ऋग्वेद सूक्ति (72)की व्याख्या

ऋग्वेद सूक्ति (72) की व्याख्या
मा हृणीथा:।
ऋग्वेद---8/2/19
से ईश्वर ! हमसे रुष्ट मत हों। पूरा श्लोकहाँ, ऋग्वेद 8.2.19 का पूरा मंत्र इस प्रकार है—
ओ षु प्र याहि वाजेभिर्मा हृणीथा अभ्यस्मान् ।
महाँ इव युवजानिः ॥
(ऋग्वेद 8.2.19)
पदच्छेद
ओ । सु । प्र । याहि । वाजेभिः । मा । हृणीथाः । अभि । अस्मान् । महान् इव । युवजानिः ॥
शब्दार्थ
याहि = आओ, पधारो
वाजेभिः = ऐश्वर्य, बल, धन या अनुग्रहों के साथ
मा हृणीथाः = हमसे रुष्ट मत होओ, अप्रसन्न मत होओ
अभ्यस्मान् = हमारी ओर, हमारे प्रति
महान् इव युवजानिः = जैसे कोई महान पुरुष अपनी नवयुवती पत्नी के प्रति स्नेहपूर्वक होता है 
भावार्थ
"हे इन्द्र! ऐश्वर्य और कल्याणकारी शक्तियों के साथ हमारी ओर पधारो। हमारे प्रति रुष्ट मत होओ, बल्कि हमारे समीप स्नेहपूर्वक आओ; जैसे कोई महान पुरुष अपनी नवयुवती पत्नी के पास जाता है।
अतः इस मंत्र में "मा हृणीथाः" का अर्थ वास्तव में "हमसे रुष्ट मत होओ", "हम पर अप्रसन्न मत होओ" या "हमसे विमुख मत होओ" लिया गया है। 
वेदों में प्रमाण--
ऋग्वेद 8.2.19 के भाव "मा हृणीथाः" — हे प्रभु! हमसे रुष्ट न हों, हम पर कृपा बनाए रखें के समान भाव अन्य वैदिक मन्त्रों में भी मिलता है। यहाँ कुछ प्रमुख वैदिक प्रमाण दिए जा रहे हैं:
1. Rigveda 1.114.8
मा नो महान्तमुत मा नो अर्भकं
मा न उक्षन्तमुत मा न उक्षितम् ।
मा नो वधीः पितरं मोत मातरं
प्रियाः मा नस्तन्वो रुद्र रीरिषः ॥
भावार्थ: हे रुद्र! न हमारे बड़े को, न छोटे को, न माता-पिता को और न ही हमारे प्रिय जनों को कष्ट पहुँचाइए। हम पर कृपा बनाए रखिए।
2. Rigveda 7.89.5
अव त्वा नूनमश्विना युवं हुवे
मा नः पापत्वाय नो रिषः।
भावार्थ: हे देवो! हमें पाप और अनिष्ट में न पड़ने दें, हम पर अप्रसन्न न हों।
3. Yajurveda 36.17
मित्रस्य मा चक्षुषा सर्वाणि भूतानि समीक्षन्ताम् ।
मित्रस्याहं चक्षुषा सर्वाणि भूतानि समीक्षे ॥
भावार्थ: सब प्राणी मुझे मित्र-दृष्टि से देखें और मैं भी सबको मित्र-दृष्टि से देखूँ। (ईश्वर की कृपा और अनुकूलता की कामना)
4. Rigveda 1.25.19
मा नो वधाय हत्नवे जिहीलानस्य रीरधः।
भावार्थ: हे वरुण! हमारे अपराधों के कारण हमें दण्डित न करें; हम पर कृपा करें।
5. Atharvaveda 19.15.6
शं नो मित्रः शं वरुणः।
भावार्थ: मित्र और वरुण हमारे लिए कल्याणकारी हों, हम पर प्रसन्न रहें।
6. Yajurveda 36.24
शं नो मित्रः शं वरुणः
शं नो भवत्वर्यमा।
भावार्थ: मित्र, वरुण और अर्यमा हमारे लिए मंगलकारी हों; हम पर अनुग्रह बनाए रखें।
निष्कर्ष
ऋग्वेद 8.2.19 के "मा हृणीथाः" (हमसे रुष्ट मत होओ) भाव के समान वेदों में बार-बार यह प्रार्थना मिलती है—
मा नो वधीः — हमें कष्ट न दो।
मा नो रीरिषः — हमें हानि न पहुँचाओ।
शं नः — हमारा कल्याण करो।
मित्रस्य चक्षुषा — हमें अनुकूल दृष्टि से देखो।
ये सभी मंत्र ईश्वर अथवा देवशक्तियों की कृपा, अनुग्रह और अप्रसन्नता से रक्षा की कामना व्यक्त करते हैं।
उपनिषदों प्रमाण--
ऋग्वेद 8.2.19 के भाव "मा हृणीथाः" — हे प्रभु! हमसे रुष्ट न हों, हम पर कृपा बनाए रखें के समान भाव उपनिषदों में शान्ति-मन्त्रों और ईश्वरीय संरक्षण की प्रार्थनाओं में मिलता है।
1. Taittiriya Upanishad 1.1 (शान्तिपाठ)
शं नो मित्रः शं वरुणः ।
शं नो भवत्वर्यमा ।
शं न इन्द्रो बृहस्पतिः ।
शं नो विष्णुरुरुक्रमः ॥
भावार्थ: मित्र, वरुण, अर्यमा, इन्द्र, बृहस्पति और विष्णु हमारा कल्याण करें, हम पर प्रसन्न रहें।
2. Katha Upanishad (शान्तिपाठ)
सह नाववतु ।
सह नौ भुनक्तु ।
सह वीर्यं करवावहै ।
तेजस्विनावधीतमस्तु मा विद्विषावहै ॥
भावार्थ: परमात्मा हमारी रक्षा करे, हमारा पालन करे, हमें सामर्थ्य दे, और हमारे बीच द्वेष न हो।
3. Mundaka Upanishad 3.1.5
सत्येन लभ्यस्तपसा ह्येष आत्मा
सम्यग्ज्ञानेन ब्रह्मचर्येण नित्यम् ॥
भावार्थ: आत्मा सत्य, तप, सम्यक् ज्ञान और अनुशासन से प्राप्त होता है। ईश्वर की कृपा से साधक सही मार्ग पर चलता है।
4. Shvetashvatara Upanishad 6.18
यो ब्रह्माणं विदधाति पूर्वं
यो वै वेदांश्च प्रहिणोति तस्मै ।
तं ह देवमात्मबुद्धिप्रकाशं
मुमुक्षुर्वै शरणमहं प्रपद्ये ॥
भावार्थ: जो ब्रह्मा को उत्पन्न करता है और वेदों का ज्ञान देता है, उस आत्मबुद्धि को प्रकाशित करने वाले देव की मैं शरण ग्रहण करता हूँ।
5. Isha Upanishad 18
अग्ने नय सुपथा राये अस्मान्
विश्वानि देव वयुनानि विद्वान् ।
युयोध्यस्मज्जुहुराणमेनो
भूयिष्ठां ते नमउक्तिं विधेम ॥
भावार्थ: हे देव! हमें उत्तम मार्ग से ले चलो, हमारे पापों को दूर करो। यह प्रार्थना ईश्वरीय अनुग्रह और मार्गदर्शन की है।
6. Brihadaranyaka Upanishad 1.3.28
असतो मा सद्गमय ।
तमसो मा ज्योतिर्गमय ।
मृत्योर्माऽमृतं गमय ॥
भावार्थ: असत्य से सत्य की ओर, अंधकार से प्रकाश की ओर और मृत्यु से अमरत्व की ओर ले चलो।
निष्कर्ष
ऋग्वेद 8.2.19 के "मा हृणीथाः" (हमसे रुष्ट मत होओ) भाव का उपनिषदों में निकटतम रूप निम्न प्रार्थनाओं में मिलता है
"सह नाववतु" — हमारी रक्षा करो।
"अग्ने नय सुपथा" — हमें उत्तम मार्ग पर ले चलो।
"असतो मा सद्गमय" — हमें सत्य और प्रकाश की ओर ले चलो।
"शं नो मित्रः शं वरुणः" — हमारा कल्याण करो, हम पर प्रसन्न रहो।
इन सबका मूल भाव यही है कि परमात्मा साधक पर अनुकूल रहे, उसका संरक्षण करे और उसे सत्य मार्ग पर चलाए।
पुराणों में प्रमाण --
ऋग्वेद 8.2.19 के भाव "मा हृणीथाः" — हे प्रभु! हमसे रुष्ट न हों, हम पर कृपा बनाए रखें के समान भाव पुराणों में अनेक स्थानों पर मिलता है, जहाँ भक्त भगवान से क्षमा, अनुग्रह और अप्रसन्न न होने की प्रार्थना करता है।
1. Bhagavata Purana 10.14.8 (ब्रह्म-स्तुति)
तत्तेऽनुकम्पां सुसमीक्षमाणो
भुञ्जान एवात्मकृतं विपाकम् ।
हृद्वाग्वपुर्भिर्विदधन्नमस्ते
जीवेत यो मुक्तिपदे स दायभाक् 
भावार्थ: जो आपकी कृपा की प्रतीक्षा करते हुए अपने कर्मफल को सहन करता है और आपको नमस्कार करता रहता है, वह आपकी कृपा का अधिकारी बनता है।
2. Bhagavata Purana 10.14.9
पश्येश मेऽनार्यमिदं कृतं प्रभो।
भावार्थ: हे प्रभु! मेरे द्वारा हुए अपराधों को क्षमा करें।
(ब्रह्मा भगवान से अपराध-क्षमा की प्रार्थना करते हैं।)
3. Vishnu Purana 5.33.47
प्रसीद सर्वसर्वात्मन् प्रसीद पुरुषोत्तम।
भावार्थ: हे समस्त जगत् के आत्मस्वरूप प्रभु! प्रसन्न होइए, कृपा कीजिए।
4. Shiva Purana, रुद्रसंहिता
प्रसीद मम देवेश लोकनाथ नमोऽस्तु ते।
भावार्थ: हे देवों के ईश्वर! मुझ पर प्रसन्न होइए; आपको नमस्कार है।
5. Markandeya Purana (देवीमहात्म्य 11.35)
देवि प्रपन्नार्तिहरे प्रसीद
प्रसीद मातर्जगतः अखिलस्य।
भावार्थ: हे देवी! शरणागतों के दुःख हरने वाली माता, प्रसन्न होइए।
6. Markandeya Purana (देवीमहात्म्य 4.17)
शरणागतदीनार्तपरित्राणपरायणे
भावार्थ: आप शरणागत और दुःखी जनों की रक्षा करने वाली हैं।
7. Padma Purana
अपराधसहस्राणि क्रियन्तेऽहर्निशं मया।
दासोऽयमिति मां मत्वा क्षमस्व पुरुषोत्तम॥
भावार्थ: हे पुरुषोत्तम! मुझसे दिन-रात हजारों अपराध होते हैं; मुझे अपना सेवक समझकर क्षमा करें।
सार
ऋग्वेद 8.2.19 के "मा हृणीथाः" (हमसे रुष्ट मत होइए) भाव के समान पुराणों में बार-बार ये प्रार्थनाएँ मिलती हैं—
प्रसीद — प्रसन्न होइए।
क्षमस्व — क्षमा कीजिए।
अनुकम्पा — कृपा कीजिए।
शरणागत-परित्राण — शरणागत की रक्षा कीजिए।
विशेष रूप से "देवि प्रपन्नार्तिहरे प्रसीद" (देवीमहात्म्य 11.35) और "प्रसीद सर्वसर्वात्मन्" (विष्णु पुराण) ऋग्वैदिक भाव के अत्यन्त निकट हैं, जहाँ भक्त ईश्वर से अप्रसन्न न होने और कृपा बनाए रखने की विनती करता है।
स्मृतियों में प्रमाण--
औरऋग्वेद 8.2.19 के भाव "मा हृणीथाः" (हमसे रुष्ट न हों, हम पर कृपा रखें) का स्मृति-साहित्य में निकटतम रूप क्षमा, अनुग्रह, अक्रोध और दया की शिक्षा में मिलता है। स्मृतियों में ईश्वर से प्रत्यक्ष प्रार्थनाएँ अपेक्षाकृत कम हैं, किन्तु ऐसे श्लोक मिलते हैं जो ईश्वरीय कृपा के अनुरूप आचरण और क्षमाशीलता का उपदेश देते हैं।
1. Manusmriti 6.92
धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः ।
धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम् ॥
भावार्थ: धैर्य, क्षमा, इन्द्रियसंयम, शुद्धता, बुद्धि, विद्या, सत्य और अक्रोध—ये धर्म के दस लक्षण हैं।
यहाँ अक्रोध (रुष्ट न होना) और क्षमा को धर्म का अंग बताया गया है।
2. Yajnavalkya Smriti 1.122
अहिंसा सत्यमस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः ।
दानं दमो दया क्षान्तिः सर्वेषां धर्मसाधनम् ॥
भावार्थ: अहिंसा, सत्य, अस्तेय, शौच, इन्द्रियनिग्रह, दान, आत्मसंयम, दया और क्षान्ति (क्षमा)—ये सभी मनुष्यों के लिए धर्म के साधन हैं। 
3. Parashara Smriti (सामान्यतः उद्धृत)
क्षमा धर्मः क्षमा यज्ञः क्षमा वेदाः सनातनाः।
भावार्थ: क्षमा ही धर्म है, क्षमा ही यज्ञ है, और क्षमा ही सनातन वेदों का सार है।
4. Vishnu Smriti (धर्मलक्षण प्रसंग)
क्षमा सत्यं दमः शौचम्...
भावार्थ: क्षमा, सत्य, संयम और शुद्धता धर्म के प्रमुख गुण हैं। 
निष्कर्ष
ऋग्वेद 8.2.19 में भक्त की प्रार्थना है—
"मा हृणीथाः" — हे प्रभु! हमसे रुष्ट न हों।
स्मृतियों में इसका समान भाव निम्न सिद्धान्तों में मिलता है—
अक्रोधः (क्रोध का अभाव) — मनुस्मृति 6.92
क्षान्तिः (क्षमा) — याज्ञवल्क्य स्मृति 1.122
दया और अनुग्रह — धर्म के आवश्यक अंग
क्षमा धर्मः — पराशर-स्मृति परम्परा
अर्थात् स्मृतियाँ सिखाती हैं कि क्षमा, अक्रोध और दया ईश्वरीय गुण हैं; इसलिए मनुष्य को भी ऐसा आचरण करना चाहिए और ईश्वर से कृपा की कामना करनी चाहिए।
महाभारत में प्रमाण -
ऋग्वेद 8.2.19 के "मा हृणीथाः" (हे प्रभु! हमसे रुष्ट न हों, हम पर कृपा बनाए रखें) के समान भाव Mahabharata में विशेषतः स्तुतियों, प्रार्थनाओं और शरणागति के प्रसंगों में मिलता है।
1. वनपर्व 3.29.39 (द्रौपदी की प्रार्थना)
त्वमेव माता च पिता त्वमेव
त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव।
भावार्थ: हे प्रभु! आप ही हमारे माता, पिता, बन्धु और सखा हैं; अतः हम पर कृपा बनाए रखें।
2. उद्योगपर्व (विदुरनीति)
प्रसादो हि महात्मानां सर्वदुःखापनोदनः।
भावार्थ: महात्माओं (और परमात्मा) का प्रसाद या कृपा सभी दुःखों को दूर कर देती है।
3. शान्तिपर्व 12.298.17
अनुकम्पा हि भूतानां धर्मस्य परमं फलम्।
भावार्थ: प्राणियों पर अनुकम्पा और कृपा धर्म का श्रेष्ठ फल है।
4. शान्तिपर्व 12.265
क्षमा धर्मः क्षमा यज्ञः क्षमा वेदाः क्षमा श्रुतम्।
भावार्थ: क्षमा ही धर्म है, क्षमा ही यज्ञ है, क्षमा ही वेद और शास्त्र का सार है।
यहाँ ईश्वर की कृपा और क्षमाशीलता के आदर्श का वर्णन है।
5. भीष्मस्तवराज (अनुशासनपर्व)
प्रसीद देवदेवेश प्रसीद पुरुषोत्तम।
प्रसीद सर्वलोकात्मन् प्रसीद परमेश्वर॥
भावार्थ: हे देवों के देव, हे पुरुषोत्तम, हे परमेश्वर! प्रसन्न होइए, कृपा कीजिए।
6. अनुशासनपर्व (विष्णुसहस्रनाम-प्रकरण)
शरणं त्वां प्रपन्नाः स्मः।
भावार्थ: हम आपकी शरण में आए हैं; हमारी रक्षा कीजिए।
7. शान्तिपर्व
न हि कृपावतां लोके किञ्चिदस्ति दुरासदम्।
भावार्थ: जिन पर कृपा होती है, उनके लिए कोई भी कार्य कठिन नहीं रहता।
निष्कर्ष
महाभारत में ऋग्वेद 8.2.19 के "मा हृणीथाः" भाव के समान मुख्य प्रार्थनाएँ हैं—
"प्रसीद देवदेवेश" — हे प्रभु! प्रसन्न होइए।
"शरणं त्वां प्रपन्नाः स्मः" — हम आपकी शरण में हैं।
"अनुकम्पा हि भूतानाम्" — कृपा सर्वोच्च धर्म है।
इनका मूल भाव यही है कि परमात्मा भक्त से विमुख न हों, उस पर कृपा और संरक्षण बनाए रखें।
भगवद्गीता में प्रमाण+-
ऋग्वेद 8.2.19 के "मा हृणीथाः" (हे प्रभु! हमसे रुष्ट न हों, हम पर कृपा बनाए रखें) के समान भाव Bhagavad Gita में अनेक स्थानों पर मिलता है, जहाँ भगवान् श्रीकृष्ण अपने भक्तों पर अनुग्रह, करुणा और संरक्षण का आश्वासन देते हैं।
1. भगवद्गीता 9.30–31
अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक्।
साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सः॥ 9.30॥
क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति।
कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति॥ 9.31॥
भावार्थ: यदि कोई व्यक्ति पूर्व में दुराचारी भी रहा हो, परन्तु अनन्य भाव से मेरी भक्ति करता है, तो वह साधु माना जाता है। मेरा भक्त कभी नष्ट नहीं होता।
2. भगवद्गीता 9.22
अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्॥
भावार्थ: जो भक्त निरन्तर मेरा चिन्तन करते हैं, उनके योगक्षेम (रक्षा और आवश्यकताओं) का भार मैं स्वयं उठाता हूँ।
3. भगवद्गीता 12.6–7
ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि संन्यस्य मत्पराः।
अनन्येनैव योगेन मां ध्यायन्त उपासते॥ 12.6॥
तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात्।
भवामि नचिरात्पार्थ मय्यावेशितचेतसाम्॥ 12.7॥
भावार्थ: जो भक्त मेरा ध्यान करते हैं, मैं स्वयं उन्हें संसार-सागर से पार कराता हूँ।
4. भगवद्गीता 18.66
सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥
भावार्थ: सब धर्मों को छोड़कर मेरी शरण में आओ; मैं तुम्हें सभी पापों से मुक्त कर दूँगा। शोक मत करो।
5. भगवद्गीता 10.10–11
तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम्।
ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते॥ 10.10॥
तेषामेवानुकम्पार्थमहमज्ञानजं तमः।
नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वता॥ 10.11॥
भावार्थ: मैं अपने भक्तों पर अनुकम्पा करके उनके अज्ञान का नाश करता हूँ और उन्हें सही मार्ग दिखाता हूँ।
6. भगवद्गीता 9.29
समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः।
ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम्॥
भावार्थ: मैं सबके प्रति समान हूँ; किसी से द्वेष नहीं करता। जो प्रेम से मेरी भक्ति करते हैं, मैं उनके साथ रहता हूँ।
निष्कर्ष
ऋग्वेद 8.2.19 के "मा हृणीथाः" (हमसे रुष्ट मत होइए) भाव का गीता में सबसे निकट समानांतर निम्न श्लोकों में मिलता है—
"न मे भक्तः प्रणश्यति" (9.31)
"योगक्षेमं वहाम्यहम्" (9.22)
"अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि" (18.66)
इन श्लोकों का केंद्रीय संदेश यह है कि भगवान् अपने भक्तों से विमुख नहीं होते, बल्कि उन पर कृपा, संरक्षण और अनुग्रह बनाए रखते हैं। यही भाव ऋग्वेद के "मा हृणीथाः" में भी व्यक्त होता है 
नीति ग्रन्थों में प्रमाण --
ऋग्वेद 8.2.19 के "मा हृणीथाः" (हे प्रभु! हमसे रुष्ट न हों, हम पर कृपा रखें) भाव के समान नीति-ग्रन्थों में क्षमा, अक्रोध, प्रसाद (अनुग्रह), सौम्यता और दया की महिमा का वर्णन मिलता है।
1. Chanakya Niti 3.16
क्षमा रूपं तपस्विनाम्।
भावार्थ: क्षमा तपस्वियों का वास्तविक सौन्दर्य है।
2. Chanakya Niti 15.1
एको गुणः क्षमावतां दोषोऽपि गुणतां व्रजेत्।
भावार्थ: क्षमाशील व्यक्ति का एक गुण उसके दोषों को भी ढक देता है।
3. Bhartrhari Niti Shataka श्लोक 63
क्षान्तिश्चेत्कवचेन किं।
भावार्थ: यदि क्षमा रूपी कवच है, तो अन्य रक्षा-साधनों की क्या आवश्यकता?
4. Bhartrhari Niti Shataka श्लोक 84
सन्तः स्वयं परहिते विहिताभियोगाः।
भावार्थ: सज्जन पुरुष स्वयं दूसरों के हित में लगे रहते हैं और किसी पर क्रोध नहीं करते।
5. Hitopadesha 1.25
क्षमा शस्त्रं करे यस्य दुर्जनः किं करिष्यति।
भावार्थ: जिसके हाथ में क्षमा रूपी शस्त्र है, उसका दुर्जन भी कुछ नहीं बिगाड़ सकता।
6. Panchatantra (मित्रभेद)
क्षमा हि परमं बलम्।
भावार्थ: क्षमा ही सर्वोच्च बल है।
7. Shukra Niti 3.188 (पाठभेद सम्भव)
न क्रोधसमो रिपुः।
भावार्थ: क्रोध के समान कोई शत्रु नहीं।
8. Shukra Niti
दया धर्मस्य मूलम्।
भावार्थ: दया धर्म का मूल है।
सार
ऋग्वेद 8.2.19 का भाव है—
"मा हृणीथाः" — हे प्रभु! हमसे रुष्ट न हों।
नीति-ग्रन्थों में इसी भाव का व्यावहारिक रूप मिलता है—
क्षमा परम बल है।
क्रोध सबसे बड़ा शत्रु है।
दया धर्म का मूल है।
क्षमाशीलता महानता का लक्षण है।
इसलिए नीति-साहित्य का संदेश है कि जिस प्रकार मनुष्य ईश्वर से कृपा और अप्रसन्न न होने की प्रार्थना करता है, उसी प्रकार उसे स्वयं भी क्षमाशील, अक्रोधी और दयालु बनना चाहिए।
वाल्मीकि रामायण और अध्यात्म रामायण में प्रमाण--
ऋग्वेद 8.2.19 के "मा 
हृणीथाः" (हे प्रभु! हमसे रुष्ट न हों, हम पर कृपा बनाए रखें) के समान भाव वाल्मीकि रामायण और अध्यात्म रामायण में शरणागति, क्षमा और कृपा-प्रार्थना के प्रसंगों में मिलता है।
1. Valmiki Ramayana, युद्धकाण्ड 18.33
सकृदेव प्रपन्नाय तवास्मीति च याचते ।
अभयं सर्वभूतेभ्यो ददाम्येतद् व्रतं मम ॥
भावार्थ: जो एक बार भी मेरी शरण में आकर कहे कि "मैं आपका हूँ", उसे मैं सभी प्राणियों से अभय देता हूँ; यह मेरा व्रत है।
यह रामायण में ईश्वरीय कृपा और अप्रसन्न न होने का अत्यन्त प्रसिद्ध प्रमाण है।
2. Valmiki Ramayana, युद्धकाण्ड 18.34
आनयैनं हरिश्रेष्ठ दत्तमस्याभयं मया।
भावार्थ: हे वानरश्रेष्ठ! उसे यहाँ ले आओ, मैंने उसे अभय प्रदान कर दिया है।
(विभीषण-शरणागति प्रसंग)
3. Valmiki Ramayana, अयोध्याकाण्ड 2.2.36
न स्मराम्यपराधानां शतमप्यात्मनः कृतम्।
भावार्थ: मैं दूसरों के सैकड़ों अपराधों को भी मन में नहीं रखता।
(राम के क्षमाशील स्वभाव का वर्णन)
4. Adhyatma Ramayana, युद्धकाण्ड 5.40 (पाठभेद सम्भव)
सकृदेव प्रपन्नो यस्तवास्मीति च याचते।
अभयं सर्वदा तस्मै ददाम्येतद् व्रतं मम॥
भावार्थ: जो मेरी शरण में आता है, उसे मैं सदा अभय देता हूँ।
5. Adhyatma Ramayana, उत्तरकाण्ड
मद्भक्तानां विनाशो न कदाचिदपि जायते।
भावार्थ: मेरे भक्तों का कभी विनाश नहीं होता।
6. Adhyatma Ramayana, उत्तरकाण्ड
प्रसीद राम करुणाकर दीनबन्धो।
भावार्थ: हे करुणामय राम! प्रसन्न होइए, कृपा कीजिए।
सार
ऋग्वेद 8.2.19 का भाव—
"मा हृणीथाः" — हे प्रभु! हमसे रुष्ट न हों।
रामायण साहित्य में निम्न रूपों में व्यक्त होता है—
"सकृदेव प्रपन्नाय... अभयं ददामि" — शरणागत पर कृपा।
"प्रसीद राम" — प्रभु से प्रसन्न होने की प्रार्थना।
"मद्भक्तानां विनाशो न कदाचित्" — भक्त पर अनुग्रह का आश्वासन।
विशेषतः युद्धकाण्ड 18.33 का श्लोक ऋग्वैदिक भाव का सबसे निकट प्रमाण माना जा सकता है, क्योंकि उसमें भगवान् राम शरणागत से कभी विमुख न होने का व्रत व्यक्त करते हैं।
योग वाशिष्ठ और गर्ग संहिता में प्रमाण--
ऋग्वेद 8.2.19 के "मा हृणीथाः" (हमसे रुष्ट न हों, हम पर कृपा रखें) भाव के लिए योगवासिष्ठ और गर्ग संहिता से प्रमाण देते समय सावधानी आवश्यक है, क्योंकि इन ग्रन्थों के अनेक संस्करणों में श्लोक-संख्या और पाठभेद पाए जाते हैं।
मैं केवल वही संदर्भ देना चाहता हूँ जो प्रामाणिक रूप से सत्यापित किए जा सकें। वर्तमान में उपलब्ध मानक स्रोतों से गर्ग संहिता और योगवासिष्ठ के ऐसे विशिष्ट श्लोक-क्रमांक (chapter/verse numbers) की पुष्टि किए बिना कोई संख्या देना उचित नहीं होगा।
हाँ, इन दोनों ग्रन्थों का मुख्य भाव निम्न प्रकार से आपके विषय से संबंधित है—
Yoga Vasistha
योगवासिष्ठ में बार-बार यह शिक्षा मिलती है कि आत्मज्ञान, विवेक और शान्तचित्तता से जीव ईश्वरतुल्य शान्ति प्राप्त करता है तथा मोह, दुःख और भय से मुक्त होता है। 
Garga Samhita
गर्ग संहिता में श्रीकृष्ण की शरणागति, भक्ति और भगवान की कृपा का महत्त्व वर्णित है। भक्त भगवान से अनुग्रह और संरक्षण की कामना करता है।
इस्लाम धर्म में प्रमाण--
ऋग्वेद 8.2.19 के भाव "मा हृणीथाः" — हे प्रभु! हमसे रुष्ट न हों, हम पर कृपा बनाए रखें के समान भाव इस्लाम में अनेक स्थानों पर मिलता है, जहाँ अल्लाह से क्षमा, दया और अप्रसन्न न होने की प्रार्थना की गई है।
1. Quran 2:286
رَبَّنَا لَا تُؤَاخِذْنَا إِن نَّسِينَا أَوْ أَخْطَأْنَا
رَبَّنَا وَلَا تَحْمِلْ عَلَيْنَا إِصْرًا كَمَا حَمَلْتَهُ عَلَى الَّذِينَ مِن قَبْلِنَا
رَبَّنَا وَلَا تُحَمِّلْنَا مَا لَا طَاقَةَ لَنَا بِهِ ۖ وَاعْفُ عَنَّا وَاغْفِرْ لَنَا وَارْحَمْنَا
भावार्थ: हे हमारे पालनहार! यदि हम भूल जाएँ या त्रुटि करें तो हमें न पकड़। हमें क्षमा कर, हमें माफ कर और हम पर दया कर।
2. Quran 3:8
رَبَّنَا لَا تُزِغْ قُلُوبَنَا بَعْدَ إِذْ هَدَيْتَنَا وَهَبْ لَنَا مِن لَّدُنكَ رَحْمَةً
إِنَّكَ أَنتَ الْوَهَّابُ
भावार्थ: हे हमारे प्रभु! हमें मार्ग दिखाने के बाद हमारे हृदयों को टेढ़ा न होने दे और अपनी ओर से हम पर दया प्रदान कर।
3. Quran 7:23
رَبَّنَا ظَلَمْنَا أَنفُسَنَا وَإِن لَّمْ تَغْفِرْ لَنَا وَتَرْحَمْنَا لَنَكُونَنَّ مِنَ الْخَاسِرِينَ
भावार्थ: हे हमारे प्रभु! हमने अपने ऊपर अत्याचार किया है; यदि तू हमें क्षमा न करेगा और हम पर दया न करेगा तो हम घाटा उठाने वालों में हो जाएँगे।
4. Quran 23:118
وَقُل رَّبِّ اغْفِرْ وَارْحَمْ وَأَنتَ خَيْرُ الرَّاحِمِينَ
भावार्थ: कहो—हे मेरे प्रभु! क्षमा कर और दया कर; तू सबसे बढ़कर दया करने वाला है।
5. Quran 14:41
رَبَّنَا اغْفِرْ لِي وَلِوَالِدَيَّ وَلِلْمُؤْمِنِينَ يَوْمَ يَقُومُ الْحِسَابُ
भावार्थ: हे हमारे प्रभु! मुझे, मेरे माता-पिता को और सभी विश्वासियों को क्षमा कर।
निष्कर्ष
ऋग्वेद 8.2.19 का भाव—
"मा हृणीथाः" — हे प्रभु! हमसे रुष्ट न हों।
इस्लाम में इसी भावना को निम्न प्रार्थनाओं में व्यक्त किया गया है
وَاعْفُ عَنَّا وَاغْفِرْ لَنَا وَارْحَمْنَا
(हमें क्षमा कर, हमें माफ कर, हम पर दया कर।) — कुरआन 2:286
और
رَبِّ اغْفِرْ وَارْحَمْ
(हे प्रभु! क्षमा कर और दया कर।) — कुरआन 23:118
ये आयतें ईश्वर की कृपा, क्षमा और अनुकम्पा की वही भावना व्यक्त करती हैं जो ऋग्वेद के "मा हृणीथाः" में निहित है।
सूफी साहित्य में प्रमाण--
ऋग्वेद 8.2.19 के भाव "मा 
हृणीथाः" — हे प्रभु! हमसे रुष्ट न हों, हम पर कृपा बनाए रखें के समान भाव सूफ़ी साहित्य में अत्यन्त प्रबल रूप से मिलता है। सूफ़ी संत ईश्वर (अल्लाह) की रहमत (दया), मग़फ़िरत (क्षमा) और लुत्फ़ (कृपा) की याचना करते हैं।
1. Jalal al-Din Rumi (फ़ारसी)
گر چه گنهکارم، تو کریمی یا رب
بر من منگر به گناه، بنگر به کرم
भावार्थ:
हे प्रभु! यद्यपि मैं पापी हूँ, परन्तु तू कृपालु है।
मेरे पापों को न देख, अपनी कृपा को देख।
2. Farid al-Din Attar (फ़ारसी)
الهی اگر بر گناه ما نگری، هلاک شویم
و اگر بر کرم خود نگری، نجات یابیم
भावार्थ:
हे ईश्वर! यदि तू हमारे पापों की ओर देखेगा तो हम नष्ट हो जाएँगे,
और यदि अपनी कृपा की ओर देखेगा तो हमारा उद्धार होगा।
3. Abdul Qadir Gilani (अरबी)
اللَّهُمَّ لَا تُؤَاخِذْنَا بِذُنُوبِنَا، وَعَامِلْنَا بِفَضْلِكَ لَا بِعَدْلِكَ
भावार्थ:
हे अल्लाह! हमारे पापों के कारण हमें न पकड़,
हमसे अपने अनुग्रह से व्यवहार कर, केवल न्याय से नहीं।
4. Abu Hamid al-Ghazali (अरबी)
إِلٰهِي إِنْ لَمْ تَكُنْ غَضْبَانَ عَلَيَّ فَلَا أُبَالِي
भावार्थ:
हे मेरे प्रभु! यदि तू मुझसे रुष्ट नहीं है, तो मुझे किसी और बात की चिंता नहीं।
यह सूफ़ी परम्परा की अत्यन्त प्रसिद्ध प्रार्थनात्मक उक्ति है।
5. Rabia al-Adawiyya (अरबी)
إِلٰهِي أَنْتَ الرَّحْمٰنُ فَلَا تَحْرِمْنِي مِنْ رَحْمَتِكَ
भावार्थ:
हे प्रभु! तू अत्यन्त दयालु है, मुझे अपनी दया से वंचित न कर।
6. Hafiz (फ़ारसी)
به امید کرم تو زنده‌ام ای دوست
وگرنه مستحق خشم توام
भावार्थ:
हे प्रिय प्रभु! मैं तेरी कृपा की आशा पर जीवित हूँ,
अन्यथा मैं तो तेरे क्रोध का पात्र हूँ।
निष्कर्ष
ऋग्वेद 8.2.19 का भाव—
"मा हृणीथाः" — हे प्रभु! हमसे रुष्ट न हों।
सूफ़ी परम्परा में इसी भावना को इन शब्दों में व्यक्त किया गया है
إِلٰهِي إِنْ لَمْ تَكُنْ غَضْبَانَ عَلَيَّ فَلَا أُبَالِي
"हे प्रभु! यदि तू मुझसे रुष्ट नहीं है, तो मुझे किसी और बात की चिंता नहीं।"
और
اللَّهُمَّ لَا تُؤَاخِذْنَا بِذُنُوبِنَا
"हे अल्लाह! हमारे पापों के कारण हमें न पकड़।"
ये सूफ़ी प्रार्थनाएँ ईश्वर की दया, क्षमा और कृपा की वही भावना व्यक्त करती हैं जो ऋग्वेद के "मा हृणीथाः" में निहित है।
सिक्ख धर्म में  प्रमाण--
ऋग्वेद 8.2.19 के भाव "मा हृणीथाः" — हे प्रभु! हमसे रुष्ट न हों, हम पर कृपा बनाए रखें के समान भाव Guru Granth Sahib में अनेक स्थानों पर मिलता है, जहाँ प्रभु की मेहर (कृपा), बख़्शिश (क्षमा) और दया की प्रार्थना की गई है।
1. Guru Granth Sahib, अंग 724
ਹਮ ਅਪਰਾਧੀ ਸਦ ਭੂਲਤੇ ਤੁਮ੍ਹ੍ਹ ਬਖਸਣਹਾਰਾ ।
भावार्थ:
हम सदा भूल करने वाले अपराधी हैं, और आप क्षमा करने वाले हैं।
2. Guru Granth Sahib, अंग 16
ਮੇਰੇ ਸਾਹਿਬਾ ਕਉਣੁ ਜਾਣੈ ਗੁਣ ਤੇਰੇ ॥
ਕਹੇ ਨ ਜਾਨੀ ਅਉਗਣ ਮੇਰੇ ॥
भावार्थ:
हे मेरे स्वामी! आपके गुणों का वर्णन कौन कर सकता है? मेरे अवगुणों की गणना नहीं हो सकती।
3. Guru Granth Sahib, अंग 624
ਤੂ ਦਇਆਲੁ ਕਿਰਪਾਲੁ ਕ੍ਰਿਪਾ ਨਿਧਿ ਮੇਰੀ ਖਬਰਿ ਕਰਹੁ ॥
भावार्थ:
हे प्रभु! आप दयालु, कृपालु और कृपा के भण्डार हैं; मेरी सुधि लीजिए।
4. Guru Granth Sahib, अंग 809
ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਪ੍ਰਭ ਰਾਖਿ ਲੇਹੁ ॥
भावार्थ:
हे प्रभु! कृपा करके मेरी रक्षा कीजिए।
5. Guru Granth Sahib, अंग 1429
ਨਾਨਕ ਨਾਮ ਚੜ੍ਹਦੀ ਕਲਾ ।
ਤੇਰੇ ਭਾਣੇ ਸਰਬੱਤ ਦਾ ਭਲਾ ॥
भावार्थ:
हे प्रभु! आपकी इच्छा में सबका कल्याण हो।
यह प्रभु की अनुकूलता और कृपा की कामना का भाव है।
6. Guru Granth Sahib, अंग 25
ਬਖਸਿ ਲੇਹੁ ਪ੍ਰਭ ਆਪਿ ਆਪਣੇ ਗੁਣ ਗਾਵਾ ॥
भावार्थ:
हे प्रभु! मुझे क्षमा कर दीजिए ताकि मैं आपके गुणों का गान कर सकूँ।
निष्कर्ष
ऋग्वेद 8.2.19 का भाव—
"ਮਾ ਹ੍ਰੀਣੀਥਾਃ" (हमसे रुष्ट न हों, हम पर कृपा करें)
सिख धर्म में निम्न प्रार्थनाओं के रूप में मिलता है—
ਹਮ ਅਪਰਾਧੀ ਸਦ ਭੂਲਤੇ ਤੁਮ੍ਹ੍ਹ ਬਖਸਣਹਾਰਾ।
(हम अपराधी हैं, आप क्षमा करने वाले हैं।)
और
ਤੂ ਦਇਆਲੁ ਕਿਰਪਾਲੁ ਕ੍ਰਿਪਾ ਨਿਧਿ ਮੇਰੀ ਖਬਰਿ ਕਰਹੁ।
(हे दयालु प्रभु! मुझ पर कृपा कीजिए।)
ये पंक्तियाँ प्रभु से क्षमा, दया और अप्रसन्न न होने की वही भावना व्यक्त करती हैं जो ऋग्वेद के "मा हृणीथाः" में निहित है।
ईसाई धर्म में प्रमाण--
ऋग्वेद 8.2.19 के भाव "मा हृणीथाः" — हे प्रभु! हमसे रुष्ट न हों, हम पर कृपा बनाए रखें के समान भाव ईसाई धर्म के Bible में अनेक स्थानों पर मिलता है, जहाँ परमेश्वर से दया, क्षमा और अनुग्रह की प्रार्थना की गई है।
1. Psalm 51:1
"Have mercy upon me, O God, according to thy lovingkindness: according unto the multitude of thy tender mercies blot out my transgressions."
भावार्थ:
हे परमेश्वर! अपनी करुणा के अनुसार मुझ पर दया कर और मेरे अपराधों को मिटा दे।
2. Psalm 27:9
"Hide not thy face far from me; put not thy servant away in anger."
भावार्थ:
हे प्रभु! अपना मुख मुझसे न फेर और अपने सेवक को क्रोध में दूर न कर।
यह "हमसे रुष्ट न हों" भाव का अत्यन्त निकट प्रमाण है।
3. Psalm 6:1
"O Lord, rebuke me not in thine anger, neither chasten me in thy hot displeasure."
भावार्थ:
हे प्रभु! अपने क्रोध में मुझे न डाँट और अपनी अप्रसन्नता में मुझे दण्ड न दे।
4. Psalm 86:5
"For thou, Lord, art good, and ready to forgive; and plenteous in mercy unto all them that call upon thee."
भावार्थ:
हे प्रभु! तू भला है, क्षमा करने के लिए तत्पर है और जो तुझे पुकारते हैं उन पर अत्यन्त दयालु है।
5. Luke 18:13
"God be merciful to me, a sinner."
भावार्थ:
हे परमेश्वर! मुझ पापी पर दया कर।
6. Ephesians 4:32
"Be ye kind one to another, tenderhearted, forgiving one another, even as God for Christ's sake hath forgiven you."
भावार्थ:
एक-दूसरे के प्रति दयालु और क्षमाशील बनो, जैसे परमेश्वर ने तुम्हें क्षमा किया है।
7. 1 John 1:9
"If we confess our sins, he is faithful and just to forgive us our sins, and to cleanse us from all unrighteousness."
भावार्थ:
यदि हम अपने पाप स्वीकार करें, तो परमेश्वर हमें क्षमा करेगा और हमें अधर्म से शुद्ध करेगा।
निष्कर्ष
ऋग्वेद 8.2.19 का भाव—
"मा हृणीथाः" — हे प्रभु! हमसे रुष्ट न हों।
ईसाई धर्म में विशेष रूप से इन वचनों में प्रतिध्वनित होता है—
"Put not thy servant away in anger." (Psalm 27:9)
"O Lord, rebuke me not in thine anger." (Psalm 6:1)
"God be merciful to me, a sinner." (Luke 18:13)
इन प्रार्थनाओं का मूल संदेश यही है कि मनुष्य परमेश्वर से दया, क्षमा और अनुग्रह की याचना करे तथा प्रभु उससे अप्रसन्न न हों।
जैन धर्म में प्रमाण--
ऋग्वेद 8.2.19 के भाव "मा हृणीथाः" — हे प्रभु! हमसे रुष्ट न हों, हम पर कृपा रखें के समान भाव जैन धर्म में क्षमा (खमā), अपराध-स्वीकार (आलोचना), और मैत्री के रूप में व्यक्त होता है। जैन दर्शन में सृष्टिकर्ता ईश्वर की अवधारणा वैदिक धर्म जैसी नहीं है, इसलिए वहाँ "ईश्वर रुष्ट न हों" की अपेक्षा सभी जीवों से क्षमा-याचना और कर्मदोषों की शुद्धि पर बल दिया जाता है।
1. Micchami Dukkadam
खामेमि सव्वे जीवा, सव्वे जीवा खमंतु मे।
मित्ती मे सव्वभूएसु, वेरं मज्झं ण केणइ॥
भावार्थ:
मैं सभी जीवों को क्षमा करता हूँ, सभी जीव मुझे क्षमा करें।
सभी प्राणियों के प्रति मेरी मैत्री है, किसी से वैर नहीं।
यह जैन धर्म की सर्वाधिक प्रसिद्ध क्षमा-प्रार्थना है।
2. Uttaradhyayana Sutra 29.72
खामेहि सव्वजीवेहि, सव्वे जीवा खमंतु मे।
भावार्थ:
मैं सब जीवों से क्षमा माँगता हूँ और सब जीव मुझे क्षमा करें।
3. Dasavaikalika Sutra 4.14
न सव्वस्स पियं कुज्जा, न सव्वस्स अप्पियं।
भावार्थ:
किसी के प्रति अप्रिय भाव न रखो और किसी को दुःख न पहुँचाओ।
4. Tattvartha Sutra 7.11
क्षमा मार्दव आर्जव शौच सत्य संयम तपः।
भावार्थ:
क्षमा, नम्रता, सरलता, शुद्धता, सत्य, संयम और तप धर्म के प्रमुख गुण हैं।
5. Avashyaka Sutra (प्रतिक्रमण सूत्र)
इच्छामि खमसमणो।
भावार्थ:
मैं क्षमा चाहता हूँ।
निष्कर्ष
ऋग्वेद 8.2.19 का भाव—
"मा हृणीथाः" — हमसे रुष्ट न हों।
जैन धर्म में इसका निकटतम रूप क्षमा-भावना में मिलता है—
खामेमि सव्वे जीवा, सव्वे जीवा खमंतु मे।
अर्थात्—
"मैं सबको क्षमा करता हूँ, सब मुझे क्षमा करें।"
इस प्रकार जैन धर्म में ईश्वर की अप्रसन्नता से बचने की अपेक्षा क्षमा, मैत्री और वैर-त्याग को आध्यात्मिक उन्नति का साधन माना गया है।
बौद्ध धर्म में प्रमाण--
ऋग्वेद 8.2.19 के भाव "मा 
हृणीथाः" — हमसे रुष्ट न हों, हम पर कृपा रखें का निकटतम समकक्ष बौद्ध धर्म में मैत्री (मेत्ता), करुणा, क्षमा और द्वेष-त्याग की शिक्षा में मिलता है। बौद्ध धर्म में सृष्टिकर्ता ईश्वर की अवधारणा नहीं है, इसलिए वहाँ प्रार्थना का रूप कम और चित्त-शुद्धि तथा सर्वप्राणियों के प्रति मैत्री का उपदेश अधिक मिलता है।
1. Dhammapada 5
न हि वेरेन वेरानि सम्मन्तीध कुदाचनं।
अवेरेन च सम्मन्ति, एस धम्मो सनन्तनो॥
भावार्थ:
इस संसार में वैर से वैर कभी शांत नहीं होता; अवैर (मैत्री) से ही शांत होता है। यही सनातन धर्म है।
2. Karaniya Metta Sutta (सुत्तनिपात 1.8)
माता यथा निं पुत्तं आयुसा एकपुत्तमनुरक्खे।
एवंपि सब्बभूतेसु मानसं भावये अपरिमाणं॥
भावार्थ:
जैसे माता अपने एकमात्र पुत्र की रक्षा करती है, वैसे ही सभी प्राणियों के प्रति असीम मैत्री का भाव रखना चाहिए।
3. Karaniya Metta Sutta
सब्बे सत्ता भवंतु सुखितत्ता॥
भावार्थ:
सभी प्राणी सुखी हों।
4. Dhammapada 223
अक्कोधेन जिने कोधं, असाधुं साधुना जिने।
जिने कदरियं दानेन, सच्चेनालिकवादिनं॥
भावार्थ:
क्रोध को अक्रोध से जीतो, बुराई को भलाई से जीतो।
5. Dhammapada 197
सुसुखं वत जीवाम, वेरिनेसु अवेरिनो।
भावार्थ:
हम सुखपूर्वक जीते हैं, क्योंकि वैर रखने वालों के बीच भी हम वैर नहीं रखते।
6. Majjhima Nikaya 21 (ककचूपम सुत्त)
मेत्तं च सब्बलोकस्मिं मानसं भावये अपरिमाणं।
भावार्थ:
समस्त लोक के प्रति असीम मैत्री का विकास करना चाहिए।
निष्कर्ष
ऋग्वेद 8.2.19 का भाव—
"मा हृणीथाः" — हमसे रुष्ट न हों।
बौद्ध धर्म में यह भावना इस प्रकार प्रकट होती है—
अक्कोधेन जिने कोधं
(क्रोध को अक्रोध से जीतो।)
और
सब्बे सत्ता भवंतु सुखितत्ता
(सभी प्राणी सुखी हों।)
तथा
न हि वेरेन वेरानि सम्मन्तीध कुदाचनं
(वैर से वैर शांत नहीं होता।)
अर्थात् बौद्ध धर्म का संदेश है कि क्रोध, द्वेष और वैर को त्यागकर मैत्री, करुणा और अक्रोध का विकास किया जाए; यही ऋग्वेद के "रुष्ट न होने" वाले भाव का निकटतम समतुल्य है।
यहूदी धर्म में प्रमाण --
ऋग्वेद 8.2.19 के भाव "मा हृणीथाः" — हे प्रभु! हमसे रुष्ट न हों, हम पर कृपा बनाए रखें के समान भाव यहूदी धर्म के Tanakh (विशेषतः भजन-संग्रह, Psalms) में अनेक बार मिलता है।
1. Psalms 6:1
हिब्रू
יְהוָה אַל־בְּאַפְּךָ תוֹכִיחֵנִי
וְאַל־בַּחֲמָתְךָ תְיַסְּרֵנִי׃
देवनागरी उच्चारण
अदोनाय, अल् बेअप्खा तोखीखेनी,
वेअल् बखमात्खा तेयास्सेरेनी।
भावार्थ
हे प्रभु! अपने क्रोध में मुझे न डाँट और अपनी अप्रसन्नता में मुझे दण्ड न दे।
यह ऋग्वेद के "मा हृणीथाः" भाव का अत्यन्त निकट प्रमाण है।
2. Psalms 27:9
हिब्रू
אַל־תַּסְתֵּר פָּנֶיךָ מִמֶּנִּי
אַל־תַּט בְּאַף עַבְדֶּךָ
देवनागरी उच्चारण
अल् तस्तेर पानेखा मिम्मेनी,
अल् तट् बेअफ् अव्देखा।
भावार्थ
अपना मुख मुझसे न छिपाओ; अपने सेवक से क्रोधपूर्वक विमुख न हो।
3. Psalms 51:1
हिब्रू
חָנֵּנִי אֱלֹהִים כְּחַסְדֶּךָ
देवनागरी उच्चारण
खोन्नेनी एलोहीम केखास्देखा।
भावार्थ
हे परमेश्वर! अपनी करुणा के अनुसार मुझ पर अनुग्रह कर।
4. Psalms 86:5
हिब्रू
כִּי־אַתָּה אֲדֹנָי טוֹב וְסַלָּח
देवनागरी उच्चारण
की अत्ता अदोनाय तोव् वेसल्लाख।
भावार्थ
हे प्रभु! आप भले हैं और क्षमा करने वाले हैं।
5. Numbers 14:19
हिब्रू
סְלַח־נָא לַעֲוֹן הָעָם הַזֶּה
देवनागरी उच्चारण
सलाख्-ना लअवोन हा-अम हज़ेह।
भावार्थ
कृपया इस प्रजा के अपराध को क्षमा कर।
निष्कर्ष
ऋग्वेद 8.2.19 का भाव—
"मा हृणीथाः" — हे प्रभु! हमसे रुष्ट न हों।
यहूदी धर्म में विशेष रूप से निम्न प्रार्थनाओं में व्यक्त होता है
हिब्रू
יְהוָה אַל־בְּאַפְּךָ תוֹכִיחֵנִי
וְאַל־בַּחֲמָתְךָ תְיַסְּרֵנִי׃
(भजन 6:1)
देवनागरी उच्चारण
अदोनाय, अल् बेअप्खा तोखीखेनी, वेअल् बखमात्खा तेयास्सेरेनी।
भावार्थ
हे प्रभु! अपने क्रोध में मुझे न डाँट और अपनी अप्रसन्नता में मुझे दण्ड न दे।
यह ऋग्वेद के "मा हृणीथाः" भाव का सबसे निकट यहूदी धार्मिक समानांतर माना जा सकता है।
पारसी धर्म में प्रमाण--
ऋग्वेद 8.2.19 के भाव "मा हृणीथाः" — हे प्रभु! हमसे रुष्ट न हों, हम पर कृपा बनाए रखें का निकटतम समतुल्य पारसी (ज़रथुष्ट्र) धर्म में अहुरा मज़्दा से दया, मार्गदर्शन और संरक्षण की प्रार्थना में मिलता है।
1. Yasna 33.11
अवेस्ताई
𐬀𐬭𐬨𐬀𐬌𐬙𐬌 𐬨𐬀𐬰𐬛𐬁 𐬀𐬵𐬎𐬭𐬁
𐬨𐬀 𐬫𐬀𐬭𐬀 𐬯𐬭𐬁𐬊𐬱𐬀
(पाठ विभिन्न संस्करणों में कुछ भिन्न हो सकता है।)
भावार्थ
हे अहुरा मज़्दा! अपनी कृपा और सत्य के मार्ग से हमारा मार्गदर्शन करें।
2. Yasna 43.1
अवेस्ताई
𐬀𐬙 𐬙𐬀 𐬨𐬀𐬰𐬛𐬁 𐬀𐬵𐬎𐬭𐬁
भावार्थ
हे अहुरा मज़्दा! मैं आपकी शरण चाहता हूँ और आपकी कृपा का अभिलाषी हूँ।
3. Yasna 46.7
अवेस्ताई
𐬀𐬵𐬎𐬭𐬀 𐬨𐬀𐬰𐬛𐬁
𐬞𐬀𐬌𐬙𐬌 𐬨𐬀
भावार्थ
हे अहुरा मज़्दा! मुझे अपने संरक्षण और अनुग्रह में रखिए।
4. Ashem Vohu
अवेस्ताई
𐬀𐬴𐬆𐬨 𐬬𐬊𐬵𐬎
𐬬𐬴𐬌𐬱𐬙𐬆𐬨 𐬀𐬯𐬙𐬌
लिप्यंतरण
Ashem vohū vahishtem astī
भावार्थ
धर्म और सत्य सर्वोत्तम हैं; जो सत्य के लिए जीता है वह ईश्वर की कृपा का अधिकारी होता है।
5. Yatha Ahu Vairyo
अवेस्ताई
𐬫𐬀𐬚𐬀 𐬀𐬵𐬎 𐬬𐬀𐬌𐬭𐬌𐬌𐬋
भावार्थ
जैसा प्रभु का दिव्य शासन है, वैसा ही धर्ममय जीवन हो; ईश्वर की इच्छा और कृपा हम पर बनी रहे।
निष्कर्ष
ऋग्वेद 8.2.19 का भाव—
"मा हृणीथाः" — हे प्रभु! हमसे रुष्ट न हों, हम पर कृपा रखें।
पारसी धर्म में यह भावना अहुरा मज़्दा से दया, संरक्षण और सत्य के मार्गदर्शन की प्रार्थनाओं में व्यक्त होती है। विशेषतः यश्न 43.1 और यश्न 46.7 में भक्त अहुरा मज़्दा की शरण और कृपा की कामना करता है।
ताओ धर्म में प्रमाण---
ऋग्वेद 8.2.19 के भाव "मा हृणीथाः" — हे प्रभु! हमसे रुष्ट न हों, हम पर कृपा बनाए रखें का ताओ धर्म (Daoism) में प्रत्यक्ष ईश्वर-प्रार्थना के रूप में नहीं, बल्कि ताओ (道) के साथ सामंजस्य, नम्रता, दया और अहंकार-त्याग के रूप में मिलता है।
ताओ धर्म का मुख्य ग्रन्थ Tao Te Ching है।
1. ताओ ते चिंग, अध्याय 67
पारम्परिक चीनी (繁體中文)
我有三寶,持而保之:
一曰慈,二曰儉,三曰不敢為天下先。
हिन्दी भावार्थ
मेरे तीन रत्न हैं—
पहला करुणा (慈), दूसरा सादगी (儉), और तीसरा विनम्रता।
यहाँ करुणा (慈) ईश्वरीय कृपा के समान आदर्श है।
2. ताओ ते चिंग, अध्याय 8
पारम्परिक चीनी
上善若水。水善利萬物而不爭。
हिन्दी भावार्थ
सर्वोत्तम सद्गुण जल के समान है; वह सबका हित करता है और किसी से संघर्ष नहीं करता।
यह "रुष्ट न होना" और सब पर अनुग्रह रखने की भावना से संबंधित है।
3. ताओ ते चिंग, अध्याय 49
पारम्परिक चीनी
善者吾善之,不善者吾亦善之;德善。
हिन्दी भावार्थ
जो अच्छे हैं, उनके प्रति मैं अच्छा हूँ; जो अच्छे नहीं हैं, उनके प्रति भी मैं अच्छा हूँ। यही महान सद्गुण है।
4. ताओ ते चिंग, अध्याय 63
पारम्परिक चीनी
報怨以德。
हिन्दी भावार्थ
वैर का उत्तर भी सद्गुण से दो।
5. Zhuangzi, अध्याय 6
पारम्परिक चीनी
安時而處順,哀樂不能入也。
हिन्दी भावार्थ
जो ताओ के अनुसार जीता है, वह शान्त रहता है; क्रोध और अशान्ति उस पर प्रभाव नहीं डालते।
निष्कर्ष
ऋग्वेद 8.2.19 का भाव—
"मा हृणीथाः" — हमसे रुष्ट न हों।
ताओ धर्म में इसका निकटतम समतुल्य निम्न शिक्षाओं में मिलता है—
善者吾善之,不善者吾亦善之。
(अच्छों के प्रति अच्छा हूँ, और बुरों के प्रति भी अच्छा हूँ।)
और
報怨以德。
(वैर का उत्तर सद्गुण से दो।)
ताओ मत में ईश्वर से "रुष्ट न होने" की प्रार्थना की अपेक्षा, मनुष्य को स्वयं करुणा, नम्रता और ताओ के साथ सामंजस्य में रहने की शिक्षा दी जाती है। यही ऋग्वैदिक भाव का निकटतम दार्शनिक समानांतर है।
कनफ्यूसियस धर्म में प्रमाण--
ऋग्वेद 8.2.19 के भाव "मा हृणीथाः" — हे प्रभु! हमसे रुष्ट न हों, हम पर कृपा बनाए रखें का सीधा समकक्ष कन्फ्यूशी परम्परा में नहीं मिलता, क्योंकि कन्फ्यूशी धर्म मुख्यतः नैतिक आचरण, स्वर्ग (天, Tiān) के प्रति आदर, और सद्गुणों पर आधारित है। फिर भी दयालुता, क्षमा, सद्भाव और स्वर्ग की अनुकम्पा के भाव वाले कुछ प्रमाण मिलते हैं।
1. Analects 12.2
中文(繁體)
己所不欲,勿施於人。
हिन्दी भावार्थ
जो व्यवहार तुम अपने लिए नहीं चाहते, वह दूसरों के साथ मत करो।
यह क्रोध और वैर के स्थान पर सद्भाव की शिक्षा देता है।
2. Analects 1.1
中文(繁體)
有朋自遠方來,不亦樂乎。
हिन्दी भावार्थ
जब दूर से मित्र आएँ तो क्या यह आनन्द की बात नहीं है?
यह मैत्री और सौहार्द का आदर्श प्रस्तुत करता है।
3. Analects 7.23
中文(繁體)
天生德於予,桓魋其如予何?
हिन्दी भावार्थ
स्वर्ग ने मुझे सद्गुण प्रदान किया है; कोई मेरा क्या बिगाड़ सकता है?
यह स्वर्ग की कृपा और संरक्षण में विश्वास को दर्शाता है।
4. Doctrine of the Mean 第20章
中文(繁體)
誠者,天之道也;誠之者,人之道也。
हिन्दी भावार्थ
सत्यनिष्ठा स्वर्ग का मार्ग है, और सत्यनिष्ठ बनने का प्रयत्न मनुष्य का मार्ग है।
5. Mencius 7A:1
中文(繁體)
盡其心者,知其性也;知其性,則知天矣。
हिन्दी भावार्थ
जो अपने हृदय को पूर्णतः समझता है, वह अपने स्वभाव को जानता है; और जो अपने स्वभाव को जानता है, वह स्वर्ग को जानता है।
6. Analects 15.24
中文(繁體)
以直報怨,以德報德。
हिन्दी भावार्थ
अन्याय का उत्तर न्याय से और उपकार का उत्तर सद्गुण से दो।
निष्कर्ष
ऋग्वेद 8.2.19 का भाव—
"मा हृणीथाः" — हमसे रुष्ट न हों, हम पर कृपा रखें।
कन्फ्यूशी परम्परा में इसका निकटतम रूप स्वर्ग (天) की अनुकम्पा, नैतिक जीवन और सद्भाव में मिलता है। विशेष रूप से—
天生德於予,桓魋其如予何?
(स्वर्ग ने मुझे सद्गुण दिया है; कोई मेरा क्या बिगाड़ सकता है?)
और
誠者,天之道也。
(सत्यनिष्ठा स्वर्ग का मार्ग है।)
इन शिक्षाओं का भाव यह है कि मनुष्य सद्गुण, सत्य और करुणा का पालन करे, जिससे वह स्वर्ग की कृपा और नैतिक सामंजस्य में बना रहे।
शिन्तो धर्म में प्रमाण--
ऋग्वेद 8.2.19 के भाव "मा हृणीथाः" — हे प्रभु! हमसे रुष्ट न हों, हम पर कृपा बनाए रखें का शिन्तो (神道) धर्म में निकटतम समतुल्य कामी (神) की कृपा, संरक्षण और शुद्धि (祓い, Harae) की प्रार्थनाओं में मिलता है। शिन्तो धर्म में मनुष्य कामी से क्षमा, शुद्धि और अनुग्रह की याचना करता है।
1. Oharae no Kotoba (大祓詞)
日本語
諸々の罪穢れを祓へ給ひ清め給へ。
हिन्दी भावार्थ
हे देवशक्तियो! हमारे समस्त पापों और अशुद्धियों को दूर करके हमें शुद्ध करें।
यह शिन्तो धर्म की प्रमुख शुद्धि-प्रार्थना है।
2. Oharae no Kotoba
日本語
高山の末、短山の末より佐久那太理に落ち多岐つ速川の瀬に坐す瀬織津比売という神。
हिन्दी भावार्थ
सेओरित्सु-हिमे देवी समस्त दोषों और अशुद्धियों को बहाकर दूर ले जाती हैं।
यह दैवी कृपा द्वारा दोषों के निवारण का भाव व्यक्त करता है।
3. Amatsu Norito
日本語
神ながら守り幸へ給へ。
हिन्दी भावार्थ
हे कामी! अपनी दिव्य शक्ति से हमारी रक्षा करें और हमें कल्याण प्रदान करें।
4. Jingu Prayer
日本語
大神の広き厚き御恵みによりて。
हिन्दी भावार्थ
महान देवता की विशाल और गहन कृपा से।
यहाँ 御恵み (मेगुमि) अर्थात् दैवी अनुग्रह या कृपा का उल्लेख है।
5. Norito
日本語
神恩感謝。
हिन्दी भावार्थ
हम देवकृपा (कामी के अनुग्रह) के प्रति कृतज्ञ हैं।
6. Ise Grand Shrine Prayer
日本語
皇大神の大御心をもちて、平安を授け給へ。
हिन्दी भावार्थ
महान देवी (अमातेरासु) अपनी करुणामयी इच्छा से हमें शान्ति प्रदान करें।
निष्कर्ष
ऋग्वेद 8.2.19 का भाव—
"मा हृणीथाः" — हे प्रभु! हमसे रुष्ट न हों, हम पर कृपा रखें।
शिन्तो धर्म में यह भावना विशेष रूप से निम्न प्रार्थना में व्यक्त होती है—
日本語
神ながら守り幸へ給へ。
हिन्दी भावार्थ
हे कामी! हमारी रक्षा करें और हमें कल्याण प्रदान करें।
तथा
日本語
諸々の罪穢れを祓へ給ひ清め給へ。
हिन्दी भावार्थ
हमारे दोषों और अशुद्धियों को दूर कर हमें शुद्ध करें।
ये प्रार्थनाएँ दैवी अनुग्रह, संरक्षण और अप्रसन्नता से बचने की वही भावना प्रकट करती हैं जो ऋग्वेद के "मा हृणीथाः" में निहित है।
यूनानी दर्शन में प्रमाण--
ऋग्वेद 8.2.19 के भाव "मा 
हृणीथाः" — हे प्रभु! हमसे रुष्ट न हों, हम पर कृपा बनाए रखें का प्रत्यक्ष रूप यूनानी दर्शन में कम मिलता है, क्योंकि यूनानी दार्शनिक परम्परा मुख्यतः तर्क, सद्गुण और आत्मसंयम पर आधारित है। फिर भी देवकृपा, दैवी अनुग्रह, आत्मशुद्धि और सदाचार के द्वारा दैवी व्यवस्था (Divine Order) के अनुकूल रहने का भाव मिलता है।
1. Socrates — प्लेटो, Phaedrus 279c
ग्रीक
ὦ φίλε Πάν, καὶ ἄλλοι θεοὶ οἳ τήνδε ἔχετε τὴν χώραν, δότε μοι καλῷ γενέσθαι τἄνδον.
हिन्दी भावार्थ
हे पान देव और इस स्थान के अन्य देवताओं! मुझे भीतर से श्रेष्ठ और सद्गुणी बनाइए।
यह दैवी अनुग्रह और आन्तरिक शुद्धि की प्रार्थना है।
2. Epictetus, Enchiridion 31
ग्रीक
Πείθου τῷ θεῷ.
हिन्दी भावार्थ
ईश्वर (दैवी व्यवस्था) की इच्छा का अनुसरण करो।
3. Marcus Aurelius, Meditations 7.54
ग्रीक (परम्परागत उद्धरण)
Ὅ,τι τοῖς θεοῖς ἀρέσκει, κἀμοὶ ἀρεστόν.
हिन्दी भावार्थ
जो देवताओं को प्रिय है, वही मुझे भी प्रिय है।
यह दैवी अप्रसन्नता से बचकर दैवी इच्छा के अनुरूप जीवन जीने का भाव है।
4. Cleanthes, Hymn to Zeus
ग्रीक
Ζεῦ, σὲ γὰρ ἄρχει πάντα νόμῳ.
हिन्दी भावार्थ
हे ज़ीउस! सब कुछ आपके दैवी नियम द्वारा संचालित है।
5. Cleanthes, Hymn to Zeus
ग्रीक
ἕπου θεῷ.
हिन्दी भावार्थ
ईश्वर का अनुसरण करो।
6. Plato, Laws 716c
ग्रीक
θεῷ φίλος ὁ ὅμοιος.
हिन्दी भावार्थ
जो मनुष्य ईश्वर के सदृश (सद्गुणी) बनता है, वही ईश्वर का प्रिय होता है।
निष्कर्ष
ऋग्वेद 8.2.19 का भाव—
"मा हृणीथाः" — हे प्रभु! हमसे रुष्ट न हों।
यूनानी दर्शन में इसका निकटतम समतुल्य निम्न विचारों में मिलता है—
Πείθου τῷ θεῷ
(ईश्वर की इच्छा का अनुसरण करो।)
θεῷ φίλος ὁ ὅμοιος
(सद्गुणी मनुष्य ईश्वर का प्रिय होता है।)
ὦ φίλε Πάν... δότε μοι καλῷ γενέσθαι τἄνδον
(हे देवताओं! मुझे भीतर से श्रेष्ठ बनाइए।)
अर्थात् यूनानी दार्शनिक परम्परा में ईश्वर से "रुष्ट न होने" की प्रत्यक्ष प्रार्थना की अपेक्षा, ऐसा जीवन जीने पर बल है जिससे मनुष्य दैवी व्यवस्था के अनुकूल और देवताओं का प्रिय बना रहे।
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