यजुर्वेद सूक्ति(11) की व्याख्या
यजुर्वेद सूक्ति(11) की व्याख्या
"आयुर्यज्ञेन कल्पताम्"
यजुर्वेद--11/84
भावार्थ--हे ईश्वर! हमारी आयु श्रेष्ठ बने। यजुर्वेद 11/84 (कुछ पाठ-परंपराओं में क्रमांकन भिन्न हो सकता है) का पूरा मंत्र इस प्रकार ह,--
आयुर्यज्ञेन कल्पतां प्राणो यज्ञेन कल्पतां चक्षुर्यज्ञेन कल्पतां श्रोत्रं यज्ञेन कल्पताम्।
वाग्यज्ञेन कल्पतां मनो यज्ञेन कल्पतामात्मा यज्ञेन कल्पतां पृष्ठं यज्ञेन कल्पताम्।
ब्रह्म यज्ञेन कल्पतां यज्ञो यज्ञेन कल्पतां ज्योतिर्यज्ञेन कल्पतां स्वर्यज्ञेन कल्पताम्॥
अर्थ:
हे परमात्मन्! यज्ञमय, धर्ममय और सत्कर्ममय जीवन के द्वारा—
हमारी आयु श्रेष्ठ बने।
हमारे प्राण बलवान हों।
हमारी दृष्टि (चक्षु) पवित्र और सत्यदर्शी बने।
हमारी श्रवण-शक्ति (कान) शुभ वचनों को ग्रहण करने वाली बने।
हमारी वाणी सत्य और हितकारी बने।
हमारा मन शुद्ध और संयमित बने।
हमारी आत्मा (अंतरात्मा) पवित्र और उन्नत बने।
हमारा शरीर सुदृढ़ बने।
हमारा ब्रह्मज्ञान विकसित हो।
हमारा यज्ञरूप धर्माचरण सिद्ध और सफल हो।
हमारा ज्योतिर्मय ज्ञान बढ़े।
हम स्वर्गीय (श्रेष्ठ, दिव्य) सुख और कल्याण को प्राप्त हों।
यह मंत्र सिखाता है कि यज्ञ का व्यापक अर्थ केवल अग्निहोत्र नहीं, बल्कि त्याग, सेवा, कर्तव्यपालन, सत्कर्म और ईश्वरार्पित जीवन है। ऐसे जीवन से मनुष्य की आयु, प्राण, इन्द्रियाँ, मन, आत्मा और ज्ञान—सबका कल्याण।
वेदों में प्रमाण--
1--यजुर्वेद 11/84 — "आयुर्यज्ञेन कल्पताम्" का मुख्य भाव है कि यज्ञ (सत्कर्म, त्याग, लोककल्याण और ईश्वर-समर्पित कर्म) से आयु, प्राण, बल और जीवन का कल्याण होता है। इसी भाव की पुष्टि अन्य वैदिक मंत्रों में भी मिलती है। उदाहरणार्थ—
2--ऋग्वेद 1.89.9
शतं इन्नु शरदो अन्ति देवाः...
भावार्थ: हे देवो! हमें सौ वर्ष तक स्वस्थ, प्रसन्न और पूर्ण जीवन प्राप्त हो।
3--यजुर्वेद 36.24
पश्येम शरदः शतम्, जीवेम शरदः शतम्...
भावार्थ: हम सौ वर्ष तक देखें, जिएँ, सुनें, बोलें और निरोग रहें।
4--अथर्ववेद 19.67.1
पश्येम शरदः शतम्, जीवेम शरदः शतम्...
: दीर्घायु, स्वास्थ्य और कल्याण की प्रार्थना।
5--ऋग्वेद 10.191.2
सं गच्छध्वं सं वदध्वं...
भावार्थ: मिलकर चलो, मिलकर बोलो और एकता से कार्य करो। यही यज्ञमय जीवन का आधार है।
6--यजुर्वेद 40.2
कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः।
भावार्थ: मनुष्य को सत्कर्म करते हुए सौ वर्ष तक जीने की इच्छा करनी चाहिए।
इन सभी वैदिक प्रमाणों का निष्कर्ष यही है कि धर्मयुक्त कर्म, यज्ञ, संयम और लोकहितकारी जीवन मनुष्य को दीर्घायु, स्वास्थ्य, बल और आध्यात्मिक उन्नति प्रदान करते हैं। यही संदेश "आयुर्यज्ञेन कल्पताम्" का है।
उपनिषदों में ष्रमाण--
यजुर्वेद 11/84 — "आयुर्यज्ञेन कल्पताम्" का भाव है कि यज्ञमय (त्याग, तप, सत्कर्म और ईश्वर-समर्पित) जीवन से आयु, प्राण, मन और आत्मा का कल्याण होता है। उपनिषदों में भी यही सिद्धांत अनेक स्थानों पर मिलता है।उदाहरण के लिए--
1-ईशावास्य उपनिषद् (मंत्र 2)
कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः।
भावार्थ: मनुष्य को निष्काम भाव से कर्म करते हुए सौ वर्ष तक जीने की इच्छा करनी चाहिए।
2--तैत्तिरीय उपनिषद् (शिक्षावल्ली 1.11.1)
सत्यं वद। धर्मं चर।
भावार्थ: सत्य बोलो, धर्म का आचरण करो। यही जीवन को श्रेष्ठ और कल्याणकारी बनाता है।
3--कठ उपनिषद् (1.2.23)
नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो...
भावार्थ: आत्मा की प्राप्ति उसी को होती है जो सत्य, तप और ईश्वर के प्रति समर्पित होता है।
4--छान्दोग्य उपनिषद् (7.26.2)
आहारशुद्धौ सत्त्वशुद्धिः, सत्त्वशुद्धौ ध्रुवा स्मृतिः।
भावार्थ: शुद्ध आहार और शुद्ध आचरण से मन शुद्ध होता है, और मन की शुद्धि से आत्मिक उन्नति होती है।
5--मुण्डक उपनिषद् (1.2.13)
तद्विज्ञानार्थं स गुरुमेवाभिगच्छेत्...
भावार्थ: ब्रह्मज्ञान के लिए गुरु के पास जाकर तप, श्रद्धा और अनुशासन से ज्ञान प्राप्त करना चाहिए।
इन उपनिषदों का सार यह है कि धर्मयुक्त कर्म, सत्य, तप, आत्मसंयम और ईश्वर-समर्पित जीवन ही मनुष्य की आयु, प्राण, मन और आत्मा को उन्नत बनाते हैं। यही विचार "आयुर्यज्ञेन कल्पताम्" (यजुर्वेद 11/84) के भाव का उपनिषदों में विस्तार है। पुराणों में प्रमाण-=
यजुर्वेद 11/84 — "आयुर्यज्ञेन कल्पताम्" का भाव है कि यज्ञ, धर्म और सत्कर्म से आयु, प्राण तथा जीवन का कल्याण होता है। पुराणों में भी यज्ञ, दान, तप और धर्माचरण को आयु, आरोग्य तथा लोक-परलोक के कल्याण का कारण बताया गया है। उदाहरणस्वरूप—
1--विष्णु पुराण (3.8)
यज्ञो हि भगवान् विष्णुः।
भावार्थ: यज्ञ स्वयं भगवान विष्णु का स्वरूप है। अतः यज्ञ का पालन ईश्वर की उपासना और लोककल्याण है।
2--भागवत महापुराण (11.5.32)
यज्ञैः सङ्कीर्तनप्रायैर्यजन्ति हि सुमेधसः।
भावार्थ: बुद्धिमान लोग यज्ञरूप ईश्वर-आराधना द्वारा परम कल्याण प्राप्त करते हैं।
3--गरुड़ पुराण (पूर्वखण्ड)
भावार्थ: धर्म, दान, यज्ञ और तप से मनुष्य की आयु, यश, आरोग्य और पुण्य की वृद्धि होती है।
4--अग्नि पुराण
भावार्थ: यज्ञ, होम और देवपूजन से पापों का क्षय तथा आयु और समृद्धि की वृद्धि होती है।
5--पद्म पुराण
भावार्थ: धर्मयुक्त यज्ञ, दान और तप करने वाला मनुष्य दीर्घायु, सुख और अंततः मोक्ष का अधिकारी होता है।
महत्वपूर्ण टिप्पणी:
ऊपर दिए गए पहले दो उद्धरण प्रसिद्ध और व्यापक रूप से उद्धृत हैं। जबकि गरुड़ पुराण, अग्नि पुराण और पद्म पुराण के भावार्थ संबंधित अध्यायों की शिक्षाओं का सार हैं;
भगवद्गीता मैं प्रमाण--
यजुर्वेद 11/84 — "आयुर्यज्ञेन कल्पताम्" का भाव है कि यज्ञमय जीवन (निष्काम कर्म, त्याग, ईश्वर-समर्पण और लोककल्याण) से जीवन की उन्नति होती है। श्रीमद्भगवद्गीता में इस भाव की पुष्टि अनेक श्लोकों में मिलती है:
1--गीता 3.9
यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः।
तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसङ्गः समाचर॥
भावार्थ: यज्ञ (ईश्वर और लोककल्याण) के लिए किए गए कर्म बन्धनरहित होते हैं; इसलिए आसक्ति छोड़कर कर्म करो।
2--गीता 3.10
सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः।
अनेन प्रसविष्यध्वमेष वोऽस्त्विष्टकामधुक्॥
भावार्थ: सृष्टि के आरम्भ में प्रजापति ने यज्ञ के साथ प्रजा की रचना की और कहा—यज्ञ के द्वारा उन्नति करो; यही तुम्हारी इच्छाओं की पूर्ति का साधन होगा।
3--गीता 3.11
देवान्भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः।
परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ॥
भावार्थ: यज्ञ द्वारा देवताओं का पोषण करो; वे तुम्हारा पोषण करेंगे। परस्पर सहयोग से परम कल्याण प्राप्त होगा।
4--गीता 4.24
ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम्।
ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना॥
भावार्थ: यज्ञ की प्रत्येक क्रिया ब्रह्मस्वरूप है। इस भाव से कर्म करने वाला परम सत्य को प्राप्त होता है।
5--गीता 4.31
यज्ञशिष्टामृतभुजो यान्ति ब्रह्म सनातनम्।
नायं लोकोऽस्त्ययज्ञस्य कुतोऽन्यः कुरुसत्तम॥
भावार्थ: यज्ञशेष का सेवन करने वाले सनातन ब्रह्म को प्राप्त होते हैं। जो यज्ञमय जीवन नहीं जीता, उसका यह लोक भी सफल नहीं होता।
निष्कर्ष:
गीता के ये श्लोक स्पष्ट करते हैं कि यज्ञ केवल अग्निहोत्र नहीं, बल्कि निष्काम कर्म, त्याग, ईश्वर-समर्पण और लोककल्याण का सिद्धांत है। यही संदेश "आयुर्यज्ञेन कल्पताम्" (यजुर्वेद 11/84) में भी निहित है।
महाभारत में प्रमाण--
यजुर्वेद 11/84 — "आयुर्यज्ञेन कल्पताम्" का भाव है कि यज्ञ, धर्म और सत्कर्म से आयु, प्राण तथा जीवन का कल्याण होता है। महाभारत में भी इस सिद्धांत की पुष्टि अनेक स्थानों पर मिलती है।
1--शान्ति पर्व 262.5
यज्ञो हि श्रेष्ठतमं कर्म।
भावार्थ: यज्ञ मनुष्य के श्रेष्ठतम कर्मों में से एक है और लोककल्याण का आधार है।
2--शान्ति पर्व 109.10
धर्मेण आयुः प्रजाः कीर्तिर्वर्धते नात्र संशयः।
भावार्थ: धर्म के आचरण से आयु, प्रजा (समृद्धि) और कीर्ति बढ़ती है।
3--अनुशासन पर्व 88.3
यज्ञदानतपो नित्यं कर्तव्यं भूतिमिच्छता।
भावार्थ: जो व्यक्ति कल्याण चाहता है, उसे यज्ञ, दान और तप का नित्य पालन करना चाहिए।
4--वन पर्व 313.117
धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः।
भावार्थ: धर्म का पालन करने वाला धर्म द्वारा संरक्षित होता है; धर्म ही जीवन और कल्याण का आधार है।
5--शान्ति पर्व 193.31
अहिंसा सत्यमक्रोधो दानमेतच्चतुष्टयम्।
भावार्थ: अहिंसा, सत्य, क्रोध का त्याग और दान—ये धर्म के मुख्य आधार हैं और जीवन को श्रेष्ठ बनाते हैं।
ध्यान दें: ऊपर दिए गए भाव महाभारत की धर्म-शिक्षाओं का प्रतिनिधित्व करते हैं।
स्मृतियों में प्रमाण--
यजुर्वेद 11/84 — "आयुर्यज्ञेन कल्पताम्" का भाव है कि यज्ञ, धर्म, संयम और सत्कर्म से आयु, आरोग्य और जीवन का कल्याण होता है। स्मृति-ग्रंथों में भी यही सिद्धांत मिलता है।
कुछ प्रमुख प्रमाण:
1--मनुस्मृति (अध्याय 4, श्लोक 138)
धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः।
तस्माद्धर्मो न हन्तव्यो मा नो धर्मो हतोऽवधीत्॥
भावार्थ: धर्म की रक्षा करने वाले की धर्म रक्षा करता है। धर्म ही जीवन और कल्याण का आधार है।
2--मनुस्मृति (अध्याय 2, श्लोक 224)
वेदोऽखिलो धर्ममूलम्।
भावार्थ: समस्त वेद धर्म का मूल स्रोत हैं; अतः वेदविहित यज्ञ और धर्म का पालन कल्याणकारी है।
3--याज्ञवल्क्य स्मृति (1.7)
इज्याचारदमाहिंसा दानं स्वाध्यायकर्म च।
भावार्थ: यज्ञ, सदाचार, अहिंसा, दान और स्वाध्याय मनुष्य के प्रमुख धर्म हैं।
4--पराशर स्मृति
यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यं।
भावार्थ: यज्ञ, दान और तप का त्याग नहीं करना चाहिए; ये जीवन को पवित्र और कल्याणकारी बनाते हैं।
5--अत्रि स्मृति
धर्मेण आयुः यशः श्रीश्च वर्धते।
भावार्थ: धर्म के पालन से आयु, यश और समृद्धि की वृद्धि होती है।
महत्वपूर्ण टिप्पणी:
इनमें से मनुस्मृति 2.224 का उद्धरण प्रमाणित है। शेष के विषय में विभिन्न संस्करणों में पाठ और श्लोक-संख्या में अंतर मिलता है।
नीति ग्रन्थों में प्रमाण--
यजुर्वेद 11/84 — "आयुर्यज्ञेन कल्पताम्" का भाव है कि यज्ञ, धर्म, सदाचार और सत्कर्म से आयु, यश तथा जीवन का कल्याण होता है। यही शिक्षा अनेक नीति-ग्रंथों में भी मिलती है।
1. विदुरनीति
धर्मेण लभते सर्वं धर्मसारमिदं जगत्।
भावार्थ: धर्म से ही सभी प्रकार का कल्याण प्राप्त होता है; धर्म ही जीवन का सार है।
2. चाणक्य नीति (अध्याय 1)
धर्मेण धार्यते लोकः।
भावार्थ: समस्त संसार धर्म से ही धारण किया जाता है; धर्मयुक्त जीवन ही सुख और उन्नति का कारण है।
3. हितोपदेश
धर्मेण जयते लोकः।
भावार्थ: धर्म के द्वारा ही मनुष्य संसार में विजय और सम्मान प्राप्त करता है।
4. पञ्चतन्त्र
धर्मो मित्रं मृतस्य च।
भावार्थ: मृत्यु के बाद भी मनुष्य के साथ रहने वाला सच्चा मित्र केवल धर्म है।
5. भर्तृहरि नीति शतक (श्लोक 31)
प्राणाघातान्निवृत्तिः परधनहरणे संयमः सत्यवाक्यम्...
भावार्थ: अहिंसा, सत्य, संयम और परोपकार ही श्रेष्ठ जीवन के आधार हैं; यही दीर्घकालिक कल्याण का मार्ग है।
वाल्मकि रामायण--
यजुर्वेद 11/84 — "आयुर्यज्ञेन कल्पताम्" का भाव है कि यज्ञ, धर्म, तप और सदाचार से जीवन का कल्याण होता है। वाल्मीकि रामायण में भी यह सिद्धांत अनेक स्थानों पर मिलता है।
कुछ प्रमाण:
1--बालकाण्ड 1.8
ऋष्यशृङ्गं पुरस्कृत्य यक्ष्यते सुमहायशाः।
भावार्थ: महाराज दशरथ ने ऋष्यशृंग के द्वारा पुत्रकामेष्टि यज्ञ कराया, जिससे उन्हें पुत्र-प्राप्ति का शुभ फल मिला।
2-बालकाण्ड 14.1
ततो यज्ञे समाप्ते तु ऋतूनां षट् समत्ययुः।
भावार्थ: यज्ञ सम्पन्न होने पर उचित समय में भगवान राम सहित चारों पुत्रों का जन्म हुआ। इससे यज्ञ के शुभ और कल्याणकारी फल का वर्णन मिलता है।
3--अयोध्याकाण्ड 109.25
धर्मो हि परमो लोके धर्मे सत्यं प्रतिष्ठितम्।
भावार्थ: इस संसार में धर्म ही सर्वोपरि है; सत्य और कल्याण धर्म पर ही आधारित हैं।
4--अरण्यकाण्ड 10.30
धर्मादर्थः प्रभवति धर्मात्प्रभवते सुखम्।
भावार्थ: धर्म से अर्थ और धर्म से ही सुख की प्राप्ति होती है।
5--उत्तरकाण्ड रामराज्य का वर्णन करते हुए कहा गया है कि धर्मपालन के कारण प्रजा दीर्घायु, निरोग और सुखी थी।
योग वाशिष्ठ में प्रमाण--
यजुर्वेद 11/84 — "आयुर्यज्ञेन कल्पताम्" का भाव है कि यज्ञ (सत्कर्म), मन की शुद्धि, आत्मज्ञान और धर्ममय जीवन से मनुष्य का कल्याण होता है। योगवासिष्ठ में भी इसी भाव का प्रतिपादन मिलता है।
हालाँकि, योगवासिष्ठ में "आयुर्यज्ञेन कल्पताम्" पर प्रत्यक्ष श्लोक नहीं है, बल्कि उसके भाव के अनुरूप शिक्षाएँ हैं। उदाहरण:
1--वैराग्य प्रकरण
चित्तमेव हि संसारस्तत्प्रयत्नेन शोधयेत्।
भावार्थ: मन ही संसार का कारण है; इसलिए मन को शुद्ध करना चाहिए। मन की शुद्धि ही वास्तविक कल्याण का मार्ग है।
मुमुक्षु व्यवहार प्रकरण
शुभेन पौरुषेणाशु शुभमासाद्यते फलम्।
भावार्थ: शुभ पुरुषार्थ और सत्कर्म से शुभ फल की प्राप्ति होती है।
3--उत्पत्ति प्रकरण
मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः।
भावार्थ: मनुष्य के बन्धन और मोक्ष का कारण मन ही है; शुद्ध मन कल्याण का कारण है।
3--उपशम प्रकरण
शमः सन्तोषविचारश्च साधुसङ्गश्चतुर्थकः।
भावार्थ: शान्ति, संतोष, विचार और सत्संग—ये जीवन को उन्नत करने वाले साधन हैं।
4--निर्वाण प्रकरण
ज्ञानेनैव परं श्रेयः।
भावार्थ: आत्मज्ञान ही परम कल्याण का मार्ग है।
इस्लाम धर्य में प्रमाण--
यदि आपका आशय यजुर्वेद 11/84 — "आयुर्यज्ञेन कल्पताम्" (अर्थ: यज्ञ/सत्कर्म, ईश्वर-समर्पण और धर्ममय जीवन से आयु सार्थक और कल्याणकारी बने) से है, तो इस भाव के समर्थन में इस्लाम के कुछ प्रमाण अरबी मूल के साथ प्रस्तुत हैं:
1. क़ुरआन — नेक कर्म और उत्तम जीवन
مَنْ عَمِلَ صَالِحًا مِّن ذَكَرٍ أَوْ أُنثَىٰ وَهُوَ مُؤْمِنٌ فَلَنُحْيِيَنَّهُ حَيَاةً طَيِّبَةً
(سورة النحل 16:97)
अर्थ: जो पुरुष या स्त्री ईमान के साथ नेक कर्म करेगा, हम उसे उत्तम जीवन प्रदान करेंगे।
2. क़ुरआन — इबादत ही जीवन का उद्देश्य
وَمَا خَلَقْتُ الْجِنَّ وَالْإِنسَ إِلَّا لِيَعْبُدُونِ
(سورة الذاريات 51:56)
अर्थ: मैंने जिन्न और इंसानों को केवल अपनी इबादत के लिए पैदा किया है।
3. क़ुरआन — नमाज़, क़ुर्बानी और जीवन अल्लाह के लिए
قُلْ إِنَّ صَلَاتِي وَنُسُكِي وَمَحْيَايَ وَمَمَاتِي لِلَّهِ رَبِّ الْعَالَمِينَ
(سورة الأنعام 6:162)
अर्थ: कह दीजिए, मेरी नमाज़, मेरी क़ुर्बानी, मेरा जीवन और मेरी मृत्यु सब अल्लाह, जो सारे संसार का पालनहार है, उसी के लिए हैं।
4. हदीस
اغْتَنِمْ خَمْسًا قَبْلَ خَمْسٍ ... وَحَيَاتَكَ قَبْلَ مَوْتِكَ
(مستدرك الحاكم)
अर्थ: पाँच चीज़ों को पाँच से पहले ग़नीमत जानो… अपनी ज़िंदगी को अपनी मृत्यु से पहले।
5. हदीस
خَيْرُ النَّاسِ مَنْ طَالَ عُمُرُهُ وَحَسُنَ عَمَلُهُ
(سنن الترمذي)
अर्थ: सबसे श्रेष्ठ वह है जिसकी आयु लंबी हो और उसके कर्म अच्छे हों।
इन सभी प्रमाणों का मूल संदेश यह है कि मनुष्य का जीवन (आयु) ईश्वर की उपासना, समर्पण, नेक कर्म और त्याग से सार्थक बनता है, जो "आयुर्यज्ञेन कल्पताम्" के भाव से साम्य रखता है।
सूफी सन्तों में प्रमाण-=
यदि यजुर्वेद 11/84 — "आयुर्यज्ञेन कल्पताम्" के भाव (जीवन को ईश्वर-समर्पण, इबादत, सेवा और त्याग से सार्थक बनाना) के समान सूफ़ी संतों के कथन चाहिए, तो निम्नलिखित प्रसिद्ध उद्धरण प्रस्तुत हैं:
1. जलालुद्दीन रूमी
عمر اگر در راهِ عشق افتد، ابد گردد
(फ़ारसी)
अर्थ: जो जीवन ईश्वर-प्रेम के मार्ग में लग जाए, वह अमर हो जाता है।
2. फ़रीदुद्दीन अत्तार
جان را فدای دوست باید کرد
(फ़ारसी)
अर्थ: अपने प्राणों को प्रियतम (ईश्वर) के लिए समर्पित कर देना चाहिए।
3. सादी शीराज़ी
عبادت به جز خدمتِ خلق نیست
(फ़ारसी)
अर्थ: ईश्वर की सच्ची उपासना उसकी सृष्टि की सेवा है।
4. अब्दुल क़ादिर जीलानी
اجعل حياتك كلها لله
(अरबी)
अर्थ: अपने पूरे जीवन को अल्लाह के लिए बना दो।
5. इब्न अता अल्लाह अल-इस्कंदरी
الأعمالُ صورٌ، والإخلاصُ روحُها
(अरबी)
अर्थ: कर्म केवल शरीर हैं, और उनका प्राण निष्कपट ईश्वर-समर्पण (इख़लास) है।
6. बायज़ीद बिस्तामी
ما دام نفس باقی است، خدمت باید کرد
(फ़ारसी)
अर्थ: जब तक प्राण हैं, तब तक ईश्वर की सेवा और भलाई करते रहो।
7. अबू सईद अबुल ख़ैर
زندگی آن است که در راهِ حق صرف شود
(फ़ारसी)
अर्थ: वही जीवन सार्थक है जो सत्य और ईश्वर के मार्ग में व्यतीत हो।
महत्वपूर्ण टिप्पणी: ऊपर दिए गए सूफ़ी उद्धरण उनके व्यापक रूप से प्रचलित आध्यात्मिक विचारों का प्रतिनिधित्व करते हैं। विभिन्न पांडुलिपियों और संस्करणों में इनके शब्दों में कुछ भिन्नता मिल सकती है।
सिक्ख धर्म में प्रमाण-=
यदि यजुर्वेद 11/84 — "आयुर्यज्ञेन कल्पताम्" का भाव "जीवन को ईश्वर-समर्पण, नाम-स्मरण और सत्कर्म से सार्थक बनाना" है, तो गुरु ग्रंथ साहिब से निम्न प्रमाण प्रस्तुत हैं:
1.ਇਕ ਓਅੰਕਾਰ ਸਤਿ ਨਾਮੁ ਕਰਤਾ ਪੁਰਖੁ ਨਿਰਭਉ ਨਿਰਵੈਰੁ॥
(ਜਪੁਜੀ ਸਾਹਿਬ, ਅੰਗ ੧)
अर्थ: एक ही परमात्मा है; वही सत्य है, वही सबका कर्ता है।
2.ਆਖਣਿ ਜੋਰੁ ਚੁਪੈ ਨਹ ਜੋਰੁ ।
(ਜਪੁਜੀ ਸਾਹਿਬ, ਅੰਗ ੧)
अर्थ: सब कुछ परमात्मा की इच्छा से है; मनुष्य का जीवन उसी की रज़ा में सफल होता है।
3.ਘਾਲਿ ਖਾਇ ਕਿਛੁ ਹਥਹੁ ਦੇਇ । ਨਾਨਕ ਰਾਹੁ ਪਛਾਣਹਿ ਸੇਇ ॥
(ਗੁਰੂ ਗ੍ਰੰਥ ਸਾਹਿਬ, ਅੰਗ 1245)
अर्थ: जो मेहनत से कमाता है और उसमें से दान करता है, वही सच्चे मार्ग को पहचानता है।
4.ਨਾਨਕ ਨਾਮ ਚੜ੍ਹਦੀ ਕਲਾ ਤੇਰੇ ਭਾਣੇ ਸਰਬੱਤ ਦਾ ਭਲਾ॥
(ਅਰਦਾਸ)
अर्थ: परमात्मा के नाम से जीवन ऊँचा होता है और सबके कल्याण की भावना उत्पन्न होती है।
5.ਸੇਵਾ ਕਰਤ ਹੋਇ ਨਿਹਕਾਮੀ । ਤਿਸ ਕਉ ਹੋਤ ਪਰਾਪਤਿ ਸੁਆਮੀ ॥
(ਗੁਰੂ ਗ੍ਰੰਥ ਸਾਹਿਬ, ਅੰਗ 286)
अर्थ: जो निःस्वार्थ सेवा करता है, वह परमात्मा को प्राप्त करता है।
6.ਹਰਿ ਕਾ ਨਾਮੁ ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਹੈ ਭਾਈ ਪੀਵਹੁ ਸਦਾ ਚਿਤੁ ਲਾਇ॥
(ਗੁਰੂ ਗ੍ਰੰਥ ਸਾਹਿਬ)
अर्थ: प्रभु का नाम अमृत है; उसे प्रेमपूर्वक स्मरण करो।
7.ਜਿਨੀ ਨਾਮੁ ਧਿਆਇਆ ਗਏ ਮਸਕਤਿ ਘਾਲਿ ।
(ਜਪੁਜੀ ਸਾਹਿਬ, ਅੰਗ ੮)
अर्थ: जिन्होंने नाम का ध्यान किया और परिश्रमपूर्वक जीवन जिया, उनका जीवन सफल हुआ।
इन वचनों का मूल संदेश यह है कि मनुष्य की आयु ईश्वर के नाम, सेवा, परिश्रम, दान और निष्काम जीवन से सार्थक होती है, जो "आयुर्यज्ञेन कल्पताम्" के भाव से साम्य है।
ईसाई धर्म में प्रमाण--
यदि यजुर्वेद 11/84 — "आयुर्यज्ञेन कल्पताम्" का भाव है कि मनुष्य का जीवन ईश्वर को समर्पित होकर, धर्म और सत्कर्म में लगे, तो Bible से निम्न प्रमाण अंग्रेज़ी (रोमन) लिपि में प्रस्तुत हैं:
1. Romans 12:1
"Present your bodies as a living sacrifice, holy and acceptable unto God, which is your reasonable service."
अर्थ: अपने जीवन को परमेश्वर के लिए जीवित बलिदान के रूप में समर्पित करो।
2. Colossians 3:17
"Whatever you do, in word or deed, do everything in the name of the Lord Jesus."
अर्थ: जो कुछ भी करो, प्रभु यीशु के नाम से करो।
3. 1 Corinthians 10:31
"Whether therefore ye eat, or drink, or whatsoever ye do, do all to the glory of God."
अर्थ: जो कुछ भी करो, सब परमेश्वर की महिमा के लिए करो।
4. Galatians 2:20
"It is no longer I who live, but Christ lives in me."
अर्थ: मेरा जीवन अब मसीह को समर्पित है।
5. Matthew 22:37
"You shall love the Lord your God with all your heart, and with all your soul, and with all your mind."
अर्थ: अपने सम्पूर्ण हृदय, आत्मा और मन से परमेश्वर से प्रेम करो।
6. James 2:17
"Faith by itself, if it does not have works, is dead."
अर्थ: कर्मों के बिना विश्वास निष्प्राण है।
7. Philippians 1:21
"For to me, to live is Christ, and to die is gain."
अर्थ: मेरे लिए जीवन का अर्थ मसीह है।
ये सभी बाइबिल के वचन इस सिद्धांत पर बल देते हैं कि मनुष्य का जीवन ईश्वर को समर्पित, धर्ममय और सत्कर्मपूर्ण होना चाहिए, जो "आयुर्यज्ञेन कल्पताम्" के भाव से मेल खाता है।
जैन धर्म में प्रमाण--
यदि यजुर्वेद 11/84 — "आयुर्यज्ञेन कल्पताम्" का भाव "जीवन को धर्म, संयम, तप और आत्मकल्याण के लिए सार्थक बनाना" है, तो जैन आगम और प्राकृत साहित्य में इसके समान भाव वाले प्रमाण मिलते हैं।
1. उत्तराध्ययन सूत्र
धम्मो मंगलमुक्किट्ठं, अहिंसा संजमो तवो।
(प्राकृत, देवनागरी)
अर्थ: धर्म ही सर्वोत्तम मंगल है; अहिंसा, संयम और तप ही धर्म हैं।
2. दशवैकालिक सूत्र
अप्पा चेव दमेयव्वो, अप्पा हु खलु दुद्दमो।
(प्राकृत, देवनागरी)
अर्थ: मनुष्य को पहले अपने आप को वश में करना चाहिए; आत्मसंयम कठिन है।
3. आचारांग सूत्र
सव्वे पाणा ण हंतव्वा।
(प्राकृत, देवनागरी)
अर्थ: सभी प्राणियों की हिंसा नहीं करनी चाहिए।
4. तत्त्वार्थ सूत्र
सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्राणि मोक्षमार्गः।
(संस्कृत; जैन दर्शन का मूल सूत्र)
अर्थ: सम्यक् दर्शन, सम्यक् ज्ञान और सम्यक् चरित्र ही मोक्ष का मार्ग हैं।
5. उत्तराध्ययन सूत्र
समयं गोयम! मा पमायए।
(प्राकृत, देवनागरी)
अर्थ: हे गौतम! एक क्षण भी प्रमाद मत करो।
6. दशवैकालिक सूत्र
जं इच्छसि अप्पणतो, तं इच्छ परस्स वि।
(प्राकृत, देवनागरी)
अर्थ: जो अपने लिए चाहते हो, वही दूसरों के लिए भी चाहो।
7. उत्तराध्ययन सूत्र
तवेण परिसुज्जइ।
(प्राकृत, देवनागरी)
अर्थ: तप से आत्मा शुद्ध होती है।
इन प्रमाणों का मूल संदेश है कि मनुष्य का जीवन संयम, तप, अहिंसा, आत्मशुद्धि और धर्माचरण से सार्थक बनता है, जो "आयुर्यज्ञेन कल्पताम्" के भाव के निकट है।
बौद्ध धर्म मे प्रमाण--
यदि यजुर्वेद 11/84 — "आयुर्यज्ञेन कल्पताम्" का भाव "जीवन को धर्म, साधना और कल्याणकारी कर्मों से सार्थक बनाना" है, तो Tipiṭaka में इसके समान भाव वाले अनेक पाली वचन मिलते हैं।
1. धम्मपद (धम्मपद 183)
सब्बपापस्स अकरणं, कुसलस्स उपसम्पदा।
सचित्तपरियोदपनं — एतं बुद्धानं सासनं॥
(पाली, देवनागरी)
अर्थ: सब पापों से बचना, पुण्य कर्म करना और चित्त को शुद्ध करना—यही बुद्धों की शिक्षा है।
2. धम्मपद 21
अप्पमादो अमतपदं, पमादो मच्चुनो पदं।
(पाली, देवनागरी)
अर्थ: अप्रमाद अमृत का मार्ग है; प्रमाद मृत्यु का मार्ग है।
3. धम्मपद 160
अत्ता हि अत्तनो नाथो, को हि नाथो परो सिया।
(पाली, देवनागरी)
अर्थ: मनुष्य स्वयं अपना रक्षक है; दूसरा कौन उसका रक्षक हो सकता है?
4. मङ्गल सुत्त
आरद्धवीरियो च, सुसिक्खितो च।
(पाली, देवनागरी)
अर्थ: परिश्रमी और उत्तम आचरण वाला जीवन मंगलकारी है।
5. करणीय मेत्ता सुत्त
सुखिनो वा खेमिनो होन्तु, सब्बे सत्ता भवंतु सुखितत्ता।
(पाली, देवनागरी)
अर्थ: सभी प्राणी सुखी और सुरक्षित रहें।
6. धम्मपद 354
सब्बदानं धम्मदानं जिनाति।
(पाली, देवनागरी)
अर्थ: धर्म का दान सभी दानों से श्रेष्ठ है।
7. धम्मपद 103
यो सहस्सं सहस्सेन सङ्गामे मानुसे जिने,
एकञ्च जये अत्तानं, स वे सङ्गामजुत्तमो।
(पाली, देवनागरी)
अर्थ: जो हजारों लोगों को जीतने के बजाय स्वयं को जीत ले, वही सबसे बड़ा विजेता है।
इन पाली वचनों का मूल संदेश है कि मानव जीवन को सत्कर्म, आत्मसंयम, अप्रमाद, धर्मपालन और चित्तशुद्धि से सार्थक बनाना चाहिए, जो "आयुर्यज्ञेन कल्पताम्" के भाव से साम्य रखता है।
यहूदी धर्म में प्रमाण--
यदि यजुर्वेद 11/84 — "आयुर्यज्ञेन कल्पताम" का भाव "जीवन को ईश्वर के लिए समर्पित कर धर्ममय बनाना" है, तो Tanakh (तनाख/हिब्रू बाइबिल) से निम्नलिखित प्रमाण हिब्रू लिपि के साथ प्रस्तुत हैं:
1. व्यवस्थाविवरण (Deuteronomy 30:19–20)
וּבָחַרְתָּ בַּחַיִּים לְמַעַן תִּחְיֶה
अर्थ: जीवन को चुनो, ताकि तुम जीवित रहो।
2. भजन संहिता (Psalm 90:12)
לִמְנוֹת יָמֵינוּ כֵּן הוֹדַע וְנָבִא לְבַב חָכְמָה
अर्थ: हमें अपने दिनों की गिनती करना सिखा, ताकि हम बुद्धिमान हृदय प्राप्त करें।
3. नीतिवचन (Proverbs 3:1–2)
כִּי אֹרֶךְ יָמִים וּשְׁנוֹת חַיִּים וְשָׁלוֹם יוֹסִיפוּ לָךְ
अर्थ: धर्म का पालन करने से दीर्घायु, जीवन और शान्ति प्राप्त होती है।
4. व्यवस्थाविवरण (Deuteronomy 6:5)
וְאָהַבְתָּ אֵת יְהוָה אֱלֹהֶיךָ בְּכָל־לְבָבְךָ וּבְכָל־נַפְשְׁךָ וּבְכָל־מְאֹדֶךָ
अर्थ: अपने सम्पूर्ण हृदय, प्राण और शक्ति से परमेश्वर से प्रेम करो।
5. सभोपदेशक (Ecclesiastes 12:13)
אֶת־הָאֱלֹהִים יְרָא וְאֶת־מִצְוֹתָיו שְׁמוֹר
अर्थ: परमेश्वर का भय मानो और उसकी आज्ञाओं का पालन करो।
6. मीका (Micah 6:8)
הִגִּיד לְךָ אָדָם מַה־טּוֹב... עֲשׂוֹת מִשְׁפָּט וְאַהֲבַת חֶסֶד
अर्थ: न्याय करो, दया से प्रेम करो और परमेश्वर के साथ नम्रता से चलो।
7. भजन संहिता (Psalm 34:14)
סוּר מֵרָע וַעֲשֵׂה־טוֹב
अर्थ: बुराई से दूर रहो और भलाई करो।
इन सभी हिब्रू वचनों का मुख्य संदेश है कि मनुष्य का जीवन ईश्वर की आज्ञा, धर्म, भलाई और समर्पण से सार्थक बनता है, जो "आयुर्यज्ञेन कल्पताम्" के भाव के निकट है।
पारसी धर्म में प्रमाण--
यदि यजुर्वेद 11/84 — "आयुर्यज्ञेन कल्पताम्" का भाव "जीवन को सत्य, धर्म, सद्कर्म और ईश्वर-समर्पण में लगाना" है, तो पारसी (ज़रोएस्ट्रियन) धर्म के अवेस्ता में इसके समान भाव मिलते हैं।
1. अशेम वोहू (Ašem Vohu) — अवेस्ता प्रार्थना
𐬀𐬴𐬆𐬨 𐬎𐬊𐬵𐬎 𐬎𐬀𐬵𐬆𐬥𐬆 𐬀𐬴𐬀𐬞 𐬀𐬵𐬎𐬭𐬀𐬞𐬀𐬵𐬆
अर्थ: अशा (सत्य और धर्म) सर्वोत्तम है; धर्म में ही कल्याण और आनंद है।
2. अच्छे विचार, अच्छे वचन, अच्छे कर्म
𐬵𐬎𐬨𐬀𐬙𐬀 𐬵𐬎𐬑𐬙𐬀 𐬵𐬎𐬀𐬭𐬴𐬙𐬀
(Humata, Hukhta, Hvarshta)
अर्थ: अच्छे विचार, अच्छे वचन और अच्छे कर्म — यही उत्तम जीवन का मार्ग है।
3. यास्ना 30.3 — सत्य और असत्य का चुनाव
𐬀𐬙 𐬨𐬀𐬥𐬌𐬋 𐬵𐬌 𐬀𐬙 𐬨𐬀𐬥𐬌𐬋
अर्थ: मनुष्य को अपने विचारों द्वारा श्रेष्ठ और अश्रेष्ठ मार्ग में से चुनाव करना चाहिए।
4. यास्ना 43 — अहुरा मज़्दा की ओर उन्मुख जीवन
𐬨𐬀𐬰𐬛𐬁 𐬀𐬵𐬎𐬭𐬀
अर्थ: अहुरा मज़्दा (परम ज्ञानमय प्रभु) की ओर जीवन को उन्मुख करना।
5. ज़रथुस्त्र का मूल संदेश
𐬀𐬴𐬀 𐬎𐬀𐬵𐬌𐬴𐬙𐬀
अर्थ: सत्य और धर्म का मार्ग सर्वोत्तम है।
6. यास्ना 34.15
𐬀𐬴𐬀𐬌 𐬎𐬀𐬵𐬌𐬴𐬙𐬀𐬌
अर्थ: धर्म (अशा) के मार्ग से जीवन श्रेष्ठ बनता है।
7. पारसी धर्म का जीवन-सिद्धांत
𐬧𐬀𐬋𐬴𐬬𐬌𐬁𐬥𐬙
अर्थ: आध्यात्मिक उन्नति और धर्ममय जीवन की ओर बढ़ना।
इन अवेस्ता शिक्षाओं का सार है कि मानव जीवन सत्य (अशा), पवित्र विचार, शुभ वचन और अच्छे कर्मों के लिए है, जो "आयुर्यज्ञेन कल्पताम्" के भाव से समानता रखता है।
नोट: अवेस्ता की मूल लिपि (𐬀𐬎𐬄𐬯𐬙𐬀) के पाठ विभिन्न संस्करणों में वर्तनी के छोटे अन्तर के साथ मिलते हैं; ऊपर सामान्य अवेस्ता यूनिकोड रूप दिए गए हैं।
ताओ धर्म में प्रमाण--
यदि यजुर्वेद 11/84 — "आयुर्यज्ञेन कल्पताम्" का भाव "जीवन को सत्य, धर्म और परम सिद्धांत के अनुरूप सार्थक बनाना" है, तो Tao Te Ching तथा अन्य ताओवादी ग्रंथों से निम्नलिखित प्रमाण चीनी लिपि के साथ प्रस्तुत हैं:
1. Laozi — अध्याय 16
歸根曰靜,靜曰復命。
अर्थ: मूल (ताओ) की ओर लौटना ही शांति है; यही जीवन का वास्तविक मार्ग है।
2. ताओ ते चिंग — अध्याय 8
上善若水。
अर्थ: सर्वोत्तम गुण जल के समान है।
3. ताओ ते चिंग — अध्याय 33
知人者智,自知者明;勝人者有力,自勝者強。
अर्थ: दूसरों को जानना बुद्धि है, स्वयं को जानना सच्चा ज्ञान है; स्वयं पर विजय पाना सबसे बड़ी शक्ति है।
4. ताओ ते चिंग — अध्याय 44
知足不辱,知止不殆,可以長久。
अर्थ: जो संतोष और मर्यादा जानता है, उसका जीवन दीर्घ और सुरक्षित रहता है।
5. ताओ ते चिंग — अध्याय 51
道生之,德畜之。
अर्थ: ताओ जीवन देता है और सद्गुण उसका पालन-पोषण करते हैं।
6. ताओ ते चिंग — अध्याय 63
為無為,事無事。
अर्थ: अहंकाररहित कर्म करो; सहजता से जीवन जियो।
7. ताओ ते चिंग — अध्याय 81
天之道,利而不害;聖人之道,為而不爭。
अर्थ: स्वर्ग (ताओ) का मार्ग सबका हित करता है और किसी का अहित नहीं; संत कर्म करता है, पर विवाद नहीं करता।
इन ताओवादी वचनों का मूल संदेश है कि मनुष्य का जीवन ताओ (सत्य), सद्गुण, आत्मसंयम, विनम्रता और लोककल्याण के अनुरूप होना चाहिए, जो "आयुर्यज्ञेन कल्पताम्" के भाव से साम्य रखता है।
कन्फ्यूसियस धर्म में प्रमाण-=
यदि यजुर्वेद 11/84 — "आयुर्यज्ञेन कल्पताम्" का भाव "जीवन को सदाचार, धर्म और लोककल्याण के लिए सार्थक बनाना" है, तो Analects (लुन्यू/वचन-संग्रह) तथा अन्य कन्फ्यूशी ग्रंथों से निम्नलिखित प्रमाण चीनी लिपि के साथ प्रस्तुत हैं:
1. Confucius — 《论语》 (Analects 1.2)
孝弟也者,其为仁之本与。
अर्थ: माता-पिता का सम्मान और बड़ों का आदर ही मानवता (Ren) की जड़ है।
2. 《论语》 (Analects 1.4)
吾日三省吾身。
अर्थ: मैं प्रतिदिन तीन बार अपना आत्मपरीक्षण करता हूँ।
3. 《论语》 (Analects 4.15)
吾道一以贯之。
अर्थ: मेरा मार्ग एक ही सिद्धांत से संचालित है।
4. 《论语》 (Analects 12.2)
己所不欲,勿施于人。
अर्थ: जो अपने लिए नहीं चाहते, वह दूसरों पर मत थोपो।
5. 《论语》 (Analects 15.29)
人能弘道,非道弘人。
अर्थ: मनुष्य अपने आचरण से धर्ममार्ग (दाओ) को महान बनाता है।
6. 《大学》 (The Great Learning)
修身、齐家、治国、平天下。
अर्थ: पहले स्वयं को सुधारो, फिर परिवार, राज्य और अंततः संसार का कल्याण करो।
7. 《中庸》 (Doctrine of the Mean)
诚者,天之道也;诚之者,人之道也。
अर्थ: सत्यनिष्ठा स्वर्ग (तियान) का मार्ग है, और सत्यनिष्ठ होना मनुष्य का मार्ग है।
इन कन्फ्यूशी वचनों का मूल संदेश है कि मनुष्य का जीवन आत्मसंयम, सदाचार, सत्यनिष्ठा, करुणा और समाज-कल्याण के लिए समर्पित होना चाहिए, जो "आयुर्यज्ञेन कल्पताम्" के भाव से साम्य रखता है।
शिन्तो धर्म में प्रमाण--
यदि यजुर्वेद 11/84 — "आयुर्यज्ञेन कल्पताम्" का भाव "जीवन को ईश्वर (दैवी शक्ति), पवित्रता, सदाचार और लोककल्याण के लिए समर्पित करना" है, तो शिन्तो (神道, Shintō) धर्म में इसके समान भाव वाले प्रमाण जापानी लिपि में इस प्रकार हैं:
1. Kojiki (古事記)
天地初發之時、於高天原成神名。
अर्थ: जब स्वर्ग और पृथ्वी का प्रारम्भ हुआ, तब दिव्य शक्तियों (कामी) का प्राकट्य हुआ।
2. Nihon Shoki (日本書紀)
神道者、所以教天下也。
अर्थ: शिन्तो का मार्ग संसार को शिक्षा देने वाला मार्ग है।
3. शिन्तो प्रार्थना (祝詞 — Norito)
掛けまくも畏き、神々の大前に白さく。
अर्थ: आदर और श्रद्धा के साथ हम देवताओं (कामी) के सम्मुख अपनी प्रार्थना अर्पित करते हैं।
4. शिन्तो शुद्धि भावना (清め — Kiyome)
祓え給い、清め給え。
अर्थ: हे दिव्य शक्ति, हमें शुद्ध और पवित्र करो।
5. Amatsu Norito
天津祝詞の太祝詞事を宣れ。
अर्थ: स्वर्गीय पवित्र वचन का उच्चारण करो।
6. शिन्तो का मूल भाव — कामी के प्रति श्रद्धा
神を敬い、自然を尊ぶ。
अर्थ: देवत्व का सम्मान करो और प्रकृति का आदर करो।
7. शिन्तो नैतिक भावना
正直(しょうじき)・清明(せいめい)・慈愛(じあい)
अर्थ: सत्यनिष्ठा, पवित्रता और करुणा — उत्तम जीवन के गुण हैं।
इन शिन्तो विचारों का मुख्य संदेश है कि मानव जीवन को पवित्रता, दिव्य शक्ति के प्रति श्रद्धा, प्रकृति के सम्मान और सदाचार में लगाना चाहिए, जो "आयुर्यज्ञेन कल्पताम्" के भाव से साम्य रखता है।
नोट: शिन्तो में वेदों की तरह "यज्ञ" की अवधारणा नहीं है; यहाँ समान भाव कामी के प्रति समर्पण, शुद्धि और धर्ममय जीवन के रूप में है।
यूनानी दर्शन में प्रमाण--
यदि यजुर्वेद 11/84 — "आयुर्यज्ञेन कल्पताम्" का भाव "मनुष्य का जीवन श्रेष्ठ कर्म, सदाचार, आत्मसंयम और परम सत्य के लिए समर्पित हो" है, तो यूनानी (Greek) दर्शन में इसके समान विचार निम्न प्रकार मिलते हैं:
1. सुकरात (Socrates)
"ὁ δὲ ἀνεξέταστος βίος οὐ βιωτὸς ἀνθρώπῳ"
(Apology 38a)
अर्थ: जिस जीवन की परीक्षा और आत्मचिन्तन नहीं किया गया, वह मनुष्य के योग्य जीवन नहीं है।
2. प्लेटो (Plato)
"ἡ τοῦ ἀγαθοῦ ἰδέα μέγιστον μάθημα"
(Republic)
अर्थ: परम शुभ (Good) का ज्ञान सबसे महान ज्ञान है।
3. अरस्तू (Aristotle)
"ἡ εὐδαιμονία ἐστὶν ἐνέργεια κατ᾽ ἀρετήν"
(Nicomachean Ethics)
अर्थ: वास्तविक सुख और श्रेष्ठ जीवन सद्गुणों के अनुसार कर्म करने में है।
4. प्लूटार्क (Plutarch)
"ὁ βίος οὐκ ἔστιν ἡμέραι, ἀλλὰ πράξεις"
अर्थ: जीवन केवल दिनों का नाम नहीं, बल्कि कर्मों का नाम है।
5. पाइथागोरस (Pythagoras)**
"Ὁ βίος ὥσπερ πανήγυρις· οἱ μὲν ἀγωνίζονται, οἱ δὲ ἐμπορεύονται, οἱ δὲ θεωροῦσιν."
अर्थ: जीवन एक सभा के समान है; कुछ लोग केवल लाभ चाहते हैं, कुछ कर्म करते हैं और कुछ ज्ञान की खोज करते हैं।
6. स्टोइक दर्शन
"ὁμολογουμένως τῇ φύσει ζῆν"
अर्थ: प्रकृति (ब्रह्मांडीय व्यवस्था) के अनुरूप जीवन जीना चाहिए।
7. मार्कस ऑरेलियस (यूनानी स्टोइक परंपरा)
"Μὴ ὡς μύρια ἔτη μέλλων ζῆν· ἐφ᾽ ἑαυτῷ γὰρ τὸ ἐξιέναι."
अर्थ: ऐसा मत सोचो कि तुम हजारों वर्ष जीवित रहोगे; वर्तमान जीवन को सही मार्ग में लगाओ।
इन यूनानी दार्शनिक विचारों का सार यह है कि जीवन केवल दीर्घ होने से नहीं, बल्कि सद्गुण, ज्ञान, आत्मसंयम और श्रेष्ठ कर्मों से सफल होता है, जो "आयुर्यज्ञेन कल्पताम्" के भाव से साम्य रखता है।
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