ऋग्वेद सूक्ति (71) की व्याख्या

ऋग्वेद सूक्ति (71) की व्याख्या
बृहस्पते अति यदर्यो अराति:
ऋगुवेद--2/23/1
भावार्थ--हे ईश्वर ! हमें श्रेष्ठ बुद्धि प्रदान करें।
आपने जो मंत्र उद्धृत किया है—
बृहस्पते अति यदर्यो अरातिर्द्युमद्विभाति क्रतुमज्जनेषु
यद्दीदयच्छवस ऋतप्रजात तदस्मासु द्रविणं धेहि चित्रम् ॥ — ऋग्वेद 2.23.1
का सामान्य अर्थ वास्तव में बृहस्पति (ब्रह्मणस्पति) से उत्तम बुद्धि, प्रेरणा, शक्ति और कल्याणकारी संपदा की प्रार्थना है।
पदानुसार अर्थ
बृहस्पते — हे बृहस्पति (प्रार्थना, ज्ञान और वाणी के अधिष्ठाता)!
अति यत् अर्यः अरातिः — जो शत्रुता, दरिद्रता या बाधाओं को दूर करते हैं।
द्युमत् विभाति — जो तेजस्वी होकर प्रकाशित होते हैं।
क्रतुमत् जनेषु — बुद्धिमान और कर्मशील लोगों में प्रेरणा देते हैं।
तत् अस्मासु द्रविणं धेहि चित्रम् — वह विविध कल्याण, ज्ञान और ऐश्वर्य हमें प्रदान करें।
भावार्थ
हे बृहस्पति (परमेश्वर के ज्ञानमय स्वरूप)! आप अज्ञान, दुष्प्रवृत्तियों और बाधाओं को दूर करने वाले हैं। जैसे आप बुद्धिमानों में श्रेष्ठ विवेक और कर्मशक्ति का प्रकाश करते हैं, वैसे ही हमें भी उत्तम बुद्धि, विवेक, ज्ञान, सद्कर्म की प्रेरणा तथा कल्याणकारी संपदा प्रदान करें।
इसलिए दिया हुआ भावार्थ—"हे ईश्वर! हमें श्रेष्ठ बुद्धि प्रदान करें।"—मंत्र के मूल आशय के अनुरूप एक संक्षिप्त और सारगर्भित भावार्थ है, यद्यपि मंत्र में केवल बुद्धि ही नहीं, बल्कि ज्ञान, प्रेरणा, शक्ति और समृद्धि की भी प्रार्थना निहित है।
वेदों में प्रमाण--
यदि विषय है "हे ईश्वर! हमें श्रेष्ठ
बुद्धि प्रदान करें", तो वेदों में इसके समर्थन में निम्न प्रमुख प्रमाण मिलते हैं:
1. ऋग्वेद 3.62.10 (गायत्री मंत्र)
तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि ।
धियो यो नः प्रचोदयात् ॥
भावार्थ: हम उस परम दिव्य तेज का ध्यान करते हैं; वह हमारी बुद्धियों को प्रेरित और प्रकाशित करे।
2. ऋग्वेद 1.89.1
आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतः
भावार्थ: हमारे पास सब ओर से कल्याणकारी विचार और उत्तम संकल्प आएँ।
3. ऋग्वेद 10.191.2
संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम् ।
भावार्थ: मिलकर चलो, मिलकर विचार करो, और तुम्हारे मन उत्तम ज्ञान में एक हों।
4. अथर्ववेद 19.9.2
मेधां मे वरुणो ददातु मेधामग्निः प्रजापतिः ।
मेधामिन्द्रश्च वायुश्च मेधां धाता ददातु मे ॥
भावार्थ: मुझे मेधा (उत्तम बुद्धि, स्मरणशक्ति और विवेक) प्राप्त हो।
5. यजुर्वेद 32.14
यां मेधां देवगणाःपितरश्चोपासते 
तया मामद्य मेधया अग्ने मेधाविनं कुरु ॥
भावार्थ: हे अग्ने! मुझे उस श्रेष्ठ मेधा से युक्त कर जिससे मैं मेधावी बनूँ।
6. ऋग्वेद 1.3.12
महो अर्णः सरस्वती प्र चेतयति केतुना ।
धियो विश्वा विराजति ॥
भावार्थ: सरस्वती (ज्ञानशक्ति) हमारी सभी बुद्धियों को प्रकाशित करती है।
7. अथर्ववेद 7.12.1
सुमतिं मेधाṃ च मे देहि। (भावार्थगत प्रार्थना)
भावार्थ: मुझे शुभ बुद्धि और मेधा प्रदान हो।
इन वैदिक मंत्रों से सिद्ध होता है कि सद्बुद्धि (धी), मेधा, प्रज्ञा, विवेक और कल्याणकारी विचारों की प्राप्ति वेदों की एक प्रमुख प्रार्थना है। इसलिए ऋग्वेद 2.23.1 का भावार्थ — "हे ईश्वर! हमें श्रेष्ठ बुद्धि प्रदान करें" — वैदिक साहित्य के व्यापक संदेश के अनुरूप है।"हे ईश्वर! हमें श्रेष्ठ बुद्धि प्रदान करें" — इस भाव के समर्थन में उपनिषदों में अनेक स्थानों पर ज्ञान, विवेक, मेधा और आत्मबोध की प्रार्थना की गई है।
1. कठोपनिषद् 1.2.23
नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन ।
यमेवैष वृणुते तेन लभ्यः तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूं स्वाम् ॥
भावार्थ: आत्मा केवल वाद-विवाद या श्रवण से नहीं मिलता; ईश्वर की कृपा और योग्य विवेक से उसका ज्ञान प्राप्त होता है।
2. कठोपनिषद् 1.3.14
उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत ।
भावार्थ: उठो, जागो और श्रेष्ठ आचार्यों से ज्ञान प्राप्त करके बुद्धिमान बनो।
3. मुण्डकोपनिषद् 1.2.12
तद्विज्ञानार्थं स गुरुमेवाभिगच्छेत्
समित्पाणिः श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठम् 
भावार्थ: परम ज्ञान की प्राप्ति के लिए मनुष्य को ज्ञानी गुरु के पास जाना चाहिए।
4. तैत्तिरीयोपनिषद् (शिक्षावल्ली)
सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु ।
सह वीर्यं करवावहै ।
तेजस्विनावधीतमस्तु मा विद्विषावहै ॥
भावार्थ: ईश्वर हमारी रक्षा करे, हमें सामर्थ्य दे, और हमारा अध्ययन तेजस्वी (ज्ञानयुक्त) हो।
5. बृहदारण्यकोपनिषद् 1.3.28
असतो मा सद्गमय ।
तमसो मा ज्योतिर्गमय ।
मृत्योर्माऽमृतं गमय ॥
भावार्थ: मुझे असत्य से सत्य की ओर, अज्ञानरूपी अंधकार से ज्ञानरूपी प्रकाश की ओर ले चल।
6. ईशोपनिषद् 18
अग्ने नय सुपथा राये अस्मान्
विश्वानि देव वयुनानि विद्वान् ।
भावार्थ: हे प्रभु! हमें उत्तम मार्ग पर ले चलो और हमारे दोषों को दूर करो।
7. केनोपनिषद् 2.4
प्रतिबोधविदितं मतम् अमृतत्वं हि विन्दते ।
भावार्थ: जो प्रत्येक बोध में सत्य को पहचानता है, वही अमृतत्व (परम ज्ञान) प्राप्त करता है।
इन उपनिषदिक मंत्रों का सार यही है कि मनुष्य ईश्वर से मेधा, विवेक, ज्ञान, आत्मबोध और सद्मार्ग की प्रेरणा प्राप्त करे। इसलिए ऋग्वेद 2.23.1 के भावार्थ "हे ईश्वर! हमें श्रेष्ठ बुद्धि प्रदान करें" का उपनिषदों में भी पर्याप्त समर्थन है।
 पुराणों में प्रमाण--
ऋग्वेद 2.23.1 के भाव "हे ईश्वर! हमें श्रेष्ठ बुद्धि प्रदान करें" के समर्थन में पुराणों में भी ज्ञान, विवेक, मेधा और सद्बुद्धि की महिमा का वर्णन मिलता है।
1. Bhagavata Purana 1.2.17
शृण्वतां स्वकथाः कृष्णः पुण्यश्रवणकीर्तनः ।
हृद्यन्तःस्थो ह्यभद्राणि विधुनोति सुहृत्सताम् ॥
भावार्थ: भगवान् भक्तों के हृदय में स्थित होकर उनके अज्ञान और दोषों को दूर करते हैं, जिससे शुद्ध बुद्धि का उदय होता है।
2. Bhagavata Purana 1.2.18
नष्टप्रायेष्वभद्रेषु नित्यं भागवतसेवया ।
भगवत्युत्तमश्लोके भक्तिर्भवति नैष्ठिकी ॥
भावार्थ: सत्संग और भगवद्भक्ति से चित्त शुद्ध होता है और विवेक जागृत होता है।
3. Vishnu Purana 1.19
ज्ञानं विशुद्धममलं...
भावार्थ: भगवान विष्णु विशुद्ध ज्ञानस्वरूप हैं; उन्हीं से ज्ञान और विवेक की प्राप्ति होती है।
4. Markandeya Purana (देवी माहात्म्य 5.16)
या देवी सर्वभूतेषु बुद्धिरूपेण संस्थिता ।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥
भावार्थ: जो देवी समस्त प्राणियों में बुद्धिरूप से स्थित हैं, उन्हें बारम्बार नमस्कार।
5. Devi Bhagavata Purana
सर्वविद्यास्वरूपां तां सर्वज्ञानप्रदायिनीम्।
भावार्थ: देवी समस्त विद्याओं की स्वरूप और ज्ञान प्रदान करने वाली हैं।
6. Shiva Purana
ज्ञानं मोक्षप्रदं प्रोक्तम्।
भावार्थ: ज्ञान ही मोक्ष प्रदान करने वाला कहा गया है।
7. Bhagavata Purana 11.19.38
ज्ञानं परं गुह्यं मे...
भावार्थ: परम ज्ञान मनुष्य के कल्याण का सर्वोच्च साधन है।
सार
पुराणों में बार-बार यह शिक्षा मिलती है कि—
बुद्धि (बुद्धिरूपेण संस्थिता)
ज्ञान (ज्ञानं विशुद्धम्) मेधा और विवेक ,अज्ञान का नाश
ईश्वरीय कृपा, भक्ति, सत्संग और आत्मचिन्तन से प्राप्त होते हैं। इसलिए ऋग्वेद 2.23.1 के भाव "हे ईश्वर! हमें श्रेष्ठ बुद्धि प्रदान करें" का समर्थन पुराण साहित्य में भी व्यापक रूप से
मिलता है।
भगवद्गीता में प्रमाण-- 
ऋग्वेद 2.23.1 के भाव "हे ईश्वर! हमें श्रेष्ठ बुद्धि प्रदान करें" के समर्थन में Bhagavad Gita में अनेक स्पष्ट प्रमाण मिलते हैं।
1. भगवद्गीता 10.10
तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम् ।
ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते ॥
भावार्थ: जो भक्त प्रेमपूर्वक मेरी उपासना करते हैं, उन्हें मैं बुद्धियोग प्रदान करता हूँ, जिससे वे मुझे प्राप्त करते हैं।
यह "श्रेष्ठ बुद्धि प्रदान करने" का सबसे प्रत्यक्ष गीता-प्रमाण है।
2. भगवद्गीता 10.11
तेषामेवानुकम्पार्थमहमज्ञानजं तमः ।
नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वता ॥
भावार्थ: उन पर अनुकम्पा करके मैं उनके अज्ञानरूपी अंधकार का ज्ञानरूपी दीपक से नाश करता हूँ।
3. भगवद्गीता 15.15
सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टो
मत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च ।
भावार्थ: मैं सबके हृदय में स्थित हूँ; मुझसे ही स्मृति, ज्ञान और विवेक प्राप्त होते हैं।
4. भगवद्गीता 18.30
प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च कार्याकार्ये भयाभये ।
बन्धं मोक्षं च या वेत्ति बुद्धिः सा पार्थ सात्त्विकी ॥
भावार्थ: जो बुद्धि कर्तव्य-अकर्तव्य, बन्धन-मोक्ष तथा उचित-अनुचित का यथार्थ ज्ञान कराती है, वही सात्त्विक बुद्धि है।
5. भगवद्गीता 2.41
व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरुनन्दन ।
भावार्थ: आध्यात्मिक मार्ग में निश्चयात्मक और एकाग्र बुद्धि आवश्यक है।
6. भगवद्गीता 2.50
बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते ।
भावार्थ: बुद्धियोग से युक्त मनुष्य पाप और पुण्य दोनों के बन्धनों से ऊपर उठ जाता है।
7. भगवद्गीता 4.39
श्रद्धावान् लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः ।
ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति ॥
भावार्थ: श्रद्धावान और संयमी व्यक्ति ज्ञान प्राप्त करता है, और ज्ञान प्राप्त करके परम शान्ति को प्राप्त होता है।
निष्कर्ष
ऋग्वेद 2.23.1 की प्रार्थना "हे ईश्वर! हमें श्रेष्ठ बुद्धि प्रदान करें" का गीता में सबसे निकट और स्पष्ट समानांतर श्लोक है—
"ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते" (गीता 10.10)
अर्थात् "मैं उन्हें वह बुद्धियोग प्रदान करता हूँ जिससे वे परम सत्य को प्राप्त करते हैं।"
इसके साथ गीता 10.11, 15.15, 18.30 आदि श्लोक भी बताते हैं कि ज्ञान, स्मृति, विवेक और सात्त्विक बुद्धि परमात्मा की कृपा से प्राप्त होते हैं।
महाभारत में प्रमाण--
ऋग्वेद 2.23.1 के भाव "हे ईश्वर! हमें श्रेष्ठ बुद्धि प्रदान करें" के समर्थन में Mahabharata में भी अनेक स्थानों पर बुद्धि, विवेक, प्रज्ञा और धर्मबोध की महिमा वर्णित है।
1. उद्योगपर्व
नास्ति बुद्धिसमं चक्षुः।
भावार्थ: बुद्धि के समान कोई नेत्र नहीं है।
अर्थात् मनुष्य को सही मार्ग दिखाने वाली सबसे बड़ी शक्ति बुद्धि है।
2. शान्तिपर्व
बुद्धिः कर्मानुसारिणी।
भावार्थ: बुद्धि ही मनुष्य के कर्मों को दिशा देती है।
3. शान्तिपर्व
प्रज्ञा प्रतिष्ठा भूतानाम्।
भावार्थ: प्रज्ञा (उच्च बुद्धि) ही प्राणियों की वास्तविक प्रतिष्ठा और आधार है।
4. वनपर्व (यक्ष-प्रश्न)
कः पन्थाः?
युधिष्ठिर का उत्तर:
महाजनो येन गतः स पन्थाः।
भावार्थ: महान् और विवेकी पुरुष जिस मार्ग पर चले हैं, वही श्रेष्ठ मार्ग है।
यह उत्तर धर्मबुद्धि और विवेक के महत्व को दर्शाता है।
5. शान्तिपर्व
धर्मेण बुद्धिः वर्धते।
भावार्थ: धर्माचरण से बुद्धि का विकास होता है।
6. विदुरनीति (उद्योगपर्व)
यस्य नास्ति स्वयं प्रज्ञा शास्त्रं तस्य करोति किम्।
लोचनाभ्यां विहीनस्य दर्पणः किं करिष्यति॥
भावार्थ: जिस व्यक्ति में स्वयं विवेक नहीं है, उसके लिए शास्त्र भी क्या कर सकते हैं? जैसे अन्धे के लिए दर्पण व्यर्थ है।
7. विदुरनीति
बुद्धिः श्रेष्ठा हि भूतानाम्।
भावार्थ: समस्त गुणों में बुद्धि सर्वोत्तम है।
8. शान्तिपर्व
प्रज्ञया मानवं दुःखादुद्धरेत्।
भावार्थ: मनुष्य प्रज्ञा (विवेकपूर्ण बुद्धि) के द्वारा दुःखों से ऊपर उठ सकता है।
सार
महाभारत का संदेश है कि—
बुद्धि सबसे बड़ा नेत्र है (नास्ति बुद्धिसमं चक्षुः)
प्रज्ञा मनुष्य का वास्तविक धन है
धर्म से बुद्धि विकसित होती है
विवेक के बिना शास्त्रज्ञान भी निष्फल हो सकता है
प्रज्ञा दुःख से मुक्ति का साधन है। अतः ऋग्वेद 2.23.1 के भाव "हे ईश्वर! हमें श्रेष्ठ बुद्धि प्रदान करें" का समर्थन महाभारत में बुद्धि, प्रज्ञा और धर्मयुक्त विवेक की महिमा के रूप में व्यापक रूप से मिलता है।
स्मृतियों में प्रमाण--
ऋग्वेद 2.23.1 के भाव "हे ईश्वर! हमें श्रेष्ठ बुद्धि प्रदान करें" के समर्थन में स्मृति-ग्रन्थों में भी बुद्धि, प्रज्ञा, विवेक और ज्ञान की महिमा का वर्णन मिलता है।
1. Manusmriti 2.12
वेदः स्मृतिः सदाचारः स्वस्य च प्रियमात्मनः ।
एतच्चतुर्विधं प्राहुः साक्षाद्धर्मस्य लक्षणम् ॥
भावार्थ: धर्म का निर्णय वेद, स्मृति, सदाचार और शुद्ध अन्तःकरण से होता है। यहाँ शुद्ध विवेक और बुद्धि का महत्व स्वीकार किया गया है।
2. Manusmriti 2.224
बुद्धिवृद्धिकराण्याशु धन्यानि च हितानि च।
भावार्थ: मनुष्य को ऐसे कार्य करने चाहिए जो बुद्धि की वृद्धि करने वाले, कल्याणकारी और हितकारी हों।
3. Yajnavalkya Smriti 1.3
श्रुतिः स्मृतिः सदाचारः स्वस्य च प्रियमात्मनः।
सम्यक्संकल्पजः कामो धर्ममूलमिदं स्मृतम्॥
भावार्थ: धर्म का आधार शास्त्र और सम्यक् संकल्प (सद्बुद्धि) है।
4. Yajnavalkya Smriti
विद्या प्रज्ञां यशो लक्ष्मीं बलमारोग्यमेव च।
भावार्थ: विद्या से प्रज्ञा, यश, समृद्धि और बल की प्राप्ति होती है।
5. Parashara Smriti
ज्ञानं हि परमं बलम्।
भावार्थ: ज्ञान ही सर्वोच्च बल है।
6. Narada Smriti
प्रज्ञया सर्वकार्याणि सिद्ध्यन्ति।
भावार्थ: प्रज्ञा (विवेकपूर्ण बुद्धि) से सभी कार्य सफल होते हैं।
7. Manusmriti 12.106
तपो विद्या च विप्रस्य निःश्रेयसकरं परम्।
भावार्थ: तप और विद्या मनुष्य के परम कल्याण के साधन हैं।
निष्कर्ष
स्मृति-साहित्य में बार-बार यह शिक्षा मिलती है कि—
विद्या से प्रज्ञा प्राप्त होती है।
ज्ञान सर्वोच्च बल है।
सम्यक् संकल्प और विवेक धर्म का आधार हैं।
बुद्धि-वर्धक आचरण अपनाना चाहिए।
इस प्रकार ऋग्वेद 2.23.1 के भाव "हे ईश्वर! हमें श्रेष्ठ बुद्धि प्रदान करें" का समर्थन स्मृतियों में विद्या, प्रज्ञा, ज्ञान और सद्बुद्धि की महिमा के रूप मिलता है।
नीति ग्रन्थों में प्रमाण--
ऋग्वेद 2.23.1 — "हे ईश्वर! हमें श्रेष्ठ बुद्धि प्रदान करें" — इस भाव के समर्थन में भारतीय नीति-ग्रन्थों में बुद्धि, विवेक, प्रज्ञा और सद्बुद्धि की महिमा बार-बार वर्णित हुई है।
1. Chanakya Niti
बुद्धिर्यस्य बलं तस्य निर्बुद्धेश्च कुतो बलम्।
वने सिंहो मदोन्मत्तः शशकेन निपातितः॥
भावार्थ: जिसके पास बुद्धि है, उसी का वास्तविक बल है; निर्बुद्धि का बल व्यर्थ है। जैसे एक चतुर खरगोश ने सिंह को पराजित कर दिया।
2. Chanakya Niti
विद्या मित्रं प्रवासेषु विद्या भोगकरी यशः।
विद्या गुरूणां गुरुश्च विद्या बन्धुजनो विदेशे॥
भावार्थ: विद्या ही मनुष्य की सच्ची मित्र है; वही यश, सम्मान और सही मार्गदर्शन देती है।
3. Hitopadesha
विद्या ददाति विनयं विनयाद् याति पात्रताम्।
पात्रत्वात् धनमाप्नोति धनात् धर्मं ततः सुखम्॥
भावार्थ: विद्या विनय देती है, विनय से पात्रता आती है, और उससे जीवन में कल्याण और सुख प्राप्त होता है।
4. Panchatantra
नास्ति विद्यासमं चक्षुः।
भावार्थ: विद्या के समान कोई नेत्र नहीं है।
5. Panchatantra
यस्य नास्ति स्वयं प्रज्ञा शास्त्रं तस्य करोति किम्।
लोचनाभ्यां विहीनस्य दर्पणः किं करिष्यति॥
भावार्थ: जिसमें स्वयं विवेक नहीं है, उसके लिए शास्त्र भी क्या कर सकते हैं? जैसे अंधे के लिए दर्पण व्यर्थ है।
6. Bhartrhari Niti Shataka
विद्या नाम नरस्य रूपमधिकं प्रच्छन्नगुप्तं धनम्।
भावार्थ: विद्या मनुष्य का श्रेष्ठ रूप और छिपा हुआ अमूल्य धन है।
7. Bhartrhari Niti Shataka
केयूराणि न भूषयन्ति पुरुषं हारा न चन्द्रोज्ज्वलाः।
... वाग्भूषणं भूषणम्॥
भावार्थ: मनुष्य का वास्तविक आभूषण ज्ञान और विवेकयुक्त वाणी है।
8. Shukra Niti
बुद्ध्या बलवतां बलम्।
भावार्थ: बुद्धि ही बलवानों का भी बल है।
सार
नीति-ग्रन्थों का निष्कर्ष है कि—
बुद्धि ही वास्तविक बल है।
विद्या सबसे बड़ा धन और नेत्र है। प्रज्ञा के बिना शास्त्रज्ञान भी निष्फल है। विवेक जीवन को सफल बनाता है।
अतः ऋग्वेद 2.23.1 के भाव "हे ईश्वर! हमें श्रेष्ठ बुद्धि प्रदान करें" का समर्थन नीति-साहित्य में विद्या, प्रज्ञा, विवेक और सद्बुद्धि की सर्वोच्च महिमा के रूप में मिलता है। 
वाल्मीकि रामायण और अध्यात्म रामायण में प्रमाण--
ऋग्वेद 2.23.1 के भाव "हे ईश्वर! हमें श्रेष्ठ बुद्धि प्रदान करें" के समर्थन में Valmiki Ramayana तथा Adhyatma Ramayana में ज्ञान, विवेक, धर्मबुद्धि और सदाचार की महिमा अनेक स्थानों पर मिलती है।
1. वाल्मीकि रामायण
(क) बालकाण्ड 1.1.2
को न्वस्मिन् साम्प्रतं लोके गुणवान् कश्च वीर्यवान्।
धर्मज्ञश्च कृतज्ञश्च सत्यवाक्यो दृढव्रतः॥
भावार्थ: महर्षि वाल्मीकि ऐसे पुरुष की खोज करते हैं जो गुणवान, धर्मज्ञ, सत्यवादी और दृढ़व्रती हो। यहाँ धर्मज्ञ (धर्म का ज्ञाता) होने को श्रेष्ठ गुण माना गया है।
(ख) अयोध्याकाण्ड
नयश्च विनयश्चोभौ यस्मिन् सत्यं च सुस्थितम्।
भावार्थ: जिसमें नीति, विनय और सत्य दृढ़ता से स्थित हों, वही आदर्श पुरुष है।
(ग) राम का चरित्र
बुद्धिमान् नीतिमान् वाग्मी श्रीमान् शत्रुनिबर्हणः।
भावार्थ: श्रीराम बुद्धिमान, नीतिज्ञ और उत्तम वक्ता हैं। रामायण में आदर्श पुरुष के प्रमुख गुणों में बुद्धिमत्ता को रखा गया है।
2. अध्यात्म रामायण
(क) बालकाण्ड
ज्ञानमेव परं तत्त्वं ज्ञानान्मोक्षः प्रजायते।
भावार्थ: ज्ञान ही परम तत्त्व है और ज्ञान से ही मोक्ष की प्राप्ति होती है।
(ख) उत्तरकाण्ड
अज्ञानं मूलं संसारस्य ज्ञानं तस्य निवर्तकम्।
भावार्थ: अज्ञान संसार-बन्धन का मूल कारण है और ज्ञान उसका नाश करने वाला है।
(ग) श्रीराम का उपदेश
आत्मज्ञानं परं ज्ञानं।
भावार्थ: आत्मज्ञान ही सर्वोच्च ज्ञान है।
(घ) अध्यात्म रामायण का मूल संदेश
विवेक और ज्ञान के द्वारा जीव अपने वास्तविक स्वरूप को पहचानता है और मोक्ष प्राप्त करता है।
तुलनात्मक निष्कर्ष
ग्रन्थ
मुख्य शिक्षा
ऋग्वेद 2.23.1
श्रेष्ठ बुद्धि और दिव्य प्रेरणा की प्रार्थना
वाल्मीकि रामायण
धर्मज्ञता, नीति, विनय और बुद्धिमत्ता आदर्श मानव के गुण हैं।
अध्यात्म रामायण
ज्ञान, विवेक और आत्मबोध मुक्ति के साधन हैं।
अतः ऋग्वेद के "हमें श्रेष्ठ बुद्धि प्रदान करें" भाव का प्रतिध्वनि वाल्मीकि रामायण में धर्मज्ञ, बुद्धिमान और नीतिमान जीवन के रूप में तथा अध्यात्म रामायण में ज्ञान, विवेक और आत्मबोध के रूप में स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।
योग वाशिष्ठ और गर्ग संहिता में प्रमाण--
 ऋग्वेद 2.23.1 के भाव — "हे ईश्वर! हमें श्रेष्ठ बुद्धि, विवेक और ज्ञान प्रदान करें" — के संदर्भ में Yoga Vasistha और Garga Samhita में ज्ञान, विवेक और आत्मबोध की महिमा प्रमुख रूप से वर्णित है।
1. योगवासिष्ठ में प्रमाण
योगवासिष्ठ का मुख्य विषय ही विवेक (विचार), ज्ञान और आत्मबोध है।
(क) वैराग्यप्रकरण
विचारः परमं ज्ञानं शमः परमसुखम्।
भावार्थ: विवेकपूर्ण विचार ही परम ज्ञान है और मन की शान्ति परम सुख है।
(ख) उपशमप्रकरण
नास्ति ज्ञानात्परं बलम्।
भावार्थ: ज्ञान से बढ़कर कोई बल नहीं है।
(ग) निर्वाणप्रकरण
विवेक एव संसारमहामोहविनाशनः।
भावार्थ: विवेक ही संसाररूपी महान मोह का नाश करने वाला है।
(घ) आत्मज्ञानं परं श्रेयः।
भावार्थ: आत्मज्ञान ही सर्वोच्च कल्याण है।
2. गर्ग संहिता में प्रमाण
गर्ग संहिता मुख्यतः श्रीकृष्ण की लीलाओं और भक्ति पर आधारित है, परन्तु उसमें भक्ति से उत्पन्न ज्ञान और सद्बुद्धि का भी वर्णन मिलता है।
(क) भक्त्या ज्ञानं प्रजायते।
भावार्थ: भक्ति से ज्ञान उत्पन्न होता है।
(ख) कृष्णभक्तिर्हि जन्तूनां सर्वविद्याप्रदायिनी।
भावार्थ: श्रीकृष्ण की भक्ति मनुष्य को समस्त कल्याणकारी ज्ञान प्रदान करती है।
(ग) यस्य बुद्धिः हरेर्भक्तौ स एव पण्डितः स्मृतः।
भावार्थ: जिसकी बुद्धि भगवान् के प्रति समर्पित है, वही वास्तव में बुद्धिमान है।
निष्कर्ष
बुद्धि/ज्ञान सम्बन्धी शिक्षा
ऋग्वेद 2.23.1 में --
श्रेष्ठ बुद्धि की प्रार्थना।
योगवासिष्ठ में --
विवेक, विचार और आत्मज्ञान ही मोक्ष का मार्ग हैं।
गर्ग संहिता में --
भक्ति से ज्ञान और सद्बुद्धि की प्राप्ति होती है।
विशेष रूप से योगवासिष्ठ का यह वचन—
"विवेक एव संसारमहामोहविनाशनः"
और ऋग्वेद का भाव—
"हमें श्रेष्ठ बुद्धि प्रदान करें"
दोनों मिलकर यह शिक्षा देते हैं कि मनुष्य का वास्तविक कल्याण विवेक, ज्ञान और आत्मबोध में निहित है।
इस्लाम धर्म में प्रमाण--
यदि विषय "हे ईश्वर! हमें श्रेष्ठ बुद्धि, सही समझ और मार्गदर्शन प्रदान करें" है, तो इस्लाम में भी ऐसी प्रार्थनाएँ मिलती हैं।
1. क़ुरआन 20:114
رَّبِّ زِدْنِي عِلْمًا
Rabbi zidnī ʿilmā
भावार्थ: "हे मेरे पालनहार! मेरे ज्ञान में वृद्धि कर।"
2. क़ुरआन 2:269
يُؤْتِي الْحِكْمَةَ مَن يَشَاءُ ۚ وَمَن يُؤْتَ الْحِكْمَةَ فَقَدْ أُوتِيَ خَيْرًا كَثِيرًا
Yuʾtī al-ḥikmata man yashāʾ, wa man yuʾta al-ḥikmata faqad ūtiya khayran kathīrā.
भावार्थ: "अल्लाह जिसे चाहता है, उसे हिकमत (बुद्धि, विवेक) प्रदान करता है; और जिसे हिकमत दी गई, उसे बहुत बड़ी भलाई दी गई।"
3. क़ुरआन 1:6
اهْدِنَا الصِّرَاطَ الْمُسْتَقِيمَ
Ihdinā aṣ-ṣirāṭ al-mustaqīm.
भावार्थ: "हमें सीधा मार्ग दिखा।"
4. क़ुरआन 26:83 (नबी इब्राहीम की प्रार्थना)
رَبِّ هَبْ لِي حُكْمًا وَأَلْحِقْنِي بِالصَّالِحِينَ
Rabbi hab lī ḥukman wa alḥiqnī biṣ-ṣāliḥīn.
भावार्थ: "हे मेरे पालनहार! मुझे सही निर्णय-शक्ति (हुक्म/हिकमत) प्रदान कर और मुझे नेक लोगों में शामिल कर।"
5. हदीस की प्रसिद्ध दुआ
اللَّهُمَّ انْفَعْنِي بِمَا عَلَّمْتَنِي وَعَلِّمْنِي مَا يَنْفَعُنِي وَزِدْنِي عِلْمًا
Allāhumma anfaʿnī bimā ʿallamtanī wa ʿallimnī mā yanfaʿunī wa zidnī ʿilmā.
भावार्थ: "हे अल्लाह! जो ज्ञान तूने मुझे दिया है उससे मुझे लाभ पहुँचा, मुझे वह सिखा जो मेरे लिए लाभदायक हो, और मेरे ज्ञान में वृद्धि कर।"
इन आयतों और दुआओं से स्पष्ट है कि इस्लाम में भी ईश्वर (अल्लाह) से इल्म (ज्ञान), हिकमत (विवेक), सही निर्णय-शक्ति और सीधे मार्गदर्शन की प्रार्थना की जाती है। यह भाव ऋग्वेद के "हमें श्रेष्ठ बुद्धि प्रदान करें" वाले भाव से काफी साम्य रखता है।
सूफी संतों में प्रमाण--
यदि विषय "हे ईश्वर! हमें श्रेष्ठ बुद्धि, ज्ञान, विवेक और सत्य का बोध प्रदान करें" है, तो सूफ़ी परम्परा में भी ऐसी प्रार्थनाएँ और कथन मिलते हैं। सूफ़ी संतों ने केवल बाहरी ज्ञान नहीं, बल्कि मआरिफ़त (आध्यात्मिक ज्ञान), हिकमत (विवेक) और बसीरत (अंतरदृष्टि) की याचना पर बल दिया है।
1. Jalal al-Din Rumi (फ़ारसी)
عقلِ جزوی عقل را بدنام کرد
کامِ دنیا مرد را ناکام کرد
ʿAql-e juzvī ʿaql-rā badnām kard,
kām-e dunyā mard-rā nākām kard.
भावार्थ: सीमित बुद्धि (सिर्फ सांसारिक चतुराई) सच्ची बुद्धि को बदनाम कर देती है; संसार की वासनाएँ मनुष्य को उसके वास्तविक लक्ष्य से दूर कर देती हैं।
2. Jalal al-Din Rumi (फ़ारसी)
خرد را جان ز حق آید یقیناً
چو نور آید ز خورشید آسمانا
भावार्थ: सच्ची बुद्धि और चेतना परम सत्य से आती है, जैसे सूर्य से प्रकाश आता है।
3. Abd al-Qadir al-Jilani (अरबी)
اللَّهُمَّ افْتَحْ عَلَيْنَا فُتُوحَ الْعَارِفِينَ وَارْزُقْنَا فَهْمَ النَّبِيِّينَ
भावार्थ: हे अल्लाह! हमारे लिए ज्ञानी संतों के ज्ञान के द्वार खोल और हमें नबियों जैसी समझ प्रदान कर।
(यह सूफ़ी परम्परा में प्रचलित दुआ है।)
4. Ibn Ata Allah al-Iskandari (अरबी, अल-हिकम)
مَنْ أَشْرَقَتْ بَدَايَتُهُ أَشْرَقَتْ نِهَايَتُهُ
भावार्थ: जिसकी शुरुआत (आध्यात्मिक जागृति) प्रकाशमय होती है, उसका अंत भी प्रकाशमय होता है।
5. Farid al-Din Attar (फ़ारसी)
تا نگردی آشنا زین پرده رازی نشنوی
भावार्थ: जब तक भीतर की पहचान और समझ नहीं जागती, तब तक सत्य के रहस्य को नहीं समझा जा सकता।
6. सूफ़ी दुआ (अरबी)
اللَّهُمَّ زِدْنَا نُورًا وَعِلْمًا وَفَهْمًا
भावार्थ: हे अल्लाह! हमें अधिक प्रकाश, ज्ञान और समझ प्रदान कर।
सूफ़ी साहित्य का मूल संदेश यह है कि सच्ची बुद्धि (حكمة), अंतरदृष्टि (بصيرة), ज्ञान (علم) और ईश्वरीय प्रकाश (نور) परमात्मा/अल्लाह की कृपा से प्राप्त होते हैं। यह भाव ऋग्वेद 2.23.1 के "हमें श्रेष्ठ बुद्धि प्रदान करें" के अत्यंत निकल है।
सिक्ख धर्म में प्रमाण--
 यदि विषय "हे ईश्वर! हमें श्रेष्ठ बुद्धि, विवेक और सही मार्गदर्शन प्रदान करें" है, तो सिख धर्म के ग्रंथों में भी इस भाव के अनेक प्रमाण मिलते हैं।
1. Guru Granth Sahib, अंग 12
ਮਤਿ ਵਿਚਿ ਰਤਨ ਜਵਾਹਰ ਮਾਣਿਕ ਜੇ ਇਕ ਗੁਰ ਕੀ ਸਿਖ ਸੁਣੀ ॥
Transliteration: Mat vich ratan javāhar māṇik je ik gur kī sikh suṇī.
भावार्थ: यदि गुरु की एक भी शिक्षा को सुनकर अपनाया जाए, तो बुद्धि में रत्नों-जवाहरों के समान अमूल्य गुण उत्पन्न हो जाते हैं।
2. Guru Granth Sahib, अंग 470
ਮਤਿ ਗੁਰਮਤਿ ਸੁਣਿ ਜਸੁ ਕਾਨ ॥
भावार्थ: गुरु की शिक्षा सुनकर बुद्धि शुद्ध और प्रकाशित होती है।
3. Guru Granth Sahib, अंग 1245
ਗੁਰਮਤਿ ਬੁਧਿ ਪ੍ਰਗਾਸੁ ॥
Transliteration: Gurmat budh pragās.
भावार्थ: गुरु की मत (शिक्षा) से बुद्धि में प्रकाश उत्पन्न होता है।
4. Guru Granth Sahib, अंग 768
ਦੇਹੁ ਮਤਿ ਸੰਤੋਖੀਆ ਸਚਾ ਸਬਦੁ ਵੀਚਾਰਿ ॥
Transliteration: Dehu mat santokhīā sachā sabad vīchār.
भावार्थ: हे प्रभु! मुझे ऐसी बुद्धि प्रदान कर जिससे मैं सत्य का चिंतन कर सकूँ और संतोष प्राप्त करूँ।
5. Guru Arjan की प्रार्थना
ਤੂ ਠਾਕੁਰੁ ਤੁਮ ਪਹਿ ਅਰਦਾਸਿ ।
ਜੀਉ ਪਿੰਡੁ ਸਭੁ ਤੇਰੀ ਰਾਸਿ ॥
भावार्थ: हे प्रभु! मैं तेरे समक्ष प्रार्थना करता हूँ; मेरा तन-मन सब तेरा है। मुझे अपनी कृपा और मार्गदर्शन प्रदान कर।
6. Guru Granth Sahib, अंग 241
ਗਿਆਨ ਅੰਜਨੁ ਗੁਰਿ ਦੀਆ ਅਗਿਆਨ ਅੰਧੇਰ ਬਿਨਾਸੁ ॥
Transliteration: Giān anjan gur dīā, agiān andher binās.
भावार्थ: गुरु ने ज्ञानरूपी अंजन दिया, जिससे अज्ञान का अंधकार दूर हो गया।
इन वचनों का सार यह है कि सिख धर्म में ਗਿਆਨ (ज्ञान), ਮਤਿ (सद्बुद्धि), ਬੁਧਿ (विवेक), ਅਤੇ ਪ੍ਰਕਾਸ਼ (आध्यात्मिक प्रकाश) को परमात्मा और गुरु की कृपा का फल माना गया है। अतः ऋग्वेद 2.23.1 के भाव "हे ईश्वर! हमें श्रेष्ठ बुद्धि प्रदान करें" के समान भाव सिख धर्म में भी स्पष्ट रूप से मिलता है। है।
ईसाई धर्म में प्रमाण--
यदि विषय "हे ईश्वर! हमें श्रेष्ठ बुद्धि, ज्ञान और सही मार्गदर्शन प्रदान करें" है, तो ईसाई धर्म के पवित्र ग्रंथ Bible में भी इसके अनेक प्रमाण मिलते हैं।
1. James 1:5
"If any of you lacks wisdom, let him ask of God, that giveth to all men liberally, and upbraideth not; and it shall be given him."
भावार्थ: यदि किसी में बुद्धि की कमी हो, तो वह परमेश्वर से माँगे; परमेश्वर उदारतापूर्वक बुद्धि प्रदान करता है।
2. Proverbs 2:6
"For the Lord giveth wisdom: out of his mouth cometh knowledge and understanding."
भावार्थ: प्रभु ही बुद्धि देता है; उसी से ज्ञान और समझ प्राप्त होती है।
3. Proverbs 3:13
"Happy is the man that findeth wisdom, and the man that getteth understanding."
भावार्थ: धन्य है वह मनुष्य जो बुद्धि और समझ प्राप्त करता है।
4. Ephesians 1:17
"That the God of our Lord Jesus Christ, the Father of glory, may give unto you the spirit of wisdom and revelation in the knowledge of him."
भावार्थ: परमेश्वर तुम्हें बुद्धि और आध्यात्मिक ज्ञान की आत्मा प्रदान करे।
5. Psalm 119:66
"Teach me good judgment and knowledge: for I have believed thy commandments."
भावार्थ: मुझे उत्तम निर्णय-शक्ति और ज्ञान सिखा, क्योंकि मैं तेरी आज्ञाओं पर विश्वास करता हूँ।
6. Colossians 1:9
"We do not cease to pray for you, and to desire that ye might be filled with the knowledge of his will in all wisdom and spiritual understanding."
भावार्थ: हम प्रार्थना करते हैं कि तुम परमेश्वर की इच्छा के ज्ञान तथा समस्त बुद्धि और आध्यात्मिक समझ से परिपूर्ण हो जाओ।
7. Psalm 143:10
"Teach me to do thy will; for thou art my God: thy spirit is good; lead me into the land of uprightness."
भावार्थ: हे परमेश्वर! मुझे अपनी इच्छा के अनुसार चलना सिखा और सही मार्ग पर ले चल।
इन बाइबिल के वचनों से स्पष्ट है कि ईसाई धर्म में भी परमेश्वर से wisdom (बुद्धि), knowledge (ज्ञान), understanding (समझ) और right guidance (सही मार्गदर्शन) की प्रार्थना की जाती है। यह भाव ऋग्वेद 2.23.1 के "हे ईश्वर! हमें श्रेष्ठ बुद्धि प्रदान करें" के अत्यंत निकट है।
जैन धर्म में प्रमाण--
यदि विषय "हे ईश्वर (या परम सत्य), हमें श्रेष्ठ बुद्धि, सम्यक् ज्ञान और विवेक प्रदान हो" है, तो जैन धर्म में सृष्टिकर्ता ईश्वर की अवधारणा नहीं है, परन्तु सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चरित्र को मोक्ष का मार्ग माना गया है। इसलिए "श्रेष्ठ बुद्धि" के समतुल्य भाव सम्यक् ज्ञान (सही ज्ञान) और विवेक के रूप में मिलता है।
1. नमोकार मंत्र (प्राकृत)
णमो अरिहंताणं ।
णमो सिद्धाणं ।
णमो आयरियाणं ।
णमो उवज्झायाणं ।
णमो लोए सव्वसाहूणं ॥
भावार्थ: अरिहंतों, सिद्धों, आचार्यों, उपाध्यायों और समस्त साधुओं को नमस्कार। इनके गुणों का स्मरण आत्मा को सम्यक् मार्ग की ओर प्रेरित करता है।
2. Tattvartha Sutra 1.1
सम्यग्दंसणणाणचरित्ताणि मोक्खमग्गो।
(प्राकृत रूप)
भावार्थ: सम्यक् दर्शन, सम्यक् ज्ञान और सम्यक् चरित्र ही मोक्ष का मार्ग हैं।
3. उत्तराध्ययन सूत्र (प्राकृत)
णाणेण विणा न हु होइ मोक्खो।
भावार्थ: ज्ञान के बिना मोक्ष नहीं हो सकता।
4. दशवैकालिक सूत्र (प्राकृत)
णाणं च दंसणं चेव चरित्तं च तवो तहा।
एयं मग्गमणुप्पत्ता जीवा णंति सुग्गइं॥
भावार्थ: ज्ञान, दर्शन, चरित्र और तप — इनका अनुसरण करने वाले जीव श्रेष्ठ गति को प्राप्त करते हैं।
5. उत्तराध्ययन सूत्र (प्राकृत)
जं णाणं तं पयासेइ।
भावार्थ: ज्ञान ही प्रकाश देता है।
जैन दृष्टि से निष्कर्ष
ऋग्वेद के भाव "हमें श्रेष्ठ बुद्धि प्रदान करें" के निकट जैन धर्म में यह शिक्षा मिलती है कि मनुष्य सम्यक् ज्ञान (णाण), सम्यक् दर्शन (दंसण) और विवेकपूर्ण आचरण प्राप्त करे। जैन आगमों में बार-बार ज्ञान को अज्ञान के अंधकार को दूर करने वाला प्रकाश बताया गया है। इसलिए "श्रेष्ठ बुद्धि" का जैन समकक्ष सम्यग्ज्ञान है, जिसके बिना आत्मकल्याण संभव नहीं माना गया।
बौद्ध धर्म में प्रमाण--
यदि विषय "हमें श्रेष्ठ बुद्धि, प्रज्ञा, विवेक और सम्यक् समझ प्राप्त हो" है, तो बौद्ध धर्म में इसका निकटतम समतुल्य पञ्ञा (प्रज्ञा) और सम्मा-दिट्ठि (सम्यक् दृष्टि) है। पाली त्रिपिटक में इसके अनेक प्रमाण मिलते हैं।
1. धम्मपद 282
पञ्ञा नरानं रतनं।
Paññā narānaṃ ratanaṃ.
भावार्थ: प्रज्ञा (बुद्धिमत्ता, विवेक) मनुष्यों का श्रेष्ठ रत्न है।
2. धम्मपद 259
न तेन पण्डितो होति यावता बहु भासति।
खेमी अवेरी अभयो पण्डितोति पवुच्चति॥
Na tena paṇḍito hoti yāvatā bahu bhāsati;
khemī averī abhayo paṇḍitoti pavuccati.
भावार्थ: केवल अधिक बोलने से कोई पण्डित नहीं होता; जो शांत, द्वेषरहित और निर्भय है, वही वास्तव में बुद्धिमान कहलाता है।
3. धम्मपद 372
नत्थि झानं अपञ्ञस्स, पञ्ञा नत्थि अझायतो।
Natthi jhānaṃ apaññassa, paññā natthi ajhāyato.
भावार्थ: जिसमें प्रज्ञा नहीं, उसमें ध्यान नहीं; और जो ध्यान नहीं करता, उसमें प्रज्ञा नहीं होती।
4. मङ्गल सुत्त (सुत्तनिपात)
बहुसच्चञ्च सिप्पञ्च, विनयो च सुसिक्खितो।
सुभासिता च या वाचा, एतं मङ्गलमुत्तमं॥
Bahusaccañca sippañca, vinayo ca susikkhito;
subhāsitā ca yā vācā, etaṃ maṅgalamuttamaṃ.
भावार्थ: व्यापक ज्ञान, कौशल, उत्तम शिक्षा और श्रेष्ठ वाणी — यह महान मंगल है।
5. रतन सुत्त
ये पञ्ञवन्ता।
Ye paññavantā.
भावार्थ: जो प्रज्ञावान हैं, वे सत्य को समझते हैं।
6. धम्मपद 276
तुम्हेहि किच्चमातप्पं, अक्खातारो तथागता।
Tumhehi kiccamātappaṃ, akkhātāro tathāgatā.
भावार्थ: प्रयास तुम्हें स्वयं करना है; तथागत केवल मार्ग दिखाते हैं।
7. अंगुत्तर निकाय
पञ्ञा परमं बलं।
Paññā paramaṃ balaṃ.
भावार्थ: प्रज्ञा (विवेकपूर्ण बुद्धि) सर्वोच्च बल है।
निष्कर्ष
ऋग्वेद 2.23.1 के भाव "हे ईश्वर! हमें श्रेष्ठ बुद्धि प्रदान करें" का बौद्ध धर्म में समकक्ष भाव "प्रज्ञा (पञ्ञा), सम्यक् दृष्टि और विवेक का विकास" है। यद्यपि बौद्ध धर्म में सृष्टिकर्ता ईश्वर से प्रार्थना की अपेक्षा आत्म-विकास पर बल दिया जाता है, फिर भी पाली ग्रंथों में पञ्ञा (प्रज्ञा) को मनुष्य का सर्वोच्च धन, बल और प्रकाश बताया गया है।
यहूदी धर्म में प्रमाण--
यदि विषय "हे ईश्वर! हमें श्रेष्ठ बुद्धि, ज्ञान और विवेक प्रदान करें" है, तो यहूदी धर्म (Judaism) के पवित्र ग्रंथ Tanakh में भी ऐसे अनेक प्रमाण मिलते हैं।
1. नीतिवचन (Proverbs) 2:6
כִּי־יְהוָה יִתֵּן חָכְמָה מִפִּיו דַּעַת וּתְבוּנָה׃
Ki Adonai yitten chokhmah, mipiv daʿat u-tevunah.
भावार्थ: क्योंकि परमेश्वर ही बुद्धि देता है; उसके मुख से ज्ञान और समझ प्राप्त होती है।
2. भजन संहिता (Psalms) 119:66
טוּב טַעַם וָדַעַת לַמְּדֵנִי כִּי בְמִצְוֺתֶיךָ הֶאֱמָנְתִּי׃
Tuv taʿam va-daʿat lamdeni, ki be-mitzvotekha he'emanti.
भावार्थ: मुझे उत्तम विवेक और ज्ञान सिखा, क्योंकि मैंने तेरी आज्ञाओं पर विश्वास किया है।
3. नीतिवचन (Proverbs) 4:7
רֵאשִׁית חָכְמָה קְנֵה חָכְמָה וּבְכָל־קִנְיָנְךָ קְנֵה בִינָה׃
Reshit chokhmah qeneh chokhmah, u-ve-khol qinyanekha qeneh vinah.
भावार्थ: बुद्धि सबसे प्रधान है; बुद्धि प्राप्त करो, और अपनी सारी प्राप्तियों के साथ समझ भी प्राप्त करो।
4. 1 राजा (1 Kings) 3:9 — Solomon की प्रार्थना
וְנָתַתָּ לְעַבְדְּךָ לֵב שֹׁמֵעַ לִשְׁפֹּט אֶת־עַמֶּךָ לְהָבִין בֵּין־טוֹב לְרָע׃
Ve-natata le-avdekha lev shomea... le-havin bein tov le-ra.
भावार्थ: अपने सेवक को ऐसा समझदार हृदय दे कि वह अच्छे और बुरे में भेद कर सके।
5. दानिय्येल (Daniel) 2:21
יָהֵב חָכְמְתָא לְחַכִּימִין וּמַנְדְּעָא לְיָדְעֵי בִינָה׃
Yahev chokhmata le-chakkimin u-manda le-yade binah.
भावार्थ: परमेश्वर बुद्धिमानों को बुद्धि और समझ रखने वालों को ज्ञान देता है।
6. भजन संहिता (Psalms) 111:10
רֵאשִׁית חָכְמָה יִרְאַת יְהוָה׃
Reshit chokhmah yirat Adonai.
भावार्थ: परमेश्वर का आदर और श्रद्धा ही बुद्धि का प्रारम्भ है।
निष्कर्ष
यहूदी धर्म में חָכְמָה (Chokhmah = बुद्धि), דַּעַת (Da'at = ज्ञान), בִּינָה (Binah = विवेक/समझ) को ईश्वर का वरदान माना गया है। इसलिए ऋग्वेद 2.23.1 के भाव "हे ईश्वर! हमें श्रेष्ठ बुद्धि प्रदान करें" के समान भाव यहूदी धर्मग्रंथों में स्पष्ट रूप से मिलता है।
पारसी धर्म में प्रमाण--
यदि विषय "हे ईश्वर! हमें श्रेष्ठ बुद्धि, विवेक और सत्य का ज्ञान प्रदान करें" है, तो पारसी (ज़रथुष्ट्र) धर्म में इसका निकटतम भाव वहु मनह (Vohu Manah = शुभ मन, श्रेष्ठ बुद्धि) और अषा (Asha = सत्य एवं धर्म) की प्राप्ति है। पारसी धर्म के पवित्र ग्रंथ Avesta में इसके अनेक संकेत मिलते हैं।
1. यश्न 28.2 (गाथा अहुनवैती)
अवेस्ताई (Avestan):
𐬨𐬀𐬰𐬛𐬁 𐬀𐬵𐬎𐬭𐬁 𐬨𐬀𐬥𐬀𐬢𐬵𐬀 𐬬𐬊𐬵𐬎
(Mazdā Ahurā ... Vohu Manah ...)
भावार्थ: हे अहुरा मज़्दा! मुझे शुभ मन (वहु मनह) और सत्य के मार्ग की प्रेरणा प्रदान करें।
2. यश्न 34.1
अवेस्ताई:
𐬀𐬴𐬎𐬭𐬀𐬌 𐬨𐬀𐬰𐬛𐬁𐬌 𐬀𐬴𐬨𐬀𐬌 𐬭𐬀𐬙𐬎𐬨
(Ahurai Mazdāi ...)
भावार्थ: अहुरा मज़्दा के ज्ञान और धर्ममय मार्ग का अनुसरण करने की प्रार्थना।
3. यश्न 43.3
अवेस्ताई:
𐬀𐬙 𐬙𐬀 𐬨𐬀𐬰𐬛𐬁 𐬀𐬵𐬎𐬭𐬁
(At ta Mazdā Ahurā ...)
भावार्थ: हे अहुरा मज़्दा! मुझे वह ज्ञान प्रदान करें जिसके द्वारा मैं सत्य को पहचान सकूँ।
4. यश्न 43.9
अवेस्ताई:
𐬙𐬉𐬨 𐬗𐬀𐬙 𐬨𐬀𐬰𐬛𐬁
(Tem khshathra Mazdā ...)
भावार्थ: हे मज़्दा! अपनी बुद्धिमत्ता और धर्मयुक्त शासन के प्रकाश से हमारा मार्गदर्शन करें।
5. यश्न 30.2
अवेस्ताई:
𐬯𐬭𐬀𐬊𐬙𐬀 𐬀𐬙 𐬫𐬀𐬭𐬆𐬙𐬀
(Sraotā at ...)
भावार्थ: सुनो, विचार करो और अपनी बुद्धि से सत्य और असत्य के बीच निर्णय करो।
यह गाथाओं का अत्यंत प्रसिद्ध उपदेश है जिसमें मनुष्य को अपनी विवेकपूर्ण बुद्धि से सत्य का चयन करने के लिए कहा गया है।
पारसी धर्म का मुख्य सिद्धांत
ज़रथुष्ट्र ने बार-बार "वहु मनह" (𐬎𐬵𐬎 𐬨𐬀𐬥𐬀𐬵 = शुभ मन/श्रेष्ठ बुद्धि) की प्राप्ति पर बल दिया। यह अवधारणा ऋग्वेद के "हमें श्रेष्ठ बुद्धि प्रदान करें" भाव के बहुत निकट है।
अवेस्ताई शब्द:
𐬎𐬵𐬎 𐬨𐬀𐬥𐬀𐬵
Vohu Manah
अर्थ: शुभ मन, श्रेष्ठ बुद्धि, सद्विवेक।
निष्कर्ष
पारसी धर्म में अहुरा मज़्दा से वहु मनह (श्रेष्ठ बुद्धि), अषा (सत्य), और सही निर्णय-शक्ति की प्राप्ति की कामना की जाती है। इस प्रकार ऋग्वेद 2.23.1 के भाव "हे ईश्वर! हमें श्रेष्ठ बुद्धि प्रदान करें" का निकटतम पारसी समकक्ष वहु मनह की अवधारणा में मिलता है।
ताओ धर्म में प्रमाण--
यदि विषय "हमें श्रेष्ठ बुद्धि, विवेक, सही समझ और सत्य के अनुरूप जीवन जीने की प्रेरणा मिले" है, तो ताओ धर्म (Daoism / Taoism) में इसका निकटतम भाव ताओ (道) के ज्ञान और उसके अनुरूप जीवन जीने की बुद्धि है। ताओ धर्म में सृष्टिकर्ता ईश्वर की प्रार्थना की अपेक्षा ताओ के साथ सामंजस्य पर बल दिया जाता है।
1. Tao Te Ching, अध्याय 33
知人者智,自知者明。
Zhī rén zhě zhì, zì zhī zhě míng.
भावार्थ: जो दूसरों को जानता है वह बुद्धिमान है, पर जो स्वयं को जानता है वह वास्तव में प्रबुद्ध है।
2. Tao Te Ching, अध्याय 47
不出戶,知天下;不窺牖,見天道。
Bù chū hù, zhī tiānxià; bù kuī yǒu, jiàn tiāndào.
भावार्थ: बाहर निकले बिना संसार को जाना जा सकता है; भीतर की अंतर्दृष्टि से स्वर्गीय मार्ग (ताओ) को समझा जा सकता है।
3. Tao Te Ching, अध्याय 15
孰能濁以靜之徐清?
Shú néng zhuó yǐ jìng zhī xú qīng?
भावार्थ: कौन अशांत मन को शांति द्वारा धीरे-धीरे निर्मल कर सकता है? (अर्थात् विवेक और आंतरिक स्पष्टता प्राप्त कर सकता है।)
4. Tao Te Ching, अध्याय 48
為學日益,為道日損。
Wéi xué rì yì, wéi dào rì sǔn.
भावार्थ: सामान्य ज्ञान में प्रतिदिन वृद्धि होती है, पर ताओ के मार्ग में अनावश्यक बातों का त्याग करके वास्तविक बुद्धि प्राप्त होती है।
5. Zhuangzi
以道觀之,物無貴賤。
Yǐ dào guān zhī, wù wú guì jiàn.
भावार्थ: ताओ की दृष्टि से देखने पर सब वस्तुओं का वास्तविक स्वरूप समझ में आता है; पक्षपात समाप्त हो जाता है।
6. Tao Te Ching, अध्याय 27
善人者,不善人之師;不善人者,善人之資。
Shàn rén zhě, bù shàn rén zhī shī; bù shàn rén zhě, shàn rén zhī zī.
भावार्थ: बुद्धिमान व्यक्ति दूसरों का मार्गदर्शक होता है, और प्रत्येक अनुभव सीखने का अवसर प्रदान करता है।
निष्कर्ष
ताओ धर्म में वैदिक शैली की "हे ईश्वर! हमें श्रेष्ठ बुद्धि प्रदान करें" जैसी प्रार्थना कम मिलती है, क्योंकि ताओवाद का केंद्र ताओ (道) के साथ सामंजस्य है। फिर भी उसके ग्रंथों का मुख्य संदेश है कि मनुष्य 明 (míng = प्रबुद्धता), 智 (zhì = बुद्धि), 自知 (zìzhī = आत्मज्ञान) और 道 (dào = सत्य मार्ग) को प्राप्त करे। यह भाव ऋग्वेद 2.23.1 में व्यक्त श्रेष्ठ बुद्धि की कामना के बहुत निकट है।
कन्फ्यूसियस धर्म में प्रमाण--
यदि विषय "हमें श्रेष्ठ बुद्धि, विवेक, नैतिक समझ और सही आचरण की प्रेरणा मिले" है, तो कन्फ्यूशियस धर्म (Confucianism) में इसका निकटतम भाव 智 (Zhì = बुद्धि), 仁 (Rén = करुणा), 義 (Yì = धर्मनिष्ठा) तथा 明德 (Míngdé = उज्ज्वल सद्गुण) है।
1. Analects (《論語》)
知者不惑,仁者不憂,勇者不懼。
Zhī zhě bù huò, rén zhě bù yōu, yǒng zhě bù jù.
भावार्थ: बुद्धिमान व्यक्ति भ्रमित नहीं होता, करुणामय व्यक्ति चिंतित नहीं होता और साहसी व्यक्ति भयभीत नहीं होता।
2. Confucius, 《論語》
學而不思則罔,思而不學則殆。
Xué ér bù sī zé wǎng, sī ér bù xué zé dài.
भावार्थ: अध्ययन बिना चिंतन के व्यर्थ है, और चिंतन बिना अध्ययन के संकटपूर्ण है।
3. Great Learning (《大學》)
大學之道,在明明德,在親民,在止於至善。
Dàxué zhī dào, zài míng míngdé, zài qīn mín, zài zhǐ yú zhìshàn.
भावार्थ: महान शिक्षा का मार्ग उज्ज्वल सद्गुण को प्रकाशित करना, लोगों का कल्याण करना और परम श्रेष्ठता तक पहुँचना है।
4. Doctrine of the Mean (《中庸》)
博學之,審問之,慎思之,明辨之,篤行之。
Bó xué zhī, shěn wèn zhī, shèn sī zhī, míng biàn zhī, dǔ xíng zhī.
भावार्थ: व्यापक अध्ययन करो, सावधानी से प्रश्न करो, गहन विचार करो, स्पष्ट विवेक से निर्णय करो और दृढ़ता से आचरण करो।
5. Analects
知之者不如好之者,好之者不如樂之者。
Zhī zhī zhě bùrú hào zhī zhě, hào zhī zhě bùrú lè zhī zhě.
भावार्थ: केवल जानने वाला उतना श्रेष्ठ नहीं जितना उसे प्रेम करने वाला, और प्रेम करने वाला उतना श्रेष्ठ नहीं जितना उसमें आनंद लेने वाला।
6. Confucius
三人行,必有我師焉。
Sān rén xíng, bì yǒu wǒ shī yān.
भावार्थ: जब तीन व्यक्ति साथ चलते हैं, तो उनमें से कोई न कोई मेरा शिक्षक अवश्य होता है।
निष्कर्ष
कन्फ्यूशियस धर्म में वैदिक शैली की ईश्वर-प्रार्थना अपेक्षाकृत कम है, परन्तु 智 (बुद्धि), 明辨 (विवेकपूर्ण निर्णय), 慎思 (गहन चिंतन), 明德 (उज्ज्वल सद्गुण) और निरंतर शिक्षा पर अत्यधिक बल दिया गया है। अतः ऋग्वेद 2.23.1 के भाव "हमें श्रेष्ठ बुद्धि प्रदान करें" का निकटतम कन्फ्यूशियसी समकक्ष 智 (Zhì — प्रज्ञा/बुद्धि) और 明辨 (Míngbiàn — विवेकपूर्ण समझ) की साधना है।
शिन्तो धर्म में प्रमाण--
यदि विषय "हमें श्रेष्ठ बुद्धि, शुद्ध हृदय, सही विवेक और दिव्य मार्गदर्शन प्राप्त हो" है, तो शिन्तो धर्म (神道, Shintō) में इसका निकटतम भाव मगोकॊरो (真心 = सच्चा/शुद्ध हृदय) तथा कामी (神) के मार्ग के अनुरूप जीवन है। शिन्तो के प्राचीन ग्रंथों और प्रार्थनाओं (祝詞, Norito) में शुद्ध बुद्धि और सदाचार की कामना मिलती है।
1. Kojiki
正直の心を以て神に仕えよ
Shōjiki no kokoro o motte kami ni tsukaeyo.
भावार्थ: सत्यनिष्ठ और निष्कपट हृदय से कामी (देवताओं) की सेवा करो।
2. Nihon Shoki
清き明き心
Kiyoki akaki kokoro
भावार्थ: शुद्ध और प्रकाशमान हृदय (मन)।
शिन्तो परम्परा में यह आदर्श मनुष्य की आध्यात्मिक और नैतिक अवस्था का प्रतीक है।
3. शिन्तो प्रार्थना (祝詞 – Norito)
祓へ給ひ 清め給へ
Harae tamae, kiyome tamae.
भावार्थ: हे कामी! हमें अशुद्धियों से मुक्त करो और शुद्ध बनाओ।
4. Kojiki में निहित शिन्तो आदर्श
真心をもって道を行う
Magokoro o motte michi o ayumu.
भावार्थ: सच्चे और निष्कपट हृदय से धर्ममार्ग पर चलो।
5. महान शुद्धिकरण प्रार्थना (大祓詞, Ōharae no Kotoba)
諸々の禍事・罪・穢れを祓い給え清め給え
Moromoro no magagoto, tsumi, kegare o harae tamae kiyome tamae.
भावार्थ: सभी दोषों, पापों और अशुद्धियों को दूर कर हमें शुद्ध करो।
6. शिन्तो नैतिक आदर्श
明き清き直き誠の心
Akaki kiyoki naoki makoto no kokoro
भावार्थ: प्रकाशमान, शुद्ध, सीधा और सत्यनिष्ठ हृदय।
यह शिन्तो में आदर्श मानव-चरित्र का वर्णन है।
निष्कर्ष
शिन्तो धर्म में वैदिक शैली की "हे ईश्वर! हमें श्रेष्ठ बुद्धि प्रदान करें" जैसी प्रत्यक्ष प्रार्थना कम मिलती है, किन्तु 真心 (मगोकॊरो = सच्चा हृदय), 清き心 (शुद्ध मन), 明き心 (प्रकाशमान बुद्धि) और कामी के मार्ग का अनुसरण प्रमुख आदर्श हैं। इस प्रकार ऋग्वेद 2.23.1 के भाव "हमें श्रेष्ठ बुद्धि प्रदान करें" का निकटतम शिन्तो समकक्ष 「明き清き直き誠の心」 — "प्रकाशमान, शुद्ध और सत्यनिष्ठ हृदय" — माना जा सकता है
यूनानी दर्शन में प्रमाण--
यदि विषय "हमें श्रेष्ठ बुद्धि, विवेक, सत्य का ज्ञान और उचित निर्णय-शक्ति प्राप्त हो" है, तो प्राचीन यूनानी दर्शन में इसका निकटतम समकक्ष σοφία (Sophia = प्रज्ञा/बुद्धि) और φρόνησις (Phronesis = व्यावहारिक विवेक) है।
1. Socrates
Ἓν οἶδα ὅτι οὐδὲν οἶδα.
Hen oida hoti ouden oida.
भावार्थ: "मैं इतना जानता हूँ कि मैं कुछ नहीं जानता।"
सॉक्रेटीस के अनुसार सच्ची बुद्धि अपनी सीमाओं को पहचानने से प्रारम्भ होती है।
2. Socrates
Ὁ δὲ ἀνεξέταστος βίος οὐ βιωτὸς ἀνθρώπῳ.
Ho de anexetastos bios ou biōtos anthrōpō.
भावार्थ: "परीक्षण और विवेचन के बिना जीवन जीने योग्य नहीं है।"
3. Plato, Republic
ἀγαθὸν μέγιστον μάθημα.
Agathon megiston mathēma.
भावार्थ: "परम शुभ (The Good) का ज्ञान ही सर्वोच्च शिक्षा है।"
प्लेटो के अनुसार बुद्धि का उद्देश्य सत्य और परम कल्याण का ज्ञान प्राप्त करना है।
4. Plato
Ἡ φιλοσοφία ἀρχὴ θαυμάζειν.
Hē philosophia archē thaumazein.
भावार्थ: "दर्शन का आरम्भ आश्चर्य और जिज्ञासा से होता है।"
5. Aristotle, Nicomachean Ethics
Ἡ φρόνησις ἐστὶν ἀληθὴς λόγος πρακτικός.
Hē phronēsis estin alēthēs logos praktikos.
भावार्थ: "विवेक (Phronesis) वह सत्यनिष्ठ बुद्धि है जो उचित कर्म का मार्गदर्शन करती है।"
6. Aristotle
Πάντες ἄνθρωποι τοῦ εἰδέναι ὀρέγονται φύσει.
Pantes anthrōpoi tou eidenai oregontai physei.
भावार्थ: "सभी मनुष्य स्वभावतः ज्ञान प्राप्त करना चाहते हैं।"
(Metaphysics, पुस्तक 1)
7. Epictetus
Μόνον ὁ πεπαιδευμένος ἐλεύθερος.
Monon ho pepaideumenos eleutheros.
भावार्थ: "वास्तव में वही स्वतंत्र है जो ज्ञान और विवेक से सम्पन्न है।"
निष्कर्ष
यूनानी दर्शन में वैदिक शैली की ईश्वर-प्रार्थना अपेक्षाकृत कम है, किन्तु σοφία (Sophia = प्रज्ञा), φρόνησις (Phronesis = विवेक), γνῶσις (Gnosis = ज्ञान) तथा ἀλήθεια (Aletheia = सत्य) को मानव जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य माना गया है। इसलिए ऋग्वेद 2.23.1 के भाव "हे ईश्वर! हमें श्रेष्ठ बुद्धि प्रदान करें" का निकटतम यूनानी दार्शनिक समकक्ष Sophia (प्रज्ञा) और Phronesis (विवेकपूर्ण बुद्धि) की प्राप्ति है।है।
   --------+--------+--------+--

Comments

Popular posts from this blog

ऋगुवेद सूक्ति--(56) की व्याख्या

उपनिषद की‌ सूक्तियाँ--

(2) Second Guru Angad Dev Ji Maharaj-- When Emperor Humayun pulled out his sword and try to attack on the neck of Guru Angad Dev Ji, his hand was paralyzed--Read more--