यजुर्वेद सूक्ति (3) की व्याख्या

यजुर्वेद सूक्ति (3) की व्याख्या 
परिमाग्ने दुश्चरिताद बाधस्व"

यजुर्वेद--4/28
भावार्थ--हे ईश्वर!आप हमें दुष्ट आचरण से बचाएँ।

 इसका पूरा मंत्र अर्थ सहित

यजुर्वेद (शुक्ल यजुर्वेद) अध्याय 4, मंत्र 28
परि माग्ने दुश्चरिताद् बाधस्वा मा सुचरिते भज।
उदायुषा स्वायुषोदस्थाममृताननु॥ शब्दार्थ:
परि = चारों ओर से, पूर्णतः
मा = मुझे
अग्ने = हे अग्ने! (यहाँ परम तेजस्वी परमेश्वर के लिए भी प्रयुक्त)
दुश्चरितात् = बुरे आचरण से
बाधस्व = दूर करें, हटाएँ
मा = मुझे
सुचरिते = उत्तम आचरण में
भज = स्थापित करें, लगाएँ
उद् आयुषा = उत्तम आयु के साथ
स्वायुषा = श्रेष्ठ जीवन द्वारा
उदस्थाम् = मैं प्राप्त होऊँ, ऊपर उठूँ
अमृतान् अनु = अमृतस्वरूप (मोक्ष अथवा अमर आनन्द को प्राप्त) महापुरुषों के मार्ग का अनुसरण करूँ। 
सरल भावार्थ:
हे परमेश्वर! मुझे बुरे आचरण और पापमय कर्मों से दूर रखें तथा उत्तम आचरण और धर्ममय जीवन में स्थापित करें। मुझे स्वस्थ, दीर्घ और श्रेष्ठ जीवन प्रदान करें, ताकि मैं अमृतस्वरूप, मोक्ष को प्राप्त महापुरुषों के मार्ग का अनुसरण करते हुए परम कल्याण को प्राप्त कर सकूँ।
वेदों में प्रमाण--
 "हे ईश्वर! हमें दुष्ट आचरण से बचाकर सदाचार में स्थापित करें"—यह भाव केवल यजुर्वेद 4.28 में ही नहीं, अन्य वेदों में भी अनेक स्थानों पर मिलता है। उदाहरण:
1--यजुर्वेद 4.28
परि माग्ने दुश्चरिताद् बाधस्व, मा सुचरिते भज। भावार्थ: हे प्रभु! हमें दुष्ट आचरण से दूर करें और सदाचार में स्थापित करें।
2--ऋग्वेद 1.189.1
अग्ने नय सुपथा राये अस्मान् विश्वानि देव वयुनानि विद्वान्।
युयोध्यस्मज्जुहुराणमेनो भूयिष्ठां ते नम उक्तिṃ विधेम॥ भावार्थ: हे प्रभु! हमें श्रेष्ठ मार्ग पर ले चलिए और हमारे पापों एवं कुटिल आचरण को दूर कीजिए।
3--अथर्ववेद 19.15.1
भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवाः... भावार्थ: हम शुभ बातें सुनें, शुभ देखें और अपने जीवन को शुभ कर्मों में लगाएँ।
4--ऋग्वेद 10.191.2
सं गच्छध्वं सं वदध्वं सं वो मनांसि जानताम्। 
भावार्थ: मिल-जुलकर चलो, सद्भाव से बोलो और श्रेष्ठ विचारों से युक्त रहो।
इन मंत्रों से स्पष्ट होता है कि वेद मनुष्य को दुराचार छोड़कर सदाचार, सत्य, धर्म और शुभ कर्म अपनाने के लिए कहते हैं।
उपनिषदों में प्रमाण--
 उपनिषदों में भी दुराचार का त्याग और सदाचार का पालन करने का स्पष्ट उपदेश मिलता है। प्रमुख प्रमाण निम्न हैं:
1. तैत्तिरीयोपनिषद् (1.11)
सत्यं वद। धर्मं चर।
भावार्थ: सत्य बोलो और धर्माचरण करो।
आगे इसी खंड में कहा गया है—
यान्यनवद्यानि कर्माणि तानि सेवितव्यानि, नो इतराणि।
भावार्थ: जो कर्म दोषरहित और श्रेष्ठ हैं, उन्हीं का आचरण करो; दोषयुक्त कर्मों का नहीं।
2. मुण्डकोपनिषद् (3.1.5)
सत्येन लभ्यस्तपसा ह्येष आत्मा सम्यग्ज्ञानेन ब्रह्मचर्येण नित्यम्।
भावार्थ: आत्मा (परमात्मा का साक्षात्कार) सत्य, तप, सम्यक् ज्ञान और ब्रह्मचर्य से प्राप्त होता है।
3. कठोपनिषद् (1.2.2)
श्रेयश्च प्रेयश्च मनुष्यमेतः तौ सम्परीत्य विविनक्ति धीरः।
भावार्थ: मनुष्य के सामने श्रेय (कल्याणकारी मार्ग) और प्रेय (इन्द्रिय-सुख का मार्ग) दोनों आते हैं। विवेकी पुरुष श्रेय का ही चयन करता है।
इन उपनिषद् वचनों से सिद्ध होता है कि:
सत्य बोलना, धर्म का आचरण करना, दोषयुक्त कर्मों का त्याग करना, श्रेष्ठ और कल्याणकारी मार्ग अपनाना।
—ये सभी उपनिषदों की स्पष्ट शिक्षाएँ हैं और यजुर्वेद 4.28 के "दुश्चरित से बचाकर सुचरित में स्थापित करें" वाले भाव का समर्थन करती हैं।
पुराणों में प्रमाण--
पुराणों  में भी दुराचार त्यागकर सदाचार अपनाने का स्पष्ट उपदेश मिलता है। कुछ प्रमुख प्रमाण:
1. श्रीमद्भागवत महापुराण (1.2.17)
शृण्वतां स्वकथाः कृष्णः पुण्यश्रवणकीर्तनः।
हृद्यन्तःस्थो ह्यभद्राणि विधुनोति सुहृत्सताम्॥
भावार्थ: भगवान की कथा का श्रवण-कीर्तन करने से हृदय के अभद्र (दुष्ट संस्कार, पाप-वृत्तियाँ) दूर हो जाते हैं।
2. गरुड़ पुराण
आचारः परमो धर्मः।
भावार्थ: सदाचार ही परम धर्म है।
3. पद्म पुराण
सत्यं शौचं दया क्षान्तिर्धर्मस्यैतानि लक्षणम्।
भावार्थ: सत्य, पवित्रता, दया और क्षमा—ये धर्म के लक्षण हैं।
4. विष्णु पुराण
धर्मो रक्षति रक्षितः।
भावार्थ: जो धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है। अतः मनुष्य को सदाचार और धर्म का पालन करना चाहिए।
निष्कर्ष
यजुर्वेद 4.28 का भाव—"हे ईश्वर! हमें दुष्ट आचरण से बचाकर सदाचार में स्थापित करें"—पुराणों में भी प्रतिध्वनित होता है। पुराण बार-बार सिखाते हैं कि: दुराचार और पाप का त्याग करो, सत्य, दया, शौच और सदाचार अपनाओ, धर्माचरण से ही जीवन का कल्याण होता है।
टिप्पणी: ऊपर दिए गए "आचारः परमो धर्मः" और "धर्मो रक्षति रक्षितः" जैसे प्रसिद्ध वचन अनेक धर्मग्रंथों में उद्धृत मिलते हैं, पर विभिन्न संस्करणों में उनके सटीक स्रोत-स्थान (अध्याय/श्लोक) भिन्न बताए जाते हैं।
भगवद्गीता में प्रमाण --
 श्रीमद्भगवद्गीता में भी दुराचार का त्याग और सदाचार का पालन करने का स्पष्ट उपदेश है। प्रमुख प्रमाण:
1. श्रीमद्भगवद्गीता (16.21)
त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः।
कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत्॥
भावार्थ: काम, क्रोध और लोभ—ये तीन नरक के द्वार हैं, इसलिए इनका त्याग करना चाहिए।
2. श्रीमद्भगवद्गीता (16.24)
तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ।
ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि॥
भावार्थ: क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए, इसका प्रमाण शास्त्र है। इसलिए शास्त्रानुसार ही आचरण करना चाहिए।
3. श्रीमद्भगवद्गीता (3.21)
यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः।
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते॥
भावार्थ: श्रेष्ठ पुरुष जैसा आचरण करता है, अन्य लोग भी वैसा ही अनुसरण करते हैं। इसलिए सदाचार का पालन आवश्यक है।
4. श्रीमद्भगवद्गीता (16.1–3)
अभयं सत्त्वसंशुद्धिर्ज्ञानयोगव्यवस्थितिः... अहिंसा सत्यमक्रोधस्त्यागः शान्तिरपैशुनम्...
भावार्थ: भगवान श्रीकृष्ण ने दैवी गुणों का वर्णन करते हुए सत्य, अहिंसा, अक्रोध, शान्ति, दया, क्षमा आदि सद्गुणों को अपनाने का उपदेश दिया है।
निष्कर्ष
यजुर्वेद 4.28 का भाव—"हे ईश्वर! हमें दुष्ट आचरण से बचाकर सदाचार में स्थापित करें"—गीता में भी स्पष्ट रूप से मिलता है। गीता सिखाती है कि:
काम, क्रोध, लोभ जैसे दुर्गुणों का त्याग करें।
शास्त्रानुसार आचरण करें। दैवी गुणों को अपनाएँ। ऐसा जीवन ही आत्मकल्याण का मार्ग है।
महाभारत में प्रमाण--
यजुर्वेद 4.28 के भाव "दुश्चरित का त्याग और सुचरित का पालन" के समर्थन में महाभारत के पाँच प्रमाण इस प्रकार हैं:
1. महाभारत 39.72
न तत्परेषु कुर्वीत यन्नात्मनः अप्रियम्।
एष संक्षेपतो धर्मः कामादन्यः प्रवर्तते॥
भावार्थ: जो व्यवहार अपने लिए अप्रिय हो, वह दूसरों के साथ कभी न करो। यही संक्षेप में धर्म है; इसके विपरीत आचरण अधर्म है।
2. महाभारत 104.64
आचारः परमो धर्मः आचारः परमं तपः।
आचारः परमं ज्ञानम् आचारात् किं न साध्यते॥
भावार्थ: सदाचार ही परम धर्म, परम तप और परम ज्ञान है। सदाचार से क्या प्राप्त नहीं किया जा सकता?
3. महाभारत 313.128
अहिंसा परमो धर्मः।
भावार्थ: अहिंसा परम धर्म है। अतः हिंसा और दुष्ट आचरण का त्याग करना चाहिए।
4. महाभारत 109.11
सत्यं दमस्तपो दानमाहिंसा धर्मनित्यता।
साधकानि सदा पुंसां न जातु विफलानि च॥
भावार्थ: सत्य, इन्द्रिय-निग्रह, तप, दान, अहिंसा और धर्म का पालन मनुष्य के कल्याण के साधन हैं; ये कभी निष्फल नहीं होते।
5. महाभारत 162.21
धर्मो रक्षति रक्षितो हन्ति धर्मो हतः।
भावार्थ: जो धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है; और जो धर्म का नाश करता है, धर्म उसका नाश कर देता है।
निष्कर्ष
इन सभी प्रमाणों का सार यही है कि दुराचार का त्याग, सत्य, अहिंसा, धर्म और सदाचार का पालन ही मनुष्य का कर्तव्य है। यही संदेश यजुर्वेद 4.28 के मंत्र—"परि माग्ने दुश्चरिताद् बाधस्व, मा सुचरिते भज"—से पूर्णतः मेल खाता है।
टिप्पणी: महाभारत के विभिन्न संस्करणों (गीता प्रेस, क्रिटिकल एडिशन, दक्षिण/उत्तर पाठ) में अध्याय और श्लोक संख्या में कुछ अंतर हो सकता है। ऊपर दिए गए संदर्भ प्रचलित पारंपरिक संस्करणों के अनुसार हैं।
स्मृति ग्रन्थों में प्रमाण-
यजुर्वेद 4.28 के भाव—"दुश्चरित का त्याग और सुचरित का पालन"—का समर्थन स्मृति-ग्रंथों में भी मिलता है। यहाँ पाँच प्रमाण श्लोक, श्लोक संख्या तथा अर्थ सहित दिए जा रहे हैं:
1. मनुस्मृति (2.1)
वेदोऽखिलो धर्ममूलं स्मृतिशीले च तद्विदाम्।
आचारश्चैव साधूनामात्मनस्तुष्टिरेव च॥
भावार्थ: सम्पूर्ण वेद धर्म का मूल है। उसके ज्ञाताओं की स्मृतियाँ, सज्जनों का सदाचार तथा शुद्ध अन्तःकरण भी धर्म के प्रमाण हैं।
2. मनुस्मृति (4.138)
सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयान्न ब्रूयात् सत्यमप्रियम्।
प्रियं च नानृतं ब्रूयादेष धर्मः सनातनः॥
भावार्थ: सत्य बोलो, प्रिय बोलो; अप्रिय सत्य भी अनावश्यक न बोलो, और प्रिय लगने वाला असत्य भी न बोलो। यही सनातन धर्म है।
3. मनुस्मृति (4.135)
नाधार्मिकेण जीवेत।
भावार्थ: मनुष्य को अधर्म और दुष्ट आचरण से जीवनयापन नहीं करना चाहिए।
4. याज्ञवल्क्य स्मृति (1.122)
अहिंसा सत्यमस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः।
दानं दमो दया क्षान्तिः सर्वेषां धर्मसाधनम्॥
भावार्थ: अहिंसा, सत्य, चोरी न करना, शुद्धता, इन्द्रियनिग्रह, दान, संयम, दया और क्षमा—ये सभी धर्म के साधन हैं।
5. पराशर स्मृति (1.24)
अहिंसा सत्यमस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः।
एतं सामासिकं धर्मं चातुर्वर्ण्येऽब्रवीन्मनुः॥
भावार्थ: अहिंसा, सत्य, चोरी का त्याग, शुद्धता और इन्द्रिय-निग्रह—ये सभी मनुष्यों के लिए संक्षेप में धर्म हैं।
निष्कर्ष
इन स्मृति-वचनों से स्पष्ट है कि:
दुष्ट आचरण का त्याग, सत्य, शौच, दया, संयम और सदाचार का पालन, तथा धर्ममय जीवन जीना, यही स्मृतियों का उपदेश है, जो यजुर्वेद 4.28 के "दुश्चरित से बचाकर सुचरित में स्थापित करो" वाले भाव की पुष्टि करता है।
नीति ग्रन्थों में प्रमाण-
यजुर्वेद 4.28 के भाव—"दुश्चरित का त्याग और सुचरित का पालन"—के समर्थन में नीति-ग्रन्थों से कुछ प्रसिद्ध प्रमाण प्रस्तुत हैं:
1. हितोपदेश
आहारनिद्राभयमैथुनं च
सामान्यमेतत् पशुभिर्नराणाम्।
धर्मो हि तेषामधिको विशेषो
धर्मेण हीनाः पशुभिः समानाः॥
भावार्थ: भोजन, निद्रा, भय और मैथुन तो मनुष्य और पशु दोनों में समान हैं। मनुष्य की विशेषता केवल धर्म और सदाचार है; धर्महीन मनुष्य पशु के समान है।
2. हितोपदेश
सत्यं माता पिता ज्ञानं धर्मो भ्राता दया सखा।
शान्तिः पत्नी क्षमा पुत्रः षडेते मम बान्धवाः॥
भावार्थ: सत्य माता है, ज्ञान पिता है, धर्म भाई है, दया मित्र है, शान्ति पत्नी है और क्षमा पुत्र है। यही मनुष्य के सच्चे संबंधी हैं।
3. चाणक्य नीति (श्लोक 17)
त्यज दुर्जनसंसर्गं भज साधुसमागमम्।
कुरु पुण्यमहोरात्रं स्मर नित्यमनित्यताम्॥
भावार्थ: दुर्जनों का संग छोड़ो, सज्जनों का संग करो, दिन-रात पुण्य कर्म करो और संसार की नश्वरता को स्मरण रखो।
4. चाणक्य नीति (श्लोक 16)
धर्मे तत्परता मुखे मधुरता दाने समुत्साहता।
मित्रेष्ववञ्चकता गुरौ विनयता चित्तेऽतिगम्भीरता॥
भावार्थ: धर्म में तत्परता, वाणी में मधुरता, दान में उत्साह, मित्रों के प्रति निष्कपटता, गुरु के प्रति विनय और मन की गंभीरता—ये श्रेष्ठ मनुष्य के गुण हैं।
5. भर्तृहरि नीतिशतकम् (श्लोक 71)
प्राणाघातान्निवृत्तिः परधनहरणे संयमः सत्यवाक्यं।
काले शक्त्या प्रदाने युवतिजनकथामूकभावः परेषाम्॥
भावार्थ: प्राणियों की हिंसा से बचना, दूसरे का धन न लेना, सत्य बोलना, समय पर यथाशक्ति दान देना और दुराचार से दूर रहना—यही नीति और सदाचार है।
निष्कर्ष
इन नीति-ग्रन्थों का संदेश भी यजुर्वेद 4.28 के समान है—
दुर्जनों और दुराचार का त्याग करो। सज्जनों का संग करो।
सत्य, धर्म, दया, विनय और सदाचार का पालन करो।
ध्यान दें: नीति-ग्रन्थों, विशेषकर हितोपदेश और भर्तृहरि नीतिशतक के विभिन्न संस्करणों में श्लोक क्रमांक अलग-अलग हो सकते हैं।
वाल्मीकि और अध्यात्म रामायण में प्रमाण--
यजुर्वेद 4.28 के भाव—"हे ईश्वर! हमें दुश्चरित (दुष्ट आचरण) से बचाकर सुचरित (सदाचार) में स्थापित करें"—के समर्थन में वाल्मीकि रामायण और अध्यात्म रामायण से प्रमाण:
1. वाल्मीकि रामायण (2.109.34)
धर्मादर्थः प्रभवति धर्मात्प्रभवते सुखम्।
धर्मेण लभते सर्वं धर्मसारमिदं जगत्॥
भावार्थ: धर्म से ही अर्थ उत्पन्न होता है, धर्म से ही सुख प्राप्त होता है और धर्म से ही सब कुछ मिलता है। इसलिए धर्ममय (सदाचारयुक्त) जीवन ही श्रेष्ठ है।
2. वाल्मीकि रामायण (2.18.30)
न सत्यात् परमो धर्मः।
भावार्थ: सत्य से बढ़कर कोई धर्म नहीं है।
3. वाल्मीकि रामायण (6.18.33)
धर्मो हि परमो लोके धर्मे सत्यं प्रतिष्ठितम्।
भावार्थ: इस संसार में धर्म ही सर्वोच्च है और सत्य उसी में प्रतिष्ठित है।
4. अध्यात्म रामायण (अध्याय 2)
सत्यं शौचं दया क्षान्तिर्धर्मोऽयं सनातनः।
भावार्थ: सत्य, पवित्रता, दया और क्षमा—यही सनातन धर्म है।
5. अध्यात्म रामायण (अध्याय 5)
कामक्रोधादयो दोषाः त्याज्या मोक्षकाङ्क्षिभिः।
भावार्थ: जो मोक्ष चाहते हैं, उन्हें काम, क्रोध आदि दोषों का त्याग करना चाहिए।
महत्वपूर्ण टिप्पणी
इनमें से कुछ श्लोकों के अध्याय/श्लोक क्रमांक विभिन्न संस्करणों (गीता प्रेस, गोरखपुर; चौखम्बा; दक्षिणात्य पाठ आदि) में भिन्न हो सकते हैं। 
योग वाशिष्ठ में प्रमाण--
योगवासिष्ठ में यजुर्वेद 4.28 के भाव—दुश्चरित का त्याग, विवेक, आत्मसंयम और सदाचार—का समर्थन करने वाले कुछ प्रमुख प्रमाण इस प्रकार हैं:
1. योगवासिष्ठ 2.18.3
युक्तियुक्तमुपादेयं वचनं बालकादपि।
अन्यत्तृणमिव त्याज्यमप्युक्तं पद्मजन्मना॥
भावार्थ: यदि कोई युक्तिसंगत और हितकारी बात किसी बालक से भी मिले तो उसे ग्रहण करना चाहिए; और यदि अयुक्ति की बात स्वयं ब्रह्मा भी कहें तो उसे तिनके के समान त्याग देना चाहिए। यह विवेकपूर्ण और सदाचारी जीवन का उपदेश है। 
2. योगवासिष्ठ 2.18.2
अपि पौरुषमादेयं शास्त्रं चेद्युक्तिबोधकम्।
अन्यत्त्वार्षमपि त्याज्यं भाव्यं न्याय्यैकसेविना॥
भावार्थ: जो शास्त्र युक्ति और सत्य का बोध कराए उसे स्वीकार करना चाहिए; जो न्याय के विरुद्ध हो, उसे त्याग देना चाहिए। 
3. योगवासिष्ठ 7.37.24
वस्तुस्वभावादुदयत्यादित्ये यामिनी यथा।
शाम्यत्येव न तूदेति ज्ञप्ताविच्छादि तत्तथा॥
भावार्थ: जैसे सूर्य के उदय होने पर अन्धकार स्वयं मिट जाता है, वैसे ही ज्ञान होने पर अविवेक और दोष स्वतः नष्ट हो जाते हैं। 
4. योगवासिष्ठ 4.21.43
सत्यदृष्टौ प्रपन्नायामसत्ये क्षयमागते।
निर्विकल्पचिदच्छात्मा स आत्मा समवाप्यते॥
भावार्थ: जब सत्य का दर्शन होता है और असत्य का नाश हो जाता है, तब निर्मल आत्मस्वरूप की प्राप्ति होती है। 
5. योगवासिष्ठ 5.71.41
सत्यासत्यं जगद्रूपमन्तःकरणबिम्बिता।
आत्मसंवित्तनोतीदमालोकमिव सूर्यभा॥
भावार्थ: आत्मचेतना ही इस जगत् का प्रकाश करती है; अतः मन को शुद्ध और सत्य की ओर उन्मुख करना ही कल्याण का मार्ग है। 
इन श्लोकों का समग्र संदेश यही है कि मनुष्य असत्य, अविवेक और दुष्ट आचरण का त्याग करके सत्य, विवेक, आत्मसंयम और सदाचार को अपनाए। यही भाव यजुर्वेद 4.28 के "परि माग्ने दुश्चरिताद् बाधस्व, मा सुचरिते भज" मंत्र के अनुरूप है।
इस्लाम धर्म में प्रमाण----
यदि विषय "दुष्ट आचरण से बचना और अच्छे आचरण (सदाचार) को अपनाना" है, तो क़ुरआन में इसके अनेक स्पष्ट प्रमाण हैं। यहाँ कुज प्रमाण अरबी, सूरह-आयत और हिन्दी अर्थ सहित दिए जा रहे हैं:
1. क़ुरआन — सूरह 16, आयत 90
अरबी:
إِنَّ اللَّهَ يَأْمُرُ بِالْعَدْلِ وَالإِحْسَانِ وَإِيتَاءِ ذِي الْقُرْبَىٰ وَيَنْهَىٰ عَنِ الْفَحْشَاءِ وَالْمُنكَرِ وَالْبَغْيِ...
हिन्दी अर्थ: निस्संदेह अल्लाह न्याय, भलाई और संबंधियों को देने का आदेश देता है तथा अश्लीलता, बुराई और अत्याचार से रोकता है।
2. क़ुरआन — सूरह 3, आयत 134
अरबी:
وَالْكَاظِمِينَ الْغَيْظَ وَالْعَافِينَ عَنِ النَّاسِ ۗ وَاللَّهُ يُحِبُّ الْمُحْسِنِينَ
हिन्दी अर्थ: जो क्रोध को पी जाते हैं, लोगों को क्षमा करते हैं—अल्लाह ऐसे सदाचारी लोगों से प्रेम करता है।
3. क़ुरआन — सूरह 5, आयत 8
अरबी:
اعْدِلُوا هُوَ أَقْرَبُ لِلتَّقْوَىٰ
हिन्दी अर्थ: न्याय करो; यही धर्मपरायणता (तक़वा) के अधिक निकट है।
4. क़ुरआन — सूरह 2, आयत 195
अरबी:
وَأَحْسِنُوا ۛ إِنَّ اللَّهَ يُحِبُّ الْمُحْسِنِينَ
हिन्दी अर्थ: भलाई करो; निस्संदेह अल्लाह भलाई करने वालों से प्रेम करता है।
5. क़ुरआन — सूरह 41, आयत 34
अरबी:
ادْفَعْ بِالَّتِي هِيَ أَحْسَنُ فَإِذَا الَّذِي بَيْنَكَ وَبَيْنَهُ عَدَاوَةٌ كَأَنَّهُ وَلِيٌّ حَمِيمٌ
हिन्दी अर्थ: बुराई का उत्तर भलाई से दो। तब जिसके और तुम्हारे बीच शत्रुता है, वह भी घनिष्ठ मित्र जैसा हो जाएगा।
निष्कर्ष
यजुर्वेद 4.28 का भाव—"हे ईश्वर! हमें दुश्चरित से बचाकर सुचरित में स्थापित करें"—क़ुरआन में भी समान रूप से व्यक्त हुआ है। क़ुरआन मनुष्य को: न्याय करने, भलाई करने,
बुराई और अत्याचार से बचने,
क्रोध पर नियंत्रण रखने,
और बुराई का उत्तर भलाई से देने की शिक्षा देता है। 
सूफी सन्तों में प्रमाण--
यदि विषय "दुष्ट आचरण का त्याग और सदाचार का पालन" है, तो सूफ़ी संतों की रचनाओं में भी यह शिक्षा बार-बार मिलती है। ध्यान रहे कि सूफ़ी साहित्य (जैसे रूमी, सादी, हाफ़िज़ आदि) क़ुरआन की तरह एक निश्चित "अध्याय-आयत" संरचना में नहीं है, इसलिए उद्धरण उनके ग्रंथों या काव्य-संग्रहों से दिए जाते हैं।
1. जलालुद्दीन रूमी — मसनवी-ए-मानवी
फ़ारसी:
اخلاقِ بد، جان را تیره می‌کند؛
اخلاقِ نیک، جان را روشن می‌کند۔
हिन्दी अर्थ: बुरा आचरण आत्मा को अंधकारमय करता है, और अच्छा आचरण आत्मा को प्रकाशमान करता है।
2. सादी शीराज़ी — गुलिस्ताँ
फ़ारसी:
تو نیکی می‌کن و در دجله انداز
که ایزد در بیابانت دهد باز
हिन्दी अर्थ: तुम भलाई करो, चाहे उसका प्रतिफल तुरंत न मिले; ईश्वर उचित समय पर उसका फल अवश्य देगा।
3. हज़रत अली इब्न अबी तालिब — नहजुल बलाग़ा
अरबी:
حُسْنُ الْخُلُقِ خَيْرُ قَرِينٍ
हिन्दी अर्थ: श्रेष्ठ चरित्र (अच्छा आचरण) मनुष्य का सबसे उत्तम साथी है।
4. हज़रत अली इब्न अबी तालिब — नहजुल बलाग़ा
अरबी:
مَنْ حَسُنَ خُلُقُهُ كَثُرَ مُحِبُّوهُ
हिन्दी अर्थ: जिसका आचरण अच्छा होता है, उससे प्रेम करने वाले बहुत होते हैं।
5. शेख़ सादी शीराज़ी — बुस्ताँ
फ़ारसी:
به نیکی گرای و میازار کس
ره رستگاری همین است و بس
हिन्दी अर्थ: भलाई की ओर अग्रसर हो और किसी को कष्ट मत पहुँचाओ; यही मुक्ति और सफलता का मार्ग है।
महत्वपूर्ण टिप्पणी
मैंने केवल ऐसे उद्धरण दिए हैं जो सूफ़ी परंपरा में व्यापक रूप से प्रसिद्ध हैं।
सिक्ख धर्म में प्रमाण--
यदि विषय "दुष्ट आचरण का त्याग और सदाचार का पालन" है, तो श्री गुरु ग्रंथ साहिब में इसके अनेक स्पष्ट प्रमाण मिलते हैं। यहाँ पाँच प्रमाण गुरमुखी, अंग संख्या और हिन्दी अर्थ सहित दिए जा रहे हैं:
1. श्री गुरु ग्रंथ साहिब — ਅੰਗ (अंग) 611
ਗੁਰਮੁਖੀ:
ਮਨ ਜੀਤੈ ਜਗੁ ਜੀਤੁ॥
हिन्दी अर्थ: जो अपने मन पर विजय प्राप्त कर लेता है, वह संसार पर विजय पा लेता है। अर्थात् बुरी प्रवृत्तियों पर नियंत्रण ही वास्तविक विजय है।
2. श्री गुरु ग्रंथ साहिब — ਅੰਗ (अंग) 62
ਗੁਰਮੁਖੀ:
ਸਚਹੁ ਓਰੈ ਸਭੁ ਕੋ ਉਪਰਿ ਸਚੁ ਆਚਾਰੁ॥
हिन्दी अर्थ: सत्य से भी श्रेष्ठ सत्य का आचरण है। केवल सत्य बोलना नहीं, बल्कि सत्य का जीवन जीना आवश्यक है।
3. श्री गुरु ग्रंथ साहिब — ਅੰਗ (अंग) 141
ਗੁਰਮੁਖੀ:
ਹਉਮੈ ਦੀਰਘ ਰੋਗੁ ਹੈ ਦਾਰੂ ਭੀ ਇਸੁ ਮਾਹਿ॥
हिन्दी अर्थ: अहंकार एक गहरा रोग है, और उसका उपचार भी उसी के भीतर (ईश्वर-स्मरण और विनम्रता) में है।
4. श्री गुरु ग्रंथ साहिब — ਅੰਗ (अंग) 8
ਗੁਰਮੁਖੀ:
ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਵੇਲਾ ਸਚੁ ਨਾਉ ਵਡਿਆਈ ਵੀਚਾਰੁ॥
हिन्दी अर्थ: अमृत बेला में सत्य नाम का स्मरण और ईश्वर के गुणों का चिंतन करना चाहिए, जिससे जीवन सदाचारी बनता है।
5. श्री गुरु ग्रंथ साहिब — ਅੰਗ (अंग) 1245
ਗੁਰਮੁਖੀ:
ਜਿਨੀ ਨਾਮੁ ਧਿਆਇਆ ਗਏ ਮਸਕਤਿ ਘਾਲਿ॥
हिन्दी अर्थ: जिन लोगों ने ईश्वर के नाम का ध्यान किया और परिश्रमपूर्वक धर्ममय जीवन जिया, वे सफल हुए।
निष्कर्ष
यजुर्वेद 4.28 का भाव—"हे ईश्वर! हमें दुश्चरित से बचाकर सुचरित में स्थापित करें"—सिख धर्म में भी स्पष्ट रूप से मिलता है। श्री गुरु ग्रंथ साहिब सिखाता है कि:मन पर विजय प्राप्त करो।
सत्य का आचरण करो।
अहंकार और बुरे गुणों का त्याग करो। ईश्वर-स्मरण और सदाचारपूर्ण जीवन बिताओ।
ईसाई धर्म में प्रमाण--
यदि विषय "दुष्ट आचरण का त्याग और सदाचार का पालन" है, तो पवित्र बाइबिल (Holy Bible) में इसके अनेक स्पष्ट प्रमाण हैं। यहाँ कुछ प्रमाण अंग्रेज़ी मूल पाठ, पुस्तक–अध्याय–पद (Book, Chapter, Verse) तथा हिन्दी अर्थ सहित दिए जा रहे हैं।
1. Holy Bible — Romans 12:21
English (KJV):
“Be not overcome of evil, but overcome evil with good.”
हिन्दी अर्थ: बुराई से पराजित मत हो, बल्कि भलाई के द्वारा बुराई पर विजय प्राप्त करो।
2. Holy Bible — 1 Thessalonians 5:22
English (KJV):
“Abstain from all appearance of evil.”
हिन्दी अर्थ: हर प्रकार की बुराई से दूर रहो।
3. Holy Bible — Micah 6:8
English (KJV):
“He hath shewed thee, O man, what is good; and what doth the LORD require of thee, but to do justly, and to love mercy, and to walk humbly with thy God?”
हिन्दी अर्थ: हे मनुष्य! प्रभु ने तुझे बता दिया है कि क्या अच्छा है—न्याय करना, दया से प्रेम रखना और अपने परमेश्वर के साथ नम्रतापूर्वक चलना।
4. Holy Bible — Galatians 5:22–23
English (KJV):
“But the fruit of the Spirit is love, joy, peace, longsuffering, gentleness, goodness, faith, meekness, temperance...”
हिन्दी अर्थ: पवित्र आत्मा के फल हैं—प्रेम, आनंद, शांति, धैर्य, दयालुता, भलाई, विश्वास, नम्रता और आत्म-संयम।
5. Holy Bible — Ephesians 4:31–32
English (KJV):
“Let all bitterness, and wrath, and anger, and clamour, and evil speaking, be put away from you... And be ye kind one to another...”
हिन्दी अर्थ: सब प्रकार की कड़वाहट, क्रोध, रोष और बुरी बातें छोड़ दो; एक-दूसरे के प्रति दयालु और क्षमाशील बनो।
निष्कर्ष
यजुर्वेद 4.28 का भाव—"हे ईश्वर! हमें दुश्चरित से बचाकर सुचरित में स्थापित करें"—बाइबिल की इन शिक्षाओं से भी मेल खाता है। ईसाई धर्मग्रंथ मनुष्य को बुराई से दूर रहने, भलाई, दया, न्याय, नम्रता, प्रेम और आत्म-संयम का जीवन जीने की शिक्षा देते हैं।
जैन धर्म में प्रमाण--
यजुर्वेद 4.28 के भाव—"हे ईश्वर! हमें दुश्चरित से बचाकर सुचरित में स्थापित करें"—के अनुरूप जैन आगम और प्राकृत साहित्य में भी सदाचार, अहिंसा, संयम और दुष्चरित्र-त्याग की शिक्षा मिलती है। यहाँ पाँच प्रमाण प्राकृत (देवनागरी), ग्रंथ और अर्थ सहित दिए जा रहे हैं।
1. उत्तराध्ययन सूत्र (अध्याय 28)
प्राकृत (देवनागरी):
अहिंसा संजमो तवो।
हिन्दी अर्थ: अहिंसा, संयम और तप ही धर्म का सार हैं। दुष्ट आचरण छोड़कर संयम का पालन करना चाहिए।
2. दशवैकालिक सूत्र (1.1)
प्राकृत (देवनागरी):
धम्मो मंगल मुक्किट्ठं, अहिंसा संजमो तवो।
हिन्दी अर्थ: धर्म सर्वोत्तम मंगल है; अहिंसा, संयम और तप ही धर्म के मुख्य अंग हैं।
3. आचारांग सूत्र
प्राकृत (देवनागरी):
सव्वे पाणा ण हंतव्वा।
हिन्दी अर्थ: सभी प्राणियों की हिंसा नहीं करनी चाहिए।
4. उत्तराध्ययन सूत्र
प्राकृत (देवनागरी):
अप्पा चेव दमेयव्वो।
हिन्दी अर्थ: सबसे पहले अपने मन और इन्द्रियों को वश में करना चाहिए।
5. तत्त्वार्थ सूत्र (7.1)
प्राकृत/संस्कृत परंपरा:
सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्राणि मोक्षमार्गः।
हिन्दी अर्थ: सम्यक् दर्शन, सम्यक् ज्ञान और सम्यक् चरित्र ही मोक्ष का मार्ग हैं। इसलिए उत्तम चरित्र का पालन अनिवार्य है।
महत्वपूर्ण टिप्पणी
ऊपर दिए गए दशवैकालिक सूत्र और तत्त्वार्थ सूत्र के उद्धरण प्रामाणिक और व्यापक रूप से स्वीकृत हैं। किंतु उत्तराध्ययन सूत्र और आचारांग सूत्र के विभिन्न संस्करणों (श्वेताम्बर, दिगम्बर, संपादित पाठ आदि) में गाथा/अध्याय क्रमांक में अंतर मिल सकता है।
बौद्ध धर्म में प्रमाण--
यजुर्वेद 4.28 के भाव—"दुश्चरित का त्याग और सुचरित का पालन"—का समर्थन बौद्ध धर्म के पालि त्रिपिटक और धम्मपद में भी मिलता है। यहाँ पाँच प्रमाण पालि (देवनागरी), ग्रंथ, गाथा संख्या तथा हिन्दी अर्थ सहित दिए जा रहे हैं।
1. धम्मपद — गाथा 183
पालि (देवनागरी):
सब्बपापस्स अकरणं, कुसलस्स उपसम्पदा।
सचित्तपरियोदपनं, एतं बुद्धान सासनं॥
हिन्दी अर्थ: सब पापों का त्याग करना, शुभ कर्म करना और अपने चित्त को शुद्ध करना—यही बुद्धों की शिक्षा है।
2. धम्मपद — गाथा 116
पालि (देवनागरी):
अभित्थरेथ कल्याणे, पापा चित्तं निवारये।
दन्धं हि करोतो पुण्णं, पापस्मिं रमति मनो॥
हिन्दी अर्थ: शीघ्रता से शुभ कर्म करो और मन को पाप से रोको। जो शुभ कर्म में देर करता है, उसका मन पाप में लग जाता है।
3. धम्मपद — गाथा 50
पालि (देवनागरी):
न परेसं विलोमानि, न परेसं कताकतं।
अत्तनाव अवेक्खेय्य, कतानि अकतानि च॥
हिन्दी अर्थ: दूसरों के दोष मत देखो; अपने किए और न किए कर्मों को देखो।
4. धम्मपद — गाथा 223
पालि (देवनागरी):
अक्कोधेन जिने कोधं, असाधुं साधुना जिने।
जिने कदरियं दानेन, सच्चेनालिकवादिनं॥
हिन्दी अर्थ: क्रोध को अक्रोध से, दुष्ट को सदाचार से, कंजूस को दान से और झूठे को सत्य से जीतना चाहिए।
5. धम्मपद — गाथा 103
पालि (देवनागरी):
यो सहस्सं सहस्सेन सङ्गामे मानुसे जिने।
एकञ्च जये अत्तानं, स वे सङ्गामजुत्तमो॥
हिन्दी अर्थ: जो युद्ध में हजारों लोगों को जीतता है, उससे भी श्रेष्ठ वह है जो अपने मन और अपने आप पर विजय प्राप्त कर लेता है।
निष्कर्ष
इन बौद्ध प्रमाणों का सार यही है कि: पाप और दुराचार का त्याग करो। शुभ कर्म और सदाचार अपनाओ। अपने मन को शुद्ध करो।
क्रोध, झूठ और बुराई का उत्तर सत्य, दान और सदाचार से दो।
यह शिक्षा यजुर्वेद 4.28 के भाव—"हे ईश्वर! हमें दुश्चरित से बचाकर सुचरित में स्थापित करें"—से अत्यंत निकटता रखती है।
यहूदी धर्म में प्रमाण=-
यदि विषय "दुष्ट आचरण का त्याग और सदाचार का पालन" है, तो यहूदी धर्म (तनाख / Hebrew Bible) में भी इसके अनेक स्पष्ट प्रमाण मिलते हैं। यहाँ पाँच प्रमाण हिब्रू मूल, पुस्तक–अध्याय–पद तथा हिन्दी अर्थ सहित दिए जा रहे हैं।
1. Tanakh — Psalm 34:14
עברית (हिब्रू):
סוּר מֵרָע וַעֲשֵׂה־טוֹב בַּקֵּשׁ שָׁלוֹם וְרָדְפֵהוּ׃
हिन्दी अर्थ: बुराई से हटो, भलाई करो; शान्ति को खोजो और उसका अनुसरण करो।
2. Tanakh — Isaiah 1:16–17
עברית (हिब्रू):
רַחֲצוּ הִזַּכּוּ הָסִירוּ רֹעַ מַעַלְלֵיכֶם... לִמְדוּ הֵיטֵב דִּרְשׁוּ מִשְׁפָּט...
हिन्दी अर्थ: अपने को शुद्ध करो, अपने बुरे कर्मों को छोड़ दो; भलाई करना सीखो, न्याय का अनुसरण करो।
3. Tanakh — Micah 6:8
עברית (हिब्रू):
הִגִּיד לְךָ אָדָם מַה־טּוֹב... כִּי אִם־עֲשׂוֹת מִשְׁפָּט וְאַהֲבַת חֶסֶד וְהַצְנֵעַ לֶכֶת עִם־אֱלֹהֶיךָ׃
हिन्दी अर्थ: हे मनुष्य! परमेश्वर ने तुझे बता दिया है कि क्या अच्छा है—न्याय करना, दया से प्रेम रखना और अपने परमेश्वर के साथ नम्रता से चलना।
4. Tanakh — Proverbs 3:7
עברית (हिब्रू):
אַל־תְּהִי חָכָם בְּעֵינֶיךָ יְרָא אֶת־יְהוָה וְסוּר מֵרָע׃
हिन्दी अर्थ: अपनी दृष्टि में बुद्धिमान मत बनो; परमेश्वर का भय मानो और बुराई से दूर रहो।
5. Tanakh — Psalm 37:27
עברית (हिब्रू):
סוּר מֵרָע וַעֲשֵׂה־טוֹב וּשְׁכֹן לְעוֹלָם׃
हिन्दी अर्थ: बुराई से हटो, भलाई करो और स्थिर तथा कल्याणमय जीवन प्राप्त करो।
निष्कर्ष
यहूदी धर्मग्रंथ तनाख भी यही शिक्षा देता है कि:  बुराई का त्याग करो। भलाई और न्याय का आचरण करो। दया, नम्रता और शान्ति का अनुसरण करो।
यह संदेश यजुर्वेद 4.28 के भाव—"हे ईश्वर! हमें दुश्चरित से बचाकर सुचरित में स्थापित करें"—से स्पष्ट रूप से साम्य रखता है।
पारसी धर्म में प्रमाण--
यदि विषय "दुश्चरित (बुरा आचरण) का त्याग और सुचरित (सदाचार) का पालन" है, तो पारसी (ज़रोअस्ट्रियन) धर्म के पवित्र ग्रंथ अवेस्ता (Avesta) में भी इसका स्पष्ट उपदेश मिलता है। पारसी धर्म का मूल सिद्धांत अच्छे विचार (Humata), अच्छे वचन (Hukhta), अच्छे कर्म (Hvarshta) है।
1. अवेस्ता — यस्‍ना 30.3
अवेस्ता (Avestan):
āat̰ mā mainyū yā yē  ahmāi vaŋhēuš
manō ahmāi mazdā asāi hacā...
भावार्थ: हे अहुरा मज़्दा! हमें उस मार्ग का चयन करने की बुद्धि दें जो सत्य (अशा) और भलाई की ओर ले जाता है।
2. अवेस्ता — यस्‍ना 30.2
अवेस्ता (Avestan):
aēvō paiti mainyū yā āhu vīspāi
ahmāi yāci...
भावार्थ: मनुष्य के सामने दो मार्ग हैं—एक सत्य और शुभ का, दूसरा असत्य और बुराई का; विवेक से शुभ मार्ग चुनना चाहिए।
3. अवेस्ता — यस्‍ना 34.14
अवेस्ता (Avestan):
ašəm vohū vahištəm astī
uštā astī uštā ahmāi...
भावार्थ: अशा (सत्य, धर्म और शुद्ध आचरण) सर्वोत्तम है; जो व्यक्ति धर्ममय जीवन जीता है, उसे कल्याण प्राप्त होता है।
4. अवेस्ता — यस्‍ना 48.5
अवेस्ता (Avestan):
ašā ahyā vaŋhēuš manō
frā mōi urvāzišta...
भावार्थ: सत्य और शुभ विचारों के द्वारा मनुष्य उत्तम जीवन और आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त करता है।
5. अवेस्ता — यस्‍ना 34.15
अवेस्ता (Avestan):
humatāibya hūxtāibya hvarštāibya...
भावार्थ: अच्छे विचार, अच्छे वचन और अच्छे कर्म—ये धर्ममय जीवन के आधार हैं।
निष्कर्ष
पारसी धर्म में भी यही शिक्षा है कि:
बुरे विचारों और बुरे कर्मों को छोड़ना चाहिए।
सत्य (Asha) और धर्म के मार्ग पर चलना चाहिए।
अच्छे विचार, अच्छे वचन और अच्छे कर्म अपनाने चाहिए।
यह यजुर्वेद 4.28 के भाव—"दुश्चरित से बचाकर सुचरित में स्थापित करें"—के साथ समान नैतिक संदेश प्रस्तुत करता है।
टिप्पणी: अवेस्ता के मूल पाठ की वर्तनी और अनुवाद विभिन्न पारसी परंपराओं (जैसे Geldner, Darmesteter आदि संस्करणों) में कुछ भिन्न मिल सकते हैं।
ताओ धर्म में प्रमाण --
यदि विषय "दुश्चरित (बुरे आचरण) का त्याग और सुचरित (सदाचार) का पालन" है, तो ताओ (Dao/Tao) धर्म के प्रमुख ग्रंथ दाओ दे जिंग (道德經, Dào Dé Jīng) में भी इसी प्रकार की शिक्षा मिलती है। यहाँ पाँच प्रमाण चीनी मूल पाठ, अध्याय संख्या और हिन्दी अर्थ सहित दिए जा रहे हैं।
1. दाओ दे जिंग — अध्याय 8
चीनी:
上善若水。水善利萬物而不爭。
उच्चारण (Pinyin): Shàng shàn ruò shuǐ. Shuǐ shàn lì wànwù ér bù zhēng.
हिन्दी अर्थ: सर्वोत्तम सदाचार जल के समान है। जल सभी प्राणियों का उपकार करता है और किसी से संघर्ष नहीं करता।
2. दाओ दे जिंग — अध्याय 27
चीनी:
善行無轍跡,善言無瑕謫。
उच्चारण: Shàn xíng wú zhé jì, shàn yán wú xiá zhé.
हिन्दी अर्थ: श्रेष्ठ कर्म करने वाले के कर्मों में दोष का चिन्ह नहीं होता; श्रेष्ठ वचन में कोई त्रुटि नहीं होती।
3. दाओ दे जिंग — अध्याय 49
चीनी:
善者,吾善之;不善者,吾亦善之。德善。
उच्चारण: Shàn zhě, wú shàn zhī; bù shàn zhě, wú yì shàn zhī. Dé shàn.
हिन्दी अर्थ: जो अच्छे हैं, उनके साथ मैं अच्छा व्यवहार करता हूँ; जो अच्छे नहीं हैं, उनके साथ भी अच्छा व्यवहार करता हूँ। यही वास्तविक सद्गुण है।
4. दाओ दे जिंग — अध्याय 67
चीनी:
我有三寶,持而保之:一曰慈,二曰儉,三曰不敢為天下先。
उच्चारण: Wǒ yǒu sān bǎo, chí ér bǎo zhī: yī yuē cí, èr yuē jiǎn, sān yuē bù gǎn wéi tiānxià xiān.
हिन्दी अर्थ: मेरे तीन रत्न हैं—पहला करुणा, दूसरा संयम, और तीसरा विनम्रता।
5. दाओ दे जिंग — अध्याय 38
चीनी:
上德不德,是以有德;下德不失德,是以無德。
उच्चारण: Shàng dé bù dé, shì yǐ yǒu dé; xià dé bù shī dé, shì yǐ wú dé.
हिन्दी अर्थ: श्रेष्ठ सद्गुण वाला व्यक्ति अपने सद्गुण का प्रदर्शन नहीं करता, इसी कारण उसमें वास्तविक सद्गुण होता है।
निष्कर्ष
ताओ धर्म में भी शिक्षा दी गई है कि:  अहंकार, हिंसा और स्वार्थपूर्ण आचरण से दूर रहें।
करुणा, विनम्रता और सरलता अपनाएँ। अच्छे कर्म और सद्गुणों से जीवन को शुद्ध करें।
इस प्रकार ताओ धर्म का "德 (Dé — सद्गुण/नैतिक शक्ति)" का सिद्धांत यजुर्वेद 4.28 के "दुश्चरित से बचाकर सुचरित में स्थापित करने" वाले भाव से नैतिक रूप से समानता रखता है।
कन्फ्यूसियस धर्म में प्रमाण-=
यदि विषय "दुश्चरित (बुरे आचरण) का त्याग और सुचरित (सदाचार) का पालन" है, तो कन्फ्यूशियस (Confucian) परंपरा के ग्रंथों में 仁 (Ren — मानवता/करुणा), 義 (Yi — धर्मयुक्त आचरण), 禮 (Li — शिष्टाचार), 德 (De — सद्गुण) पर विशेष बल दिया गया है। निम्न प्रमाण चीनी मूल पाठ, ग्रंथ-अध्याय और हिन्दी अर्थ सहित हैं।
1. Analects of Confucius — अध्याय 4, वचन 5
चीनी:
富與貴,是人之所欲也;不以其道得之,不處也。
हिन्दी अर्थ: धन और सम्मान मनुष्य की इच्छा की वस्तुएँ हैं; परंतु यदि वे उचित मार्ग से प्राप्त न हों तो उन्हें स्वीकार नहीं करना चाहिए।
भाव: अधर्मपूर्ण साधनों का त्याग।
2. Analects of Confucius — अध्याय 4, वचन 15
चीनी:
參乎!吾道一以貫之。
हिन्दी अर्थ: हे शेन! मेरे मार्ग का एक ही मूल सिद्धांत है जो सबको जोड़ता है।
(कन्फ्यूशियस परंपरा में यह मूल सिद्धांत नैतिकता और उचित आचरण से जुड़ा है।)
3. Analects of Confucius — अध्याय 12, वचन 22
चीनी:
樊遲問仁。子曰:「愛人。」
हिन्दी अर्थ: फान ची ने पूछा—मानवता (仁) क्या है? कन्फ्यूशियस ने कहा—मनुष्यों से प्रेम करना।
भाव: दया और सद्भावपूर्ण आचरण।
4. Analects of Confucius — अध्याय 15, वचन 23
चीनी:
己所不欲,勿施於人。
हिन्दी अर्थ: जो व्यवहार तुम स्वयं अपने लिए नहीं चाहते, वह दूसरों के साथ मत करो।
भाव: अहितकारी कर्मों से बचना और सदाचार करना।
5. Analects of Confucius — अध्याय 2, वचन 3
चीनी:
道之以德,齊之以禮,有恥且格。
हिन्दी अर्थ: लोगों को सद्गुण (德) से मार्ग दिखाओ और शिष्टाचार (禮) से व्यवस्थित करो, तब उनमें लज्जा और नैतिकता उत्पन्न होगी।
निष्कर्ष
कन्फ्यूशियस धर्म की शिक्षा भी यही है:
गलत मार्ग से प्राप्त वस्तुओं का त्याग करो।
दूसरों के प्रति वही व्यवहार करो जो अपने लिए चाहते हो।
प्रेम, दया, शिष्टाचार और सद्गुण अपनाओ।
शिन्तो धर्म में प्रमाण --
यजुर्वेद 4.28 के "दुश्चरित से बचाकर सुचरित में स्थापित करने" वाले नैतिक संदेश से यदि विषय "दुश्चरित (बुरे आचरण) का त्याग और सुचरित (सदाचार) का पालन" है, तो शिन्तो (神道, Shintō) धर्म में भी शुद्धता (清め — Kiyome), सत्यता, सदाचार और कामी (神) के अनुकूल जीवन पर बल दिया गया है। शिन्तो के प्रमुख ग्रंथ कोजिकी (古事記), निहोन शोकी (日本書紀) और नोरितो (祝詞) में इसके भाव मिलते हैं।
1. Kojiki — यमातो कोतोबा परंपरा
जापानी:
清く明き心を以ちて仕へ奉る。
हिन्दी अर्थ: शुद्ध और निर्मल हृदय से सेवा और आचरण करना चाहिए।
भाव: मन और कर्म की शुद्धता।
2. Nihon Shoki
जापानी:
心を清め身を慎む。
हिन्दी अर्थ: अपने मन को शुद्ध करो और अपने आचरण में संयम रखो।
भाव: अशुद्ध कर्मों का त्याग और आत्मसंयम।
3. Engishiki Norito — Ōharae (大祓)
जापानी:
諸々の罪穢れを祓ひ清め給へ。
हिन्दी अर्थ: सभी पापों और अशुद्धियों को दूर करके शुद्ध करें।
भाव: दोषों और बुरे कर्मों से मुक्ति।
4. Kojiki
जापानी:
身を清めて、禊を為す。
हिन्दी अर्थ: शरीर और मन को शुद्ध करके शुद्धिकरण (禊 — Misogi) करना।
भाव: आंतरिक और बाहरी शुद्धता।
5. शिन्तो नैतिक परंपरा (Kami-no-michi)
जापानी:
正直の心を持ち、清き行いをなす。
हिन्दी अर्थ: सच्चे हृदय को धारण करो और शुद्ध कर्म करो।
भाव: सत्यनिष्ठा और सदाचार शिन्तो जीवन का आधार है।
निष्कर्ष
शिन्तो धर्म में भी यही संदेश मिलता है कि: अशुद्ध कर्मों और दोषों का त्याग किया जाए।
मन और कर्म को पवित्र रखा जाए। सत्य, सरलता और सदाचार का पालन किया जाए।
यह यजुर्वेद 4.28 के भाव "दुश्चरित से बचाकर सुचरित में स्थापित करें" के साथ नैतिक समानता रखता है।
टिप्पणी: शिन्तो ग्रंथों में वैदिक शैली की तरह "पाप-पुण्य" की सूची नहीं है; वहाँ मुख्य अवधारणा 穢れ (केगरे — अशुद्धि) से मुक्ति और 清明心 (सेइमेइशिन — निर्मल हृदय) है। रखता है।
यूनानी दर्शन में प्रमाण --
यदि विषय "दुश्चरित (बुरे आचरण) का त्याग और सुचरित (सदाचार) का पालन" है, तो यूनानी (Greek) दर्शन में भी यह विचार प्रमुख है। यूनानी दार्शनिकों ने इसे ἀρετή (Arete — सद्गुण/श्रेष्ठ चरित्र), σωφροσύνη (Sophrosyne — आत्मसंयम), δικαιοσύνη (Dikaiosyne — न्याय) के रूप में समझाया।
यहाँ पाँच प्रमाण यूनानी मूल (ग्रीक), ग्रंथ और हिन्दी अर्थ सहित दिए जा रहे हैं:
1. Nicomachean Ethics — पुस्तक 2, अध्याय 6
यूनानी:
ἡ δὲ ἀρετὴ περὶ πάθη καὶ πράξεις ἐστίν
लिप्यंतरण: Hē de aretē peri pathē kai praxeis estin.
हिन्दी अर्थ: सद्गुण मनुष्य के भावों और कर्मों से संबंधित है।
भाव: चरित्र और कर्मों की शुद्धता ही सदाचार है।
2. Republic — पुस्तक 4, 433a
यूनानी:
δικαιοσύνη ἕν ἕκαστον πράττειν τὸ αὑτοῦ
हिन्दी अर्थ: न्याय यह है कि प्रत्येक व्यक्ति अपना उचित कर्तव्य करे।
भाव: उचित आचरण और धर्मपूर्ण जीवन।
3. Apology — 30b
यूनानी:
οὐκ ἐκ χρημάτων ἀρετὴ γίγνεται, ἀλλ᾽ ἐξ ἀρετῆς χρήματα καὶ τὰ ἄλλα ἀγαθὰ τοῖς ἀνθρώποις
हिन्दी अर्थ: धन से सद्गुण उत्पन्न नहीं होता, बल्कि सद्गुण से मनुष्य को धन और अन्य अच्छी वस्तुएँ प्राप्त होती हैं।
भाव: चरित्र को धन से ऊपर रखना।
4. Meditations — पुस्तक 2.1
यूनानी (प्रचलित भाव):
ὡς ἄνθρωπος πράττειν κατὰ φύσιν καὶ λόγον
हिन्दी अर्थ: मनुष्य को प्रकृति और विवेक के अनुसार आचरण करना चाहिए।
भाव: विवेकपूर्ण और नैतिक जीवन।
5. Enchiridion — 1
यूनानी:
τὰ μὲν ἐφ᾽ ἡμῖν ἐστι, τὰ δὲ οὐκ ἐφ᾽ ἡμῖν
हिन्दी अर्थ: कुछ बातें हमारे नियंत्रण में हैं और कुछ हमारे नियंत्रण में नहीं हैं।
भाव: अपने मन, इच्छा और कर्मों को नियंत्रित करना ही सदाचार का मार्ग है।
निष्कर्ष
यूनानी दर्शन में भी शिक्षा यही है कि: बुरे आवेगों और अविवेकपूर्ण कर्मों से बचें।
आत्मसंयम, न्याय और सद्गुण अपनाएँ। बाहरी वस्तुओं से अधिक चरित्र को महत्व दें।
इस प्रकार यूनानी दर्शन का Arete (सद्गुण) का सिद्धांत यजुर्वेद 4.28 के "दुश्चरित से बचाकर सुचरित में स्थापित करने" वाले नैतिक संदेश से साम्य रखता है।
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