यजुर्वेद सूक्ति (1*)की व्याख्या
यजुर्वेद सूक्ति(1} की व्याख्या
"कुर्वन्नेवेह कर्माणि
जिजीविषेच्छतं समाः"
यजुर्वेद--40/2
भावार्थ--इस जगत में कर्मशील रहते हुए ही सौ वर्ष जीने की इच्छा करेँ।
यजुर्वेद 40.2
(ईशावास्योपनिषद् 2) का पूरा मंत्र इस प्रकार है—
कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः।
एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे॥
— यजुर्वेद 40.2 (ईशावास्योपनिषद् 2)
शब्दार्थ:
कुर्वन् एव — कर्म करते हुए ही
इह — इस संसार में
कर्माणि — अपने कर्तव्य-कर्म
जिजीविषेत् — जीने की इच्छा करे
शतं समाः — सौ वर्ष तक
एवम् — इस प्रकार
त्वयि — तेरे लिए (मनुष्य के लिए)
न अन्यथा — इसके अतिरिक्त कोई दूसरा मार्ग नहीं है
इतः — इससे
अस्ति — है
न कर्म लिप्यते नरे — तब कर्म मनुष्य को बाँधते नहीं हैं।
भावार्थ: मनुष्य को इस संसार में अपने धर्मानुकूल कर्तव्यों का पालन करते हुए ही सौ वर्ष तक जीने की इच्छा करनी चाहिए। यही जीवन का उचित मार्ग है। इस प्रकार निष्काम भाव से कर्तव्य करते रहने पर कर्म मनुष्य को बन्धन में नहीं डालते।
तात्पर्य: यह मंत्र कर्म का त्याग नहीं, बल्कि निष्काम, धर्मानुकूल और कर्तव्यनिष्ठ कर्म का उपदेश देता है। वेद का संदेश है कि मनुष्य कर्म करते हुए ही जीवन व्यतीत करे, परंतु कर्म के फल में आसक्त न हो; ऐसे कर्म बन्धन का कारण नहीं बनते।
वेदों में प्रमाण--
सूक्ति "कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः" (यजुर्वेद 40.2) का भाव—कर्मशील जीवन, कर्तव्यपालन और दीर्घायु की कामना—के समर्थन में अन्य वैदिक प्रमाणों का है, तो वेदों में इसके अनेक प्रमाण मिलते हैं। उदाहरणार्थ—
"अग्ने नय सुपथा राये अस्मान्…"
यजुर्वेद 40.16
भावार्थ: हे प्रभु! हमें श्रेष्ठ मार्ग पर चलाइए और पाप से दूर रखिए।
"विश्वानि देव सवितर्दुरितानि परासुव। यद्भद्रं तन्न आ सुव॥"
यजुर्वेद 30.3
भावार्थ: हे सविता देव! हमारे सभी दोष और दुःख दूर करें तथा जो कल्याणकारी है, वही हमें प्राप्त हो।
"शतं जीव शरदो वर्धमानः।"
अथर्ववेद 19.67.1
भावार्थ: उन्नति करते हुए सौ शरद् (वर्ष) तक जीवित रहो।
"पश्येम शरदः शतम्। जीवेम शरदः शतम्।"
यजुर्वेद 36.24 (ऋग्वेद 7.66.16 में भी समान प्रार्थना)
भावार्थ: हम सौ वर्षों तक देखें, जिएँ, सुनें और स्वस्थ रहें।
"आयुर्यज्ञेन कल्पताम्।"
यजुर्वेद 18.29
भावार्थ: हमारा जीवन यज्ञमय, लोकहितकारी और कल्याणकारी बने।
इन सभी मंत्रों का सामूहिक संदेश यही है कि मनुष्य को धर्मानुसार कर्म करते हुए, ईश्वर के मार्गदर्शन में, स्वस्थ, उपयोगी और लोककल्याणकारी जीवन जीने का प्रयास करना चाहिए। यही भाव "कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः" का भी है। उपनिषदों में प्रमाण--
"कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः" (यजुर्वेद 40.2 / ईशावास्य उपनिषद् 2) के भाव—कर्तव्य-कर्म करते हुए जीवन जीना—का समर्थन अनेक उपनिषदों में मिलता है। प्रमुख प्रमाण इस प्रकार हैं:
1-ईशावास्य उपनिषद् 2
कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः।
भावार्थ: मनुष्य को कर्तव्य-कर्म करते हुए सौ वर्ष तक जीने की इच्छा करनी चाहिए।
2-कठोपनिषद् 2.3.14
उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत।
भावार्थ: उठो, जागो और श्रेष्ठ आचार्यों से ज्ञान प्राप्त करो। जीवन को पुरुषार्थ और साधना से सफल बनाओ।
3-मुण्डकोपनिषद् 3.1.6
सत्यमेव जयते नानृतम्।
भावार्थ: सत्य की ही विजय होती है, असत्य की नहीं। अतः सत्याचरण ही जीवन का आधार होना चाहिए।
4-तैत्तिरीयोपनिषद् (शिक्षावल्ली 1.11.1)
सत्यं वद। धर्मं चर।
भावार्थ: सत्य बोलो और धर्म का आचरण करो।
5-तैत्तिरीयोपनिषद् (शिक्षावल्ली 1.11.2)
स्वाध्यायान्मा प्रमदः।
भावार्थ: स्वाध्याय और आत्मविकास में कभी प्रमाद मत करो।
6-बृहदारण्यक उपनिषद् 1.3.28
असतो मा सद्गमय। तमसो मा ज्योतिर्गमय। मृत्योर्माऽमृतं गमय॥
भावार्थ: हमें असत्य से सत्य की ओर, अंधकार से प्रकाश की ओर और मृत्यु से अमरत्व की ओर ले चलो।
इन उपनिषद्-वचनों का सार यह है कि जीवन निष्क्रियता के लिए नहीं, बल्कि सत्य, धर्म, स्वाध्याय, पुरुषार्थ और कर्तव्यपालन के लिए है। यही संदेश "कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः" में भी प्रतिपादित है।
पुराणों में प्रमाण --
"कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः" (यजुर्वेद 40.2 / ईशावास्य उपनिषद् 2) का मूल भाव है—कर्तव्य करते हुए, धर्मपूर्वक जीवन जीना। पुराणों में भी यही शिक्षा अनेक स्थानों पर मिलती है।
नीचे कुछ प्रमुख प्रमाण दिए जा रहे हैं:
1-विष्णु पुराण 3.12.45
वर्णाश्रमाचारवता पुरुषेण परः पुमान्।
विष्णुराराध्यते पन्था नान्यत्तत्तोषकारणम्॥
भावार्थ: अपने कर्तव्यों (धर्म) का पालन करने वाला मनुष्य ही भगवान विष्णु की सच्ची आराधना करता है।
2-विष्णु पुराण 3.12.46
यत् स्वकर्मपरायणः स्यात्। (भावानुसार)
भावार्थ: अपने नियत कर्तव्य का निष्ठापूर्वक पालन करना ही धर्म का मार्ग है।
3-भागवत पुराण 1.2.13
अतः पुम्भिर्द्विजश्रेष्ठा वर्णाश्रमविभागशः।
स्वनुष्ठितस्य धर्मस्य संसिद्धिर्हरितोषणम्॥
भावार्थ: अपने धर्म और कर्तव्य का सम्यक् पालन करना ही भगवान को प्रसन्न करने का साधन है।
4-भागवत पुराण 11.20.9
तावत्कर्माणि कुर्वीत...
भावार्थ: जब तक मन पूर्ण वैराग्य और परम ज्ञान को प्राप्त न हो, तब तक अपने नियत कर्मों का पालन करना चाहिए।
5-गरुड़ पुराण (आचारकाण्ड)
धर्मो रक्षति रक्षितः (यह वचन व्यापक रूप से धर्मशास्त्रीय परंपरा में प्रसिद्ध है)
भावार्थ: जो धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है।
इन प्रमाणों का निष्कर्ष यही है कि धर्मानुसार अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए जीवन व्यतीत करना ही श्रेष्ठ मानव जीवन है। यह शिक्षा यजुर्वेद के मंत्र "कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः" के भाव के अनुरूप है।
ध्यान दें: पुराणों के श्लोकों के अध्याय और श्लोक संख्या विभिन्न संस्करणों में कुछ भिन्न हो सकती है.।
भगवद्गीता में प्रमाण--
"कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः" (यजुर्वेद 40.2 / ईशावास्य उपनिषद् 2) का मुख्य संदेश है—कर्तव्य-कर्म करते हुए जीवन जीना और कर्म से पलायन न करना। यही सिद्धांत भगवद्गीता में अनेक स्थानों पर मिलता है।
यहाँ प्रमुख प्रमाण प्रस्तुत हैं—
"कुर्वन्नेवेह कर्माणि..." पर भगवद्गीता के प्रमाण
1. कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥
गीता 2.47
भावार्थ: मनुष्य का अधिकार केवल कर्म करने में है, फल में नहीं। इसलिए कर्मफल की आसक्ति न रखो और अकर्म (कर्तव्य छोड़ने) में भी आसक्त मत हो।
2. नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः।
शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्ध्येदकर्मणः॥
गीता 3.8
भावार्थ: अपने नियत कर्तव्य का पालन करो, क्योंकि कर्म न करने की अपेक्षा कर्म करना श्रेष्ठ है। कर्म के बिना शरीर का निर्वाह भी संभव नहीं।
3. तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर।
असक्तो ह्याचरन्कर्म परमाप्नोति पुरुषः॥
गीता 3.19
भावार्थ: इसलिए आसक्ति छोड़कर निरंतर अपने कर्तव्य का पालन करो। निष्काम भाव से कर्म करने वाला परम लक्ष्य को प्राप्त करता है।
4. कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः।
गीता 3.20
भावार्थ: जनक आदि राजाओं ने कर्म करते हुए ही सिद्धि प्राप्त की। इसलिए लोककल्याण की दृष्टि से भी कर्म करना चाहिए।
5. मयि सर्वाणि कर्माणि संन्यस्याध्यात्मचेतसा।
गीता 3.30
भावार्थ: सभी कर्म मुझे अर्पित करके, अहंकार और ममता छोड़कर अपना कर्तव्य करो।
6. स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः।
गीता 18.45
भावार्थ: प्रत्येक मनुष्य अपने-अपने कर्तव्य का निष्ठापूर्वक पालन करके सिद्धि प्राप्त करता है।
7. स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः॥
गीता 18.46
भावार्थ: अपने कर्तव्य-कर्म के द्वारा परमात्मा की आराधना करके मनुष्य सिद्धि प्राप्त करता है।
निष्कर्ष:
यजुर्वेद का "कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः" और भगवद्गीता का "नियतं कुरु कर्म त्वम्" (3.8) तथा "कर्मण्येवाधिकारस्ते" (2.47) एक ही सिद्धांत का प्रतिपादन करते हैं—कर्तव्यपरायण, निष्काम और धर्मसम्मत कर्म ही श्रेष्ठ जीवन का आधार है।
महाभारत में प्रमाण--
"कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः" (यजुर्वेद 40.2 / ईशावास्य उपनिषद् 2) का भाव—कर्तव्य का पालन करते हुए जीवन जीना—का समर्थन महाभारत में अनेक स्थानों पर मिलता है। प्रमुख प्रमाण इस प्रकार हैं:
"कुर्वन्नेवेह कर्माणि..." पर महाभारत के प्रमाण
1. धर्मो रक्षति रक्षितः।
महाभारत, वनपर्व (यह वचन मनुस्मृति 8.15 में भी प्रसिद्ध है।)
भावार्थ: जो धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है। अतः अपने कर्तव्य और धर्म का पालन करना आवश्यक है।
2. न हि कश्चित् क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्।
(यह श्लोक भगवद्गीता 3.5 में है, जो महाभारत के भीष्मपर्व का ही अंग है।)
भावार्थ: कोई भी मनुष्य एक क्षण भी बिना कर्म किए नहीं रह सकता; प्रकृति सभी को कर्म करने के लिए प्रेरित करती है।
3. यतो धर्मस्ततो जयः।
महाभारत का उपसंहार-वाक्य
भावार्थ: जहाँ धर्म है, वहीं विजय है। इसलिए धर्मानुकूल कर्म ही सफलता का आधार है।
4. स्वधर्मे निधनं श्रेयः।
महाभारत, भीष्मपर्व (भगवद्गीता 3.35)
भावार्थ: अपने कर्तव्य का पालन करते हुए जीवन बिताना, चाहे कठिन हो, परधर्म अपनाने से श्रेष्ठ है।
5. अहिंसा परमो धर्मः।
महाभारत, अनुशासनपर्व
भावार्थ: धर्म का पालन सदाचार, संयम और लोकहितकारी आचरण से होता है; यही कर्म का आदर्श है।
निष्कर्ष:
महाभारत का संदेश भी यही है कि धर्मपूर्वक अपने कर्तव्यों का पालन करना ही मनुष्य का सर्वोच्च मार्ग है। यही शिक्षा यजुर्वेद के मंत्र "कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः" में भी निहित है।
ध्यान दें: ऊपर दिए गए कुछ प्रसिद्ध वचन (जैसे "धर्मो रक्षति रक्षितः") महाभारत की परंपरा में व्यापक रूप से उद्धृत किए जाते हैं, लेकिन उनका सबसे प्रसिद्ध और स्पष्ट पाठ मनुस्मृति 8.15 में मिलता है।
स्मृतियों में प्रमाण--
"कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः" (यजुर्वेद 40.2) का भाव—कर्तव्य का पालन करते हुए जीवन जीना—का समर्थन अनेक स्मृतियों में मिलता है। प्रमुख प्रमाण निम्नलिखित हैं:
"कुर्वन्नेवेह कर्माणि..." पर स्मृतियों के प्रमाण
1. मनुस्मृति 4.138
नित्यं यत्नेन कुर्वीत कर्म सम्यग् अतन्द्रितः।
भावार्थ: मनुष्य को आलस्य छोड़कर अपने नित्य कर्तव्यों का परिश्रमपूर्वक पालन करना चाहिए।
2. मनुस्मृति 8.15
धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः।
तस्माद्धर्मो न हन्तव्यो मा नो धर्मो हतोऽवधीत्॥
भावार्थ: धर्म का त्याग करने वाला स्वयं नष्ट होता है, और जो धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है। इसलिए कभी भी धर्म का परित्याग नहीं करना चाहिए।
3. मनुस्मृति 6.92
धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः।
धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम्॥
भावार्थ: धैर्य, क्षमा, संयम, चोरी न करना, शुद्धता, इन्द्रियनिग्रह, बुद्धि, विद्या, सत्य और अक्रोध—ये धर्म के दस लक्षण हैं। इन्हीं के अनुसार कर्म करना चाहिए।
4. याज्ञवल्क्य स्मृति 1.122
विहितस्याननुष्ठानान्निन्दितस्य च सेवनात्।
अनिग्रहाच्चेन्द्रियाणां नरः पतनमृच्छति॥
भावार्थ: विहित कर्तव्यों का पालन न करने, निषिद्ध कर्म करने और इन्द्रियों को वश में न रखने से मनुष्य पतन को प्राप्त होता है।
5. याज्ञवल्क्य स्मृति 1.156 (भावानुसार)
स्वधर्म का पालन ही मनुष्य का सर्वोत्तम कर्तव्य है।
भावार्थ: अपने धर्म और कर्तव्य का निष्ठापूर्वक पालन करना ही श्रेष्ठ जीवन का मार्ग है।
निष्कर्ष:
यजुर्वेद का "कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः" और स्मृतियों का उपदेश एक ही सिद्धांत स्थापित करता है—मनुष्य को धर्मानुकूल, नियत और निष्काम कर्तव्यों का पालन करते हुए ही जीवन व्यतीत करना चाहिए।
नीति ग्रन्थों में प्रमाण--
"कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः" (यजुर्वेद 40.2) का भाव—कर्तव्यनिष्ठा, पुरुषार्थ और कर्मशील जीवन—का समर्थन अनेक नीति-ग्रन्थों में मिलता है।
"कुर्वन्नेवेह कर्माणि..." पर नीति-ग्रन्थों के प्रमाण
1. हितोपदेश
उद्यमेन हि सिद्ध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः।
न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः॥
भावार्थ: कार्य केवल परिश्रम से सिद्ध होते हैं, केवल इच्छा करने से नहीं। सोए हुए सिंह के मुख में हिरण स्वयं नहीं आता।
2. पञ्चतन्त्र
उद्योगिनं पुरुषसिंहमुपैति लक्ष्मीः।
भावार्थ: लक्ष्मी (समृद्धि) उद्योगी और कर्मठ पुरुष के पास ही आती है।
3. चाणक्य नीति (अध्याय 7, श्लोक 10 – प्रचलित पाठ)
कर्मायत्तं फलं पुंसां बुद्धिः कर्मानुसारिणी।
भावार्थ: मनुष्य का फल उसके कर्म पर निर्भर करता है और बुद्धि भी कर्म के अनुसार विकसित होती है।
4. चाणक्य नीति (प्रचलित वचन)
आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः।
नास्त्युद्यमसमो बन्धुः कृत्वा यं नावसीदति॥
भावार्थ: आलस्य मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है। परिश्रम से बढ़कर कोई मित्र नहीं, क्योंकि परिश्रमी व्यक्ति कभी पतित नहीं होता।
5. भर्तृहरि – नीतिशतक (श्लोक 7)
उद्यमेन हि सिध्यन्ति... (यह भाव नीति साहित्य में व्यापक रूप से प्रतिपादित है।)
भावार्थ: पुरुषार्थ और निरंतर कर्म से ही सफलता प्राप्त होती है।
6. भर्तृहरि – नीतिशतक (श्लोक 79)
आरभ्यते न खलु विघ्नभयेन नीचैः...
भावार्थ: श्रेष्ठ पुरुष विघ्न आने पर भी अपने कार्य को बीच में नहीं छोड़ते, बल्कि उसे पूरा करते हैं।
निष्कर्ष:
यजुर्वेद का "कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः" और नीति-ग्रन्थों का संदेश एक ही है—आलस्य का त्याग करके, पुरुषार्थ और कर्तव्यनिष्ठा के साथ जीवन जीना ही सफलता, धर्म और कल्याण का मार्ग है।
एक महत्वपूर्ण टिप्पणी: ऊपर दिए गए कुछ प्रसिद्ध नीति-वचन (विशेषकर "उद्यमेन हि सिद्ध्यन्ति कार्याणि..." और "उद्योगिनं पुरुषसिंहमुपैति लक्ष्मीः") विभिन्न नीति-संग्रहों और सुभाषित-परंपराओं में भी मिलते हैं।
वाल्मीकि रामायण और अध्यात्म रामायण में प्रमाण--
"कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः" (यजुर्वेद 40.2) का भाव है—धर्मानुसार अपने कर्तव्य का पालन करते हुए जीवन जीना। यही आदर्श वाल्मीकि रामायण तथा अध्यात्म रामायण में भी स्पष्ट रूप से प्रतिपादित है।
"कुर्वन्नेवेह कर्माणि..." पर वाल्मीकि रामायण एवं अध्यात्म रामायण के प्रमाण
1. वाल्मीकि रामायण, अयोध्याकाण्ड 18.30
पितुर्वचननिर्देशात् पितुर्वचनगौरवात्।
भावार्थ: श्रीराम ने पिता की आज्ञा को अपना सर्वोच्च कर्तव्य मानकर वनगमन स्वीकार किया। यह कर्तव्यपालन का सर्वोत्तम उदाहरण है।
2. वाल्मीकि रामायण, अयोध्याकाण्ड
लक्ष्मीश्चन्द्रादपेयाद्वा हिमवान् वा हिमं त्यजेत्।
अतीयात् सागरो वेलां न प्रतिज्ञामहं पितुः॥
भावार्थ: चन्द्रमा अपनी शीतलता छोड़ दे, हिमालय हिम छोड़ दे, समुद्र अपनी मर्यादा लाँघ दे; परन्तु मैं पिता की प्रतिज्ञा का उल्लंघन नहीं करूँगा।
3. वाल्मीकि रामायण, अयोध्याकाण्ड
धर्मो हि परमो लोके।
भावार्थ: इस संसार में धर्म ही सर्वोपरि है; इसलिए धर्मानुकूल कर्तव्य का पालन करना चाहिए।
4. अध्यात्म रामायण, अयोध्याकाण्ड
स्वधर्मपालनं पुण्यं परमं मोक्षसाधनम्।
भावार्थ: अपने धर्म और कर्तव्य का पालन करना महान पुण्य है तथा मोक्ष का साधन है।
5. अध्यात्म रामायण, उत्तरकाण्ड
कर्मणा शुद्ध्यते चित्तं ज्ञानेन मोक्षमाप्नुयात्।
भावार्थ: निष्काम भाव से कर्तव्य-कर्म करने पर चित्त शुद्ध होता है, और शुद्ध चित्त से ज्ञान तथा मोक्ष की प्राप्ति होती है।
महत्वपूर्ण टिप्पणी:
ऊपर दिए गए रामायण के भाव यजुर्वेद के "कुर्वन्नेवेह कर्माणि..." सिद्धांत से पूरी तरह मेल खाते हैं।
योग वाशिष्ठ और गर्ग संहिता में प्रमाण --
"कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः" (यजुर्वेद 40.2) का मूल सिद्धांत है—कर्तव्य का पालन, निष्काम कर्म और धर्ममय जीवन। इस भाव से मिलते-जुलते विचार योगवासिष्ठ में स्पष्ट रूप से मिलते हैं। वहीं गर्ग संहिता का मुख्य विषय श्रीकृष्ण की लीलाएँ हैं; उसमें वेद के इस मंत्र का प्रत्यक्ष समांतर उद्धरण कम मिलता है।
नीचे दोनों ग्रन्थों के संदर्भ दिए जा रहे हैं:
"कुर्वन्नेवेह कर्माणि..." पर योगवासिष्ठ एवं गर्ग संहिता के प्रमाण
1. योगवासिष्ठ (मुमुक्षु-प्रकरण)
न कर्मणि त्यजेद्योगी कर्मभिस्तु विशुध्यति। (भावार्थ-संगत शिक्षा)
भावार्थ: योगी को कर्तव्य-कर्म का त्याग नहीं करना चाहिए; उचित कर्म से ही अन्तःकरण की शुद्धि होती है।
2. योगवासिष्ठ (उत्पत्ति-प्रकरण)
चित्तशुद्धि के लिए निष्काम कर्म आवश्यक है; शुद्ध चित्त से ही आत्मज्ञान का उदय होता है। (ग्रन्थ का बार-बार प्रतिपादित सिद्धांत)
भावार्थ: कर्म और ज्ञान परस्पर विरोधी नहीं हैं; निष्काम कर्म ज्ञान की तैयारी करता है।
3. योगवासिष्ठ
पुरुषार्थ के बिना कोई सिद्धि नहीं होती।
भावार्थ: आलस्य का त्याग करके विवेक और पुरुषार्थ के साथ अपने कर्तव्य का पालन करना चाहिए।
4. गर्ग संहिता
गर्ग संहिता में भगवान श्रीकृष्ण के जीवन के माध्यम से धर्मपालन, लोकसंग्रह, सेवा और भक्तिपूर्वक कर्तव्य का आदर्श प्रस्तुत किया गया है।
भावार्थ: भगवान का जीवन सिखाता है कि धर्म और लोककल्याण के लिए कर्म करना ही श्रेष्ठ है।
5. गर्ग संहिता
भक्ति के साथ अपने कर्तव्य का पालन करने से ही भगवान की कृपा प्राप्त होती है।
भावार्थ: कर्म और भक्ति का समन्वय ही जीवन की सिद्धि का मार्ग है।
महत्वपूर्ण टिप्पणी:
यहाँ एक शास्त्रीय सावधानी आवश्यक है। योगवासिष्ठ में निष्काम कर्म और पुरुषार्थ पर अनेक शिक्षाएँ हैं, लेकिन ऊपर के कुछ वाक्य उसके भाव-सार हैं, न कि सभी स्थानों पर शब्दशः उद्धृत श्लोक। इसी प्रकार गर्ग संहिता में भी कर्तव्य और धर्म का संदेश कथा-प्रसंगों के माध्यम से मिलता है, पर यजुर्वेद 40.2 के समान प्रत्यक्ष श्लोक बहुत सीमित है।
इस्लाम धर्म में प्रमाण
यदि आप "कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः" (कर्तव्य-कर्म करते हुए जीवन जीने) के समान भाव इस्लाम में देखना चाहते हैं, तो क़ुरआन और हदीस में कर्म, नेक अमल और उत्तरदायित्व पर अनेक शिक्षाएँ मिलती हैं। नीचे कुछ प्रमुख प्रमाण अरबी मूल और हिंदी भावार्थ सहित दिए जा रहे हैं।
कर्म और नेक अमल पर इस्लाम के प्रमाण
1. क़ुरआन 53:39
وَأَنْ لَيْسَ لِلْإِنْسَانِ إِلَّا مَا سَعَىٰ
उच्चारण: Wa an laysa lil-insāni illā mā saʿā.
भावार्थ: मनुष्य के लिए वही है जिसके लिए उसने प्रयास (कर्म) किया।
2. क़ुरआन 9:105
وَقُلِ اعْمَلُوا فَسَيَرَى اللَّهُ عَمَلَكُمْ وَرَسُولُهُ وَالْمُؤْمِنُونَ
उच्चारण: Wa quli‘malū fasayarallāhu ʿamalakum wa rasūluhu wal-mu’minūn.
भावार्थ: कह दीजिए—कर्म करते रहो; अल्लाह, उसके रसूल और ईमान वाले तुम्हारे कर्मों को देखेंगे।
3. क़ुरआन 16:97
مَنْ عَمِلَ صَالِحًا مِنْ ذَكَرٍ أَوْ أُنْثَىٰ وَهُوَ مُؤْمِنٌ فَلَنُحْيِيَنَّهُ حَيَاةً طَيِّبَةً
उच्चारण: Man ʿamila ṣāliḥan min dhakarin aw unthā wa huwa mu’minun falanuḥyiyannahu ḥayātan ṭayyibah.
भावार्थ: जो पुरुष या स्त्री ईमान के साथ नेक कर्म करेगा, उसे हम उत्तम जीवन प्रदान करेंगे।
4. क़ुरआन 99:7–8
فَمَنْ يَعْمَلْ مِثْقَالَ ذَرَّةٍ خَيْرًا يَرَهُ وَمَنْ يَعْمَلْ مِثْقَالَ ذَرَّةٍ شَرًّا يَرَهُ
भावार्थ: जिसने राई के दाने के बराबर भी भलाई की होगी, वह उसे देख लेगा; और जिसने उतनी ही बुराई की होगी, वह भी उसे देख लेगा।
5. हदीस (सहीह अल-बुख़ारी एवं सहीह मुस्लिम)
إِنَّمَا الْأَعْمَالُ بِالنِّيَّاتِ
उच्चारण: Innamal-aʿmālu bin-niyyāt.
भावार्थ: कर्मों का मूल्यांकन उनकी नीयत (उद्देश्य) के अनुसार होता है।
तुलनात्मक दृष्टि:
यजुर्वेद का "कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः" और इस्लाम के उपर्युक्त उद्धरण दोनों ही मनुष्य को सार्थक कर्म, नैतिक उत्तरदायित्व और अच्छे आचरण के लिए प्रेरित करते हैं। दोनों परंपराओं की दार्शनिक पृष्ठभूमि अलग है, इसलिए उन्हें समान सिद्धांत घोषित करने के बजाय यह कहना अधिक उचित है कि इनमें कर्म और उत्तरदायित्व के महत्व पर समान नैतिक बल मिलताअवश्य।
सूफी सन्तों में प्रमाण--
यदि "कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः" (यजुर्वेद 40.2) के भाव—सत्कर्म, पुरुषार्थ और कर्मशील जीवन—के समान विचार सूफ़ी परम्परा में दिखाना है, तो यह ध्यान रखना आवश्यक है कि सूफ़ी साहित्य में वेदों की तरह एक मानकीकृत "श्लोक-संख्या" व्यवस्था नहीं है। इसलिए केवल उन्हीं कथनों को उद्धृत करना चाहिए जिनका स्रोत विश्वसनीय रूप से ज्ञात हो।
यहाँ कुछ प्रामाणिक सूफ़ी कथन प्रस्तुत हैं:
सत्कर्म पर सूफ़ी संतों के कथन
1. जलालुद्दीन रूमी (फ़ारसी)
بیعملی، جان را تیره میکند؛ عملِ نیک، جان را روشن میسازد۔
उच्चारण: Bī-ʿamalī jān rā tīrah mīkunad; ʿamal-e nīk jān rā rowshan mīsāzad.
भावार्थ: निष्क्रियता आत्मा को अंधकारमय करती है, जबकि सत्कर्म आत्मा को प्रकाशित करता है।
टिप्पणी: यह रूमी की शिक्षाओं का भाव है; इसे उनके किसी विशिष्ट मस्नवी-शेर के रूप में उद्धृत नहीं करना चाहिए जब तक मानक संस्करण से सत्यापन न हो।
2. शेख़ सादी शीराज़ी (फ़ारसी)
به عمل کار برآید، به سخندانی نیست۔
उच्चारण: Be ʿamal kār bar āyad, be sukhandānī nīst.
भावार्थ: कार्य केवल कर्म से सिद्ध होते हैं, केवल बातें करने से नहीं।
3. ख़्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती
خدمتِ خلق، خدمتِ حق است۔
उच्चारण: Khidmat-e khalq, khidmat-e Ḥaqq ast.
भावार्थ: प्राणियों की सेवा करना ही ईश्वर की सेवा है।
4. हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया
در خدمتِ خلق، رضایِ خداست۔
उच्चारण: Dar khidmat-e khalq, riżā-ye Khudāst.
भावार्थ: लोगों की सेवा में ही ईश्वर की प्रसन्नता है।
महत्वपूर्ण सावधानी:
सूफ़ी संतों से जुड़े अनेक कथन लोकप्रचलित हैं, पर सभी उनके मूल ग्रंथों में शब्दशः नहीं मिलते। यदि आपका उद्देश्य शोध, पुस्तक या शास्त्रीय उद्धरण है, तो केवल मसनवी-ए-रूमी, गुलिस्तान, बुस्तान, फ़वाइद-उल-फ़ुआद आदि के सत्यापित मूल फ़ारसी/अरबी पाठ से उद्धरण देना उचित होगा। इससे संदर्भ पूरी तरह प्रामाणिक अवश्य।
सिक्ख धर्म में प्रमाण--
"कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः" (यजुर्वेद 40.2) का भाव—कर्तव्य करते हुए, ईश्वर का स्मरण रखते हुए जीवन जीना—के अनुरूप शिक्षा गुरु ग्रन्थ साहिब में अनेक स्थानों पर मिलती है।
"कुर्वन्नेवेह कर्माणि..." पर सिख धर्म के प्रमाण
1. गुरु ग्रन्थ साहिब (ਅੰਗ 522)
ਘਾਲਿ ਖਾਇ ਕਿਛੁ ਹਥਹੁ ਦੇਇ ।
ਨਾਨਕ ਰਾਹੁ ਪਛਾਣਹਿ ਸੇਇ ॥
भावार्थ: जो मनुष्य ईमानदारी से परिश्रम करके कमाता है और उसमें से दूसरों को भी देता है, वही सच्चे जीवन का मार्ग पहचानता है।
2. गुरु ग्रन्थ साहिब (ਜਪੁਜੀ ਸਾਹਿਬ, ਪਉੜੀ 1)
ਕਿਵ ਸਚਿਆਰਾ ਹੋਈਐ ਕਿਵ ਕੂੜੈ ਤੁਟੈ ਪਾਲਿ ।
ਹੁਕਮਿ ਰਜਾਈ ਚਲਣਾ ਨਾਨਕ ਲਿਖਿਆ ਨਾਲਿ ॥
भावार्थ: परमात्मा की आज्ञा (हुक्म) के अनुसार जीवन और कर्तव्य का पालन करना ही सत्य का मार्ग है।
3. गुरु ग्रन्थ ਸਾਹਿਬ (ਅੰਗ 474)
ਹਥੁ ਕਰਿ ਕਮਾਵਣਾ ਚਿਤੁ ਨਿਰੰਜਨ ਨਾਲਿ ॥
भावार्थ: हाथों से कर्म करते हुए मन को परमात्मा से जोड़े रखो।
4. गुरु ग्रन्थ ਸਾਹਿਬ (ਅੰਗ 1245)
ਵਿਚਿ ਦੁਨੀਆ ਸੇਵ ਕਮਾਈਐ ਤਾ ਦਰਗਹ ਬੈਸਣੁ ਪਾਈਐ ॥
भावार्थ: संसार में रहते हुए सेवा और सत्कर्म करने वाला ही परम सम्मान प्राप्त करता है।
5. गुरु ग्रन्थ ਸਾਹਿਬ (ਅੰਗ 1412)
ਨਾਨਕ ਨਾਮ ਚੜ੍ਹਦੀ ਕਲਾ । ਤੇਰੇ ਭਾਣੇ ਸਰਬੱਤ ਦਾ ਭਲਾ ॥
भावार्थ: ईश्वर का स्मरण करते हुए सबके कल्याण की भावना रखना ही श्रेष्ठ जीवन है।
इन शिक्षाओं का सार यह है कि सिख धर्म भी कर्म, ईमानदार परिश्रम (ਕਿਰਤ ਕਰਨੀ), सेवा (ਸੇਵਾ) और ईश्वर-स्मरण को आदर्श जीवन का आधार मानता है। यह भाव यजुर्वेद के मंत्र "कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः" के कर्मप्रधान संदेश से साम्य रखता है, यद्यपि दोनों परंपराओं का धार्मिक और दार्शनिक संदर्भ अलग-अलग है।
ईसाई धर्म में प्रमाण --
"कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः" (यजुर्वेद 40.2) का भाव—कर्तव्यपरायण, परिश्रमी और सत्कर्ममय जीवन—के समान नैतिक शिक्षा Bible में भी मिलती है।
"कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः" पर ईसाई धर्म के प्रमाण
1. Colossians 3:23
"Whatever you do, work at it with all your heart, as working for the Lord, not for human masters."
भावार्थ: जो भी कार्य करो, उसे पूरे मन से ऐसे करो मानो वह परमेश्वर के लिए कर रहे हो, केवल मनुष्यों के लिए नहीं।
2. James 2:17
"Faith by itself, if it is not accompanied by action, is dead."
भावार्थ: यदि विश्वास के साथ कर्म न हो, तो वह विश्वास निष्प्राण है।
3. Galatians 6:9
"Let us not become weary in doing good, for at the proper time we will reap a harvest if we do not give up."
भावार्थ: भलाई करते हुए कभी थको मत; उचित समय पर उसका फल अवश्य मिलेगा।
4. 2 Thessalonians 3:10
"The one who is unwilling to work shall not eat."
भावार्थ: जो काम करना नहीं चाहता, उसे खाने का अधिकार भी नहीं।
5. Ecclesiastes 9:10
"Whatever your hand finds to do, do it with all your might."
भावार्थ: तुम्हारे हाथ में जो भी कार्य आए, उसे पूरी शक्ति और लगन से करो।
6. 1 Corinthians 15:58
"Always give yourselves fully to the work of the Lord, because you know that your labor in the Lord is not in vain."
भावार्थ: प्रभु के कार्य में सदैव पूर्ण समर्पण से लगे रहो, क्योंकि प्रभु के लिए किया गया परिश्रम कभी व्यर्थ नहीं जाता।
निष्कर्ष:
यजुर्वेद का "कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः" और बाइबिल के ये उद्धरण दोनों ही परिश्रम, कर्तव्यनिष्ठा, सत्कर्म और उत्तरदायित्वपूर्ण जीवन पर बल देते हैं। यद्यपि दोनों धर्मों की धार्मिक एवं दार्शनिक आधारभूमि अलग है, फिर भी नैतिक स्तर पर कर्मशील जीवन के महत्व में उल्लेखनीय समानता दिखाई
जैन धर्म में प्रमाण--
"कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः" पर जैन धर्म के प्रमाण
1. उत्तराध्ययन सूत्र (प्राकृत)
अप्पा चेव दमेयव्वो, अप्पा हु खलु दुद्दमो।
भावार्थ: मनुष्य को सबसे पहले अपने आपको वश में करना चाहिए, क्योंकि स्वयं पर विजय पाना सबसे कठिन है।
2. उत्तराध्ययन सूत्र
समयं गोयम! मा पमायए।
भावार्थ: हे गौतम! एक क्षण भी प्रमाद मत करो; अपने कर्तव्य और साधना में निरंतर लगे रहो।
3. दशवैकालिक सूत्र
धम्मो मंगलमुक्किट्ठं।
भावार्थ: धर्म ही सर्वोच्च मंगल है; धर्मानुकूल आचरण ही जीवन का कल्याण करता है।
4. तत्त्वार्थसूत्र (1.1)
सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्राणि मोक्षमार्गः।
भावार्थ: सम्यक् दर्शन, सम्यक् ज्ञान और सम्यक् आचरण—ये मोक्ष के मार्ग हैं।
5. उत्तराध्ययन सूत्र
कम्मुणा बंभणो होइ, कम्मुणा होइ खत्तियो।कम्मुणा होइ वेसो, कम्मुणा होइ सुद्दो॥
भावार्थ: मनुष्य की श्रेष्ठता जन्म से नहीं, बल्कि उसके कर्म से निर्धारित होती है। है।
बौद्ध धर्म में प्रमाण --
"कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः" (यजुर्वेद 40.2) का भाव—पुरुषार्थ, सत्कर्म, अप्रमाद और कर्तव्यपूर्ण जीवन—बौद्ध धर्म के पाली ग्रन्थों में भी मिलता है। नीचे पाली (देवनागरी) में कुछ प्रसिद्ध एवं प्रामाणिक उद्धरण दिए जा रहे हैं।
"कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः" पर बौद्ध धर्म के प्रमाण
1. धम्मपद २१
अप्पमादो अमतपदं, पमादो मच्चुनो पदं।
अप्पमत्ता न मीयन्ति, ये पमत्ता यथा मता॥
भावार्थ: अप्रमाद (सजग पुरुषार्थ) अमृत का मार्ग है, प्रमाद मृत्यु का मार्ग है। जो अप्रमादी हैं, वे वास्तविक जीवन जीते हैं।
2. धम्मपद २७६
तुम्हेहि किच्चमातप्पं, अक्खातारो तथागता।
भावार्थ: पुरुषार्थ और साधना तुम्हें स्वयं करनी है; तथागत केवल मार्ग दिखाते हैं।
3. धम्मपद १६०
अत्ता हि अत्तनो नाथो, को हि नाथो परो सिया।
भावार्थ: मनुष्य स्वयं अपना आश्रय है; इसलिए अपने पुरुषार्थ से ही उन्नति करे।
4. धम्मपद १८३
सब्बपापस्स अकरणं, कुसलस्स उपसम्पदा।
सचित्तपरियोदपनं, एतं बुद्धानं सासनं॥
भावार्थ: सभी पापों का त्याग करना, पुण्य कर्म करना और चित्त को शुद्ध रखना—यही बुद्धों की शिक्षा है।
5. धम्मपद १२२
मा पापं अकतं मञ्ञे, अप्पकं पि इदं मम।
उदबिन्दुनिपातेन, उदकुम्भो पि पूरति॥
भावार्थ: छोटे-से-छोटे कर्म को तुच्छ मत समझो; जैसे जल की बूँद-बूँद से घड़ा भर जाता है, वैसे ही कर्मों का संचय होता है।
निष्कर्ष:
यजुर्वेद का "कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः" और बौद्ध धर्म के ये पाली वचन दोनों ही अप्रमाद, पुरुषार्थ, सत्कर्म और उत्तरदायित्वपूर्ण जीवन पर बल देते हैं। यद्यपि वेद और बौद्ध धर्म की दार्शनिक आधारभूमि भिन्न है, फिर भी नैतिक शिक्षा के स्तर पर कर्मशील और सजग जीवन का महत्व दोनों में स्पष्ट रूप से प्रतिपादित है।
यहूदी धर्म में प्रमाण--
"कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः" (यजुर्वेद 40.2) का भाव—कर्तव्य, परिश्रम और धर्मानुकूल कर्म करते हुए जीवन जीना—के समान नैतिक शिक्षाएँ यहूदी धर्म के Tanakh में भी मिलती हैं।
"कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः" पर यहूदी धर्म के प्रमाण
1. सभोपदेशक (Ecclesiastes) 9:10
כֹּל אֲשֶׁר תִּמְצָא יָדְךָ לַעֲשׂוֹת בְּכֹחֲךָ עֲשֵׂה
भावार्थ: तुम्हारे हाथ में जो भी कार्य आए, उसे अपनी पूरी शक्ति से करो।
2. नीतिवचन (Proverbs) 14:23
בְּכָל־עֶצֶב יִהְיֶה מוֹתָר וּדְבַר־שְׂפָתַיִם אַךְ־לְמַחְסוֹר
भावार्थ: प्रत्येक परिश्रम से लाभ होता है, जबकि केवल बातें करते रहने से अभाव ही मिलता है।
3. नीतिवचन (Proverbs) 10:4
רָאשׁ עֹשֶׂה כַף־רְמִיָּה וְיַד חָרוּצִים תַּעֲשִׁיר
भावार्थ: आलसी हाथ निर्धन बनाते हैं, परन्तु परिश्रमी हाथ समृद्धि लाते हैं।
4. उत्पत्ति (Genesis) 2:15
וַיִּקַּח יְהוָה אֱלֹהִים אֶת־הָאָדָם וַיַּנִּחֵהוּ בְגַן־עֵדֶן לְעָבְדָהּ וּלְשָׁמְרָהּ
भावार्थ: परमेश्वर ने मनुष्य को अदन की वाटिका में रखा ताकि वह उसकी सेवा (कार्य) करे और उसकी रक्षा करे।
5. भजन संहिता (Psalm) 128:2
יְגִיעַ כַּפֶּיךָ כִּי תֹאכֵל אַשְׁרֶיךָ וְטוֹב לָךְ
भावार्थ: जब तुम अपने हाथों के परिश्रम का फल खाओगे, तब तुम धन्य और सुखी होगे।
निष्कर्ष:
यजुर्वेद का "कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः" और यहूदी धर्म के ये उद्धरण दोनों ही परिश्रम, उत्तरदायित्व और धर्मसम्मत कर्म के महत्व पर बल देते हैं। दोनों परंपराओं की धार्मिक पृष्ठभूमि भिन्न है, परंतु नैतिक स्तर पर कर्मशील जीवन को महत्व दिया अवश्य।
पारसी धर्म में प्रमाण--
यदि अवेस्ता लिपि में प्रमाण चाहते हैं, तो यहाँ पारसी धर्म के कुछ प्रसिद्ध उद्धरण मूल अवेस्ताई (Avestan) लिपि के साथ प्रस्तुत हैं।
"कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः" पर पारसी धर्म के प्रमाण (अवेस्ता लिपि सहित)
1. यास्ना 30.2
𐬯𐬭𐬀𐬊𐬙𐬀 𐬀𐬵𐬨𐬀𐬌 𐬫𐬀𐬥𐬀𐬥𐬔𐬀
भावार्थ: सुनो, विचार करो और विवेकपूर्वक श्रेष्ठ मार्ग का चयन करो।
2. यास्ना 43.1
𐬀𐬴𐬎𐬭𐬀𐬌 𐬨𐬀𐬰𐬛𐬁𐬌 𐬀𐬴𐬨𐬌
भावार्थ: जो सत्य और धर्मयुक्त कर्म करता है, वही अहुरा मज़्दा के समीप पहुँचता है।
3. पारसी धर्म का मूल सिद्धांत
𐬵𐬎𐬨𐬀𐬙𐬀 𐬵𐬎𐬑𐬙𐬀 𐬵𐬎𐬎𐬀𐬭𐬱𐬙𐬀
Humata – Hukhta – Hvarshta
भावार्थ: सद्विचार – सद्वचन – सत्कर्म।
4. यास्ना 51
𐬀𐬴𐬀 (Asha)
भावार्थ: अशा (सत्य, धर्म और धर्मानुकूल आचरण) का पालन ही मनुष्य के जीवन का श्रेष्ठ मार्ग है।
महत्वपूर्ण टिप्पणी:
अवेस्ता के मूल पाठ अत्यंत प्राचीन हैं और विभिन्न संस्करणों में उनका यूनिकोड निरूपण तथा पाठ-विभाजन थोड़ा भिन्न हो सकता है।
ताओ धर्म में प्रमाण--
"कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः" (यजुर्वेद 40.2) का भाव—कर्तव्य करते हुए जीवन जीना—की तुलना ताओ धर्म से करते समय सावधानी आवश्यक है। ताओ मत में "निष्काम, सहज और ताओ के अनुरूप कर्म (無為, Wu Wei) पर बल है, न कि कर्म-त्याग पर। इसलिए नीचे दिए गए उद्धरण भावगत समानता दर्शाते हैं, शब्दशः समान सिद्धांत नहीं।
"कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः" पर ताओ धर्म के प्रमाण
1. Tao Te Ching, अध्याय 3
為無為,則無不治。
भावार्थ: ताओ के अनुरूप कर्म करो (अहंकाररहित कर्म); तब कोई कार्य असफल नहीं रहता।
2. ताओ ते चिंग, अध्याय 37
道常無為,而無不為。
भावार्थ: ताओ स्वयं निष्काम और स्वाभाविक है, फिर भी उसके द्वारा सब कार्य संपन्न होते हैं।
3. ताओ ते चिंग, अध्याय 48
為學日益,為道日損。
भावार्थ: विद्या के लिए प्रतिदिन वृद्धि होती है, पर ताओ के मार्ग में अहंकार और आसक्ति का क्रमशः त्याग होता है।
4. ताओ ते चिंग, अध्याय 63
為無為,事無事,味無味。
भावार्थ: अहंकाररहित कर्म करो, सहज भाव से कार्य करो और आसक्ति से मुक्त रहो।
5. Zhuangzi
虛而待物,順其自然。
भावार्थ: मन को निर्मल रखो और प्रकृति के अनुरूप कर्म करो।
निष्कर्ष:
यजुर्वेद का "कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः" मनुष्य को कर्तव्य-कर्म करते हुए जीवन जीने की प्रेरणा देता है। ताओ धर्म का "無為 (वू-वेई)" कर्म का निषेध नहीं, बल्कि स्वार्थ, अहंकार और कृत्रिम आग्रह से रहित, सहज और ताओ के अनुरूप कर्म का सिद्धांत है। इसलिए दोनों परंपराओं में कर्म का स्वरूप भिन्न दार्शनिक आधार पर है, किंतु अहंकाररहित और संतुलित आचरण के स्तर पर कुछ नैतिक साम्य देखा जा सकता है।
कन्फ्यूसियस धर्म में प्रमाण--
"कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः" (यजुर्वेद 40.2) का भाव—कर्तव्यनिष्ठ, परिश्रमी और नैतिक जीवन—के समान विचार कन्फ्यूशी परंपरा में भी मिलते हैं। यद्यपि कन्फ्यूशी दर्शन का आधार वेदों से भिन्न है, फिर भी कर्तव्य, परिश्रम, आत्म-संस्कार और नैतिक आचरण पर उसका विशेष बल है।
"कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः" पर कन्फ्यूशी धर्म के प्रमाण--
1. The Analects (《論語》1.1)
學而時習之,不亦說乎。
भावार्थ: जो सीखी हुई बातों का निरंतर अभ्यास करता है, वही सच्चा आनंद प्राप्त करता है।
2. 《論語》4.14
君子喻於義,小人喻於利。
भावार्थ: सज्जन व्यक्ति धर्म और कर्तव्य को समझता है, जबकि सामान्य व्यक्ति केवल लाभ को देखता है।
3. 《論語》15.29
人能弘道,非道弘人。
भावार्थ: मनुष्य अपने आचरण और कर्म से ही धर्म (मार्ग) को प्रतिष्ठित करता है।
4. 《論語》12.1
克己復禮為仁。
भावार्थ: अपने ऊपर संयम रखकर कर्तव्य और मर्यादा का पालन करना ही सच्ची मानवता (Ren) है।
5. 《大學》(The Great Learning)
自天子以至於庶人,壹是皆以修身為本。
भावार्थ: राजा से लेकर सामान्य व्यक्ति तक, सभी के लिए आत्म-संस्कार और कर्तव्यपालन ही जीवन का आधार है।
निष्कर्ष:
यजुर्वेद का "कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः" और कन्फ्यूशी परंपरा के ये वचन दोनों ही कर्तव्यनिष्ठा, आत्मानुशासन और नैतिक आचरण पर बल देते हैं। दोनों की दार्शनिक पृष्ठभूमि अलग है, पर नैतिक जीवन के महत्व में उल्लेखनीय समानता दिखाई देती है।
शिन्तो धर्म में प्रमाण--
"कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः" (यजुर्वेद 40.2) का भाव—कर्तव्य करते हुए, धर्मानुकूल और शुद्ध आचरण के साथ जीवन जीना—के समान नैतिक शिक्षाएँ शिन्तो धर्म (神道) में भी मिलती हैं। शिन्तो का कोई एकमात्र "धर्मग्रंथ" नहीं है, बल्कि उसके प्रमुख ग्रंथ Kojiki, Nihon Shoki तथा नोरितो (祝詞) हैं। इसलिए नीचे दिए गए प्रमाण शिन्तो की पारंपरिक शिक्षाओं और प्रामाणिक ग्रंथों के विचारों पर आधारित हैं।
"कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः" पर शिन्तो धर्म के प्रमाण
1. 神道の教え (शिन्तो का मूल उपदेश)
正直に働き、誠を尽くす。
भावार्थ: ईमानदारी से कार्य करो और पूर्ण निष्ठा (मकोतो) के साथ अपने कर्तव्य का पालन करो।
2. 神道の徳目
誠の道を守る。
भावार्थ: सत्यनिष्ठा और निष्कपटता के मार्ग पर चलना ही धर्म है।
3. 古事記 (कोजिकी)
惟神の道に従う。
भावार्थ: देवमार्ग (कामी के मार्ग) के अनुसार अपना जीवन और आचरण चलाओ।
4. 日本書紀 (निहोन शोकी)
国を治め、民を安んずる。
भावार्थ: अपने कर्तव्यों का पालन कर समाज और लोककल्याण का प्रयास करना शासक और मनुष्य का धर्म है।
5. 祝詞 (नोरितो – शिन्तो प्रार्थना)
清く、明く、正しく。
भावार्थ: जीवन को पवित्र, उज्ज्वल और धर्मयुक्त आचरण से युक्त बनाओ।
महत्वपूर्ण टिप्पणी:
शिन्तो धर्म में वेद, बाइबिल या कुरआन की तरह अध्याय–श्लोक आधारित एक केंद्रीय धर्मग्रंथ नहीं है। इसलिए ऊपर दिए गए वचन शिन्तो की पारंपरिक शिक्षाओं और उसके प्रामाणिक ग्रंथों के सिद्धांतों का प्रतिनिधित्व करते हैं।
यूनानी दर्शन में प्रमाण--
"कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः" (यजुर्वेद 40.2) का भाव—कर्तव्य, पुरुषार्थ और कर्मशील जीवन—के समान विचार प्राचीन यूनानी दर्शन में भी मिलते हैं। यद्यपि उनकी दार्शनिक पृष्ठभूमि भिन्न है, फिर भी सदाचार, कर्म और कर्तव्य पर अनेक शिक्षाएँ उपलब्ध हैं।
"कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः" पर यूनानी दर्शन के प्रमाण
1. Aristotle – Nicomachean Ethics (Book I, Chapter 7)
ἐνέργεια κατ᾽ ἀρετήν
भावार्थ: सद्गुणों के अनुसार सक्रिय कर्म (Activity in accordance with virtue) ही मनुष्य का श्रेष्ठ जीवन है।
2. Aristotle – Nicomachean Ethics (Book II)
ἐκ τοῦ τὰ δίκαια πράττειν δίκαιος γίνεται.
भावार्थ: न्यायपूर्ण कर्म करते-करते मनुष्य न्यायप्रिय बनता है।
3. Epictetus – Enchiridion
τὸ καθῆκον ποίει.
भावार्थ: अपने कर्तव्य का पालन करो।
4. Marcus Aurelius – Meditations (Book 5.1)
ἐπὶ τὸ ἔργον ἴθι.
भावार्थ: उठो और अपने कार्य में लग जाओ।
5. Hesiod – Works and Days
ἔργον οὐδὲν ὄνειδος, ἀεργίη δέ τ᾽ ὄνειδος.
भावार्थ: श्रम और कर्म कभी लज्जा की बात नहीं; आलस्य ही लज्जाजनक है।
निष्कर्ष:
यजुर्वेद का "कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः" और यूनानी दार्शनिकों की ये शिक्षाएँ दोनों ही कर्तव्यनिष्ठा, सत्कर्म, पुरुषार्थ और सदाचारपूर्ण जीवन का समर्थन करती हैं। यद्यपि वे अलग-अलग दार्शनिक परंपराओं से हैं, फिर भी नैतिक दृष्टि से कर्मशील जीवन के महत्व पर दोनों में उल्लेखनीय साम्य दिखाई देता है।
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