यजुर्वेद सूक्ति( 1) की व्याख्या
यजु यजुर्वेद सूक्ति~(1) की व्याख्या
"त्रयम्बकं यजामहे"
त्रयम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टि वर्धनम्"
यजुर्वेद --3/60
भावार्थ --हम तीन नेत्रों वाले भगवान् शिव की उपासना करते हैं जो सुगन्ध की भाँति हर स्थान पर समान रूप से व्याप्त हैं।
हम जिस मंत्र का उल्लेख कर
रहे हैं, वह प्रसिद्ध महामृत्युंजय मंत्र है। इसका प्रामाणिक वैदिक पाठ इस प्रकार है:
ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।
उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मा अमृतात्॥
यजुर्वेद संदर्भ: अध्याय 3, मंत्र 60 (कुछ संस्करणों में यह तैत्तिरीय संहिता 1.8.6 अथवा ऋग्वेद में भी मिलता है। विभिन्न शाखाओं में मंत्र क्रमांक भिन्न हो सकता है।)
सरल अर्थ: हम तीन नेत्रों वाले भगवान रुद्र (शिव) की उपासना करते हैं, जो सुगंध के समान सर्वत्र व्याप्त हैं और सबका पोषण करने वाले हैं। जैसे पका हुआ फल (ककड़ी) अपने बंधन से सहज ही अलग हो जाता है, वैसे ही हम मृत्यु के बंधन से मुक्त हों, परंतु अमृतस्वरूप (मोक्ष) से वंचित न हों।
यह मंत्र दीर्घायु, आरोग्य, भय-निवारण तथा आध्यात्मिक कल्याण के लिए अत्यंत प्रसिद्ध है।
वेदों में प्रमाण--
"त्र्यम्बकं यजामहे…" (ऋग्वेद 7.59.12 / यजुर्वेद 3.60) का मुख्य भाव है—आरोग्य, दीर्घायु, मृत्यु के भय से रक्षा, कल्याण और मोक्ष। इसी भाव के अन्य वेदों के प्रमाण नीचे दिए गए हैं।
1. ऋग्वेद
मण्डल 1, सूक्त 114, मंत्र 8
मा नो महान्तमुत मा नो अर्भकं मा न उक्षन्तमुत मा न उक्षितम्।
मा नोऽवधीः पितरं मोत मातरं मा नः प्रियास्तन्वो रुद्र रीरिषः॥
अर्थ: हे रुद्र! हमारे बड़े-छोटे, माता-पिता और प्रियजनों को कोई कष्ट न हो। हमारी रक्षा करें।
2. यजुर्वेद
अध्याय 36, मंत्र 24
तच्चक्षुर्देवहितं पुरस्ताच्छुक्रमुच्चरत्।
पश्येम शरदः शतं जीवेम शरदः शतम्॥
अर्थ: हम सौ वर्षों तक देखें, जिएँ, सुनें और स्वस्थ एवं सुखी जीवन व्यतीत करें।
3. सामवेद
पूर्वार्चिक, प्रथम प्रपाठक, प्रथम दशति, मंत्र 1
अग्न आ याहि वीतये गृणानो हव्यदातये।
नि होता सत्सि बर्हिषि॥
अर्थ: हे अग्ने! हमारे यज्ञ में पधारें, हमारी प्रार्थना स्वीकार करें और हमारा कल्याण करें।
4. अथर्ववेद
काण्ड 19, सूक्त 67, मंत्र 1
पश्येम शरदः शतं जीवेम शरदः शतम्।
बुध्येम शरदः शतं रोहेम शरदः शतम्॥
अर्थ: हम सौ वर्षों तक देखें, जिएँ, ज्ञान प्राप्त करें, उन्नति करें और स्वस्थ जीवन व्यतीत करें।
5. अथर्ववेद
काण्ड 12, सूक्त 2, मंत्र 31
शतं जीव शरदो वर्धमानः।
अर्थ: तुम उन्नति करते हुए सौ वर्षों तक जीवन प्राप्त करो।
इन मंत्रों का भाव महामृत्युंजय मंत्र के समान है।
उपनिषदों में प्रमाण --
—दीर्घायु, आरोग्य, रक्षा, कल्याण और मृत्यु के भय से मुक्ति की प्रार्थना। नीचे मंत्र के साथ पूरा संदर्भ (अध्याय/खण्ड/मंत्र संख्या) दिया गया है।
1. बृहदारण्यक उपनिषद्वे
अध्याय 1, ब्राह्मण 3, मंत्र 28
असतो मा सद्गमय।
तमसो मा ज्योतिर्गमय।
मृत्योर्माऽमृतं गमय॥
अर्थ: हे प्रभु! मुझे असत्य से सत्य की ओर, अंधकार से प्रकाश की ओर और मृत्यु से अमृतत्व की ओर ले चलिए।
2. श्वेताश्वतर उपनिषद्द
अध्याय 3, मंत्र 8
वेदाहमेतं पुरुषं महान्तम् आदित्यवर्णं तमसः परस्तात्।
तमेव विदित्वाऽतिमृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय॥
अर्थ: उस परम पुरुष को जानकर ही मनुष्य मृत्यु को पार करता है; मुक्ति का दूसरा कोई मार्ग नहीं है।
3. कठोपनिषद्
अध्याय 2, वल्ली 3, मंत्र 14
यदा सर्वे प्रमुच्यन्ते कामा येऽस्य हृदि श्रिताः।
अथ मर्त्योऽमृतो भवत्यत्र ब्रह्म समश्नुते॥
अर्थ: जब हृदय की सभी कामनाएँ समाप्त हो जाती हैं, तब मनुष्य अमृतस्वरूप होकर ब्रह्म को प्राप्त करता है।
4. श्वेताश्वतर उपनिषद्
अध्याय 4, मंत्र 12
एको हि रुद्रो न द्वितीयाय तस्थुर्य इमान् लोकानीशत ईशनीभिः॥
अर्थ: रुद्र एकमात्र परमेश्वर हैं; उनके समान दूसरा कोई नहीं। वही समस्त लोकों के स्वामी हैं।
5. कैवल्य उपनिषद्
उमासहायं परमेश्वरं प्रभुं त्रिलोचनं नीलकण्ठं प्रशान्तम्।
ध्यात्वा मुनिर्गच्छति भूतयोनिं समस्तसाक्षिं तमसः परस्तात्॥
अर्थ: जो मुनि त्रिलोचन परमेश्वर का ध्यान करता है, वह समस्त बन्धनों से मुक्त होकर परम पद को प्राप्त करता है।
ये उपनिषद्-मंत्र "त्र्यम्बकं यजामहे… मृत्योर्मुक्षीय मा अमृतात्" के भाव—मृत्यु से मुक्ति, अमृतत्व और परमात्मा की प्राप्ति के समरूप है।
पुराणों में प्रमाण--
"त्र्यम्बकं यजामहे… मृत्योर्मुक्षीय मा अमृतात्" के समान भाव (मृत्यु से रक्षा, दीर्घायु, मोक्ष, शिव-शरण) वाले पुराण-प्रमाण नीचे दिए जा रहे हैं।
ध्यान दें कि पुराणों के अध्याय और श्लोक क्रम विभिन्न संस्करणों (गीता प्रेस सहित) में कुछ स्थानों पर भिन्न हो सकते हैं।
1-शिव महापुराण
अध्याय 22, श्लोक 21–22
महामृत्युञ्जयं मन्त्रं श्रौतमग्र्यं वदामि ते॥ (21)
त्र्यम्बकं यजामहे त्रैलोक्यं पितरं प्रभुम्...॥ (22)
अर्थ: यह महामृत्युंजय मंत्र मृत्यु के भय का नाश करने वाला और कल्याण प्रदान करने वाला बताया गया है।
2-लिङ्ग पुराण
अध्याय 64, श्लोक 6–9
संपूज्य शिवसूक्तेन त्र्यम्बकेन शुभेन च...
अर्थ: शिवपूजन के पश्चात् त्र्यम्बक (महामृत्युंजय) मंत्र का जप करने का विधान है।
3--लिङ्ग पुराण--
अध्याय 54, श्लोक 18–20
अर्थ: रुद्रोपासना एवं मृत्यु-भय से रक्षा के लिए त्र्यम्बक मंत्र का माहात्म्य वर्णित है।
4--स्कन्द पुराण
अध्याय 95, श्लोक 4–5
मृत्युञ्जयमहामन्त्रं...
अर्थ: मृत्युंजय महामंत्र के जप से भगवान शिव प्रसन्न होकर आयु, आरोग्य और अभय प्रदान करते हैं।
5--कूर्म पुराण
रुद्रोपासना के प्रसंग में शिव-मंत्र-जप द्वारा बन्धन-मुक्ति और परमगति का वर्णन मिलता है (अध्याय-क्रम संस्करणानुसार भिन्न है।
भगवद्गीता में प्रमाण--
"त्र्यम्बकं यजामहे… मृत्योर्मुक्षीय मा अमृतात्" के समान भाव (मृत्यु से मुक्ति, अमृतत्व, आत्मा की नित्यता और मोक्ष) के श्रीमद्भगवद्गीता से प्रमुख प्रमाण इस प्रकार हैं:
1. अध्याय 2, श्लोक 20
न जायते म्रियते वा कदाचि-
न्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः।
अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो
न हन्यते हन्यमाने शरीरे॥ 2.20॥
अर्थ: आत्मा न जन्म लेती है, न मरती है। शरीर के नष्ट होने पर भी उसका नाश नहीं होता।
2. अध्याय 2, श्लोक 27
जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च।
तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि॥ 2.27॥
अर्थ: जिसका जन्म हुआ है उसकी मृत्यु निश्चित है, और मृत्यु के बाद पुनर्जन्म भी निश्चित है। इसलिए अनिवार्य विषय पर शोक नहीं करना चाहिए।
3. अध्याय 5, श्लोक 24
योऽन्तःसुखोऽन्तरारामस्तथान्तर्ज्योतिरेव यः।
स योगी ब्रह्मनिर्वाणं ब्रह्मभूतोऽधिगच्छति॥ 5.24॥
अर्थ: जो भीतर ही सुख और प्रकाश का अनुभव करता है, वह योगी ब्रह्मनिर्वाण (मोक्ष) को प्राप्त करता है।
4. अध्याय 9, श्लोक 19
तपाम्यहमहं वर्षं निगृह्णाम्युत्सृजामि च।
अमृतं चैव मृत्युश्च सदसच्चाहमर्जुन॥ 9.19॥
अर्थ: हे अर्जुन! मैं ही अमृत हूँ और मैं ही मृत्यु हूँ; समस्त अस्तित्व का आधार मैं ही हूँ।
5. अध्याय 14, श्लोक 20
गुणानेतानतीत्य त्रीन्देही देहसमुद्भवान्।
जन्ममृत्युजरादुःखैर्विमुक्तोऽमृतमश्नुते॥ 14.20॥
अर्थ: जो पुरुष तीनों गुणों से ऊपर उठ जाता है, वह जन्म, मृत्यु और बुढ़ापे के दुःखों से मुक्त होकर अमृतत्व (मोक्ष) को प्राप्त करता है। यह श्लोक "मृत्योर्मुक्षीय मा अमृतात्" के भाव से अत्यन्त निकट है।
इन पाँच श्लोकों में विशेष रूप से गीता 14.20 और 2.20 महामृत्युंजय मंत्र के भाव—मृत्यु से मुक्ति, अमृतत्व और आत्मा की नित्यता—का सबसे प्रबल समर्थन करते हैं।
महाभारत में प्रमाण --
"त्र्यम्बकं यजामहे… मृत्योर्मुक्षीय मा अमृतात्" का भाव है—मृत्यु पर विजय, भगवान शिव की शरण, दीर्घायु और मोक्ष। महाभारत में इसी भाव के अनेक श्लोक मिलते हैं। प्रमुख प्रमाण निम्न हैं:
1. महाभारत
नमः शिवाय शान्ताय नमः कारणहेतवे।
नमोऽस्तु ते महादेव त्राहि मां शरणागतम्॥
अर्थ:
हे शान्तस्वरूप महादेव! आपको नमस्कार है। मैं आपकी शरण में आया हूँ, मेरी रक्षा कीजिए।
भाव: मृत्यु और संकट से रक्षा के लिए शिव की शरण।
2. महाभारत (शिवसहस्रनाम)
मृत्युञ्जयो महादेवः कालकालः सदाशिवः॥
अर्थ:
भगवान शिव मृत्यु पर विजय प्राप्त कराने वाले, काल के भी काल और सदाशिव हैं।
भाव: "मृत्योर्मुक्षीय" के समान।
3. महाभारत (अर्जुनकृत शिवस्तुति)
त्वं यज्ञस्त्वं वषट्कारस्त्वमोङ्कारः परात्परः॥
अर्थ:
हे शिव! आप ही यज्ञ हैं, आप ही ओंकार हैं, आप ही परम ब्रह्म हैं।
भाव: त्र्यम्बक (परमेश्वर) की उपासना।
4. महाभारत
यो हि भक्त्या महादेवं शरणं याति मानवः।
न तस्य मृत्युर्भयं किञ्चित्...
अर्थ:
जो मनुष्य भक्तिभाव से महादेव की शरण ग्रहण करता है, उसे मृत्यु का भय नहीं रहता।
भाव: मृत्यु-भय से मुक्ति।
5. महाभारत
अर्जुन की शिव-उपासना के प्रसंग में भगवान शिव प्रसन्न होकर वरदान देते हैं और उनकी रक्षा करते हैं। यह प्रसंग भी महामृत्युंजय मंत्र के भाव—शिव-आराधना से अभय और कल्याण—का समर्थन करता है।
टिप्पणी: महाभारत के अनुशासन पर्व और द्रोण पर्व के अध्याय एवं श्लोक क्रम विभिन्न संस्करणों (जैसे गीता प्रेस और आलोचनात्मक संस्करण) में कुछ भिन्न हो सकते हैं।
आप जिस भाव के प्रमाण चाहते हैं—"त्र्यम्बकं यजामहे… मृत्योर्मुक्षीय मा अमृतात्" (रक्षा, आयु, मृत्यु से मुक्ति, परमेश्वर की शरण)—उस विषय में एक महत्वपूर्ण तथ्य है:
वाल्मीकि रामायण में महामृत्युंजय मंत्र का न तो शब्दशः उल्लेख है और न ही उसके जप का विधान मिलता है। इसलिए उसके लिए अध्याय और श्लोक संख्या सहित सीधा प्रमाण देना संभव नहीं है।
हाँ, समान भाव (शरण, अभय, मोक्ष, धर्मरक्षा) वाले कुछ श्लोक अवश्य मिलते हैं, जैसे—
1. वाल्मीकि रामायण
सकृदेव प्रपन्नाय तवास्मीति च याचते।
अभयं सर्वभूतेभ्यो ददाम्येतद् व्रतं मम॥
अर्थ:
जो एक बार भी मेरी शरण में आकर कहता है—"मैं आपका हूँ", उसे मैं सभी प्राणियों से अभय देता हूँ। यह मेरा व्रत है।
भाव: शरणागति से भय और संकट से मुक्ति।
2. वाल्मीकि रामायण
धर्मो हि परमो लोके धर्मे सत्यं प्रतिष्ठितम्।
अर्थ:
इस संसार में धर्म ही सर्वोच्च है और सत्य धर्म में प्रतिष्ठित है।
भाव: कल्याण और जीवन का श्रेष्ठ मार्ग।
3. वाल्मीकि रामायण
रामायण में अनेक स्थानों पर श्रीराम का स्मरण और उनकी शरण को भय-निवारक बताया गया है, पर "मृत्योर्मुक्षीय मा अमृतात्" जैसा वाक्यांश या महामृत्युंजय मंत्र का प्रत्यक्ष उद्धरण नहीं मिलता।
निष्कर्ष:
यदि आपका उद्देश्य महामृत्युंजय मंत्र के समान अर्थ वाले ग्रंथ-प्रमाण एकत्र करना है, तो सबसे अधिक प्रमाण उपनिषद्, भगवद्गीता, महाभारत, शिवपुराण, लिङ्गपुराण और स्कन्दपुराण में मिलते हैं।
वाल्मीकि रामायण में इस मंत्र का प्रत्यक्ष समकक्ष श्लोक उपलब्ध नहीं है।
योग वाशिष्ठ में प्रमाण--
"त्र्यम्बकं यजामहे… मृत्योर्मुक्षीय मा अमृतात्" का मुख्य भाव है—मृत्यु के बंधन से मुक्ति, आत्मज्ञान और अमृतस्वरूप मोक्ष। इस भाव के समर्थन में योगवासिष्ठ में अनेक श्लोक मिलते हैं, परंतु महामृत्युंजय मंत्र का शब्दशः उद्धरण योगवासिष्ठ में नहीं है।
कुछ प्रमुख प्रमाण इस प्रकार हैं:
1. योगवासिष्ठ
ज्ञानेनैव भवेद् मोक्षो नान्यथा कर्मकोटिभिः।
अर्थ:
केवल ज्ञान से ही मोक्ष प्राप्त होता है; करोड़ों कर्मों से नहीं।
भाव: मृत्यु के बंधन से मुक्ति का साधन आत्मज्ञान है।
2. योगवासिष्ठ
मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः।
अर्थ:
मनुष्य के बन्धन और मोक्ष का कारण मन ही है।
भाव: "मृत्योर्मुक्षीय" का तात्पर्य आन्तरिक बन्धनों से मुक्ति भी है।
3. योगवासिष्ठ
यदा न भाव्यते किंचित् तदा मोक्षः प्रजायते।
अर्थ:
जब मन की कल्पनाएँ समाप्त हो जाती हैं, तभी मोक्ष की प्राप्ति होती है।
4. योगवासिष्ठ
आत्मज्ञानं परं श्रेयः।
अर्थ:
आत्मज्ञान ही परम कल्याण का मार्ग है।
महत्वपूर्ण सूचना
ऊपर दिए गए श्लोकों का भाव योगवासिष्ठ का है, लेकिन श्लोक-पाठ और सर्ग-संख्या विभिन्न संस्करणों (निर्णयसागर, चौखम्बा, गीता प्रेस आदि) में अलग-अलग हो सकते हैं।
इस्लाम धर्म में प्रमाण--
नीचे सूरह संख्या : आयत संख्या स्पष्ट रूप से दी जा रही है:
1-क़ुरआन
सूरह 3, आयत 185
كُلُّ نَفْسٍ ذَائِقَةُ الْمَوْتِ...
अर्थ: प्रत्येक प्राणी को मृत्यु का स्वाद चखना है। जो जहन्नम से बचा लिया गया और जन्नत में प्रवेश कर गया, वही सफल हुआ।
2-क़ुरआन
सूरह 2, आयत 156
إِنَّا لِلَّهِ وَإِنَّا إِلَيْهِ رَاجِعُونَ
अर्थ: निश्चय ही हम अल्लाह के हैं और उसी की ओर लौटने वाले हैं।
3-क़ुरआन
सूरह 26, आयत 80
وَإِذَا مَرِضْتُ فَهُوَ يَشْفِينِ
अर्थ: जब मैं बीमार पड़ता हूँ, तो वही (अल्लाह) मुझे आरोग्य देता है।
4-क़ुरआन
सूरह 10, आयत 57
يَا أَيُّهَا النَّاسُ قَدْ جَاءَتْكُم مَّوْعِظَةٌ مِّن رَّبِّكُمْ وَشِفَاءٌ لِّمَا فِي الصُّدُورِ...
अर्थ: तुम्हारे पास तुम्हारे पालनहार की ओर से उपदेश, हृदयों के रोगों के लिए शिफ़ा (चिकित्सा), मार्गदर्शन और दया आ गई है।
5-क़ुरआन
सूरह 67, आयत 2
الَّذِي خَلَقَ الْمَوْتَ وَالْحَيَاةَ لِيَبْلُوَكُمْ...
अर्थ: उसी (अल्लाह) ने मृत्यु और जीवन को पैदा किया ताकि वह तुम्हारी परीक्षा ले कि तुममें कौन श्रेष्ठ कर्म करता है।
ये आयतें "त्र्यम्बकं यजामहे… मृत्योर्मुक्षीय मा अमृतात्" के समान विषय—मृत्यु, ईश्वर पर भरोसा, आरोग्य और अंतिम कल्याण—से संबंधित हैं।
सूफी सन्तों में प्रमाण--
"त्र्यम्बकं यजामहे… मृत्योर्मुक्षीय मा अमृतात्" के समान भाव (ईश्वर-स्मरण, मृत्यु से निर्भयता, आत्मा की मुक्ति, ईश्वर से मिलन) पर सूफ़ी संतों की रचनाएँ उपलब्ध हैं, परन्तु वे वेद, गीता या क़ुरआन की तरह अध्याय–श्लोक/आयत क्रमांक वाले ग्रंथ नहीं हैं। अधिकांश सूफ़ी साहित्य दीवान, मसनवी, रुबाइयाँ, ग़ज़लें या मक़्तूबात के रूप में है, इसलिए उनमें "श्लोक संख्या" जैसी व्यवस्था सामान्यतः नहीं होती।
फिर भी कुछ प्रमुख प्रमाण हैं:
1. जलालुद्दीन रूमी — मसनवी-ए-मानवी (دفتر اول / प्रथम दफ़्तर)
بمیر پیش از آنک بمیری
अर्थ:
"मरने से पहले मर जाओ।" अर्थात अहंकार का अंत करो; तभी वास्तविक जीवन (ईश्वर से मिलन) प्राप्त होगा। यह भाव "मृत्योर्मुक्षीय" से मिलता-जुलता माना जाता है।
2. फ़रीदुद्दीन अत्तार — منطق الطیر (मन्तिक़ुत्-तैर)
چون خود بمردی، زندهٔ جانان شوی
अर्थ:
जब तुम अपने अहंकार को त्याग देते हो, तब प्रियतम (ईश्वर) के साथ वास्तविक जीवन प्राप्त करते हो।
3. हाफ़िज़ शीराज़ी — दीवान-ए-हाफ़िज़
هرگز نمیرد آنکه دلش زنده شد به عشق
अर्थ:
जिसका हृदय ईश्वर-प्रेम से जीवित हो गया, वह वास्तव में कभी नहीं मरता।
4. इब्न अरबी — فصوص الحكم (फ़ुसूस अल-हिकम)
الموتُ بابٌ والناسُ داخلوه
अर्थ:
मृत्यु एक द्वार है, और सभी मनुष्य उसमें प्रवेश करेंगे।
ये उद्धरण भावगत समानता रखते हैं, प्रत्यक्ष रूप से महामृत्युंजय मंत्र के उद्धरण नहीं हैं।
5-. बायज़ीद बिस्तामी
سُبْحَانَ مَنْ أَحْيَانِي بِمَوْتِي
अर्थ:
"पवित्र है वह जिसने मेरी मृत्यु (अहंकार के अंत) के द्वारा मुझे वास्तविक जीवन दिया।"
6-. राबिआ अल-अदविय्या
إِلٰهِي أَنْتَ مَقْصُودِي وَرِضَاكَ مَطْلُوبِي
अर्थ:
"हे मेरे पालनहार! केवल तू ही मेरा लक्ष्य है और तेरी प्रसन्नता ही मेरी अभिलाषा है।"
7-- शेख अब्दुल क़ादिर जीलानी
مُوتُوا عَنِ النَّفْسِ تَحْيَوْا بِالْحَقِّ
अर्थ:
"अपने अहंकार के लिए मर जाओ, तब सत्य (ईश्वर) में जीवित हो जाओ।"
8--शम्स तबरीज़
بمیر تا زنده شوی
अर्थ:
"मर जाओ (अहंकार का त्याग करो), तभी सच्चे अर्थों में जीवित होओ।"
9--सुल्तान बाहू
مرن توں پہلاں مر جا باہو، تاں عشق دی منزل پائیں
अर्थ:
"हे बाहू! मरने से पहले (अहंकार को) मार दो, तभी ईश्वर-प्रेम की मंज़िल मिलेगी।"
10 बुले शाह
مرنا نہیں او مر جانا اے نفس دا
अर्थ:
"जिस मृत्यु की आवश्यकता है, वह शरीर की नहीं, अहंकार की मृत्यु है।"
महत्वपूर्ण टिप्पणी:
इनमें से कुछ वाक्य सूफ़ी परम्परा के अत्यंत प्रसिद्ध कथन हैं, लेकिन वे हमेशा किसी एक प्रामाणिक ग्रंथ के अध्याय/श्लोक की तरह क्रमांकित नहीं मिलते। सिक्ख धर्म में प्रमाण --
"त्र्यम्बकं यजामहे… मृत्योर्मुक्षीय मा अमृतात्" का मुख्य भाव है—ईश्वर का स्मरण, मृत्यु के भय से मुक्ति, अमृत पद की प्राप्ति और परमात्मा से एकत्व। इसी भाव के कुछ प्रमुख प्रमाण श्री गुरु ग्रंथ साहिब से गुरुमुखी सहित प्रस्तुत हैं:
1. श्री गुरु ग्रंथ साहिब
ਜਿਸੁ ਸਿਮਰਤ ਸੁਖੁ ਹੋਇ ਸਗਲੇ ਦੂਖ ਜਾਹਿ ॥
ਜਿਸੁ ਸਿਮਰਤ ਇਹ ਮਨੁ ਨਿਰਮਲੁ ਹੋਵੈ ॥
अर्थ:
जिस परमात्मा का स्मरण करने से सुख प्राप्त होता है और सभी दुःख दूर हो जाते हैं, उसी के स्मरण से मन निर्मल हो जाता है।
2. श्री गुरु ग्रंथ साहिब
ਹਰਿ ਕਾ ਨਾਮੁ ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਹੈ ਪੀਵਹੁ ਸੰਤਹੁ ਭਾਇ ॥
अर्थ:
परमात्मा का नाम अमृत है; हे संतों! प्रेमपूर्वक उसका पान करो।
3. श्री गुरु ग्रंथ साहिब
ਨਾਮ ਕੇ ਧਾਰੇ ਸਗਲੇ ਜੰਤ ॥
ਨਾਮ ਕੇ ਧਾਰੇ ਖੰਡ ਬ੍ਰਹਮੰਡ ॥
अर्थ:
समस्त जीव और समस्त ब्रह्माण्ड परमात्मा के नाम पर ही आधारित हैं।
4. श्री गुरु ग्रंथ साहिब
ਜਨਮ ਮਰਣ ਦੁਹਹੂ ਮਹਿ ਨਾਹੀ ਜਨ ਪਰਉਪਕਾਰੀ ਆਏ ॥
अर्थ:
जो प्रभु में स्थित हो जाता है, वह जन्म और मृत्यु के बंधन से मुक्त हो जाता है।
5. श्री गुरु ग्रंथ साहिब
ਜਿਨਿ ਨਾਮੁ ਧਿਆਇਆ ਗਏ ਮਸਕਤਿ ਘਾਲਿ ॥
अर्थ:
जिन लोगों ने प्रभु के नाम का ध्यान किया, वे जीवन का सच्चा लक्ष्य प्राप्त कर गए।
इन प्रमाणों का भाव महामृत्युंजय मंत्र के समान है—ईश्वर का स्मरण, अमृत की प्राप्ति, जन्म-मरण के बंधन से मुक्ति और परम कल्याण।
ईसाई धर्म में प्रमाण-
"त्र्यम्बकं यजामहे… मृत्योर्मुक्षीय मा अमृतात्" के समान भाव (मृत्यु पर विजय, अनन्त जीवन, ईश्वर में विश्वास) के ईसाई धर्मग्रंथ (बाइबिल) से प्रमाण प्राप्त करना है, तो प्रमुख प्रमाण इस प्रकार हैं:
1. John
English (KJV):
"I am the resurrection, and the life: he that believeth in me, though he were dead, yet shall he live:
And whosoever liveth and believeth in me shall never die."
हिन्दी अर्थ:
यीशु ने कहा—मैं पुनरुत्थान और जीवन हूँ। जो मुझ पर विश्वास करता है, वह मरकर भी जीवित रहेगा।
2. John
English (KJV):
"For God so loved the world, that he gave his only begotten Son, that whosoever believeth in him should not perish, but have everlasting life."
हिन्दी अर्थ:
जो उस पर विश्वास करे, वह नाश न हो, बल्कि अनन्त जीवन पाए।
3. 1 Corinthians
English (KJV):
"Death is swallowed up in victory.
O death, where is thy sting? O grave, where is thy victory?"
हिन्दी अर्थ:
मृत्यु विजय में निगल ली गई। हे मृत्यु! तेरा डंक कहाँ रहा?
4. Romans
English (KJV):
"For the wages of sin is death; but the gift of God is eternal life through Jesus Christ our Lord."
हिन्दी अर्थ:
पाप की मजदूरी मृत्यु है, परन्तु परमेश्वर का वरदान हमारे प्रभु यीशु मसीह में अनन्त जीवन है।
5. Psalm
English (KJV):
"Yea, though I walk through the valley of the shadow of death, I will fear no evil: for thou art with me."
हिन्दी अर्थ:
यदि मैं मृत्यु की छाया की तराई से होकर भी चलूँ, तो भी किसी विपत्ति से नहीं डरूँगा, क्योंकि तू मेरे साथ है।
ये सभी उद्धरण महामृत्युंजय मंत्र का प्रत्यक्ष अनुवाद नहीं हैं, बल्कि उसके समान विषय—मृत्यु का अतिक्रमण, ईश्वर की शरण और अनन्त जीवन—को व्यक्त करते हैं।
जैन धर्म में प्रमाण--
"त्र्यम्बकं यजामहे… मृत्योर्मुक्षीय मा अमृतात्" का मुख्य भाव है—जन्म-मरण के बन्धन से मुक्ति, अमृत (मोक्ष) की प्राप्ति और परम कल्याण। जैन धर्म में भी इसी भाव के अनेक प्राकृत वचन मिलते हैं। कुछ प्रमुख प्रमाण इस प्रकार हैं:
1. णमोकार मंत्र
प्राकृत (देवनागरी):
णमो अरिहंताणं।
णमो सिद्धाणं।
णमो आयरियाणं।
णमो उवज्झायाणं।
णमो लोए सव्वसाहूणं॥
अर्थ:
अरिहंतों, सिद्धों, आचार्यों, उपाध्यायों और समस्त साधुओं को नमस्कार। यह मंत्र आत्मा को पापों से मुक्त कर मोक्षमार्ग की ओर प्रेरित करता है।
2. उत्तराध्ययन सूत्र
प्राकृत (देवनागरी):
अप्पा चेव दमेयव्वो, अप्पा हु खलु दुद्दमो।
अर्थ:
मनुष्य को अपने ही आत्मस्वरूप को वश में करना चाहिए; आत्मसंयम ही मुक्ति का मार्ग है।
3. आचारांग सूत्र
प्राकृत (देवनागरी):
सव्वे पाणा ण हंतव्वा।
अर्थ:
सभी प्राणियों की हिंसा नहीं करनी चाहिए। अहिंसा ही आत्मकल्याण का आधार है।
4. तत्त्वार्थसूत्र
मोक्षमार्गस्य हेतवः सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्राणि।
अर्थ:
सम्यक् दर्शन, सम्यक् ज्ञान और सम्यक् चरित्र—ये मोक्षमार्ग के कारण हैं।
ध्यान दें: तत्त्वार्थसूत्र संस्कृत ग्रन्थ है, प्राकृत नहीं, किन्तु जैन दर्शन का सर्वमान्य ग्रन्थ है।
5. दशवैकालिक सूत्र
प्राकृत (देवनागरी):
धम्मो मंगलमुक्किट्ठं।
अर्थ:
धर्म ही सर्वोच्च मंगल है और वही जीव को जन्म-मरण के बन्धन से छुड़ाकर मोक्ष की ओर ले जाता है।
टिप्पणी
जैन आगमों में वेदों की तरह "मृत्यु से अमृतत्व" की भाषा नहीं है। वहाँ जन्म-मरण के चक्र से मुक्त होकर सिद्धपद (मोक्ष) प्राप्त करना लक्ष्य है। इसलिए ऊपर दिए गए उद्धरण भाव की समानता के आधार पर प्रस्तुत किए गए हैं, न कि महामृत्युंजय मंत्र के प्रत्यक्ष समकक्ष के रूप में।
बौद्ध धर्म में प्रमाण--
त्र्यम्बकं यजामहे… मृत्योर्मुक्षीय मा अमृतात्" का भाव है—दुःख और मृत्यु के बन्धन से मुक्ति तथा अमृत (निर्वाण) की प्राप्ति। बौद्ध धर्म में "अमत" (पाली: Amata = अमृत/निर्वाण) शब्द का बार-बार प्रयोग हुआ है। नीचे पाली (देवनागरी) के साथ कुछ प्रमुख प्रमाण दिए जा रहे हैं।
1. धम्मपद
पाली (देवनागरी):
अप्पमादो अमतपदं, पमादो मच्चुनो पदं।
अप्पमत्ता न मीयन्ति, ये पमत्ता यथा मता॥ (धम्मपद २१)
अर्थ:
अप्रमाद (सजगता) अमृत-पद (निर्वाण) का मार्ग है, और प्रमाद मृत्यु का मार्ग है। जो अप्रमादी हैं, वे अमृत-पद प्राप्त करते हैं।
2. धम्मपद
पाली (देवनागरी):
यो च वस्ससतं जीवे, अपस्सं अमतं पदं।
एकाहं जीवितं सेय्यो, पस्सतो अमतं पदं॥ (धम्मपद ११४)
अर्थ:
जो सौ वर्ष जीकर भी अमृत-पद (निर्वाण) को नहीं देखता, उससे श्रेष्ठ वह है जो एक दिन जीकर भी अमृत-पद को देख ले।
3. संयुक्त निकाय
पाली (देवनागरी):
अमतद्वारं अपावुतं।
अर्थ:
अमृत (निर्वाण) का द्वार खुल गया है।
4. महापरिनिब्बान सुत्त
पाली (देवनागरी):
वयधम्मा सङ्खारा, अप्पमादेन सम्पादेथ।
अर्थ:
सभी संस्कार नश्वर हैं; इसलिए अप्रमादपूर्वक अपने लक्ष्य (निर्वाण) की सिद्धि करो।
5. उदान
पाली (देवनागरी):
अत्थि भिक्खवे अजातं अभूतं अकतं असङ्खतं।
अर्थ:
हे भिक्षुओ! एक ऐसा तत्त्व है जो अजन्मा, अभूत, अकृत और असंस्कृत है। उसी के कारण जन्म-मरण से परे निर्वाण सम्भव है।
इन प्रमाणों में विशेषकर धम्मपद 21, धम्मपद 114 और उदान 8.3 का भाव "मृत्योर्मुक्षीय मा अमृतात्" के सबसे निकट माना जा सकता है, क्योंकि इनमें "अमत" (अमृत/निर्वाण) और मृत्यु के बन्धन से पार होने का स्पष्ट उल्लेखहै।
यहूदी धर्म में प्रमाण--
"त्र्यम्बकं यजामहे… मृत्योर्मुक्षीय मा अमृतात्" का भाव है—ईश्वर की शरण, मृत्यु से रक्षा, जीवन की प्राप्ति और परम आश्रय। यहूदी धर्म (तनाख/हिब्रू बाइबिल) में इससे मिलते-जुलते भाव वाले अनेक पद मिलते हैं।
1. Psalms (תהילים ט״ז:י׳)
हिब्रू:
כִּי לֹא־תַעֲזֹב נַפְשִׁי לִשְׁאוֹל לֹא־תִתֵּן חֲסִידְךָ לִרְאוֹת שָׁחַת׃
उच्चारण: Ki lo ta'azov nafshi lish'ol, lo titen chasidekha lir'ot shachat.
अर्थ:
तू मेरे प्राण को अधोलोक में नहीं छोड़ेगा और अपने भक्त को विनाश देखने नहीं देगा।
2. Psalms (תהילים כ״ג:ד׳)
हिब्रू:
גַּם כִּי־אֵלֵךְ בְּגֵיא צַלְמָוֶת לֹא־אִירָא רָע כִּי־אַתָּה עִמָּדִי...
अर्थ:
यदि मैं मृत्यु की छाया की तराई में भी चलूँ, तो भी किसी बुराई से नहीं डरूँगा, क्योंकि तू मेरे साथ है।
3. Isaiah (ישעיהו כ״ה:ח׳)
हिब्रू:
בִּלַּע הַמָּוֶת לָנֶצַח...
अर्थ:
वह मृत्यु का सदा के लिए अंत कर देगा।
4. Hosea (הושע י״ג:י״ד)
हिब्रू:
מִיַּד שְׁאוֹל אֶפְדֵּם מִמָּוֶת אֶגְאָלֵם...
अर्थ:
मैं उन्हें अधोलोक से छुड़ाऊँगा और मृत्यु से उनका उद्धार करूँगा।
5. Deuteronomy (דברים ל״ב:ל״ט)
हिब्रू:
אֲנִי אָמִית וַאֲחַיֶּה...
अर्थ:
मैं ही मृत्यु देता हूँ और मैं ही जीवन देता हूँ।
इन सभी पदों का विषय महामृत्युंजय मंत्र का प्रत्यक्ष समकक्ष नहीं है, बल्कि मृत्यु से रक्षा, ईश्वर की शरण, जीवन और उद्धार जैसे समान आध्यात्मिक विषय हैं। विशेष रूप से यशायाह 25:8 ("वह मृत्यु का सदा के लिए अंत कर देगा") और होशे 13:14 ("मैं उन्हें मृत्यु से छुड़ाऊँगा") का भाव "मृत्योर्मुक्षीय" के सबसे निकट माना जा सकता है।
पारसी धर्म में प्रमाण--
"त्र्यम्बकं यजामहे… मृत्योर्मुक्षीय मा अमृतात्" के समान भाव—आरोग्य, दीर्घायु, अमरत्व (अमेरेतात), धर्म और अहुरा मज़्दा की शरण—के प्रमाण जरथुस्त्र (पारसी) धर्म के अवेस्ता में मिलते हैं। परंतु एक महत्वपूर्ण बात है:
अवेस्ता के मूल ग्रंथ अवेस्ताई (Avestan) भाषा और अवेस्ताई लिपि (𐬀𐬎𐬀...) में हैं। देवनागरी या फ़ारसी लिपि मूल नहीं हैं। इसलिए यदि आप "अवेस्ता लिपि" चाहते हैं, तो वही मूल लिपि प्रस्तुत की जानी चाहिए।
कुछ प्रमुख प्रमाण:
1. यश्न
अवेस्ताई (Avestan):
𐬀𐬨𐬆𐬭𐬆𐬙𐬁𐬙𐬁 ...
भावार्थ:
अहुरा मज़्दा धर्मात्माओं को Ameretat (अमरत्व) प्रदान करते हैं।
2. यश्न
अवेस्ताई:
𐬨𐬀𐬰𐬛𐬁 𐬀𐬵𐬎𐬭𐬀 ...
भावार्थ:
हे अहुरा मज़्दा! मुझे सत्य के मार्ग पर चलाइए और श्रेष्ठ जीवन प्रदान कीजिए।
3. यश्न
अवेस्ताई:
𐬀𐬱𐬀 ...
भावार्थ:
अशा (सत्य) के मार्ग से मनुष्य अमरत्व की ओर बढ़ता है।
4. वेंदीदाद
भावार्थ:
धर्म का पालन करने वाला दुष्ट शक्तियों पर विजय प्राप्त करता है और उत्तम गति को प्राप्त होता है।
5. यश्न
भावार्थ:
अहुरा मज़्दा की उपासना मनुष्य को कल्याण और अमरत्व के मार्ग पर ले जाती है।
महत्वपूर्ण टिप्पणी
मैं यहाँ पूरे अवेस्ताई मूल मंत्र नहीं दे रहा हूँ क्योंकि अवेस्ता के मूल पाठ का अक्षरशः उद्धरण अत्यधिक सावधानी चाहता है, और बिना सत्यापित पाठ के एक भी अक्षर गलत होना उचित नहीं होगा।
ताओ धर्म में प्रमाण--
"त्र्यम्बकं यजामहे… मृत्योर्मुक्षीय मा अमृतात्" का भाव—प्रकृति के साथ एकत्व, भय से मुक्ति, दीर्घजीवन, और परम सत्य की प्राप्ति—ताओ (Dao) दर्शन में भी मिलता है। परन्तु ध्यान रहे कि ताओ धर्म में "मृत्यु से अमरत्व" का अर्थ वैदिक मोक्ष से भिन्न है। वहाँ ताओ (道) के साथ सामंजस्य पर बल दिया गया है।
नीचे ताओ ते चिंग (Dao De Jing) से कुछ प्रमुख प्रमाण मूल चीनी लिपि सहित दिए जा रहे हैं:
1. Tao Te Ching
中文:
知人者智,自知者明。
勝人者有力,自勝者強。
知足者富。
強行者有志。
不失其所者久,
死而不亡者壽。
हिन्दी अर्थ:
जो दूसरों को जानता है वह बुद्धिमान है; जो स्वयं को जानता है वह प्रबुद्ध है। जो अपने सत्यस्वरूप में स्थित रहता है, वही दीर्घजीवी है; जो मरकर भी नष्ट नहीं होता, वही वास्तविक अर्थ में अमर है।
2. Tao Te Ching
中文:
歸根曰靜,
靜曰復命,
復命曰常。
हिन्दी अर्थ:
मूल में लौटना ही शान्ति है; शान्ति ही अपने शाश्वत स्वरूप में लौटना है।
3. Tao Te Ching
中文:
出生入死。
हिन्दी अर्थ:
जीवन और मृत्यु एक ही प्राकृतिक प्रवाह के अंग हैं।
4. Tao Te Ching
中文:
含德之厚,比於赤子。
हिन्दी अर्थ:
जिसमें ताओ का पूर्ण गुण है, वह नवजात शिशु के समान निर्मल और जीवन-शक्ति से पूर्ण होता है।
5. Zhuangzi
中文:
生死一條。
हिन्दी अर्थ:
जीवन और मृत्यु एक ही निरन्तर प्रवाह के दो रूप हैं।
टिप्पणी
ये उद्धरण महामृत्युंजय मंत्र का प्रत्यक्ष समकक्ष नहीं हैं, बल्कि मृत्यु के भय से ऊपर उठने, शाश्वत सत्य और आंतरिक अमरत्व जैसे समान दार्शनिक विषयों को व्यक्त करते हैं। विशेष रूप से ताओ ते चिंग अध्याय 33 का वाक्य 「死而不亡者壽」 ("जो मरकर भी नष्ट नहीं होता, वही वास्तविक दीर्घजीवी है")।
कन्फ्यूसियस धर्म में प्रमाण--
"त्र्यम्बकं यजामहे… मृत्योर्मुक्षीय मा अमृतात्" के समान भाव—धर्ममय जीवन, नैतिक पूर्णता, मृत्यु के भय से ऊपर उठना और स्वर्ग (天, Tiān) के मार्ग का अनुसरण—के कुछ प्रमाण कन्फ्यूशी (Confucian) ग्रंथों में मिलते हैं। परंतु यह ध्यान रखना चाहिए कि कन्फ्यूशी धर्म में वैदिक "मोक्ष" जैसी अवधारणा नहीं है। इसलिए नीचे दिए गए उद्धरण भावगत समानता रखते हैं, प्रत्यक्ष समकक्ष नहीं।
1. The Analects (Lúnyǔ)
中文:
朝聞道,夕死可矣。
पिन्यिन:
Zhāo wén dào, xī sǐ kě yǐ.
हिन्दी अर्थ:
यदि प्रातः सत्य (दाओ) का ज्ञान हो जाए, तो संध्या को मृत्यु भी स्वीकार है।
भाव: सत्य की प्राप्ति मृत्यु के भय से श्रेष्ठ है।
2. The Analects (Lúnyǔ)
中文:
克己復禮為仁。
पिन्यिन:
Kè jǐ fù lǐ wéi rén.
हिन्दी अर्थ:
अपने अहंकार पर विजय पाकर धर्म (रीति) में स्थित होना ही श्रेष्ठ मानवता (रेन) है।
3. The Analects (Lúnyǔ)
中文:
志士仁人,無求生以害仁,有殺身以成仁。
हिन्दी अर्थ:
श्रेष्ठ व्यक्ति केवल जीवित रहने के लिए धर्म का त्याग नहीं करता; आवश्यकता पड़ने पर धर्म की रक्षा के लिए प्राण भी दे देता है।
4. Doctrine of the Mean (Zhōngyōng)
中文:
天命之謂性,率性之謂道,修道之謂教。
हिन्दी अर्थ:
स्वर्ग (तियान) द्वारा प्रदत्त स्वभाव ही प्रकृति है; उसी के अनुसार चलना ही मार्ग (दाओ) है।
5. Mencius
中文:
盡其心者,知其性也;知其性,則知天矣。
हिन्दी अर्थ:
जो अपने मन को पूर्णतः जान लेता है, वह अपने स्वभाव को जानता है; और जो अपने स्वभाव को जानता है, वह स्वर्ग (तियान) को जानता है।
इन पाँचों उद्धरणों में विशेष रूप से Analects 4.8 —「朝聞道,夕死可矣」 का भाव "मृत्योर्मुक्षीय" के सबसे निकट माना जा सकता है, क्योंकि इसमें सत्य की प्राप्ति को मृत्यु के भय से श्रेष्ठ बताया गया है। हालाँकि, कन्फ्यूशी परम्परा का मुख्य बल नैतिक जीवन पर है, न कि वैदिक अर्थ में मोक्ष या अमृतत्व पर।
शिन्तो धर्म में प्रमाण--
"त्र्यम्बकं यजामहे… मृत्योर्मुक्षीय मा अमृतात्" के समान भाव—दैवी संरक्षण, शुद्धि, दीर्घायु, जीवन की पवित्रता और देवकृपा—शिन्तो (Shintō, 神道) परम्परा में मिलते हैं। किंतु एक महत्वपूर्ण तथ्य है:
शिन्तो धर्म में वेद, बाइबिल या क़ुरआन की तरह क्रमांकित "श्लोक" या "आयत" नहीं हैं। इसके प्रमुख ग्रंथ कोजिकी (古事記), निहोन शोकी (日本書紀) और नोरितो (祝詞) हैं। इनमें अधिकांश प्रार्थनाएँ और आख्यान हैं, इसलिए "अध्याय–श्लोक संख्या" का प्रारूप सामान्यतः नहीं मिलता।
नीचे समान भाव वाले कुछ प्रमाण जापानी लिपि सहित दिए जा रहे हैं:
1. Ōharae no Kotoba (大祓詞)
日本語:
祓へ給ひ 清め給へ 守り給ひ 幸へ給へ
रोमन:
Harae tamai, kiyome tamai, mamori tamai, sakiwai tamai.
हिन्दी अर्थ:
हे देवताओं! हमें शुद्ध करें, हमारी रक्षा करें और हमें कल्याण प्रदान करें।
भाव: ईश्वर से रक्षा और कल्याण की प्रार्थना।
2. Ōharae no Kotoba
日本語:
諸々の罪穢れを祓へ給へ清め給へ。
हिन्दी अर्थ:
हमारे सभी पापों और अशुद्धियों को दूर करके हमें शुद्ध कीजिए।
3. Kojiki (古事記)
日本語:
惟神の道
रोमन:
Kannagara no Michi.
हिन्दी अर्थ:
देवताओं के मार्ग के अनुसार जीवन व्यतीत करना।
4. Nihon Shoki (日本書紀)
日本語:
天壌無窮
हिन्दी अर्थ:
स्वर्ग और पृथ्वी की भाँति अनन्त और चिरस्थायी।
टिप्पणी
शिन्तो धर्म में "मृत्यु से अमृतत्व" जैसा वैदिक सिद्धान्त नहीं है। उसका मुख्य बल शुद्धि (祓い), देवताओं (神, कामी) की कृपा, सुरक्षा और प्रकृति के साथ सामंजस्य पर है। इसलिए ऊपर दिए गए उद्धरण महामृत्युंजय मंत्र के प्रत्यक्ष समकक्ष नहीं, बल्कि समान आध्यात्मिक भाव को व्यक्त करते हैं।
यदि आपका उद्देश्य विश्व धर्मों में महामृत्युंजय मंत्र के समान भाव वाले प्रमाणों का शोध-संकलन बनाना है, तो शिन्तो परम्परा में Ōharae no Kotoba (大祓詞) सबसे उपयुक्त और प्रामाणिक स्रोत माना जाता है।
यूनानी दर्शन में प्रमाण --
"त्र्यम्बकं यजामहे… मृत्योर्मुक्षीय मा अमृतात्" का भाव—आत्मा की उन्नति, मृत्यु का निर्भय सामना, परम सत्य की प्राप्ति और दिव्य जीवन—के समान विचार यूनानी दर्शन में भी मिलते हैं। यद्यपि वहाँ वैदिक "मोक्ष" की अवधारणा नहीं है, फिर भी आत्मा की अमरता और सत्य की प्राप्ति पर विशेष बल मिलता है।
नीचे प्रमुख यूनानी दार्शनिक ग्रंथों से प्रमाण दिए जा रहे हैं:
1. Phaedo
ग्रीक (Greek):
οἱ φιλοσοφοῦντες ἀποθνῄσκειν μελετῶσιν.
लिप्यंतरण:
Hoi philosophountes apothnēskein meletōsin.
हिन्दी अर्थ:
"सच्चे दार्शनिक मृत्यु के लिए स्वयं को तैयार करते रहते हैं।"
भाव: मृत्यु का भय नहीं, बल्कि आत्मा की उच्च अवस्था की तैयारी।
2. Apology
ग्रीक:
ὁ δὲ θάνατος... μέγα κέρδος.
हिन्दी अर्थ:
यदि मृत्यु के बाद श्रेष्ठ जीवन है, तो मृत्यु महान लाभ है।
3. Phaedo
ग्रीक:
ἀθάνατος ἡ ψυχή.
लिप्यंतरण:
Athanatos hē psychē.
हिन्दी अर्थ:
"आत्मा अमर है।"
4. Meditations
ग्रीक:
Ὁ θάνατος φύσεως ἔργον ἐστίν.
हिन्दी अर्थ:
मृत्यु प्रकृति का एक कार्य है; उससे भयभीत नहीं होना चाहिए।
5. Enchiridion
ग्रीक:
μὴ τὰ πράγματα ταράττει τοὺς ἀνθρώπους, ἀλλὰ αἱ περὶ τῶν πραγμάτων δόξαι.
हिन्दी अर्थ:
मनुष्य को वस्तुएँ नहीं, बल्कि उनके बारे में उसके विचार व्याकुल करते हैं।
भाव: भय और बन्धन का कारण मन है; ज्ञान से मुक्ति मिलती है।
6. Republic
ग्रीक:
ψυχὴ πᾶσα ἀθάνατος.
हिन्दी अर्थ:
प्रत्येक आत्मा अमर है।
टिप्पणी
इन उद्धरणों में विशेष रूप से प्लेटो के Phaedo में वर्णित "ἀθάνατος ἡ ψυχή" (आत्मा अमर है) और "दार्शनिक मृत्यु के लिए स्वयं को तैयार करता है" का भाव "मृत्योर्मुक्षीय मा अमृतात्" के सबसे निकट माना जा सकता है। परंतु यह ध्यान रखना चाहिए कि यूनानी दर्शन में "अमरत्व" और वैदिक "मोक्ष" की अवधारणाएँ एक-दूसरे से पूर्णतः समान नहीं हैं।
--------×--------×---------×------- सूक्ति~(1) की व्याख्या
"त्रयम्बकं यजामहे"
त्रयम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टि वर्धनम्"
यजुर्वेद --3/60
भावार्थ --हम तीन नेत्रों वाले भगवान् शिव की उपासना करते हैं जो सुगन्ध की भाँति हर स्थान पर समान रूप से व्याप्त हैं।
हम जिस मंत्र का उल्लेख कर
रहे हैं, वह प्रसिद्ध महामृत्युंजय मंत्र है। इसका प्रामाणिक वैदिक पाठ इस प्रकार है:
ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।
उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मा अमृतात्॥
यजुर्वेद संदर्भ: अध्याय 3, मंत्र 60 (कुछ संस्करणों में यह तैत्तिरीय संहिता 1.8.6 अथवा ऋग्वेद में भी मिलता है। विभिन्न शाखाओं में मंत्र क्रमांक भिन्न हो सकता है।)
सरल अर्थ: हम तीन नेत्रों वाले भगवान रुद्र (शिव) की उपासना करते हैं, जो सुगंध के समान सर्वत्र व्याप्त हैं और सबका पोषण करने वाले हैं। जैसे पका हुआ फल (ककड़ी) अपने बंधन से सहज ही अलग हो जाता है, वैसे ही हम मृत्यु के बंधन से मुक्त हों, परंतु अमृतस्वरूप (मोक्ष) से वंचित न हों।
यह मंत्र दीर्घायु, आरोग्य, भय-निवारण तथा आध्यात्मिक कल्याण के लिए अत्यंत प्रसिद्ध है।
वेदों में प्रमाण--
"त्र्यम्बकं यजामहे…" (ऋग्वेद 7.59.12 / यजुर्वेद 3.60) का मुख्य भाव है—आरोग्य, दीर्घायु, मृत्यु के भय से रक्षा, कल्याण और मोक्ष। इसी भाव के अन्य वेदों के प्रमाण नीचे दिए गए हैं।
1. ऋग्वेद
मण्डल 1, सूक्त 114, मंत्र 8
मा नो महान्तमुत मा नो अर्भकं मा न उक्षन्तमुत मा न उक्षितम्।
मा नोऽवधीः पितरं मोत मातरं मा नः प्रियास्तन्वो रुद्र रीरिषः॥
अर्थ: हे रुद्र! हमारे बड़े-छोटे, माता-पिता और प्रियजनों को कोई कष्ट न हो। हमारी रक्षा करें।
2. यजुर्वेद
अध्याय 36, मंत्र 24
तच्चक्षुर्देवहितं पुरस्ताच्छुक्रमुच्चरत्।
पश्येम शरदः शतं जीवेम शरदः शतम्॥
अर्थ: हम सौ वर्षों तक देखें, जिएँ, सुनें और स्वस्थ एवं सुखी जीवन व्यतीत करें।
3. सामवेद
पूर्वार्चिक, प्रथम प्रपाठक, प्रथम दशति, मंत्र 1
अग्न आ याहि वीतये गृणानो हव्यदातये।
नि होता सत्सि बर्हिषि॥
अर्थ: हे अग्ने! हमारे यज्ञ में पधारें, हमारी प्रार्थना स्वीकार करें और हमारा कल्याण करें।
4. अथर्ववेद
काण्ड 19, सूक्त 67, मंत्र 1
पश्येम शरदः शतं जीवेम शरदः शतम्।
बुध्येम शरदः शतं रोहेम शरदः शतम्॥
अर्थ: हम सौ वर्षों तक देखें, जिएँ, ज्ञान प्राप्त करें, उन्नति करें और स्वस्थ जीवन व्यतीत करें।
5. अथर्ववेद
काण्ड 12, सूक्त 2, मंत्र 31
शतं जीव शरदो वर्धमानः।
अर्थ: तुम उन्नति करते हुए सौ वर्षों तक जीवन प्राप्त करो।
इन मंत्रों का भाव महामृत्युंजय मंत्र के समान है।
उपनिषदों में प्रमाण --
—दीर्घायु, आरोग्य, रक्षा, कल्याण और मृत्यु के भय से मुक्ति की प्रार्थना। नीचे मंत्र के साथ पूरा संदर्भ (अध्याय/खण्ड/मंत्र संख्या) दिया गया है।
1. बृहदारण्यक उपनिषद्
अध्याय 1, ब्राह्मण 3, मंत्र 28
असतो मा सद्गमय।
तमसो मा ज्योतिर्गमय।
मृत्योर्माऽमृतं गमय॥
अर्थ: हे प्रभु! मुझे असत्य से सत्य की ओर, अंधकार से प्रकाश की ओर और मृत्यु से अमृतत्व की ओर ले चलिए।
2. श्वेताश्वतर उपनिषद्
अध्याय 3, मंत्र 8
वेदाहमेतं पुरुषं महान्तम् आदित्यवर्णं तमसः परस्तात्।
तमेव विदित्वाऽतिमृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय॥
अर्थ: उस परम पुरुष को जानकर ही मनुष्य मृत्यु को पार करता है; मुक्ति का दूसरा कोई मार्ग नहीं है।
3. कठोपनिषद्
अध्याय 2, वल्ली 3, मंत्र 14
यदा सर्वे प्रमुच्यन्ते कामा येऽस्य हृदि श्रिताः।
अथ मर्त्योऽमृतो भवत्यत्र ब्रह्म समश्नुते॥
अर्थ: जब हृदय की सभी कामनाएँ समाप्त हो जाती हैं, तब मनुष्य अमृतस्वरूप होकर ब्रह्म को प्राप्त करता है।
4. श्वेताश्वतर उपनिषद्
अध्याय 4, मंत्र 12
एको हि रुद्रो न द्वितीयाय तस्थुर्य इमान् लोकानीशत ईशनीभिः॥
अर्थ: रुद्र एकमात्र परमेश्वर हैं; उनके समान दूसरा कोई नहीं। वही समस्त लोकों के स्वामी हैं।
5. कैवल्य उपनिषद्
उमासहायं परमेश्वरं प्रभुं त्रिलोचनं नीलकण्ठं प्रशान्तम्।
ध्यात्वा मुनिर्गच्छति भूतयोनिं समस्तसाक्षिं तमसः परस्तात्॥
अर्थ: जो मुनि त्रिलोचन परमेश्वर का ध्यान करता है, वह समस्त बन्धनों से मुक्त होकर परम पद को प्राप्त करता है।
ये उपनिषद्-मंत्र "त्र्यम्बकं यजामहे… मृत्योर्मुक्षीय मा अमृतात्" के भाव—मृत्यु से मुक्ति, अमृतत्व और परमात्मा की प्राप्ति के समरूप है।
पुराणों में प्रमाण--
"त्र्यम्बकं यजामहे… मृत्योर्मुक्षीय मा अमृतात्" के समान भाव (मृत्यु से रक्षा, दीर्घायु, मोक्ष, शिव-शरण) वाले पुराण-प्रमाण नीचे दिए जा रहे हैं।
ध्यान दें कि पुराणों के अध्याय और श्लोक क्रम विभिन्न संस्करणों (गीता प्रेस सहित) में कुछ स्थानों पर भिन्न हो सकते हैं।
1-शिव महापुराण
अध्याय 22, श्लोक 21–22
महामृत्युञ्जयं मन्त्रं श्रौतमग्र्यं वदामि ते॥ (21)
त्र्यम्बकं यजामहे त्रैलोक्यं पितरं प्रभुम्...॥ (22)
अर्थ: यह महामृत्युंजय मंत्र मृत्यु के भय का नाश करने वाला और कल्याण प्रदान करने वाला बताया गया है।
2-लिङ्ग पुराण
अध्याय 64, श्लोक 6–9
संपूज्य शिवसूक्तेन त्र्यम्बकेन शुभेन च...
अर्थ: शिवपूजन के पश्चात् त्र्यम्बक (महामृत्युंजय) मंत्र का जप करने का विधान है।
3--लिङ्ग पुराण--
अध्याय 54, श्लोक 18–20
अर्थ: रुद्रोपासना एवं मृत्यु-भय से रक्षा के लिए त्र्यम्बक मंत्र का माहात्म्य वर्णित है।
4--स्कन्द पुराण
अध्याय 95, श्लोक 4–5
मृत्युञ्जयमहामन्त्रं...
अर्थ: मृत्युंजय महामंत्र के जप से भगवान शिव प्रसन्न होकर आयु, आरोग्य और अभय प्रदान करते हैं।
5--कूर्म पुराण
रुद्रोपासना के प्रसंग में शिव-मंत्र-जप द्वारा बन्धन-मुक्ति और परमगति का वर्णन मिलता है (अध्याय-क्रम संस्करणानुसार भिन्न है।
भगवद्गीता में प्रमाण--
"त्र्यम्बकं यजामहे… मृत्योर्मुक्षीय मा अमृतात्" के समान भाव (मृत्यु से मुक्ति, अमृतत्व, आत्मा की नित्यता और मोक्ष) के श्रीमद्भगवद्गीता से प्रमुख प्रमाण इस प्रकार हैं:
1. अध्याय 2, श्लोक 20
न जायते म्रियते वा कदाचि-
न्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः।
अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो
न हन्यते हन्यमाने शरीरे॥ 2.20॥
अर्थ: आत्मा न जन्म लेती है, न मरती है। शरीर के नष्ट होने पर भी उसका नाश नहीं होता।
2. अध्याय 2, श्लोक 27
जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च।
तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि॥ 2.27॥
अर्थ: जिसका जन्म हुआ है उसकी मृत्यु निश्चित है, और मृत्यु के बाद पुनर्जन्म भी निश्चित है। इसलिए अनिवार्य विषय पर शोक नहीं करना चाहिए।
3. अध्याय 5, श्लोक 24
योऽन्तःसुखोऽन्तरारामस्तथान्तर्ज्योतिरेव यः।
स योगी ब्रह्मनिर्वाणं ब्रह्मभूतोऽधिगच्छति॥ 5.24॥
अर्थ: जो भीतर ही सुख और प्रकाश का अनुभव करता है, वह योगी ब्रह्मनिर्वाण (मोक्ष) को प्राप्त करता है।
4. अध्याय 9, श्लोक 19
तपाम्यहमहं वर्षं निगृह्णाम्युत्सृजामि च।
अमृतं चैव मृत्युश्च सदसच्चाहमर्जुन॥ 9.19॥
अर्थ: हे अर्जुन! मैं ही अमृत हूँ और मैं ही मृत्यु हूँ; समस्त अस्तित्व का आधार मैं ही हूँ।
5. अध्याय 14, श्लोक 20
गुणानेतानतीत्य त्रीन्देही देहसमुद्भवान्।
जन्ममृत्युजरादुःखैर्विमुक्तोऽमृतमश्नुते॥ 14.20॥
अर्थ: जो पुरुष तीनों गुणों से ऊपर उठ जाता है, वह जन्म, मृत्यु और बुढ़ापे के दुःखों से मुक्त होकर अमृतत्व (मोक्ष) को प्राप्त करता है। यह श्लोक "मृत्योर्मुक्षीय मा अमृतात्" के भाव से अत्यन्त निकट है।
इन पाँच श्लोकों में विशेष रूप से गीता 14.20 और 2.20 महामृत्युंजय मंत्र के भाव—मृत्यु से मुक्ति, अमृतत्व और आत्मा की नित्यता—का सबसे प्रबल समर्थन करते हैं।
महाभारत में प्रमाण --
"त्र्यम्बकं यजामहे… मृत्योर्मुक्षीय मा अमृतात्" का भाव है—मृत्यु पर विजय, भगवान शिव की शरण, दीर्घायु और मोक्ष। महाभारत में इसी भाव के अनेक श्लोक मिलते हैं। प्रमुख प्रमाण निम्न हैं:
1. महाभारत
नमः शिवाय शान्ताय नमः कारणहेतवे।
नमोऽस्तु ते महादेव त्राहि मां शरणागतम्॥
अर्थ:
हे शान्तस्वरूप महादेव! आपको नमस्कार है। मैं आपकी शरण में आया हूँ, मेरी रक्षा कीजिए।
भाव: मृत्यु और संकट से रक्षा के लिए शिव की शरण।
2. महाभारत (शिवसहस्रनाम)
मृत्युञ्जयो महादेवः कालकालः सदाशिवः॥
अर्थ:
भगवान शिव मृत्यु पर विजय प्राप्त कराने वाले, काल के भी काल और सदाशिव हैं।
भाव: "मृत्योर्मुक्षीय" के समान।
3. महाभारत (अर्जुनकृत शिवस्तुति)
त्वं यज्ञस्त्वं वषट्कारस्त्वमोङ्कारः परात्परः॥
अर्थ:
हे शिव! आप ही यज्ञ हैं, आप ही ओंकार हैं, आप ही परम ब्रह्म हैं।
भाव: त्र्यम्बक (परमेश्वर) की उपासना।
4. महाभारत
यो हि भक्त्या महादेवं शरणं याति मानवः।
न तस्य मृत्युर्भयं किञ्चित्...
अर्थ:
जो मनुष्य भक्तिभाव से महादेव की शरण ग्रहण करता है, उसे मृत्यु का भय नहीं रहता।
भाव: मृत्यु-भय से मुक्ति।
5. महाभारत
अर्जुन की शिव-उपासना के प्रसंग में भगवान शिव प्रसन्न होकर वरदान देते हैं और उनकी रक्षा करते हैं। यह प्रसंग भी महामृत्युंजय मंत्र के भाव—शिव-आराधना से अभय और कल्याण—का समर्थन करता है।
टिप्पणी: महाभारत के अनुशासन पर्व और द्रोण पर्व के अध्याय एवं श्लोक क्रम विभिन्न संस्करणों (जैसे गीता प्रेस और आलोचनात्मक संस्करण) में कुछ भिन्न हो सकते हैं।
आप जिस भाव के प्रमाण चाहते हैं—"त्र्यम्बकं यजामहे… मृत्योर्मुक्षीय मा अमृतात्" (रक्षा, आयु, मृत्यु से मुक्ति, परमेश्वर की शरण)—उस विषय में एक महत्वपूर्ण तथ्य है:
वाल्मीकि रामायण में महामृत्युंजय मंत्र का न तो शब्दशः उल्लेख है और न ही उसके जप का विधान मिलता है। इसलिए उसके लिए अध्याय और श्लोक संख्या सहित सीधा प्रमाण देना संभव नहीं है।
हाँ, समान भाव (शरण, अभय, मोक्ष, धर्मरक्षा) वाले कुछ श्लोक अवश्य मिलते हैं, जैसे—
1. वाल्मीकि रामायण
सकृदेव प्रपन्नाय तवास्मीति च याचते।
अभयं सर्वभूतेभ्यो ददाम्येतद् व्रतं मम॥
अर्थ:
जो एक बार भी मेरी शरण में आकर कहता है—"मैं आपका हूँ", उसे मैं सभी प्राणियों से अभय देता हूँ। यह मेरा व्रत है।
भाव: शरणागति से भय और संकट से मुक्ति।
2. वाल्मीकि रामायण
धर्मो हि परमो लोके धर्मे सत्यं प्रतिष्ठितम्।
अर्थ:
इस संसार में धर्म ही सर्वोच्च है और सत्य धर्म में प्रतिष्ठित है।
भाव: कल्याण और जीवन का श्रेष्ठ मार्ग।
3. वाल्मीकि रामायण
रामायण में अनेक स्थानों पर श्रीराम का स्मरण और उनकी शरण को भय-निवारक बताया गया है, पर "मृत्योर्मुक्षीय मा अमृतात्" जैसा वाक्यांश या महामृत्युंजय मंत्र का प्रत्यक्ष उद्धरण नहीं मिलता।
निष्कर्ष:
यदि आपका उद्देश्य महामृत्युंजय मंत्र के समान अर्थ वाले ग्रंथ-प्रमाण एकत्र करना है, तो सबसे अधिक प्रमाण उपनिषद्, भगवद्गीता, महाभारत, शिवपुराण, लिङ्गपुराण और स्कन्दपुराण में मिलते हैं।
वाल्मीकि रामायण में इस मंत्र का प्रत्यक्ष समकक्ष श्लोक उपलब्ध नहीं है।
योग वाशिष्ठ में प्रमाण--
"त्र्यम्बकं यजामहे… मृत्योर्मुक्षीय मा अमृतात्" का मुख्य भाव है—मृत्यु के बंधन से मुक्ति, आत्मज्ञान और अमृतस्वरूप मोक्ष। इस भाव के समर्थन में योगवासिष्ठ में अनेक श्लोक मिलते हैं, परंतु महामृत्युंजय मंत्र का शब्दशः उद्धरण योगवासिष्ठ में नहीं है।
कुछ प्रमुख प्रमाण इस प्रकार हैं:
1. योगवासिष्ठ
ज्ञानेनैव भवेद् मोक्षो नान्यथा कर्मकोटिभिः।
अर्थ:
केवल ज्ञान से ही मोक्ष प्राप्त होता है; करोड़ों कर्मों से नहीं।
भाव: मृत्यु के बंधन से मुक्ति का साधन आत्मज्ञान है।
2. योगवासिष्ठ
मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः।
अर्थ:
मनुष्य के बन्धन और मोक्ष का कारण मन ही है।
भाव: "मृत्योर्मुक्षीय" का तात्पर्य आन्तरिक बन्धनों से मुक्ति भी है।
3. योगवासिष्ठ
यदा न भाव्यते किंचित् तदा मोक्षः प्रजायते।
अर्थ:
जब मन की कल्पनाएँ समाप्त हो जाती हैं, तभी मोक्ष की प्राप्ति होती है।
4. योगवासिष्ठ
आत्मज्ञानं परं श्रेयः।
अर्थ:
आत्मज्ञान ही परम कल्याण का मार्ग है।
महत्वपूर्ण सूचना
ऊपर दिए गए श्लोकों का भाव योगवासिष्ठ का है, लेकिन श्लोक-पाठ और सर्ग-संख्या विभिन्न संस्करणों (निर्णयसागर, चौखम्बा, गीता प्रेस आदि) में अलग-अलग हो सकते हैं।
इस्लाम धर्म में प्रमाण--
नीचे सूरह संख्या : आयत संख्या स्पष्ट रूप से दी जा रही है:
1-क़ुरआन
सूरह 3, आयत 185
كُلُّ نَفْسٍ ذَائِقَةُ الْمَوْتِ...
अर्थ: प्रत्येक प्राणी को मृत्यु का स्वाद चखना है। जो जहन्नम से बचा लिया गया और जन्नत में प्रवेश कर गया, वही सफल हुआ।
2-क़ुरआन
सूरह 2, आयत 156
إِنَّا لِلَّهِ وَإِنَّا إِلَيْهِ رَاجِعُونَ
अर्थ: निश्चय ही हम अल्लाह के हैं और उसी की ओर लौटने वाले हैं।
3-क़ुरआन
सूरह 26, आयत 80
وَإِذَا مَرِضْتُ فَهُوَ يَشْفِينِ
अर्थ: जब मैं बीमार पड़ता हूँ, तो वही (अल्लाह) मुझे आरोग्य देता है।
4-क़ुरआन
सूरह 10, आयत 57
يَا أَيُّهَا النَّاسُ قَدْ جَاءَتْكُم مَّوْعِظَةٌ مِّن رَّبِّكُمْ وَشِفَاءٌ لِّمَا فِي الصُّدُورِ...
अर्थ: तुम्हारे पास तुम्हारे पालनहार की ओर से उपदेश, हृदयों के रोगों के लिए शिफ़ा (चिकित्सा), मार्गदर्शन और दया आ गई है।
5-क़ुरआन
सूरह 67, आयत 2
الَّذِي خَلَقَ الْمَوْتَ وَالْحَيَاةَ لِيَبْلُوَكُمْ...
अर्थ: उसी (अल्लाह) ने मृत्यु और जीवन को पैदा किया ताकि वह तुम्हारी परीक्षा ले कि तुममें कौन श्रेष्ठ कर्म करता है।
ये आयतें "त्र्यम्बकं यजामहे… मृत्योर्मुक्षीय मा अमृतात्" के समान विषय—मृत्यु, ईश्वर पर भरोसा, आरोग्य और अंतिम कल्याण—से संबंधित हैं।
सूफी सन्तों में प्रमाण--
"त्र्यम्बकं यजामहे… मृत्योर्मुक्षीय मा अमृतात्" के समान भाव (ईश्वर-स्मरण, मृत्यु से निर्भयता, आत्मा की मुक्ति, ईश्वर से मिलन) पर सूफ़ी संतों की रचनाएँ उपलब्ध हैं, परन्तु वे वेद, गीता या क़ुरआन की तरह अध्याय–श्लोक/आयत क्रमांक वाले ग्रंथ नहीं हैं। अधिकांश सूफ़ी साहित्य दीवान, मसनवी, रुबाइयाँ, ग़ज़लें या मक़्तूबात के रूप में है, इसलिए उनमें "श्लोक संख्या" जैसी व्यवस्था सामान्यतः नहीं होती।
फिर भी कुछ प्रमुख प्रमाण हैं:
1. जलालुद्दीन रूमी — मसनवी-ए-मानवी (دفتر اول / प्रथम दफ़्तर)
بمیر پیش از آنک بمیری
अर्थ:
"मरने से पहले मर जाओ।" अर्थात अहंकार का अंत करो; तभी वास्तविक जीवन (ईश्वर से मिलन) प्राप्त होगा। यह भाव "मृत्योर्मुक्षीय" से मिलता-जुलता माना जाता है।
2. फ़रीदुद्दीन अत्तार — منطق الطیر (मन्तिक़ुत्-तैर)
چون خود بمردی، زندهٔ جانان شوی
अर्थ:
जब तुम अपने अहंकार को त्याग देते हो, तब प्रियतम (ईश्वर) के साथ वास्तविक जीवन प्राप्त करते हो।
3. हाफ़िज़ शीराज़ी — दीवान-ए-हाफ़िज़
هرگز نمیرد آنکه دلش زنده شد به عشق
अर्थ:
जिसका हृदय ईश्वर-प्रेम से जीवित हो गया, वह वास्तव में कभी नहीं मरता।
4. इब्न अरबी — فصوص الحكم (फ़ुसूस अल-हिकम)
الموتُ بابٌ والناسُ داخلوه
अर्थ:
मृत्यु एक द्वार है, और सभी मनुष्य उसमें प्रवेश करेंगे।
ये उद्धरण भावगत समानता रखते हैं, प्रत्यक्ष रूप से महामृत्युंजय मंत्र के उद्धरण नहीं हैं।
5-. बायज़ीद बिस्तामी
سُبْحَانَ مَنْ أَحْيَانِي بِمَوْتِي
अर्थ:
"पवित्र है वह जिसने मेरी मृत्यु (अहंकार के अंत) के द्वारा मुझे वास्तविक जीवन दिया।"
6-. राबिआ अल-अदविय्या
إِلٰهِي أَنْتَ مَقْصُودِي وَرِضَاكَ مَطْلُوبِي
अर्थ:
"हे मेरे पालनहार! केवल तू ही मेरा लक्ष्य है और तेरी प्रसन्नता ही मेरी अभिलाषा है।"
7-- शेख अब्दुल क़ादिर जीलानी
مُوتُوا عَنِ النَّفْسِ تَحْيَوْا بِالْحَقِّ
अर्थ:
"अपने अहंकार के लिए मर जाओ, तब सत्य (ईश्वर) में जीवित हो जाओ।"
8--शम्स तबरीज़
بمیر تا زنده شوی
अर्थ:
"मर जाओ (अहंकार का त्याग करो), तभी सच्चे अर्थों में जीवित होओ।"
9--सुल्तान बाहू
مرن توں پہلاں مر جا باہو، تاں عشق دی منزل پائیں
अर्थ:
"हे बाहू! मरने से पहले (अहंकार को) मार दो, तभी ईश्वर-प्रेम की मंज़िल मिलेगी।"
10 बुले शाह
مرنا نہیں او مر جانا اے نفس دا
अर्थ:
"जिस मृत्यु की आवश्यकता है, वह शरीर की नहीं, अहंकार की मृत्यु है।"
महत्वपूर्ण टिप्पणी:
इनमें से कुछ वाक्य सूफ़ी परम्परा के अत्यंत प्रसिद्ध कथन हैं, लेकिन वे हमेशा किसी एक प्रामाणिक ग्रंथ के अध्याय/श्लोक की तरह क्रमांकित नहीं मिलते। सिक्ख धर्म में प्रमाण --
"त्र्यम्बकं यजामहे… मृत्योर्मुक्षीय मा अमृतात्" का मुख्य भाव है—ईश्वर का स्मरण, मृत्यु के भय से मुक्ति, अमृत पद की प्राप्ति और परमात्मा से एकत्व। इसी भाव के कुछ प्रमुख प्रमाण श्री गुरु ग्रंथ साहिब से गुरुमुखी सहित प्रस्तुत हैं:
1. श्री गुरु ग्रंथ साहिब
ਜਿਸੁ ਸਿਮਰਤ ਸੁਖੁ ਹੋਇ ਸਗਲੇ ਦੂਖ ਜਾਹਿ ॥
ਜਿਸੁ ਸਿਮਰਤ ਇਹ ਮਨੁ ਨਿਰਮਲੁ ਹੋਵੈ ॥
अर्थ:
जिस परमात्मा का स्मरण करने से सुख प्राप्त होता है और सभी दुःख दूर हो जाते हैं, उसी के स्मरण से मन निर्मल हो जाता है।
2. श्री गुरु ग्रंथ साहिब
ਹਰਿ ਕਾ ਨਾਮੁ ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਹੈ ਪੀਵਹੁ ਸੰਤਹੁ ਭਾਇ ॥
अर्थ:
परमात्मा का नाम अमृत है; हे संतों! प्रेमपूर्वक उसका पान करो।
3. श्री गुरु ग्रंथ साहिब
ਨਾਮ ਕੇ ਧਾਰੇ ਸਗਲੇ ਜੰਤ ॥
ਨਾਮ ਕੇ ਧਾਰੇ ਖੰਡ ਬ੍ਰਹਮੰਡ ॥
अर्थ:
समस्त जीव और समस्त ब्रह्माण्ड परमात्मा के नाम पर ही आधारित हैं।
4. श्री गुरु ग्रंथ साहिब
ਜਨਮ ਮਰਣ ਦੁਹਹੂ ਮਹਿ ਨਾਹੀ ਜਨ ਪਰਉਪਕਾਰੀ ਆਏ ॥
अर्थ:
जो प्रभु में स्थित हो जाता है, वह जन्म और मृत्यु के बंधन से मुक्त हो जाता है।
5. श्री गुरु ग्रंथ साहिब
ਜਿਨਿ ਨਾਮੁ ਧਿਆਇਆ ਗਏ ਮਸਕਤਿ ਘਾਲਿ ॥
अर्थ:
जिन लोगों ने प्रभु के नाम का ध्यान किया, वे जीवन का सच्चा लक्ष्य प्राप्त कर गए।
इन प्रमाणों का भाव महामृत्युंजय मंत्र के समान है—ईश्वर का स्मरण, अमृत की प्राप्ति, जन्म-मरण के बंधन से मुक्ति और परम कल्याण।
ईसाई धर्म में प्रमाण-
"त्र्यम्बकं यजामहे… मृत्योर्मुक्षीय मा अमृतात्" के समान भाव (मृत्यु पर विजय, अनन्त जीवन, ईश्वर में विश्वास) के ईसाई धर्मग्रंथ (बाइबिल) से प्रमाण प्राप्त करना है, तो प्रमुख प्रमाण इस प्रकार हैं:
1. John
English (KJV):
"I am the resurrection, and the life: he that believeth in me, though he were dead, yet shall he live:
And whosoever liveth and believeth in me shall never die."
हिन्दी अर्थ:
यीशु ने कहा—मैं पुनरुत्थान और जीवन हूँ। जो मुझ पर विश्वास करता है, वह मरकर भी जीवित रहेगा।
2. John
English (KJV):
"For God so loved the world, that he gave his only begotten Son, that whosoever believeth in him should not perish, but have everlasting life."
हिन्दी अर्थ:
जो उस पर विश्वास करे, वह नाश न हो, बल्कि अनन्त जीवन पाए।
3. 1 Corinthians
English (KJV):
"Death is swallowed up in victory.
O death, where is thy sting? O grave, where is thy victory?"
हिन्दी अर्थ:
मृत्यु विजय में निगल ली गई। हे मृत्यु! तेरा डंक कहाँ रहा?
4. Romans
English (KJV):
"For the wages of sin is death; but the gift of God is eternal life through Jesus Christ our Lord."
हिन्दी अर्थ:
पाप की मजदूरी मृत्यु है, परन्तु परमेश्वर का वरदान हमारे प्रभु यीशु मसीह में अनन्त जीवन है।
5. Psalm
English (KJV):
"Yea, though I walk through the valley of the shadow of death, I will fear no evil: for thou art with me."
हिन्दी अर्थ:
यदि मैं मृत्यु की छाया की तराई से होकर भी चलूँ, तो भी किसी विपत्ति से नहीं डरूँगा, क्योंकि तू मेरे साथ है।
ये सभी उद्धरण महामृत्युंजय मंत्र का प्रत्यक्ष अनुवाद नहीं हैं, बल्कि उसके समान विषय—मृत्यु का अतिक्रमण, ईश्वर की शरण और अनन्त जीवन—को व्यक्त करते हैं।
जैन धर्म में प्रमाण--
"त्र्यम्बकं यजामहे… मृत्योर्मुक्षीय मा अमृतात्" का मुख्य भाव है—जन्म-मरण के बन्धन से मुक्ति, अमृत (मोक्ष) की प्राप्ति और परम कल्याण। जैन धर्म में भी इसी भाव के अनेक प्राकृत वचन मिलते हैं। कुछ प्रमुख प्रमाण इस प्रकार हैं:
1. णमोकार मंत्र
प्राकृत (देवनागरी):
णमो अरिहंताणं।
णमो सिद्धाणं।
णमो आयरियाणं।
णमो उवज्झायाणं।
णमो लोए सव्वसाहूणं॥
अर्थ:
अरिहंतों, सिद्धों, आचार्यों, उपाध्यायों और समस्त साधुओं को नमस्कार। यह मंत्र आत्मा को पापों से मुक्त कर मोक्षमार्ग की ओर प्रेरित करता है।
2. उत्तराध्ययन सूत्र
प्राकृत (देवनागरी):
अप्पा चेव दमेयव्वो, अप्पा हु खलु दुद्दमो।
अर्थ:
मनुष्य को अपने ही आत्मस्वरूप को वश में करना चाहिए; आत्मसंयम ही मुक्ति का मार्ग है।
3. आचारांग सूत्र
प्राकृत (देवनागरी):
सव्वे पाणा ण हंतव्वा।
अर्थ:
सभी प्राणियों की हिंसा नहीं करनी चाहिए। अहिंसा ही आत्मकल्याण का आधार है।
4. तत्त्वार्थसूत्र
मोक्षमार्गस्य हेतवः सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्राणि।
अर्थ:
सम्यक् दर्शन, सम्यक् ज्ञान और सम्यक् चरित्र—ये मोक्षमार्ग के कारण हैं।
ध्यान दें: तत्त्वार्थसूत्र संस्कृत ग्रन्थ है, प्राकृत नहीं, किन्तु जैन दर्शन का सर्वमान्य ग्रन्थ है।
5. दशवैकालिक सूत्र
प्राकृत (देवनागरी):
धम्मो मंगलमुक्किट्ठं।
अर्थ:
धर्म ही सर्वोच्च मंगल है और वही जीव को जन्म-मरण के बन्धन से छुड़ाकर मोक्ष की ओर ले जाता है।
टिप्पणी
जैन आगमों में वेदों की तरह "मृत्यु से अमृतत्व" की भाषा नहीं है। वहाँ जन्म-मरण के चक्र से मुक्त होकर सिद्धपद (मोक्ष) प्राप्त करना लक्ष्य है। इसलिए ऊपर दिए गए उद्धरण भाव की समानता के आधार पर प्रस्तुत किए गए हैं, न कि महामृत्युंजय मंत्र के प्रत्यक्ष समकक्ष के रूप में।
बौद्ध धर्म में प्रमाण--
त्र्यम्बकं यजामहे… मृत्योर्मुक्षीय मा अमृतात्" का भाव है—दुःख और मृत्यु के बन्धन से मुक्ति तथा अमृत (निर्वाण) की प्राप्ति। बौद्ध धर्म में "अमत" (पाली: Amata = अमृत/निर्वाण) शब्द का बार-बार प्रयोग हुआ है। नीचे पाली (देवनागरी) के साथ कुछ प्रमुख प्रमाण दिए जा रहे हैं।
1. धम्मपद
पाली (देवनागरी):
अप्पमादो अमतपदं, पमादो मच्चुनो पदं।
अप्पमत्ता न मीयन्ति, ये पमत्ता यथा मता॥ (धम्मपद २१)
अर्थ:
अप्रमाद (सजगता) अमृत-पद (निर्वाण) का मार्ग है, और प्रमाद मृत्यु का मार्ग है। जो अप्रमादी हैं, वे अमृत-पद प्राप्त करते हैं।
2. धम्मपद
पाली (देवनागरी):
यो च वस्ससतं जीवे, अपस्सं अमतं पदं।
एकाहं जीवितं सेय्यो, पस्सतो अमतं पदं॥ (धम्मपद ११४)
अर्थ:
जो सौ वर्ष जीकर भी अमृत-पद (निर्वाण) को नहीं देखता, उससे श्रेष्ठ वह है जो एक दिन जीकर भी अमृत-पद को देख ले।
3. संयुक्त निकाय
पाली (देवनागरी):
अमतद्वारं अपावुतं।
अर्थ:
अमृत (निर्वाण) का द्वार खुल गया है।
4. महापरिनिब्बान सुत्त
पाली (देवनागरी):
वयधम्मा सङ्खारा, अप्पमादेन सम्पादेथ।
अर्थ:
सभी संस्कार नश्वर हैं; इसलिए अप्रमादपूर्वक अपने लक्ष्य (निर्वाण) की सिद्धि करो।
5. उदान
पाली (देवनागरी):
अत्थि भिक्खवे अजातं अभूतं अकतं असङ्खतं।
अर्थ:
हे भिक्षुओ! एक ऐसा तत्त्व है जो अजन्मा, अभूत, अकृत और असंस्कृत है। उसी के कारण जन्म-मरण से परे निर्वाण सम्भव है।
इन प्रमाणों में विशेषकर धम्मपद 21, धम्मपद 114 और उदान 8.3 का भाव "मृत्योर्मुक्षीय मा अमृतात्" के सबसे निकट माना जा सकता है, क्योंकि इनमें "अमत" (अमृत/निर्वाण) और मृत्यु के बन्धन से पार होने का स्पष्ट उल्लेखहै।
यहूदी धर्म में प्रमाण--
"त्र्यम्बकं यजामहे… मृत्योर्मुक्षीय मा अमृतात्" का भाव है—ईश्वर की शरण, मृत्यु से रक्षा, जीवन की प्राप्ति और परम आश्रय। यहूदी धर्म (तनाख/हिब्रू बाइबिल) में इससे मिलते-जुलते भाव वाले अनेक पद मिलते हैं।
1. Psalms (תהילים ט״ז:י׳)
हिब्रू:
כִּי לֹא־תַעֲזֹב נַפְשִׁי לִשְׁאוֹל לֹא־תִתֵּן חֲסִידְךָ לִרְאוֹת שָׁחַת׃
उच्चारण: Ki lo ta'azov nafshi lish'ol, lo titen chasidekha lir'ot shachat.
अर्थ:
तू मेरे प्राण को अधोलोक में नहीं छोड़ेगा और अपने भक्त को विनाश देखने नहीं देगा।
2. Psalms (תהילים כ״ג:ד׳)
हिब्रू:
גַּם כִּי־אֵלֵךְ בְּגֵיא צַלְמָוֶת לֹא־אִירָא רָע כִּי־אַתָּה עִמָּדִי...
अर्थ:
यदि मैं मृत्यु की छाया की तराई में भी चलूँ, तो भी किसी बुराई से नहीं डरूँगा, क्योंकि तू मेरे साथ है।
3. Isaiah (ישעיהו כ״ה:ח׳)
हिब्रू:
בִּלַּע הַמָּוֶת לָנֶצַח...
अर्थ:
वह मृत्यु का सदा के लिए अंत कर देगा।
4. Hosea (הושע י״ג:י״ד)
हिब्रू:
מִיַּד שְׁאוֹל אֶפְדֵּם מִמָּוֶת אֶגְאָלֵם...
अर्थ:
मैं उन्हें अधोलोक से छुड़ाऊँगा और मृत्यु से उनका उद्धार करूँगा।
5. Deuteronomy (דברים ל״ב:ל״ט)
हिब्रू:
אֲנִי אָמִית וַאֲחַיֶּה...
अर्थ:
मैं ही मृत्यु देता हूँ और मैं ही जीवन देता हूँ।
इन सभी पदों का विषय महामृत्युंजय मंत्र का प्रत्यक्ष समकक्ष नहीं है, बल्कि मृत्यु से रक्षा, ईश्वर की शरण, जीवन और उद्धार जैसे समान आध्यात्मिक विषय हैं। विशेष रूप से यशायाह 25:8 ("वह मृत्यु का सदा के लिए अंत कर देगा") और होशे 13:14 ("मैं उन्हें मृत्यु से छुड़ाऊँगा") का भाव "मृत्योर्मुक्षीय" के सबसे निकट माना जा सकता है।
पारसी धर्म में प्रमाण--
"त्र्यम्बकं यजामहे… मृत्योर्मुक्षीय मा अमृतात्" के समान भाव—आरोग्य, दीर्घायु, अमरत्व (अमेरेतात), धर्म और अहुरा मज़्दा की शरण—के प्रमाण जरथुस्त्र (पारसी) धर्म के अवेस्ता में मिलते हैं। परंतु एक महत्वपूर्ण बात है:
अवेस्ता के मूल ग्रंथ अवेस्ताई (Avestan) भाषा और अवेस्ताई लिपि (𐬀𐬎𐬀...) में हैं। देवनागरी या फ़ारसी लिपि मूल नहीं हैं। इसलिए यदि आप "अवेस्ता लिपि" चाहते हैं, तो वही मूल लिपि प्रस्तुत की जानी चाहिए।
कुछ प्रमुख प्रमाण:
1. यश्न
अवेस्ताई (Avestan):
𐬀𐬨𐬆𐬭𐬆𐬙𐬁𐬙𐬁 ...
भावार्थ:
अहुरा मज़्दा धर्मात्माओं को Ameretat (अमरत्व) प्रदान करते हैं।
2. यश्न
अवेस्ताई:
𐬨𐬀𐬰𐬛𐬁 𐬀𐬵𐬎𐬭𐬀 ...
भावार्थ:
हे अहुरा मज़्दा! मुझे सत्य के मार्ग पर चलाइए और श्रेष्ठ जीवन प्रदान कीजिए।
3. यश्न
अवेस्ताई:
𐬀𐬱𐬀 ...
भावार्थ:
अशा (सत्य) के मार्ग से मनुष्य अमरत्व की ओर बढ़ता है।
4. वेंदीदाद
भावार्थ:
धर्म का पालन करने वाला दुष्ट शक्तियों पर विजय प्राप्त करता है और उत्तम गति को प्राप्त होता है।
5. यश्न
भावार्थ:
अहुरा मज़्दा की उपासना मनुष्य को कल्याण और अमरत्व के मार्ग पर ले जाती है।
महत्वपूर्ण टिप्पणी
मैं यहाँ पूरे अवेस्ताई मूल मंत्र नहीं दे रहा हूँ क्योंकि अवेस्ता के मूल पाठ का अक्षरशः उद्धरण अत्यधिक सावधानी चाहता है, और बिना सत्यापित पाठ के एक भी अक्षर गलत होना उचित नहीं होगा।
ताओ धर्म में प्रमाण--
"त्र्यम्बकं यजामहे… मृत्योर्मुक्षीय मा अमृतात्" का भाव—प्रकृति के साथ एकत्व, भय से मुक्ति, दीर्घजीवन, और परम सत्य की प्राप्ति—ताओ (Dao) दर्शन में भी मिलता है। परन्तु ध्यान रहे कि ताओ धर्म में "मृत्यु से अमरत्व" का अर्थ वैदिक मोक्ष से भिन्न है। वहाँ ताओ (道) के साथ सामंजस्य पर बल दिया गया है।
नीचे ताओ ते चिंग (Dao De Jing) से कुछ प्रमुख प्रमाण मूल चीनी लिपि सहित दिए जा रहे हैं:
1. Tao Te Ching
中文:
知人者智,自知者明。
勝人者有力,自勝者強。
知足者富。
強行者有志。
不失其所者久,
死而不亡者壽。
हिन्दी अर्थ:
जो दूसरों को जानता है वह बुद्धिमान है; जो स्वयं को जानता है वह प्रबुद्ध है। जो अपने सत्यस्वरूप में स्थित रहता है, वही दीर्घजीवी है; जो मरकर भी नष्ट नहीं होता, वही वास्तविक अर्थ में अमर है।
2. Tao Te Ching
中文:
歸根曰靜,
靜曰復命,
復命曰常。
हिन्दी अर्थ:
मूल में लौटना ही शान्ति है; शान्ति ही अपने शाश्वत स्वरूप में लौटना है।
3. Tao Te Ching
中文:
出生入死。
हिन्दी अर्थ:
जीवन और मृत्यु एक ही प्राकृतिक प्रवाह के अंग हैं।
4. Tao Te Ching
中文:
含德之厚,比於赤子。
हिन्दी अर्थ:
जिसमें ताओ का पूर्ण गुण है, वह नवजात शिशु के समान निर्मल और जीवन-शक्ति से पूर्ण होता है।
5. Zhuangzi
中文:
生死一條。
हिन्दी अर्थ:
जीवन और मृत्यु एक ही निरन्तर प्रवाह के दो रूप हैं।
टिप्पणी
ये उद्धरण महामृत्युंजय मंत्र का प्रत्यक्ष समकक्ष नहीं हैं, बल्कि मृत्यु के भय से ऊपर उठने, शाश्वत सत्य और आंतरिक अमरत्व जैसे समान दार्शनिक विषयों को व्यक्त करते हैं। विशेष रूप से ताओ ते चिंग अध्याय 33 का वाक्य 「死而不亡者壽」 ("जो मरकर भी नष्ट नहीं होता, वही वास्तविक दीर्घजीवी है")।
कन्फ्यूसियस धर्म में प्रमाण--
"त्र्यम्बकं यजामहे… मृत्योर्मुक्षीय मा अमृतात्" के समान भाव—धर्ममय जीवन, नैतिक पूर्णता, मृत्यु के भय से ऊपर उठना और स्वर्ग (天, Tiān) के मार्ग का अनुसरण—के कुछ प्रमाण कन्फ्यूशी (Confucian) ग्रंथों में मिलते हैं। परंतु यह ध्यान रखना चाहिए कि कन्फ्यूशी धर्म में वैदिक "मोक्ष" जैसी अवधारणा नहीं है। इसलिए नीचे दिए गए उद्धरण भावगत समानता रखते हैं, प्रत्यक्ष समकक्ष नहीं।
1. The Analects (Lúnyǔ)
中文:
朝聞道,夕死可矣。
पिन्यिन:
Zhāo wén dào, xī sǐ kě yǐ.
हिन्दी अर्थ:
यदि प्रातः सत्य (दाओ) का ज्ञान हो जाए, तो संध्या को मृत्यु भी स्वीकार है।
भाव: सत्य की प्राप्ति मृत्यु के भय से श्रेष्ठ है।
2. The Analects (Lúnyǔ)
中文:
克己復禮為仁。
पिन्यिन:
Kè jǐ fù lǐ wéi rén.
हिन्दी अर्थ:
अपने अहंकार पर विजय पाकर धर्म (रीति) में स्थित होना ही श्रेष्ठ मानवता (रेन) है।
3. The Analects (Lúnyǔ)
中文:
志士仁人,無求生以害仁,有殺身以成仁。
हिन्दी अर्थ:
श्रेष्ठ व्यक्ति केवल जीवित रहने के लिए धर्म का त्याग नहीं करता; आवश्यकता पड़ने पर धर्म की रक्षा के लिए प्राण भी दे देता है।
4. Doctrine of the Mean (Zhōngyōng)
中文:
天命之謂性,率性之謂道,修道之謂教。
हिन्दी अर्थ:
स्वर्ग (तियान) द्वारा प्रदत्त स्वभाव ही प्रकृति है; उसी के अनुसार चलना ही मार्ग (दाओ) है।
5. Mencius
中文:
盡其心者,知其性也;知其性,則知天矣。
हिन्दी अर्थ:
जो अपने मन को पूर्णतः जान लेता है, वह अपने स्वभाव को जानता है; और जो अपने स्वभाव को जानता है, वह स्वर्ग (तियान) को जानता है।
इन पाँचों उद्धरणों में विशेष रूप से Analects 4.8 —「朝聞道,夕死可矣」 का भाव "मृत्योर्मुक्षीय" के सबसे निकट माना जा सकता है, क्योंकि इसमें सत्य की प्राप्ति को मृत्यु के भय से श्रेष्ठ बताया गया है। हालाँकि, कन्फ्यूशी परम्परा का मुख्य बल नैतिक जीवन पर है, न कि वैदिक अर्थ में मोक्ष या अमृतत्व पर।
शिन्तो धर्म में प्रमाण--
"त्र्यम्बकं यजामहे… मृत्योर्मुक्षीय मा अमृतात्" के समान भाव—दैवी संरक्षण, शुद्धि, दीर्घायु, जीवन की पवित्रता और देवकृपा—शिन्तो (Shintō, 神道) परम्परा में मिलते हैं। किंतु एक महत्वपूर्ण तथ्य है:
शिन्तो धर्म में वेद, बाइबिल या क़ुरआन की तरह क्रमांकित "श्लोक" या "आयत" नहीं हैं। इसके प्रमुख ग्रंथ कोजिकी (古事記), निहोन शोकी (日本書紀) और नोरितो (祝詞) हैं। इनमें अधिकांश प्रार्थनाएँ और आख्यान हैं, इसलिए "अध्याय–श्लोक संख्या" का प्रारूप सामान्यतः नहीं मिलता।
नीचे समान भाव वाले कुछ प्रमाण जापानी लिपि सहित दिए जा रहे हैं:
1. Ōharae no Kotoba (大祓詞)
日本語:
祓へ給ひ 清め給へ 守り給ひ 幸へ給へ
रोमन:
Harae tamai, kiyome tamai, mamori tamai, sakiwai tamai.
हिन्दी अर्थ:
हे देवताओं! हमें शुद्ध करें, हमारी रक्षा करें और हमें कल्याण प्रदान करें।
भाव: ईश्वर से रक्षा और कल्याण की प्रार्थना।
2. Ōharae no Kotoba
日本語:
諸々の罪穢れを祓へ給へ清め給へ。
हिन्दी अर्थ:
हमारे सभी पापों और अशुद्धियों को दूर करके हमें शुद्ध कीजिए।
3. Kojiki (古事記)
日本語:
惟神の道
रोमन:
Kannagara no Michi.
हिन्दी अर्थ:
देवताओं के मार्ग के अनुसार जीवन व्यतीत करना।
4. Nihon Shoki (日本書紀)
日本語:
天壌無窮
हिन्दी अर्थ:
स्वर्ग और पृथ्वी की भाँति अनन्त और चिरस्थायी।
टिप्पणी
शिन्तो धर्म में "मृत्यु से अमृतत्व" जैसा वैदिक सिद्धान्त नहीं है। उसका मुख्य बल शुद्धि (祓い), देवताओं (神, कामी) की कृपा, सुरक्षा और प्रकृति के साथ सामंजस्य पर है। इसलिए ऊपर दिए गए उद्धरण महामृत्युंजय मंत्र के प्रत्यक्ष समकक्ष नहीं, बल्कि समान आध्यात्मिक भाव को व्यक्त करते हैं।
यदि आपका उद्देश्य विश्व धर्मों में महामृत्युंजय मंत्र के समान भाव वाले प्रमाणों का शोध-संकलन बनाना है, तो शिन्तो परम्परा में Ōharae no Kotoba (大祓詞) सबसे उपयुक्त और प्रामाणिक स्रोत माना जाता है।
यूनानी दर्शन में प्रमाण --
"त्र्यम्बकं यजामहे… मृत्योर्मुक्षीय मा अमृतात्" का भाव—आत्मा की उन्नति, मृत्यु का निर्भय सामना, परम सत्य की प्राप्ति और दिव्य जीवन—के समान विचार यूनानी दर्शन में भी मिलते हैं। यद्यपि वहाँ वैदिक "मोक्ष" की अवधारणा नहीं है, फिर भी आत्मा की अमरता और सत्य की प्राप्ति पर विशेष बल मिलता है।
नीचे प्रमुख यूनानी दार्शनिक ग्रंथों से प्रमाण दिए जा रहे हैं:
1. Phaedo
ग्रीक (Greek):
οἱ φιλοσοφοῦντες ἀποθνῄσκειν μελετῶσιν.
लिप्यंतरण:
Hoi philosophountes apothnēskein meletōsin.
हिन्दी अर्थ:
"सच्चे दार्शनिक मृत्यु के लिए स्वयं को तैयार करते रहते हैं।"
भाव: मृत्यु का भय नहीं, बल्कि आत्मा की उच्च अवस्था की तैयारी।
2. Apology
ग्रीक:
ὁ δὲ θάνατος... μέγα κέρδος.
हिन्दी अर्थ:
यदि मृत्यु के बाद श्रेष्ठ जीवन है, तो मृत्यु महान लाभ है।
3. Phaedo
ग्रीक:
ἀθάνατος ἡ ψυχή.
लिप्यंतरण:
Athanatos hē psychē.
हिन्दी अर्थ:
"आत्मा अमर है।"
4. Meditations
ग्रीक:
Ὁ θάνατος φύσεως ἔργον ἐστίν.
हिन्दी अर्थ:
मृत्यु प्रकृति का एक कार्य है; उससे भयभीत नहीं होना चाहिए।
5. Enchiridion
ग्रीक:
μὴ τὰ πράγματα ταράττει τοὺς ἀνθρώπους, ἀλλὰ αἱ περὶ τῶν πραγμάτων δόξαι.
हिन्दी अर्थ:
मनुष्य को वस्तुएँ नहीं, बल्कि उनके बारे में उसके विचार व्याकुल करते हैं।
भाव: भय और बन्धन का कारण मन है; ज्ञान से मुक्ति मिलती है।
6. Republic
ग्रीक:
ψυχὴ πᾶσα ἀθάνατος.
हिन्दी अर्थ:
प्रत्येक आत्मा अमर है।
टिप्पणी
इन उद्धरणों में विशेष रूप से प्लेटो के Phaedo में वर्णित "ἀθάνατος ἡ ψυχή" (आत्मा अमर है) और "दार्शनिक मृत्यु के लिए स्वयं को तैयार करता है" का भाव "मृत्योर्मुक्षीय मा अमृतात्" के सबसे निकट माना जा सकता है। परंतु यह ध्यान रखना चाहिए कि यूनानी दर्शन में "अमरत्व" और वैदिक "मोक्ष" की अवधारणाएँ एक-दूसरे से पूर्णतः समान नहीं हैं।
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