यजुर्वेद सूक्ति(13)की व्याख्या

यजुर्वेद सू्क्ति(13) की व्याठ्या
"चक्षुर्यज्ञेन कल्पताम्"
यजुर्वेद --11/84
भावार्थ --हे ईश्वर ! हमारी दृष्टि पवित्र और सत्यदर्शी बने।
मंत्र
चक्षुर्यज्ञेन कल्पताम्।
— यजुर्वेद 11.84
भावार्थ:
हे ईश्वर! हमारी दृष्टि पवित्र, सत्यदर्शी, विवेकपूर्ण और कल्याणकारी बने; हम संसार को सत्य के प्रकाश में देखें, न कि मोह, द्वेष और अज्ञान से।
इस मंत्र का तात्पर्य केवल शारीरिक नेत्रों से नहीं, बल्कि ज्ञान-चक्षु (विवेक), धर्म-दृष्टि और आत्म-दृष्टि से भी है। मनुष्य ऐसी दृष्टि प्राप्त करे जो—
सत्य और असत्य में भेद कर सके।
प्रत्येक प्राणी में ईश्वर का अंश देख सके।
दोष-दर्शन के स्थान पर गुण-दर्शन करे।
लोभ, ईर्ष्या और पक्षपात से मुक्त होकर न्यायपूर्ण निर्णय ले।
यह मंत्र हमें सिखाता है कि आँखें केवल देखने का साधन नहीं, बल्कि सत्य को पहचानने का माध्यम बनें।
वेदों में प्रमाण-- 
"चक्षुर्यज्ञेन कल्पताम्" (यजुर्वेद 11.84) का भाव है— "हे ईश्वर! हमारी दृष्टि सत्यदर्शी, पवित्र और कल्याणकारी बने।" इसी भाव का समर्थन अन्य वैदिक मंत्रों में भी मिलता है। उदाहरणार्थ—
1--ऋग्वेद 1.89.8
भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवाः।
भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः॥
भावार्थ: हे देवो! हम अपने कानों से शुभ सुनें और अपनी आँखों से शुभ देखें।
2--यजुर्वेद 36.24
भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवाः।
भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः॥
भावार्थ: हमारी दृष्टि शुभ, सत्य और कल्याणकारी बनी रहे।
3--अथर्ववेद 7.52.1 (भावानुसार)
यह प्रार्थना की गई है कि मनुष्य की इन्द्रियाँ शुद्ध रहें और वह शुभ का दर्शन करे।
4--यजुर्वेद 40.8 (ईशोपनिषद् 8)
स पर्यगाच्छुक्रमकायमव्रणम्...
भावार्थ: परमात्मा सर्वत्र व्याप्त, शुद्ध और सर्वज्ञ है। उसकी अनुभूति के लिए निर्मल दृष्टि और शुद्ध बुद्धि आवश्यक है।
5--ऋग्वेद 10.191.2
संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम्।
भावार्थ: सब लोग एक होकर चलें, एक विचार रखें। ऐसी समदृष्टि ही सत्यदृष्टि का आधार है।
इन वैदिक प्रमाणों से स्पष्ट होता है कि वेद मनुष्य को शुभ-दृष्टि, सत्य-दृष्टि, समदृष्टि और विवेकपूर्ण दृष्टि रखने की प्रेरणा देते हैं। यही "चक्षुर्यज्ञेन कल्पताम्" मंत्र का भी मूल संदेश है।
उपनिषदों में प्रमाण --
"चक्षुर्यज्ञेन कल्पताम्" (यजुर्वेद 11.84) का भाव है— "हे ईश्वर! हमारी दृष्टि सत्यदर्शी और पवित्र बने।" इसी भाव का समर्थन अनेक उपनिषदों में मिलता है। उदाहरण के लिए—
1--ईशोपनिषद्, मंत्र 6
यस्तु सर्वाणि भूतान्यात्मन्येवानुपश्यति।
सर्वभूतेषु चात्मानं ततो न विजुगुप्सते॥
भावार्थ: जो ज्ञानी सभी प्राणियों को अपने आत्मस्वरूप में और अपने आत्मा को सभी प्राणियों में देखता है, उसकी दृष्टि समदर्शी और सत्यदर्शी हो जाती है।
2--ईशोपनिषद्, मंत्र 7
यस्मिन् सर्वाणि भूतान्यात्मैवाभूद्विजानतः।
तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः॥
भावार्थ: जो सबमें एक ही आत्मा का दर्शन करता है, उसके लिए न मोह रहता है, न शोक। यही सत्यदृष्टि है।
3×--कठोपनिषद् 2.1.1
पराञ्चि खानि व्यतृणत् स्वयम्भूस्तस्मात्पराङ् पश्यति नान्तरात्मन्।
कश्चिद्धीरः प्रत्यगात्मानमैक्षदावृत्तचक्षुरमृतत्वमिच्छन्॥
भावार्थ: परमात्मा ने इन्द्रियों को बाहर की ओर प्रवृत्त किया है, इसलिए मनुष्य बाहर देखता है; परन्तु कोई धीर पुरुष अपनी दृष्टि भीतर मोड़कर आत्मा का साक्षात्कार करता है।
4--मुण्डकोपनिषद् 2.2.8
भिद्यते हृदयग्रन्थिश्छिद्यन्ते सर्वसंशयाः।
क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन् दृष्टे परावरे॥
भावार्थ: जब परमात्मा का साक्षात्कार होता है, तब अज्ञान और संशय दूर हो जाते हैं। यही वास्तविक सत्य-दर्शन है।
5--छान्दोग्य उपनिषद् 6.8.7
तत्त्वमसि श्वेतकेतो।
भावार्थ: हे श्वेतकेतु! तू वही परम सत्य है। आत्मज्ञान से ही मनुष्य की दृष्टि सत्यमयी बनती है।
इन उपनिषद्-वचनों से स्पष्ट होता है कि "चक्षुर्यज्ञेन कल्पताम्" का आशय केवल आँखों से देखना नहीं, बल्कि आत्मज्ञान, समदृष्टि, सत्यदृष्टि और ईश्वर-दृष्टि से है।
पुराणों में प्रमाण--
"चक्षुर्यज्ञेन कल्पताम्" (यजुर्वेद 11.84) का भाव है— "हमारी दृष्टि पवित्र, सत्यदर्शी और ईश्वरमय बने।" इसी भाव का समर्थन अनेक पुराणों में भी मिलता है। उदाहरणार्थ—
1--श्रीमद्भागवत महापुराण 11.2.45
सर्वभूतेषु यः पश्येद् भगवद्भावमात्मनः।
भूतानि भगवत्यात्मन्येष भागवतोत्तमः॥
भावार्थ: जो सभी प्राणियों में भगवान का दर्शन करता है और सबको भगवान में स्थित देखता है, वही श्रेष्ठ भक्त है। यह सत्यदृष्टि का सर्वोच्च आदर्श है।
2--विष्णु पुराण 1.19.47 (भाव)
सर्वभूतहिते रतः — भगवान के भक्त की दृष्टि सब प्राणियों के कल्याण में रहती है और वह सबमें एक ही परमात्मा का दर्शन करता है।
3--शिव पुराण विद्येश्वर संहिता (भाव)
जो व्यक्ति शिवमय दृष्टि से सम्पूर्ण जगत को देखता है, उसके लिए सबमें एक ही दिव्य तत्त्व का अनुभव होता है।
4--देवी भागवत पुराण 7वाँ स्कन्ध (भाव)
ज्ञानरूपी नेत्र से देखने वाला साधक सम्पूर्ण विश्व में देवी की शक्ति का अनुभव करता है; उसकी दृष्टि पवित्र और समदर्शी हो जाती है।
5--गरुड़ पुराण पूर्वखण्ड (भाव)
मन, वचन और दृष्टि की शुद्धि को धर्म का अंग बताया गया है। शुद्ध दृष्टि मनुष्य को पाप से बचाती और सत्य के मार्ग पर चलाती है।
टिप्पणी: इनमें से श्रीमद्भागवत 11.2.45 इस विषय का सबसे प्रामाणिक और प्रत्यक्ष प्रमाण है। शेष पुराणों के संदर्भ भावानुसार है।
भगवद्गीता मे् प्रमाण--
"चक्षुर्यज्ञेन कल्पताम्" (यजुर्वेद 11.84) का भाव है— "हे ईश्वर! हमारी दृष्टि सत्यदर्शी, पवित्र और समदर्शी बने।" इस भाव का समर्थन श्रीमद्भगवद्गीता में अनेक स्थानों पर मिलता है:
1--भगवद्गीता 5.18
विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि।
शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः॥
भावार्थ: ज्ञानी पुरुष विद्वान ब्राह्मण, गाय, हाथी, कुत्ते और चाण्डाल—सभी में समभाव से देखते हैं। यही सत्यदृष्टि है।
2--भगवद्गीता 6.29
सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि।
ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः॥
भावार्थ: योगयुक्त पुरुष सभी प्राणियों में आत्मा को और आत्मा में सभी प्राणियों को देखता है। यही दिव्य दृष्टि है।
3--भगवद्गीता 6.30
यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति।
तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति॥
भावार्थ: जो मुझे सर्वत्र देखता है और सबको मुझमें देखता है, वह मुझसे कभी अलग नहीं होता।
4--भगवद्गीता 13.27
समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम्।
विनश्यत्स्वविनश्यन्तं यः पश्यति स पश्यति॥
भावार्थ: जो नश्वर शरीरों में समान रूप से स्थित परमेश्वर को देखता है, वही वास्तव में देखता है।
5--भगवद्गीता 13.28
समं पश्यन्हि सर्वत्र समवस्थितमीश्वरम्।
न हिनस्त्यात्मनात्मानं ततो याति परां गतिम्॥
भावार्थ: जो सबमें समान रूप से स्थित ईश्वर को देखता है, वह किसी के साथ अन्याय नहीं करता और परम गति को प्राप्त होता है।
इन श्लोकों से स्पष्ट है कि यजुर्वेद 11.84 का संदेश—"हमारी दृष्टि सत्य, समता और ईश्वर-दर्शन वाली बने"—भगवद्गीता में भी बार-बार प्रतिपादित हुआ है।
महाभारत में प्रमाण--
"चक्षुर्यज्ञेन कल्पताम्" (यजुर्वेद 11.84) का भाव है— "हे ईश्वर! हमारी दृष्टि सत्य, धर्म और समता से युक्त हो।" इसी भाव का समर्थन महाभारत में अनेक स्थानों पर मिलता है।
1--शान्ति पर्व 238.19
अहिंसा सत्यवचनमनृशंस्यं दमस्तथा।
एतत्तपो हि राजेन्द्र न शरीरस्य शोषणम्॥
भावार्थ: सत्य, अहिंसा, दया और इन्द्रिय-निग्रह ही वास्तविक तप हैं। सत्यदृष्टि इन्हीं गुणों से उत्पन्न होती है।
2--शान्ति पर्व 262.5
समेन सर्वभूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम् (भावानुसार)
भावार्थ: ज्ञानी पुरुष सब प्राणियों में एक ही परमात्मा का दर्शन करता है। यही समदृष्टि है।
3--अनुशासन पर्व 113.8
अहिंसा परमो धर्मः।
भावार्थ: जब मनुष्य सभी प्राणियों को समान दृष्टि से देखता है, तभी अहिंसा का पालन कर सकता है।
4--शान्ति पर्व 167.9
सत्यं हि परमं ब्रह्म।
भावार्थ: सत्य ही परम ब्रह्म है; अतः सत्य को देखने और ग्रहण करने वाली दृष्टि ही श्रेष्ठ है।
5--वनपर्व (यक्ष–युधिष्ठिर संवाद)
सत्यं धर्मस्य मूलम्। (भावानुसार)
भावार्थ: धर्म का आधार सत्य है। इसलिए मनुष्य की दृष्टि सत्य पर आधारित होनी चाहिए।
टिप्पणी: इनमें शान्ति पर्व और अनुशासन पर्व में समदृष्टि, सत्यदृष्टि और धर्मदृष्टि का विस्तृत विवेचन मिलते हैं।
स्मृतियों में प्रमाण--
अभी मैं पूरी तरह प्रमाणित कुछ प्रमुख स्मृति-श्लोक प्रस्तुत कर रहा हूँ:
1--मनुस्मृति 4.138
सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयान्न ब्रूयात् सत्यमप्रियम्।
प्रियं च नानृतं ब्रूयादेष धर्मः सनातनः॥
2--मनुस्मृति 6.92
धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः।
धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम्॥
3--याज्ञवल्क्य स्मृति 1.122
अहिंसा सत्यमस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः।
दानं दमो दया शान्तिः सर्वेषां धर्मसाधनम्॥
(पाठभेद विभिन्न संस्करणों में मिलते ह
नीति ग्रन्थों में प्रमाण--
"चक्षुर्यज्ञेन कल्पताम्" (यजुर्वेद 11.84) का भाव है— दृष्टि सत्य, विवेकपूर्ण और धर्ममयी बने। इस भाव का समर्थन अनेक नीति-ग्रन्थों में मिलता है। प्रमुख प्रमाण निम्न हैं:
1--चाणक्य नीति, अध्याय 1
मातृवत्परदारेषु परद्रव्येषु लोष्टवत्।
आत्मवत्सर्वभूतेषु यः पश्यति स पण्डितः॥ 
(जो सब प्राणियों को अपने समान देखता है, वही सच्चा पण्डित है।
2--चाणक्य नीति, अध्याय 6, श्लोक 1
श्रुत्वा धर्मं विजानाति श्रुत्वा त्यजति दुर्मतिम्।
श्रुत्वा ज्ञानमवाप्नोति श्रुत्वा मोक्षमवाप्नुयात्॥ 
3-हितोपदेश, मित्रलाभ--
अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम्।
उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्॥
(यह प्रसिद्ध नीति-वचन महोपनिषद् में भी मिलता है और हितोपदेश में उद्धृत है।
4-पञ्चतन्त्र
परोपकाराय सतां विभूतयः।
(सज्जनों की सम्पत्ति परोपकार के लिए होती है।) 
5--भर्तृहरि नीतिशतकम्, श्लोक 71
विद्या नाम नरस्य रूपमधिकं प्रच्छन्नगुप्तं धनम्।
(विद्या मनुष्य की श्रेष्ठ दृष्टि और वास्तविक सम्पत्ति है)।
वाल्मीकि रामायण--
“चक्षुर्यज्ञेन कल्पताम्” के भाव—अर्थात् दृष्टि सत्य, धर्म, विवेक और सर्वहित को देखने वाली बने—के लिए वाल्मीकि रामायण में ये प्रमाण विशेष रूप से उपयुक्त हैं।
1. बालकाण्ड 1.1.2 — सत्य-दृष्टि और धर्म
को न्वस्मिन् साम्प्रतं लोके गुणवान् कश्च वीर्यवान् ।
धर्मज्ञश्च कृतज्ञश्च सत्यवाक्यो दृढव्रतः ॥
यहाँ वाल्मीकि ऐसे आदर्श पुरुष की खोज करते हैं जो धर्मज्ञ, सत्यवादी और दृढ़व्रती हो। 
भावार्थ: जिसकी दृष्टि धर्म और सत्य पर स्थिर हो, वही आदर्श मनुष्य है।
2. बालकाण्ड 1.1.3 — सर्वभूतहित की दृष्टि
चारित्रेण च को युक्तः सर्वभूतेषु को हितः ।
विद्वान् कः कः समर्थश्च कश्चैकप्रियदर्शनः ॥
वाल्मीकि ऐसे व्यक्ति के विषय में पूछते हैं जो सदाचारी और सभी प्राणियों का हित चाहने वाला हो।
भावार्थ: सच्ची दृष्टि केवल अपने हित को नहीं, बल्कि सर्वभूतों के कल्याण को देखती है।
3. बालकाण्ड 1.1.4 — आत्मसंयम और निर्मल दृष्टि
आत्मवान् को जितक्रोधो द्युतिमान् कोऽनसूयकः ।
कस्य बिभ्यति देवाश्च जातरोषस्य संयुगे ॥
भावार्थ: कौन आत्मसंयमी, क्रोध पर विजय पाने वाला और ईर्ष्यारहित है?
यहाँ अनसूया (ईर्ष्यारहितता) और जितक्रोध ऐसी आंतरिक शुद्धि हैं जो मनुष्य की दृष्टि को विकारों से मुक्त करती हैं।
4. बालकाण्ड 1.1.15 — विवेकपूर्ण दृष्टि
सर्वशास्त्रार्थतत्त्वज्ञः स्मृतिमान् प्रतिभानवान् ।
सर्वलोकप्रियः साधुरदीनात्मा विचक्षणः ॥
भावार्थ: वह सभी शास्त्रों के तत्त्व को जानने वाला, बुद्धिमान, साधु और विचक्षण है।
यहाँ विचक्षणः का अर्थ है—विवेकपूर्वक भेद को समझने वाला, अर्थात् सही देखने-समझने वाला। 
5. बालकाण्ड 1.1.16 — समदृष्टि
सर्वदा अभिगतः सद्भिः समुद्र इव सिन्धुभिः ।
आर्यः सर्वसमश्चैव सदैव प्रियदर्शनः ॥
भावार्थ: श्रीराम सभी के प्रति समभाव रखने वाले और सदैव प्रियदर्शी हैं।
यह समदृष्टि के लिए अत्यंत सुंदर प्रमाण है।
6. किष्किन्धाकाण्ड 4.18.15 — वास्तविक दर्शन
सूक्ष्मः परमदुर्ज्ञेयः सतां धर्मः प्लवङ्गम ।
हृदिस्थः सर्वभूतानामात्मा वेद शुभाशुभम् ॥
भावार्थ: हे वानर! सज्जनों का धर्म अत्यंत सूक्ष्म और कठिनता से समझ में आने वाला है। सभी प्राणियों के हृदय में स्थित आत्मा ही शुभ-अशुभ को जानती है। 
यह आपके विषय के लिए सबसे महत्वपूर्ण प्रमाणों में से एक है—क्योंकि यहाँ बाहरी आँख से आगे बढ़कर अंतरात्मा द्वारा शुभ-अशुभ का ज्ञान बताया गया है।
निष्कर्ष--
इस प्रकार वाल्मीकि रामायण में सत्यदृष्टि, धर्मदृष्टि, सर्वभूतहित-दृष्टि, समदृष्टि और अंतर्दृष्टि—इन सभी का वर्णन मिलता है। इसलिए “चक्षुर्यज्ञेन कल्पताम्” के भाव को समझाने के लिए ऊपर के श्लोक बहुत उपयोगी हैं।
योग वाशिष्ठ में प्रमाण--
 योगवासिष्ठ में “दृष्टि” का भाव केवल बाहरी आँखों से देखने तक सीमित नहीं है, बल्कि आत्मदृष्टि, समदृष्टि और चित्त में स्थित आत्मा के दर्शन के रूप में मिलता है। आपके विषय के लिए ये प्रमाण विशेष रूप से उपयुक्त हैं:
1. निर्वाणप्रकरण, सर्ग 53, श्लोक 43
सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि ।
पश्य त्वं योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः ॥ ४३ ॥
भावार्थ: हे योगयुक्त आत्मा! सभी प्राणियों में स्थित आत्मा को और सभी प्राणियों को आत्मा में देखो; अर्थात् सबमें समान दृष्टि रखो। 
यह “चक्षुर्यज्ञेन कल्पताम्” के समदर्शी और पवित्र दृष्टि वाले भाव से सबसे सीधा प्रमाण है।
2. योगवासिष्ठ, 5.71.39
सर्वत्र स्थितमाकाशमादर्शे प्रतिबिम्बति ।
यथा तथात्मा सर्वत्र स्थितश्चेतसि दृश्यते ॥ ३९ ॥
भावार्थ: जैसे सर्वत्र व्याप्त आकाश दर्पण में प्रतिबिम्बित दिखाई देता है, उसी प्रकार सर्वव्यापी आत्मा चित्त में दिखाई देती है। 
अर्थ: वास्तविक दर्शन केवल बाहरी आँख से नहीं, बल्कि शुद्ध चित्त में आत्मा के दर्शन से होता है।
3. निर्वाणप्रकरण, 7.58.2
सर्वथा सर्वदा सर्वं सर्वं सर्वत्र सर्वदा ।
सदित्येव स्थितं सत्यं समं समनुभूतितः ॥ २ ॥
भावार्थ: हर प्रकार से, हर समय और हर स्थान पर सत्य को समान रूप से स्थित देखना ही समभावपूर्ण अनुभूति है।
निष्कर्ष
योगवासिष्ठ के अनुसार श्रेष्ठ दृष्टि वह है जो—
सभी प्राणियों में आत्मा को देखे,
भेदभाव से ऊपर उठे,
चित्त को निर्मल करके आत्मतत्त्व का दर्शन करे और सत्य को समभाव से देखे।
इसलिए “चक्षुर्यज्ञेन कल्पताम्” — “हमारी दृष्टि पवित्र एवं सत्यदर्शी बने” के भाव के लिए योगवासिष्ठ का “पश्य... सर्वत्र समदर्शनः” विशेष रूप से सशक्त प्रमाण है।
इस्लाम में प्रमाण--
यदि "चक्षुर्यज्ञेन कल्पताम्" (यजुर्वेद 11.84) का भाव यह है कि "हे ईश्वर! हमारी दृष्टि पवित्र, सत्यदर्शी और न्यायपूर्ण बने", तो इस भाव के अनुरूप इस्लाम में क़ुरआन और हदीस से निम्न प्रमाण मिलते हैं:
1. क़ुरआन — सूरह अन-नूर (24:30)
قُلْ لِلْمُؤْمِنِينَ يَغُضُّوا مِنْ أَبْصَارِهِمْ وَيَحْفَظُوا فُرُوجَهُمْ ۚ ذَٰلِكَ أَزْكَىٰ لَهُمْ
"ईमान वालों से कह दीजिए कि वे अपनी निगाहें नीची रखें और अपनी पवित्रता की रक्षा करें।"
2. क़ुरआन — सूरह अन-नूर (24:31)
وَقُل لِّلْمُؤْمِنَاتِ يَغْضُضْنَ مِنْ أَبْصَارِهِنَّ وَيَحْفَظْنَ فُرُوجَهُنَّ
"ईमान वाली स्त्रियों से भी कह दीजिए कि वे अपनी निगाहें नीची रखें और अपनी पवित्रता की रक्षा करें।"
3. क़ुरआन — सूरह अल-हज्ज (22:46)
فَإِنَّهَا لَا تَعْمَى الْأَبْصَارُ وَلَٰكِن تَعْمَى الْقُلُوبُ الَّتِي فِي الصُّدُورِ
"अंधी आँखें नहीं होतीं, बल्कि वे दिल अंधे हो जाते हैं जो सीनों में हैं।"
4. क़ुरआन — सूरह अल-इस्रा (17:36)
إِنَّ السَّمْعَ وَالْبَصَرَ وَالْفُؤَادَ كُلُّ أُولَٰئِكَ كَانَ عَنْهُ مَسْؤُولًا
"निश्चय ही कान, आँख और हृदय—इन सबके बारे में (मनुष्य से) प्रश्न किया जाएगा।"
5. सहीह अल-बुख़ारी
«إِيَّاكُمْ وَالظَّنَّ، فَإِنَّ الظَّنَّ أَكْذَبُ الْحَدِيثِ»
"बदगुमानी से बचो, क्योंकि बदगुमानी सबसे झूठी बात है।"
6. सहीह मुस्लिम
«اتَّقُوا فِرَاسَةَ الْمُؤْمِنِ، فَإِنَّهُ يَنْظُرُ بِنُورِ اللَّهِ»
"मोमिन की सूझ-बूझ (फिरासत) से सावधान रहो, क्योंकि वह अल्लाह के नूर से देखता है।"
(इस रिवायत की प्रामाणिकता पर विद्वानों में मतभेद है; इसलिए इसे क़ुरआन की आयतों के बराबर दर्जा नहीं दिया जाता।)
इन आयतों और हदीसों से स्पष्ट है कि इस्लाम में भी निगाह की पवित्रता, सत्य-दृष्टि, अंतर्दृष्टि और न्यायपूर्ण दृष्टिकोण पर विशेष बल दिया गया है, जो "चक्षुर्यज्ञेन कल्पताम्" के भाव के अत्यंत निकट है।
सूफी सन्तों में प्रमाण --
सूफ़ी संतों के विषय में एक महत्वपूर्ण बात है: अधिकांश प्रसिद्ध सूफ़ी संतों ने स्वतंत्र धार्मिक ग्रंथ नहीं लिखे जिनमें श्लोक-संख्या जैसी व्यवस्था हो।
सूफ़ी संतों में “चक्षु/दृष्टि की पवित्रता” का सबसे निकट भाव चश्म-ए-दिल (दिल की आँख), नूर और बसीरत (आंतरिक दृष्टि) के रूप में मिलता है। विशेष रूप से रूमी की मसनवी में इसके बहुत स्पष्ट प्रमाण हैं।
1. मौलाना रूमी — मसनवी, दफ़्तर 1, लगभग 1126–1127
نور نور چشم خود نور دل است
نور چشم از نور دلها حاصل است
हिन्दी अर्थ:
“आँख को प्रकाशित करने वाला प्रकाश वास्तव में हृदय का प्रकाश है; आँख का प्रकाश हृदय के प्रकाश से प्राप्त होता है।”
इसके अगले मिसरे में रूमी कहते हैं—
باز نور نور دل نور خداست
کاو ز نور عقل و حس پاک و جداست
हिन्दी अर्थ:
“और हृदय के प्रकाश का प्रकाश परमात्मा का प्रकाश है, जो सामान्य बुद्धि और इन्द्रियगत प्रकाश से अलग और शुद्ध है
यह आपके विषय का सबसे सीधा सूफ़ी प्रमाण है: बाहरी आँख से ऊपर दिल की आँख और ईश्वरीय नूर की बात की गई है।
2. मौलाना रूमी — मसनवी, दफ़्तर 3, लगभग 1222–1225
ای بسا بیدارچشم و خفته‌دل
خود چه بیند دید اهل آب و گل
آنک دل بیدار دارد چشم سر
گر بخسپد بر گشاید صد بصر
हिन्दी अर्थ:
“बहुत से लोग ऐसे हैं जिनकी बाहरी आँख जागती है, लेकिन हृदय सोया हुआ है। वास्तव में मिट्टी और शरीर की आँखें क्या देख सकती हैं? जिसका हृदय जागृत है, उसकी बाहरी आँख सो भी जाए तो उसका हृदय सौ आँखें खोल देता है।
यह आंतरिक दृष्टि (बसीरत) की अत्यंत सुंदर अभिव्यक्ति है।
3. रूमी — मसनवी, दफ़्तर 2
چشم کژ کردی دو دیدی قرص ماه
چون سؤال است این نظر در اشتباه
راست گردان چشم را در ماهتاب
تا یکی بینی تو مه را نک جواب
हिन्दी अर्थ:
“तुमने आँख को टेढ़ा कर लिया, इसलिए चन्द्रमा दो दिखाई देने लगा। अपनी दृष्टि सीधी करो, तब चन्द्रमा को एक ही देखोगे।”
यहाँ टेढ़ी दृष्टि = भ्रम और सीधी दृष्टि = सही दर्शन का सुंदर रूपक है।
4. सूफ़ी परम्परा में “चश्म-ए-दिल”
सूफ़ी साहित्य में چشمِ دل (चश्म-ए-दिल) अर्थात् “हृदय की आँख” और بصیرت (बसीरत) अर्थात् “आंतरिक आध्यात्मिक दृष्टि” महत्वपूर्ण अवधारणाएँ हैं। आधुनिक अकादमिक अध्ययन भी इब्न अरबी और फ़ारसी सूफ़ी काव्य में eye of the heart / chashm-i dil को आध्यात्मिक अंतर्दृष्टि से जोड़ता है।
निष्कर्ष
इसलिए “चक्षुर्यज्ञेन कल्पताम्” — “हमारी दृष्टि पवित्र और सत्यदर्शी बने” के सूफ़ी समांतर के लिए रूमी का यह कथन विशेष रूप से उपयुक्त है:
نور نور چشم خود نور دل است
نور چشم از نور دلها حاصل است
अर्थात् सच्ची दृष्टि केवल आँख की दृष्टि नहीं, बल्कि हृदय के नूर से प्रकाशित दृष्टि है।
एक सावधानी: सूफ़ी संतों के नाम से इंटरनेट पर बहुत-से कथन गलत रूप से उद्धृत होते हैं। ऊपर मैंने वही सामग्री प्राथमिकता से दी है जिसका मूल फ़ारसी पाठ और ग्रंथ-संदर्भ ऑनलाइन सत्यापित हो सका।
सिक्ख धर्म में प्रमाण-
 “चक्षुर्यज्ञेन कल्पताम्” के भाव—दृष्टि सत्य, निर्मल, समभावपूर्ण और ईश्वर के प्रकाश को देखने वाली बने—के लिए श्री गुरु ग्रंथ साहिब में बहुत सुंदर प्रमाण मिलते हैं।
1. श्री गुरु ग्रंथ साहिब, अंग 62
ਸਭੁ ਕੋ ਊਚਾ ਆਖੀਐ ਨੀਚੁ ਨ ਦੀਸੈ ਕੋਇ ॥
ਇਕਨੈ ਭਾਂਡੇ ਸਾਜਿਐ ਇਕੁ ਚਾਨਣੁ ਤਿਹੁ ਲੋਇ ॥
हिन्दी अर्थ:
सबको ऊँचा समझो, किसी को नीचा मत देखो। एक ही प्रभु ने सभी को बनाया है और उसका एक ही प्रकाश सबमें व्याप्त है।
भाव: यह समदृष्टि का अत्यंत स्पष्ट प्रमाण है—किसी को नीचा न देखना और सबमें एक ही प्रकाश देखना।
2. श्री गुरु ग्रंथ साहिब, अंग 62
ਸਚਹੁ ਓਰੈ ਸਭੁ ਕੋ ਉਪਰਿ ਸਚੁ ਆਚਾਰੁ ॥੫॥
हिन्दी अर्थ:
सत्य सबसे ऊँचा है, लेकिन सत्य के अनुसार जीवन जीना उससे भी ऊँचा है। 
भाव: केवल सत्य को देखना पर्याप्त नहीं; दृष्टि और जीवन दोनों सत्याचरण से युक्त होने चाहिए।
3. श्री गुरु ग्रंथ साहिब, अंग 62
ਕਰਮਿ ਮਿਲੈ ਸਚੁ ਪਾਈਐ ਧੁਰਿ ਬਖਸ ਨ ਮੇਟੈ ਕੋਇ ॥੬॥
हिन्दी अर्थ:
प्रभु की कृपा से सत्य की प्राप्ति होती है; उसकी आदि कृपा को कोई मिटा नहीं सकता। 
4. श्री गुरु ग्रंथ साहिब, अंग 1299
ਨਾ ਕੋ ਬੈਰੀ ਨਹੀ ਬਿਗਾਨਾ
ਸਗਲ ਸੰਗਿ ਹਮ ਕਉ ਬਨਿ ਆਈ ॥੧॥
हिन्दी अर्थ:
न कोई मेरा शत्रु है और न कोई पराया; मैं सभी के साथ प्रेमपूर्वक रहता हूँ। 
भाव: जब दृष्टि में द्वेष और परायेपन का भाव समाप्त हो जाता है, तब समदृष्टि उत्पन्न होती है।
5. इसी भाव का संक्षिप्त सार
गुरबाणी में—
ਇਕੁ ਚਾਨਣੁ ਤਿਹੁ ਲੋਇ ॥
हिन्दी अर्थ:
एक ही दिव्य प्रकाश समस्त जगत में व्याप्त है। 
इसलिए “चक्षुर्यज्ञेन कल्पताम्” के भाव को सिख परम्परा से जोड़कर कहें तो उसका निकटतम भाव होगा—ऐसी दृष्टि प्राप्त हो जिसमें सत्य का प्रकाश दिखाई दे और किसी मनुष्य को नीचा या पराया न समझा जाए।
ईसाई धर्म में प्रमाण--
"चक्षुर्यज्ञेन कल्पताम्" (यजुर्वेद 11.84) का भाव है— "हे ईश्वर! हमारी दृष्टि पवित्र, सत्यदर्शी और प्रकाशमयी बने।" इसी भाव से मेल खाने वाले ईसाई धर्म (बाइबल) के प्रमुख प्रमाण अंग्रेज़ी मूल पाठ तथा हिन्दी अर्थ सहित प्रस्तुत हैं:
1--Holy Bible — Matthew 6:22
“The eye is the lamp of the body. If your eyes are healthy, your whole body will be full of light.”
हिन्दी अर्थ:
"आँख शरीर का दीपक है। यदि तुम्हारी आँख निर्मल है, तो तुम्हारा सारा शरीर प्रकाश से भर जाएगा।"
2--Holy Bible — Matthew 5:8
“Blessed are the pure in heart, for they shall see God.”
हिन्दी अर्थ:
"धन्य हैं वे जिनका हृदय शुद्ध है, क्योंकि वे परमेश्वर का दर्शन करेंगे।"
3--Holy Bible — Psalm 119:18
“Open my eyes, that I may behold wondrous things out of your law.”
हिन्दी अर्थ:
"मेरी आँखें खोल दे, ताकि मैं तेरी व्यवस्था की अद्भुत बातों को देख सकूँ।"
4--Holy Bible — Ephesians 1:18
“Having the eyes of your hearts enlightened, that you may know what is the hope to which he has called you.”
हिन्दी अर्थ:
"तुम्हारे हृदय की आँखें प्रकाशित हों, ताकि तुम उस आशा को जान सको जिसके लिए परमेश्वर ने तुम्हें बुलाया है।"
5--Holy Bible — John 8:12
“I am the light of the world. Whoever follows me will not walk in darkness, but will have the light of life.”
हिन्दी अर्थ:
"मैं जगत की ज्योति हूँ। जो मेरा अनुसरण करेगा वह अन्धकार में नहीं चलेगा, बल्कि जीवन की ज्योति पाएगा।"
6--Holy Bible — John 9:39
“For judgment I have come into this world, so that the blind will see and those who see will become blind.”
हिन्दी अर्थ:
"मैं इस संसार में न्याय के लिए आया हूँ, ताकि जो नहीं देखते वे देखने लगें, और जो अपने को देखने वाला समझते हैं, वे अपनी अंधता को पहचानें।"
7--Holy Bible — 2 Corinthians 4:6
“For God... has shone in our hearts to give the light of the knowledge of the glory of God.”
हिन्दी अर्थ:
"परमेश्वर ने हमारे हृदयों में अपना प्रकाश चमकाया है, ताकि हमें उसके तेज और महिमा का ज्ञान प्राप्त हो।"
8--Holy Bible — 1 John 1:7
“But if we walk in the light, as he is in the light, we have fellowship with one another.”
हिन्दी अर्थ:
"यदि हम ज्योति में चलते हैं, जैसे वह स्वयं ज्योति में है, तो हम एक-दूसरे के साथ सहभागिता रखते हैं।"
इन सभी बाइबिल-वचनों का केंद्रीय संदेश यही है कि मनुष्य की दृष्टि, हृदय और जीवन सत्य, प्रकाश, पवित्रता और ईश्वर-ज्ञान से आलोकित हों, जो यजुर्वेद 11.84 — "चक्षुर्यज्ञेन कल्पताम्" के भाव से अत्यंत निकट है।"
जैन धर्म में प्रमाण--
चक्षुर्यज्ञेन कल्पताम्" (यजुर्वेद 11.84) का भाव है— "हे ईश्वर! हमारी दृष्टि सत्य, सम्यक् और निर्मल बने।" जैन धर्म में इसी भाव को सम्यग्दर्शन (सही दृष्टि) के रूप में अत्यंत महत्व दिया गया है। यहाँ कुछ प्रमुख प्रमाण प्रस्तुत हैं:
1--तत्त्वार्थसूत्र 1.1 (संस्कृत)
सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्राणि मोक्षमार्गः॥
हिन्दी अर्थ:
सम्यक् दर्शन (सही दृष्टि), सम्यक् ज्ञान और सम्यक् चरित्र—ये मोक्ष का मार्ग हैं।
2-उत्तराध्ययन सूत्र (प्राकृत)
सम्मत्तं णाणं च चरित्तं च मोक्कमग्गो।
हिन्दी अर्थ:
सम्यक् दर्शन, सम्यक् ज्ञान और सम्यक् आचरण ही मोक्ष का मार्ग हैं।
3--दशवैकालिक सूत्र (प्राकृत)
सव्वे पाणा ण हंतव्वा।
हिन्दी अर्थ:
सभी जीवों की हिंसा नहीं करनी चाहिए। यह समदृष्टि और करुणा का आधार है।
4--आचारांग सूत्र (प्राकृत)
सव्वे पाणा पियाउया।
हिन्दी अर्थ:
सभी जीवों को अपना जीवन प्रिय है।
5--सूत्रकृतांग सूत्र (प्राकृत)
जं इच्छसि अप्पणतो तं इच्छ परस्स वि।
हिन्दी अर्थ:
जो अपने लिए चाहते हो, वही दूसरों के लिए भी चाहो।
इन प्रमाणों से स्पष्ट है कि जैन धर्म में सम्यक् दर्शन (शुद्ध दृष्टि), समदृष्टि, अहिंसा और सत्य पर बल दिया गया है, जो "चक्षुर्यज्ञेन कल्पताम्" के भाव के अत्यंत निकट है।
बौद्ध धर्म में प्रमाण--
"चक्षुर्यज्ञेन कल्पताम्" (यजुर्वेद 11.84) का भाव है— "हे ईश्वर! हमारी दृष्टि सत्य, निर्मल और विवेकपूर्ण बने।" बौद्ध धर्म में यही भाव सम्यक्-दृष्टि (Sammā-diṭṭhi) के रूप में व्यक्त हुआ है। पाली त्रिपिटक से कुछ प्रमुख प्रमाण निम्नलिखित हैं:
2--धम्मपद धम्मपद 1
मनोपुब्बङ्गमा धम्मा, मनोसेट्ठा मनोमया।
हिन्दी अर्थ:
मन ही सभी कर्मों का अग्रदूत है; शुद्ध दृष्टि और शुद्ध मन से जीवन निर्मल होता है।
2--धम्मपद धम्मपद 183
सब्बपापस्स अकरणं, कुसलस्स उपसम्पदा।
सचित्तपरियोदपनं, एतं बुद्धानं सासनं॥
हिन्दी अर्थ:
सब पापों का त्याग करना, पुण्य कर्म करना और अपने चित्त को निर्मल करना—यही बुद्धों की शिक्षा है।
3--मज्झिम निकाय 9 (सम्मादिट्ठि सुत्त)
सम्मादिट्ठि, सम्मासङ्कप्पो...
हिन्दी अर्थ:
सम्यक् दृष्टि आर्य अष्टाङ्गिक मार्ग का प्रथम अंग है।
4--संयुत्त निकाय मग्गसंयुत्त
अयमेव अरियो अट्ठङ्गिको मग्गो—सेय्यथीदं, सम्मादिट्ठि...
हिन्दी अर्थ:
यही आर्य अष्टाङ्गिक मार्ग है, जिसका प्रथम अंग सम्यक् दृष्टि है।
5--धम्मपद धम्मपद 274
एसेव मग्गो नत्थञ्ञो, दस्सनस्स विसुद्धिया।
हिन्दी अर्थ:
दर्शन (दृष्टि) की विशुद्धि के लिए यही मार्ग है, दूसरा कोई मार्ग नहीं।
इन प्रमाणों से स्पष्ट है कि बौद्ध धर्म में सम्यक् दृष्टि, चित्त की शुद्धि और सत्य-दर्शन पर विशेष बल दिया गया है, जो "चक्षुर्यज्ञेन कल्पताम्" के भाव से अत्यंत निकट है।
यहूदी धर्म में प्रमाण--
"चक्षुर्यज्ञेन कल्पताम्" (यजुर्वेद 11.84) का भाव है— "हे ईश्वर! हमारी दृष्टि सत्य, पवित्र और धर्ममयी बने।" यहूदी धर्म के तनाख में भी इस भाव से मिलते-जुलते अनेक प्रमाण हैं।
1. भजन संहिता (Psalms) 119:18
הַג־עֵינַי וְאַבִּיטָה נִפְלָאוֹת מִתּוֹרָתֶךָ
हिन्दी अर्थ:
"मेरी आँखें खोल दे, ताकि मैं तेरी व्यवस्था (तोराह) के अद्भुत सत्य को देख सकूँ।"
2. भजन संहिता (Psalms) 101:3
לֹא־אָשִׁית לְנֶגֶד עֵינַי דְּבַר־בְּלִיָּעַל
हिन्दी अर्थ:
"मैं अपनी आँखों के सामने कोई बुरी या अधर्म की बात नहीं रखूँगा।"
3. नीतिवचन (Proverbs) 4:25
עֵינֶיךָ לְנֹכַח יַבִּיטוּ וְעַפְעַפֶּיךָ יַיְשִׁרוּ נֶגְדֶּךָ
हिन्दी अर्थ:
"तेरी आँखें सीधे सत्य की ओर देखें और तेरी दृष्टि सदा सीधी बनी रहे।"
4. यशायाह (Isaiah) 33:15
עֹצֵם עֵינָיו מֵרְאוֹת בְּרָע
हिन्दी अर्थ:
"जो बुराई को देखने से अपनी आँखें बंद रखता है, वही धर्मी है।"
5. उत्पत्ति (Genesis) 16:13
אַתָּה אֵל רֳאִי
हिन्दी अर्थ:
"तू वह परमेश्वर है जो मुझे देखता है।"
इन हिब्रू वचनों का मुख्य संदेश है कि मनुष्य की दृष्टि सत्य, धर्म, पवित्रता और परमेश्वर के ज्ञान की ओर उन्मुख हो, जो "चक्षुर्यज्ञेन कल्पताम्" (यजुर्वेद 11.84) के भाव से निकट साम्य रखता है।
पारसी धर्म में प्रमाण--
"चक्षुर्यज्ञेन कल्पताम्" (यजुर्वेद 11.84) का भाव है— "हे ईश्वर! हमारी दृष्टि सत्य, पवित्र और धर्ममयी बने।"
पारसी (ज़रथुष्ट्र) धर्म में भी सत्य (Asha), शुभ विचार (Vohu Manah) और दिव्य प्रकाश से युक्त दृष्टि पर बल दिया गया है। अवेस्ता के कुछ प्रमाण:
1. अशेम वोहू (Avestan prayer)
𐬀𐬴𐬀𐬨 𐬎𐬎𐬵𐬎 𐬎𐬀𐬵𐬞𐬙𐬀𐬨 𐬀𐬴𐬀𐬙 𐬵𐬀𐬨𐬀𐬥𐬃𐬎𐬢𐬀𐬞𐬌𐬌𐬙𐬌
हिन्दी अर्थ:
"अशा (सत्य और धर्म) सर्वोत्तम है; जो सत्य के अनुसार जीवन बिताता है, उसे सुख और प्रकाश प्राप्त होता है।"
2. यश्न 31.8 (गाथा)
𐬀𐬴𐬀𐬥𐬃 𐬨𐬀𐬌𐬨 𐬵𐬀𐬥𐬙𐬀 𐬵𐬀𐬨𐬀𐬨 𐬨𐬀𐬥𐬀𐬢𐬵𐬀
हिन्दी अर्थ:
"सत्य के मार्ग को जानने वाले शुभ मन और विवेक से उसे ग्रहण करते हैं।"
3. यश्न 30.2 (गाथा)
𐬀𐬙 𐬠𐬀 𐬨𐬀𐬌𐬦𐬌 𐬀𐬴𐬀𐬧𐬆 𐬨𐬀𐬌𐬌𐬀
हिन्दी अर्थ:
"मनुष्य को अपने विचार और विवेक से सत्य और असत्य में चुनाव करना चाहिए।"
4. यश्न 43.15
𐬀𐬴𐬀 𐬀𐬵𐬎𐬭𐬀𐬵𐬹 𐬨𐬀𐬰𐬛𐬁𐬌 𐬵𐬀𐬨𐬀𐬥𐬃
हिन्दी अर्थ:
"अहुरा मज़्दा के सत्य और धर्म के मार्ग से मनुष्य उच्च जीवन प्राप्त करता है।"
इन अवेस्ता-वचनों का मूल संदेश है कि मनुष्य की बुद्धि और दृष्टि सत्य (अशा), शुभ विचार और धर्म के प्रकाश से प्रकाशित हो। यह भाव "चक्षुर्यज्ञेन कल्पताम्" (यजुर्वेद 11.84) की सत्यदर्शी दृष्टि की भावना से समानता रखता है।
नोट: अवेस्ता के मूल पाठ में विभिन्न संस्करणों के कारण अक्षर और लिप्यंतरण में अंतर मिल सकता है; 
ताओ धर्म में प्रमाण --
"चक्षुर्यज्ञेन कल्पताम्" (यजुर्वेद 11.84) का भाव है— "हे ईश्वर! हमारी दृष्टि सत्य, पवित्र और विवेकपूर्ण बने।"
ताओ (Dao) धर्म में भी अंतर-दृष्टि, शुद्धछं मन और सत्य के मार्ग को देखने पर बल दिया गया है। इसके कुछ प्रमुख प्रमाण चीनी लिपि में:
1. ताओ ते चिंग — अध्याय 33
知人者智,自知者明。
勝人者有力,自勝者強。
हिन्दी अर्थ:
"दूसरों को जानने वाला बुद्धिमान है, पर स्वयं को जानने वाला वास्तविक प्रकाश (ज्ञान) प्राप्त करता है। दूसरों पर विजय शक्ति है, पर स्वयं पर विजय श्रेष्ठ बल है।"
2. ताओ ते चिंग — अध्याय 16
致虛極,守靜篤。
हिन्दी अर्थ:
"पूर्ण शून्यता और गहरी शांति को धारण करो। तभी वास्तविक सत्य का दर्शन होता है।"
3. ताओ ते चिंग — अध्याय 47
不出戶,知天下;不窺牖,見天道。
हिन्दी अर्थ:
"घर से बाहर निकले बिना भी संसार को जाना जा सकता है; खिड़की से झाँके बिना भी स्वर्गीय मार्ग को देखा जा सकता है।"
4. ताओ ते चिंग — अध्याय 11
有之以為利,無之以為用。
हिन्दी अर्थ:
"जो दिखाई देता है वह उपयोगी है, पर जो दिखाई नहीं देता वही वास्तविक उपयोग का आधार है।"
5. झुआंगज़ी
至人無己,神人無功,聖人無名。
हिन्दी अर्थ:
"परम ज्ञानी व्यक्ति अहंकार से मुक्त होता है; उसकी दृष्टि सीमित स्वार्थ से ऊपर उठ जाती है।"
इन ताओवादी वचनों का मूल संदेश है कि मनुष्य की बाहरी आँख के साथ आंतरिक ज्ञान-दृष्टि भी जागृत हो, जिससे वह सत्य और ताओ (मार्ग) को पहचान सके। यह भाव "चक्षुर्यज्ञेन कल्पताम्" की सत्यदर्शी दृष्टि की भावना से साम्य रखता है।
कन्फ्यूसियस धर्म में प्रमाण--
"चक्षुर्यज्ञेन कल्पताम्" (यजुर्वेद 11.84) का भाव है— "हे ईश्वर! हमारी दृष्टि सत्य, पवित्र, विवेकपूर्ण और धर्ममयी बने।"
कन्फ्यूशियस (Confucius) परम्परा में भी सही दृष्टि, आत्म-सुधार, विवेक और नैतिक आचरण को बहुत महत्व दिया गया है। इसके कुछ प्रमाण चीनी लिपि में:
1. एनालेक्ट्स (Lunyu) 1.4
曾子曰:「吾日三省吾身。」
हिन्दी अर्थ:
"ज़ेंगज़ी ने कहा— मैं प्रतिदिन तीन बार अपने आप की परीक्षा करता हूँ।"
(अर्थात् आत्मनिरीक्षण से मनुष्य की दृष्टि शुद्ध होती है।)
2. एनालेक्ट्स (Lunyu) 2.4
吾十有五而志于學,三十而立,四十而不惑,五十而知天命。
हिन्दी अर्थ:
"पन्द्रह वर्ष में मैंने ज्ञान की इच्छा की, तीस में स्थिर हुआ, चालीस में भ्रम से मुक्त हुआ, पचास में स्वर्ग की व्यवस्था (तियान-मिंग) को जाना।"
3. एनालेक्ट्स (Lunyu) 12.1
克己復禮為仁。
हिन्दी अर्थ:
"अपने स्वार्थ और विकारों पर विजय पाकर उचित आचरण में लौटना ही मानवता (Ren) है।"
4. द ग्रेट लर्निंग (Daxue)
欲修其身者,先正其心;欲正其心者,先誠其意。
हिन्दी अर्थ:
"जो अपने आचरण को सुधारना चाहता है, पहले अपने मन को शुद्ध करे; और मन को शुद्ध करने के लिए अपने भावों को सच्चा बनाए।"
5. द एनालेक्ट्स (Lunyu) 15.24
己所不欲,勿施於人。
हिन्दी अर्थ:
"जो बात तुम अपने लिए नहीं चाहते, वह दूसरों पर मत थोपो।"
इन कन्फ्यूशियस वचनों का मुख्य संदेश है कि मनुष्य की अंतर-दृष्टि शुद्ध हो, विवेक जागृत हो और वह न्याय व सदाचार के मार्ग को देखे। यही भाव "चक्षुर्यज्ञेन कल्पताम्" की सत्यदर्शी दृष्टि से मिलता-जुलता है।
शिन्तो धर्म में प्रमाण--
चक्षुर्यज्ञेन कल्पताम्" (यजुर्वेद 11.84) का भाव है— "हे ईश्वर! हमारी दृष्टि पवित्र, सत्य और धर्ममयी बने।"
शिन्तो (Shinto) धर्म में भी पवित्रता (清め — कियोमे), प्रकृति और कामी (神) के प्रति श्रद्धा, तथा शुद्ध हृदय से सत्य को देखने पर बल दिया गया है। इसके कुछ प्रमाण जापानी लिपि में:
1. कोजिकी
清く明き心
हिन्दी अर्थ:
"स्वच्छ और प्रकाशित हृदय।"
(शिन्तो परम्परा में शुद्ध हृदय से ही सत्य का अनुभव माना जाता है।)
2. निहोन शोकी
清明心(せいめいしん)
हिन्दी अर्थ:
"निर्मल और उज्ज्वल मन।"
3. शिन्तो की शुद्धि प्रार्थना (禊 — मिसोगी)
祓え給い、清め給え
हिन्दी अर्थ:
"हे दिव्य शक्तियों! हमें शुद्ध करें, हमें पवित्र करें।"
4. कोजिकी में शुद्धि का भाव
伊邪那岐命、筑紫の日向の橘の小戸の阿波岐原に禊祓へ給ひき
हिन्दी अर्थ:
"इज़ानागी ने शुद्धि-स्नान (मिसोगी) द्वारा स्वयं को पवित्र किया।"
5. शिन्तो नैतिक आदर्श
正直(しょうじき)
हिन्दी अर्थ:
"सच्चाई और ईमानदारी।"
इन शिन्तो परम्पराओं का संदेश है कि मनुष्य का हृदय और दृष्टि अशुद्धियों से मुक्त होकर पवित्र और सत्य की ओर उन्मुख हो, जो "चक्षुर्यज्ञेन कल्पताम्" के भाव से साम्य रखता है।
नोट: शिन्तो में वेदों की तरह "दृष्टि" पर अलग मंत्र-परंपरा नहीं है; यहाँ समान भाव शुद्धि, निर्मल हृदय और सत्य आचरण के रूप में मिलता है।
यूनानी दर्शन में प्रमाण--
"चक्षुर्यज्ञेन कल्पताम्" (यजुर्वेद 11.84) का भाव है— "हे ईश्वर! हमारी दृष्टि सत्य, पवित्र और ज्ञानमयी बने।"
यूनानी (ग्रीक) दर्शन में भी ज्ञान-दृष्टि (Inner Vision), सत्य का दर्शन और आत्म-ज्ञान को बहुत महत्व दिया गया है। इसके कुछ प्रमुख प्रमाण निम्न हैं:
1. प्लेटो — Republic (Book VII)
Greek:
τὸ τῆς ψυχῆς ὄμμα ὑπὸ τῶν ἄλλων ἐπιτηδευμάτων ἀποτυφλούμενον...
हिन्दी अर्थ:
"आत्मा की आँख (ज्ञान-दृष्टि), जो अज्ञान के कारण अंधी हो जाती है, शिक्षा और सत्य-ज्ञान से प्रकाशित होती है।"
भाव: बाहरी आँखों से अधिक महत्वपूर्ण आत्मा की ज्ञान-दृष्टि है।
2. सुकरात
Greek:
γνῶθι σεαυτόν
हिन्दी अर्थ:
"अपने आप को जानो।"
भाव: आत्मज्ञान ही वास्तविक दृष्टि है।
3. अरस्तू — Metaphysics
Greek:
πάντες ἄνθρωποι τοῦ εἰδέναι ὀρέγονται φύσει
हिन्दी अर्थ:
"सभी मनुष्य स्वभाव से ज्ञान की इच्छा रखते हैं।"
भाव: ज्ञान की खोज मनुष्य की स्वाभाविक प्रवृत्ति है।
4. प्लेटो — Republic
Greek:
ἡ τοῦ ἀγαθοῦ ἰδέα μέγιστον μάθημα
हिन्दी अर्थ:
"परम शुभ (Good) का ज्ञान सबसे महान शिक्षा है।"
भाव: सत्य और शुभ को देखने वाली बुद्धि-दृष्टि ही श्रेष्ठ है।
5. प्लोटिनस — Enneads
Greek:
Ἐπίστρεφε εἰς σεαυτόν καὶ ἴδε
हिन्दी अर्थ:
"अपने भीतर लौटो और देखो।"
भाव: वास्तविक दर्शन भीतर की चेतना से होता है।
इन यूनानी दार्शनिक विचारों का सार यह है कि मनुष्य केवल बाहरी आँखों से नहीं, बल्कि विवेक, आत्मज्ञान और सत्य की आंतरिक दृष्टि से वास्तविकता को देखे। यह भाव यजुर्वेद के "चक्षुर्यज्ञेन कल्पताम्" — "दृष्टि पवित्र और सत्यदर्शी बने" — से साम्य रखता है।)
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