यजुर्वेद सूक्ति(8) की व्याख्या
यजुर्वेद सूक्ति(8) की व्याख्य
"अन्नस्य न: देहि"
शुक्ल यजुर्वेद --11/83
हे ईश्वर ! हमें उतम अन्न प्रदान करो। पूरा मंत्र अर्थ सहित
शुक्ल यजुर्वेद (माध्यन्दिन शाखा) के अध्याय 11, मंत्र 83 का मूल मंत्र है—
अन्नपतेऽन्नस्य नो देह्यनमीवस्य शुष्मिणः।
प्र-प्र दातारं तारिष ऊर्जं नो धेहि द्विपदे चतुष्पदे
शब्दार्थ:
अन्नपते — हे अन्न के स्वामी!
अन्नस्य नः देहि — हमें उत्तम अन्न प्रदान करो।
अनमीवस्य — रोगरहित।
शुष्मिणः — बल और सामर्थ्य से युक्त।
प्र-प्र दातारं तारिष — अन्न देने वाले दाता की उन्नति और रक्षा करो।
ऊर्जं नः धेहि — हमें पोषण, शक्ति और ऊर्जा दो।
द्विपदे चतुष्पदे — दो पैरों वाले (मनुष्यों) और चार पैरों वाले (पशुओं) सभी के लिए।
भावार्थ:
हे अन्न के अधिष्ठाता देव! हमें ऐसा पौष्टिक, रोगरहित और बलवर्धक अन्न प्रदान करें। अन्न देने वालों की रक्षा और उन्नति करें तथा मनुष्यों और पशुओं सभी को पोषण, बल और समृद्धि प्रदान करें।
वेदों में प्रमाण--
यदि आपका आशय "हमें उत्तम अन्न प्रदान करो" इस भावना के लिए वेदों में अन्य प्रमाणों से है, तो ऐसे कई मंत्र मिलते हैं:
1-शुक्ल यजुर्वेद 11.83
अन्नपतेऽन्नस्य नो देह्यनमीवस्य शुष्मिणः...
अर्थ: हे अन्न के स्वामी! हमें रोगरहित, बलवर्धक अन्न प्रदान करें और मनुष्यों तथा पशुओं को पोषण दें।
2-ऋग्वेद 10.117.6
केवलाघो भवति केवलादी। अर्थ: जो व्यक्ति अकेला अन्न खाता है और दूसरों को नहीं देता, वह पाप का भागी होता है। इससे अन्न के दान और साझा करने का महत्व सिद्ध होता है।
3-अथर्ववेद 3.24.5
अन्नं को जीवन और पोषण का आधार माना गया है तथा अन्न की वृद्धि और समृद्धि की कामना की गई है।
तैत्तिरीय उपनिषद् (कृष्ण यजुर्वेद), शिक्षावल्ली 3.7
अन्नं न निन्द्यात्। तद्व्रतम्। अन्नं बहु कुर्वीत। तद्व्रतम्। अर्थ: अन्न की निंदा न करे; अधिक से अधिक अन्न उत्पन्न करे—यह व्रत है।
इन प्रमाणों से स्पष्ट होता है कि वेदों में अन्न को ईश्वर का वरदान, जीवन का आधार और सबके साथ बाँटने योग्य संपदा माना गया है।
उपनिषदों में प्रमाण--
उद्धृत मंत्र का भाव उपनिषदों में भी अत्यंत स्पष्ट रूप से मिलता है। उपनिषद अन्न को केवल भोजन नहीं, बल्कि जीवन, ब्रह्म और समस्त प्राणियों के पालन का आधार मानते हैं।
यहाँ कुछ प्रमुख प्रमाण हैं:
1. तैत्तिरीय उपनिषद् 3.2
अन्नं ब्रह्मेति व्यजानात्।
अर्थ: जानो कि अन्न ही ब्रह्मस्वरूप है, क्योंकि सभी प्राणी अन्न से उत्पन्न होते हैं, अन्न से जीवित रहते हैं और अंत में अन्न (पृथ्वी) में ही विलीन हो जाते हैं।
2. तैत्तिरीय उपनिषद् 3.7
अन्नं न निन्द्यात्। तद्व्रतम्।
अन्नं बहु कुर्वीत। तद्व्रतम्।
अर्थ: अन्न की कभी निंदा न करे—यह व्रत है। अधिक से अधिक अन्न उत्पन्न करे—यह भी व्रत है।
3. तैत्तिरीय उपनिषद् 3.10
न कञ्चन वसतौ प्रत्याचक्षीत। तद्व्रतम्।
अर्थ: अपने यहाँ आए हुए अतिथि को कभी निराश न लौटाए। उसे अन्न अवश्य प्रदान करे। यही धर्म है।
4. छान्दोग्य उपनिषद् 7.9.1
अन्नं वै बलम्।
अर्थ: अन्न ही बल का आधार है। अन्न से ही शरीर, शक्ति और जीवन का पोषण होता है।
शुक्ल यजुर्वेद 11.83 के साथ संबंध
शुक्ल यजुर्वेद का मंत्र—
अन्नपतेऽन्नस्य नो देह्यनमीवस्य शुष्मिणः।
प्र-प्र दातारं तारिष ऊर्जं नो धेहि द्विपदे चतुष्पदे॥
इसमें प्रार्थना है कि हमें रोगरहित, बलवर्धक अन्न मिले, अन्नदाता की रक्षा हो तथा मनुष्य और पशु सभी पुष्ट हों।
उपनिषद् इस वैदिक भावना को और गहराई देते हैं—
अन्न ब्रह्मस्वरूप है।
अन्न का सम्मान करना चाहिए।
अधिक अन्न उत्पन्न करना चाहिए।
अन्न को दान और अतिथि-सत्कार में प्रयोग करना चाहिए।
अन्न सभी प्राणियों के जीवन और बल का आधार है।
इस प्रकार शुक्ल यजुर्वेद 11.83 में की गई "उत्तम अन्न की प्रार्थना" का दार्शनिक विस्तार विशेष रूप से तैत्तिरीय उपनिषद् में मिलता है, जहाँ अन्न को ईश्वर की कृपा, जीवन का आधार और ब्रह्मस्वरूप बताया गया है।.
पुराणों में प्रमाण--
यदि विषय "अन्नस्य नः देहि" (हमें उत्तम अन्न प्रदान करो), अन्न की महिमा, अन्नदान और सबके पोषण है, तो पुराणों में अनेक प्रमाण मिलते हैं। नीचे कुछ प्रमाणित श्लोक उनके उद्धरण सहित दिए जा रहे हैं।
1. पद्म पुराण
सृष्टिखण्ड, अध्याय 50, श्लोक 18
अन्नदानात्परं दानं न भूतं न भविष्यति।
अन्नेन धार्यते सर्वं त्रैलोक्यं सचराचरम्॥
अर्थ:
अन्नदान से बढ़कर कोई दान न कभी हुआ है और न होगा, क्योंकि चर-अचर सहित तीनों लोक अन्न से ही धारण किए जाते हैं।
2. गरुड़ पुराण
पूर्वखण्ड, अध्याय 49, श्लोक 52
अन्नदानं परं दानं विद्यादानमतः परम्।
अन्नेन क्षणिका तृप्तिर्विद्यया अमृतमश्नुते॥
अर्थ:
अन्नदान श्रेष्ठ दान है, और उससे भी श्रेष्ठ विद्यादान है। अन्न से तत्काल तृप्ति होती है, जबकि विद्या अमर कल्याण देती है।
3. स्कन्द पुराण
काशीखण्ड, अध्याय 24
अन्नं हि प्राणिनां प्राणः।
अर्थ:
अन्न ही प्राणियों का प्राण है।
भाव:
अन्न जीवन का मूल आधार है।
4. अग्नि पुराण
अध्याय 209
अन्नदानं महादानं सर्वदानमयं स्मृतम्।
अर्थ:
अन्नदान महादान है और सभी दानों का सार माना गया है।
5. भविष्य पुराण
ब्राह्मपर्व, अध्याय 41
यो ददात्यन्नमर्थिभ्यो भक्त्या श्रद्धासमन्वितः।
स याति परमां सिद्धिं विष्णुलोकं सनातनम्॥
अर्थ:
जो श्रद्धा और भक्ति से याचकों को अन्न देता है, वह परम सिद्धि और विष्णुलोक को प्राप्त होता है।
भग्वद्गीता में प्रमाण--
विषय "हे ईश्वर! हमें उत्तम अन्न प्रदान करो" के समर्थन में श्रीमद्भगवद्गीता के प्रमाण हैं, तो ये प्रमुख श्लोक हैं:
1. श्रीमद्भगवद्गीता — अध्याय 3, श्लोक 14
अन्नाद्भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्नसम्भवः।
यज्ञाद्भवति पर्जन्यो यज्ञः कर्मसमुद्भवः॥ 3.14॥
अर्थ: सभी प्राणी अन्न से उत्पन्न और पोषित होते हैं। अन्न वर्षा से उत्पन्न होता है, वर्षा यज्ञ से होती है और यज्ञ नियत कर्म से उत्पन्न होता है।
2. श्रीमद्भगवद्गीता — अध्याय 3, श्लोक 13
यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः।
भुञ्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात्॥ 3.
अर्थ: जो लोग यज्ञ में अर्पित अन्न का शेष भाग ग्रहण करते हैं, वे पापों से मुक्त हो जाते हैं; जबकि जो केवल अपने लिए भोजन पकाते हैं, वे पाप का ही भोग करते हैं।
3. श्रीमद्भगवद्गीता — अध्याय 17, श्लोक 8
आयुःसत्त्वबलारोग्यसुखप्रीतिविवर्धनाः।
रस्याः स्निग्धाः स्थिरा हृद्या आहाराः सात्त्विकप्रियाः॥ 17.8
अर्थ: जो आहार आयु, सत्त्व, बल, आरोग्य, सुख और प्रसन्नता को बढ़ाने वाले, रसयुक्त, स्निग्ध, स्थिर (पौष्टिक) और हृदय को प्रिय हों, वे सात्त्विक मनुष्यों को प्रिय होते हैं।
शुक्ल यजुर्वेद 11.83 से संबंध
शुक्ल यजुर्वेद 11.83
अन्नपतेऽन्नस्य नो देह्यनमीवस्य शुष्मिणः...
"हे अन्न के स्वामी! हमें रोगरहित, बलवर्धक अन्न प्रदान करें।"
गीता 17.8 उसी भाव को आगे बढ़ाती है कि श्रेष्ठ आहार वही है जो आयु, बल, आरोग्य और सुख बढ़ाए।
गीता 3.14 बताती है कि अन्न समस्त प्राणियों के जीवन का आधार है।
इस प्रकार गीता में अन्न को केवल भोजन नहीं, बल्कि जीवन, स्वास्थ्य और धर्म का आधार बताया है।
महाभारत में प्रमाण--
यदि विषय अन्न का महत्व, अन्नदान और प्राणियों के पालन का है, तो महाभारत के अनुशासन पर्व में भीष्म पितामह ने युधिष्ठिर को अन्नदान का महत्त्व विस्तार से बताया है।
1. महाभारत
अनुशासन पर्व, अध्याय 63, श्लोक 5
अन्नदानं परं दानं विद्यादानमतः परम्।
अन्नेन क्षणिका तृप्तिर्विद्यया तु विमुक्तता॥
अर्थ: अन्नदान महान दान है, और उससे भी श्रेष्ठ विद्यादान है। अन्न से तत्काल तृप्ति होती है, जबकि विद्या से स्थायी कल्याण प्राप्त होता है।
2. महाभारत
अनुशासन पर्व, अध्याय 63, श्लोक 7
अन्ने प्रतिष्ठिता लक्ष्मीः अन्ने प्राणाः प्रतिष्ठिताः।
धर्मोऽन्ने प्रतिष्ठितस्तस्मादन्नं विशिष्यते॥
अर्थ: अन्न में ही लक्ष्मी का निवास है, अन्न में ही प्राण प्रतिष्ठित हैं और धर्म भी अन्न पर आधारित है। इसलिए अन्न सर्वोत्तम माना गया है।
3. महाभारत
अनुशासन पर्व, अध्याय 63
अन्नाद्भवन्ति भूतानि।
अर्थ: सभी प्राणियों का जीवन अन्न पर ही आधारित है।
महत्वपूर्ण टिप्पणी
ऊपर दिए गए "अन्नदानं परं दानम्..." तथा "अन्ने प्रतिष्ठिता लक्ष्मीः..." जैसे श्लोक अनेक पुस्तकों और प्रवचनों में महाभारत, अनुशासन पर्व से उद्धृत किए जाते हैं, किन्तु विभिन्न संस्करणों (विशेषकर आलोचनात्मक संस्करण, गीता प्रेस, दक्षिण भारतीय पाठ आदि) में अध्याय और श्लोक संख्या में अंतर मिलता है।
स्मृतियों में प्रमाण--
यदि विषय "अन्न का महत्त्व, अन्न का सम्मान, अन्नदान और अन्न से प्राणियों का पालन" है, तो स्मृतियों में इसके अनेक प्रमाण मिलते हैं। यहाँ पाँच प्रमुख प्रमाण दिए जा रहे हैं:
1. मनुस्मृति
अध्याय 3, श्लोक 106
पूजयेदशनं नित्यमद्याच्चैतदकुत्सयन्।
दृष्ट्वा हृष्येत् प्रसीदेच्च प्रतिनन्देच्च सर्वशः॥
अर्थ: भोजन (अन्न) का नित्य सम्मान करे, उसकी निन्दा न करे। भोजन को देखकर प्रसन्न हो और आदरपूर्वक ग्रहण करे।
2. मनुस्मृति
अध्याय 3, श्लोक 118
अतिथिं चान्नदानेन पूजयेद्विधिपूर्वकम्।
अर्थ: अतिथि का विधिपूर्वक अन्न देकर सत्कार करना चाहिए।
3. याज्ञवल्क्य स्मृति
आचाराध्याय, श्लोक 103 (कुछ संस्करणों में श्लोक संख्या भिन्न हो सकती है)
अतिथिं शक्तितो नित्यं भोजयेत् पूर्वमात्मनः।
अर्थ: अपनी सामर्थ्य के अनुसार अतिथि को पहले भोजन कराना चाहिए, उसके बाद स्वयं भोजन करना चाहिए।
4. पराशर स्मृति
प्रथम अध्याय (विभिन्न संस्करणों में श्लोक संख्या भिन्न)
अन्नदानं महादानं सर्वदानमयं स्मृतम्।
अर्थ: अन्नदान महादान है; इसमें सभी दानों का फल समाहित माना गया है।
5. आपस्तम्ब धर्मसूत्र
प्रश्न 2, पटल 4, खण्ड 8 (धर्मसूत्र परंपरा में)
अतिथयेऽन्नं दद्यात्।
अर्थ: अतिथि को अन्न अवश्य देना चाहिए।
महत्वपूर्ण टिप्पणी
इनमें से मनुस्मृति 3.106 का श्लोक और उसका अध्याय-श्लोक क्रम सभी प्रमुख संस्करणों में प्रामाणिक रूप से उपलब्ध है। वहीं याज्ञवल्क्य स्मृति, पराशर स्मृति और धर्मसूत्रों में श्लोक क्रम विभिन्न संस्करणों और संपादनों में बदल सकता है।
नीति ग्रन्थों में प्रमाण--
यदि विषय "अन्न की महिमा, अन्नदान, भूखे को भोजन देना" है, तो नीति-साहित्य (सुभाषित, चाणक्य नीति आदि) में निम्न प्रमाण मिलते हैं:
1. चाणक्य नीति — अध्याय 8, श्लोक 23
अन्नहीनो दहेद्राष्ट्रं मन्त्रहीनश्च ऋत्विजः।
यजमानं दानहीनो नास्ति यज्ञसमो रिपुः॥
अर्थ:
अन्न का अभाव राष्ट्र को संकट में डाल देता है; मंत्रहीन ऋत्विज और दानहीन यजमान भी अपने कर्तव्य को नष्ट कर देते हैं।
2. नीति-सुभाषित
अन्नदानं परं दानं विद्यादानमतः परम्।
अन्नेन क्षणिका तृप्तिर्यावज्जीवं च विद्यया॥
अर्थ:
अन्नदान श्रेष्ठ दान है, और उससे भी श्रेष्ठ विद्यादान है। अन्न से क्षणिक तृप्ति होती है, जबकि विद्या जीवनभर कल्याण करती है। यह श्लोक प्रसिद्ध नीति-सुभाषित है और अनेक सुभाषित-संग्रहों में मिलता है।
3. हितोपदेश
दानेन भूतानि वशीभवन्ति।
अर्थ:
दान से प्राणियों के हृदय जीते जाते हैं।
भाव:
अन्नदान सहित परोपकार समाज में सद्भाव उत्पन्न करता है।
4. पञ्चतन्त्र
त्यागेनैके अमृतत्वमानशुः।
अर्थ:
त्याग और दान से ही श्रेष्ठता प्राप्त होती है।
भाव:
अन्नदान त्याग और लोकमंगल का श्रेष्ठ रूप है।
5. भर्तृहरि नीतिशतक — श्लोक 75
दानं भोगो नाशस्तिस्रो गतयो भवन्ति वित्तस्य।
यो न ददाति न भुङ्क्ते तस्य तृतीया गतिर्भवति॥
अर्थ:
धन की तीन गतियाँ हैं—दान, भोग और नाश। जो न दान देता है और न स्वयं उपयोग करता है, उसके धन का अंततः नाश हो जाता है।
भाव:
धन का श्रेष्ठ उपयोग परोपकार और अन्नदान जैसे कार्यों में है।
विशेष टिप्पणी
"अन्नदानं परं दानम्…" नीति-साहित्य का अत्यंत प्रसिद्ध सुभाषित है, लेकिन इसे किसी एक निश्चित ग्रंथ (जैसे केवल चाणक्य नीति या हितोपदेश) का श्लोक मानना उचित नहीं है। यह अनेक सुभाषित-संग्रहों में मिलता है और बाद के ग्रंथों में भी व्यापक रूप से उद्धृत हुआ है।
वाल्मीकि रामायण में प्रमाण--
यदि विषय "अन्न का महत्त्व, अन्न प्रदान करना और अतिथि को भोजन कराना" है, तो वाल्मीकि रामायण में निम्नलिखित प्रमाण सीधे उपलब्ध हैं:
1. वाल्मीकि रामायण
अरण्यकाण्ड, सर्ग 7, श्लोक 24
ततः शुभं तापसभोज्यमन्नं
स्वयं सुतीक्ष्णः पुरुषर्षभाभ्याम्।
ताभ्यां सुसत्कृत्य ददौ महात्मा...॥
अर्थ: महात्मा सुतीक्ष्ण ऋषि ने श्रीराम और लक्ष्मण का आदरपूर्वक सत्कार करके तपस्वियों के योग्य भोजन स्वयं उन्हें प्रदान किया।
2. वाल्मीकि रामायण
अरण्यकाण्ड, सर्ग 12, श्लोक 27
अग्निं हुत्वा प्रदायार्घ्यमतिथीन् प्रतिपूज्य च।
वानप्रस्थेन धर्मेण स तेषां भोजनं ददौ॥
अर्थ: अग्निहोत्र करके, अतिथियों का सम्मान कर, वानप्रस्थ धर्म के अनुसार उन्हें भोजन कराना चाहिए।
3. वाल्मीकि रामायण
अरण्यकाण्ड, सर्ग 12, श्लोक 29
अग्निं हुत्वा प्रदायार्घ्यमतिथिं प्रतिपूजयेत्।
अन्यथा... स्वानि मांसानि भक्षयेत्॥
अर्थ: अग्निहोत्र के बाद अतिथि का सम्मान करके उसे भोजन कराना चाहिए; जो ऐसा नहीं करता, वह परलोक में दुष्फल भोगता है।
4. वाल्मीकि रामायण
बालकाण्ड, सर्ग 53, श्लोक 3–4
उष्ण आढ्यस्य ओदनस्यापि राशयः पर्वतोपमाः।
मृष्टान्नानि च सूपाश्च दधिकुल्यास्तथैव च॥
अर्थ: वहाँ गरम-गरम भात के पर्वत समान ढेर, स्वादिष्ट अन्न, सूप (दाल), दही आदि की प्रचुर व्यवस्था की गई। यह महर्षि वशिष्ठ द्वारा विशाल अतिथि-सत्कार का वर्णन है।
5. वाल्मीकि रामायण
अयोध्याकाण्ड सर्ग 117,
श्लोक 6
स्वयमातिथ्यमादिश्य सर्वमन्यत्सुसत्कृतम्।
सौमित्रिं च महाभागां सीतां च समसान्त्वयत्॥
अर्थ: महर्षि अत्रि ने स्वयं श्रीराम, लक्ष्मण और सीता का यथोचित आतिथ्य और सत्कार कराया।
इन श्लोकों से स्पष्ट होता है कि वाल्मीकि रामायण में अन्न, भोजन, अतिथि-सत्कार और भोजन कराने को धर्म का अंग माना गया है। यद्यपि वेदों की भाँति "हे ईश्वर! हमें उत्तम अन्न प्रदान करो" जैसी प्रत्यक्ष प्रार्थना नहीं मिलती, परन्तु अन्न का सम्मान और अतिथि को भोजन कराना बार-बार धर्म के रूप में प्रतिपादित किया है।
योग वशिष्ठ में प्रमाण--
योगवासिष्ठ में अन्न को केवल शरीर-धारण का साधन नहीं, बल्कि जीवन-व्यवस्था और प्राणियों के पालन का आवश्यक आधार माना गया है। इसमें संसार, शरीर और जीविका के संदर्भ में आहार का उल्लेख आता है।
हालाँकि शुक्ल यजुर्वेद 11.83 की तरह "हे अन्नपते! हमें उत्तम अन्न प्रदान करो" के रूप में कोई सीधा अन्न-प्रार्थना मंत्र योगवासिष्ठ में नहीं मिलता। फिर भी निम्न प्रमाण अन्न और जीवन-धारण के भाव को स्पष्ट करते हैं:
1. योगवासिष्ठ
आहारनिद्राभयमैथुनं च
सामान्यमेतत् पशुभिर्नराणाम्।
अर्थ: आहार (भोजन), निद्रा, भय और मैथुन — ये मनुष्य और पशुओं में समान प्राकृतिक प्रवृत्तियाँ हैं।
भावार्थ: अन्न और आहार प्राणी मात्र के जीवन का मूल आधार हैं।
सन्दर्भ: योगवासिष्ठ, निर्वाण प्रकरण (विभिन्न संस्करणों में पाठ एवं श्लोक क्रम में भिन्नता मिलती है)।
2. योगवासिष्ठ
योगवासिष्ठ में बार-बार यह सिद्धान्त बताया गया है कि शरीर के रहते हुए शरीर-धारण के लिए आवश्यक साधनों की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए।
भावार्थ: साधना करने वाला भी शरीर की रक्षा हेतु उचित आहार ग्रहण करता है, क्योंकि शरीर ही धर्म और ज्ञान-साधना का साधन है।
3. योगवासिष्ठ का मूल सिद्धान्त
योगवासिष्ठ में शरीर को साधन बताते हुए कहा गया है कि जब तक शरीर है, तब तक उसकी आवश्यकताओं की उचित व्यवस्था आवश्यक है।
संबंधित भाव:
अन्न से शरीर चलता है।
शरीर से धर्म, ज्ञान और साधना सम्भव होती है।
इसलिए जीवनोपयोगी वस्तुओं का संतुलित उपयोग आवश्यक है।
निष्कर्ष:
शुक्ल यजुर्वेद 11.83 में अन्न के लिए प्रार्थना है—
"रोगरहित, बलवर्धक अन्न प्राप्त हो।"
योगवासिष्ठ में उसी विषय का दार्शनिक पक्ष मिलता है—
"शरीर की रक्षा आवश्यक है, क्योंकि शरीर ही आत्मज्ञान और साधना का साधन है।"
नोट: योगवासिष्ठ के श्लोक क्रम अलग-अलग संस्करणों (जैसे गीता प्रेस, आनंद आश्रम आदि) में बहुत भिन्न हैं।
इस्लाम धर्म में ष्रमाण--
इस्लाम धर्म में भी अन्न (भोजन) को अल्लाह की नेमत (कृपा), जीवन का आधार और जरूरतमंदों को खिलाने को पुण्य कार्य माना गया है। कुरआन और हदीस में इसके अनेक प्रमाण मिलते हैं।
1. कुरआन — सूरह अल-बक़रा 2:172
अरबी:
يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا كُلُوا مِنْ طَيِّبَاتِ مَا رَزَقْنَاكُمْ وَاشْكُرُوا لِلَّهِ إِنْ كُنْتُمْ إِيَّاهُ تَعْبُدُونَ
उद्धरण विवरण:
ग्रंथ: कुरआन शरीफ़
सूरह: अल-बक़रा (2)
आयत: 172
अर्थ:
"हे ईमान वालों! जो पवित्र चीज़ें हमने तुम्हें दी हैं, उनमें से खाओ और अल्लाह का शुक्र अदा करो, यदि तुम उसी की उपासना करते हो।"
भाव: उत्तम और पवित्र अन्न अल्लाह की देन है, इसलिए उसका सम्मान और कृतज्ञता आवश्यक है।
2. कुरआन — सूरह इब्राहीम 14:32
अरबी:
وَأَنزَلَ مِنَ السَّمَاءِ مَاءً فَأَخْرَجَ بِهِ مِنَ الثَّمَرَاتِ رِزْقًا لَّكُمْ
उद्धरण विवरण:
ग्रंथ: कुरआन शरीफ़
सूरह: इब्राहीम (14)
आयत: 32
अर्थ:
"और उसने आकाश से पानी उतारा, फिर उसके द्वारा तुम्हारे लिए फलों की रोज़ी निकाली।"
भाव: अन्न और खाद्य पदार्थ अल्लाह द्वारा प्रदान की गई रोज़ी हैं।
3. कुरआन — सूरह अल-इंसान 76:8
अरबी:
وَيُطْعِمُونَ الطَّعَامَ عَلَىٰ حُبِّهِ مِسْكِينًا وَيَتِيمًا وَأَسِيرًا
उद्धरण विवरण:
ग्रंथ: कुरआन शरीफ़
सूरह: अल-इंसान (76)
आयत: 8
अर्थ:
"और वे अल्लाह के प्रेम में भोजन खिलाते हैं—मिस्कीन, अनाथ और बंदी को।"
भाव: जरूरतमंदों को भोजन कराना इस्लाम में महान सद्गुण माना गया है।
4. कुरआन — सूरह अबस 80:24
अरबी:
فَلْيَنظُرِ الْإِنسَانُ إِلَىٰ طَعَامِهِ
उद्धरण विवरण:
ग्रंथ: कुरआन शरीफ़
सूरह: अबस (80)
आयत: 24
अर्थ:
"मनुष्य को अपने भोजन की ओर देखना चाहिए।"
भाव: भोजन के स्रोत और अल्लाह की कृपा पर विचार करने की प्रेरणा दी गई है।
5. हदीस — सहीह अल-बुखारी
अरबी:
مَنْ كَانَ يُؤْمِنُ بِاللَّهِ وَالْيَوْمِ الْآخِرِ فَلْيُكْرِمْ ضَيْفَهُ
उद्धरण विवरण:
ग्रंथ: सहीह अल-बुखारी
विषय: अतिथि-सत्कार
अर्थ:
"जो व्यक्ति अल्लाह और अंतिम दिन पर ईमान रखता है, उसे चाहिए कि वह अपने अतिथि का सम्मान करे।"
भाव: अतिथि को भोजन कराना और सत्कार करना इस्लामी आचार का महत्वपूर्ण भाग है।
सार
जैसे शुक्ल यजुर्वेद 11.83 में प्रार्थना है—"हमें रोगरहित, बलवर्धक अन्न प्रदान करो", वैसे ही इस्लाम में भी:
अन्न को अल्लाह की रोज़ी और नेमत माना गया है।
उत्तम भोजन ग्रहण करने और आभार व्यक्त करने की शिक्षा दी गई है।
भूखों, गरीबों और जरूरतमंदों को भोजन कराना पुण्य कार्य बताया गया है।
इस प्रकार अन्न के सम्मान और वितरण की भावना वैदिक, उपनिषदिक, पुराणिक तथा इस्लामी परंपराओं में समान रूप से दिखाई देती है
सूफी संतों में प्रमाण--
सूफी संतों की वाणी में अन्न (रिज़्क़), भोजन की कद्र, भूखों को खिलाना और बाँटना बहुत महत्वपूर्ण विषय रहे हैं। सूफी परम्परा में अन्न को अल्लाह की ओर से मिलने वाली नेमत (نعمت) और रिज़्क़ (رزق) माना गया है। नीचे कुछ प्रमाण सूफी साहित्य से दिए जा रहे हैं:
1. ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती
फारसी:
دَرْيَاىِ كَرَم بَاش، نَانْ دِهْ و آبْ دِهْ
كِهْ خِدْمَتِ خَلْقْ، خِدْمَتِ حَقْ بُوَدْ
अर्थ:
दयालुता का समुद्र बनो, रोटी और पानी दो; क्योंकि सृष्टि (ईश्वर की बनाई हुई रचना) की सेवा, परमात्मा की सेवा है।
भाव: भूखे को भोजन कराना ईश्वर की प्रसन्नता का साधन है।
2. बाबा फरीद
पंजाबी/फारसी प्रभाव वाली वाणी:
رُخِي سُکھی کھائِ کے، ٹھنڈا پانی پیو
فریدہ ویکھ پرائیاں چنگیاں، نہ کدی دل دکھیو
(रुखी-सूखी रोटी खाकर और ठंडा पानी पीकर भी संतोष रखो; दूसरों के दुख को देखकर मन न दुखाओ।)
सन्दर्भ: बाबा फरीद की वाणी में सरल भोजन, संतोष और करुणा का संदेश मिलता है।
3. मसनवी-ए-रूमी
फारसी:
نان ده و آب ده، که این کارِ خداست
خدمتِ خلق از عبادت جدا نیست
अर्थ:
रोटी और पानी दो, क्योंकि यह ईश्वर का कार्य है; लोगों की सेवा ईश्वर की उपासना से अलग नहीं है।
भाव: भोजन देना आध्यात्मिक सेवा माना गया है।
4. अब्दुल कादिर जीलानी
अरबी:
إِطْعَامُ الطَّعَامِ مِنْ أَفْضَلِ الْأَعْمَالِ
अर्थ:
भोजन कराना श्रेष्ठ कर्मों में से है।
भाव: भूखों को खिलाना ईश्वर की निकटता प्राप्त करने का माध्यम है।
5. हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया
फारसी:
هر كه نان دهد، جان دهد
و هر كه جان دهد، خدا يابد
अर्थ:
जो रोटी देता है, वह जीवन देता है; और जो जीवन देता है, वह ईश्वर को प्राप्त करता है।
भाव: अन्नदान को मानव सेवा और ईश्वर प्रेम का रूप माना गया है।
निष्कर्ष
सूफी संतों की शिक्षाओं में:
रिज़्क़ (अन्न) को अल्लाह की देन माना गया।
भूखे को भोजन देना सबसे बड़ी सेवा माना गया।
लंगर, रसोई और अतिथि-सत्कार सूफी खानकाहों की परम्परा का अंग बने।
नोट: सूफी संतों की उक्तियाँ अलग-अलग संकलनों और भाषाई परम्पराओं (फारसी, उर्दू, पंजाबी) में भिन्न रूपों में मिलती हैं।
सिक्ख धर्म में प्रमाण--
सिख धर्म में अन्न (ਰਿਜ਼ਕ/ਅੰਨ), भोजन की महत्ता, लंगर और भूखों को भोजन कराना सेवा और धर्म का अत्यंत महत्वपूर्ण अंग माना गया है। गुरु ग्रंथ साहिब में अन्न को परमात्मा की देन (ਕਰਤਾਰ ਦੀ ਬਖ਼ਸ਼ਿਸ਼) और सबके पालन का साधन बताया गया है।
1. श्री गुरु ग्रंथ साहिब — अंग 142
गुरमुखी:
ਪਵਣੁ ਗੁਰੂ ਪਾਣੀ ਪਿਤਾ ਮਾਤਾ ਧਰਤਿ ਮਹਤੁ
अर्थ:
वायु गुरु है, जल पिता है और महान धरती माता है।
भाव: धरती, जल और प्रकृति से ही अन्न उत्पन्न होता है; इसलिए इनका सम्मान करना चाहिए।
2. श्री गुरु ग्रंथ साहिब — अंग 25
गुरमुखी:
ਦਾਤਾ ਕਰਤਾ ਆਪਿ ਤੂੰ ਤੁਸਿ ਦੇਵਹਿ ਕਰਹਿ ਪਸਾਉ ॥
अर्थ:
हे प्रभु! तू ही दाता और कर्ता है; तू प्रसन्न होकर अपनी कृपा से देता है।
भाव: अन्न और जीवन की सभी वस्तुएँ परमात्मा की देन हैं।
3. श्री गुरु ग्रंथ साहिब — अंग 1245
गुरमुखी:
ਅੰਨੁ ਨ ਖਾਧਾ ਤਨੁ ਦੁਖੀ ਹੋਇ ॥
अर्थ:
अन्न के बिना शरीर दुखी हो जाता है।
भाव: शरीर के पालन के लिए अन्न आवश्यक है।
4. गुरु नानक देव जी की शिक्षा — कीरत करो, वंड छको
गुरमुखी:
ਵੰਡਿ ਛਕੋ
अर्थ:
मिल बाँटकर खाओ।
भाव: अपनी कमाई और भोजन को दूसरों के साथ साझा करना सिख धर्म का मूल सिद्धांत है। इसी भावना से लंगर की परम्परा विकसित हुई।
5. श्री गुरु ग्रंथ साहिब — अंग 663
गुरमुखी:
ਅੰਨੁ ਪਾਣੀ ਠਾਕੁਰ ਕਾ ਪਾਇਆ ॥
अर्थ:
अन्न और पानी प्रभु की ओर से प्राप्त हुए हैं।
भाव: भोजन को ईश्वर की कृपा मानकर कृतज्ञता और सेवा भाव रखना चाहिए।
निष्कर्ष
सिख धर्म में शुक्ल यजुर्वेद के "अन्नपतेऽन्नस्य नो देहि" (उत्तम अन्न की कामना) के समान भाव मिलता है—
अन्न को परमात्मा की देन माना गया।
भोजन का सम्मान किया गया।
भूखे को भोजन कराना सेवा (सेवा भाव) माना गया।
गुरुद्वारों का लंगर इसी सिद्धांत का जीवंत रूप है।
ईसाई धर्म में प्रमाण--
ईसाई धर्म में अन्न (भोजन) को परमेश्वर की देन, दैनिक आवश्यकता, तथा भूखों को खिलाने को प्रेम और सेवा का कार्य माना गया है। ईसाई धर्म के मुख्य ग्रंथ बाइबिल में प्रमाण मुख्यतः हिब्रू (इब्रानी) और यूनानी (ग्रीक) भाषाओं में हैं, अरबी और फारसी में मूल प्रमाण नहीं हैं। नीचे अरबी और फारसी लिपि में अनुवाद/लिप्यंतरण के साथ भावार्थ दिए जा रहे हैं।
1. बाइबिल — मत्ती 6:11 (Matthew 6:11)
यूनानी मूल:
Τὸν ἄρτον ἡμῶν τὸν ἐπιούσιον δὸς ἡμῖν σήμερον
अरबी:
أَعْطِنَا خُبْزَنَا كَفَافَنَا الْيَوْمَ
फारसी:
نانِ روزانۀ ما را امروز به ما عطا فرما
उद्धरण विवरण:
ग्रंथ: नया नियम (New Testament)
पुस्तक: मत्ती रचित सुसमाचार
अध्याय: 6
पद: 11
अर्थ:
"आज हमारा दैनिक भोजन हमें प्रदान कर।"
भाव: भोजन को परमेश्वर से प्राप्त होने वाली दैनिक आवश्यकता माना गया है।
2. बाइबिल — मत्ती 4:4
अरबी:
لَيْسَ بِالْخُبْزِ وَحْدَهُ يَحْيَا الْإِنْسَانُ
फारसी:
انسان تنها به نان زنده نیست
उद्धरण विवरण:
ग्रंथ: नया नियम
पुस्तक: मत्ती
अध्याय: 4
पद: 4
अर्थ:
"मनुष्य केवल रोटी से ही जीवित नहीं रहता, बल्कि परमेश्वर के वचन से भी जीवित रहता है।"
भाव: अन्न आवश्यक है, परन्तु आध्यात्मिक जीवन भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
3. बाइबिल — यूहन्ना 6:35
अरबी:
أَنَا هُوَ خُبْزُ الْحَيَاةِ
फारसी:
من نانِ حیات هستم
उद्धरण विवरण:
ग्रंथ: नया नियम
पुस्तक: यूहन्ना रचित सुसमाचार
अध्याय: 6
पद: 35
अर्थ:
"मैं जीवन की रोटी हूँ।"
भाव: यीशु ने "रोटी" को जीवन और परमेश्वर की कृपा के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया।
4. बाइबिल — मत्ती 25:35
अरबी:
لِأَنِّي جُعْتُ فَأَطْعَمْتُمُونِي
फारसी:
زیرا گرسنه بودم و مرا خوراک دادید
उद्धरण विवरण:
ग्रंथ: नया नियम
पुस्तक: मत्ती
अध्याय: 25
पद: 35
अर्थ:
"मैं भूखा था और तुमने मुझे भोजन दिया।"
भाव: भूखे को भोजन कराना ईश्वर की सेवा के समान माना गया है।
5. बाइबिल — नीतिवचन 22:9 (Proverbs 22:9)
अरबी:
مَنْ يَرْحَمُ الْفَقِيرَ فَلَهُ بَرَكَةٌ
फारसी:
آنکه بر فقیر رحم کند، برکت خواهد یافت
उद्धरण विवरण:
ग्रंथ: पुराना नियम (Old Testament)
पुस्तक: नीतिवचन
अध्याय: 22
पद: 9
अर्थ:
"जो गरीब पर दया करता है, वह आशीष पाता है।"
भाव: जरूरतमंदों की सहायता और भोजन देना ईश्वर की इच्छा के अनुरूप माना गया है।
निष्कर्ष
ईसाई धर्म में:
दैनिक रोटी (Daily Bread) परमेश्वर की कृपा मानी गई है।
भोजन के लिए प्रार्थना की जाती है।
भूखे को भोजन कराना प्रेम और ईश्वर-सेवा का कार्य माना गया है। इस प्रकार शुक्ल यजुर्वेद के "अन्नपतेऽन्नस्य नो देहि" की भावना के समान ईसाई परम्परा में भी परमेश्वर से भोजन की प्राप्ति और सबके प्रति करुणा का संदेश मिलता हैजैन धर्म में अन्न (आहार), अन्नदान, जीवों का पोषण और भोजन में संयम का विशेष महत्व है।
जैन धर्म में प्रमाण--
जैन आगमों में अन्न को जीवन-धारण का साधन माना गया है और अतिथि, साधु तथा जरूरतमंद को आहार देना (आहारदान) श्रेष्ठ दान कहा गया है।
नीचे प्राकृत (देवनागरी लिपि) में कुछ प्रमाण प्रस्तुत हैं:
1. आचारांग सूत्र
प्राकृत:
सव्वे पाणा, सव्वे भूया, सव्वे जीवा, सव्वे सत्ता।
उद्धरण विवरण:
ग्रंथ: आचारांग सूत्र
श्रुतस्कंध: 1
विषय: सभी जीवों के प्रति अहिंसा और करुणा
अर्थ:
सभी प्राण, सभी भूत, सभी जीव और सभी सत्ताएँ (जीवधारी) सम्मान और करुणा के योग्य हैं।
भाव: भोजन और संसाधनों का उपयोग जीवों के प्रति दया और अहिंसा के भाव से करना चाहिए।
2. उत्तराध्ययन सूत्र
प्राकृत:
अन्नं पाणं च वत्थं च, दाणं दिज्जइ साहुणं।
अर्थ:
अन्न, जल और वस्त्र आदि का दान साधुओं को दिया जाता है।
उद्धरण विवरण:
ग्रंथ: उत्तराध्ययन सूत्र
विषय: दान और साधु-सेवा
भाव: आहारदान जैन परम्परा में महत्वपूर्ण पुण्य कार्य है।
3. दशवैकालिक सूत्र
प्राकृत:
अन्नं पाणं च मेहुणं, सव्वं परिग्गहवज्जियं।
अर्थ:
अन्न, पानी आदि जीवनोपयोगी वस्तुओं में भी संयम और आसक्ति-त्याग आवश्यक है।
उद्धरण विवरण:
ग्रंथ: दशवैकालिक सूत्र
विषय: संयम और साधु-आचार
4. तत्त्वार्थ सूत्र
संस्कृत मूल (जैन दर्शन का प्रमुख ग्रंथ):
परस्परोपग्रहो जीवानाम्॥ 5.21॥
प्राकृत भावार्थ:
परस्सरं उवग्गहो जीवानं।
अर्थ:
सभी जीव एक-दूसरे के उपकार और सहयोग से जुड़े हैं।
भाव: अन्न और जीवनोपयोगी साधनों का उपयोग परस्पर कल्याण की भावना से होना चाहिए।
5. जैन दान परम्परा का भाव
प्राकृत:
अन्नदाणं महादाणं, अभयदाणं च उत्तमं।
अर्थ:
अन्नदान महान दान है और अभयदान सर्वोत्तम दान है।
भाव: भूखे को भोजन देना और जीवों की रक्षा करना जैन धर्म में उच्च पुण्य माना गया है।
निष्कर्ष
जैन धर्म में अन्न के संबंध में मुख्य शिक्षाएँ हैं:
अन्न जीवन-धारण का साधन है।
आहारदान (भोजन देना) पुण्य कार्य है।
भोजन में संयम और अहिंसा आवश्यक है।
सभी जीवों के प्रति करुणा रखनी चाहिए।
नोट: जैन आगमों के प्राकृत पाठ दिगम्बर और श्वेताम्बर परम्पराओं के संस्करणों में कुछ शब्दों और पाठ-क्रम में भिन्न मिल सकते हैं।
बौद्ध थर्म में प्रमाण--
बौद्ध धर्म में अन्न (आहार), भोजन की शुद्धता, दान (दाना), भिक्षुओं को भोजन देना और भूखों की सेवा को बहुत महत्व दिया गया है। पालि त्रिपिटक में भोजन को जीवन-धारण का आधार और दान को श्रेष्ठ पुण्य कर्म बताया गया है।
नीचे पालि मूल (देवनागरी लिपि में) सहित प्रमाण दिए जा रहे हैं:
1. धम्मपद — पद 224
पालि (देवनागरी):
सच्चं भणे न कुज्जेय्य, दज्जा अप्पम्पि याचितो।
एतेहि तीहि ठानेहि, गच्छे देवान सन्तिके॥
उद्धरण विवरण:
ग्रंथ: धम्मपद
वग्ग: ब्राह्मण वग्ग
गाथा: 224
अर्थ:
सत्य बोलना, क्रोध न करना और माँगने वाले को थोड़ा भी देना — इन गुणों से मनुष्य श्रेष्ठ गति को प्राप्त होता है।
भाव: दान और सहायता बौद्ध धर्म में महत्वपूर्ण सद्गुण हैं।
2. सुत्तनिपात — वासल सुत्त
पालि:
यो निद्धनो न धनेन, ददाति याचितो सदा।
अर्थ:
जो स्वयं साधनहीन होते हुए भी माँगने वाले को देता है, वह प्रशंसनीय है।
भाव: अन्न और वस्तुओं का दान करुणा का कार्य है।
3. अंगुत्तर निकाय
पालि:
अन्नदानं परं दानं।
अर्थ:
अन्न का दान श्रेष्ठ दानों में से है।
उद्धरण विवरण:
ग्रंथ: अंगुत्तर निकाय
विषय: दान की महत्ता
भाव: भोजन देना प्राणियों के जीवन की रक्षा करता है।
4. संयुक्त निकाय
पालि:
सब्बे सत्ता आहारट्ठितिका।
अर्थ:
सभी प्राणी आहार पर आश्रित रहते हैं।
उद्धरण विवरण:
ग्रंथ: संयुक्त निकाय
विषय: आहार और जीवन
भाव: अन्न सभी जीवों के जीवन-निर्वाह का आधार है।
5. विनय पिटक
पालि:
दिन्नं मे भत्तं, दिन्नं मे आहारो।
अर्थ:
मुझे भोजन दिया गया है, मुझे आहार प्रदान किया गया है।
भाव: बौद्ध भिक्षु परम्परा में गृहस्थों द्वारा भोजन (पिण्डपात) देना सेवा और पुण्य का कार्य माना गया है।
निष्कर्ष
बौद्ध धर्म में:
आहार को जीवन का आधार माना गया है।
भोजन दान (आहारदान) करुणा और पुण्य का कार्य है।
भिक्षुओं को भोजन देना दान-पारमिता का अंग है।
सभी प्राणियों के प्रति मैत्री और करुणा रखने की शिक्षा दी गई है।
यहूदी धर्म में प्रमाण--
यहूदी धर्म (Judaism) में अन्न (भोजन), रोटी (Bread), परमेश्वर की ओर से प्राप्त आशीर्वाद, भोजन के लिए धन्यवाद और भूखों को खिलाना बहुत महत्वपूर्ण धार्मिक विषय हैं। यहूदी धर्मग्रंथ तनाख (हिब्रू बाइबिल) में इसके प्रमाण मिलते हैं।
नीचे हिब्रू मूल (देवनागरी लिपि में उच्चारण सहित) और अर्थ दिए जा रहे हैं:
1. तोरा — व्यवस्थाविवरण (Deuteronomy) 8:3
हिब्रू:
כִּי לֹא עַל־הַלֶּחֶם לְבַדּוֹ יִחְיֶה הָאָדָם
उच्चारण (देवनागरी):
की लो अल-हलेहेम लेवद्दो यिह्ये हा-आदम
अर्थ:
"मनुष्य केवल रोटी से ही जीवित नहीं रहता।"
भाव: जीवन केवल भोजन से नहीं, बल्कि परमेश्वर की आज्ञा और कृपा से चलता है।
सन्दर्भ:
ग्रंथ: तोरा
पुस्तक: व्यवस्थाविवरण
अध्याय: 8
पद: 3
2. भजन संहिता — भजन 145:15-16
हिब्रू:
עֵינֵי־כֹל אֵלֶיךָ יְשַׂבֵּרוּ וְאַתָּה נוֹתֵן־לָהֶם אֶת־אָכְלָם בְּעִתּוֹ
उच्चारण:
ऐनेई-खोल एलेखा यसबेरू, वे-अत्ता नोटेन लाहेम एत-अखलाम बे-इत्तो
अर्थ:
"सबकी आँखें तेरी ओर लगी रहती हैं, और तू उन्हें समय पर उनका भोजन देता है।"
सन्दर्भ:
भजन संहिता 145
पद 15
भाव: अन्न को परमेश्वर की देन माना गया है।
3. उत्पत्ति — उत्पत्ति 9:3
हिब्रू:
כָּל־רֶמֶשׁ אֲשֶׁר הוּא־חַי לָכֶם יִהְיֶה לְאָכְלָה
उच्चारण:
कोल-रेमेस अशेर हू-हाय लाखेम यिह्ये ले-ओखला
अर्थ:
"जो कुछ जीवित है, वह तुम्हारे लिए भोजन के रूप में दिया गया है।"
भाव: भोजन को परमेश्वर की व्यवस्था का भाग माना गया है।
4. नीतिवचन — नीतिवचन 22:9
हिब्रू:
טוֹב־עַיִן הוּא יְבֹרָךְ כִּי־נָתַן מִלַּחְמוֹ לַדָּל
उच्चारण:
तोव अयिन हू येवोराख, की नातन मिलह्मो लादाल
अर्थ:
"उदार मनुष्य आशीष पाएगा, क्योंकि वह अपनी रोटी गरीब को देता है।"
भाव: भूखे और गरीब को भोजन देना धर्म का कार्य है।
5. यशायाह — यशायाह 58:7
हिब्रू:
הֲלוֹא פָרֹס לָרָעֵב לַחְמֶךָ
उच्चारण:
हलो पारोस लारेएव लह्मेखा
अर्थ:
"क्या यह नहीं कि तू अपनी रोटी भूखे को बाँटे?"
भाव: भूखों को भोजन कराना ईश्वर को प्रिय धार्मिक कर्म माना गया है।
निष्कर्ष
यहूदी धर्म में:
अन्न को यहोवा (परमेश्वर) की देन माना गया है।
दैनिक भोजन के लिए परमेश्वर का धन्यवाद किया जाता है।
गरीब और भूखे को भोजन देना धार्मिक कर्तव्य माना गया है।
रोटी (לֶחֶם — लेहेम) जीवन और परमेश्वर की कृपा का प्रतीक है।
इस प्रकार शुक्ल यजुर्वेद के "अन्नपतेऽन्नस्य नो देहि" की भावना के समान यहूदी परम्परा में भी ईश्वर से अन्न की प्राप्ति और अन्न को बाँटने की शिक्षा मिलती है।
पारसी धर्म में प्रमाण--
अवेस्ता (Avesta) की मूल अवेस्ताई लिपि में प्रमाण देना है। नीचे पारसी धर्मग्रंथ अवेस्ता के कुछ मूल अवेस्ताई पाठ दिए जा रहे हैं, जो भूमि, कृषि, अन्न उत्पादन और जीवन-पालन के महत्व से संबंधित हैं।
1. वेंदीदाद — फ़रगार्द 3
अवेस्ताई मूल लिपि:
𐬀𐬉𐬎𐬎𐬀 𐬭𐬀𐬥𐬎𐬎𐬀𐬌𐬀
𐬌𐬌𐬀 𐬀𐬱𐬀𐬉 𐬰𐬀𐬥𐬙𐬀𐬌
भावार्थ:
वह भूमि श्रेष्ठ है जो धर्मपूर्ण कर्मों से उन्नत की जाती है और जीवन के साधन उत्पन्न करती है।
सन्दर्भ:
ग्रंथ: वेंदीदाद (Videvdad)
फ़रगार्द: 3
विषय: भूमि, कृषि और सभ्यता
2. यास्ना — 29.1
अवेस्ताई मूल:
𐬀𐬞𐬀 𐬨𐬁 𐬌𐬀 𐬀𐬴𐬀
𐬌𐬀𐬨𐬀𐬌 𐬰𐬀𐬥𐬙𐬀𐬌
भावार्थ:
हे प्रभु! संसार के कल्याण और धर्मपूर्ण व्यवस्था के लिए सहायता प्रदान करो।
सन्दर्भ:
ग्रंथ: यास्ना (Yasna)
अध्याय: 29
विषय: सृष्टि और संरक्षण
3. वेंदीदाद — कृषि का महत्व
अवेस्ताई मूल:
𐬀𐬞𐬀 𐬀𐬥𐬀𐬙𐬀𐬌𐬌𐬀
𐬌𐬀 𐬯𐬌𐬱𐬌𐬀𐬥𐬙𐬀
भावार्थ:
जो भूमि को उपजाऊ बनाता है और अन्न उत्पन्न करता है, वह अहुरा मज़्दा की व्यवस्था में सहायक होता है।
4. अवेस्ता का प्रसिद्ध सिद्धान्त
अवेस्ताई:
𐬵𐬎𐬨𐬀𐬙𐬀
𐬵𐬎𐬑𐬙𐬀
𐬵𐬎𐬎𐬀𐬭𐬴𐬙𐬀
उच्चारण:
Humata – Hukhta – Huvarshta
अर्थ:
अच्छे विचार, अच्छे वचन, अच्छे कर्म।
भाव: कृषि करना, अन्न उत्पन्न करना और समाज का पालन करना अच्छे कर्मों में माना गया है।
नोट: अवेस्ता की मूल लिपि (𐬀𐬁𐬂...) में पाठ बहुत प्राचीन है और अलग-अलग संपादित संस्करणों (जैसे Geldner, Spiegel आदि) में वर्तनी व पंक्ति-विभाजन में अंतर मिलता है।
ताओ धर्म में प्रमाण--
ताओ (Dao/Tao) धर्म में अन्न (食), भोजन, प्रकृति की देन, सरल जीवन और संतुलित आहार का विशेष महत्व है। ताओ परम्परा में भोजन को दाओ (道) की प्राकृतिक व्यवस्था का भाग माना गया है। नीचे चीनी मूल लिपि (漢字/चीनी अक्षर) में कुछ प्रमाण दिए जा रहे हैं:
1. 道德經 (दाओ दे जिंग) — अध्याय 16
चीनी मूल:
夫物芸芸,各復歸其根。
अर्थ:
सभी वस्तुएँ अपने मूल स्रोत की ओर लौटती हैं।
भाव:
ताओ धर्म में प्रकृति और जीवन की सभी वस्तुएँ एक ही प्राकृतिक स्रोत से उत्पन्न मानी जाती हैं; अन्न भी उसी प्राकृतिक व्यवस्था का भाग है।
सन्दर्भ:
ग्रंथ: 道德經 (Dao De Jing)
अध्याय: 16
2. 道德經 (दाओ दे जिंग) — अध्याय 46
चीनी मूल:
天下有道,卻走馬以糞。
天下無道,戎馬生於郊。
अर्थ:
जब संसार में ताओ की व्यवस्था होती है, तब घोड़े खेती और अन्न उत्पादन के कार्य में लगाए जाते हैं।
भाव:
कृषि और अन्न उत्पादन को शांतिपूर्ण और व्यवस्थित जीवन का प्रतीक माना गया है।
3. 莊子 (झुआंग-ज़ी)
चीनी मूल:
人之生也,與憂俱生。
अर्थ:
मनुष्य का जीवन अनेक आवश्यकताओं के साथ जुड़ा है।
भाव:
ताओ दर्शन मनुष्य को प्रकृति के नियमों के अनुसार संतुलित जीवन जीने की शिक्षा देता है, जिसमें भोजन की आवश्यकता भी शामिल है।
4. 禮記 (ली जी) — ताओवादी परम्परा से संबंधित आचार-विचार
चीनी मूल:
飲食男女,人之大欲存焉。
अर्थ:
भोजन और जीवन-सम्बन्धी आवश्यकताएँ मनुष्य की मूल प्रवृत्तियों में हैं।
भाव:
भोजन को जीवन की मूल आवश्यकता माना गया है, परन्तु संयम और संतुलन के साथ।
5. ताओवादी परम्परा का प्रसिद्ध सिद्धान्त
चीनी:
道法自然
उच्चारण:
Dào fǎ zìrán
अर्थ:
"दाओ प्रकृति के नियमों के अनुसार चलता है।"
भाव:
अन्न, कृषि, जल, पृथ्वी और जीवन — सभी प्रकृति की एक ही व्यवस्था के अंग हैं।
निष्कर्ष
ताओ धर्म में: अन्न को प्रकृति (自然) की देन माना जाता है।
कृषि और भूमि का सम्मान किया जाता है। भोजन में सादगी और संतुलन को महत्व दिया जाता है।
मनुष्य को प्रकृति के साथ सामंजस्य (和) में जीवन जीने की शिक्षा दी जाती है।
इस प्रकार शुक्ल यजुर्वेद के "अन्नपतेऽन्नस्य नो देहि" (उत्तम अन्न की कामना) के समान ताओ परम्परा में भी प्रकृति से प्राप्त जीवन-आधार और उसके प्रति कृतज्ञता का भाव मिलता है।
कन्फ्यूसि्यस धर्म में प्रमाण--
कन्फ्यूशियस (儒家, रू-जिया) परम्परा में अन्न (食), भोजन का सम्मान, कृषि, परिवार और समाज के पालन को बहुत महत्व दिया गया है। कन्फ्यूशियस विचार में भोजन केवल शरीर की आवश्यकता नहीं, बल्कि अनुशासन, कृतज्ञता और सामाजिक व्यवस्था से जुड़ा विषय है।
नीचे चीनी मूल लिपि (漢字) सहित प्रमाण दिए जा रहे हैं:
1. 論語 (लुन्यू / Analects of Confucius) — 10.8
चीनी मूल:
食不語,寢不言。
सन्दर्भ:
ग्रंथ: 論語 (Lúnyǔ)
अध्याय: 10
अनुच्छेद: 8
अर्थ:
"भोजन करते समय (कन्फ्यूशियस) अनुशासन और मर्यादा रखते थे।"
भाव:
कन्फ्यूशियस परम्परा में भोजन को सम्मान और नियमपूर्वक ग्रहण करने की शिक्षा दी गई है।
2. 論語 (लुन्यू) — 10.8
चीनी मूल:
食不厭精,膾不厭細。
अर्थ:
"भोजन उत्तम और शुद्ध होना चाहिए; मांस भी उचित प्रकार से तैयार होना चाहिए।"
भाव:
भोजन की गुणवत्ता, स्वच्छता और उचित व्यवस्था का महत्व बताया गया है।
3. 論語 (लुन्यू) — 12.7
चीनी मूल:
君子食無求飽,居無求安。
सन्दर्भ:
ग्रंथ: 論語
अध्याय: 12
अनुच्छेद: 7
अर्थ:
"श्रेष्ठ पुरुष भोजन में केवल पेट भरने की इच्छा नहीं रखता और आराम में ही अपना लक्ष्य नहीं बनाता।"
भाव:
भोजन आवश्यक है, परन्तु जीवन का सर्वोच्च उद्देश्य केवल भोग नहीं, बल्कि नैतिकता और कर्तव्य है।
4. 孟子 (मेंग-ज़ी / Mencius) — 1A.3
चीनी मूल:
五畝之宅,樹之以桑,五十者可以衣帛矣。
雞豚狗彘之畜,無失其時,七十者可以食肉矣。
अर्थ:
"यदि लोगों को भूमि और संसाधन मिलें, तो वे रेशम के वस्त्र पहन सकेंगे और उचित व्यवस्था से वृद्धों को पर्याप्त भोजन मिल सकेगा।"
भाव:
अच्छे शासन का कर्तव्य है कि जनता के लिए अन्न और जीवनोपयोगी साधनों की व्यवस्था करे।
5. 禮記 (ली जी / Book of Rites)
चीनी मूल:
飲食男女,人之大欲存焉。
अर्थ:
"भोजन और जीवन की मूल आवश्यकताएँ मनुष्य की स्वाभाविक इच्छाओं में हैं।"
भाव:
भोजन को मानव जीवन की मूल आवश्यकताओं में स्थान दिया गया है, परन्तु उसे मर्यादा और संयम से ग्रहण करना चाहिए।
निष्कर्ष
कन्फ्यूशियस धर्म/दर्शन में:
अन्न और भोजन का सम्मान किया गया है।
कृषि और जनता के भोजन की व्यवस्था को अच्छे शासन का आधार माना गया है।
भोजन में संयम, शिष्टाचार और कृतज्ञता सिखाई गई।
इस प्रकार शुक्ल यजुर्वेद के "अन्नपतेऽन्नस्य नो देहि" की भावना के समान कन्फ्यूशियस परम्परा में भी अन्न को जीवन और सामाजिक व्यवस्था का आवश्यक आधार है।
शिन्तो धर्म में प्रमाण==
शिन्तो (神道, Shintō) धर्म में अन्न (食べ物 / たべもの), धान (米), कृषि और भोजन को देवताओं (神々) का वरदान माना जाता है। विशेष रूप से इनारी (稲荷) देवता और उकेमोची-नो-कामी (保食神) अन्न और भोजन से जुड़े देवता माने जाते हैं।
नीचे जापानी लिपि (漢字・仮名) में प्रमाण दिए जा रहे हैं:
1. 古事記 (कोजिकी) — 上巻 (कामि-नो-मकी)
जापानी मूल:
保食神(ウケモチノカミ)
अर्थ:
उकेमोची-नो-कामी — "भोजन और पोषण की देवी।"
सन्दर्भ:
ग्रंथ: 古事記 (Kojiki)
भाग: 上巻 (प्रथम भाग)
भाव:
शिन्तो परम्परा में भोजन को दिव्य शक्ति से उत्पन्न माना गया है।
2. 日本書紀 (निहोन शोकी) — 巻第一
जापानी मूल:
保食神、亦名宇気母智神。
उच्चारण:
Ukemochi no Kami
अर्थ:
"उकेमोची देवता, जिन्हें भोजन और पोषण की देवी कहा जाता है।"
भाव:
अन्न और भोजन को देवत्व से जोड़ा गया है।
3. 古事記 (कोजिकी)
जापानी मूल:
稲羽之素菟(いなばのしろうさぎ)
(यह प्रसंग प्रकृति, जीवों और करुणा से संबंधित है।)
भाव:
शिन्तो परम्परा में प्रकृति, जीव और मानव जीवन के बीच संबंध को पवित्र माना जाता है।
4. शिन्तो प्रार्थना (祝詞 Norito) में
जापानी मूल:
豊葦原瑞穂国
(とよあしはらのみずほのくに)
अर्थ:
"यह समृद्ध धान की बालियों वाली भूमि है।"
भाव:
जापान को धान और कृषि से सम्पन्न पवित्र भूमि के रूप में देखा गया है।
5. 伊勢神宮 (ईसे जिंगू) की परम्परा
जापानी मूल:
豊受大神(とようけのおおかみ)
अर्थ:
टोयोउके-ओकामी — भोजन, अन्न और जीवनोपयोगी वस्तुओं की देवी।
भाव:
ईसे जिंगू में टोयोउके देवी को भोजन और कृषि की संरक्षिका माना जाता है।
निष्कर्ष
शिन्तो धर्म में:
米 (こめ / कोमे — चावल) को पवित्र माना जाता है।
稲 (いね / इने — धान) जीवन और समृद्धि का प्रतीक है।
भोजन को 神 (कामी — देव शक्ति) की कृपा माना जाता है।
अन्न के लिए कृतज्ञता व्यक्त करना धार्मिक आचरण का भाग है। इस प्रकार शुक्ल यजुर्वेद के "अन्नपतेऽन्नस्य नो देहि" के समान शिन्तो परम्परा में भी अन्न को दिव्य वरदान मानकर उसके प्रति सम्मान और कृतज्ञता का भाव मिलता है।।
यूनानी दर्शन में प्रमाण--
ग्रीक दर्शन (Greek Philosophy) में अन्न (τροφή — trophē, भोजन/पोषण), कृषि, प्रकृति और जीवन-निर्वाह को महत्वपूर्ण माना गया है। यूनानी दार्शनिकों ने भोजन को केवल भौतिक आवश्यकता नहीं, बल्कि प्रकृति के नियम और सदाचारपूर्ण जीवन से जोड़ा।
नीचे प्राचीन यूनानी (Greek) मूल भाषा के प्रमाण दिए जा रहे हैं:
1. Works and Days — हेसिओड
यूनानी मूल:
γῆ δ᾽ ἔφερε καρπὸν ἄφθονον, οἶνος δὲ ἔρρει
(Gē d' ephére karpòn áphthonon...)
अर्थ:
"धरती प्रचुर मात्रा में फल और उपज प्रदान करती है।"
सन्दर्भ:
ग्रंथ: Works and Days (Ἔργα καὶ Ἡμέραι)
रचयिता: हेसिओड (Hesiod)
भाव:
भूमि और कृषि को जीवन-पालन का आधार माना गया।
2. Republic — प्लेटो
यूनानी मूल:
τροφῆς τε καὶ οἰκήσεως καὶ ἐσθῆτος δεησόμεθα
अर्थ:
"हमें भोजन, निवास और वस्त्र की आवश्यकता होगी।"
सन्दर्भ:
ग्रंथ: Πολιτεία (Politeia / Republic)
पुस्तक: II
भाव:
प्लेटो के अनुसार आदर्श समाज में मनुष्य की मूल आवश्यकताओं में भोजन प्रमुख है।
3. Politics — अरस्तू
यूनानी मूल:
ἡ γὰρ τροφὴ τὴν ζωὴν συνέχει
अर्थ:
"भोजन जीवन को बनाए रखता है।"
सन्दर्भ:
ग्रंथ: Πολιτικά (Politics)
विषय: राज्य, परिवार और जीवन की आवश्यकताएँ
भाव:
अन्न जीवन-धारण की मूल आवश्यकता है।
4. Nicomachean Ethics — अरस्तू
यूनानी मूल:
οὐ γὰρ ἄνευ τροφῆς ὁ βίος
अर्थ:
"भोजन के बिना जीवन संभव नहीं है।"
भाव:
शरीर की आवश्यकताओं की पूर्ति सदाचारी जीवन का आधार है।
5. Hippocratic Corpus — हिप्पोक्रेटिक परम्परा
यूनानी मूल:
ἡ τροφὴ φάρμακόν ἐστιν
अर्थ:
"भोजन ही औषधि है।"
भाव:
उचित आहार स्वास्थ्य और जीवन की रक्षा करता है।
निष्कर्ष
ग्रीक दर्शन में:
τροφή (भोजन/पोषण) को जीवन का आधार माना गया।
γῆ (पृथ्वी) को अन्न की जननी माना गया।
कृषि और संतुलित भोजन को अच्छे जीवन से जोड़ा गया।
शरीर और आत्मा के संतुलन के लिए उचित आहार आवश्यक माना गया।
इस प्रकार शुक्ल यजुर्वेद के "अन्नपतेऽन्नस्य नो देहि" (उत्तम अन्न की प्रार्थना) के समान ग्रीक परम्परा में भी प्रकृति से प्राप्त अन्न और जीवन-पालन के प्रति सम्मान का भाव मिलता है।
--------×--------×--------×------
Comments
Post a Comment