने आत्मस्वरूप में, तुरीय पद में स्थित रहता हूँ। धीरे-धीरे प्राणों की चंचल गति भी भीतर ही शान्त होने लगी।
११
ज्वालाजालपरिस्पन्दो दग्धेन्धन इवानलः ।
तदितोऽस्तं गत इव ह्यस्तं गत इवोदितः ॥ ११॥
अर्थ:
जैसे ईंधन समाप्त होने पर अग्नि की ज्वालाओं की चंचलता समाप्त हो जाती है, वैसे ही प्राणों का स्पन्दन भी शान्त हो गया। उनका उदय और अस्त मानो समाप्त हो गया।
१२
समः समरसाभासस्तिष्ठामि स्वच्छतां गतः ।
प्रबुद्धोऽपि सुषुप्तिस्थः सुषुप्तिस्थः प्रबुद्धवान् ॥ १२॥
अर्थ:
मैं समभाव और एकरसता में स्थित होकर अत्यन्त निर्मल हो गया। जाग्रत होते हुए भी सुषुप्ति जैसी शान्त अवस्था में और सुषुप्ति में होते हुए भी जाग्रत ज्ञान में स्थित रहा।
१३
तुर्यमालम्ब्य कायान्तस्तिष्ठामि स्तम्भितस्थितिः ।
सबाह्याभ्यन्तरान्भावान्स्थूलान्सूक्ष्मतरानपि ॥ १३॥
अर्थ:
तुरीय अवस्था का आश्रय लेकर मैं शरीर के भीतर अत्यन्त स्थिर होकर स्थित हूँ। बाहरी और आन्तरिक सभी स्थूल तथा सूक्ष्म भावों से मैंने अपने को अलग कर लिया।
१४
त्रैलोक्यसंभवांस्त्यक्त्वा संकल्पैकविनिर्मितान् ।
सह प्रणवपर्यन्तदीर्घनिःस्वनतन्तुना ॥ १४॥
अर्थ:
तीनों लोकों से सम्बन्धित, संकल्प से उत्पन्न सभी मानसिक कल्पनाओं को छोड़ दिया। प्रणव अर्थात् ॐ के दीर्घ नाद के सूक्ष्म आधार का आश्रय लिया।
१५
जहाविन्द्रियतन्मात्रजालं खग इवानलः ।
ततोऽङ्गसंविदं स्वच्छां प्रतिभासमुपागताम् ॥ १५॥
अर्थ:
उन्होंने इन्द्रियों और उनके विषयों के सम्पूर्ण जाल को उसी प्रकार छोड़ दिया जैसे पक्षी जाल से निकल जाता है। तब शरीर में व्याप्त निर्मल चेतना का स्पष्ट प्रकाश प्रकट हुआ।
१६
सद्योजातशिशुज्ञानं प्राप्तवान्मुनिपुङ्गवः ।
जहौ चित्तं चैत्यदशां स्पन्दशक्तिमिवानिलः ॥ १६॥
अर्थ:
उस श्रेष्ठ मुनि को नवजात शिशु के समान निर्मल और निष्कलुष ज्ञान प्राप्त हुआ। उन्होंने विषयों में भटकने वाले चित्त को छोड़ दिया, जैसे वायु अपने स्पन्दन को रोक दे।
१७
चित्सामान्यमथासाद्य सत्तामात्रात्मकं ततः ।
सुषुप्तपदमालम्ब्य तस्थौ गिरिरिवाचलः ॥ १७॥
अर्थ:
फिर उन्होंने शुद्ध चेतना की सामान्य अवस्था, केवल सत्ता के रूप को प्राप्त किया और सुषुप्ति-जैसी गहन शान्त अवस्था का आश्रय लेकर पर्वत के समान अचल होकर स्थित हो गए।
१८
सुषुप्तस्थैर्यमासाद्य तुर्यरूपमुपाययौ ।
निरानन्दोऽपि सानन्दः सच्चासच्च बभूव सः ॥ १८॥
अर्थ:
सुषुप्ति जैसी स्थिरता प्राप्त करके वे तुरीय स्वरूप में स्थित हुए। वहाँ वे सामान्य सुख-दुःख से परे होते हुए भी आनन्दमय थे; वहाँ सत् और असत् के सामान्य भेद भी लुप्त हो गए।
१९
ततस्तु संबभूवासौ यद्गिरामप्यगोचरः ।
यच्छून्यवादिनां शून्यं ब्रह्म ब्रह्मविदां च यत् ॥ १९॥
अर्थ:
इसके बाद वे उस परम अवस्था में स्थित हुए जो वाणी के भी परे है—जिसे शून्यवादियों ने “शून्य” कहा है और ब्रह्मवेत्ताओं ने “ब्रह्म” कहा है।
२०
विज्ञानमात्रं विज्ञानविदां यदमलात्मकम् ।
पुरुषः सांख्यदृष्टीनामीश्वरो योगवादिनाम् ॥ २०॥
अर्थ:
वही तत्त्व विज्ञानवादियों के लिए निर्मल विज्ञानमात्र है; सांख्य दर्शन वालों के लिए पुरुष और योगियों के लिए ईश्वर कहा जाता है।
२१
शिवः शैवागमस्थानां कालः कालैकवादिनाम् ।
यत्सर्वशास्त्रसिद्धान्तं यत्सर्वहृदयानुगम् ॥ २१॥
अर्थ:
शैव आगमों में वही शिव है और काल को परम तत्त्व मानने वालों के लिए वही काल है। वास्तव में वही सभी शास्त्रों का परम सिद्धान्त और सभी हृदयों में स्थित तत्त्व है।
२२
यत्सर्वं सर्वगं वस्तु यत्तत्त्वं तदसौ स्थितः ।
यदनुक्तमनिष्पन्दं दीपकं तेजसामपि ॥ २२॥
अर्थ:
जो सर्वत्र व्याप्त है और जो सम्पूर्ण जगत् का वास्तविक तत्त्व है, माण्डव्य मुनि उसी में स्थित हुए। वह ऐसा तत्त्व है जिसका पूर्ण वर्णन नहीं किया जा सकता, जो स्वयं अचल है और सभी प्रकाशों का भी प्रकाश है।
२३
स्वानुभूत्यैकमानं च यत्तत्त्वं तदसौ स्थितः ।
यदेकं चाप्यनेकं च साञ्जनं च निरञ्जनम् ।
यत्सर्वं चाप्यसर्वं च यत्तत्त्वं तदसु स्थितः ॥ २३॥
अर्थ:
जिस तत्त्व का प्रमाण केवल स्वयं का अनुभव है, माण्डव्य उसी में स्थित हुए। वही एक भी है और अनेक रूपों में भी दिखाई देता है; उपाधियों से युक्त भी प्रतीत होता है और निरुपाधि भी है। वही सब कुछ है और सब कुछ से परे भी है।
२४
अजममरमनाद्यमाद्यमेकं
पदममलं सकलं च निष्कलं च ।
स्थित इति स तदा नभःस्वरूपा-
दपिविमलस्थितिरीश्वरः क्षणेन ॥ २४॥
अर्थ:
तब वह मुनि उस परम पद में स्थित हो गया जो अजन्मा, अमर, अनादि, आदि, एक, निर्मल, सकल और निष्कल है। क्षणभर में ही वह आकाश के समान व्यापक और उससे भी अधिक निर्मल ईश्वरस्वरूप अवस्था में प्रतिष्ठित हो गया। �
Sanskrit Documents
॥ इति तृतीयोऽध्यायः ॥ ३॥
तृतीय अध्याय का सार
इस अध्याय में साधना की एक अत्यन्त सूक्ष्म यात्रा दिखाई गई है—इन्द्रियों का प्रत्याहार → मन की चंचलता का शमन → प्राणों की शान्ति → तुरीय अवस्था → विषयातीत ब्रह्मानुभूति। अन्त में उपनिषद् बताता है कि जिसे अलग-अलग दर्शनों में शून्य, ब्रह्म, विज्ञान, पुरुष, ईश्वर, शिव आदि कहा गया है, वह मूल परम तत्त्व एक ही है। �
Sanskrit Documents
यदि आप चाहें तो इसके बाद �⁠चतुर्थ अध्याय के सभी ४९ श्लोक मूलपाठ और अर्थ सहित भी इसी क्रम में दे सकता हूँ।
जी। एक आवश्यक सुधार: उपलब्ध मूल पाठ में चतुर्थ अध्याय ९२ श्लोकों का है, ४९ का नहीं। मैंने संस्कृत पाठ का क्रम मूल स्रोत से मिलाकर नीचे दिया है। �
Sanskrit Documents +1
॥ अन्नपूर्णोपनिषत् ॥
॥ चतुर्थोऽध्यायः ॥
१
जीवन्मुक्तस्य किं लक्ष्म ह्याकाशगमनादिकम् ।
तथा चेन्मुनिशार्दूल तत्र नैव प्रलक्ष्यते ॥ १॥
अर्थ:
जीवन्मुक्त पुरुष की क्या पहचान है? क्या आकाश में गमन आदि सिद्धियाँ उसकी पहचान हैं? हे मुनिश्रेष्ठ! ऐसा नहीं है; ऐसी सिद्धियाँ जीवन्मुक्ति की वास्तविक पहचान नहीं हैं।
२
अनात्मविदमुक्तोऽपि नभोविहरणादिकम् ।
द्रव्यमन्त्रक्रियाकालशक्त्याप्नोत्येव स द्विजः ॥ २॥
अर्थ:
जो आत्मतत्त्व को नहीं जानता, वह भी द्रव्य, मंत्र, क्रिया, काल और शक्ति आदि के साधनों से आकाशगमन जैसी सिद्धियाँ प्राप्त कर सकता है।
३
नात्मज्ञस्यैष विषय आत्मज्ञो ह्यात्ममात्रदृक् ।
आत्मनात्मनि संतृप्तो नाविद्यामनुधावति ॥ ३॥
अर्थ:
परन्तु आत्मज्ञानी का विषय सिद्धियाँ नहीं हैं। वह केवल आत्मा को देखता है, आत्मा में ही आत्मा द्वारा तृप्त रहता है और अज्ञान के पीछे नहीं भागता।
४
ये ये भावाः स्थिता लोके तानविद्यामयान्विदुः ।
त्यक्ताविद्यो महायोगी कथं तेषु निमज्जति ॥ ४॥
अर्थ:
संसार में जितने भी विषय-भाव दिखाई देते हैं, ज्ञानी उन्हें अज्ञान से उत्पन्न मानता है। जिसने अज्ञान ही त्याग दिया, वह महान् योगी उनमें कैसे आसक्त हो सकता है?
५
यस्तु मूढोऽल्पबुद्धिर्वा सिद्धिजालानि वाञ्छति ।
सिद्धिसाधनैर्योगैस्तानि साधयति क्रमात् ॥ ५॥
अर्थ:
जो मूढ़ या अल्पबुद्धि वाला व्यक्ति सिद्धियों की इच्छा करता है, वह विभिन्न सिद्धि-साधनों और योगों द्वारा उन्हें क्रमशः प्राप्त करने का प्रयास करता है।
६
द्रव्यमन्त्रक्रियाकालयुक्तयः साधुसिद्धिदाः ।
परमात्मपदप्राप्तौ नोपकुर्वन्ति काश्चन ॥ ६॥
अर्थ:
द्रव्य, मंत्र, क्रिया, काल आदि से प्राप्त सिद्धियाँ चाहे उपयोगी हों, पर परमात्म-पद की प्राप्ति में वे स्वयं कोई वास्तविक सहायता नहीं करतीं।
७
यस्येच्छा विद्यते काचित्सा सिद्धिं साधयत्यहो ।
निरिच्छोः परिपूर्णस्य नेच्छा संभवति क्वचित् ॥ ७॥
अर्थ:
जिसके भीतर कोई इच्छा है, वही किसी सिद्धि की इच्छा कर सकता है। जो पूर्ण और इच्छारहित है, उसके भीतर किसी प्रकार की इच्छा कैसे उत्पन्न हो सकती है?
८
सर्वेच्छाजालसंज्ञान्तावात्मलाभो भवेन्मुने ।
स कथं सिद्धिजालानि नूनं वाञ्छन्त्यचित्तकः ॥ ८॥
अर्थ:
हे मुनि! जब सभी इच्छाओं का पूर्ण अन्त हो जाता है, तब आत्मप्राप्ति होती है। जिसका चित्त ही इच्छाओं से मुक्त हो गया, वह सिद्धियों की इच्छा कैसे कर सकता है?
९
अपि शीतरुचावर्के सुतीक्ष्णेऽपीन्दुमण्डले ।
अप्यधः प्रसरत्यग्नौ जीवन्मुक्तो न विस्मयी ॥ ९॥
अर्थ:
यदि सूर्य शीतल हो जाए, चन्द्रमा अत्यन्त उष्ण हो जाए या अग्नि नीचे की ओर प्रवाहित होने लगे, तब भी जीवन्मुक्त आश्चर्यचकित नहीं होता।
१०
अधिष्ठाने परे तत्त्वे कल्पिता रज्जुसर्पवत् ।
कल्पिताश्चर्यजालेषु नाभ्युदेति कुतूहलम् ॥ १०॥
अर्थ:
जैसे रस्सी में कल्पित सर्प वास्तविक नहीं होता, वैसे ही परम तत्त्व के आधार पर कल्पित ये आश्चर्यजनक दृश्य भी परम सत्य नहीं हैं। इसलिए ज्ञानी उनमें कौतूहल नहीं करता।
११
ये हि विज्ञातविज्ञेया वीतरागा महाधियः ।
विच्छिन्नग्रन्थयः सर्वे ते स्वतन्त्रास्तनौ स्थितः ॥ ११॥
अर्थ:
जिन महाबुद्धिमान पुरुषों ने जानने योग्य परम तत्त्व को जान लिया है, जिनकी आसक्ति और हृदय की गाँठें कट गई हैं, वे शरीर में रहते हुए भी स्वतन्त्र हैं।
१२
सुखदुःखदशाधीरं साम्यान्न प्रोद्धरन्ति यम् ।
निश्वासा इव शैलेन्द्रं चित्तं तस्य मृतं विदुः ॥ १२॥
अर्थ:
जिसका चित्त सुख-दुःख की अवस्थाओं से विचलित नहीं होता, जैसे हल्की साँस पर्वत को नहीं हिला सकती, उसके चित्त को शास्त्र मृत—अर्थात् वासनारहित—कहते हैं।
१३
आपत्कार्पण्यमुत्साहो मदो मान्द्यं महोत्सवः ।
यं नयन्ति न वैरूप्यं तस्य नष्टं मनो विदुः ॥ १३॥
अर्थ:
आपत्ति, दीनता, उत्साह, मद, आलस्य अथवा महान् उत्सव—इनमें से कोई भी जिसके मन का संतुलन नहीं बिगाड़ता, उसका मन नष्ट अर्थात् वासनाक्षीण माना जाता है।
१४
द्विविधचित्तनाशोऽस्ति सरूपोऽरूप एव च ।
जीवन्मुक्तौ सरूपः स्यादरूपो देहमुक्तिगः ॥ १४॥
अर्थ:
चित्तनाश दो प्रकार का कहा गया है—सरूप और अरूप। जीवन्मुक्ति में सरूप चित्तनाश होता है, जबकि देह से मुक्त होने पर अरूप चित्तनाश होता है।
१५
चित्तसत्तेह दुःखाय चित्तनाशः सुखाय च ।
चित्तसत्तं क्षयं नीत्वा चित्तं नाशमुपानयेत् ॥ १५॥
अर्थ:
चित्त की वासनामयी सत्ता दुःख का कारण है और उसका क्षय सुख का कारण है। इसलिए चित्त की ऐसी सत्ता को क्षीण करके उसके नाश की ओर ले जाना चाहिए।
१६
मनस्तां मूढतां विद्धि यदा नश्यति सानघ ।
चित्तनाशाभिधानं हि तत्स्वरूपमितीरितम् ॥ १६॥
अर्थ:
हे निष्पाप! मन की जो मूढ़ता और विषयासक्ति है, उसके नष्ट होने को ही चित्तनाश कहा गया है।
१७
मैत्र्यादिभिर्गुणैर्युक्तं भवत्युत्तमवासनम् ।
भूयो जन्मविनिर्मुक्तं जीवन्मुक्तस्य तन्मनः ॥ १७॥
अर्थ:
मैत्री आदि शुभ गुणों से युक्त मन उत्तम वासनाओं वाला होता है और जीवन्मुक्त का मन पुनर्जन्म के बन्धन से मुक्त होता है।
१८
सरूपोऽसौ मनोनाशो जीवन्मुक्तस्य विद्यते ।
निदाघाऽरूपनाशस्तु वर्तते देहमुक्तिके ॥ १८॥
अर्थ:
हे निदाघ! जीवन्मुक्त के लिए मन का सरूप नाश होता है; देहमुक्ति में अरूप नाश की अवस्था होती है।
१९
विदेहमुक्त एवासौ विद्यते निष्कलात्मकः ।
समग्राग्र्यगुणाधारमपि सत्त्वं प्रलीयते ॥ १९॥
अर्थ:
विदेहमुक्त पुरुष निष्कल, अर्थात् किसी विभाजन से रहित स्वरूप में स्थित होता है। वहाँ उत्कृष्ट गुणों का आधार माना जाने वाला सत्त्व भी विलीन हो जाता है।
२०
विदेहमुक्तौ विमले पदे परमपावने ।
विदेहमुक्तिविषये तस्मिन्सत्त्वक्षयात्मके ॥ २०॥
अर्थ:
विदेहमुक्ति की वह निर्मल और परम पवित्र अवस्था सत्त्व के पूर्ण क्षय से सम्बन्धित है।
२१
चित्तनाशे विरूपाख्ये न किंचिदिह विद्यते ।
न गुणा नागुणास्तत्र न श्रीर्नाश्रीर्न लोकता ॥ २१॥
अर्थ:
उस चित्तनाश की अवस्था में कुछ भी पृथक् नहीं रहता। न गुण हैं, न अगुण; न श्री है, न अश्री; न कोई लोकगत भेद।
२२
न चोदयो नास्तमयो न हर्षामर्षसंविदः ।
न तेजो न तमः किंचिन्न सन्ध्यादिनरात्रयः ।
न सत्तापि न चासत्ता न च मध्यं हि तत्पदम् ॥ २२॥
अर्थ:
वहाँ न उदय है न अस्त, न हर्ष है न क्रोध; न प्रकाश है न अन्धकार; न संध्या, न दिन, न रात। वहाँ न सामान्य अर्थ में सत्ता है, न असत्ता और न दोनों के बीच की कोई अवस्था।
२३
ये हि पारं गता बुद्धेः संसाराडम्बरस्य च ।
तेषां तदास्पदं स्फारं पवनानामिवाम्बरम् ॥ २३॥
अर्थ:
जो बुद्धि और संसार के सम्पूर्ण आडम्बर से पार चले गए हैं, उनके लिए वह परम पद वायु के लिए आकाश की तरह असीम और व्यापक है।
२४
संशान्तदुःखमजडात्मकमेकसुप्त-
मानन्दमन्थरमपेतरजस्तमो यत् ।
आकाशकोशतनवोऽतनवो महान्त-
स्तस्मिन्पदे गलितचित्तलवा भवन्ति ॥ २४॥
अर्थ:
वह पद पूर्ण दुःखशान्त, जड़ता से रहित, गहन शान्ति और आनन्द से युक्त तथा रज-तम से रहित है। वहाँ पहुँचकर विशाल आकाश के समान व्यापक साधक के चित्त के सूक्ष्म अंश भी विलीन हो जाते हैं।
२५
हे निदाघ महाप्राज्ञ निर्वासनमना भव ।
बलाच्चेतः समाधाय निर्विकल्पमना भव ॥ २५॥
अर्थ:
हे महान् बुद्धिमान निदाघ! वासनारहित मन वाले बनो। दृढ़ प्रयास से चित्त को समाधि में स्थिर करो और निर्विकल्प मन वाले बनो। �
Sanskrit Documents
ब्रह्मतत्त्व का विवेचन
२६
यज्जगद्भासकं भानं नित्यं भाति स्वतः स्फुरत् ।
स एव जगतः साक्षी सर्वात्मा विमलाकृतिः ॥ २६॥
अर्थ:
जिस चेतना के प्रकाश से यह सम्पूर्ण जगत् प्रकाशित होता है और जो स्वयं निरन्तर प्रकाशित है, वही जगत् का साक्षी, सबका आत्मा और निर्मल स्वरूप है।
२७
प्रतिष्ठा सर्वभूतानां प्रज्ञानघनलक्षणः ।
तद्विद्याविषयं ब्रह्म सत्यज्ञानसुखाद्वनम् ॥ २७॥
अर्थ:
वही समस्त प्राणियों का आधार है और प्रज्ञानघन उसका लक्षण है। उसी ज्ञान का विषय ब्रह्म है—जो सत्य, ज्ञान और आनन्दस्वरूप है।
२८
एकं ब्रह्माहमस्मीति कृतकृत्यो भवेन्मुनिः ॥ २८॥
अर्थ:
“मैं एकमात्र ब्रह्म हूँ”—इस अनुभूति को प्राप्त करके मुनि कृतकृत्य हो जाता है।
२९
सर्वाधिष्ठानमद्वन्द्वं परं ब्रह्म सनातनम् ।
सच्चिदानन्दरूपं तदवाङ्मनसगोचरम् ॥ २९॥
अर्थ:
वह सनातन परम ब्रह्म सबका आधार, द्वन्द्वरहित, सत्-चित्-आनन्दस्वरूप और वाणी तथा मन की पहुँच से परे है।
३०
न तत्र चन्द्रार्कवपुः प्रकाशते
न वान्ति वातः सकलाश्च देवताः ।
स एव देवः कृतभावभूतः
स्वयं विशुद्धो विरजः प्रकाशते ॥ ३०॥
अर्थ:
वहाँ सूर्य या चन्द्रमा का प्रकाश नहीं है, वायु नहीं बहती और देवताओं की शक्ति भी वहाँ प्रकाश का कारण नहीं है। वही परम देव स्वयं निर्मल और रजोगुणरहित होकर प्रकाशित होता है।
३१
भिद्यते हृदयग्रन्थिश्छिद्यन्ते सर्वसंशयाः ।
क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन्दृष्टे परावरे ॥ ३१॥
अर्थ:
उस परम ब्रह्म का साक्षात्कार होने पर हृदय की गाँठें कट जाती हैं, सभी संशय समाप्त हो जाते हैं और कर्मों का बन्धन क्षीण हो जाता है।
३२
द्वौ सुपर्णौ शरीरेऽस्मिञ्जीवेशाख्यौ सह स्थितौ ।
तयोर्जीवः फलं भुङ्क्ते कर्मणो न महेश्वरः ॥ ३२॥
अर्थ:
इस शरीर में जीव और ईश्वर नाम के दो पक्षी साथ स्थित हैं। उनमें जीव कर्मों के फल का भोग करता है; महेश्वर भोगता नहीं, साक्षी रहता है।
३३
केवलं साक्षिरूपेण विना भोगो महेश्वरः ।
प्रकाशते स्वयं भेदः कल्पितो मायया तयोः ।
चिच्चिदाकारतो भिन्ना न भिन्ना चित्त्वहानितः ॥ ३३॥
अर्थ:
महेश्वर केवल साक्षी रूप में स्थित है, भोग नहीं करता। जीव और ईश्वर का भेद माया द्वारा कल्पित है। चेतना के स्वरूप से देखने पर उनमें वास्तविक भेद नहीं है।
३४
तर्कतश्च प्रमाणाच्च चिदेकत्वव्यवस्थितेः ।
चिदेकत्वपरिज्ञाने न शोचति न मुह्यति ॥ ३४॥
अर्थ:
तर्क और प्रमाण से चेतना की एकता सिद्ध होती है। इस चैतन्य-एकत्व को जान लेने पर मनुष्य न शोक करता है, न मोह में पड़ता है।
३५
अधिष्ठानं समस्तस्य जगतः सत्यचिद्घनम् ।
अहमस्मीति निश्चित्य वीतशोको भवेन्मुनिः ॥ ३५॥
अर्थ:
सम्पूर्ण जगत् का आधार सत्य-चैतन्यघन ब्रह्म है। “वही मैं हूँ”—ऐसा निश्चय करके मुनि शोक से मुक्त हो जाता है।
३६
स्वशरीरे स्वयंज्योतिस्वरूपं सर्वसाक्षिणम् ।
क्षीणदोषाः प्रपश्यन्ति नेतरे माययावृताः ॥ ३६॥
अर्थ:
अपने ही शरीर में स्थित स्वयंप्रकाश, सर्वसाक्षी आत्मा को जिनके दोष क्षीण हो गए हैं वे देखते हैं; माया से आवृत लोग उसे नहीं देख पाते।
३७
तमेव धीरो विज्ञाय प्रज्ञां कुर्वीत ब्राह्मणः ।
नानुध्यायाद्बहूञ्छब्दान्वाचो विग्लापनं हि तत् ॥ ३७॥
अर्थ:
धीर साधक को उसी परम आत्मा को जानकर उसमें अपनी बुद्धि स्थिर करनी चाहिए। बहुत-से शब्दों और वाद-विवादों में उलझना वाणी को थका देने मात्र के समान है।
३८
बालेनैव हि तिष्ठासेन्निर्विद्य ब्रह्मवेदनम् ।
ब्रह्मविद्यां च बाल्यं च निर्विद्य मुनिरात्मवान् ॥ ३८॥
अर्थ:
ब्रह्मज्ञान के बाद साधक बालक जैसी सरलता में स्थित रहे। ब्रह्मविद्या और बाल्य—दोनों के अहंकार से भी परे होकर आत्मवान् मुनि बने।
चित्त, प्राण और वासना
३९
अन्तर्लीनसमारम्भः शुभाशुभमहाङ्कुरम् ।
संसृतिव्रततेर्बीजं शरीरं विद्धि भौतिकम् ॥ ३९॥
अर्थ:
यह भौतिक शरीर शुभ-अशुभ कर्मों के महान् अंकुरों और संसाररूपी लता का बीज है; इसके भीतर कर्मों के संस्कार छिपे रहते हैं।
४०
भावाभावदशाकोशं दुःखरत्नसमुद्गकम् ।
बीजमस्य शरीरस्य चित्तमाशावशानुगम् ॥ ४०॥
अर्थ:
चित्त भाव-अभाव की अवस्थाओं का भण्डार और दुःखों का स्रोत है। यह शरीररूपी वृक्ष का बीज है और आशाओं के अधीन चलता है।
४१
द्वे बीजे चित्तवृक्षस्य वृत्तिव्रततिधारिणः ।
एकं प्राणपरिस्पन्दो द्वितीयो दृढभावना ॥ ४१॥
अर्थ:
चित्तरूपी वृक्ष के दो बीज हैं—पहला प्राणों का स्पन्दन और दूसरा दृढ़ भावना या वासना।
४२
यदा प्रस्पन्दन्ते प्राणो नाडीसंस्पर्शनोद्यतः ।
तदा संवेदनमयं चित्तमाशु प्रजायते ॥ ४२॥
अर्थ:
जब नाड़ियों में प्राण का स्पन्दन होता है, तब शीघ्र ही संवेदनाओं से युक्त चित्त उत्पन्न हो जाता है।
४३
सा हि सर्वगता संवित्प्राणस्पन्देन बोध्यते ।
संवित्संरोधनं श्रेयः प्राणादिस्पन्दनं वरम् ॥ ४३॥
अर्थ:
सर्वव्यापी चेतना का अनुभव प्राण के स्पन्दन से होता है। इसलिए प्राणों के अनियंत्रित स्पन्दन को रोककर चेतना में स्थिर होना कल्याणकारी है।
४४
योगिनश्चित्तशान्त्यर्थं कुर्वन्ति प्राणरोधनम् ।
प्राणायामैस्तथा ध्यानैः प्रयोगैर्युक्तिकल्पितैः ॥ ४४॥
अर्थ:
योगी चित्त की शान्ति के लिए प्राणों का नियमन करते हैं—प्राणायाम, ध्यान और उचित योग-विधियों के द्वारा।
४५
चित्तोपशान्तिफलदं परमं विद्धि कारणम् ।
सुखदं संविदः स्वास्थ्यं प्राणसंरोधनं विदुः ॥ ४५॥
अर्थ:
प्राणसंयम चित्त की शान्ति का महान् साधन है। योगी इसे चेतना की स्थिरता और आन्तरिक सुख का कारण मानते हैं।
४६
दृढभावनया त्यक्तपूर्वापरविचारणम् ।
यदादानं पदार्थस्य वासना सा प्रकीर्तिता ॥ ४६॥
अर्थ:
किसी वस्तु के प्रति दृढ़ मानसिक ग्रहण, जिसमें पूर्व और भविष्य की कल्पनाएँ जुड़ी हों, वही वासना कहलाती है।
४७
यदा न भाव्यते किंचिद्धेयोपादेयरूपि यत् ।
स्थीयते सकलं त्यक्त्वा तदा चित्तं न जायते ॥ ४७॥
अर्थ:
जब त्याज्य और ग्राह्य किसी भी वस्तु की भावना नहीं रहती और सबको छोड़कर साधक स्थित रहता है, तब चित्त की चंचल वृत्ति उत्पन्न नहीं होती।
४८
अवासनत्वात्सततं यदा न मनुते मनः ।
अमनस्ता तदोदेति परमोपशमप्रदा ॥ ४८॥
अर्थ:
जब वासनारहित मन किसी वस्तु का निरन्तर चिन्तन नहीं करता, तब मन से परे की अवस्था उत्पन्न होती है, जो परम शान्ति देने वाली है।
४९
यदा न भाव्यते भावः क्वचिज्जगति वस्तुनि ।
तदा हृदम्बरे शून्ये कथं चित्तं प्रजायते ॥ ४९॥
अर्थ:
जब संसार की किसी भी वस्तु के प्रति मानसिक कल्पना नहीं रहती, तब हृदय-आकाश की उस शून्य अवस्था में चित्त कैसे उत्पन्न होगा?
५०
यदभावनमास्थाय यदभावस्य भावनम् ।
यद्यथा वस्तुदर्शित्वं तदचित्तत्वमुच्यते ॥ ५०॥
अर्थ:
किसी वस्तु की कल्पना न करना और उसके अभाव की भी कल्पना न करना, तथा वस्तु को जैसा है वैसा देखना—इसी को अचित्तता कहा गया है।
५१
सर्वमन्तः परित्यज्य शीतलाशयवर्ति यत् ।
वृत्तिस्थमपि तच्चित्तमसद्रूपमुदाहृतम् ॥ ५१॥
अर्थ:
जो भीतर से सबका त्याग करके शीतल और शान्त रहता है, उसका चित्त यदि कोई वृत्ति करता भी हो तो उसे असत्स्वरूप कहा गया है—अर्थात् उसकी पकड़ वास्तविक नहीं रहती।
५२
भ्रष्टबीजोपमा येषां पुनर्जननवर्जिता ।
वासनारसनाहीना जीवन्मुक्ता हि ते स्मृताः ॥ ५२॥
अर्थ:
जिनकी वासनाएँ ऐसे बीज के समान हो गई हैं जो अंकुरित नहीं हो सकता, वे पुनर्जन्म से रहित जीवन्मुक्त कहलाते हैं।
५३
सत्त्वरूपपरिप्राप्तचित्तास्ते ज्ञानपारगाः ।
अचित्ता इति कथ्यन्ते देहान्ते व्योमरूपिणः ॥ ५३॥
अर्थ:
जिनका चित्त शुद्ध सत्त्वस्वरूप को प्राप्त हो गया है और जो ज्ञान के पार पहुँच चुके हैं, उन्हें अचित्त कहा जाता है; देहान्त के बाद वे आकाश के समान व्यापक हो जाते हैं।
५४
संवेद्यसम्परित्यागात्प्राणस्पन्दनवासने ।
समूलं नश्यतः क्षिप्रं मूलच्छेदादिव द्रुमः ॥ ५४॥
अर्थ:
विषयों का पूर्ण त्याग करने पर प्राण का स्पन्दन और वासना दोनों जड़ से शीघ्र नष्ट हो जाते हैं, जैसे जड़ काट देने पर वृक्ष नष्ट हो जाता है।
५५
पूर्वदृष्टमदृष्टं वा यदस्याः प्रतिभासते ।
संविदस्तत्प्रयत्नेन मार्जनीयं विजानता ॥ ५५॥
अर्थ:
पूर्व में देखा हुआ हो या न देखा हुआ—जो भी संस्कार चेतना में उभरता है, ज्ञानी को प्रयत्नपूर्वक उसे मिटाना चाहिए।
५६
तदमार्जनमात्रं हि महासंसारतां गतम् ।
तत्प्रमार्जनमात्रं तु मोक्ष इत्यभिधीयते ॥ ५६॥
अर्थ:
उन संस्कारों और वासनाओं का न मिटना ही महान् संसार-बन्धन है; उनका पूर्ण मिट जाना ही मोक्ष कहलाता है।
५७
अजडो गलितानन्दस्त्यक्तसंवेदनो भव ॥ ५७॥
अर्थ:
जड़ता से रहित, सामान्य विषयानन्द से परे और विषय-संवेदन की आसक्ति से मुक्त हो जाओ।
५८
संविद्वस्तुदशालम्बः सा यस्येह न विद्यते ।
सोऽसंविदजडः प्रोक्तः कुर्वन्कार्यशतान्यपि ॥ ५८॥
अर्थ:
जिसकी चेतना वस्तुओं की अवस्थाओं का आश्रय नहीं लेती, वह अ-संविद् अर्थात् विषयासक्ति से रहित और जड़ता से मुक्त कहा जाता है, भले ही वह सैकड़ों कार्य करता रहे।
५९
संवेद्येन हृदाकाशे मनागपि न लिप्यते ।
यस्यासावजडा संविज्जीवन्मुक्तः स कथ्यते ॥ ५९॥
अर्थ:
जिसकी चेतना हृदय-आकाश में किसी विषय से तनिक भी लिप्त नहीं होती, वही अजड़ चेतना वाला पुरुष जीवन्मुक्त कहलाता है। �
Sanskrit Documents +1
६०
यदा न भाव्यते किंचिन्निर्वासनतयात्मनि ।
बालमूकादिविज्ञानमिव च स्थीयते स्थिरम् ॥ ६०॥
अर्थ:
जब आत्मा में वासनारहित होकर किसी वस्तु की कल्पना नहीं की जाती, तब ज्ञान बालक अथवा मूक व्यक्ति की सरल, निष्कल्प अवस्था जैसा स्थिर हो जाता है।
६१
तदा जाड्यविनिर्मुक्तमसंवेदनमाततम् ।
आश्रितं भवति प्राज्ञो यस्माद्भूयो न लिप्यते ॥ ६१॥
अर्थ:
तब ज्ञानी जड़ता से मुक्त, विषय-संवेदन से परे व्यापक चेतना का आश्रय लेता है और फिर संसार में लिप्त नहीं होता।
६२
समस्ता वासनास्त्यक्त्वा निर्विकल्पसमाधितः ।
तन्मयत्वादनाद्यन्ते तदप्यन्तर्विलीयते ॥ ६२॥
अर्थ:
सभी वासनाओं को त्यागकर निर्विकल्प समाधि में स्थित होने पर साधक अनादि-अनन्त तत्त्व में तन्मय हो जाता है और अंततः वह भी भीतर विलीन हो जाता है।
६३
तिष्ठन्गच्छन्स्पृशञ्जिघ्रन्नपि तल्लेपवर्जितः ।
अजडो गलितानन्दस्त्यक्तसंवेदनः सुखी ॥ ६३॥
अर्थ:
वह खड़ा हो, चले, स्पर्श करे या सूँघे—फिर भी किसी विषय से लिप्त नहीं होता। जड़ता से मुक्त, विषयासक्ति से रहित और सामान्य आनन्द से परे होकर वह सुखी रहता है।
६४
एतां दृष्टिमवष्टभ्य कष्टचेष्टायुतोऽपि सन् ।
तरेद्दुःखाम्बुधेः पारमपारगुणसागरः ॥ ६४॥
अर्थ:
इस दृष्टि को धारण करके, कठिन परिस्थितियों में भी साधक दुःखरूपी समुद्र को पार कर सकता है और अनन्त गुणों के सागर परम पद को प्राप्त कर सकता है।
६५
विशेषं सम्परित्यज्य सन्मात्रं यदलेपकम् ।
एकरूपं महारूपं सत्तायास्तत्पदं विदुः ॥ ६५॥
अर्थ:
सभी विशेषताओं को छोड़कर जो केवल शुद्ध सत्ता, किसी से न लिप्त और एकरूप है, उसे ही सत्ता का परम पद कहा गया है।
६६
कालसत्ता कलासत्ता वस्तुसत्तेयमित्यपि ।
विभागकलनां त्यक्त्वा सन्मात्रैकपरो भव ॥ ६६॥
अर्थ:
काल की सत्ता, कला की सत्ता, वस्तु की सत्ता आदि के भेद छोड़कर केवल शुद्ध सत्ता में स्थित हो जाओ।
६७
सत्तासामान्यमेवैकं भावयन्केवलं विभुः ।
परिपूर्णः परानन्दि तिष्ठापूरितदिग्भरः ॥ ६७॥
अर्थ:
केवल एक समान शुद्ध सत्ता का ध्यान करते हुए साधक सर्वव्यापक, पूर्ण और परम आनन्दमय होकर स्थित रहता है; उसका स्वरूप सभी दिशाओं को भर देता है।
६८
सत्तासामान्यपर्यन्ते यत्तत्कलनयोज्झितम् ।
पदमाद्यमनाद्यन्तं तस्य बीजं न विद्यते ॥ ६८॥
अर्थ:
शुद्ध सत्ता की चरम अवस्था में जो कल्पना से रहित आदि-अनन्त पद है, उसका कोई कारण या बीज नहीं है।
६९
तत्र संलीयते संविन्निर्विकल्पं च तिष्ठति ।
भूयो न वर्तते दुःखे तत्र लब्धपदः पुमान् ॥ ६९॥
अर्थ:
वहाँ चेतना विलीन होकर निर्विकल्प रहती है। जो उस पद को प्राप्त कर लेता है, वह फिर दुःख में नहीं लौटता।
७०
तद्धेतुः सर्वभूतानां तस्य हेतुर्न विद्यते ।
स सारः सर्वसाराणां तस्मात्सारो न विद्यते ॥ ७०॥
अर्थ:
वह सभी प्राणियों का कारण है, पर स्वयं उसका कोई कारण नहीं। वह सभी सारों का सार है; इसलिए उससे अधिक कोई सार नहीं है।
७१
तस्मिंश्चिद्दर्पणे स्फारे समस्ता वस्तुदृष्टयः ।
इमास्ताः प्रतिबिम्बन्ति सरसीव तटद्रुमाः ॥ ७१॥
अर्थ:
उस विशाल चैतन्य-दर्पण में सभी वस्तुओं के रूप उसी प्रकार प्रतिबिम्बित होते हैं जैसे शांत सरोवर में किनारे के वृक्ष प्रतिबिम्बित होते हैं।
७२
तदमलमरजं तदात्मतत्त्वं
तदवगतावुपशान्तिमेति चेतः ।
अवगतविगतैकतत्स्वरूपो
भवभयमुक्तपदोऽसि सम्यगेव ॥ ७२॥
अर्थ:
वही निर्मल, रजरहित आत्मतत्त्व है। उसे जान लेने पर चित्त शान्त हो जाता है। उसके वास्तविक अद्वैत स्वरूप को जानकर तुम संसार-भय से मुक्त परम पद को प्राप्त हो जाते हो। �
Sanskrit Documents
७३
एतेषां दुःखबीजानां प्रोक्तं यद्यन्मयोत्तरम् ।
तस्य तस्य प्रयोगेण शीघ्रं तत्प्राप्यते पदम् ॥ ७३॥
अर्थ:
दुःख के जिन-जिन बीजों के विषय में मैंने उपाय बताए हैं, उनके अभ्यास से साधक शीघ्र ही परम पद प्राप्त कर सकता है।
७४
सत्तासामान्यकोटिस्थे द्रागित्येव पदे यदि ।
पौरुषेण प्रयत्नेन बलात्संत्यज्य वासनाम् ॥ ७४॥
अर्थ:
यदि पुरुषार्थपूर्वक वासनाओं को दृढ़ता से छोड़कर शुद्ध सत्ता के परम पद में तुरन्त स्थित होने का प्रयास किया जाए—
७५
स्थितिं बध्नासि तत्त्वज्ञ क्षणमप्यक्षयात्मिकाम् ।
क्षणेऽस्मिन्नेव तत्साधु पदमासादयस्यलम् ॥ ७५॥
अर्थ:
हे तत्त्वज्ञ! यदि तुम उस अविनाशी अवस्था में एक क्षण के लिए भी स्थिर हो जाओ, तो इसी क्षण परम पद की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त हो जाता है।
७६
सत्तासामान्यरूपे वा करोषि स्थितिमादरात् ।
तत्किंचिदधिकेनेह यत्नेनाप्नोषि तत्पदम् ॥ ७६॥
अर्थ:
यदि तुम शुद्ध सत्ता के सामान्य स्वरूप में श्रद्धापूर्वक स्थित होते हो, तो थोड़े और प्रयास से उसी परम पद को प्राप्त कर सकते हो।
७७
संवित्तत्त्वे कृतध्यानो निदाघ यदि तिष्ठसि ।
तद्यत्नेनाधिकेनोच्चैरासादयसि तत्पदम् ॥ ७७॥
अर्थ:
हे निदाघ! यदि तुम चेतना के तत्त्व में ध्यानपूर्वक स्थित रहो, तो और अधिक प्रयत्न से उस परम पद को प्राप्त कर लोगे।
७८
वासनासम्परित्यागे यदि यत्नं करोषि भोः ।
यावद्विलीनं न मनो न तावद्वासनाक्षयः ॥ ७८॥
अर्थ:
यदि वासनाओं को त्यागने का प्रयास कर रहे हो, तो याद रखो—जब तक मन की चंचलता विलीन नहीं होती, तब तक वासनाओं का पूर्ण क्षय नहीं होता।
७९
न क्षीणा वासना यावच्चित्तं तावन्न शाम्यति ।
यावन्न तत्त्वविज्ञानं तावच्चित्तशमः कुतः ॥ ७९॥
अर्थ:
जब तक वासनाएँ क्षीण नहीं होतीं, चित्त शान्त नहीं होता; और जब तक तत्त्वज्ञान नहीं होता, तब तक चित्त की पूर्ण शान्ति कैसे हो सकती है?
८०
यावन्न चित्तोपशमो न तावत्तत्त्ववेदनम् ।
यावन्न वासनानाशस्तावत्तत्त्वागमः कुतः ।
यावन्न तत्त्वसम्प्राप्तिर्न तावद्वासनक्षयः ॥ ८०॥
अर्थ:
चित्त शान्त हुए बिना तत्त्वज्ञान नहीं; वासनाओं के नष्ट हुए बिना तत्त्वज्ञान नहीं; और तत्त्व की पूर्ण प्राप्ति हुए बिना वासनाओं का पूर्ण क्षय नहीं। ये तीनों एक-दूसरे से जुड़े हैं।
८१
तत्त्वज्ञानं मनोनाशो वासनाक्षय एव च ।
मिथः कारणतां गत्वा दुःसाधानि स्थितान्यतः ॥ ८१॥
अर्थ:
तत्त्वज्ञान, मनोनाश और वासनाक्षय—ये तीनों एक-दूसरे के कारण बनते हैं और इसलिए साधना में कठिन होते हुए भी परस्पर सहायक हैं।
८२
भोगेच्छां दूरतस्त्यक्त्वा त्रयमेतत्समाचर ॥ ८२॥
अर्थ:
भोग की इच्छा को दूर से ही त्यागकर इन तीनों का अभ्यास करो—तत्त्वज्ञान, मनोनाश और वासनाक्षय।
८३
वासनाक्षयविज्ञानमनोनाशा महामते ।
समकालं चिराभ्यस्ता भवन्ति फलदा मताः ॥ ८३॥
अर्थ:
हे महामते! वासनाक्षय, तत्त्वज्ञान और मनोनाश—इन तीनों का दीर्घकाल तक साथ-साथ अभ्यास करने पर वे फलदायक होते हैं।
८४
त्रिभिरेभिः समभ्यस्तैर्हृदयग्रन्थयो दृढाः ।
निःशेषमेव त्रुट्यन्ति बिसच्छेदाद्गुणा इव ॥ ८४॥
अर्थ:
इन तीनों के अभ्यास से हृदय की दृढ़ गाँठें पूर्णतः कट जाती हैं, जैसे कमल की डंडी के रेशे टूट जाते हैं।
८५
वासनासम्परित्यागसमं प्राणनिरोधनम् ।
विदुस्तत्त्वविदस्तस्मात्तदप्येवं समाहरेत् ॥ ८५॥
अर्थ:
तत्त्वज्ञ प्राणनिरोध को वासनात्याग के समान ही महत्वपूर्ण मानते हैं। इसलिए प्राणसंयम का भी अभ्यास करना चाहिए।
८६
वासनासम्परित्यागाच्चित्तं गच्छत्यचित्तताम् ।
प्राणस्पन्दनिरोधाच्च यथेच्छसि तथा कुरु ॥ ८६॥
अर्थ:
वासनाओं के त्याग से चित्त अचित्त अवस्था में जाता है और प्राणों के स्पन्दन को रोकने से भी वही परिणाम प्राप्त होता है। इसलिए साधक दोनों में से उपयुक्त साधन अपनाए।
८७
प्राणायामदृढाध्यासैर्युक्त्या च गुरुदत्तया ।
आसनाशनयोगेन प्राणस्पन्दो निरुध्यते ॥ ८७॥
अर्थ:
दृढ़ प्राणायाम-अभ्यास, गुरु द्वारा दी गई उचित युक्ति, आसन और आहार-संयम आदि के द्वारा प्राणों का स्पन्दन नियंत्रित किया जाता है।
८८
निःसङ्गव्यवहारत्वाद्भवभावनवर्जनात् ।
शरीरनाशदर्शित्वाद्वासना न प्रवर्तते ॥ ८८॥
अर्थ:
असंग व्यवहार, वस्तुओं के प्रति भावनात्मक आसक्ति का त्याग और शरीर की नश्वरता का ज्ञान—इनसे वासनाएँ फिर सक्रिय नहीं होतीं।
८९
यः प्राणपवनस्पन्दश्चित्तस्पन्दः स एव हि ।
प्राणस्पन्दजये यत्नः कर्तव्यो धीमतोच्चकैः ॥ ८९॥
अर्थ:
प्राणवायु का स्पन्दन ही चित्त का स्पन्दन है। इसलिए बुद्धिमान साधक को प्राण-स्पन्दन के नियन्त्रण के लिए विशेष प्रयत्न करना चाहिए।
९०
न शक्यते मनो जेतुं विना युक्तिमनिन्दिताम् ।
शुद्धां संविदमाश्रित्यवीतरागः स्थिरो भव ॥ ९०॥
अर्थ:
उचित साधन के बिना मन को जीतना सम्भव नहीं। शुद्ध चेतना का आश्रय लेकर, राग-द्वेष से मुक्त होकर स्थिर रहो।
९१
संवेद्यवर्जितमनुत्तममाद्यमेकं
संविदत्पदं विकलनं कलयन्महात्मन् ।
हृद्येव तिष्ठ कलनारहितः क्रियां तु
कुर्वन्नकर्तृपदमेत्य शमोदितश्रीः ॥ ९१॥
अर्थ:
हे महात्मन्! उस सर्वोच्च, आदि, एक और विषय-रहित चेतना-पद को जानकर हृदय में ही स्थित रहो। कल्पना से मुक्त होकर कर्म करते हुए भी अकर्तृत्व की अवस्था प्राप्त करो और शान्ति की शोभा से युक्त हो जाओ।
९२
मनागपि विचारेण चेतसः स्वस्य निग्रहः ।
पुरुषेण कृतो येन तेनाप्तं जन्मनः फलम् ॥ ९२॥
अर्थ:
जिस पुरुष ने थोड़े-से भी आत्म-विचार द्वारा अपने चित्त पर विजय प्राप्त कर ली, उसने अपने मानव-जन्म का वास्तविक फल प्राप्त कर लिया।
॥ इति चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४॥ �
Sanskrit Documents
चतुर्थ अध्याय का सार
इस अध्याय का अत्यन्त महत्वपूर्ण संदेश है कि चमत्कारी सिद्धियाँ जीवन्मुक्ति की पहचान नहीं हैं। वास्तविक मुक्ति के लिए तीन बातें बार-बार सामने आती हैं—तत्त्वज्ञान, मनोनाश और वासनाक्षय। उपनिषद् के अनुसार इनका परस्पर अभ्यास हृदय की गाँठों को काटता है और साधक को उस अद्वैत आत्मतत्त्व में प्रतिष्ठित करता है जहाँ वह कर्म करता हुआ भी भीतर से अकर्ता और असंग रहता है। �
Sanskrit Documents +1

जी। नीचे अन्नपूर्णोपनिषद् के पंचम अध्याय का पूरा मूलपाठ (१–१२०) सरल हिन्दी अर्थ सहित दिया जा रहा है। मूल पाठ का क्रम और पाठ-संख्या संस्कृतDocuments के उपलब्ध पाठ से मिलाई गई है। �
Sanskrit Documents +1
अन्नपूर्णोपनिषद् — पंचमोऽध्यायः
श्लोक १
मूलपाठ—
गच्छतस्तिष्ठतो वापि जाग्रतः स्वपतोऽपि वा ।
न विचारपरं चेतो यस्यासौ मृत उच्यते ॥ १॥
अर्थ—
जो व्यक्ति चलते, बैठते, जागते अथवा सोते हुए भी आत्म-विचार में मन को नहीं लगाता, उसे यहाँ आध्यात्मिक दृष्टि से मृत कहा गया है।
श्लोक २
सम्यग्ज्ञानसमालोकः पुमाऽज्ञेयसमः स्वयम् ।
न बिभेति न चादत्ते वैवश्यं न च दीनताम् ॥ २॥
अर्थ—
सम्यक् ज्ञान के प्रकाश से प्रकाशित मनुष्य स्वयं अज्ञान से परे हो जाता है। वह न भयभीत होता है, न असहायता स्वीकार करता है और न दीनता को अपनाता है।
श्लोक ३
अपवित्रमपथ्यं च विषसंसर्गदूषितम् ।
भुक्तं जरयति ज्ञानी क्लिन्नं नष्ठं च मृष्टवत् ॥ ३॥
अर्थ—
ज्ञानी पुरुष अपवित्र, अहितकर अथवा विष-संसर्ग से दूषित वस्तु भी ग्रहण हो जाने पर उसे वैसे ही पचा देता है, जैसे कोई साधारण मलिन वस्तु हो। अर्थात् ज्ञानवान आसक्ति से अछूता रहता है।
श्लोक ४
सङ्गत्यागं विदुर्मोक्षं सङ्गत्यागादजन्मता ।
सङ्गं त्यज त्वं भावानां जीवन्मुक्तो भवानघ ॥ ४॥
अर्थ—
संग का त्याग ही मोक्ष कहा गया है और संग-त्याग से पुनर्जन्म का बन्धन समाप्त होता है। अतः हे निष्पाप! पदार्थों और भावों की आसक्ति छोड़कर जीवन्मुक्त बनो।
श्लोक ५
भावाभावे पदार्थानां हर्षामर्षविकारदा ।
मलिना वासना यैषा साऽसङ्ग इति कथ्यते ॥ ५॥
अर्थ—
पदार्थों की प्राप्ति या अप्राप्ति से जो हर्ष और क्रोध आदि विकार उत्पन्न होते हैं, उनसे रहित निर्मल वासना को ही असंगता कहा गया है।
श्लोक ६
जीवन्मुक्तशरीराणामपुनर्जन्मकारिणी ।
मुक्ता हर्षविषादाभ्यां शुद्धा भवति वासना ॥ ६॥
अर्थ—
जो वासना हर्ष और विषाद दोनों से मुक्त तथा शुद्ध हो जाती है, वह जीवन्मुक्त के शरीर को पुनर्जन्म का कारण नहीं बनने देती।
श्लोक ७
दुःखैर्न ग्लानिमायासि हृदि हृष्यसि नो सुखैः ।
आशावैवश्यमुत्सृज्य निदाघाऽसङ्गतां व्रज ॥ ७॥
अर्थ—
हे निदाघ! दुःख आने पर खिन्न मत हो और सुख मिलने पर अत्यधिक प्रसन्न मत हो। आशाओं की पराधीनता छोड़कर असंगता को अपनाओ।
श्लोक ८
दिक्कालाद्यनवच्छिन्नमदृष्टोभयकोटिकम् ।
चिन्मात्रमक्षयं शान्तमेकं ब्रह्मास्मि नेतरत् ॥ ८॥
अर्थ—
मैं दिशा और काल आदि से परे, दोनों सीमाओं से रहित, केवल चैतन्यस्वरूप, अविनाशी और शांत एकमात्र ब्रह्म हूँ; इसके अतिरिक्त कुछ नहीं।
श्लोक ९
इति मत्वाहमित्यन्तर्मुक्तामुक्तवपुः पुमान् ।
एकरूपः प्रशान्तात्मा मौनी स्वात्मसुखो भव ॥ ९॥
अर्थ—
इस प्रकार भीतर से ‘मैं ब्रह्म हूँ’ ऐसा जानकर मनुष्य बाहरी बन्धनों से मुक्त होकर एकरूप, शांत और मौन आत्मस्वरूप के आनन्द में स्थित हो।
श्लोक १०
नास्ति चित्तं न चाविद्या न मनो न च जीवकः ।
ब्रह्मैवैकमनाद्यन्तमब्धिवत्प्रविजृम्भते ॥ १०॥
अर्थ—
परम सत्य में न चित्त है, न अविद्या, न मन और न पृथक् जीव। अनादि-अनन्त ब्रह्म ही समुद्र की तरह सर्वत्र विस्तृत है।
श्लोक ११
देहे यावदहंभावो दृश्येऽस्मिन्यावदात्मता ।
यावन्ममेदमित्यास्था तावच्चित्तादिविभ्रमः ॥ ११॥
अर्थ—
जब तक देह में ‘मैं’ का भाव और दृश्य संसार में आत्मबुद्धि है, जब तक ‘यह मेरा है’ की आसक्ति है, तब तक चित्त और संसार का भ्रम बना रहता है।
श्लोक १२
अन्तर्मुखतया सर्वं चिद्वह्नौ त्रिजगत्तृणम् ।
जुह्वन्तोऽन्तर्निवर्तन्ते मुने चित्तादिविभ्रमाः ॥ १२॥
अर्थ—
अन्तर्मुख होकर तीनों लोकों को चैतन्यरूपी अग्नि में तृण के समान अर्पित करने पर चित्त आदि के सारे भ्रम भीतर ही शांत हो जाते हैं।
श्लोक १३
चिदात्मास्मि निरंशोऽस्मि परापरविवर्जितः ।
रूपं स्मरन्निजं स्फारं मा स्मृत्या संमितो भव ॥ १३॥
अर्थ—
‘मैं चैतन्य आत्मा हूँ, अखण्ड हूँ, पर और अपर से रहित हूँ।’ अपने व्यापक स्वरूप का स्मरण करते हुए स्वयं को सीमित मत समझो।
श्लोक १४
अध्यात्मशास्त्रमन्त्रेण तृष्णाविषविषूचिका ।
क्षीयते भावितेनान्तः शरदा मिहिका यथा ॥ १४॥
अर्थ—
अध्यात्मशास्त्र के ज्ञानरूपी मन्त्र का मनन करने से तृष्णा का विष उसी प्रकार नष्ट हो जाता है जैसे शरद् ऋतु में कुहरा मिट जाता है।
श्लोक १५
परिज्ञाय परित्यागो वासानानं य उत्तमः ।
सत्तासामान्यरूपत्वात्तत्कैवल्यपदं विदुः ॥ १५॥
अर्थ—
वासना को भलीभाँति पहचानकर उसका त्याग करना श्रेष्ठ है। अस्तित्व की सामान्य, अखण्ड स्थिति में स्थित होने के कारण इसे कैवल्य-पद कहा गया है।
श्लोक १६
यन्नास्ति वासना लीना तत्सुषुप्तं न सिद्धये ।
निर्बीजा वासना यत्र तत्तुर्यं सिद्धिदं स्मृतम् ॥ १६॥
अर्थ—
जहाँ केवल वासनाएँ लीन हो गई हों, वह अवस्था सुषुप्ति है, सिद्धि नहीं। जहाँ वासनाएँ बीजरहित हो जाती हैं, वही तुर्य अवस्था सिद्धिदायक कही गई है।
श्लोक १७
वासानायास्तथा वह्नेरृणव्याधिद्विषामपि ।
स्नेहवैरविषाण च शेषः स्वल्पोऽपि बाधते ॥ १७॥
अर्थ—
वासना, अग्नि, ऋण, रोग, शत्रु, स्नेह और विष—इनमें से किसी का थोड़ा-सा अवशेष भी आगे कष्ट दे सकता है।
श्लोक १८
निर्दग्धवासनाबीजः सत्तासामान्यरूपवान् ।
सदेहो वा विदेहो वा न भूयो दुःखभाग्भवेत् ॥ १८॥
अर्थ—
जिसकी वासनाओं के बीज पूरी तरह जल गए हैं और जो अस्तित्व के अखण्ड स्वरूप में स्थित है, वह देहधारी हो या विदेह—फिर दुःख का भागी नहीं होता।
श्लोक १९
एतावदेवाविद्यात्वं नेदं ब्रह्मेति निश्चयः ।
एष एव क्षयस्तस्या ब्रह्मेदमिति निश्चयः ॥ १९॥
अर्थ—
‘यह ब्रह्म नहीं है’—ऐसा निश्चय ही अविद्या है; ‘यह सब ब्रह्म है’—ऐसा दृढ़ निश्चय ही अविद्या का क्षय है।
श्लोक २०
ब्रह्म चिद्ब्रह्म भुवनं ब्रह्म भूतपरम्परा ।
ब्रह्माहं ब्रह्म चिच्छत्रुर्ब्रह्म चिन्मित्रबान्धवाः ॥ २०॥
अर्थ—
ब्रह्म ही चैतन्य है, ब्रह्म ही संसार है, ब्रह्म ही समस्त भूत-परम्परा है। मैं ब्रह्म हूँ; शत्रु भी ब्रह्म है और मित्र तथा बन्धु भी ब्रह्म हैं।
श्लोक २१
ब्रह्मैव सर्वमित्येव भाविते ब्रह्म वै पुमान् ।
सर्वत्रावस्थितं शान्तं चिद्ब्रह्मेत्यनुभूयते ॥ २१॥
अर्थ—
जब मनुष्य दृढ़ता से ‘सब कुछ ब्रह्म ही है’ ऐसा भाव करता है, तब वह ब्रह्मस्वरूप हो जाता है और सर्वत्र स्थित शांत चैतन्य-ब्रह्म का अनुभव करता है। �
Sanskrit Documents +1
श्लोक २२
असंस्कृताध्वगालोके मनस्यन्यत्र संस्थिते ।
या प्रतीतिरनागसका तच्चिद्ब्रह्मास्मि सर्वगम् ॥ २२॥
अर्थ—
जब बाहरी मार्ग और संसार को देखते हुए भी मन कहीं और—आत्मस्वरूप में—स्थित हो, तब जो निर्मल अनुभूति होती है, वही सर्वव्यापी चिद्ब्रह्म का अनुभव है।
श्लोक २३
प्रशान्तसर्वसंकल्पं विगताखिलकौतुकम् ।
विगताशेषसंरंभं चिदात्मानं समाश्रय ॥ २३॥
अर्थ—
सभी संकल्पों से शांत, समस्त कौतूहल से रहित और सभी मानसिक उद्वेगों से मुक्त चैतन्य आत्मा का आश्रय लो।
श्लोक २४
एवं पूर्णधियो धीराः समा नीरागचेतसः ।
न नन्दन्ति न निन्दन्ति जीवितं मरणं तथा ॥ २४॥
अर्थ—
इस प्रकार जिनकी बुद्धि पूर्ण और मन रागरहित हो जाता है, वे धीर पुरुष न जीवन का अति-उत्सव करते हैं, न मृत्यु की निन्दा।
श्लोक २५
प्राणोऽयमनिशं ब्रह्मस्पन्दशक्तिः सदागतिः ।
सबाह्याभ्यन्तरे देहे प्राणोऽसावूर्ध्वगः स्थितः ॥ २५॥
अर्थ—
प्राण निरन्तर गतिशील ब्रह्म की स्पन्दन-शक्ति है। वह शरीर के भीतर और बाहर प्रवाहित होकर ऊपर की ओर गति करता है।
श्लोक २६
अपानोऽप्यनिशं ब्रह्मस्पन्दशक्तिः सदागतिः ।
सबाह्याभ्यन्तरे देहे अपानोऽयमवाक्स्थितः ॥ २६॥
अर्थ—
अपान भी ब्रह्म की निरन्तर स्पन्दन-शक्ति है। वह शरीर के भीतर और बाहर नीचे की ओर गति करता है।
श्लोक २७
जाग्रतः स्वपतश्चैव प्राणायामोऽयमुत्तमः ।
प्रवर्तते ह्यभिज्ञस्य तं तावच्छ्रेयसे श‍ृणु ॥ २७॥
अर्थ—
ज्ञानी के लिए जाग्रत और स्वप्न दोनों अवस्थाओं में एक श्रेष्ठ आन्तरिक प्राणायाम चलता रहता है। उसके कल्याण के लिए उसका स्वरूप सुनो।
श्लोक २८
द्वादशाङ्गुलपर्यन्तं बाह्यमाक्रमतां ततः ।
प्राणाङ्गनामा संस्पर्शो यः स पूरक उच्यते ॥ २८॥
अर्थ—
प्राण जब बाहर की ओर बारह अंगुल तक गति करता है, उस प्राण-स्पर्श को पूरक कहा गया है।
श्लोक २९
अपानश्चन्द्रमा देहमाप्याययति सुव्रत ।
प्राणः सूर्योऽग्निरथ वा पचत्यनत्रिदं वपुः ॥ २९॥
अर्थ—
हे साधक! अपान चन्द्रमा के समान शरीर को पुष्ट करता है और प्राण सूर्य अथवा अग्नि के समान शरीर में प्राप्त अन्न को पचाता है।
श्लोक ३०
प्राणक्षयसमीपस्थमपानोदयकोटिगम् ।
अपानप्राणयोरैक्यं चिदात्मानं समाश्रय ॥ ३०॥
अर्थ—
प्राण और अपान के मिलन की उस सूक्ष्म स्थिति में, जहाँ उनकी गति एकत्व को प्राप्त होती है, चैतन्य आत्मा का आश्रय लो।
श्लोक ३१
अपानोऽस्तंगतो यत्र प्राणो नाभ्युदितः क्षणम् ।
कलाकलङ्करहितं तच्चित्तत्त्वं समाश्रय ॥ ३१॥
अर्थ—
जहाँ अपान शांत हो जाता है और क्षणभर प्राण भी उदित नहीं होता, उस कलंकरहित चित्ततत्त्व में स्थित हो।
श्लोक ३२
नापानोऽस्तंगतो यत्र प्राणश्चास्तमुपागतः ।
नासाग्रगमनावर्तं तच्चित्तत्त्वमुपाश्रय ॥ ३२॥
अर्थ—
जहाँ अपान और प्राण दोनों की गति शांत हो जाती है, नासिका के अग्रभाग की उस सूक्ष्म गति के केन्द्र में स्थित चित्ततत्त्व का आश्रय लो।
श्लोक ३३
आभासमात्रमेवेदं न सनासज्जगत्त्रयम् ।
इत्यन्यकलनात्यागं सम्यग्ज्ञानं विदुर्बुधाः ॥ ३३॥
अर्थ—
यह सम्पूर्ण त्रिजगत् केवल आभास मात्र है—न इसे पूर्णतः सत् कहा जा सकता है, न असत्। इस प्रकार अन्य कल्पनाओं का त्याग ही ज्ञानी लोग सम्यक् ज्ञान कहते हैं।
श्लोक ३४
आभासमात्रकं ब्रह्मंश्चित्तदर्शकलङ्कितम् ।
ततस्तदपि संत्यज्य निराभासो भवोत्तम ॥ ३४॥
अर्थ—
हे ब्रह्मन्! जो जगत् आभासमात्र है, वह चित्त के द्वारा दिखाई देता है। उस आभास को भी त्यागकर निराभास आत्मस्वरूप में स्थित हो।
श्लोक ३५
भयप्रदमकल्याणं धैर्यसर्वस्वहारिणम् ।
मनःपिशाचमुत्सार्य योऽसि सोऽसि स्थिरो भव ॥ ३५॥
अर्थ—
भय उत्पन्न करने वाले, अशान्ति देने वाले और धैर्य हर लेने वाले मनरूपी पिशाच को दूर करके अपने वास्तविक स्वरूप में स्थिर रहो।
श्लोक ३६
चिद्व्योमेव किलास्तीह परापरविवर्जितम् ।
सर्वत्रासंभवच्चैत्यं यत्कल्पान्तेऽवशिष्यते ॥ ३६॥
अर्थ—
यहाँ केवल चिदाकाश ही है, जो पर और अपर से रहित है। जो कल्प के अन्त में भी शेष रहता है, वही सर्वत्र व्याप्त चैतन्य है।
श्लोक ३७
वाञ्छाक्षणे तु या तुष्टिस्तत्र वाञ्छैव कारणम् ।
तुष्टिस्त्वतुष्टिपर्यन्ता तस्माद्वाञ्छां परित्यज ॥ ३७॥
अर्थ—
इच्छा पूरी होने के क्षण जो सुख मिलता है, उसका कारण स्वयं इच्छा है; पर वह संतोष फिर असंतोष में बदल जाता है। इसलिए इच्छा का त्याग करो।
श्लोक ३८
आशा यातु निराशात्वमभावं यातु भावना ।
अमनस्त्वं मनो यातु तवासङ्गेन जीवतः ॥ ३८॥
अर्थ—
आशा निराशा में, कल्पना अभाव में और मन अमन अवस्था में विलीन हो जाए—ऐसी असंगता के साथ जीवन बिताओ।
श्लोक ३९
वासनारहितैरन्तरिन्द्रियैराहरन्क्रिया ।
न विकारमवाप्नोषि खवत्क्षोभशतैरपि ॥ ३९॥
अर्थ—
यदि अन्तःकरण वासनारहित हो तो अनेक प्रकार की क्रियाएँ करते हुए भी मनुष्य आकाश के समान अनेक हलचलों से विचलित नहीं होता।
श्लोक ४०
चित्तोन्मेषनिमेषाभ्यां संसारप्रलयोदयौ ।
वासनाप्राणसंरोधमनुन्मेषं मनः कुरु ॥ ४०॥
अर्थ—
चित्त के उदय और लय से संसार का उदय और प्रलय होता है। अतः वासना और प्राण की गति को रोककर मन को निर्विकल्प बनाओ।
श्लोक ४१
प्राणोन्मेषनिमेषाभ्यां संसृतेः प्रलयोदयौ ।
तमभ्यासप्रयोगाभ्यामुन्मेषरहितं कुरु ॥ ४१॥
अर्थ—
प्राण की गति के उदय-अस्त से संसार का उदय-लय होता है। अभ्यास द्वारा प्राण की इस चंचलता को शांत करो।
श्लोक ४२
मौर्ख्योन्मेषनिमेषाभ्यां कर्मणां प्रलयोदयौ ।
तद्विलीनं कुरु बलाद्गुरुशास्त्रार्थसंगमैः ॥ ४२॥
अर्थ—
अज्ञान के उदय-अस्त से कर्मों का उदय और लय होता है। गुरु और शास्त्र के उपदेश के द्वारा उस अज्ञान को बलपूर्वक विलीन करो।
श्लोक ४३
असंवित्स्पन्दमात्रेण याति चित्तमचित्तताम् ।
प्राणानां वा निरोधेन तदेव परमं पदम् ॥ ४३॥
अर्थ—
चैतन्य के स्पन्दन के शांत होने मात्र से चित्त अचित्त अवस्था को प्राप्त हो जाता है। अथवा प्राणों के निरोध से भी वही परम पद प्राप्त होता है।
श्लोक ४४
दृश्यदर्शनसंबन्धे यत्सुखं पारमार्थिकम् ।
तदन्तैकान्तसंवित्त्या ब्रह्मदृष्ट्यावलोकय ॥ ४४॥
अर्थ—
दृश्य और दर्शन के सम्बन्ध में जो वास्तविक सुख है, उसे भीतर की एकाग्र चैतन्य-दृष्टि से ब्रह्मरूप में देखो।
श्लोक ४५
यत्र नाभ्युदितं चित्तं तद्वै सुखमकृत्रिमम् ।
क्षयातिशयनिर्मुक्तं नोदेति न च शाम्यति ॥ ४५॥
अर्थ—
जहाँ चित्त का उदय ही नहीं होता, वही वास्तविक और अकृत्रिम सुख है। वह न घटता है, न बढ़ता है, न उत्पन्न होता है और न नष्ट होता है। �
Sanskrit Documents +1
श्लोक ४६
यस्य चित्तं न चित्ताख्यं चित्तं चित्तत्त्वमेव हि ।
तदेव तुर्यावस्थायं तुर्यातीतं भवत्यतः ॥ ४६॥
अर्थ—
जिसका चित्त चित्त नाम से ही रहित होकर शुद्ध चित्ततत्त्व बन जाता है, वही तुर्य अवस्था और आगे तुर्यातीत अवस्था को प्राप्त होता है।
श्लोक ४७
संन्यस्तसर्वसंकल्पः समः शान्तमना मुनिः ।
संन्यासयोगयुक्तात्मा ज्ञानवान्मोक्षवान्भव ॥ ४७॥
अर्थ—
सभी संकल्पों का त्याग करने वाला, समदर्शी और शांत मन वाला मुनि संन्यासयोग से युक्त होकर ज्ञानी और मोक्षवान् होता है।
श्लोक ४८
सर्वसंकल्पसंशान्तं प्रशान्तघनवासनम् ।
न किंचिद्भावनाकारं यत्तद्ब्रह्म परं विदुः ॥ ४८॥
अर्थ—
जहाँ सभी संकल्प शांत हैं, वासनाएँ अत्यन्त शांत हैं और किसी वस्तु की कल्पना नहीं है—उसी को परम ब्रह्म कहा गया है।
श्लोक ४९
सम्यग्ज्ञानावरोधेन नित्यमेकसमाधिना ।
सांख्य एवावबुद्धा ये ते सांख्या योगिनः परे ॥ ४९॥
अर्थ—
सम्यक् ज्ञान में स्थित होकर और निरन्तर एकाग्र समाधि द्वारा जो सत्य को जानते हैं, वे श्रेष्ठ सांख्ययोगी कहलाते हैं।
श्लोक ५०
प्राणाद्यनिलसंशान्तौ युक्त्या ये पदमागताः ।
अनामयमनाद्यन्तं ते स्मृता योगयोगिनः ॥ ५०॥
अर्थ—
जो उचित साधना से प्राण आदि वायु की चंचलता शांत करके अनादि-अनन्त, रोगरहित परम पद को प्राप्त होते हैं, वे श्रेष्ठ योगी हैं।
श्लोक ५१
उपादेयं तु सर्वेषां शातं पदमकृत्रिमम् ।
एकार्थाभ्यसनं प्राणरोधश्चेतः परिक्षयः ॥ ५१॥
अर्थ—
सभी साधकों के लिए अकृत्रिम, शांत परम पद ही प्राप्त करने योग्य है। उसके लिए एक तत्त्व का अभ्यास, प्राणनिरोध और चित्त का क्षय साधन हैं।
श्लोक ५२
एकस्मिन्नेव संसिद्धे संसिद्ध्यन्ति परस्परम् ।
अविनाभाविनी नित्यं जन्तूनां प्राणचेतसी ॥ ५२॥
अर्थ—
इनमें से किसी एक की सिद्धि होने पर दूसरे भी सिद्ध होने लगते हैं, क्योंकि प्राण और चित्त जीवों में सदा परस्पर अविनाभाव से जुड़े हैं।
श्लोक ५३
आधाराधेयवच्चैते एकभावे विनश्यतः ।
कुरुतः स्वविनाशेन कार्यं मोक्षाख्यमुत्तमम् ॥ ५३॥
अर्थ—
प्राण और चित्त आधार-आधेय की तरह हैं। एक की शान्ति से दूसरे की भी शान्ति होती है और दोनों का लय मोक्षरूपी महान कार्य करता है।
श्लोक ५४
सर्वमेतद्धिया त्यक्त्वा यदि तिष्ठसि निश्चलः ।
तदाहंकारविलये त्वमेव परमं पदम् ॥ ५४॥
अर्थ—
यदि बुद्धि से इन सबका त्याग करके तुम निश्चल रहो, तो अहंकार के विलीन होते ही तुम स्वयं परम पद हो।
श्लोक ५५
महाचिदेकैवेहास्ति महासत्तेति योच्यते ।
निष्कलंका समा शुद्धा निरहंकाररूपिणी ॥ ५५॥
अर्थ—
यहाँ एक महान चैतन्य ही है, जिसे महासत्ता कहते हैं। वह निष्कलंक, सम, शुद्ध और अहंकाररहित है।
श्लोक ५६
सकृद्विभाता विमला नित्योदयवती समा ।
सा ब्रह्म परमात्मेति नामभिः परिगीयते ॥ ५६॥
अर्थ—
जो एक बार प्रकाशित होकर सदा निर्मल और नित्य प्रकाशित रहती है, वही ब्रह्म और परमात्मा के नाम से कही जाती है।
श्लोक ५७
सैवाहमिति निश्चित्य निदाघ कृतकृत्यवान् ।
न भूतं न भविष्यच्च चिन्तयामि कदाचन ॥ ५७॥
अर्थ—
हे निदाघ! ‘वही परमात्मा मैं हूँ’ ऐसा निश्चय करके कृतकृत्य हो जाओ। फिर न अतीत की और न भविष्य की चिन्ता करो।
श्लोक ५८
दृष्टिमालम्ब्य तिष्ठामि वर्तमानामिहात्मना ।
इदमद्य मया लब्धमिदं प्राप्स्यामि सुन्दरम् ॥ ५८॥
अर्थ—
मैं वर्तमान में आत्मस्वरूप में स्थित रहता हूँ। आज जो प्राप्त है, वही पर्याप्त है; भविष्य में क्या मिलेगा, इसकी चिन्ता नहीं करता।
श्लोक ५९
न स्तौमि न च निन्दामि आत्मनोऽन्यन्नहि क्वचित् ।
न तुष्यामि शुभप्राप्तौ न खिद्याम्यशुभागमे ॥ ५९॥
अर्थ—
मैं किसी को विशेष स्तुति या निन्दा का विषय नहीं बनाता। शुभ मिलने पर अत्यधिक प्रसन्न और अशुभ आने पर दुखी नहीं होता।
श्लोक ६०
प्रशान्तचापलं वीतशोकमस्तसमीहितम् ।
मनो मम मुने शान्तं तेन जीवाम्यनामयः ॥ ६०॥
अर्थ—
मेरा मन चंचलता और शोक से रहित तथा इच्छाओं से शांत है। इसी शांत मन के कारण मैं स्वस्थ और निर्विघ्न जीवन जीता हूँ।
श्लोक ६१
अयं बन्धुः परश्चायं ममायमयमन्यकः ।
इति ब्रह्मन्न जानामि संस्पर्शं न ददाम्यहम् ॥ ६१॥
अर्थ—
‘यह मेरा बन्धु है, वह पराया है, यह मेरा है, वह दूसरा है’—ऐसा भेद मैं नहीं मानता और किसी में ऐसी आसक्ति नहीं रखता।
श्लोक ६२
वासनामात्रसंत्यागाज्जरामरणवर्जितम् ।
सवासनं मनो ज्ञानं ज्ञेयं निर्वासनं मनः ॥ ६२॥
अर्थ—
केवल वासनाओं के त्याग से मनुष्य जरा-मरण के बन्धन से मुक्त होता है। वासनायुक्त मन संसार का ज्ञान देता है, जबकि निर्वासन मन जानने योग्य आत्मतत्त्व में स्थित होता है।
श्लोक ६३
चित्ते त्यक्ते लयं याति द्वैतमेतच्च सर्वतः ।
शिष्यते परमं शान्तमेकमगच्छमनामयम् ॥ ६३॥
अर्थ—
चित्त के त्याग से समस्त द्वैत लीन हो जाता है और केवल एक परम शांत, अचल, रोगरहित सत्य शेष रहता है।
श्लोक ६४
अनन्तमजमव्यक्तमजरं शान्तमच्युतम् ।
अद्वितीयमनाद्यन्तं यदाद्यमुपलम्भनम् ॥ ६४॥
अर्थ—
वह सत्य अनन्त, अजन्मा, अव्यक्त, अजर, शांत, अच्युत, अद्वितीय तथा अनादि-अनन्त है और समस्त अनुभव का मूल है।
श्लोक ६५
एकमाद्यन्तरहितं चिन्मात्रममलं ततम् ।
खादप्यतितरां सूक्ष्मं तद्ब्रह्मास्मि न संशयः ॥ ६५॥
अर्थ—
जो एक, आदि-अन्त से रहित, शुद्ध चैतन्यमात्र और आकाश से भी सूक्ष्म है—वही ब्रह्म मैं हूँ, इसमें कोई संशय नहीं।
श्लोक ६६
दिक्कालाद्यनवच्छिन्नं स्वच्छं नित्योदितं ततम् ।
सर्वार्थमयमेकार्थं चिन्मात्रममलं भव ॥ ६६॥
अर्थ—
दिशा और काल से परे, निर्मल, नित्य प्रकाशित, सर्वव्यापक और शुद्ध चैतन्यस्वरूप ब्रह्म में स्थित हो।
श्लोक ६७
सर्वमेकमिदं शान्तमादिमध्यान्तवर्जितम् ।
भावाभावमजं सर्वमिति मत्वा सुखी भव ॥ ६७॥
अर्थ—
यह सब एक ही शांत तत्त्व है, जिसका आदि, मध्य और अन्त नहीं है। सत्-असत् के सभी भेदों से परे इस अजन्मा सत्य को जानकर सुखी हो।
श्लोक ६८
न बद्धोऽस्मि न मुक्तोऽस्मि ब्रह्मैवास्मि निरामयम् ।
द्वैतभावविमुक्तोऽस्मि सच्चिदानन्दलक्षणः ।
एवं भावय यत्नेन जीवन्मुक्तो भविष्यसि ॥ ६८॥
अर्थ—
‘मैं न बन्धा हूँ, न मुक्त; मैं निरुपद्रव ब्रह्म ही हूँ। मैं द्वैतभाव से मुक्त सच्चिदानन्दस्वरूप हूँ।’ इस भाव का निरन्तर अभ्यास करो; जीवन्मुक्त हो जाओगे।
श्लोक ६९
पदार्थवृन्दे देहादिधिया संत्यज्य दूरतः ।
आशीतलान्तःकरणो नित्यमात्मपरो भव ॥ ६९॥
अर्थ—
देह आदि की बुद्धि और पदार्थों की आसक्ति को दूर त्यागकर, शीतल अन्तःकरण वाला होकर सदा आत्मतत्त्व में स्थित रहो।
श्लोक ७०
इदं रम्यमिदं नेति बीजं ते दुःखसंततेः ।
तस्मिन्साम्याग्निना दग्धे दुःखस्यावसरः कुतः ॥ ७०॥
अर्थ—
‘यह अच्छा है, यह अच्छा नहीं’—ऐसा भेद करना दुःख की श्रृंखला का बीज है। समता की अग्नि में यह बीज जल जाए तो दुःख का अवसर कहाँ रहेगा?
श्लोक ७१
शास्त्रसज्जनसम्पर्कैः प्रज्ञामादौ विवर्धयेत् ॥ ७१॥
अर्थ—
सबसे पहले शास्त्रों और सज्जनों के सत्संग से अपनी विवेक-बुद्धि और प्रज्ञा को बढ़ाना चाहिए।
श्लोक ७२
ऋतं सत्यं परं ब्रह्म सर्वसंसारभेषजम् ।
अत्यर्थममलं नित्यमादिमध्यान्तवर्जितम् ॥ ७२॥
अर्थ—
परम ब्रह्म ऋत और सत्यस्वरूप है, संसाररूपी रोग की औषधि है, अत्यन्त निर्मल, नित्य और आदि-मध्य-अन्त से रहित है।
श्लोक ७३
तथा स्थूलमनाकाशमसंस्पृश्यमचाक्षुषम् ।
न रसं न च गन्धाख्यमप्रमेयमनूपमम् ॥ ७३॥
अर्थ—
वह न स्थूल है, न आकाशरूप; उसे स्पर्श या नेत्र से ग्रहण नहीं किया जा सकता। वह न रस है, न गन्ध; वह अप्रमेय और अनुपम है।
श्लोक ७४
आत्मानं सच्चिदानन्दमनन्तं ब्रह्म सुव्रत ।
अहमस्मीत्यभिध्यायेद्ध्येयातीतं विमुक्तये ॥ ७४॥
अर्थ—
हे साधक! मुक्ति के लिए उस सच्चिदानन्द, अनन्त ब्रह्मरूप आत्मा का ध्यान करो—‘वह मैं हूँ।’ अन्ततः वह ध्यान के विषय से भी परे है।
श्लोक ७५
समाधिः संविदुत्पत्तिः परजीवैकतं प्रति ।
नित्यः सर्वगतो ह्यात्मा कूटस्थो दोषवर्जितः ॥ ७५॥
अर्थ—
समाधि वह है जिसमें चैतन्य का उदय होकर परमात्मा और जीव की एकता का अनुभव होता है। आत्मा नित्य, सर्वव्यापक, कूटस्थ और दोषरहित है।
श्लोक ७६
एकः सन्भिद्यते भ्रान्त्या मायया न स्वरूपतः ।
तस्मादद्वैत एवास्ति न प्रपञ्चो न संसृतिः ॥ ७६॥
अर्थ—
एक ही आत्मतत्त्व माया के भ्रम से भिन्न दिखाई देता है; अपने वास्तविक स्वरूप से वह विभाजित नहीं है। इसलिए वास्तव में अद्वैत ही है; पृथक् प्रपञ्च और संसार का परम सत्य नहीं है।
श्लोक ७७
यथाकाशो घटाकाशो महाकाश इतीरितः ।
तथा भ्रान्तेर्द्विधा प्रोक्तो ह्यात्मा जीवेश्वरात्मना ॥ ७७॥
अर्थ—
जैसे एक ही आकाश घटाकाश और महाकाश के नाम से अलग दिखाई देता है, वैसे ही भ्रम के कारण एक आत्मा जीव और ईश्वर के रूप में अलग प्रतीत होती है।
श्लोक ७८
यदा मनसि चैतन्यं भाति सर्वत्रगं सदा ।
योगिनोऽऽव्यवधानेन तदा सम्पद्यते स्वयम् ॥ ७८॥
अर्थ—
जब योगी के मन में सर्वव्यापी चैतन्य निरन्तर प्रकाशित होता है और बीच में कोई बाधा नहीं रहती, तब वह स्वयं उस सत्य को प्राप्त हो जाता है।
श्लोक ७९
यदा सर्वाणि भूतानि स्वात्मन्येव हि पश्यति ।
सर्वभूतेषु चात्मानं ब्रह्म सम्पद्यते सदा ॥ ७९॥
अर्थ—
जब साधक सभी प्राणियों को अपने आत्मस्वरूप में और अपने आत्मा को सभी प्राणियों में देखता है, तब वह सदा ब्रह्मभाव को प्राप्त रहता है।
श्लोक ८०
यदा सर्वाणि भूतानि समाधिस्थो न पश्यति ।
एकीभूतः परेणासौ तदा भवति केवलः ॥ ८०॥
अर्थ—
जब समाधि में साधक किसी पृथक् प्राणी या वस्तु को नहीं देखता और परम तत्त्व में पूर्ण एक हो जाता है, तब वह केवल अद्वैत स्वरूप में स्थित होता है। �
Sanskrit Documents +1
श्लोक ८१
शास्त्रसज्जनसम्पर्कवैराग्याभ्यासरूपिणी ।
प्रथमा भूमिकैषोक्ता मुमुक्षुत्वप्रदायिनी ॥ ८१॥
अर्थ—
शास्त्र और सज्जनों का संग तथा वैराग्य का अभ्यास—यह पहली आध्यात्मिक भूमिका है, जो मुक्ति की इच्छा उत्पन्न करती है।
श्लोक ८२
विचारणा द्वितीया स्यात्तृतीया साङ्गभावना ।
विलापिनी चतुर्थी स्याद्वासना विलयात्मिका ॥ ८२॥
अर्थ—
दूसरी भूमिका विचारणा है; तीसरी गहन भावनात्मक साधना; चौथी विलापिनी है, जिसमें वासनाओं का विलय होने लगता है।
श्लोक ८३
शुद्धसंविन्मनानन्दरूपा भवति पञ्चमी ।
अर्धसुप्तप्रबुद्धाभो जीवन्मुक्तोऽत्र तिष्ठति ॥ ८३॥
अर्थ—
पाँचवीं भूमिका शुद्ध चैतन्य और मन के आनन्दस्वरूप की है। इसमें जीवन्मुक्त व्यक्ति ऐसी अवस्था में रहता है जो आधी सुषुप्ति और आधी जागृति जैसी प्रतीत होती है।
श्लोक ८४
असंवेदनरूपा च षष्ठी भवति भूमिका ।
आनन्दैकघनाकारा सुषुप्तसदृशी स्थितिः ॥ ८४॥
अर्थ—
छठी भूमिका असंवेदनरूप है और अखण्ड आनन्द से परिपूर्ण है; उसकी स्थिति सुषुप्ति के समान प्रतीत होती है।
श्लोक ८५
तुर्यावस्थोपशान्ता सा मुक्तिरेव हि केवला ।
समता स्वच्छता सौम्या सप्तमी भूमिका भवेत् ॥ ८५॥
अर्थ—
तुर्य अवस्था की पूर्ण शान्ति ही वास्तविक मुक्ति है। समता, निर्मलता और सौम्यता से युक्त अवस्था सातवीं भूमिका है।
श्लोक ८६
तुर्यातीता तु यावस्था परा निर्वाणरूपिणी ।
सप्तमी सा परा प्रौढा विषयो नैव जीवताम् ॥ ८६॥
अर्थ—
तुर्यातीत अवस्था परम निर्वाणस्वरूप है। यही सातवीं और परिपक्वतम अवस्था है, जो सामान्य जीवों की अनुभूति का विषय नहीं है।
श्लोक ८७
पूर्वावस्थात्रयं तत्र जाग्रदित्येव संस्थितम् ।
चतुर्थी स्वप्न इत्युक्ता स्वप्नाभं यत्र वै जगत् ॥ ८७॥
अर्थ—
पहली तीन भूमिकाएँ जाग्रत अवस्था के समान मानी गई हैं। चौथी को स्वप्न कहा गया है, क्योंकि उसमें संसार स्वप्न के समान प्रतीत होता है।
श्लोक ८८
आनन्दैकघनाकारा सुषुप्ताख्या तु पञ्चमी ।
असंवेदनरूपा तु षष्ठी तुर्यपदाभिधा ॥ ८८॥
अर्थ—
पाँचवीं भूमिका अखण्ड आनन्दमयी होने से सुषुप्ति के समान है। छठी असंवेदनरूप है और तुर्य पद कहलाती है।
श्लोक ८९
तुर्यातीतपदावस्था सप्तमी भूमिकोत्तमा ।
मनोवचोभिरग्राह्या स्वप्रकाशसदात्मिका ॥ ८९॥
अर्थ—
सातवीं और सर्वोत्तम भूमिका तुर्यातीत अवस्था है। वह मन और वाणी की पहुँच से परे तथा स्वयं प्रकाशित सत्यस्वरूप है।
श्लोक ९०
अन्तः प्रत्याहृतिवशाच्चैत्यं चेन्न विभावितम् ।
मुक्त एव न सन्देहो महासमतया तया ॥ ९०॥
अर्थ—
यदि अन्तर्मुख होकर चित्त किसी बाहरी विषय को प्रकाशित न करे, तो उस महान समता के कारण साधक निःसन्देह मुक्त ही है।
श्लोक ९१
न म्रिये न च जीवामि नाहं सन्नाप्यसन्मयः ।
अहं न किंचिच्चिदिति मत्वा धीरो न शोचति ॥ ९१॥
अर्थ—
‘मैं न मरता हूँ, न सामान्य अर्थ में जीता हूँ; न केवल सत् हूँ, न असत्; मैं किसी सीमित वस्तु के रूप में नहीं हूँ।’ ऐसा जानने वाला धीर पुरुष शोक नहीं करता।
श्लोक ९२
अलेपकोऽहमजरो नीरागः शान्तवासनः ।
निरंशोऽस्मि चिदाकाशमिति मत्वा न शोचति ॥ ९२॥
अर्थ—
‘मैं किसी से लिप्त नहीं, अजर हूँ, रागरहित हूँ, मेरी वासनाएँ शांत हैं और मैं अखण्ड चिदाकाश हूँ।’ ऐसा जानकर वह शोक नहीं करता।
श्लोक ९३
अहंमत्या विरहितः शुद्धो बुद्धोऽजरोऽमरः ।
शान्तः शमसमाभास इति मत्वा न शोचति ॥ ९३॥
अर्थ—
‘मैं अहंकार से रहित, शुद्ध, ज्ञानस्वरूप, अजर, अमर और पूर्ण शान्त हूँ।’ ऐसा जानने वाला शोक से मुक्त रहता है।
श्लोक ९४
तृणाग्रेष्वम्बरे भानौ नरनागामरेषु च ।
यत्तिष्ठति तदेवाहमिति मत्वा न शोचति ॥ ९४॥
अर्थ—
तृण के अग्रभाग से लेकर आकाश, सूर्य, मनुष्य, हाथी और देवताओं तक जो एक ही चैतन्य स्थित है, वही मैं हूँ—ऐसा जानकर ज्ञानी शोक नहीं करता।
श्लोक ९५
भावनां सर्वभावेभ्यः समुत्सृज्य समुत्थितः ।
अवशिष्टं परं ब्रह्म केवलोऽस्मीति भावय ॥ ९५॥
अर्थ—
सभी वस्तुओं के सम्बन्ध में की जाने वाली कल्पनाओं को छोड़कर उनसे ऊपर उठो और जो शेष परम ब्रह्म है, ‘मैं वही अकेला हूँ’ ऐसा अनुभव करो।
श्लोक ९६
वाचामतीतविषयो विषयाशादशोज्झितः ।
परानन्दरसाक्षुब्धो रमते स्वात्मनात्मनि ॥ ९६॥
अर्थ—
जो वाणी से परे है और दसों दिशाओं की विषय-आशाओं से मुक्त है, वह परम आनन्द में निमग्न होकर अपने ही आत्मस्वरूप में आनन्दित रहता है।
श्लोक ९७
सर्वकर्मपरित्यागी नित्यतृप्तो निराश्रयः ।
न पुण्येन न पापेन नेतरेण च लिप्यते ॥ ९७॥
अर्थ—
जो भीतर से सभी कर्मों की आसक्ति छोड़ चुका है, नित्य तृप्त और निराश्रय है, वह न पुण्य से, न पाप से और न किसी अन्य कर्मफल से लिप्त होता है।
श्लोक ९८
स्फटिकः प्रतिबिम्बेन यथा नायाति रञ्जनम् ।
तज्ज्ञः कर्मफलेनान्तस्तथा नायाति रञ्जनम् ॥ ९८॥
अर्थ—
जैसे स्फटिक पास के प्रतिबिम्ब के कारण वास्तव में रंगीन नहीं हो जाता, वैसे ही आत्मज्ञानी कर्मफल से भीतर से प्रभावित नहीं होता।
श्लोक ९९
विहरञ्जनतावृन्दे देवकीर्तन पूजनैः ।
खेदाह्लादौ न जानाति प्रतिबिम्बगतैरिव ॥ ९९॥
अर्थ—
लोगों के बीच रहकर देव-कीर्तन और पूजा आदि करते हुए भी ज्ञानी सुख-दुःख को अपने वास्तविक आत्मस्वरूप से सम्बन्धित नहीं मानता; वे उसे प्रतिबिम्ब के समान दिखाई देते हैं।
श्लोक १००
निस्स्तोत्रो निर्विकारश्च पूज्यपूजाविवर्जितः ।
संयुक्तश्च वियुक्तश्च सर्वाचारनयक्रमैः ॥ १००॥
अर्थ—
वह स्तुति से परे, निर्विकार तथा पूज्य और पूजा के भेद से रहित है। फिर भी व्यवहार में आवश्यक आचार-विचारों के साथ जुड़ा हुआ भी है और उनसे भीतर से अलग भी।
श्लोक १०१
तनुं त्यजतु वा तीर्थे श्वपचस्य गृहेऽथ वा ।
ज्ञानसम्पत्तिसमये मुक्तोऽसौ विगताशयः ॥ १०१॥
अर्थ—
वह शरीर तीर्थ में छोड़े या किसी अत्यन्त साधारण व्यक्ति के घर में—ज्ञान की पूर्ण प्राप्ति के समय ही वह मुक्त है, क्योंकि उसकी समस्त आशाएँ समाप्त हो चुकी हैं।
श्लोक १०२
संकल्पत्वं हि बन्धस्य कारणं तत्परित्यज ।
मोक्षो भवेदसंकल्पात्तदभ्यासं धिया कुरु ॥ १०२॥
अर्थ—
संकल्प ही बन्धन का कारण है; इसलिए उसका त्याग करो। असंकल्प ही मोक्ष का कारण है—बुद्धिपूर्वक इसका अभ्यास करो।
श्लोक १०३
सावधानो भव त्वं च ग्राह्यग्राहकसंगमे ।
अजस्रमेव संकल्पदशाः परिहरञ्शनैः ॥ १०३॥
अर्थ—
ज्ञेय वस्तु और उसे ग्रहण करने वाले ज्ञाता के सम्बन्ध में सावधान रहो और निरन्तर धीरे-धीरे संकल्प की अवस्थाओं का त्याग करते जाओ।
श्लोक १०४
मा भव ग्राह्यभावात्मा ग्राहकात्मा च मा भव ।
भावनामखिलां त्यक्त्वा यच्छिष्टं तन्मयो भव ॥ १०४॥
अर्थ—
न स्वयं को केवल ज्ञेय वस्तु मानो और न केवल ज्ञाता। सभी कल्पनाओं का त्याग करके जो शेष रहे, उसी के स्वरूप में स्थित हो जाओ।
श्लोक १०५
किंचिच्चेद्रोचते तुभ्यं तद्बद्धोऽसि भवस्थितौ ।
न किंचिद्रोचते चेत्ते तन्मुक्तोऽसि भवस्थितौ ॥ १०५॥
अर्थ—
यदि संसार की किसी वस्तु में तुम्हारी विशेष रुचि या आसक्ति है, तो तुम बन्धन में हो। यदि किसी वस्तु में आसक्ति नहीं है, तो तुम मुक्त हो।
श्लोक १०६
अस्मात्पदार्थनिचयाद्यावत्स्थावरजङ्गमात् ।
तृणादेर्देहपर्यन्तान्मा किंचित्तत्र रोचताम् ॥ १०६॥
अर्थ—
इस समस्त स्थावर-जंगम पदार्थ-जगत् में, तृण से लेकर शरीर तक, किसी वस्तु के प्रति आसक्ति न होने दो।
श्लोक १०७
अहंभावानहंभावौ त्यक्त्वा सदसती तथा ।
यदसक्तं समं स्वच्छं स्थितं तत्तुर्यमुच्यते ॥ १०७॥
अर्थ—
‘मैं’ और ‘मैं नहीं’, ‘सत्’ और ‘असत्’—इन सभी द्वन्द्वों को छोड़कर जो आसक्तिरहित, सम और निर्मल स्थिति है, उसे तुर्य कहा जाता है।
श्लोक १०८
या स्वच्छा समता शान्ता जीवन्मुक्तव्यवस्थितिः ।
साक्ष्यवस्था व्यवहृतौ सा तुर्या कलनोच्यते ॥ १०८॥
अर्थ—
जीवन्मुक्त की जो निर्मल, सम और शांत अवस्था है, व्यवहार में साक्षीभाव से स्थित रहना ही तुर्य अवस्था कहलाता है।
श्लोक १०९
नैतज्जाग्रन्न च स्वप्नः संकल्पानामसंभवात् ।
सुषुप्तभावो नाऽप्येतदभावाज्जडतास्थितेः ॥ १०९॥
अर्थ—
यह अवस्था न जाग्रत है, न स्वप्न, क्योंकि इसमें संकल्प नहीं हैं। यह सुषुप्ति भी नहीं, क्योंकि इसमें जड़ता या अज्ञान नहीं है।
श्लोक ११०
शान्तसम्यक्प्रबुद्धानां यथास्थितमिदं जगत् ।
विलीनं तुर्यमित्याहुरबुद्धानां स्थितं स्थिरम् ॥ ११०॥
अर्थ—
पूर्णतः शांत और जाग्रत ज्ञानी के लिए यह जगत् अपने वास्तविक स्वरूप में विलीन है—इसे तुर्य कहा गया है; अज्ञानी को वही जगत् स्थिर और वास्तविक दिखाई देता है। �
Sanskrit Documents +1
श्लोक १११
अहंकारकलात्यागे समतायाः समुद्गमे ।
विशरारौ कृते चित्ते तुर्यावस्थोपतिष्ठते ॥ १११॥
अर्थ—
अहंकार के अंश का त्याग, समता का उदय और चित्त की चंचलता का समाप्त होना—इनसे तुर्य अवस्था प्रकट होती है।
श्लोक ११२
सिद्धान्तोऽध्यात्मशास्त्राणां सर्वापह्नव एव हि ।
नाविद्यास्तीह नो माया शान्तं ब्रह्मेदमक्लमम् ॥ ११२॥
अर्थ—
अध्यात्मशास्त्रों का परम सिद्धान्त है कि अन्ततः सभी सीमित धारणाओं का निषेध हो। यहाँ न अविद्या है, न माया; यह शांत और निर्दोष ब्रह्म ही है।
श्लोक ११३
शान्त एव चिदाकाशे स्वच्छे शमसमात्मनि ।
समग्रशक्तिखचिते ब्रह्मेति कलिताभिधे ॥ ११३॥
अर्थ—
शांत, निर्मल चिदाकाश में, जो पूर्ण शमस्वरूप आत्मा है और समस्त शक्तियों से युक्त है, उसी को ब्रह्म कहा गया है।
श्लोक ११४
सर्वमेव परित्यज्य महामौनी भवानघ ।
निर्वाणवान्निर्मननः क्षीणचित्तः प्रशान्तधीः ॥ ११४॥
अर्थ—
हे निष्पाप! सब प्रकार की आसक्ति छोड़कर महान मौनी बनो। मनन की चंचलता से रहित, चित्त को क्षीण करके शांत बुद्धि वाले निर्वाणस्वरूप बनो।
श्लोक ११५
आत्मन्येवास्व शान्तात्मा मूकान्धबधिरोपमः ।
नित्यमन्तर्मुखः स्वच्छः स्वात्मनान्तः प्रपूर्णधीः ॥ ११५॥
अर्थ—
शांत आत्मा होकर आत्मा में ही स्थित रहो। बाहरी विषयों के प्रति मूक, अन्धे और बहरे के समान रहकर सदा अन्तर्मुख और निर्मल बनो तथा आत्मज्ञान से भीतर पूर्ण रहो।
श्लोक ११६
जाग्रत्येव सुषुप्तस्थः कुरु कर्माणि वै द्विज ।
अन्तः सर्वपरित्यागी बहिः कुरु यथागतम् ॥ ११६॥
अर्थ—
हे द्विज! जागते हुए भी भीतर से सुषुप्ति जैसी शांति में स्थित रहकर कर्म करो। भीतर से सबका त्याग रखो और बाहर आवश्यक कर्म स्वाभाविक रूप से करते रहो।
श्लोक ११७
चित्तसत्ता परं दुःखं चित्तत्यागः परं सुखम् ।
अतश्चित्तं चिदाकाशे नय क्षयमवेदनात् ॥ ११७॥
अर्थ—
चित्त की सत्ता ही परम दुःख का कारण है और चित्त का त्याग परम सुख है। इसलिए चित्त को चिदाकाश में ले जाकर, विषय-संवेदन से मुक्त करते हुए उसका क्षय करो।
श्लोक ११८
दृष्ट्वा रम्यमरम्यं वा स्थेयं पाषाणवत्सदा ।
एतावतात्मयत्नेन जिता भवति संसृतिः ॥ ११८॥
अर्थ—
सुन्दर या असुन्दर कुछ भी देखकर सदा पत्थर के समान समभाव में स्थित रहो। इतना आत्म-प्रयत्न करने से संसार-चक्र पर विजय प्राप्त होती है।
श्लोक ११९
वेदान्ते परमं गुह्यं पुराकल्पप्रचोदितम् ।
नाप्रशान्ताय दातव्यं न चाशिष्याय वै पुनः ॥ ११९॥
अर्थ—
यह वेदान्त का अत्यन्त गूढ़ ज्ञान है, जो प्राचीन काल से उपदिष्ट है। इसे अशांत व्यक्ति या अयोग्य शिष्य को नहीं देना चाहिए।
श्लोक १२०
अन्नपूर्णोपनिषदं योऽधीते गुर्वनुग्रहात् ।
स जीवन्मुक्ततां प्राप्य ब्रह्मैव भवति स्वयम् ॥ १२०॥
अर्थ—
जो गुरु की कृपा से अन्नपूर्णोपनिषद् का अध्ययन करता है, वह जीवन्मुक्ति को प्राप्त करके स्वयं ब्रह्मस्वरूप हो जाता है। �
Sanskrit Documents
उपनिषद् का समापन
मूलपाठ—
इत्युपनिषत् ॥ इति पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५॥
ॐ भद्रं कर्णेभिः श‍ृणुयाम देवाः ।
भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः ।
स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवाꣳसस्तनूभिः ।
व्यशेम देवहितं यदायुः ॥
स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः ।
स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः ।
स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः ।
स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
इत्यन्नपूर्णोपनिषत्समाप्ता ॥ �
Sanskrit Documents
अर्थ—
हे देवताओं! हम अपने कानों से कल्याणकारी वचन सुनें, अपनी आँखों से मंगलमय दृश्य देखें, स्वस्थ अंगों से ईश्वर की स्तुति करते हुए देवहित में प्राप्त आयु को पूर्ण करें। इन्द्र, पूषा, गरुड़ और बृहस्पति हमारा कल्याण करें।
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः।
इस प्रकार अन्नपूर्णोपनिषद् पूर्ण होती है।
विशेष: पंचम अध्याय का मुख्य संदेश है—संगत्याग, वासनाक्षय, चित्तशमन, आत्मविचार, समता और अन्ततः ‘अहं ब्रह्मास्मि’ की अनुभूति। पाँचवीं से सातवीं भूमिकाओं तक का वर्णन विशेष रूप से जीवन्मुक्ति और तुर्य–तुर्यातीत अवस्था को स्पष्ट करता है।

Comments

Popular posts from this blog

डा० सूर्य पाल सिंह का उत्कृष्ट व्यक्तित्व

---प्राणायाम से दिव्य शक्ति की प्राप्ति---

ऋगुवेद सूक्ति--(53) की व्याख्या