डा० सूर्य पाल सिंह का उत्कृष्ट व्यक्तित्व
डा०सूर्यपाल सिंह का उत्कृष्ट व्यक्तित्व : मनुष्यता की उज्ज्वल परंपरा के साधक
(आदरणीय डॉ. ………… के व्यक्तित्व पर एक साहित्यिक व्यक्तित्व-चित्र)
सृष्टि के विराट रंगमंच पर प्रतिदिन असंख्य मनुष्य आते हैं, अपना-अपना अभिनय पूरा करते हैं और समय की धारा में विलीन हो जाते हैं। किंतु कुछ विरले व्यक्तित्व ऐसे भी होते हैं जो अपने जीवन को अभिनय नहीं बनने देते; वे उसे साधना बना देते हैं। ऐसे लोग अपने युग की धड़कनों में बस जाते हैं। वे अपने लिए नहीं जीते, वे अपने समय की चेतना के लिए जीते हैं। उनके व्यक्तित्व की ऊष्मा केवल उनके परिवार या परिचितों तक सीमित नहीं रहती, वह समाज के विस्तृत आकाश में फैलकर अनेक जीवनों को आलोकित करती है। ऐसे व्यक्तित्वों का मूल्यांकन उनके पदों, पुरस्कारों या उपलब्धियों से नहीं किया जा सकता; क्योंकि उनका वास्तविक परिचय उनके चरित्र में, उनके व्यवहार में और उनके द्वारा स्पर्श किए गए असंख्य हृदयों में सुरक्षित रहता है।
भारतीय संस्कृति ने सदैव ऐसे ही मनुष्यों को अपनी सबसे बड़ी संपदा माना है। हमारे यहाँ महानता का अर्थ अधिकार नहीं, उत्तरदायित्व है; वैभव नहीं, विनम्रता है; और प्रसिद्धि नहीं, लोकमंगल है। यही कारण है कि हमारे ऋषियों ने कहा—"विद्या ददाति विनयम्।" यदि विद्या विनम्रता न दे सके, यदि ज्ञान मनुष्यता से न जुड़े और यदि प्रतिष्ठा सेवा का माध्यम न बने, तो वह अधूरी है। आदरणीय डॉ. सूर्य पाल सिंह का जीवन इस शाश्वत भारतीय सत्य का साकार रूप है।
आफके व्यक्तित्व को देखकर सहज ही अनुभव होता है कि ईश्वर कभी-कभी मनुष्य को केवल प्रतिभा ही नहीं देता, बल्कि उसके भीतर करुणा, सहिष्णुता, उदारता और आत्मसंयम का ऐसा अद्भुत संतुलन भी स्थापित कर देता है, जो उसे सामान्य मनुष्यों से अलग पहचान देता है। आप उन दुर्लभ व्यक्तियों में हैं जिनके संबंध में जितना सुना जाए, उससे कहीं अधिक आफके निकट जाकर अनुभव किया जा सकता है। आपका व्यक्तित्व किसी ऊँचे पर्वत की भाँति दूर से भव्य दिखाई देता है, और निकट पहुँचने पर उसकी हरियाली, उसकी शीतलता और उसकी जीवनदायिनी धाराएँ मन को कहीं अधिक आकर्षित करती हैं।
जीवन में सफलता प्राप्त करना कठिन है, किंतु सफलता प्राप्त करने के बाद भी सरल बने रहना उससे कहीं अधिक कठिन है। संसार में ऐसे लोगों की कमी नहीं है जो पद पाते ही बदल जाते हैं, सम्मान मिलते ही अपने चारों ओर औपचारिकता की दीवारें खड़ी कर लेते हैं और उपलब्धियों के साथ अपने व्यक्तित्व की सहजता खो बैठते हैं। परंतु डॉ. साहब का जीवन इस सामान्य प्रवृत्ति का अपवाद है। आपने जितनी ऊँचाइयाँ प्राप्त कीं, उतने ही विनम्र होते चले गए। यही कारण है कि आपके व्यक्तित्व का सबसे उज्ज्वल पक्ष आपकी उपलब्धियाँ नहीं, आपकी विनम्रता है।
आपने अपने जीवन का प्रारंभ जेटीसी ग्रेड के शिक्षक के रूप में किया। यह वह समय था जब शिक्षक केवल पाठ नहीं पढ़ाता था, बल्कि समाज का संस्कार भी गढ़ता था। डॉ. साहब ने अध्यापन को कभी नौकरी नहीं माना; उन्होंने उसे राष्ट्र-निर्माण का दायित्व समझा। यही निष्ठा आपको क्रमशः शिक्षा-जगत की ऊँचाइयों तक ले गई। डिग्री कॉलेज के प्रधानाचार्य के रूप में आपने जिस गरिमा, अनुशासन और मानवीय संवेदना के साथ अपने दायित्वों का निर्वहन किया, वह आज भी आपके सहयोगियों और विद्यार्थियों की स्मृतियों में जीवित है।
आपकी यात्रा केवल पदोन्नति की यात्रा नहीं थी; वह आत्मविकास की यात्रा थी। आफने अपने प्रत्येक दायित्व को एक नई साधना की तरह स्वीकार किया। शिक्षक रहते हुए आपने विद्यार्थियों का विश्वास जीता, प्रशासक बने तो सहकर्मियों का सम्मान अर्जित किया, और साहित्यकार बने तो पाठकों के हृदय में स्थान पाया। यह विरल समन्वय विरले व्यक्तित्वों में ही संभव होता है।
किन्तु यदि कोई यह समझे कि आफका परिचय केवल एक सफल शिक्षाविद् के रूप में समाप्त हो जाता है, तो यह आपके व्यक्तित्व के साथ अन्याय होगा। आपके जीवन का दूसरा महान अध्याय साहित्य है। साहित्य आपके लिए केवल अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि जीवन का नैतिक दायित्व है। आपने शब्दों को कभी यश प्राप्त करने का साधन नहीं बनाया; आपने समाज को जोड़ने और मनुष्यता को समृद्ध करने का माध्यम बनाया। यही कारण है कि आपकी लेखनी में विचार की गंभीरता है, किंतु उसके भीतर करुणा की ऊष्मा भी है।
एक त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका का नियमित प्रकाशन अपने आप में साधारण कार्य नहीं है। यह केवल संपादन का कार्य नहीं, बल्कि साहित्यिक संस्कृति की रक्षा का उत्तरदायित्व है। डॉ. साहब ने वर्षों तक इस उत्तरदायित्व का निर्वाह अत्यंत निष्ठा के साथ किया। आपने साहित्य को गुटों और समूहों की सीमाओं से ऊपर उठाकर देखा। आपके लिए रचना का मूल्य लेखक की प्रसिद्धि से नहीं, उसकी संवेदना और गुणवत्ता से निर्धारित होता था। इसलिए आपकी पत्रिका में वरिष्ठ और नवोदित—दोनों प्रकार के साहित्यकार समान आत्मीयता से स्थान पाते रहे।
इतना ही नहीं, अपने पूर्वापर प्रकाशन संस्थान के माध्यम से आपने अनेक छोटे-बड़े साहित्यकारों की पुस्तकों का प्रकाशन कराया। यह कार्य केवल प्रकाशक का कार्य नहीं था; यह एक साहित्य-साधक का दायित्व था। आपने उन लेखकों के हाथ थामे, जिनकी प्रतिभा अवसर के अभाव में दब सकती थी। वस्तुतः आपने केवल पुस्तकें प्रकाशित नहीं कीं, आपने अनेक साहित्यिक यात्राओं का शुभारंभ किया।
आज जब साहित्य में भी प्रतिस्पर्धा, प्रचार और आत्मकेंद्रित प्रवृत्तियाँ बढ़ती जा रही हैं, तब डॉ. साहब का यह योगदान और अधिक महत्त्वपूर्ण हो जाता है। आपने सिद्ध किया कि साहित्य का वास्तविक उद्देश्य स्वयं को स्थापित करना नहीं, दूसरों को आगे बढ़ाना है। जो व्यक्ति अपने साथ-साथ दूसरों के लिए भी प्रकाश का मार्ग प्रशस्त करता है, वही सच्चा साहित्य-सेवी कहलाने का अधिकारी है।
डॉ. साहब के व्यक्तित्व की सबसे बड़ी विशेषता यह नहीं है कि आपनै जीवन में ऊँचे पद प्राप्त किए, साहित्य के क्षेत्र में विशिष्ट पहचान बनाई अथवा अनेक सम्मानों से विभूषित हुए। इन सबसे कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण यह है कि इन उपलब्धियों ने आपके भीतर अहंकार का एक कण भी उत्पन्न नहीं होने दिया। आपके निकट बैठने वाला व्यक्ति कुछ ही क्षणों में अनुभव कर लेता है कि महानता का वास्तविक निवास ऊँचे आसनों पर नहीं, विनम्र हृदयों में होता है।
आज के समय में जब थोड़ी-सी प्रसिद्धि भी व्यक्ति को आत्ममुग्ध बना देती है, तब डॉ. साहब का जीवन भारतीय संत-परंपरा की याद दिलाता है। आफ जितने बड़े विद्वान हैं, उतने ही सहज श्रोता भी हैं। आप अपनी बात कहने से पहले सामने वाले की बात पूरी तन्मयता से सुनते हैं। यह गुण साधारण नहीं होता। सुनने की कला उसी के पास होती है जिसके भीतर 'मैं' का शोर कम और 'तुम' के प्रति सम्मान अधिक होता है।
आपके व्यक्तित्व का दूसरा अनुपम पक्ष है-मधुर वाणी। कहा गया है-
"ऐसी वाणी बोलिए, मन का आपा खोय।
औरन को शीतल करे, आपहुँ शीतल होय॥"
यह दोहा जैसे आपके जीवन का स्वाभाविक परिचय बन जाता है। आपकी वाणी में कृत्रिम मिठास नहीं, बल्कि आत्मीयता का संगीत है। आफ किसी को प्रभावित करने के लिए मधुर नहीं बोलते; आप इसलिए मधुर बोलते हैं क्योंकि आपका मन मधुर है। आपके शब्दों में कटुता का स्थान नहीं है। वर्षों का अनुभव, गहन अध्ययन और व्यापक सामाजिक संपर्क भी आपकी भाषा को कठोर नहीं बना सके।
आपके परिचित जानते हैं कि आफने जीवन भर किसी की आलोचना नहीं की। इतना ही नहीं, आप दूसरों की निंदा सुनना भी पसंद नहीं करते। आपके
के लिए मनुष्य की चर्चा उसके गुणों के आधार पर होनी चाहिए, दोषों के आधार पर नहीं। आप मानते हैं कि किसी व्यक्ति की अनुपस्थिति में उसकी आलोचना करना अपने ही चरित्र की दुर्बलता का परिचय है। इसलिए जहाँ कहीं नकारात्मक चर्चा प्रारंभ होती है, वहाँआप बड़ी सहजता से विषय बदल देते हैं। आपके इस व्यवहार में केवल शिष्टाचार नहीं, बल्कि एक गहरी जीवन-दृष्टि छिपी हुई है। वस्तुतः आप जानते हैं कि आलोचना से अधिक शक्तिशाली प्रेरणा होती है। दोष गिनाने से अधिक उपयोगी गुणों को विकसित करना होता है। यही कारण है कि आफके संपर्क में आने वाले लोग अपने भीतर आत्मविश्वास का अनुभव करते हैं। आप टूटे हुए मनों को जोड़ते हैं, निराश लोगों में आशा जगाते हैं और संघर्षरत व्यक्तियों के भीतर आगे बढ़ने की शक्ति भरते हैं।
क्रोध मनुष्य के विवेक को सबसे पहले नष्ट करता है। परंतु डॉ. साहब के व्यक्तित्व को देखकर लगता है कि आपने क्रोध पर नहीं, स्वयं पर विजय प्राप्त की है। आपके निकट रहने वालों का अनुभव है कि विपरीत से विपरीत परिस्थितियों में भी आपकाका धैर्य विचलित नहीं होता। आप निर्णय आवेश में नहीं, विवेक से लेते हैं। आपकी शांत मुद्रा सामने वाले के मन में भी शांति का संचार करती है। शायद यही कारण है कि आफके आसपास सदैव संवाद का वातावरण रहता है, विवाद का नहीं।
आपके भीतर लोभ का भी कोई स्थान नहीं है। ईश्वर ने आपको आर्थिक सम्पन्नता प्रदान की, सामाजिक प्रतिष्ठा दी और यश भी दिया; किंतु आप ने इन सबको कभी अपने व्यक्तित्व का केंद्र नहीं बनने दिया। आप ने संग्रह की अपेक्षा वितरण को अधिक महत्त्व दिया। आपका विश्वास है कि संपत्ति का सौंदर्य उसके संचय में नहीं, उसके सदुपयोग में है। इसलिए आप समय-समय पर निर्धनों, असहायों और जरूरतमंदों की सहायता करते रहे हैं। यह सहायता कभी प्रचार का विषय नहीं बनी; क्योंकि सेवा का वास्तविक स्वरूप मौन होता है।
डॉ. साहब की करुणा केवल आर्थिक सहायता तक सीमित नहीं है। आप लोगों के दुःख में सहभागी बनते हैं। किसी विद्यार्थी की समस्या हो, किसी साहित्यकार की कठिनाई हो या किसी सामान्य व्यक्ति की पीड़ा—आप यथाशक्ति सहायता के लिए तत्पर रहते हैं। आपका विश्वास है कि मनुष्य होने का सबसे बड़ा अर्थ है—दूसरे मनुष्य के दुःख को अपना दुःख समझना।
आपके व्यक्तित्व का एक अत्यंत उज्ज्वल पक्ष आपकी सामाजिक समरसता की भावना है। जाति, धर्म, संप्रदाय, भाषा अथवा क्षेत्र—इनमें से कोई भी संकीर्ण पहचान आपके व्यवहार को प्रभावित नहीं कर सकी। आप प्रत्येक व्यक्ति को समान सम्मान देते हैं। आपके लिए मनुष्य की पहचान उसके कर्म, उसके संस्कार और उसके चरित्र से होती है। यही कारण है कि समाज का प्रत्येक वर्ग आपको अपना मानता है।
भारतीय संस्कृति के महान आदर्श 'वसुधैव कुटुम्बकम्' का वास्तविक अर्थ यदि किसी व्यक्ति के जीवन में देखना हो, तो डॉ. साहब का जीवन एक सुंदर उदाहरण है। वे किसी विशेष वर्ग के नहीं, समूचे समाज के व्यक्ति हैं। उनके द्वार पर आने वाले व्यक्ति से पहले उसका परिचय नहीं पूछा जाता; पहले उसकी आवश्यकता समझी जाती है। यही संवेदनशीलता आपको लोकनायक बनाती है।
आपकी व्यवहार-कुशलता भी उल्लेखनीय है। आप जानते हैं कि मनुष्य केवल तर्क से नहीं, आत्मीयता से जीता जाता है। इसलिए आप हर व्यक्ति को उसके सम्मान के साथ स्वीकार करते हैं। आपकी उपस्थिति में कोई स्वयं को छोटा नहीं समझता। बड़े से बड़ा विद्वान और सामान्य से सामान्य व्यक्ति—दोनों उनके पास समान सहजता का अनुभव करते हैं। यही किसी बड़े व्यक्तित्व की सबसे बड़ी पहचान है।
वास्तव में डॉ. साहब का व्यक्तित्व हमें यह सिखाता है कि मनुष्य की ऊँचाई उसकी उपलब्धियों से नहीं, उसके व्यवहार से मापी जाती है। ज्ञान यदि विनम्रता न दे, प्रतिष्ठा यदि करुणा न दे और सफलता यदि सेवा का भाव न दे, तो वह अधूरी है। डॉ. साहब का जीवन इन तीनों का अद्भुत समन्वय है। आप इस सत्य के साक्षात् प्रमाण हैं कि चरित्र ही मनुष्य का सबसे बड़ा सम्मान-पत्र होता है।
यदि डॉ. साहब के व्यक्तित्व का एक शब्द में परिचय देना हो, तो निःसंकोच कहा जा सकता है आप साधक हैं। साधना केवल पूजा-अर्चना का नाम नहीं है; साधना उस निरंतर तप का नाम है जिसमें मनुष्य अपने स्वार्थ से ऊपर उठकर किसी बड़े उद्देश्य के लिए जीना सीखता है। डॉ. साहब का संपूर्ण जीवन इसी साधना का जीवंत उदाहरण है। शिक्षा आपकी कर्मभूमि रही, साहित्य आपकी तपोभूमि और समाज आपकी आराधना।
साहित्य के प्रति आपका समर्पण केवल लेखन तक सीमित नहीं रहा। आपने साहित्य को जीया, सँवारा और नई पीढ़ियों तक पहुँचाया। एक त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका का वर्षों तक नियमित प्रकाशन आज के समय में साधारण कार्य नहीं है। पत्रिका निकालना केवल आर्थिक या प्रशासनिक दायित्व नहीं, बल्कि साहित्यिक उत्तरदायित्व है। उसमें निष्पक्ष दृष्टि चाहिए, नए रचनाकारों पर विश्वास चाहिए और साहित्य के भविष्य के प्रति गहरी आस्था चाहिए। डॉ. साहब ने इन तीनों दायित्वों का निर्वाह अत्यंत निष्ठा के साथ किया।
आपकी पत्रिका किसी गुट, विचारधारा या साहित्यिक राजनीति की प्रतिनिधि नहीं बनी; वह साहित्य की प्रतिनिधि बनी। उसमें स्थापित रचनाकारों के साथ-साथ उन नवोदित लेखकों को भी स्थान मिला, जिनकी प्रतिभा अवसर की प्रतीक्षा कर रही थी। अनेक साहित्यकारों के लिए आपकी पत्रिका पूर्वापर पहला ऐसा मंच बनी, जहाँ उनकी रचनाओं को सम्मान मिला। किसी नवोदित लेखक की पहली प्रकाशित रचना जितनी प्रसन्नता लेखक को देती है, उससे कम प्रसन्नता डॉ. साहब को भी नहीं होती थी। यही एक सच्चे साहित्य-सेवी का हृदय होता है।
अपने प्रकाशन संस्थान के माध्यम से आपने अनेक छोटे-बड़े साहित्यकारों की पुस्तकों का प्रकाशन कराया। यह कार्य केवल प्रकाशन नहीं था, बल्कि साहित्यिक संस्कृति के संरक्षण का एक मौन आंदोलन था। आपने कभी यह नहीं देखा कि लेखक कितना प्रसिद्ध है; आपने यह देखा कि उसकी रचना में जीवन कितना है। आज जब प्रकाशन भी प्रायः बाज़ार की शर्तों पर निर्भर होता जा रहा है, तब आपका यह दृष्टिकोण साहित्य के प्रति आपकी निष्काम निष्ठा का प्रमाण है।
इप स्वयं उच्चकोटि के साहित्यकार हैं। आपकी लेखनी में अनुभव का सौम्य प्रकाश है। आप शब्दों का चमत्कार नहीं रचते; आप शब्दों के माध्यम से मनुष्यता का विस्तार करते हैं। आपकी रचनाओं में जीवन की सच्चाइयाँ हैं, भारतीय संस्कृति की गूँज है, समाज के प्रति उत्तरदायित्व है और मनुष्य के प्रति अटूट विश्वास है। आपकी साहित्य-साधना को अनेक पुरस्कारों और सम्मानों से अलंकृत किया गया, परंतु आपने कभी सम्मानों को अपने व्यक्तित्व का केंद्र नहीं बनने दिया। आपके लिए सबसे बड़ा पुरस्कार पाठकों का विश्वास और समाज का स्नेह रहा।
आपके जीवन का एक अत्यंत प्रेरक आयाम आपका वार्षिक सम्मान समारोह है। प्रत्येक वर्ष आप समाज के विभिन्न क्षेत्रों में उल्लेखनीय कार्य करने वाले व्यक्तियों का सम्मान करते हैं। यह केवल एक औपचारिक आयोजन नहीं होता; यह समाज के श्रेष्ठ मूल्यों का उत्सव होता है। वहाँ सम्मानित व्यक्ति का परिचय उसके पद, जाति या आर्थिक स्थिति से नहीं, बल्कि उसके कर्म और समाज के प्रति उसके योगदान से होता है। इस प्रकार यह समारोह समाज में उत्कृष्टता के प्रति सम्मान और प्रेरणा की संस्कृति का संवाहक बन जाता है।
वास्तव में यह आयोजन डॉ. साहब के जीवन-दर्शन का सार्वजनिक रूप है। आप मानते हैं कि सम्मान केवल व्यक्ति का नहीं, आपके द्वारा स्थापित मूल्यों का होना चाहिए। जब समाज अपने श्रेष्ठ लोगों को सम्मान देता है, तब वह आने वाली पीढ़ियों के सामने आदर्श भी स्थापित करता है। इस दृष्टि से आपका यह प्रयास केवल एक वार्षिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि सांस्कृतिक उत्तरदायित्व का निर्वाह है।
बानवे वर्ष की आयु में भी आपकी सक्रियता विस्मय उत्पन्न करती है। सामान्यतः इस आयु में लोग स्मृतियों के सहारे जीवन बिताते हैं, किंतु डॉ. साहब आज भी भविष्य की पीढ़ियों के लिए कार्यरत हैं। अध्ययन उनकी दिनचर्या का हिस्सा है, लेखन आपकी साधना है, संपादन आपका उत्तरदायित्व है और समाज के साथ संवाद आपकी जीवन-शैली। आपको देखकर सहज ही विश्वास होता है कि वृद्धावस्था शरीर की हो सकती है, मन की नहीं।
आपके जीवन को निकट से देखने पर यह अनुभव होता है कि आपने अपने लिए बहुत कम माँगा और समाज को बहुत अधिक दिया। आपने जो कुछ अर्जित किया, उसे बाँटने का प्रयत्न किया—ज्ञान बाँटा, अनुभव बाँटा, अवसर बाँटे, सम्मान बाँटा और सबसे बढ़कर अपना स्नेह बाँटा। शायद इसी कारण आपके संपर्क में आने वाला प्रत्येक व्यक्ति स्वयं को आपका आत्मीय मानता है।
डॉ. साहब का व्यक्तित्व किसी एक युग की उपलब्धि नहीं है; वह उन शाश्वत भारतीय जीवन-मूल्यों का प्रतिनिधि है जिनमें ज्ञान का लक्ष्य विनम्रता, साहित्य का लक्ष्य लोकमंगल और जीवन का लक्ष्य परोपकार माना गया है। ऐसे व्यक्तित्व समय के साथ पुराने नहीं होते; वे समय को ही दिशा देते हैं। वे दीपक की तरह स्वयं जलते हैं और अपने प्रकाश से असंख्य दीपों को प्रज्वलित करते चलते हैं।
आज जब समाज में संवाद की जगह शोर, संवेदना की जगह स्वार्थ और मूल्य की जगह प्रदर्शन का संकट दिखाई देता है, तब डॉ. साहब जैसे व्यक्तित्व हमें आश्वस्त करते हैं कि भारतीय संस्कृति की मूल चेतना अभी जीवित है। जब तक ऐसे लोग हमारे बीच हैं, तब तक विश्वास, विनम्रता, सद्भाव और साहित्य की उज्ज्वल परंपरा भी जीवित रहेगी।
आपका जीवन हमें यह सिखाता है कि मनुष्य की सबसे बड़ी सफलता यह नहीं कि उसने कितना प्राप्त किया, बल्कि यह है कि उसने अपने कारण कितने लोगों का जीवन समृद्ध किया। इस कसौटी पर डॉ. साहब निस्संदेह हमारे समय के उन विरल व्यक्तित्वों में हैं, जिनकी उपस्थिति स्वयं एक सांस्कृतिक उपलब्धि है।
किसी मनुष्य का वास्तविक मूल्यांकन उसके जीवनकाल में नहीं होता। समय उसकी उपलब्धियों की नहीं, उसके प्रभाव की परीक्षा लेता है। पद समाप्त हो जाते हैं, अधिकार छिन जाते हैं, सम्मान-पत्र अलमारियों में रखे रह जाते हैं, किंतु यदि किसी व्यक्ति का स्पर्श मनुष्यों के जीवन को बदल देता है, यदि उसकी वाणी किसी निराश हृदय में आशा जगा देती है, यदि उसकी उपस्थिति लोगों के भीतर विश्वास का संचार करती है, तो वह व्यक्ति समय के इतिहास में नहीं, मानव-हृदय के इतिहास में अपना स्थान बना लेता है। डॉ. साहब का व्यक्तित्व इसी अर्थ में असाधारण है।
आपका जीवन किसी ऊँचे शिखर पर खड़े व्यक्ति का जीवन नहीं, बल्कि उस वटवृक्ष का जीवन है जिसकी छाया में असंख्य लोग विश्राम पाते हैं। आपने कभी स्वयं को केंद्र में रखने का प्रयत्न नहीं किया। आप सदैव दूसरों को आगे बढ़ाने, दूसरों का सम्मान करने और दूसरों की उपलब्धियों पर प्रसन्न होने वाले व्यक्ति रहे। यही कारण है कि आपके संपर्क में आने वाला प्रत्येक व्यक्ति स्वयं को समृद्ध अनुभव करता है। बड़े व्यक्तित्व की यही पहचान है कि उसके पास से लौटकर मनुष्य अपने भीतर कुछ अधिक प्रकाश, कुछ अधिक विश्वास और कुछ अधिक मनुष्यता लेकर आता है।
डॉ. साहब के व्यक्तित्व में एक अद्भुत संतुलन दिखाई देता है। शिक्षा ने उन्हें विद्वान बनाया, साहित्य ने उन्हें संवेदनशील बनाया, समाज-सेवा ने उन्हें उदार बनाया और जीवन-साधना ने उन्हें विनम्र बनाया। सामान्यतः ये गुण अलग-अलग व्यक्तियों में मिलते हैं, किंतु आपके भीतर इनका ऐसा सुंदर समन्वय दिखाई देता है कि कोई एक गुण दूसरे पर भारी नहीं पड़ता। यही संतुलन आपके व्यक्तित्व की सबसे बड़ी शक्ति है।
आपकी बानवे वर्ष की आयु केवल वर्षों की गणना नहीं है; वह अनुभव, तप, अध्ययन, सेवा और सतत कर्म की एक दीर्घ यात्रा है। आपने समय को केवल बिताया नहीं, उसे सार्थक बनाया। आपने अपने जीवन के प्रत्येक चरण को समाज के लिए उपयोगी बनाया। यही कारण है कि आपकी सक्रियता आज भी प्रेरणा का विषय है। आपको
देखकर सहज विश्वास होता है कि मनुष्य की वास्तविक आयु उसके शरीर से नहीं, उसके संकल्प से मापी जाती है।
भारतीय संस्कृति में ऐसे व्यक्तियों को 'लोकऋषि' कहा गया है—वे जो समाज के बीच रहते हुए भी समाज को ऊँचा उठाने का कार्य करते हैं। डॉ. साहब का व्यक्तित्व इसी परंपरा की याद दिलाता है। आपने न किसी प्रकार की कटुता को अपने भीतर स्थान दिया, न किसी प्रकार के भेदभाव को। जाति और धर्म की संकीर्ण सीमाएँ आपके जीवन-दर्शन के सामने स्वतः ही अर्थहीन हो जाती हैं। आपके लिए मनुष्य की पहचान केवल उसकी मनुष्यता है। यह दृष्टि आज के समय में अत्यंत दुर्लभ है और इसलिए और भी अधिक मूल्यवान है।
आपकी सबसे बड़ी उपलब्धि यह नहीं कि आप डिग्री कॉलेज के प्रधानाचार्य रहे, न यह कि आप प्रतिष्ठित साहित्यकार हैं, न ही यह कि आपको अनेक सम्मान प्राप्त हुए। आपकी सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि आप ने जहाँ-जहाँ जीवन को स्पर्श किया, वहाँ-वहाँ विश्वास, आत्मीयता और सद्भाव का वातावरण निर्मित किया। यही किसी भी शिक्षाविद्, साहित्यकार और समाजसेवी की सर्वोच्च सफलता है।
जब भविष्य की पीढ़ियाँ आपके जीवन को देखेंगी, तब संभव है कि वे आपके प्रकाशित ग्रंथों की संख्या गिनें, प्राप्त सम्मानों का उल्लेख करें, आपके पदों का इतिहास लिखें।
आपके जीवन की सबसे बड़ी पुस्तक आपका चरित्र है; सबसे बड़ा पुरस्कार जनमानस का विश्वास है; और सबसे बड़ी उपलब्धि वे असंख्य हृदय हैं जिनमें आप ने अपने प्रति सम्मान और स्नेह का स्थायी स्थान बनाया है।
महाकवि मैथिलीशरण गुप्त की पंक्तियाँ यहाँ सहज ही स्मरण हो आती हैं—
"यही पशु-प्रवृत्ति है कि आप-आप ही चरे,
वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे।"
डॉ. साहब का जीवन इसी मानवीय आदर्श का विस्तृत रूप है। आपने अपने ज्ञान को समाज के साथ बाँटा, अपनी साहित्य-साधना को नई पीढ़ियों के लिए समर्पित किया, अपनी प्रतिष्ठा को दूसरों के सम्मान का माध्यम बनाया और अपने जीवन को लोकमंगल की साधना बना दिया।
ऐसे व्यक्तित्व किसी एक परिवार की निजी धरोहर नहीं होते। वे समाज की सांस्कृतिक पूँजी होते हैं। उनका सम्मान करना केवल एक व्यक्ति का सम्मान करना नहीं, बल्कि उन जीवन-मूल्यों के प्रति अपनी आस्था प्रकट करना है जिन पर किसी भी सभ्य समाज का भविष्य टिका होता है। आज जब मूल्य-संकट की चर्चा बार-बार होती है, तब डॉ. साहब जैसे व्यक्तित्व हमें आश्वस्त करते हैं कि भारतीय समाज की आत्मा अभी भी जीवित है।
अंत में केवल इतना ही कहा जा सकता है कि कुछ लोग अपने जीवन से इतिहास लिखते हैं, कुछ अपने विचारों से साहित्य रचते हैं; परंतु कुछ विरले लोग ऐसे भी होते हैं जो अपने व्यक्तित्व से मनुष्यता की परिभाषा लिखते हैं। आदरणीय डॉ. साहब निस्संदेह उन्हीं विरल व्यक्तित्वों में हैं।
आपके प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त करते हुए मन यही प्रार्थना करता है कि आपका स्नेह, आपका अनुभव, आपका मार्गदर्शन और आफकी जीवन-ज्योति आने वाले वर्षों तक साहित्य, शिक्षा और समाज को आलोकित करती रहे। यही आपके प्रति हमारी सच्ची कृतज्ञता होगी और यही आपके उत्कृष्ट व्यक्तित्व को हमारी विनम्र शब्दांजलि।
-----गणेश तिवारी 'नैश'
कर्नलगंज, गोण्डा
Comments
Post a Comment