---प्राणायाम से दिव्य शक्ति की प्राप्ति---

----प्राणायाम से दिव्य शक्ति की प्राप्ति--
एक बार बिठूर, कानपुर के लव कुश आश्रम के प्रांगण में स्वामी श्री सत्य मूर्ति जी आए । श्री स्वामी जी ने  अपनी दिव्य अलौकिक शक्ति का वहाँ प्रदर्शन किया। वह वहाँ की गुफा में प्रवेश कर गए। उन्होंने जो संकल्प लिया था उसके अनुसार उन्हें सातवें दिन प्रातः निकलना था। गुफा से द्वार पर डेढ़ फुट मिट्टी डालकर गुफा को पूरी तरह से बन्द कर दिया गया। कहीं भी हवा के प्रवेश के लिए कोई छिद्र नहीं था। उस अवसर पर तत्कालीन उ० प्र० के महामहिम राज्यपाल श्री विश्वनाथ दास जी भी उपस्थित थे। निश्चित तिथि पर बहुत भीड़ इकट्ठा थी  उन सबके समक्ष मिट्टी को हटाया गया। श्री स्वामी जी जब बाहर निकले तो पूर्णतया स्वस्थ थे। उन्होंने अपने प्रवचन में कहा कि इस तरह की समाधि अबतक 142 बार विभिन्न स्थानों पर ले चुका हूँ। यह प्राणायाम योग के द्वारा सम्भव होता है।
समाधि के समय हम अपने प्राण को कुम्भक करके ब्रह्माण्ड में चढ़ाकर अनन्त में समाहित हो जाते हैं और संकल्प के अनुसार निश्चित तिथि और समय पर प्राण के उतरने पर हम चेतन की अवस्था में आज जाते हैं। 
यह बात सन् 1837 की है जब पंजाब केसरी महाराज रणजीत सिंह राजा थे।
उस समय स्वामी हरिदास‌ जी के योग बल की चर्चा दूर- दूर तक फैली हुयी थी। स्वामी जी ने महाराजा रणजीत सिंह से कहा, आप मुझे एक बाक्स में बन्द करवा कर मिट्टी में गाड़ दिया जाए, और जितने दिन चाहें उतने दिन के बाद आप मुझे बाहर निकालें, मैं जीवित तो निकलूँगा ही पूर्णतयः स्वस्थ भी रहूँगा। महाराज ने ऐसा ही किया। महाराज ने 40 दिन का समय दिया। स्वामी जी को एक बाक्स में बन्द करके बाहर से मजबूत ताला लगा दिया गया, जिसकी कुञ्जी महाराज ने स्वयं अपने पास रख लिया। एक बाग में मिट्टी की गहराई में बाक्स को गाड़ दिया गया और बाहर से पहरा बिठा दिया गया जिससे वहाँ पास तक कोई आ न सके। 40 दिन बाद निश्चित समय पर महाराज स्वयं कुञ्जी लेकर अपने लाव लश्कर के साथ वहाँ  उपस्थित हुए। मिट्टी हटाई गयी। बाक्स निकाला गया। ताला खोला गया। स्वामी हरिदास जी हँसते हुए बाहर निकले और बातचीत करने लगे। महाराज ने अपने गले से रत्नों का हार निकालकर आपको पहना दिया और 21 तोपों की सलामी देने हेतु महाराज ने आदेश दिया।
-------+-------+--------+-------+--------

Comments

Popular posts from this blog

डा० सूर्य पाल सिंह का उत्कृष्ट व्यक्तित्व

ऋगुवेद सूक्ति--(53) की व्याख्या