ऋगुवेद की सूक्तियाँ--

ऋगुवेद की सूक्तियाँ--
(१) न स सखा यो न ददाति सख्ये।
ऋगुवेद--१०/११७/४
भाव-- जो मित्र‌ सहायता नहीं करता, वह मित्र नहीं है।
(२) केवलाघो भवति केवलादी।
    ऋगुवेद---१०/११७/६
भाव--जो मनुष्य अकेले  खाता है, वह
अकेले पाप का भागी होता है।)
(३) न ऋते श्रान्तस्य सख्याय देवा:।
    ऋगुवेद--४/३३/११
भाव--देवता श्रम करने वाले  के अतिरिक्त किसी और से मित्रता नहीं करते।
(४) सं गच्छध्वम् सं वद्ध्वम्। सं वो मनांसि जानिताम।
         ऋगुवेद----१०/१८१/२
भाव :- साथ चलें, साथ बोलें। तुम्हारा मन एक सा समझे।
(५) यो जागारतमृच: कामयन्ते।
    ऋगुवेद--५/४४/१४
भाव--जो जागृत रहता है, उसे ऋचाएँ चाहती हैं।
(६) अग्ने नय सुपथा राए अस्मान्।
      ऋगुवेद--१/१८९/१
भाव-- हे अग्निदेव ! हमें धन के लिए सन्मार्ग से ले चलें।
(७) न यस्य हन्यते सखा न जीयते कदाचन।
      ऋगुवेद--१०/१५२/१
भाव-- ईश्वर के भक्त को न कोई नष्ट कर सकता है, न जीत सकता है।
(८) न विन्धेस्य सुष्टितम्।
      ऋगुवेद--१/७/७
भाव--मैं परमात्मा की स्तुति का पार नहीं पाता।
(९) महे च न त्वामद्रिवः परा शुक्लाय देयाम्।
           ऋगुवेद-८/१/५
भाव--हे महान और अद्वितीय ईश्वर ! हम आपको अपने हृदय‌ से शुद्ध भावों के साथ समर्पित करते हैं जिससे हमारा जीवन पवित्र उज्ज्वल और तेजस्वी मार्ग की ओर अग्रसर हो।
(१०) न रिष्यते त्वावतः सखा।
              ऋगुवेद--१/९१/८
भाव--हे ईश्वर ! आपका मित्र कभी नष्ट नहीं होता।
(११) एको विश्वस्य भुवनस्य राजा।
       ऋगुवेद--६/३६/४
भाव--वह सब लोकों का एक ही स्वामी है।
(१२)  त्वमस्माकं तव स्मसि।
        ऋगुवेद--८/९२/३२
भाव-- प्रभु ! तू हमारा है, हम तेरे हैं।
(१३) अधाम इन्द्र श्रणवो हवेमा।
    ऋगुवेद--७/२९/३
भाव--हे प्रभु ! अब तो मेरी इन प्रार्थनाओं  को सुन लो।
(१४) यस्तन्न वेद किमृचा करिष्यति।
       ऋगुवेद--१/१६४/३९
भाव--जो उस ब्रह्म को नहीं जानता, वह वेद से क्या करेगा।
(१५) तवेद्धि सख्यम् स्तृतम।
ऋगुवेद--१/१५/५
भाव--प्रभो ! तेरी ही मैत्री सच्ची है।
 (१६) मान्तः स्थुर्नो अरातयः।
      ऋगुवेद--१०/५७/१
भाव--हमारे अन्दर कंजूसी न हो।
(१७) उतो रयिः पृणतो नोपदस्यति।
     ‌‌ ‌        ऋगुवेद--१०/११७/१
भाव-- दानी का दान घटता नहीं।
(१८) अक्षैर्मा दीव्यः।
              ऋगुवेद-- ‌‌‌‌‌ ‌‌‌‌१०/३४/१३
भाव-- जुआ मत खेलो।
(१९) जाया तप्यते कितवस्य हीना।
             ऋगुवेद--१०/३४/१०
भाव--जुएबाज की स्त्री दीन-हीन होकर दुख पाती है।
(२०) क्रत्वा चेतिष्ठो विषामुषर्भुत।
           ऋगुवेद--१/६५/५
भाव--प्रातः जागनेवाला प्रबुद्ध होता है,
    उसे सब स्नेह करते हैं।
(२१) न ऋष्यत्त्वावतः सखा।
           ऋगुवेद--१/११/८
भाव-- हे प्रभु ! आपका सखा कभी दुखी नहीं होता।
(२२) त्वं ज्योतिषा वितमोववर्थ। ऋगुवेद-- १/११/२२
भाव-- हे प्रभु ! अपने ज्ञान के प्रकाश से हमारे अज्ञान को नष्ट करो।
(२३) पितेव नः श्रृणुहि हूयमानः।
         ऋगुवेद--१/१०४/९
पिता की भाँति मेरी पुकार सुनो।
(२४) अघृणे न ते सख्यम पह्युवे।
          ऋगुवेद--१/१३८/४
भाव--हे प्रभु ! तेरी मित्रता से इनकार नहीं करता।
(२५) दिप्सन्त इद्रिपवो नाहदेभुः।
          ऋगुवेद--१/१४७/३
भाव-- हे प्रभु ! शत्रु आपके दास को नहीं दबा सकते।
(२६) अपृणन्तमभि सं यन्तु  शोकाः।
          ऋगुवेद--१/१२५/७
भाव--,उपकार हीन कृपण को शोक घेर लेता है।
(२७) मा प्रगाम पथोवयम्।
    ऋगुवेद--१०/५७/१
भाव-- हम वैदिक मार्ग से पृथक न हों।
(२८) उतदेवा अवहित देवा उन्नयथा पुन:।
       ऋगुवेद--१०/१३७/१
भाव--हे विद्वानों ! गिरे हुओं को पुनः उठाओ।
(२९) बहुप्रजा निऋर्तिमा विवेश।
      ऋगुवेद--१/१६४/३२
भाव-- बहुत सन्तान वाले बहुत कष्ट उठाते हैं।
(३०) कस्तमिन्द्र त्वावसुमा मतर्यो दधर्षति।
        ऋगुवेद--७/३२/१४
भाव--ईश्वर भक्त का तिरस्कार कोई नहीं कर सकता।
(३१) इमं नः श्रणवद्धवम्।
        ऋगुवेद--१०/२६/९
भाव-- वह ईश्वर मेरी प्रार्थना को सुने।
(३२) स्तोतुर्मघवनकाममा पृण।
       ऋगुवेद--१/५७/५
भाव--हे प्रभु ! भक्त की कामनाओं को पूर्ण करो।
(३३) विश्वेषा मिज्जनिता ब्रह्मणामसि।
      ऋगुवेद---२/२३/२
भाव--हे प्रभु ! सम्पूर्ण विद्याओं का आदि मूल तू ही है।
(३४) देवो देवनामसि।
         ऋगुवेद--१/१४/१३
भाव-- हे प्रभु ! तू देवों का देव है।
(३५) स नः पर्षदति द्विषः।
           ऋगुवेद--१०/१८७/५
भाव-- वह परमात्मा हमें सब कष्टों से पार‌ करे।
(३६) मा नः प्रजा रीरिषः।
       ऋगुवेद--१०/१८/१
 भाव--हे प्रभु ! तू हमारी सन्तान को नष्ट न कर ।
(३७) सत्या मनसो मेअस्तु।
       ऋगुवेद--१०/१२८/४
भाव--मेरे मन के भाव सच्चे हों।
(३८) भियं दधाना हृदयेषु शत्रुणाम्।
         ऋगुवेद--१०/८४/७
भाव-- शत्रु के हृदय में भय उत्पन्न कर दो।
(३९) निन्दितारो निन्द्यासो भवन्तु।
            ऋगुवेद--५/२/६
भाव--निन्दक सबसे निन्दित होते हैं।
(४०) न त्वदन्यो मघवन्नस्य मदिर्ता।
          ऋगुवेद--१/८४/१९
भाव-- हे प्रभो ! आपके सिवा सुख देने वाला दूसरा कोई नहीं है।
(४१) आर्य ज्योतिरग्राः।
            ऋगुवेद-- ७/३३/७
भाव--आर्य ज्योति (ज्ञान) को प्राप्त करने वाला होता है।
(४२) करो यत्र वरिवो बाधिताय।
           ऋगुवेद--६/१८/१४
भाव--पीड़ितों की सहायता करने वाले हाथ ही उत्तम हैं।
(४३) प्राता रत्नं प्रातरिश्वा दधाति।
          ऋगुवेद--१/१२५/१
भाव--प्रातः जागनेवाला प्रात काल में ऐश्वर्य पाता है।
(४४) अधः पश्यस्व मोपरि। 
       ऋगुवेद--८/३३/१९
भाव--हे नारि ! नीचे देख, ऊपर मत देखा।
(45) उद्वयं तमसस्परि ज्योतिष्पश्यन्त उत्तरे।
ऋगुवेद -1/115/1
भाव --अन्धकार से ऊपर उठकर प्रकाश की ओर बढ़ो।
(46) कृण्वन्तो विश्व मार्यम्।
ऋग्वेद- 5/51/15
भाव --पूरे विश्व को आर्य (श्रेष्ठ) बनाओ।
(47) उदुत्यं जातवेदसं देवं वहन्ति केतव:।
ऋग्वेद- 1/50/10
भाव --सूर्य की किरणें ज्ञान का
प्रकाश फैलाती हैं। 
(48) अभि वीरान् जयत।
ऋग्वेद- 6/75/14
भाव--वीर बनकर आगे बढ़ो और विजय प्राप्त करो।
(49) उषा जागर्ति प्रथमा।
ऋग्वेद- 1/92/6
भाव--उषा (देवि) सबसे पहले जागती हैं।
(50) चरैवेति चरैवेति।
ऋगुवेद -9/63/5
भाव--चलते रहो बढ़ते रहो।
(51) नव्यो नव्यो भवति।
ऋग्वेद- 1/31/8
भाव--सदैव नवीन बनये रहो।
(52) समानी व आकूति:।
ऋग्वेद-10/191/3
भाव-- समान विचार रखो
(53) स भूमिं विश्वतो वृत्वा।
ऋग्वेद- 10/90/1
भाव--वह पृथ्वी पर चारों ओर व्याप्त है।
(54) धियो यो न: प्रचोदयात।
ऋग्वेद- 3/62/10
भाव--वह हमारी बुद्धि को प्रेरित करे।
(55) ऋतं च सत्यं च।
ऋग्वेद- 10/190/1
भाव--नियम और सत्य ही
(जगत का) आधार है।
(56) भद्रं कर्णेभि: श्रणुयाम् देव:।
ऋग्वेद- 1/89/8
भाव--हे ईश्वर ! हम अपने कानों से शुभ सुने
(57) एकं सदविप्र: बहुधा वदन्ति।
ऋग्वेद- 1/164/46
भाव--ईश्वर एक है। ज्ञानी उसे अनेक नामों से पुकारते हैं।
(58) प्रियं वद।
ऋग्वेद- 8/89/3
भाव--प्रिय बोलो।
(59) अभित्वा जागृवांस:।
ऋग्वेद- 3/39/5
भाव--जागरूक बनो और सही रहो।
(60) श्रेष्ठ यश:।
ऋग्वेद- 4/33/11
भाव-- श्रेष्ठ यश प्राप्त करो।
(61) बलं धेहि।
ऋग्वेद- 4/9/6
भाव--शक्ति धारण करो।
(62)  न मृष्यसे।
ऋग्वेद- 1/116)2
भाव--हार मत मानो। निराश मत हो।
(63) धियं धारय।
ऋग्वेद- 8/1/5
भाव --अपने मन को स्थिर रखो।
(64) विश्वासं धैहि।
ऋग्वेद- 10/4८/5
भाव --अपने ऊपर विश्वास रखो।
(65) उत्सं दुहन्ति।
ऋग्वेद- 9/112/1
भाव--उत्साह उत्पन्न करो।
(66) देवानां सख्यमुप सेदिम
 ऋग्वेद- 1/89/3
भाव--श्रेष्ठ लोगों की संगति प्राप्त करो।
(67) दक्षता महे।
ऋग्वेद -7/32/9
भावार्थ - कर्मठ बनों।
(68) मां स्रेधत
ऋग्वेद -7/32/9
भावार्थ --आलस्य मत करो।
(69) यद्भद्रं तन्न आ सुव
ऋग्वेद -5/82/5
भावार्थ --हे ईश्वर ! जो हमारे लिए शुभ है, उसे प्रदान करें।
(70) प्रेहि प्रेहि पथिभि:पूर्व्येभि;
ऋगुवेद--10/14/7
भावार्थ--श्रेष्ठ मार्ग पर आगे बढ़ो।
(71)बृहस्पते अति यदर्यो अराति:।
ऋगुवेद--2/23/1
भावार्थ--हे ईश्वर ! हमें श्रेष्ठ बुद्धि प्रदान करें।
(72) मा हृणीथा:।
रिग्वेद--9/2/19
भावार्थ--हे ईश्वर ! आप हमसे रुष्ट न हों।
(73) न देवास: कवत्नवे
रिग्वेद --9/2/19
भावार्थ--ईश्वर अकर्मण्य का साथ नहीं देता।
(74) तरणि:इत जयति।
रिग्वेद--7/2/19
भावार्थ--परिश्रमी ही सफल होता 
(75) ऋग्वेद 1.114.8
मा नो महान्तमुत मा नो अर्भकं
मा नो उक्षन्तमुत मा नो उक्षितम्।
अर्थ:
हे प्रभु! हमारे बड़े-बूढ़ों को हानि न हो, हमारे छोटे बच्चों को हानि न हो। हमारे युवाओं तथा गर्भस्थ अथवा नवजात शिशुओं की भी रक्षा करें; उन पर किसी प्रकार का कष्ट या अनिष्ट न आने दें।











  

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