ऋग्वेद सूक्ति (73)की व्याख्या


ऋग्वेद सूक्ति-- (73) की व्याख्या 
न देवास: कवत्नवे।
ऋगवेद--
7/32/9
भावार्थ--ईश्वर अकर्मण्य का साथ नहीं देता।
ऋग्वेद 7.32.9
मा स्रेधत सोमिनो दक्षता महे कृणुध्वं राय आतुजे ।
तरणिरिज्जयति क्षेति पुष्यति न देवासः कवत्नवे ॥
पदच्छेद
मा । स्रेधत । सोमिनः । दक्षत । महे । कृणुध्वम् । राये । आतुजे 
तरणिः । इत् । जयति । क्षेति । पुष्यति । न । देवासः । कवत्नवे 
शब्दार्थ
मा स्रेधत = आलस्य मत करो, शिथिल मत पड़ो।
सोमिनः = सोमयाग करने वालों!
दक्षता = कर्मठ बनो, दक्षता दिखाओ।
महे = महान (इन्द्र) के लिए।
राये = धन, समृद्धि के लिए।
तरणिः = परिश्रमी, कर्मशील व्यक्ति।
जयति = विजय प्राप्त करता है।
क्षेति = सुरक्षित निवास करता है।
पुष्यति = उन्नति करता है, फलता-फूलता है।
न देवासः कवत्नवे = देवगण अकर्मण्य/कृपण/प्रयत्नहीन व्यक्ति का साथ नही देते हैं। 
भावार्थ
“हे सोमयाग करने वालो! आलस्य मत करो, कर्मठ बनो और समृद्धि के लिए महान इन्द्र की उपासना करो। परिश्रमी और पुरुषार्थी व्यक्ति ही विजय प्राप्त करता है, सुरक्षित रहता है तथा उन्नति करता है; देवता अकर्मण्य और प्रयत्नहीन व्यक्ति का साथ नहीं देते।”
इस मंत्र का मुख्य संदेश है कि पुरुषार्थ, कर्मठता और प्रयत्न सफलता के आधार हैं; आलस्य और अकर्मण्यता दैवी अनुग्रह के भी अधिकारी नहीं बनते हैं।
वेदों में प्रमाण --
यदि विषय "ईश्वर/देवता कर्मशील, पुरुषार्थी और परिश्रमी व्यक्ति का साथ देते हैं, अकर्मण्यता का समर्थन नहीं करते" है, तो वेदों में अनेक मंत्र इस सिद्धान्त को व्यक्त करते हैं। कुछ प्रमुख प्रमाण निम्न हैं:
1. ऋग्वेद 7.32.9
तरणिरिज्जयति क्षेति पुष्यति न देवासः कवत्नवे॥
भावार्थ: परिश्रमी मनुष्य विजय प्राप्त करता है, उन्नति करता है; देवता अकर्मण्य व्यक्ति का साथ नहीं देते।
2. ऋग्वेद 10.117.6
मोघमन्नं विन्दते अप्रचेताः...
भावार्थ: जो व्यक्ति केवल अपने लिए जीता है और कर्मशील नहीं है, उसका अन्न व्यर्थ जाता है। समाजोपयोगी कर्म ही जीवन को सार्थक बनाते हैं।
3. अथर्ववेद 20.18.3
उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि...
(यह प्रसिद्ध उक्ति इसी वैदिक भावना का सार है, यद्यपि यह मंत्ररूप में अथर्ववेद का मूल पाठ नहीं है।)
वैदिक सिद्धान्त: कार्य सिद्धि प्रयत्न और पुरुषार्थ से होती है।
4. यजुर्वेद 40.2 (ईशावास्य उपनिषद्)
कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः।
भावार्थ: मनुष्य को कर्म करते हुए ही सौ वर्ष तक जीने की इच्छा करनी चाहिए। कर्मशील जीवन ही श्रेष्ठ है।
5. ऋग्वेद 1.9.7
न ऋते श्रान्तस्य सख्याय देवाः।
भावार्थ: परिश्रम किए बिना देवताओं की मित्रता या सहायता प्राप्त नहीं होती।
यह मंत्र विशेष रूप से इस विषय का अत्यन्त प्रबल प्रमाण माना जाता है।
6. अथर्ववेद 6.122.3
कृतं मे दक्षिणे हस्ते जयो मे सव्य आहितः।
भावार्थ: मेरे दाहिने हाथ में कर्म है और बाएँ हाथ में विजय। अर्थात् विजय कर्म से प्राप्त होती है।
वैदिक निष्कर्ष
वेदों का स्पष्ट संदेश है:
कर्म करो — यजुर्वेद 40.2
परिश्रम करो — ऋग्वेद 1.9.7
पुरुषार्थी विजय पाता है — ऋग्वेद 7.32.9
कर्म से ही जय प्राप्त होती है — अथर्ववेद 6.122.3
अतः वैदिक दृष्टि में ईश्वर-कृपा और सफलता दोनों पुरुषार्थ, कर्मठता और उद्यम से जुड़े हैं; आलस्य और अकर्मण्यता का समर्थन नहीं किया गया है।
उपनिषदों में प्रमाण --
उपनिषदों में भी कर्म, पुरुषार्थ, जागरूकता, आत्मप्रयत्न और उद्यम पर बल दिया गया है। यद्यपि "ईश्वर अकर्मण्य का साथ नहीं देता" यह वाक्य शब्दशः नहीं मिलता, परन्तु उसके अनुरूप सिद्धान्त अनेक स्थानों पर मिलता है।
1. कठोपनिषद्
उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत।
(कठोपनिषद् 1.3.14)
भावार्थ: उठो, जागो और श्रेष्ठ ज्ञानी पुरुषों को प्राप्त करके ज्ञान प्राप्त करो।
संदेश: आलस्य छोड़कर सक्रिय पुरुषार्थ करने की प्रेरणा।
2. कठोपनिषद्
नायमात्मा बलहीनेन लभ्यः।
(कठोपनिषद् 1.2.23; समान भाव मुण्डकोपनिषद् में भी)
भावार्थ: यह आत्मा निर्बल, उत्साहहीन या पुरुषार्थहीन व्यक्ति को प्राप्त नहीं होती।
संदेश: आध्यात्मिक उन्नति भी प्रयत्न और सामर्थ्य से होती है।
3. ईशावास्य उपनिषद्
कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः।
(ईशावास्य उपनिषद् 2)
भावार्थ: कर्म करते हुए ही मनुष्य को सौ वर्ष तक जीने की इच्छा करनी चाहिए।
संदेश: निष्क्रियता नहीं, कर्मशीलता उपनिषद् का आदर्श है।
4. मुण्डकोपनिषद्
परीक्ष्य लोकान् कर्मचितान् ब्राह्मणो निर्वेदमायात्।
भावार्थ: विवेकी मनुष्य कर्मों से प्राप्त होने वाले फलों का परीक्षण करके उच्च सत्य की खोज करता है।
संदेश: जिज्ञासा, प्रयास और साधना आवश्यक हैं; जड़ निष्क्रियता नहीं।
5. श्वेताश्वतर उपनिषद्
यस्य देवे परा भक्तिर्यथा देवे तथा गुरौ।
(श्वेताश्वतर उपनिषद् 6.23)
भावार्थ: जिस पुरुष को ईश्वर और गुरु में परम श्रद्धा होती है, उसके लिए उपनिषद् के रहस्य प्रकाशित होते हैं।
संदेश: ज्ञान प्राप्ति के लिए श्रद्धा के साथ साधना और प्रयत्न आवश्यक हैं।
समग्र उपनिषद्-सिद्धान्त
इन उपनिषद्-वचनों से स्पष्ट होता है कि—
उठो और जागो — कठोपनिषद् 1.3.14
निर्बल और पुरुषार्थहीन को आत्मविद्या नहीं मिलती — कठोपनिषद् 1.2.23
जीवनभर कर्म करते रहो — ईशावास्य उपनिषद् 2
सत्य की खोज हेतु प्रयास करो — मुण्डकोपनिषद् 1.2.12
अतः उपनिषदों का संदेश भी यही है कि आलस्य, प्रमाद और अकर्मण्यता उन्नति के मार्ग में बाधक हैं; आत्मोन्नति और ईश्वरप्राप्ति के लिए जागरूक पुरुषार्थ आवश्यक है।
पुराणों में प्रमाण --
पुराणों में भी पुरुषार्थ, उद्यम, परिश्रम और कर्मशीलता की महिमा का वर्णन मिलता है। "ईश्वर अकर्मण्य का साथ नहीं देता" यह वाक्य यथावत् नहीं मिलता, किन्तु उसका भाव अनेक श्लोकों में व्यक्त हुआ है।
1. विष्णु पुराण
उद्यमः खलु कर्तव्यः फलम् मार्जारवत् भवेत्।
(विष्णु पुराण, 1.6.2 के रूप में प्रचलित उद्धरण)
भावार्थ: मनुष्य को उद्यम अवश्य करना चाहिए; फल की प्राप्ति बाद की बात है।
संदेश: निष्क्रिय बैठना उचित नहीं, पुरुषार्थ आवश्यक है।
2. गरुड़ पुराण
उद्योगिनं पुरुषसिंहमुपैति लक्ष्मीः।
भावार्थ: लक्ष्मी (समृद्धि) उद्योगी और पुरुषार्थी पुरुष के पास आती है।
संदेश: सफलता और समृद्धि परिश्रमी व्यक्ति को प्राप्त होती है।
3. भागवत पुराण
न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः।
भावार्थ: सोए हुए सिंह के मुख में मृग स्वयं प्रवेश नहीं करते।
संदेश: केवल इच्छा करने से नहीं, प्रयास करने से सफलता मिलती है।
नोट: यह श्लोक व्यापक रूप से प्रसिद्ध है, परन्तु विद्वानों के अनुसार इसका मूल स्रोत नीति-साहित्य में अधिक स्पष्ट मिलता है; इसलिए इसे भागवत का निश्चित श्लोक-संदर्भ मानने से पहले मूल पाठ की जाँच कर लेनी चाहिए।
4. पद्म पुराण
दैवं निहत्य कुरु पौरुषमात्मशक्त्या।
भावार्थ: केवल भाग्य के भरोसे मत बैठो; अपनी शक्ति से पुरुषार्थ करो।
संदेश: पुरुषार्थ के बिना सफलता नहीं मिलती।
5. स्कन्द पुराण
उद्योगेन विना नैव कार्यसिद्धिः कदाचन।
भावार्थ: उद्योग (प्रयत्न) के बिना किसी कार्य की सिद्धि नहीं होती।
संदेश: अकर्मण्यता से सफलता संभव नहीं।
सावधानी
सबसे प्रामाणिक और निर्विवाद प्रमाण
इस विषय पर सबसे अधिक प्रमाणिक स्रोत वास्तव में—
ऋग्वेद 7.32.9 — न देवासः कवत्नवे
ऋग्वेद 1.9.7 — न ऋते श्रान्तस्य सख्याय देवाः
ईशावास्य उपनिषद् 2 — कुर्वन्नेवेह कर्माणि...
कठोपनिषद् 1.3.14 — उत्तिष्ठत जाग्रत...
माने जाते हैं, क्योंकि इनमें कर्म, पुरुषार्थ और अकर्मण्यता के विषय में स्पष्ट और प्राचीन प्रमाण उपलब्ध हैं।
भगवद्गीता में प्रमाण-- 
ऋग्वेद 7.32.9 — “न देवासः कवत्नवे” (अर्थात् ईश्वर अकर्मण्य का साथ नहीं देता) के भाव का श्रीमद्भगवद्गीता में अनेक स्थानों पर समर्थन मिलता है। भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को कर्म, पुरुषार्थ और कर्तव्यपालन का उपदेश देते हैं।
1. Bhagavad Gita
नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः।
शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्ध्येदकर्मणः॥ 3.8॥
भावार्थ: अपने नियत कर्तव्य का पालन करो, क्योंकि कर्म अकर्म (निष्क्रियता) से श्रेष्ठ है। अकर्म रहने पर तो शरीर का निर्वाह भी नहीं हो सकता।
2. Bhagavad Gita
न कर्मणामनारम्भान्नैष्कर्म्यं पुरुषोऽश्नुते।
न च संन्यसनादेव सिद्धिं समधिगच्छति॥ 3.4॥
भावार्थ: कर्म का आरम्भ किए बिना मनुष्य कर्म-मुक्ति को प्राप्त नहीं होता और केवल कर्मत्याग से सिद्धि नहीं मिलती।
3. Bhagavad Gita
न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्।
कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः॥ 3.5॥
भावार्थ: कोई भी मनुष्य एक क्षण भी बिना कर्म किए नहीं रह सकता।
4. Bhagavad Gita
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥ 2.47॥
भावार्थ: तेरा अधिकार केवल कर्म करने में है, फल में नहीं। इसलिए अकर्मण्यता में आसक्त मत हो।
5. Bhagavad Gita
उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत्।
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः॥ 6.5॥
भावार्थ: मनुष्य को अपने पुरुषार्थ से स्वयं अपना उत्थान करना चाहिए; स्वयं को अधोगति में नहीं डालना चाहिए।
6. Bhagavad Gita
अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम्।
विविधाश्च पृथक्चेष्टा दैवं चैवात्र पञ्चमम्॥ 18.14॥
भावार्थ: किसी कार्य की सिद्धि के पाँच कारण हैं, जिनमें मनुष्य की चेष्टा (प्रयत्न) भी आवश्यक है; केवल दैव ही कारण नहीं है।
7. Bhagavad Gita
तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर।
असक्तो ह्याचरन्कर्म परमाप्नोति पुरुषः॥ 3.19॥
भावार्थ: इसलिए आसक्ति छोड़कर निरन्तर कर्तव्य-कर्म करो; ऐसा करने वाला पुरुष परम पद को प्राप्त करता है।
8. Bhagavad Gita
तस्मात्त्वमुत्तिष्ठ यशो लभस्व।
(पूर्ण श्लोक 11.33)
भावार्थ: इसलिए उठो, पुरुषार्थ करो और यश प्राप्त करो।
गीता का सार
गीता का स्पष्ट संदेश है—
कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः (3.8)
"कर्म अकर्म से श्रेष्ठ है।"
मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि (2.47)
"अकर्मण्यता में आसक्त मत हो।"
उद्धरेदात्मनात्मानम् (6.5)
"स्वयं अपने पुरुषार्थ से अपना उत्थान करो।"
अतः श्रीमद्भगवद्गीता में अनेक श्लोक ऋग्वेद 7.32.9 “न देवासः कवत्नवे” के भाव की पुष्टि करते हैं कि ईश्वर कर्मशील, कर्तव्यनिष्ठ और पुरुषार्थी व्यक्ति का मार्गदर्शन करता है; अकर्मण्यता गीता के अनुसार त्याज्य है।
महाभारत में प्रमाण-- 
ऋग्वेद 7.32.9 के "न देवासः कवत्नवे" (देवता अकर्मण्य व्यक्ति का साथ नहीं देते) भाव के समर्थन में महाभारत में पुरुषार्थ और उद्योग की महिमा अनेक स्थानों पर वर्णित है। पर्व सहित प्रमुख प्रमाण निम्न हैं:
1. महाभारत
उद्योगिनं पुरुषसिंहमुपैति लक्ष्मीः।
दैवेन देयमिति कापुरुषा वदन्ति॥
दैवं निहत्य कुरु पौरुषमात्मशक्त्या।
यत्ने कृते यदि न सिध्यति कोऽत्र दोषः॥
पर्व: उद्योगपर्व (विदुरनीति प्रसंग में व्यापक रूप से उद्धृत)। 
भावार्थ: लक्ष्मी उद्योगी पुरुष के पास आती है। "सब कुछ भाग्य से होगा" ऐसा कायर लोग कहते हैं। अपनी शक्ति के अनुसार पुरुषार्थ करो; पूरा प्रयत्न करने पर भी सफलता न मिले तो दोष नहीं।
2. महाभारत
उद्योगं पुरुषसिंहं हि लक्ष्मीः समुपतिष्ठति।
पर्व: शान्तिपर्व
भावार्थ: लक्ष्मी (समृद्धि, सफलता) उद्योगी और पुरुषार्थी मनुष्य के पास आती है।
3. महाभारत
उद्योगेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः।
पर्व: शान्तिपर्व
भावार्थ: कार्य केवल कल्पनाओं और इच्छाओं से नहीं, बल्कि उद्योग (परिश्रम) से सिद्ध होते हैं।
4. महाभारत
न हि दैवेन सिद्ध्यन्ति कार्याण्येकेन भारत।
न चापि कर्मणैकेन द्वाभ्यां सिद्धिस्तु योगतः॥
पर्व: सभापर्व
भावार्थ: केवल भाग्य से कार्य सिद्ध नहीं होते और केवल कर्म से भी नहीं; भाग्य और पुरुषार्थ के समन्वय से सफलता मिलती है।
5. महाभारत
दैवं पुरुषकारश्च कर्मसिद्धौ व्यवस्थितौ।
पर्व: अनुशासनपर्व
भावार्थ: कार्य-सिद्धि में दैव और पुरुषार्थ दोनों का स्थान है, परन्तु पुरुषार्थ के बिना सिद्धि संभव नहीं।
महाभारत का सार
महाभारत बार-बार यह शिक्षा देता है
उद्योग (प्रयत्न) करो।
भाग्य के भरोसे निष्क्रिय मत बैठो।
लक्ष्मी और सफलता पुरुषार्थी के पास आती हैं।
कार्य परिश्रम से सिद्ध होते हैं, केवल इच्छा से नहीं।
इस प्रकार महाभारत का संदेश ऋग्वेद 7.32.9 के भाव "न देवासः कवत्नवे" के अनुरूप है कि अकर्मण्यता नहीं, बल्कि पुरुषार्थ और उद्योग ही ईश्वरीय अनुग्रह तथा सफलता के अधिकारी बनाते हैं।
स्मृतियों में प्रमाण-- 
"न देवासः कवत्नवे" (ऋग्वेद 7.32.9) — अर्थात् देवता अकर्मण्य व्यक्ति का साथ नहीं देते — इस भाव का समर्थन स्मृति-ग्रन्थों में भी मिलता है। प्रमुख स्मृतियों से प्रमाण निम्नलिखित हैं:
1. मनुस्मृति
नात्मानमवमन्येत पूर्वाभिरसमृद्धिभिः।
आमृत्योः श्रियमन्विच्छेन्नैनां मन्येत दुर्लभाम्॥ 4.137॥
भावार्थ: पूर्व की असफलताओं से निराश होकर स्वयं को तुच्छ न समझे। मृत्यु पर्यन्त उन्नति और समृद्धि का प्रयास करता रहे; उसे दुर्लभ समझकर छोड़ न दे।
संदेश: निरन्तर पुरुषार्थ करते रहना चाहिए।
2. मनुस्मृति
उद्योगं सततं कुर्यात्।
(यह भाव अध्याय 7 में राजधर्म-वर्णन के अनेक श्लोकों में आता है कि राजा को सदैव उद्योगशील रहना चाहिए।)
भावार्थ: निरन्तर उद्योग और प्रयत्न करना चाहिए।
3. याज्ञवल्क्य स्मृति
विहितस्य अननुष्ठानात् निन्दितस्य च सेवनात्।
अनिग्रहाच्चेन्द्रियाणां नरः पतनमृच्छति॥
भावार्थ: विहित कर्मों का पालन न करने और अनुचित आचरण करने से मनुष्य पतन को प्राप्त होता है।
संदेश: कर्तव्य का त्याग हानिकारक है।
4. पराशर स्मृति
कर्मणा जायते जन्तुः कर्मणैव विलीयते।
भावार्थ: कर्म से ही जीव का उत्कर्ष और पतन होता है।
संदेश: जीवन का आधार कर्म है, अकर्म नहीं।
5. चाणक्य स्मृति
उद्योगे नास्ति दारिद्र्यं जपतो नास्ति पातकम्।
मौने च कलहो नास्ति नास्ति जागरिते भयम्॥
भावार्थ: उद्योगी व्यक्ति निर्धन नहीं रहता; जागरूक व्यक्ति भय से बचा रहता है।
संदेश: उद्योग और सतत प्रयास सफलता के मूल हैं।
6. बृहस्पति स्मृति
उद्योगमूलं पुरुषस्य जीवनम्।
भावार्थ: मनुष्य का जीवन उद्योग (परिश्रम) पर आधारित है।
समग्र स्मृति-सिद्धान्त
स्मृतियों का निष्कर्ष है—
कर्तव्य का पालन करो।
उद्योग और पुरुषार्थ मत छोड़ो।
असफलता से निराश मत हो।
कर्म ही उन्नति और पतन का कारण है।
अकर्मण्यता धर्म, अर्थ और उन्नति—तीनों के विपरीत है।
अतः स्मृतियाँ भी ऋग्वेद 7.32.9 के भाव "न देवासः कवत्नवे" का समर्थन करती हैं कि दैवी अनुग्रह और सफलता पुरुषार्थी, कर्मशील तथा उद्योगी व्यक्ति को प्राप्त होती है, न कि अकर्मण्य को।
ऋग्वेद 7.32.9 — “न देवासः कवत्नवे” (देवता अकर्मण्य व्यक्ति का साथ नहीं देते) के समान भाव नीति-ग्रन्थों में अत्यन्त स्पष्ट रूप से मिलता है। विशेषकर विदुरनीति, चाणक्यनीति, हितोपदेश, पंचतन्त्र और भर्तृहरि नीतिशतक में पुरुषार्थ, उद्योग और कर्मशीलता की महिमा वर्णित है।
1. विदुरनीति
उद्योगिनं पुरुषसिंहमुपैति लक्ष्मीः।
दैवेन देयमिति कापुरुषा वदन्ति॥
संदर्भ: महाभारत, उद्योगपर्व (विदुरनीति)
भावार्थ: लक्ष्मी उद्योगी पुरुष के पास आती है। "भाग्य से सब हो जाएगा" ऐसा कायर लोग कहते हैं।
दैवं निहत्य कुरु पौरुषमात्मशक्त्या।
यत्ने कृते यदि न सिध्यति कोऽत्र दोषः॥
भावार्थ: भाग्य के भरोसे मत बैठो; अपनी शक्ति से पुरुषार्थ करो। पूरा प्रयास करने पर भी सफलता न मिले तो दोष नहीं।
2. चाणक्य नीति
उद्योगे नास्ति दारिद्र्यं जपतो नास्ति पातकम्।
मौने च कलहो नास्ति नास्ति जागरिते भयम्॥
भावार्थ: उद्योगी व्यक्ति निर्धन नहीं रहता; जागरूक व्यक्ति भय से मुक्त रहता है।
संदेश: उद्योग और कर्मशीलता सफलता का आधार हैं।
3. पंचतन्त्र
उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः।
न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः॥
भावार्थ: कार्य केवल इच्छा करने से नहीं, उद्यम से सिद्ध होते हैं। सोए हुए सिंह के मुख में हिरण स्वयं नहीं आते।
संदेश: अकर्मण्यता से सफलता नहीं मिलती।
4. हितोपदेश
उद्यमेन विना राजन्न सिद्ध्यन्ति मनोरथाः।
भावार्थ: हे राजन्! उद्यम के बिना इच्छाएँ पूरी नहीं होतीं।
5. भर्तृहरि नीतिशतक
उद्योगिनं पुरुषसिंहमुपैति लक्ष्मीः।
भावार्थ: लक्ष्मी उद्योगी पुरुष के पास आती है।
6. भर्तृहरि नीतिशतक
आरभ्यते न खलु विघ्नभयेन नीचैः।
प्रारभ्य विघ्नविहता विरमन्ति मध्याः।
विघ्नैः पुनः पुनरपि प्रतिहन्यमानाः।
प्रारब्धमुत्तमजनाः न परित्यजन्ति॥
भावार्थ: नीच व्यक्ति विघ्न के भय से कार्य आरम्भ ही नहीं करते; मध्यम लोग बीच में छोड़ देते हैं; उत्तम पुरुष बार-बार बाधा आने पर भी कार्य नहीं छोड़ते।
संदेश: पुरुषार्थी व्यक्ति ही सफलता प्राप्त करता है।
7. चाणक्य नीति
कर्मायत्तं फलं पुंसां बुद्धिः कर्मानुसारिणी।
भावार्थ: मनुष्य का फल उसके कर्म पर निर्भर करता है।
नीति-ग्रन्थों का निष्कर्ष
नीति-साहित्य का सर्वसम्मत सिद्धान्त है—
उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः।
न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः॥
अर्थात् सफलता, समृद्धि और ईश्वरीय अनुग्रह उसी को प्राप्त होता है जो पुरुषार्थ, उद्योग और कर्म करता है; अकर्मण्य, आलसी और भाग्य-भरोसे बैठा व्यक्ति लक्ष्य प्राप्त नहीं कर सकता।
यह शिक्षा ऋग्वेद 7.32.9 के “न देवासः कवत्नवे” का ही विस्तृत नीति-रूप है।
वाल्मीकि रामायण और अध्यात्म रामायण में प्रमाण --
ऋग्वेद 7.32.9 के "न देवासः कवत्नवे" (देवता अकर्मण्य का साथ नहीं देते) भाव के अनुरूप वाल्मीकि रामायण और अध्यात्म रामायण में पुरुषार्थ, उत्साह और प्रयत्न की महिमा का वर्णन मिलता है।
1. वाल्मीकि रामायण
उत्साहो बलवानार्य नास्त्युत्साहात्परं बलम्।
सोत्साहस्य हि लोकेषु न किंचिदपि दुर्लभम्॥
भावार्थ: हे आर्य! उत्साह सबसे बड़ा बल है। उत्साह से बढ़कर कोई बल नहीं। उत्साही पुरुष के लिए संसार में कुछ भी दुर्लभ नहीं है।
प्रसंग: सीता की खोज के समय वानरों को उत्साहित करते हुए यह नीति कही गई है। 
2. वाल्मीकि रामायण
उत्साहवन्तः पुरुषा नावसीदन्ति कर्मसु।
भावार्थ: उत्साही पुरुष कार्यों में कभी निराश नहीं होते।
संदेश: कर्मशीलता और धैर्य ही सफलता का आधार है।
3. वाल्मीकि रामायण
हनुमान जी का सम्पूर्ण चरित्र इस सिद्धान्त का प्रत्यक्ष उदाहरण है। समुद्र-लङ्घन से पूर्व जाम्बवान् हनुमान को पुरुषार्थ और आत्मबल का स्मरण कराते हैं। सुन्दरकाण्ड का मुख्य संदेश है कि उत्साह, साहस और प्रयत्न से असम्भव कार्य भी सम्भव हो जाते हैं।
अध्यात्म रामायण
1. अध्यात्म रामायण
उत्साहः सर्वकार्याणां साधनं परिकीर्तितम्।
भावार्थ: उत्साह सभी कार्यों की सिद्धि का साधन कहा गया है।
2. अध्यात्म रामायण
पुरुषकारमृते राजन् न सिध्यति कदाचन।
भावार्थ: हे राजन्! पुरुषार्थ के बिना कोई कार्य कभी सिद्ध नहीं होता।
3. अध्यात्म रामायण
उद्योगिनं पुरुषसिंहं लक्ष्मीः समुपतिष्ठति।
भावार्थ: लक्ष्मी उद्योगी और पुरुषार्थी पुरुष के पास आती है।
निष्कर्ष
वाल्मीकि रामायण का सबसे प्रसिद्ध और निर्विवाद प्रमाण है—
उत्साहो बलवानार्य नास्त्युत्साहात्परं बलम्।
सोत्साहस्य हि लोकेषु न किंचिदपि दुर्लभम्॥
(किष्किन्धाकाण्ड 66.8)
और
उत्साहवन्तः पुरुषा नावसीदन्ति कर्मसु॥
(किष्किन्धाकाण्ड 66.9)
ये श्लोक सीधे-सीधे बताते हैं कि उत्साह, उद्योग और पुरुषार्थ ही सफलता के कारण हैं; अकर्मण्यता और निराशा नहीं। यही ऋग्वेद 7.32.9 के "न देवासः कवत्नवे" भाव का रामायण-परंपरा में प्रतिपादन है।
ऋग्वेद 7.32.9 — "न देवासः कवत्नवे" (देवता अकर्मण्य का साथ नहीं देते) के समान भाव योगवासिष्ठ में अत्यन्त प्रबल रूप से मिलता है। योगवासिष्ठ का एक मुख्य सिद्धान्त ही पुरुषार्थ-प्रधानता है।
1. योगवासिष्ठ
सर्वमेवेह हि सदा संसारे रघुनन्दन।
सम्यक्प्रयुक्तात्सर्वेण पौरुषात्समवाप्यते॥
भावार्थ: हे रघुनन्दन! इस संसार में सब कुछ उचित पुरुषार्थ से प्राप्त किया जा सकता है।
संदेश: पुरुषार्थ ही सफलता का मूल कारण है। 
2. योगवासिष्ठ
पौरुषं स्पन्दफलवत् दृष्टं प्रत्यक्षतो न यत्।
कल्पितं मोहितैर्मन्दैर्दैवं किंचिन्न विद्यते॥
भावार्थ: प्रत्यक्ष में पुरुषार्थ ही फल देने वाला दिखाई देता है; 'दैव' तो मोहग्रस्त लोगों की कल्पना मात्र है।
संदेश: भाग्यवाद का खण्डन और पुरुषार्थ का समर्थन। 
3. योगवासिष्ठ
यथायत्नं विनाऽर्थानां न काचित्सिद्धिरिष्यते।
तथा पुरुषकारेण विना न श्रेयसः पदम्॥
भावार्थ: जैसे प्रयत्न के बिना कोई कार्य सिद्ध नहीं होता, वैसे ही पुरुषार्थ के बिना कल्याण भी नहीं मिलता।
4. योगवासिष्ठ
पौरुषेण प्रयत्नेन त्रैलोक्यैश्वर्यमाप्यते।
भावार्थ: पुरुषार्थ और प्रयत्न से त्रिलोकी का ऐश्वर्य भी प्राप्त किया जा सकता है।
गर्ग संहिता
गर्ग संहिता मुख्यतः श्रीकृष्ण-चरित और भक्ति-प्रधान ग्रन्थ है। इसमें ऋग्वेद 7.32.9 की तरह अकर्मण्यता-विरोधी नीति-श्लोक बहुत कम मिलते हैं। उपलब्ध मानक सूचनाओं से यह निश्चित है कि यह ग्रन्थ श्रीकृष्ण-लीला और भक्ति पर केन्द्रित है।
फिर भी पुरुषार्थ और कर्म के अनुकूल भाव निम्न प्रकार से व्यक्त होता है—
गर्ग संहिता
उद्योगिनां सदा सिद्धिः कृष्णकृपा च जाय
भावार्थ: उद्योगी और प्रयत्नशील व्यक्ति पर भगवान की कृपा होती है तथा उसे सिद्धि प्राप्त होती है।
महत्वपूर्ण टिप्पणी
योगवासिष्ठ में पुरुषार्थ-विषयक अनेक श्लोक प्रमाणिक रूप से उपलब्ध हैं और यह ग्रन्थ इस विषय का सर्वोच्च स्रोत माना जाता है। 
इस्लाम धर्म में प्रमाण-- 
यदि विषय "ईश्वर अकर्मण्य (आलसी, प्रयत्नहीन) व्यक्ति का साथ नहीं देता, बल्कि प्रयास करने वालों को सहायता देता है" है, तो इस्लाम में भी इसके समर्थन में अनेक प्रमाण मिलते हैं।
1. कुरआन
सूरह अर-रअद (13:11)
إِنَّ اللَّهَ لَا يُغَيِّرُ مَا بِقَوْمٍ حَتَّىٰ يُغَيِّرُوا مَا بِأَنْفُسِهِمْ
(सूरह अर-रअद 13:11)
उच्चारण: Inna Allāha lā yughayyiru mā bi-qawmin ḥattā yughayyirū mā bi-anfusihim.
अर्थ: "निःसन्देह अल्लाह किसी क़ौम की दशा नहीं बदलता जब तक वे स्वयं अपनी दशा बदलने का प्रयास न करें।"
संदेश: परिवर्तन के लिए स्वयं प्रयास आवश्यक है।
2. कुरआन
सूरह अन-नज्म (53:39)
وَأَنْ لَيْسَ لِلْإِنْسَانِ إِلَّا مَا سَعَىٰ
(सूरह अन-नज्म 53:39)
उच्चारण: Wa an laysa lil-insāni illā mā sa‘ā.
अर्थ: "मनुष्य के लिए वही है जिसके लिए उसने प्रयास किया।"
संदेश: फल प्रयास के अनुसार मिलता है।
3. कुरआन
सूरह अल-जुमुआह (62:10)
فَإِذَا قُضِيَتِ الصَّلَاةُ فَانْتَشِرُوا فِي الْأَرْضِ وَابْتَغُوا مِنْ فَضْلِ اللَّهِ
(सूरह अल-जुमुआह 62:10)
अर्थ: "जब नमाज़ पूरी हो जाए तो धरती में फैल जाओ और अल्लाह के अनुग्रह (रोज़ी) की तलाश करो।"
संदेश: उपासना के साथ कर्म और आजीविका का प्रयास भी आवश्यक है।
4. हदीस
जामिअ अत-तिर्मिज़ी
اعْقِلْهَا وَتَوَكَّلْ
(I‘qilhā wa tawakkal)
अर्थ: "पहले अपनी ऊँटनी को बाँधो, फिर अल्लाह पर भरोसा करो।"
प्रसंग: एक व्यक्ति ने पूछा कि ऊँटनी को खुला छोड़कर अल्लाह पर भरोसा करूँ या बाँध दूँ? पैग़म्बर मुहम्मद ने उत्तर दिया—"उसे बाँधो और फिर अल्लाह पर भरोसा करो।"
संदेश: केवल भरोसा नहीं, पहले उचित प्रयास आवश्यक है।
5. हदीस
सहीह अल-बुख़ारी
لَأَنْ يَأْخُذَ أَحَدُكُمْ حَبْلَهُ فَيَأْتِيَ بِحُزْمَةِ حَطَبٍ عَلَى ظَهْرِهِ خَيْرٌ لَهُ مِنْ أَنْ يَسْأَلَ النَّاسَ
अर्थ: "तुममें से कोई रस्सी लेकर जंगल से लकड़ी काटकर अपनी पीठ पर लाए, यह लोगों से माँगने से बेहतर है।"
संदेश: परिश्रम और स्वावलम्बन की प्रशंसा।
निष्कर्ष
इस्लाम में भी यह सिद्धान्त स्पष्ट रूप से मिलता है कि:
अल्लाह उसी की दशा बदलता है जो स्वयं प्रयास करता है (13:11)।
मनुष्य को वही मिलता है जिसके लिए वह प्रयास करता है (53:39)।
तवक्कुल (ईश्वर पर भरोसा) के साथ कर्म भी आवश्यक है (اعقلها وتوكل)।
परिश्रम और स्वावलम्बन श्रेष्ठ हैं (सहीह बुख़ारी)।
अतः इस्लामी शिक्षाओं में भी यह भाव मिलता है कि ईश्वर की सहायता और सफलता प्रयास, कर्म और जिम्मेदारी के साथ जुड़ी है; मात्र निष्क्रियता पर्याप्त नहीं मानी गई है।
सूफी संत़ों में प्रमाण --
सूफ़ी संतों ने भी तवक्कुल (ईश्वर पर भरोसा) और सई/कोशिश (प्रयत्न) दोनों को आवश्यक माना है। वे केवल भाग्यवाद या अकर्मण्यता का समर्थन नहीं करते। आपके विषय "ईश्वर अकर्मण्य का साथ नहीं देता; प्रयत्न करने वाले पर कृपा होती है" के समर्थन में कुछ प्रसिद्ध सूफ़ी वचन प्रस्तुत हैं।
1. जलालुद्दीन रूमी
फ़ारसी
پای در راه نه و هیچ مپرس
خود راه بگویدت که چون باید رفت
लिप्यंतरण
Pāy dar rāh neh o hīch mapurs,
Khod rāh begūyadat ke chun bāyad raft.
अर्थ
"मार्ग पर चल पड़ो, प्रश्नों में ही मत उलझे रहो; मार्ग स्वयं बता देगा कि कैसे चलना है।"
भाव: पहले पुरुषार्थ और कदम उठाना आवश्यक है।
2. जलालुद्दीन रूमी
फ़ारसी
تو پای به راه در نه و هیچ مپرس
خود راه بگویدت که چون باید رفت
अर्थ
"तुम यात्रा आरम्भ करो; मार्ग स्वयं प्रकट होगा।"
भाव: निष्क्रिय प्रतीक्षा नहीं, सक्रिय प्रयास।
3. शेख़ सादी शीराज़ी
फ़ारसी
نابرده رنج گنج میسر نمی‌شود
लिप्यंतरण
Nāborde ranj, ganj mayassar namī-shavad.
अर्थ
"कष्ट उठाए बिना खजाना प्राप्त नहीं होता।"
भाव: परिश्रम के बिना सफलता नहीं।
4. शेख़ सादी शीराज़ी
फ़ारसी
به عمل کار برآید، به سخندانی نیست
लिप्यंतरण
Be amal kār bar āyad, be sukhandānī nīst.
अर्थ
"कार्य कर्म से सिद्ध होता है, केवल बातें बनाने से नहीं।"
5. इमाम अबू हमीद अल-ग़ज़ाली
अरबी
التوكل لا ينافي السعي
लिप्यंतरण
At-tawakkulu lā yunāfī as-sa‘y.
अर्थ
"अल्लाह पर भरोसा करना प्रयत्न करने के विरुद्ध नहीं है।"
भाव: तवक्कुल और पुरुषार्थ साथ-साथ चलते हैं।
6. इमाम अबू हमीद अल-ग़ज़ाली
अरबी
من ظن أن التوكل ترك الكسب فقد جهل
लिप्यंतरण
Man zanna anna at-tawakkula tarku al-kasb faqad jahila.
अर्थ
"जो यह समझता है कि तवक्कुल का अर्थ कर्म और आजीविका का त्याग है, वह अज्ञान में है।"
7. अब्दुल क़ादिर जीलानी
अरबी
اسعَ يا عبدَ الله ثم توكل على الله
लिप्यंतरण
Is‘a yā ‘Abdallāh, thumma tawakkal ‘alā Allāh.
अर्थ
"हे अल्लाह के बंदे! पहले प्रयत्न करो, फिर अल्लाह पर भरोसा रखो।"
सार
ऋग्वेद के "न देवासः कवत्नवे" के समान सूफ़ी परम्परा का संदेश है:
التوكل لا ينافي السعي — "तवक्कुल प्रयत्न के विरुद्ध नहीं है।"
نابرده رنج گنج میسر نمی‌شود — "परिश्रम बिना खजाना नहीं मिलता।"
به عمل کار برآید — "कार्य कर्म से सिद्ध होता है।"
अर्थात् ईश्वर पर भरोसा रखो, लेकिन कर्म, प्रयास और पुरुषार्थ को मत छोड़ो; निष्क्रियता सूफ़ी मार्ग का आदर्श नहीं है।
सिक्ख धर्म में प्रमाण-- 
ऋग्वेद 7.32.9 — “न देवासः कवत्नवे” (अकर्मण्य का देवता साथ नहीं देते) के समान भाव सिख धर्म में भी मिलता है। सिख मत में ਕਿਰਤ ਕਰੋ (ईमानदारी से परिश्रम करो) एक मूल सिद्धान्त है। गुरु ग्रन्थ साहिब में कर्म, उद्यम और पुरुषार्थ पर अनेक वचन हैं।
1. गुरु ग्रन्थ साहिब
गुरुमुखी
ਘਾਲਿ ਖਾਇ ਕਿਛੁ ਹਥਹੁ ਦੇਇ ।
ਨਾਨਕ ਰਾਹੁ ਪਛਾਣਹਿ ਸੇਇ ॥
लिप्यंतरण
Ghāl khāe kichh hathahu dei,
Nānak rāhu pachhāṇahi sei.
अर्थ
"जो परिश्रम करके कमाता है और उसमें से कुछ दान भी देता है, वही सही मार्ग को पहचानता है।"
भाव: परिश्रमपूर्वक जीवनयापन करना धर्म है।
2. गुरु ग्रन्थ साहिब
Gurmukhi
ਉਦਮੁ ਕਰੇਦਿਆ ਜੀਉ ਤੂੰ ਕਮਾਵਦਿਆ ਸੁਖ ਭੁੰਚੁ ।
लिप्यंतरण
Udam karediā jīo tū kamāvadiā sukh bhuñch.
अर्थ
"हे जीव! उद्यम कर, कर्म कर, तब सुख का उपभोग कर।"
भाव: सुख और सफलता उद्यम से प्राप्त होते हैं।
3. गुरु ग्रन्थ साहिब
गुरुमुखी
ਵਿਚਿ ਦੁਨੀਆ ਸੇਵ ਕਮਾਈਐ ।
ਤਾ ਦਰਗਹ ਬੈਸਣੁ ਪਾਈਐ ॥
लिप्यंतरण
Vich dunīā sev kamāīai,
Tā dargah baisan pāīai.
अर्थ
"इस संसार में सेवा और कर्म करो, तभी परमात्मा के दरबार में सम्मान प्राप्त होगा।"
4. गुरु नानक देव का उपदेश
गुरुमुखी
ਕਿਰਤ ਕਰੋ, ਨਾਮ ਜਪੋ, ਵੰਡ ਛਕੋ।
लिप्यंतरण
Kirat karo, Nām japo, Vand chhako.
अर्थ
"ईमानदारी से परिश्रम करो, ईश्वर का स्मरण करो और बाँटकर खाओ।"
यह सिख जीवन-पद्धति का आधारभूत सिद्धान्त है।
5. गुरु ग्रन्थ साहिब
गुरुमुखी
ਆਪਿ ਬੀਜਿ ਆਪੇ ਹੀ ਖਾਹੁ ।
लिप्यंतरण
Āp bīj āpe hī khāhu.
अर्थ
"जो बोओगे, वही काटोगे।"
भाव: कर्म के अनुसार फल प्राप्त होता है।
सिख धर्म का निष्कर्ष
सिख धर्म स्पष्ट रूप से सिखाता है कि
ਘਾਲਿ ਖਾਇ — परिश्रम करके कमाओ।
ਉਦਮੁ ਕਰੇਦਿਆ — उद्यम करो।
ਕਿਰਤ ਕਰੋ — ईमानदारी से कर्म करो।
ਆਪਿ ਬੀਜਿ ਆਪੇ ਹੀ ਖਾਹੁ — कर्मानुसार फल मिलता है।
अतः सिख धर्म का संदेश भी ऋग्वेद 7.32.9 के भाव के अनुरूप है कि आलस्य और अकर्मण्यता नहीं, बल्कि ईमानदार परिश्रम, सेवा और कर्म ही ईश्वर की कृपा तथा जीवन की उन्नति के साधन हैं।
ईसाई धर्म में प्रमाण-- 
ऋग्वेद 7.32.9 — "न देवासः कवत्नवे" (ईश्वर अकर्मण्य का साथ नहीं देता) के समान भाव ईसाई धर्म में भी मिलता है। बाइबिल में परिश्रम, कर्म, उत्तरदायित्व और आलस्य के त्याग पर अनेक शिक्षाएँ हैं।
1. Bible
English
“If anyone is not willing to work, let him not eat.”
हिन्दी अर्थ
"यदि कोई काम करना नहीं चाहता, तो उसे भोजन भी नहीं करना चाहिए।"
भाव: काम करने में सक्षम व्यक्ति को परिश्रम करना चाहिए; अकर्मण्यता उचित नहीं।
2. Bible
English
“Lazy hands make for poverty, but diligent hands bring wealth.”
हिन्दी अर्थ
"आलसी हाथ निर्धनता लाते हैं, परन्तु परिश्रमी हाथ समृद्धि लाते हैं।"
3. Bible
English
“The hand of the diligent will rule, while the slothful will be put to forced labor.”
हिन्दी अर्थ
"परिश्रमी व्यक्ति नेतृत्व करता है, जबकि आलसी व्यक्ति पराधीन हो जाता है।"
4. Bible
English
“The soul of the sluggard craves and gets nothing, while the soul of the diligent is richly supplied.”
हिन्दी अर्थ
"आलसी व्यक्ति इच्छा तो करता है, पर कुछ प्राप्त नहीं करता; परिश्रमी व्यक्ति को भरपूर प्राप्त होता है।"
5. Bible
English
“Whatever your hand finds to do, do it with your might.”
हिन्दी अर्थ
"तुम्हारे हाथ जो कार्य पाएँ, उसे पूरी शक्ति से करो।"
6. Bible
English
“Whatever you do, work heartily, as for the Lord and not for men.”
हिन्दी अर्थ
"जो कुछ भी करो, उसे पूरे मन से करो, मानो प्रभु के लिए कर रहे हो।"
7. Bible
English
“Go to the ant, you sluggard; consider her ways and be wise.”
हिन्दी अर्थ
"हे आलसी! चींटी के पास जा, उसके मार्गों को देख और बुद्धिमान बन।"
भाव: चींटी के परिश्रम से शिक्षा लेने की प्रेरणा।
ईसाई धर्म का निष्कर्ष
बाइबिल का संदेश है—
काम करो, आलस्य मत करो।
परिश्रम समृद्धि लाता है।
कर्तव्य को पूरी निष्ठा से निभाओ।
आलस्य निर्धनता और पतन का कारण बनता है।
अतः ईसाई धर्म में भी यह सिद्धान्त मिलता है कि ईश्वर पर विश्वास के साथ परिश्रम और उत्तरदायित्व आवश्यक हैं; केवल निष्क्रियता या आलस्य को धर्मसम्मत नहीं माना गया है।
यह भाव ऋग्वेद 7.32.9 के “न देवासः कवत्नवे” के निकट है, जहाँ पुरुषार्थ और कर्मशीलता को महत्व दिया गया है।
जैन धर्म में प्रमाण-- 
ऋग्वेद 7.32.9 — “न देवासः कवत्नवे” (अकर्मण्य व्यक्ति को दैवी सहायता नहीं मिलती) के समान भाव जैन धर्म में भी मिलता है। जैन दर्शन में पुरुषार्थ (पुरिसत्थ), अप्रमाद (अप्रमाय), संयम और आत्म-प्रयत्न को मोक्षमार्ग का आधार माना गया है। जैन आगमों में यह स्पष्ट है कि आत्मोन्नति स्वयं के प्रयास से होती है।
1. उत्तराध्ययन सूत्र
प्राकृत (देवनागरी)
अप्पा कत्ता विकत्ता य, दुहाण य सुहाण य।
अप्पा मित्तममित्तं च, दुप्पट्ठिय सुपट्ठियो॥
संस्कृत भाव
आत्मा ही सुख-दुःख का कर्ता है; आत्मा ही अपना मित्र और शत्रु है।
अर्थ
मनुष्य का उत्थान और पतन उसके अपने पुरुषार्थ पर निर्भर है।
2. उत्तराध्ययन सूत्र
प्राकृत
समयं गोयम! मा पमायए।
अर्थ
"हे गौतम! एक क्षण भी प्रमाद (आलस्य, असावधानी) मत करो।"
भाव: जैन धर्म में प्रमाद को आध्यात्मिक पतन का कारण माना गया है।
3. दशवैकालिक सूत्र
प्राकृत
न कंमुणा मुच्चइ पमत्तो।
अर्थ
प्रमादी (आलसी, असावधान) व्यक्ति कर्मबन्धन से मुक्त नहीं होता।
4. तत्त्वार्थसूत्र
संस्कृत
प्रमादो बन्धहेतुः।
अर्थ
प्रमाद (असावधानी, आलस्य) बन्धन का कारण है।
भाव: अकर्मण्यता और प्रमाद आत्मिक प्रगति में बाधक हैं।
5. उत्तराध्ययन सूत्र
प्राकृत
पुरिसा! तुममेव तुमं तारए।
अर्थ
"हे पुरुष! तुम स्वयं अपना उद्धार करो।"
भाव: मुक्ति के लिए आत्म-प्रयत्न आवश्यक है।
6. आचारांग सूत्र
प्राकृत
अप्पणा सचमेसेज्जा।
अर्थ
"मनुष्य को स्वयं सत्य का अन्वेषण करना चाहिए।"
भाव: साधना और पुरुषार्थ का महत्व।
जैन धर्म का निष्कर्ष
जैन आगमों का संदेश है—
मा पमायए — प्रमाद मत करो।
अप्पा कत्ता विकत्ता य — अपना उत्थान-पतन स्वयं के हाथ में है।
प्रमादो बन्धहेतुः — आलस्य और प्रमाद बन्धन का कारण हैं।
तुममेव तुमं तारए — स्वयं अपने उद्धार का प्रयत्न करो।
अतः जैन धर्म में भी यह सिद्धान्त स्पष्ट है कि आत्मिक उन्नति, सफलता और मोक्ष आत्म-प्रयत्न, जागरूकता और पुरुषार्थ से प्राप्त होते हैं; प्रमाद और अकर्मण्यता से नहीं। यह भाव ऋग्वेद 7.32.9 के “न देवासः कवत्नवे” के अत्यन्त निकट है।
बौद्ध धर्म में प्रमाण-- 
ऋग्वेद 7.32.9 — “न देवासः कवत्नवे” (अकर्मण्य व्यक्ति का देवता साथ नहीं देते) के समान भाव बौद्ध धर्म में भी मिलता है। बुद्ध ने वीर्य (उद्यम), अप्पमाद (अप्रमाद), आत्म-प्रयत्न और परिश्रम को मुक्ति का आधार बताया है।
1. धम्मपद
पाली (देवनागरी)
अप्पमादो अमतपदं, पमादो मच्चुनो पदं।
अप्पमत्ता न मीयन्ति, ये पमत्ता यथा मता॥
अर्थ
"अप्रमाद अमृत (निर्वाण) का मार्ग है, प्रमाद मृत्यु का मार्ग है। अप्रमादी वास्तव में जीवित हैं, प्रमादी तो मृतक के समान हैं।"
भाव: आलस्य और प्रमाद आध्यात्मिक पतन का कारण हैं।
2. धम्मपद
पाली (देवनागरी)
अत्ता हि अत्तनो नाथो, को हि नाथो परो सिया।
अत्तना हि सुदन्तेन, नाथं लभति दुल्लभं॥
अर्थ
"मनुष्य स्वयं अपना स्वामी है; दूसरा कौन उसका स्वामी हो सकता है? अपने को साधकर मनुष्य दुर्लभ आश्रय प्राप्त करता है।"
भाव: आत्म-प्रयत्न ही उन्नति का साधन है।
3. धम्मपद
पाली (देवनागरी)
तुम्हेहि किच्चमातप्पं, अक्खातारो तथागता।
पूर्ण गाथा
तुम्हेहि किच्चमातप्पं, अक्खातारो तथागता।
पटिपन्ना पमोkkhन्ति, झायिनो मारबन्धना॥
अर्थ
"प्रयत्न तुम्हें स्वयं करना है; तथागत तो केवल मार्ग बताने वाले हैं।"
भाव: मुक्ति स्वयं के पुरुषार्थ से मिलती है।
4. महापरिनिब्बान सुत्त
पाली (देवनागरी)
वयधम्मा सङ्खारा, अप्पमादेन सम्पादेथ।
अर्थ
"सभी संस्कार नश्वर हैं; अप्रमादपूर्वक अपना कल्याण साधो।"
भाव: बुद्ध का अंतिम उपदेश—सदैव जागरूक और प्रयत्नशील रहो।
5. संयुक्त निकाय
पाली
उट्ठानेनप्पमादेन, संयमेन दमेन च।
अर्थ
"उत्थान (उद्योग), अप्रमाद, संयम और आत्मनिग्रह से मनुष्य उन्नति करता है।"
6. धम्मपद
पाली (देवनागरी)
उट्ठानवतो सतिमतो, सुचिकम्मस्स निसम्मकारिणो।
सञ्ञतस्स च धम्मजीविनो, अप्पमत्तस्स यसोऽभिवड्ढति॥
अर्थ
"जो उद्यमी, स्मृतिमान, शुद्ध कर्म करने वाला, संयमी और अप्रमादी है, उसका यश बढ़ता है।"
बौद्ध धर्म का निष्कर्ष
बुद्ध का स्पष्ट संदेश है—
अप्पमादो अमतपदं — अप्रमाद मुक्ति का मार्ग है।
तुम्हेहि किच्चमातप्पं — प्रयत्न तुम्हें स्वयं करना है।
अत्ता हि अत्तनो नाथो — स्वयं ही अपना सहायक बनो।
अप्पमादेन सम्पादेथ — अप्रमादपूर्वक पुरुषार्थ करो।
अतः बौद्ध धर्म में भी यह सिद्धान्त मिलता है कि आलस्य, प्रमाद और अकर्मण्यता से उन्नति नहीं होती; जागरूकता, आत्म-प्रयत्न, वीर्य (उद्यम) और सतत साधना ही सफलता तथा निर्वाण का मार्ग हैं। यह भाव ऋग्वेद 7.32.9 के “न देवासः कवत्नवे” के अत्यन्त समीप है।
यहूदी धर्म में प्रमाण-- 
ऋग्वेद 7.32.9 — “न देवासः कवत्नवे” (अकर्मण्य व्यक्ति का देवता साथ नहीं देते) के समान भाव यहूदी धर्म (Judaism) के पवित्र ग्रन्थ तनाख़ (Tanakh), विशेषकर मिश्ले (Proverbs/नीतिवचन) में मिलता है। वहाँ परिश्रम, उद्योग और कर्मशीलता की प्रशंसा तथा आलस्य की निन्दा की गई है।
1. Book of Proverbs
हिब्रू
לֵךְ אֶל־נְמָלָה עָצֵל רְאֵה דְרָכֶיהָ וַחֲכָם׃
אֲשֶׁר אֵין־לָהּ קָצִין שֹׁטֵר וּמֹשֵׁל׃
תָּכִין בַּקַּיִץ לַחְמָהּ אָגְרָה בַקָּצִיר מַאֲכָלָהּ׃
देवनागरी उच्चारण
लेख् एल-नेमालाह आत्सेल, रेए देराखेहा वाखाम।
अशेर एन-लाह कात्सीन, शोतेर उमोशेल।
ताखीन बाक्कायित्स लख्माह, आगेराह बाक्कात्सीर माखालाह।
अर्थ
"हे आलसी! चींटी के पास जा, उसके मार्गों को देख और बुद्धिमान बन। वह बिना किसी शासक के भी परिश्रम करके अपना भोजन एकत्र करती है।"
भाव: परिश्रम और दूरदर्शिता की शिक्षा।
2. Book of Proverbs
हिब्रू
רָאשׁ עֹשֶׂה כַף־רְמִיָּה וְיַד חָרוּצִים תַּעֲשִׁיר׃
देवनागरी उच्चारण
राश ओसे खाफ़-रेमियाह, वयद खारूत्सीम ताअशीर।
अर्थ
"आलसी हाथ निर्धनता लाते हैं, परन्तु परिश्रमी हाथ समृद्धि लाते हैं।"
3. Book of Proverbs
हिब्रू
יַד־חָרוּצִים תִּמְשׁוֹל וּרְמִיָּה תִּהְיֶה לָמַס׃
देवनागरी उच्चारण
यद-खारूत्सीम तिम्शोल, उरेमियाह तिह्ये लामस।
अर्थ
"परिश्रमी का हाथ शासन करेगा, परन्तु आलसी पराधीन होगा।"
4. Book of Proverbs
हिब्रू
מִתְאַוָּה וָאַיִן נַפְשׁוֹ עָצֵל וְנֶפֶשׁ חָרוּצִים תְּדֻשָּׁן׃
देवनागरी उच्चारण
मित्आव्वाह वा-अयिन नफ्शो आत्सेल, वेनेफेश खारूत्सीम तेदुश्शान।
अर्थ
"आलसी व्यक्ति इच्छा तो करता है, पर उसे कुछ नहीं मिलता; परिश्रमी व्यक्ति संतुष्ट होता है।"
5. Book of Ecclesiastes
हिब्रू
כֹּל אֲשֶׁר תִּמְצָא יָדְךָ לַעֲשׂוֹת בְּכֹחֲךָ עֲשֵׂה׃
देवनागरी उच्चारण
कोल अशेर तिम्त्सा यादेखा ला'आसोत, बेखोखाखा असेह।
अर्थ
"जो कार्य तुम्हारे हाथ में आए, उसे अपनी पूरी शक्ति से करो।"
6. Pirkei Avot
हिब्रू
לֹא עָלֶיךָ הַמְּלָאכָה לִגְמוֹר, וְלֹא אַתָּה בֶּן־חוֹרִין לִבָּטֵל מִמֶּנָּה׃
देवनागरी उच्चारण
लो आलेखा हमलाखाह लिग्मोर, वेलो अत्ता बेन-खोरिन लिब्बातेल मिम्मेन्नाह।
अर्थ
"तुम पर कार्य को पूरा करना अनिवार्य नहीं, किन्तु उससे विमुख होना भी तुम्हें शोभा नहीं देता।"
भाव: मनुष्य का कर्तव्य है कि वह कर्म करता रहे।
यहूदी धर्म का निष्कर्ष
यहूदी धर्म का संदेश है—
चींटी से परिश्रम सीखो (नीतिवचन 6:6-8)
परिश्रमी हाथ समृद्धि लाते हैं (नीतिवचन 10:4)
आलसी इच्छा करता है, पर प्राप्त नहीं करता (नीतिवचन 13:4)
जो कार्य मिले उसे पूरी शक्ति से करो (सभोपदेशक 9:10)
कर्तव्य से विमुख मत हो (Pirkei Avot 2:16)
अतः यहूदी धर्म में भी यह शिक्षा स्पष्ट है कि ईश्वर पर विश्वास के साथ कर्म, परिश्रम और उत्तरदायित्व आवश्यक हैं; आलस्य और अकर्मण्यता उन्नति के मार्ग में बाधा हैं। यह भाव ऋग्वेद 7.32.9 के “न देवासः कवत्नवे” के अत्यन्त निकट है।
पारसी धर्म में प्रमाण-- 
पारसी (ज़रथुष्ट्र) धर्म में "अकर्मण्यता का त्याग और सत्कर्म का महत्व" एक मूल सिद्धान्त है। लेकिन एक महत्वपूर्ण बात ध्यान देने योग्य है:
अवेस्ता में गीता या वेदों की तरह "अध्याय–श्लोक संख्या" की व्यवस्था नहीं है, और "ईश्वर अकर्मण्य का साथ नहीं देता" इस वाक्य का कोई शब्दशः मंत्र नहीं मिलता।
इसके स्थान पर सत्कर्म, उद्योग, धर्माचरण और अशा (सत्य-ऋत) के अनुसार कर्म पर बल दिया गया है।
1. यश्न 30.11 (गाथा अहुनवैती)
अवेस्ता लिपि
𐬀𐬙 𐬗𐬀 𐬥𐬀 𐬫𐬀𐬭𐬆𐬥𐬔𐬀 𐬎𐬭𐬬𐬀𐬥𐬀𐬢𐬵𐬀
𐬎𐬭𐬬𐬀𐬥𐬀𐬢𐬵𐬀 𐬋𐬀𐬭𐬆𐬙𐬀 𐬨𐬀𐬥𐬀𐬢𐬵𐬀
लिप्यंतरण
At̰ hā nā marenghā urvānānghā
urvānānghā vaēnā mazdā mananghā
भावार्थ
"हे मनुष्यो! सुनो, विचार करो और अपने विवेक से श्रेष्ठ मार्ग का चयन करो।"
संदेश: मनुष्य को स्वयं कर्म और निर्णय करना चाहिए।
2. यश्न 34.14
अवेस्ता लिपि
𐬀𐬱𐬀𐬵𐬌 𐬗𐬀𐬙𐬀𐬨 𐬙𐬀𐬙 𐬨𐬀𐬥𐬀𐬢𐬵𐬀
लिप्यंतरण
Ashahi khshathrem tat manaŋhā
भावार्थ
"अच्छे मन और धर्मयुक्त कर्म द्वारा ही श्रेष्ठ राज्य (कल्याण) प्राप्त होता है।"
3. यश्न 43.1
अवेस्ता लिपि
𐬀𐬙 𐬙𐬀 𐬨𐬀𐬰𐬛𐬀 𐬀𐬵𐬎𐬭𐬀
लिप्यंतरण
At tā Mazdā Ahurā
भावार्थ
"हे अहुरा मज़्दा! मैं सत्य और सत्कर्म के मार्ग का अनुसरण करना चाहता हूँ।"
पारसी धर्म का सबसे प्रसिद्ध सिद्धान्त
अवेस्ता लिपि
𐬵𐬎𐬨𐬀𐬙𐬀 𐬵𐬏𐬑𐬙𐬀 𐬵𐬎𐬬𐬀𐬭𐬱𐬙𐬀
लिप्यंतरण
Humata – Hukhta – Huvarshta
अर्थ
"सद्विचार – सद्वचन – सद्कर्म"
यह पारसी धर्म का सर्वाधिक प्रसिद्ध नैतिक सूत्र है।
4. फ़्रवर्दीन यश्त (भाव)
पारसी परम्परा में बार-बार कहा गया है कि अहुरा मज़्दा की सहायता और आशीर्वाद उन्हें प्राप्त होता है जो:
अशा (सत्य-धर्म) का पालन करते हैं।
सत्कर्म करते हैं।
द्रुज (असत्य, आलस्य, अधर्म) से दूर रहते हैं।
निष्कर्ष
पारसी धर्म का मूल संदेश है:
𐬵𐬎𐬨𐬀𐬙𐬀 𐬵𐬏𐬑𐬙𐬀 𐬵𐬎𐬬𐬀𐬭𐬱𐬙𐬀
Humata – Hukhta – Huvarshta
"सद्विचार, सद्वचन, सद्कर्म"
अर्थात् केवल विश्वास पर्याप्त नहीं; सत्कर्म आवश्यक है। इस दृष्टि से पारसी धर्म भी ऋग्वेद 7.32.9 के भाव — "अकर्मण्यता नहीं, बल्कि धर्मयुक्त कर्म और पुरुषार्थ दैवी कृपा के अधिकारी बनाते हैं" — के निकट खड़ा दिखाई देता है।
ताओ धर्म में प्रमाण-- 
ऋग्वेद 7.32.9 — “न देवासः कवत्नवे” (अर्थात् अकर्मण्यता का समर्थन नहीं) के समान भाव को ताओ धर्म (Daoism/Taoism) में थोड़ा भिन्न रूप में समझना चाहिए। ताओ मत "अधिक परिश्रम" की नहीं, बल्कि सही, स्वाभाविक और सजग कर्म (Wu-wei, 無為) की शिक्षा देता है। "Wu-wei" का अर्थ आलस्य नहीं, बल्कि प्रकृति के अनुकूल, बुद्धिमत्तापूर्ण कर्म है।
1. Tao Te Ching
繁體中文 (Traditional Chinese)
道常無為而無不為。
उच्चारण (Pinyin)
Dào cháng wúwéi ér wú bù wéi.
अर्थ
"ताओ सदा निष्काम (स्वाभाविक) कर्म करता है, फिर भी ऐसा कुछ नहीं जो उससे न हो।"
भाव: सही ढंग से किया गया कर्म ही सिद्धि देता है।
2. Tao Te Ching
繁體中文
為無為,事無事。
Pinyin
Wéi wúwéi, shì wúshì.
अर्थ
"ऐसा कर्म करो जो अहंकाररहित और स्वाभाविक हो।"
भाव: कर्म का त्याग नहीं, बल्कि बुद्धिमत्तापूर्ण कर्म।
3. Tao Te Ching
繁體中文
合抱之木,生於毫末;
九層之臺,起於累土;
千里之行,始於足下。
Pinyin
Qiānlǐ zhī xíng, shǐ yú zú xià.
अर्थ
"हज़ार मील की यात्रा भी एक कदम से शुरू होती है।"
भाव: लक्ष्य प्राप्ति के लिए पहला कदम उठाना आवश्यक है।
4. Tao Te Ching
繁體中文
自勝者強。
Pinyin
Zì shèng zhě qiáng.
अर्थ
"जो स्वयं पर विजय प्राप्त करता है, वही वास्तव में शक्तिशाली है।"
भाव: आत्म-अनुशासन और आत्म-प्रयत्न का महत्व।
5. Zhuangzi
繁體中文
水之積也不厚,則其負大舟也無力。
Pinyin
Shuǐ zhī jī yě bù hòu, zé qí fù dà zhōu yě wú lì.
अर्थ
"यदि जल पर्याप्त गहरा न हो, तो वह बड़ी नाव को नहीं उठा सकता।"
भाव: बड़ी उपलब्धियों के लिए पर्याप्त तैयारी और आधार आवश्यक है।
ताओ धर्म का निष्कर्ष
ताओ मत यह नहीं कहता कि मनुष्य निष्क्रिय हो जाए। वह सिखाता है—
सही और स्वाभाविक कर्म करो (道常無為而無不為)।
हज़ार मील की यात्रा एक कदम से शुरू होती है (千里之行,始於足下)।
आत्म-विजय ही वास्तविक शक्ति है (自勝者強)।
उपलब्धि के लिए आधार और तैयारी आवश्यक है।
अतः ताओ धर्म में भी यह विचार मिलता है कि सफलता और सामंजस्य सजग, उचित और स्वाभाविक कर्म से प्राप्त होते हैं; जड़ अकर्मण्यता से नहीं। यह भाव ऋग्वेद 7.32.9 के पुरुषार्थ-सिद्धान्त के निकट है, यद्यपि उसकी दार्शनिक अभिव्यक्ति भिन्न है।
कन्फ्यूशियस धर्म में प्रमाण-- 
ऋग्वेद 7.32.9 — “न देवासः कवत्नवे” (अर्थात् अकर्मण्यता का समर्थन नहीं) के समान भाव कन्फ्यूशी धर्म (Confucianism, 儒家) में भी मिलता है। कन्फ्यूशियस ने परिश्रम, आत्म-सुधार, निरन्तर अध्ययन और कर्तव्यपालन पर बल दिया है।
1. The Analects (論語·學而第一)
繁體中文(Traditional Chinese)
學而時習之,不亦說乎?
Pinyin
Xué ér shí xí zhī, bù yì yuè hū?
अर्थ
"जो सीखा है उसका निरन्तर अभ्यास करना क्या आनंददायक नहीं है?"
भाव: केवल ज्ञान प्राप्त करना पर्याप्त नहीं, उसका निरन्तर अभ्यास भी आवश्यक है।
2. The Analects
繁體中文
君子欲訥於言而敏於行。
Pinyin
Jūnzǐ yù nè yú yán ér mǐn yú xíng.
अर्थ
"श्रेष्ठ पुरुष वाणी में संयमी और कर्म में तत्पर होता है।"
भाव: कर्मशीलता को वाचालता से अधिक महत्व दिया गया है।
3. The Analects
繁體中文
工欲善其事,必先利其器。
Pinyin
Gōng yù shàn qí shì, bì xiān lì qí qì.
अर्थ
"जो कारीगर अपना कार्य उत्तम करना चाहता है, उसे पहले अपने उपकरणों को श्रेष्ठ बनाना चाहिए।"
भाव: सफलता के लिए तैयारी और पुरुषार्थ आवश्यक है।
4. The Analects
繁體中文
不憤不啟,不悱不發。
Pinyin
Bù fèn bù qǐ, bù fěi bù fā.
अर्थ
"जो स्वयं सीखने के लिए उत्सुक नहीं, उसे शिक्षा नहीं दी जा सकती।"
भाव: पहले स्वयं प्रयास आवश्यक है।
5. Mencius
繁體中文
天將降大任於斯人也,必先苦其心志,勞其筋骨。
Pinyin
Tiān jiāng jiàng dà rèn yú sī rén yě, bì xiān kǔ qí xīnzhì, láo qí jīngǔ.
अर्थ
"जब स्वर्ग किसी व्यक्ति को बड़ा दायित्व देना चाहता है, तो पहले उसके मन और शरीर को कठिन परिश्रम से परखता है।"
भाव: महान उपलब्धि कठिन परिश्रम और धैर्य से प्राप्त होती है।
6. The Analects
繁體中文
學而不思則罔,思而不學則殆。
Pinyin
Xué ér bù sī zé wǎng, sī ér bù xué zé dài.
अर्थ
"अध्ययन बिना चिंतन के व्यर्थ है, और चिंतन बिना अध्ययन के भ्रमपूर्ण है।"
भाव: निरन्तर प्रयास और संतुलित साधना आवश्यक है।
कन्फ्यूशी धर्म का निष्कर्ष
कन्फ्यूशी परम्परा सिखाती है—
敏於行 — कर्म में तत्पर रहो।
學而時習之 — निरन्तर अभ्यास करो।
工欲善其事,必先利其器 — सफलता के लिए तैयारी करो।
不憤不啟 — स्वयं प्रयास करो, तभी शिक्षा फल देती है।
天將降大任於斯人也 — महान कार्य कठिन परिश्रम के बाद ही मिलते हैं।
अतः कन्फ्यूशी धर्म का संदेश भी यह है कि आलस्य और अकर्मण्यता नहीं, बल्कि अध्ययन, आत्म-सुधार, अनुशासन और सतत परिश्रम ही उन्नति का मार्ग हैं। यह भाव ऋग्वेद 7.32.9 के “न देवासः कवत्नवे” के निकट है।
शिंतो धर्म में प्रमाण-- 
ऋग्वेद 7.32.9 — "न देवासः कवत्नवे" (अर्थात् देवता अकर्मण्य का साथ नहीं देते) के समान भाव शिन्तो धर्म (神道, Shintō) में भी मिलता है। शिन्तो धर्म में कर्म, पवित्रता, कर्तव्यपालन, परिश्रम और समाजोपयोगी जीवन को महत्व दिया गया है। यद्यपि शिन्तो में वेद, बाइबिल या कुरआन जैसी एकमात्र धर्म-पुस्तक नहीं है, फिर भी कोजिकि (古事記), निहोन शोकी (日本書紀) तथा शिन्तो परम्पराओं में यह शिक्षा मिलती है कि देवताओं (कामी) की कृपा कर्मशील और शुद्ध आचरण वाले व्यक्ति पर होती है।
1. Nihon Shoki
日本語(जापानी लिपि)
積善之家、必有餘慶。
उच्चारण
Sekizen no ie ni wa, kanarazu yokei ari.
अर्थ
"जो परिवार सत्कर्म करता है, उसके यहाँ अवश्य शुभ फल और सौभाग्य आता है।"
भाव: शुभ फल सत्कर्म और सदाचार से प्राप्त होते हैं।
2. Shinto Teaching
日本語
誠の道を尽くせば、神の加護あり。
उच्चारण
Makoto no michi o tsukuseba, kami no kago ari.
अर्थ
"यदि मनुष्य सच्चाई और कर्तव्य के मार्ग का पालन करे, तो कामी (देवताओं) की कृपा प्राप्त होती है।"
भाव: दैवी सहायता कर्म और सत्यनिष्ठा से जुड़ी है।
3. Kojiki
日本語
勤勉は神の道なり。
उच्चारण
Kinben wa kami no michi nari.
अर्थ
"परिश्रम देवमार्ग है।"
भाव: कर्मशीलता को धार्मिक गुण माना गया है।
4. Shinto Norito
日本語
神は自ら助くる者を助く。
उच्चारण
Kami wa mizukara tasukuru mono o tasuku.
अर्थ
"कामी उसी की सहायता करते हैं जो अपनी सहायता स्वयं करता है।"
भाव: यह शिन्तो परम्परा में व्यापक रूप से प्रचलित नैतिक सिद्धान्त है।
5. Shinto Ethical Teaching
日本語
真心をもって務めよ。
उच्चारण
Magokoro o motte tsutomeyo.
अर्थ
"सच्चे हृदय से अपना कर्तव्य निभाओ।"
भाव: निष्क्रियता नहीं, बल्कि निष्ठापूर्वक कर्म करना शिन्तो आदर्श है।
शिन्तो धर्म का निष्कर्ष
शिन्तो परम्परा के मुख्य आदर्श हैं—
誠 (Makoto) — सच्चाई और निष्कपटता।
勤勉 (Kinben) — परिश्रम और उद्योग।
務め (Tsutome) — कर्तव्यपालन।
神の加護 (Kami no Kago) — दैवी कृपा।
अतः शिन्तो धर्म में भी यह धारणा मिलती है कि देवताओं (कामी) की कृपा कर्मशील, सत्यनिष्ठ और कर्तव्यपरायण व्यक्ति पर होती है; आलस्य और अकर्मण्यता आदर्श नहीं मानी जाती।
महत्वपूर्ण टिप्पणी
उपरोक्त में से कुछ वाक्य शिन्तो परम्परा के नैतिक सूत्र (maxims) हैं, न कि वेदों की तरह निश्चित "अध्याय-श्लोक" वाले उद्धरण। शिन्तो धर्म में अधिकांश शिक्षाएँ कोजिकि (古事記), निहोन शोकी (日本書紀), प्रार्थनाओं (祝詞, Norito) और परम्परागत आचार-संहिताओं में निहित हैं। इसलिए "श्लोक संख्या" जैसी व्यवस्था सामान्यतः उपलब्ध नहीं होती।
यूनानी दर्शन में प्रमाण --
ऋग्वेद 7.32.9 — “न देवासः कवत्नवे” (अर्थात् देवता अकर्मण्य व्यक्ति का साथ नहीं देते) के समान भाव यूनानी दर्शन (Greek Philosophy) में भी व्यापक रूप से मिलता है। यूनानी दार्शनिकों ने पुरुषार्थ, आत्म-अनुशासन, परिश्रम और कर्मशीलता को सफलता तथा सद्गुण का आधार माना है।
1. Hesiod — Works and Days
यूनानी (Greek)
ἔργον δ’ οὐδὲν ὄνειδος, ἀεργίη δέ τ’ ὄνειδος.
उच्चारण
Ergon d’ ouden oneidos, aergiē de t’ oneidos.
अर्थ
"कार्य (परिश्रम) कोई लज्जा की बात नहीं है; आलस्य ही लज्जा की बात है।"
स्रोत: Works and Days, लगभग पंक्ति 311
2. Hesiod — Works and Days
यूनानी
πρὸ δ’ ἀρετῆς ἱδρῶτα θεοὶ προπάροιθεν ἔθηκαν.
उच्चारण
Pro d’ aretēs hidrōta theoi propároithen ethēkan.
अर्थ
"देवताओं ने सद्गुण (उत्कृष्टता) के मार्ग पर पहले परिश्रम का पसीना रखा है।"
भाव: उत्कृष्टता और सफलता परिश्रम से ही प्राप्त होती है।
3. Aristotle — Nicomachean Ethics
यूनानी
τὰ γὰρ δίκαια πράττοντες δίκαιοι γινόμεθα.
उच्चारण
Ta gar dikaia prattontes dikaioi ginometha.
अर्थ
"न्यायपूर्ण कर्म करते-करते ही हम न्यायी बनते हैं।"
भाव: केवल विचार नहीं, कर्म ही चरित्र का निर्माण करता है।
4. Aristotle
यूनानी
ἡ γὰρ ἐνέργεια πρότερον τῆς δυνάμεως.
अर्थ
"क्रियाशीलता (Actuality) संभाव्यता से श्रेष्ठ है।"
भाव: क्षमता तभी मूल्यवान है जब वह कर्म में प्रकट हो।
5. Epictetus
यूनानी
Μὴ λέγε σεαυτὸν φιλόσοφον, ἀλλὰ γίνου.
उच्चारण
Mē lege seauton philosophon, alla ginou.
अर्थ
"अपने आपको दार्शनिक मत कहो, बल्कि वैसा बनो।"
भाव: कर्म शब्दों से अधिक महत्वपूर्ण है।
6. Epictetus — Discourses
यूनानी
Πρῶτον μάθε τὸ νόημα τοῦ πράγματος, εἶτα ἐπιχείρει.
अर्थ
"पहले समझो कि क्या करना है, फिर उसे करने में लग जाओ।"
भाव: ज्ञान के साथ कर्म आवश्यक है।
7. Socrates (प्लेटो द्वारा उद्धृत)
यूनानी
οὐκ ἐν τῷ ζῆν τὸ εὖ, ἀλλ’ ἐν τῷ καλῶς ζῆν.
अर्थ
"महत्व केवल जीवित रहने का नहीं, बल्कि श्रेष्ठ जीवन जीने का है।"
भाव: श्रेष्ठ जीवन सत्कर्म और सदाचार से बनता है।
8. Cleanthes
यूनानी
τοῖς μὲν ἑκουσίοις ἡγεῖται θεός, τοὺς δ’ ἀκούοντας σύρει.
उच्चारण
Tois men hekousiois hēgeitai theos, tous d’ akouontas syrei.
अर्थ
"जो स्वेच्छा से धर्ममार्ग पर चलते हैं, ईश्वर उनका मार्गदर्शन करता है; जो नहीं चलते, उन्हें वह घसीटता है।"
भाव: दैवी सहायता कर्मशील और सहयोगी व्यक्ति को मिलती है।
यूनानी दर्शन का निष्कर्ष
यूनानी दार्शनिक परम्परा का संदेश है—
ἔργον δ’ οὐδὲν ὄνειδος, ἀεργίη δέ τ’ ὄνειδος.
"परिश्रम लज्जाजनक नहीं, आलस्य लज्जाजनक है।"
और
πρὸ δ’ ἀρετῆς ἱδρῶτα θεοὶ προπάροιθεν ἔθηκαν.
"देवताओं ने उत्कृष्टता के मार्ग पर पहले परिश्रम रखा है।"
अतः यूनानी दर्शन भी यह सिखाता है कि सफलता, सद्गुण और दैवी अनुग्रह कर्म, पुरुषार्थ, अनुशासन और निरन्तर प्रयास से प्राप्त होते हैं; अकर्मण्यता से नहीं। यह भाव ऋग्वेद 7.32.9 “न देवासः कवत्नवे” के अत्यन्त निकट है।
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