यजुर्वेद सूक्ति (12)की व्याख्या
यजुर्वेद सूक्ति (12) की व्याख्या
प्राणोयज्ञेन कल्पताम्
यजुर्वेद --11/8,4
भावार्थ --हे ईश्वर! हमारे प्राण बलिष्ठ हों।
वेदों में प्रमाण--
"प्राणो यज्ञेन कल्पताम्" (यजुर्वेद 11.83) का भाव है कि मनुष्य के प्राण यज्ञमय, पवित्र और बलवान हों। इस भावना का समर्थन अन्य वैदिक मंत्रों में भी मिलता है। उदाहरण के लिए—
1--ऋग्वेद 10.186.1
वात आ वातु भेषजं शम्भु मयोभु नो हृदे। प्र ण आयूंषि तारिषत्॥ भावार्थ: वायु हमारे लिए औषधि स्वरूप हो, हमारे हृदय को सुख दे और हमारे प्राण तथा आयु की रक्षा करे।
2--अथर्ववेद 11.4.1
प्राणाय नमो यस्य सर्वमिदं वशे। भावार्थ: उस प्राण को नमस्कार है जिसके अधीन यह समस्त जगत है।
3--अथर्ववेद 11.4.11
प्राणो हि सर्वस्येश्वरो यदिदं किं च। भावार्थ: प्राण ही इस समस्त जगत के जीवन का आधार और नियामक है।
4--यजुर्वेद 36.24
शं नो मित्रः शं वरुणः... भावार्थ: ईश्वर हमें स्वास्थ्य, शांति और कल्याण प्रदान करे, जिससे हमारा जीवन और प्राण पुष्ट रहें।
5--ऋग्वेद 1.89.8
भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवाः... स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवांसस्तनूभिः। भावार्थ: हम स्वस्थ अंगों और सुदृढ़ शरीर के साथ दीर्घायु होकर ईश्वर की उपासना करें।
इन मंत्रों से स्पष्ट होता है कि वेदों में प्राण की रक्षा, उसकी शक्ति, दीर्घायु, स्वास्थ्य और यज्ञमय जीवन पर विशेष बल दिया गया है, जो "प्राणो यज्ञेन कल्पताम्" के भाव का समर्थन करते हैं।
उपनिषदों में प्रमाण--
"प्राणो यज्ञेन कल्पताम्" (यजुर्वेद 11.83) का भाव है कि प्राण पुष्ट, पवित्र, संयमित और ईश्वराभिमुख हों। इस विषय पर उपनिषदों में अनेक प्रमाण मिलते हैं:
1--प्रश्नोपनिषद् 2.13
प्राणस्येदं वशे सर्वं त्रिदिवे यत्प्रतिष्ठितम्। भावार्थ: यह समस्त जगत प्राण के अधीन है; प्राण ही जीवन का आधार है।
2_प्रश्नोपनिषद् 2.5
स एष प्राणः... भावार्थ: प्राण ही शरीर में सब इन्द्रियों को धारण करता है और उन्हें कार्य करने की शक्ति देता है।
3--छान्दोग्य उपनिषद् 5.1.15
प्राणो वा वा ज्येष्ठश्च श्रेष्ठश्च। भावार्थ: प्राण सबसे ज्येष्ठ और सबसे श्रेष्ठ है।
4--बृहदारण्यक उपनिषद् 1.3.23
प्राणो वै बलम्। भावार्थ: प्राण ही बल है।
5--कौषीतकि उपनिषद् 3.2
प्राणो वै प्रज्ञात्मा। भावार्थ: प्राण ही प्रज्ञा (चेतना) का आधार है; उसी से जीवन प्रकाशित होता है।
इन उपनिषद्-वचनों से स्पष्ट है कि प्राण केवल श्वास नहीं, बल्कि जीवन, बल, चेतना और आध्यात्मिक उन्नति का आधार है। इसलिए "प्राणो यज्ञेन कल्पताम्" का तात्पर्य है कि मनुष्य के प्राण यज्ञमय आचरण, संयम और ईश्वर-उपासना से बलवान, शुद्ध और कल्याणकारी।
पुराणों में प्रमाण--
"प्राणो यज्ञेन कल्पताम्" (यजुर्वेद 11.83) का भाव है— हमारे प्राण बलवान, पवित्र और धर्ममय बनें। इस भाव से संबंधित पुराणों में प्राण, आयु, तप और धर्म की महिमा का वर्णन मिलता है। उदाहरणार्थ—
1--श्रीमद्भागवत महापुराण 4.31.12
प्राणादीनां विश्वसृजां शक्तयो यस्य वर्णिताः... भावार्थ: समस्त प्राणशक्ति भगवान से ही उत्पन्न होती है; वही सभी जीवों के जीवन का आधार हैं।
2--विष्णु पुराण 1.22
सर्वभूतेषु चात्मानं... भावार्थ: भगवान सभी प्राणियों में प्राणरूप से स्थित हैं; अतः सभी प्राणियों का आदर करना चाहिए।
3--शिव पुराण (विद्येश्वर संहिता) भावार्थ: प्राण, मन और इन्द्रियों को संयमित करके की गई उपासना ही श्रेष्ठ साधना है।
4--गरुड़ पुराण (आचारकाण्ड) भावार्थ: धर्म, संयम, सात्त्विक आहार और सदाचार से प्राण पुष्ट होते हैं तथा आयु की रक्षा होती है।
5--पद्म पुराण (उत्तरखण्ड) भावार्थ: यज्ञ, दान, तप और भगवान के स्मरण से मनुष्य का जीवन और प्राण पवित्र एवं कल्याणकारी बनते हैं।
महत्वपूर्ण टिप्पणी:
पुराणों के अध्याय और श्लोक क्रम विभिन्न संस्करणों में भिन्न हो सकते हैं।
भगवद्गीता में प्रमाण-
"प्राणो यज्ञेन कल्पताम्" (यजुर्वेद 11.83) का भाव है कि प्राण यज्ञमय, संयमित, पवित्र और बलवान हों। श्रीमद्भगवद्गीता में भी इस भाव का अनेक स्थानों पर समर्थन मिलता है:
1--अध्याय 4, श्लोक 29
अपाने जुह्वति प्राणं प्राणेऽपानं तथापरे।
प्राणापानगती रुद्ध्वा प्राणायामपरायणाः॥
भावार्थ: कुछ योगी प्राण को अपान में और अपान को प्राण में अर्पित करते हैं तथा प्राणायाम द्वारा प्राणों को संयमित करते हैं।
संबंध: प्राणों को शुद्ध, संयमित और साधित करने का उपदेश।
2--अध्याय 4, श्लोक 30
अपरे नियताहाराः प्राणान् प्राणेषु जुह्वति।
सर्वेऽप्येते यज्ञविदो यज्ञक्षपितकल्मषाः॥
भावार्थ: संयमित आहार वाले साधक प्राणों का यज्ञ करते हैं; ऐसे यज्ञज्ञानी पापों से मुक्त हो जाते हैं।
संबंध: यहाँ प्राणों का यज्ञ सीधे-सीधे "प्राणो यज्ञेन कल्पताम्" की भावना का समर्थन करता है।
3--अध्याय 5, श्लोक 27–28
स्पर्शान् कृत्वा बहिर्बाह्यांश्चक्षुश्चैवान्तरे भ्रुवोः।
प्राणापानौ समौ कृत्वा नासाभ्यन्तरचारिणौ॥
भावार्थ: योगी प्राण और अपान को सम करके इन्द्रियों तथा मन को वश में करता है।
4--अध्याय 15, श्लोक 14
अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः।
प्राणापानसमायुक्तः पचाम्यन्नं चतुर्विधम्॥
भावार्थ: भगवान कहते हैं—मैं प्राणियों के शरीर में स्थित होकर प्राण और अपान के साथ चार प्रकार के अन्न को पचाता हूँ।
5--अध्याय 17, श्लोक 14
देवद्विजगुरुप्राज्ञपूजनं शौचमार्जवम्।
ब्रह्मचर्यमहिंसा च शारीरं तप उच्यते॥
भावार्थ: शरीर की पवित्रता, ब्रह्मचर्य और अहिंसा शारीरिक तप हैं, जो प्राणों की शुद्धि और बलवृद्धि में सहायक हैं।
इन श्लोकों से स्पष्ट होता है कि गीता में प्राणों का संयम, प्राणयज्ञ, शुद्ध आहार, तप और योग को आध्यात्मिक उन्नति का आधार माना गया है, जो यजुर्वेद के "प्राणो यज्ञेन कल्पताम्" के भाव से पूर्णतः संगत है।
महाभारत में प्रमाण--
"प्राणो यज्ञेन कल्पताम्" (यजुर्वेद 11.83) का भाव है— प्राण बलवान, संयमित, धर्मयुक्त और कल्याणकारी हों। महाभारत में भी प्राण, आयु, तप, संयम और धर्म की महिमा अनेक स्थानों पर वर्णित है। उदाहरण के लिए—
1--महाभारत 188.8
प्राणो हि भगवान् वायुः।
भावार्थ: प्राणस्वरूप वायु ही जीवन का आधार है।
2--महाभारत 195
भावार्थ: इन्द्रियों और प्राणों का संयम ही तप और धर्म की सिद्धि का कारण है।
3--महाभारत 104
भावार्थ: जो मनुष्य संयम, शुद्ध आहार और सदाचार का पालन करता है, उसके प्राण, बल और आयु की वृद्धि होती है।
4--महाभारत 232
भावार्थ: धर्मयुक्त आचरण से मनुष्य का जीवन और प्राण दोनों पवित्र एवं सुदृढ़ होते हैं।
5--महाभारत (यक्ष–युधिष्ठिर संवाद)
भावार्थ: धर्म का पालन ही जीवन की रक्षा और कल्याण का सर्वोच्च साधन है।
महत्वपूर्ण टिप्पणी--
महाभारत के विभिन्न संस्करणों (क्रिटिकल एडिशन, गीता प्रेस आदि) में अध्याय और श्लोक संख्या भिन्न हो सकती हे।
स्मृतियों में प्रमाण--
विषय "प्राणो यज्ञेन कल्पताम्" (प्राणों को यज्ञमय, धर्ममय और लोकहित में नियोजित करना) है, तो अनेक स्मृतियों में इसी भाव का समर्थन मिलता है।
1--मनुस्मृति (8.15)
धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः।
तस्माद्धर्मो न हन्तव्यो मा नो धर्मो हतोऽवधीत्॥
भावार्थ: जो धर्म का नाश करता है, धर्म उसका नाश करता है; जो धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है। अतः अपने जीवन और प्राणों को धर्म के लिए समर्पित रखना चाहिए।
2--मनुस्मृति (2.3)
संकल्पमूलः कामो वै यज्ञाः संकल्पसम्भवाः।
व्रतानि यमधर्माश्च सर्वे संकल्पजाः स्मृताः॥
भावार्थ: यज्ञ, व्रत और धर्म का मूल शुद्ध संकल्प है।
3--मनुस्मृति (2.86)
ये पाकयज्ञाश्चत्वारो विधियज्ञसमन्विताः।
सर्वे ते जपयज्ञस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम्॥
भावार्थ: जपयज्ञ का महत्व अत्यन्त महान है; बाह्य यज्ञों से भी श्रेष्ठ आंतरिक साधना मानी गई है।
4-याज्ञवल्क्य स्मृति (1.122–126)
याज्ञवल्क्य स्मृति में विधिपूर्वक यज्ञ, धर्माचरण और कर्तव्यपालन को जीवन का आधार बताया गया है तथा धर्मानुकूल कर्म पर बल दिया गया है।
5-पराशर स्मृति
पराशर स्मृति विशेष रूप से कलियुग में धर्म, दया, संयम और व्यावहारिक धर्मपालन पर बल देती है, जिससे स्पष्ट होता है कि जीवन का उद्देश्य धर्ममय आचरण है।
इन स्मृतियों का समग्र संदेश यही है कि मन, वचन, कर्म और प्राण—सब धर्म और यज्ञमय जीवन के लिए समर्पित हों। यही भाव "प्राणो यज्ञेन कल्पताम्" मंत्र के अनुरूप है।
नीति ग्रन्थों में प्रमाण--
विषय "प्राणो यज्ञेन कल्पताम्" (यजुर्वेद) का भाव है—अर्थात् जीवन, प्राण और कर्म का लोकहित, संयम और धर्म के लिए समर्पित होना—तो अनेक नीति-ग्रन्थ भी इसी सिद्धांत का समर्थन करते हैं।
कुछ प्रमुख प्रमाण:
1--विदुर नीति
त्यजेदेकं कुलस्यार्थे ग्रामस्यार्थे कुलं त्यजेत्।
ग्रामं जनपदस्यार्थे आत्मार्थे पृथिवीं त्यजेत्॥
भावार्थ: कुल की रक्षा के लिए एक व्यक्ति का, ग्राम के लिए कुल का, जनपद के लिए ग्राम का और आत्मकल्याण के लिए पृथ्वी तक का त्याग करना चाहिए। यह लोकहित के लिए अपने प्राण तक अर्पित करने की नीति सिखाता है।
2--चाणक्य नीति
धर्मेण धार्यते लोकः।
भावार्थ: सम्पूर्ण संसार धर्म से ही धारण किया जाता है। इसलिए धर्ममय जीवन ही श्रेष्ठ है।
3--चाणक्य नीति
त्यजेद्धर्मं दयाहीनं विद्याहीनं गुरुं त्यजेत्।
भावार्थ: जहाँ दया और धर्म न हो, उसका त्याग करना चाहिए। नीति का आधार धर्म और करुणा है।
4--हितोपदेश
परोपकाराय सतां विभूतयः।
भावार्थ: सज्जनों की सम्पत्ति और सामर्थ्य परोपकार के लिए होती है। अपने प्राण और शक्ति का उपयोग लोकमंगल में करना ही श्रेष्ठ नीति है।
5--पञ्चतन्त्र
परोपकारः पुण्याय पापाय परपीडनम्।
भावार्थ: परोपकार पुण्य है और दूसरों को पीड़ा देना पाप है।
इन नीति-ग्रंथों का निष्कर्ष यह है कि मनुष्य का जीवन, शक्ति और प्राण केवल अपने लिए नहीं, बल्कि धर्म, परोपकार और लोककल्याण के लिए होने चाहिए। यही भाव "प्राणो यज्ञेन कल्पताम्" मंत्र के साथ सामंजस्य रखता है।
योग वाशिष्ठ में ष्रमाण---
यदि संदर्भ "प्राणो यज्ञेन कल्पताम्" (यजुर्वेद 18.29) — अर्थात् प्राण का यज्ञमय, संयमित और लोककल्याणकारी होना है, तो योग वाशिष्ठ में भी इसी भाव का समर्थन मिलता है। यद्यपि वहाँ यही वैदिक वाक्य नहीं आता, पर प्राण-संयम, आत्मशुद्धि, वैराग्य और लोकहित को यज्ञ के समान माना गया है।
कुछ प्रमुख प्रमाण:
1--योग वाशिष्ठ, वैराग्य प्रकरण
प्राणायामदृढाभ्यासैर्मनो यान्ति विलयम्।
मनोलये लयं याति संसारभ्रमकारणम्॥
भावार्थ: दृढ़ प्राणायाम के अभ्यास से मन शांत होता है, और मन के शांत होने पर संसार-बन्धन का कारण भी समाप्त होने लगता है।
2--योग वाशिष्ठ, उपशम प्रकरण
चित्तमेव हि संसारस्तत्प्रयत्नेन शोधनम्।
यच्चित्तस्तन्मयो जन्तुः॥
भावार्थ: चित्त ही संसार है; इसलिए उसका शोधन करना चाहिए। मनुष्य जैसा चित्त बनाता है, वैसा ही बन जाता है। यह आंतरिक यज्ञ का स्वरूप है।
3--योग वाशिष्ठ, निर्वाण प्रकरण
यदा प्रशाम्यति प्राणो मनः शान्तिमुपैति च।
तदा ब्रह्ममयं सर्वं दृश्यते नात्र संशयः॥
भावार्थ: जब प्राण और मन दोनों शांत हो जाते हैं, तब सम्पूर्ण जगत ब्रह्ममय दिखाई देता है।
4--योग वाशिष्ठ
मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः।
भावार्थ: मनुष्य के बन्धन और मोक्ष का कारण मन ही है; इसलिए मन और प्राण का संयम ही श्रेष्ठ साधना है।
इन उद्धरणों का मुख्य संदेश यह है कि प्राण का संयम, मन की शुद्धि, आत्मविकास और लोककल्याण ही वास्तविक यज्ञ है। यही भाव यजुर्वेद के "प्राणो यज्ञेन कल्पताम्" मंत्र के अनुरूप है।
वाल्मीकि प्रमाण--
"प्राणो यज्ञेन कल्पताम्" (यजुर्वेद 11.83) का भाव है—प्राणों की रक्षा, बल, धर्म और संयम। वाल्मीकि रामायण में इसी भाव का समर्थन करने वाले कुछ प्रमाण हैं:
1--अरण्यकाण्ड 3.9.31
धर्मादर्थः प्रभवति धर्मात्प्रभवते सुखम्।
धर्मेण लभते सर्वं धर्मसारमिदं जगत्॥
भावार्थ: धर्म से अर्थ उत्पन्न होता है, धर्म से सुख प्राप्त होता है, और धर्म से ही सब कुछ प्राप्त होता है; यह संसार धर्ममय है। धर्ममय जीवन ही प्राणों के कल्याण का आधार है।
2--बालकाण्ड 1.1.8
रक्षिता जीवलोकस्य धर्मस्य परिरक्षिता।
भावार्थ: श्रीराम समस्त प्राणियों (जीवलोक) के रक्षक और धर्म के संरक्षक हैं।
3--बालकाण्ड 1.1.9
रक्षिता स्वस्य धर्मस्य स्वजनस्य च रक्षिता।
भावार्थ: जो अपने धर्म और अपने लोगों की रक्षा करता है, वही लोककल्याण करता है।
4--अयोध्याकाण्ड राम बार-बार यह प्रतिपादित करते हैं कि धर्म की रक्षा के लिए प्राणों का त्याग भी स्वीकार है, पर धर्म का त्याग नहीं। यह पूरी रामायण का मूल आदर्श है।
ये प्रमाण बताते हैं कि वाल्मीकि रामायण में धर्म, प्राणों की रक्षा, लोककल्याण और संयमित जीवन पर विशेष बल दिया गया है, जो "प्राणो यज्ञेन कल्पताम्" के भाव के अनुरूप
इस्लाम धर्म में प्रमाण--
विषय "प्राणो यज्ञेन
कल्पताम्" (हमारे प्राण बलिष्ठ, पवित्र और कल्याणकारी हों) है, तो इस्लाम में इसके निकटतम भाव जान (नफ़्स), जीवन, शक्ति, स्वास्थ्य और अल्लाह की इबादत के लिए सामर्थ्य से संबंधित आयतों और हदीसों में मिलता है।
1. क़ुरआन 2:195
وَلَا تُلْقُوا بِأَيْدِيكُمْ إِلَى التَّهْلُكَةِ
भावार्थ: "अपने आपको अपने ही हाथों विनाश में न डालो।"
यह आयत जीवन और प्राणों की रक्षा का निर्देश देती है।
2. क़ुरआन 5:32
وَمَنْ أَحْيَاهَا فَكَأَنَّمَا أَحْيَا النَّاسَ جَمِيعًا
भावार्थ: "जिसने एक प्राण (जीवन) को बचाया, उसने मानो समस्त मानवता को बचाया।"
3. क़ुरआन 16:97
مَنْ عَمِلَ صَالِحًا مِّن ذَكَرٍ أَوْ أُنثَىٰ وَهُوَ مُؤْمِنٌ فَلَنُحْيِيَنَّهُ حَيَاةً طَيِّبَةً
भावार्थ: "जो ईमान के साथ अच्छे कर्म करेगा, हम उसे उत्तम जीवन प्रदान करेंगे।"
4. सहीह मुस्लिम
الْمُؤْمِنُ الْقَوِيُّ خَيْرٌ وَأَحَبُّ إِلَى اللَّهِ مِنَ الْمُؤْمِنِ الضَّعِيفِ، وَفِي كُلٍّ خَيْرٌ
भावार्थ: "शक्तिशाली मोमिन, कमजोर मोमिन की अपेक्षा अल्लाह को अधिक प्रिय है, यद्यपि दोनों में भलाई है।"
5. सहीह अल-बुख़ारी
إِنَّ لِجَسَدِكَ عَلَيْكَ حَقًّا
भावार्थ: "निस्संदेह तुम्हारे शरीर का तुम पर अधिकार है।"
इसका अर्थ है कि मनुष्य अपने शरीर और जीवन की देखभाल करे।
इन आयतों और हदीसों से स्पष्ट है कि इस्लाम भी जीवन की रक्षा, शरीर की देखभाल, शक्ति, स्वास्थ्य और नेक कर्मों के लिए सामर्थ्य पर बल देता है। यह भाव यजुर्वेद के "प्राणो यज्ञेन कल्पताम्" से विषयगत रूप से मेल खाता है, यद्यपि दोनों ग्रंथों की अपनी-अपनी धार्मिक और दार्शनिक पृष्ठभूमि है।
सूफी सन्तोंं में प्रमाण--
यदि विषय "प्राणो यज्ञेन कल्पताम्" का भाव है—अर्थात् अपने प्राण, जीवन और अहंकार को ईश्वर तथा मानवता की सेवा में समर्पित करना—तो अनेक सूफ़ी संतों की शिक्षाओं में यही विचार मिलता है। ध्यान रहे कि सूफ़ी साहित्य में वैदिक शैली के "अध्याय–श्लोक" नहीं होते; उनके कथन, कविताएँ और ग्रंथ प्रमुख स्रोत हैं।
यहाँ कुछ प्रमाण प्रस्तुत हैं:
1---जलालुद्दीन रूमी — मसनवी
بمیر قبل از آنکه بمیری
"मरने से पहले मर जाओ।"
भावार्थ: अपने अहंकार का त्याग करो; ईश्वर के लिए स्वयं को समर्पित करो। यही आंतरिक यज्ञ है।
2--फ़रीदुद्दीन अत्तार — मन्तिक उत्-तैर
تا جان ندهی، جانان نیابی
"जब तक अपना प्राण (स्वार्थ) अर्पित नहीं करोगे, प्रियतम (ईश्वर) को नहीं पाओगे।"
भावार्थ: ईश्वर-प्राप्ति के लिए पूर्ण समर्पण आवश्यक है।
3--हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया
دل به خدا، دست به کار
"दिल अल्लाह के साथ और हाथ सेवा में।"
भावार्थ: जीवन और कर्म दोनों ईश्वर तथा मानवता की सेवा के लिए हों।
4--शेख अब्दुल क़ादिर जीलानी
الفناء في الله ثم البقاء بالله
"पहले अल्लाह में अपने अहं का लय (फ़ना), फिर उसी के सहारे स्थिर जीवन (बक़ा)।"
भावार्थ: अपने अस्तित्व को ईश्वर के लिए समर्पित करना ही आध्यात्मिक पूर्णता है।
5--राबिआ अल-अदविया
إلهي، ما عبدتك خوفًا من نارك ولا طمعًا في جنتك، ولكن حبًا لك
"हे प्रभु! मैं तेरी उपासना न नरक के भय से करती हूँ, न स्वर्ग की इच्छा से, बल्कि केवल तेरे प्रेम में।"
भावार्थ: निष्काम प्रेम और पूर्ण समर्पण ही सर्वोच्च साधना है।
इन सभी सूफ़ी शिक्षाओं का मूल संदेश है कि अहंकार का त्याग, जीवन का समर्पण, ईश्वर-प्रेम और मानव-सेवा ही सच्ची साधना है। यह भाव वैदिक मंत्र "प्राणो यज्ञेन कल्पताम्" के आध्यात्मिक अर्थ से निकटता रखता है, यद्यपि ये उद्धरण उस मंत्र की प्रत्यक्ष व्याख्या नहीं हैं।अलग है।
सिक्ख धर्म में प्रमाण=-
विषय "प्राणो यज्ञेन कल्पताम्" (अर्थात् जीवन, प्राण और कर्म को ईश्वर तथा लोकमंगल के लिए समर्पित करना) है, तो गुरु ग्रंथ साहिब में इस भाव से मिलती-जुलती अनेक वाणियाँ हैं।
यहाँ कुज प्रमाण गुरमुखी लिपि में प्रस्तुत हैं:
1-ਗੁਰੂ ਗ੍ਰੰਥ ਸਾਹਿਬ (ਅੰਗ ੧੨੪੫)
ਜਉ ਤਉ ਪ੍ਰੇਮ ਖੇਲਣ ਕਾ ਚਾਉ ।
ਸਿਰੁ ਧਰਿ ਤਲੀ ਗਲੀ ਮੇਰੀ ਆਉ
भावार्थ: यदि ईश्वर-प्रेम के मार्ग पर चलना चाहते हो, तो अपना सिर (अर्थात् जीवन) हथेली पर रखकर आओ। पूर्ण समर्पण ही सच्ची भक्ति है।
2-ਗੁਰੂ ਗ੍ਰੰਥ ਸਾਹਿਬ (ਅੰਗ ੬੧੧)
ਜਿਨਿ ਨਾਮੁ ਧਿਆਇਆ ਗਏ ਮਸਕਤਿ ਘਾਲਿ ।
भावार्थ: जिन्होंने परिश्रमपूर्वक प्रभु-नाम का स्मरण किया, उनका जीवन सफल हुआ।
3-ਗੁਰੂ ਗ੍ਰੰਥ ਸਾਹਿਬ (ਅੰਗ ੪੭੪)
ਸੇਵਾ ਕਰਤ ਹੋਇ ਨਿਹਕਾਮੀ ।
ਤਿਸ ਕਉ ਹੋਤ ਪਰਾਪਤਿ ਸੁਆਮੀ ॥
भावार्थ: जो निष्काम भाव से सेवा करता है, वह प्रभु को प्राप्त करता है।
4-ਗੁਰੂ ਗ੍ਰੰਥ ਸਾਹਿਬ (ਅੰਗ ੨੮੬)
ਸਭਨਾ ਜੀਆ ਕਾ ਇਕੁ ਦਾਤਾ ਸੋ ਮੈ ਵਿਸਰਿ ਨ ਜਾਈ ॥
भावार्थ: सभी प्राणियों का दाता एक ही परमात्मा है; उसे कभी नहीं भूलना चाहिए।
5--ਗੁਰੂ ਗ੍ਰੰਥ ਸਾਹਿਬ (ਅੰਗ ੮)
ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਵੇਲਾ ਸਚੁ ਨਾਉ ਵਡਿਆਈ ਵੀਚਾਰੁ ॥
भावार्थ: अमृत बेला में प्रभु के सत्य नाम का स्मरण और उसके गुणों का चिंतन करना चाहिए।
इन वाणियों का मूल संदेश है कि जीवन का समर्पण, निष्काम सेवा, ईश्वर-स्मरण और मानव-कल्याण ही सच्चा धर्म है। यह भाव "प्राणो यज्ञेन कल्पताम्" के आध्यात्मिक अर्थ के अनुरूप है।
ईसाई धर्म में प्रमाण--
विषय "प्राणो यज्ञेन कल्पताम्" (अपने जीवन और प्राणों को ईश्वर तथा लोककल्याण के लिए समर्पित करना) है, तो बाइबल में इसी भाव के अनेक स्पष्ट प्रमाण मिलते हैं।
2--Bible — Romans 12:1
"Therefore, I urge you, brothers and sisters, in view of God's mercy, to offer your bodies as a living sacrifice, holy and pleasing to God—this is your true and proper worship."
हिंदी भावार्थ: अपने शरीर और जीवन को परमेश्वर के लिए जीवित बलिदान (Living Sacrifice) के रूप में अर्पित करो। यही सच्ची उपासना है।
2--Bible — John 15:13
"Greater love has no one than this: to lay down one's life for one's friends."
हिंदी भावार्थ: अपने मित्रों के लिए अपना जीवन दे देना सबसे बड़ा प्रेम है।
3--Bible — Mark 8:35
"For whoever wants to save their life will lose it, but whoever loses their life for me and for the gospel will save it."
हिंदी भावार्थ: जो मेरे और सुसमाचार के लिए अपना जीवन समर्पित करता है, वही वास्तविक जीवन प्राप्त करता है।
4--Bible — Galatians 2:20
"I have been crucified with Christ and I no longer live, but Christ lives in me."
हिंदी भावार्थ: मेरा अहंकार समाप्त हो गया है; अब मेरा जीवन मसीह के लिए है।
5--Bible — Philippians 1:21
"For to me, to live is Christ and to die is gain."
हिंदी भावार्थ: मेरे लिए जीवन मसीह के लिए है और मृत्यु भी लाभ है।
निष्कर्ष
इन बाइबिल वचनों का केंद्रीय संदेश है कि मनुष्य अपना जीवन, शरीर और प्राण परमेश्वर तथा दूसरों की भलाई के लिए समर्पित करे। यह भाव वैदिक मंत्र "प्राणो यज्ञेन कल्पताम्" के आध्यात्मिक अर्थ से मिलता-जुलता है, यद्यपि दोनों परंपराओं की अपनी-अपनी धार्मिक पृष्ठभूमि और व्याख्याएँ हैं।
जैन धर्म में प्रमाण--
विषय "प्राणो यज्ञेन कल्पताम्" का भाव है—अर्थात् प्राणों को धर्म, आत्मसंयम और लोकमंगल के लिए नियोजित करना—तो जैन आगमों और प्राकृत साहित्य में भी अहिंसा, संयम और आत्मशुद्धि पर विशेष बल मिलता है। यह समान भाव है; यह नहीं कहा जा सकता कि ये ग्रंथ सीधे उसी वैदिक मंत्र की व्याख्या करते हैं।
यहाँ कुछ प्रमाण प्राकृत (देवनागरी) के साथ प्रस्तुत हैं:
1--आचारांग सूत्र
सव्वे पाणा ण हंतव्वा।
भावार्थ: सभी प्राणियों की हिंसा नहीं करनी चाहिए।
2--उत्तराध्ययन सूत्र
अप्पा चेव दमेयव्वो।
भावार्थ: सबसे पहले अपने आप (आत्मा/मन) को संयमित करना चाहिए।
3--दशवैकालिक सूत्र
धम्मो मंगलमुक्किट्ठं, अहिंसा संजमो तवो।
भावार्थ: धर्म ही सर्वोच्च मंगल है; अहिंसा, संयम और तप ही उसका सार हैं।
4--तत्त्वार्थसूत्र
परस्परोपग्रहो जीवानाम्।
भावार्थ: सभी जीव एक-दूसरे के उपकार के लिए हैं।
ध्यान दें: यह सूत्र संस्कृत में है, प्राकृत में नहीं, लेकिन जैन दर्शन का मूल सिद्धांत है।
5--समयसार
जो अप्पाणं जाणइ, सो परमं सुखं लहइ।
भावार्थ: जो अपने वास्तविक आत्मस्वरूप को जान लेता है, वही परम सुख प्राप्त करता है।
निष्कर्ष
जैन धर्म का मूल संदेश है कि प्राणों की रक्षा, आत्मसंयम, तप, अहिंसा और परस्पर उपकार ही श्रेष्ठ धर्म हैं। ये शिक्षाएँ "प्राणो यज्ञेन कल्पताम्" के उस व्यापक आध्यात्मिक भाव से मेल खाती हैं जिसमें जीवन को धर्ममय और आत्मशुद्धि के लिए समर्पित करने की प्रेरणा है.।
बौद्ध धर्म में प्रमाण--
विषय "प्राणो यज्ञेन कल्पताम्" (अर्थात् जीवन को धर्म, करुणा और आत्मशुद्धि के लिए समर्पित करना) है, तो बौद्ध धर्म के पाली ग्रंथों में भी इसी भाव से संबंधित अनेक शिक्षाएँ मिलती हैं। ध्यान रहे कि ये उस वैदिक मंत्र की प्रत्यक्ष व्याख्या नहीं, बल्कि समान आध्यात्मिक सिद्धांत व्यक्त करती हैं।
यहाँ कुछ प्रमाण पाली (देवनागरी) के साथ प्रस्तुत हैं:
1--धम्मपद (धम्मपद 183)
सब्बपापस्स अकरणं, कुसलस्स उपसम्पदा।
सचित्तपरियोदपनं, एतं बुद्धान सासनं॥
भावार्थ: सभी पापों से बचना, पुण्य कर्म करना और अपने चित्त को शुद्ध करना—यही बुद्धों का उपदेश है।
2--धम्मपद (धम्मपद 129)
सब्बे तस्सन्ति दण्डस्स, सब्बेसं जीवितं पियं।
अत्तानं उपमं कत्वा, न हनेय्य न घातये॥
भावार्थ: सभी प्राणी दण्ड से डरते हैं और सभी को अपना जीवन प्रिय है; इसलिए न स्वयं हिंसा करे और न दूसरों से कराए।
3--धम्मपद (धम्मपद 160)
अत्ता हि अत्तनो नाथो, को हि नाथो परो सिया।
भावार्थ: मनुष्य स्वयं अपना स्वामी है; इसलिए अपने जीवन का शुद्ध आचरण स्वयं करे।
4--करणीय मेत्ता सुत्त
सब्बे सत्ता भवंतु सुखितत्ता॥
भावार्थ: सभी प्राणी सुखी हों।
5--महापरिनिब्बान सुत्त
वयधम्मा संखारा, अप्पमादेन सम्पादेथ॥
भावार्थ: सभी संयोगजन्य वस्तुएँ नश्वर हैं; इसलिए अप्रमाद (सजगता) से साधना पूर्ण करो।
निष्कर्ष
बौद्ध धर्म का संदेश है कि जीवन को शील, करुणा, अहिंसा, चित्त-शुद्धि और अप्रमाद के लिए समर्पित करना ही श्रेष्ठ साधना है। यह भाव "प्राणो यज्ञेन कल्पताम्" के व्यापक आध्यात्मिक अर्थ से साम्य रखता है, यद्यपि दोनों परंपराओं की दार्शनिक पृष्ठभूमि भिन्न है।।
यहूदी धर्म में प्रमाण--
विषय "प्राणो यज्ञेन कल्पताम्" (अर्थात् अपने जीवन और प्राणों को परमेश्वर तथा धर्म के लिए समर्पित करना) है, तो यहूदी धर्म के Tanakh में भी इसी भाव से मिलते-जुलते अनेक प्रमाण हैं। ये उस वैदिक मंत्र की प्रत्यक्ष व्याख्या नहीं हैं, बल्कि समान आध्यात्मिक विचार व्यक्त करते हैं।
1. व्यवस्थाविवरण (Deuteronomy) 6:5
हिब्रू:
וְאָהַבְתָּ אֵת יְהוָה אֱלֹהֶיךָ בְּכָל־לְבָבְךָ וּבְכָל־נַפְשְׁךָ וּבְכָל־מְאֹדֶךָ׃
भावार्थ: अपने परमेश्वर यहोवा से अपने पूरे हृदय, पूरे प्राण और पूरी शक्ति से प्रेम करो।
2. लैव्यव्यवस्था (Leviticus) 19:18
हिब्रू:
וְאָהַבְתָּ לְרֵעֲךָ כָּמוֹךָ אֲנִי יְהוָה׃
भावार्थ: अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम करो।
3. मीका (Micah) 6:8
हिब्रू:
הִגִּיד לְךָ אָדָם מַה־טּוֹב וּמָה־יְהוָה דּוֹרֵשׁ מִמְּךָ כִּי אִם־עֲשׂוֹת מִשְׁפָּט וְאַהֲבַת חֶסֶד וְהַצְנֵעַ לֶכֶת עִם־אֱלֹהֶיךָ׃
भावार्थ: परमेश्वर तुमसे यही चाहता है—न्याय करो, दया से प्रेम करो और नम्रता से उसके साथ चलो।
4. भजन संहिता (Psalms) 51:17
हिब्रू:
זִבְחֵי אֱלֹהִים רוּחַ נִשְׁבָּרָה לֵב־נִשְׁבָּר וְנִדְכֶּה אֱלֹהִים לֹא תִבְזֶה׃
भावार्थ: परमेश्वर का प्रिय बलिदान टूटा हुआ (विनम्र) मन है।
5. व्यवस्थाविवरण (Deuteronomy) 30:19–20
हिब्रू:
וּבָחַרְתָּ בַּחַיִּים לְמַעַן תִּחְיֶה... לְאַהֲבָה אֶת־יְהוָה אֱלֹהֶיךָ
भावार्थ: जीवन को चुनो, परमेश्वर से प्रेम करो और उसी से जुड़े रहो।
निष्कर्ष
यहूदी धर्म में पूरे प्राण से परमेश्वर से प्रेम, दया, न्याय, विनम्रता और धर्ममय जीवन पर बल दिया गया है। यह भाव "प्राणो यज्ञेन कल्पताम्" के उस व्यापक आध्यात्मिक अर्थ से मेल खाता है जिसमें जीवन को धर्म और ईश्वर के लिए समर्पित करने की प्रेरणा है।
पारसी धर्म में ष्रमाम--
विषय "प्राणो यज्ञेन कल्पताम्" (अर्थात् जीवन और प्राणों को सत्य, धर्म और ईश्वर के लिए समर्पित करना) है, तो पारसी (ज़रथुष्ट्र) धर्म के अवेस्ता में भी इसी भाव से मिलती-जुलती शिक्षाएँ हैं। ध्यान रहे कि ये उस वैदिक मंत्र की प्रत्यक्ष व्याख्या नहीं हैं, बल्कि समान नैतिक-आध्यात्मिक सिद्धांत व्यक्त करती हैं।
नोट: अवेस्ता की मूल अवेस्ताई लिपि (Avestan script) एक विशेष यूनिकोड लिपि है जो सभी उपकरणों पर सही नहीं दिखती। इसलिए नीचे मूल अवेस्ताई लिपि के साथ उसका अर्थ दिया जा रहा है।
1. यथा आहू वैर्यो (Yasna 27.13)
अवेस्ताई:
𐬫𐬀𐬚𐬀 𐬀𐬵𐬏 𐬬𐬀𐬌𐬭𐬌𐬌𐬊 ...
भावार्थ: धर्म और सत्य के अनुसार जीवन जीना तथा ईश्वर की इच्छा का पालन करना सर्वोच्च मार्ग है।
2. अशेम वोहू (Yasna 27.14)
अवेस्ताई:
𐬀𐬴𐬆𐬨 𐬬𐬊𐬵𐬏 𐬬𐬀𐬵𐬌𐬱𐬙𐬆𐬨 𐬀𐬯𐬙𐬌 ...
भावार्थ: सत्य (अशा) ही सर्वोत्तम है; जो सत्य के लिए जीता है वही धन्य है।
3. गाथा अहुनवैती (Yasna 30.2)
अवेस्ताई:
𐬯𐬭𐬊𐬙𐬀 𐬀𐬙 𐬫𐬀𐬌𐬌𐬀𐬙 ...
भावार्थ: बुद्धि से सुनो, विचार करो और सत्य का मार्ग स्वयं चुनो।
4. गाथा (Yasna 34)
अवेस्ताई:
𐬀𐬴𐬀𐬎𐬭𐬀 𐬨𐬀𐬰𐬛𐬀 ...
भावार्थ: हे अहुरा मज़्दा! मुझे ऐसा जीवन दो जो सत्य और धर्म के कार्यों में लगे।
5. गाथा (Yasna 43.1)
अवेस्ताई:
𐬀𐬙 𐬙𐬀 𐬬𐬀𐬵𐬌𐬱𐬙𐬀 ...
भावार्थ: जो सत्य और सद्कर्म के मार्ग पर चलता है, वही ईश्वर के निकट पहुँचता है।
निष्कर्ष
पारसी धर्म का मूल सिद्धांत "Humata, Hukhta, Hvarshta" (सद्विचार, सद्वचन और सद्कर्म) है। जीवन को सत्य, धर्म और लोककल्याण के लिए समर्पित करने का यह आदर्श "प्राणो यज्ञेन कल्पताम्" के व्यापक आध्यात्मिक भाव से साम्य रखता है।
ताओ धर्म में प्रमाण--
विषय "प्राणो यज्ञेन कल्पताम्" (अर्थात् जीवन-शक्ति को धर्म, संतुलन और लोककल्याण के लिए नियोजित करना) है, तो ताओ (Dao) धर्म में भी प्रकृति के नियम (道 Dao), सरल जीवन, अहंकार-त्याग और समन्वय पर बल मिलता है। ये वैदिक मंत्र की प्रत्यक्ष व्याख्या नहीं हैं, बल्कि समान आध्यात्मिक भाव व्यक्त करते हैं।
यहाँ पाँच प्रमाण चीनी लिपि के साथ प्रस्तुत हैं:
1. Tao Te Ching — अध्याय 8
上善若水。水善利萬物而不爭。
भावार्थ: सर्वोच्च अच्छाई जल के समान है; जल सभी प्राणियों का लाभ करता है और स्पर्धा नहीं करता।
2. ताओ ते चिंग — अध्याय 33
知人者智,自知者明。勝人者有力,自勝者強。
भावार्थ: दूसरों को जानना बुद्धिमानी है, स्वयं को जानना वास्तविक ज्ञान है; स्वयं पर विजय पाना ही महान शक्ति है।
3. ताओ ते चिंग — अध्याय 16
致虛極,守靜篤。
भावार्थ: पूर्ण शून्यता और गहरी शांति को धारण करो।
4. ताओ ते चिंग — अध्याय 37
道常無為而無不為。
भावार्थ: ताओ निष्क्रियता (अहंकार-रहित कर्म) में रहता है, फिर भी सब कार्य उसी से होते हैं।
5. ताओ ते चिंग — अध्याय 49
聖人無常心,以百姓心為心。
भावार्थ: संत पुरुष अपना स्वार्थी मन नहीं रखते; वे लोगों के हित को अपना हित मानते हैं।
निष्कर्ष
ताओ धर्म में जीवन-शक्ति (氣 — Qi), प्रकृति के साथ सामंजस्य, अहंकार का त्याग और सबके हित में जीवन को श्रेष्ठ माना गया है। यह भाव व्यापक रूप से "प्राणो यज्ञेन कल्पताम्" के उस अर्थ से जुड़ता है जिसमें जीवन-ऊर्जा को उच्च उद्देश्य के लिए समर्पित करने की प्रेरणा़।
कन्फ्यूसियस धर्म में प्रमाण--
विषय "प्राणो यज्ञेन कल्पताम्" का भाव है—अर्थात् जीवन, शक्ति और कर्म को धर्म, सदाचार और लोकहित के लिए समर्पित करना—तो कन्फ्यूशियस (Confucian) परंपरा में भी मानवता (仁), कर्तव्य (義), और नैतिक आचरण पर बल मिलता है। ये वैदिक मंत्र की प्रत्यक्ष व्याख्या नहीं हैं, बल्कि समान नैतिक भाव व्यक्त करते हैं।
यहाँ कुछ प्रमाण चीनी लिपि के साथ प्रस्तुत हैं:
1. Analects of Confucius (論語, 15:24)
己所不欲,勿施於人。
भावार्थ: जो व्यवहार तुम अपने लिए नहीं चाहते, वह दूसरों के साथ मत करो।
2. Analects of Confucius (論語, 4:15)
參乎!吾道一以貫之。
भावार्थ: मेरा मार्ग एक ही सिद्धांत से जुड़ा है—सत्य और नैतिकता का मार्ग।
3. Analects of Confucius (論語, 12:22)
君子成人之美,不成人之惡。
भावार्थ: श्रेष्ठ व्यक्ति दूसरों की अच्छाई को बढ़ाता है, उनकी बुराई को नहीं।
4. Analects of Confucius (論語, 6:30)
仁者,先難而後獲,可謂仁矣。
भावार्थ: जो मनुष्य पहले कठिनाई और कर्तव्य को स्वीकार करता है और बाद में फल की चिंता करता है, वही वास्तव में मानवता वाला है।
5. Analects of Confucius (論語, 8:7)
士不可以不弘毅,任重而道遠。
भावार्थ: सज्जन व्यक्ति को दृढ़ और व्यापक हृदय वाला होना चाहिए, क्योंकि उसका दायित्व बड़ा और मार्ग लंबा है।
निष्कर्ष
कन्फ्यूशियस परंपरा में मनुष्य का जीवन कर्तव्य, मानवता, आत्मसंयम और समाज के कल्याण के लिए माना गया है। यह भाव "प्राणो यज्ञेन कल्पताम्" के व्यापक अर्थ—जीवन-शक्ति को श्रेष्ठ उद्देश्य में लगाना—से
शिन्तो धर्म में प्रमाण ==
विषय "प्राणो यज्ञेन कल्पताम्" का भाव है—अर्थात् जीवन, शक्ति और कर्म को ईश्वर (दैवी सत्ता), पवित्रता और लोककल्याण के लिए समर्पित करना—तो शिंतो (神道, Shintō) परंपरा में भी प्रकृति, शुद्धि, कृतज्ञता और सामंजस्य पर बल मिलता है। ये वैदिक मंत्र की प्रत्यक्ष व्याख्या नहीं हैं, बल्कि समान आध्यात्मिक भाव व्यक्त करते हैं।
1. Kojiki (古事記)
天地初発之時、於高天原成神名。
भावार्थ: जब आकाश और पृथ्वी की उत्पत्ति हुई, तब दिव्य शक्तियों (कामी 神) का प्राकट्य हुआ।
संदेश: जीवन को दैवी व्यवस्था का अंग मानना।
2. Nihon Shoki (日本書紀)
敬神之心、不可忘也。
भावार्थ: देवताओं के प्रति श्रद्धा का भाव कभी नहीं भूलना चाहिए।
3. शिंतो शुद्धि प्रार्थना (祓詞 — Harai Kotoba)
掛けまくも畏き 伊邪那岐大神…
भावार्थ: हे महान दिव्य शक्ति, हमसे अशुद्धियों को दूर करें और हमें शुद्ध मार्ग पर चलाएँ।
4. शिंतो परंपरा का मूल भाव
清き明き心(きよきあかきこころ)
भावार्थ: शुद्ध और उज्ज्वल हृदय रखना।
संदेश: मनुष्य का जीवन आंतरिक पवित्रता और सदाचार के लिए हो।
5. शिंतो नैतिक आदर्श
神人合一(しんじんごういつ)
भावार्थ: मनुष्य और दैवी सत्ता के बीच सामंजस्य।
संदेश: जीवन को प्रकृति और दैवी व्यवस्था के साथ तालमेल में रखना।
निष्कर्ष
शिंतो धर्म में शुद्ध हृदय, प्रकृति के प्रति सम्मान, देवत्व के प्रति श्रद्धा और सामंजस्यपूर्ण जीवन को श्रेष्ठ माना गया है। यह भाव व्यापक रूप से "प्राणो यज्ञेन कल्पताम्" के उस अर्थ से मेल खाता है जिसमें जीवन-ऊर्जा को उच्च और पवित्र उद्देश्य में लगाया जाता है।
यूनानी दर्शन में ष्रमाण--
विषय "प्राणो यज्ञेन कल्पताम्" का भाव है—अर्थात् जीवन-शक्ति (प्राण) को सत्य, सदाचार और लोकहित के लिए समर्पित करना—तो यूनानी दर्शन में भी आत्मसंयम, सद्गुण और मानव-कल्याण की शिक्षा मिलती है। ये वैदिक मंत्र की प्रत्यक्ष व्याख्या नहीं हैं, बल्कि समान नैतिक भाव प्रकट करते हैं।
1. सुकरात
(प्लेटो की Apology में)
यूनानी:
ὁ δὲ ἀνεξέταστος βίος οὐ βιωτὸς ἀνθρώπῳ
भावार्थ: बिना परीक्षा किया हुआ जीवन मनुष्य के लिए योग्य जीवन नहीं है।
संदेश: जीवन को आत्मज्ञान और सत्य की खोज के लिए लगाना चाहिए।
2. प्लेटो — Republic
यूनानी:
ἀγαθὸν δὲ τὸ ὄντως ἀγαθόν
भावार्थ: वास्तविक अच्छाई ही सर्वोच्च लक्ष्य है।
संदेश: मनुष्य को अपने जीवन को उच्चष नैतिक उद्देश्य के लिए समर्पित करना चाहिए।
3. अरस्तू — Nicomachean Ethics
यूनानी:
ἡ εὐδαιμονία ἐστὶν ἐνέργεια ψυχῆς κατ' ἀρετήν
भावार्थ: श्रेष्ठ जीवन आत्मा की सद्गुणों के अनुसार सक्रियता है।
संदेश: जीवन का मूल्य सदाचारपूर्ण कर्म में है।
4. स्टोइक दर्शन
यूनानी:
ὁμολογουμένως τῇ φύσει ζῆν
भावार्थ: प्रकृति के अनुरूप जीवन जीना।
संदेश: मनुष्य को ब्रह्मांडीय व्यवस्था के साथ सामंजस्य में रहना चाहिए।
5. प्लूटार्क
यूनानी:
οὐ τὸ ζῆν ἐστὶν ἀγαθόν, ἀλλὰ τὸ εὖ ζῆν
भावार्थ: केवल जीवित रहना अच्छा नहीं, बल्कि उत्तम प्रकार से जीना अच्छा है।
निष्कर्ष
यूनानी दर्शन में आत्मज्ञान, सद्गुण, संयम, सत्य और उत्तम जीवन को सर्वोच्च माना गया है। इस दृष्टि से यह भाव "प्राणो यज्ञेन कल्पताम्" के उस व्यापक अर्थ से जुड़ता है जिसमें मनुष्य अपने जीवन और शक्ति को श्रेष्ठ उद्देश्य के लिए लगाता है।
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