ऋग्वेद सूक्ति (69) की व्याख्या

ऋग्वेद सूक्ति(69) की व्याख्या 
"यद्भद्रं तन्न आसुव"
ऋगुवेद--5/82/5
भावार्थ --हे ईश्वर ! जो हमारे लिए शुभ है, वह हमें प्रदान करें।
पूरा मंत्र अर्थ सहित --
उद्धृत पंक्ति "यद्भद्रं तन्न आ सुव" ऋग्वेद के प्रसिद्ध मंत्र का उत्तरार्ध है।
मन्त्र
विश्वानि देव सवितर्दुरितानि परा सुव ।
यद्भद्रं तन्न आ सुव ॥
— ऋग्वेद
शब्दार्थ
विश्वानि = समस्त, सभी
देव = हे दिव्य प्रकाशमान देव!
सवितः = हे सविता (सृष्टि को प्रेरणा देने वाले परमेश्वर)!
दुरितानि = दुःख, पाप, कष्ट, बाधाएँ, बुराइयाँ
परा सुव = दूर कर दीजिए
यत् भद्रम् = जो कल्याणकारी, शुभ और हितकारी हो
तत् = वह
नः = हमें
आ सुव = प्रदान कीजिए, हमारे पास लाइए
भावार्थ
हे ईश्वर! हमारे सभी दुःखों, कष्टों, पापों और अनिष्टकारक प्रवृत्तियों को दूर करें तथा जो हमारे लिए शुभ, कल्याणकारी और हितकारी हो, वह हमें प्रदान करें।
या सरल भाषा में—
"हे परमेश्वर! जो कुछ हमारे लिए अच्छा और कल्याणकारी है, उसे हमें दें तथा सभी बुराइयों और कष्टों को हमसे दूर करें।"
यह मंत्र मानव जीवन के लिए मंगल, सद्बुद्धि और कल्याण की अत्यंत सुंदर है। 
वेदों में प्रमाण --
 "यद्भद्रं तन्न आ सुव" (हे ईश्वर! जो हमारे लिए कल्याणकारी हो, वह हमें प्रदान करें) के भाव को वेदों में निम्न वैदिक मंत्र इसी भावना को पुष्ट करते हैं कि ईश्वर मनुष्य को शुभ मार्ग, कल्याण, सद्बुद्धि और मंगल प्रदान करे।
1. ऋग्वेद 5.82.5
विश्वानि देव सवितर्दुरितानि परा सुव ।
यद्भद्रं तन्न आ सुव ॥
भावार्थ: हे सविता देव! हमारे सभी दुरितों को दूर करें और जो कल्याणकारी हो, वह हमें प्रदान करें।
2. यजुर्वेद 40.16
अग्ने नय सुपथा राये अस्मान् विश्वानि देव वयुनानि विद्वान् ।
भावार्थ: हे प्रभु! हमें उत्तम मार्ग से ले चलिए और हमारे पापों एवं दोषों को दूर कीजिए।
यह "भद्र" अर्थात् कल्याणकारी मार्ग की प्रार्थना है।
3. ऋग्वेद 1.89.1
आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतः 
भावार्थ: हमारे पास सभी दिशाओं से कल्याणकारी विचार और श्रेष्ठ संकल्प आएँ।
4. ऋग्वेद 1.89.8
भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवाः ।
भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः ॥
भावार्थ: हे देवो! हम अपने कानों से शुभ सुनें और आँखों से शुभ देखें।
5. अथर्ववेद 7.60.1
भद्रमिच्छन्त ऋषयः स्वर्विदः।
भावार्थ: स्वर्गीय ज्ञान वाले ऋषि सदैव कल्याण (भद्र) की कामना करते हैं।
6. यजुर्वेद 25.21
शं नो मित्रः शं वरुणः।
भावार्थ: मित्र, वरुण आदि देवशक्तियाँ हमारा कल्याण करें; हमें शांति और मंगल प्राप्त हो।
7. ऋग्वेद 10.63.10
यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः।
भावार्थ: आप हमें सदा कल्याण और मंगल के साथ सुरक्षित रखें।
निष्कर्ष
"यद्भद्रं तन्न आ सुव" का मूल भाव है—
"हे परमात्मा! हमारे लिए जो वास्तव में हितकारी, शुभ, मंगलकारी और कल्याणदायक हो, वही हमें प्रदान करें।"
इस भाव की पुष्टि वेदों में बार-बार भद्र (कल्याण), स्वस्ति (मंगल), सुपथा (श्रेष्ठ मार्ग), शं (शांति एवं सुख) जैसे शब्दों द्वारा की गई है। विशेष रूप से ऋग्वेद 1.89.1, ऋग्वेद 1.89.8 और यजुर्वेद 40.16 इस मंत्र के भाव के अत्यंत निकट हैं। "यद्भद्रं तन्न आ सुव" का भाव है— हे परमात्मन्! जो हमारे लिए वास्तविक कल्याणकारी हो, वही हमें प्राप्त हो। 
उपनिषदों में प्रमाण--
उपनिषदों में भी इसी भाव को विभिन्न रूपों में व्यक्त किया गया है। कुछ प्रमुख प्रमाण निम्नलिखित हैं:
1. ईशोपनिषद् 18
अग्ने नय सुपथा राये अस्मान्
विश्वानि देव वयुनानि विद्वान्।
युयोध्यस्मज्जुहुराणमेनो
भूयिष्ठां ते नमउक्तिं विधेम॥
भावार्थ: हे प्रभु! हमें कल्याणकारी मार्ग से ले चलिए, हमारे दोषों और पापों को दूर कीजिए।
संबंध: यह मंत्र सीधे "जो हमारे लिए शुभ हो वही प्रदान करें" की भावना को व्यक्त करता है।
2. कठोपनिषद् 1.2.2
श्रेयश्च प्रेयश्च मनुष्यमेतः
तौ सम्परीत्य विविनक्ति धीरः।
श्रेयो हि धीरः अभि प्रेयसो वृणीते
प्रेयो मन्दो योगक्षेमाद् वृणीते॥
भावार्थ: मनुष्य के सामने श्रेय (कल्याणकारी) और प्रेय (प्रिय लगने वाला) दोनों आते हैं; विवेकी पुरुष श्रेय को ग्रहण करता है।
संबंध: यहाँ "भद्र" के समान "श्रेय" अर्थात् वास्तविक कल्याण की शिक्षा दी गई है।
3. मुण्डकोपनिषद् 1.2.12
परीक्ष्य लोकान् कर्मचितान् ब्राह्मणो
निर्वेदमायान्नास्त्यकृतः कृतेन।
भावार्थ: विवेकी मनुष्य कर्मजन्य फलों की सीमाओं को समझकर परम कल्याण की खोज करता है।
संबंध: उपनिषद् मनुष्य को क्षणिक लाभ नहीं, बल्कि परम हित की ओर प्रेरित करता है।
4. तैत्तिरीयोपनिषद् (शिक्षावल्ली 1.11.1)
सत्यं वद। धर्मं चर।
भावार्थ: सत्य बोलो, धर्म का आचरण करो।
संबंध: धर्म और सत्य ही मनुष्य के वास्तविक कल्याण (भद्र) के साधन बताए गए हैं।
5. केनोपनिषद् 2.5
इह चेदवेदीदथ सत्यमस्ति
न चेदिहावेदीन्महती विनष्टिः।
भावार्थ: यदि मनुष्य इस जीवन में ब्रह्म को जान ले तो उसका जीवन सफल है; अन्यथा महान हानि है।
संबंध: उपनिषद् के अनुसार सर्वोच्च "भद्र" ब्रह्मविद्या की प्राप्ति है।
6. बृहदारण्यकोपनिषद् 1.3.28
असतो मा सद्गमय।
तमसो मा ज्योतिर्गमय।
मृत्योर्माऽमृतं गमय॥
भावार्थ: मुझे असत्य से सत्य की ओर, अंधकार से प्रकाश की ओर, मृत्यु से अमृतत्व की ओर ले चलो।
संबंध: यह उपनिषदों की सर्वाधिक प्रसिद्ध कल्याण-प्रार्थना है, जो "यद्भद्रं तन्न आ सुव" के भाव का विस्तार है।
सार
उपनिषदों में "भद्र" शब्द की अपेक्षा श्रेय, सत्य, धर्म, ज्योति, अमृतत्व, ब्रह्मविद्या और सुपथा जैसे शब्दों द्वारा वास्तविक कल्याण का वर्णन किया गया है। विशेष रूप से ईशोपनिषद् 18, कठोपनिषद् 1.2.2, और बृहदारण्यकोपनिषद् 1.3.28 "यद्भद्रं तन्न आ सुव" के भाव के अत्यंत निकट प्रमाण माने जा सकते हैं। 
पुराणों में प्रमाण--
"यद्भद्रं तन्न आ सुव" (हे प्रभो! जो हमारे लिए वास्तविक कल्याणकारी हो, वही हमें प्रदान करें) का भाव पुराणों में भी अनेक स्थानों पर मिलता है। नीचे कुछ प्रसिद्ध प्रमाण श्लोक उद्धरण संख्या सहित दिए जा रहे हैं:
1. श्रीमद्भागवत महापुराण 1.2.6
स वै पुंसां परो धर्मो यतो भक्तिरधोक्षजे।
अहैतुक्यप्रतिहता ययाऽत्मा सुप्रसीदति॥
भावार्थ: मनुष्यों का सर्वोच्च धर्म वह है जिससे भगवान् के प्रति निष्काम भक्ति उत्पन्न हो और जिससे आत्मा का परम कल्याण हो।
संबंध: वास्तविक भद्र (कल्याण) आत्मा की प्रसन्नता और ईश्वरभक्ति में है।
2. श्रीमद्भागवत महापुराण 1.2.17
शृण्वतां स्वकथाः कृष्णः पुण्यश्रवणकीर्तनः।
हृद्यन्तःस्थो ह्यभद्राणि विधुनोति सुहृत्सताम्॥
भावार्थ: भगवान् कृष्ण अपने भक्तों के हृदय में स्थित होकर उनके अभद्र (अशुभ) संस्कारों को दूर करते हैं।
संबंध: यह "दुरितानि परा सुव" के भाव से अत्यन्त निकट है।
3. श्रीमद्भागवत महापुराण 2.1.5
तस्माद् भारत सर्वात्मा भगवान् ईश्वरः हरिः।
श्रोतव्यः कीर्तितव्यश्च स्मर्तव्यश्चेच्छताभयम्॥
भावार्थ: जो अभय और परम कल्याण चाहता है, उसे भगवान् का श्रवण, कीर्तन और स्मरण करना चाहिए।
संबंध: यहाँ परम हित (भद्र) का साधन बताया गया है।
4. विष्णु पुराण 3.12.45
हितं मितं प्रियं काले वश्यात्मा योऽभिभाषते।
स याति लोकानाह्लादहेतुभूतान् निरामयान्॥
भावार्थ: जो हितकारी, मर्यादित और समयानुकूल वाणी बोलता है, वह सुख और कल्याण के लोकों को प्राप्त करता है।
संबंध: हित (भद्र) को जीवन का आधार बताया गया है।
5. पद्म पुराण, उत्तरखण्ड
सर्वेषामेव भूतानां हिते रतः सदा नरः।
स याति परमं स्थानं विष्णोः पदमनामयम्॥
भावार्थ: जो सदा सब प्राणियों के हित में लगा रहता है, वह परम कल्याण को प्राप्त होता है।
संबंध: भद्र का विस्तार केवल स्वयं तक नहीं, बल्कि समस्त प्राणियों के हित तक है।
6. गरुड़ पुराण (पूर्वखण्ड)
परोपकाराय पुण्याय पापाय परपीडनम्॥
भावार्थ: दूसरों का उपकार पुण्य है और दूसरों को पीड़ा देना पाप है।
संबंध: कल्याणकारी आचरण (भद्र) और दुरित का स्पष्ट विवेचन।
7. श्रीमद्भागवत महापुराण 5.18.9
यस्यास्ति भक्तिर्भगवत्यकिञ्चना
सर्वैर्गुणैस्तत्र समासते सुराः॥
भावार्थ: जिसमें निष्काम भगवान्-भक्ति होती है, उसमें सभी श्रेष्ठ गुण स्वतः आ जाते हैं।
संबंध: परमात्मा से जुड़ना ही सर्वोच्च भद्र की प्राप्ति है।
निष्कर्ष
ऋग्वेद के "विश्वानि देव सवितर्दुरितानि परा सुव । यद्भद्रं तन्न आ सुव ॥" मंत्र का पुराणों में समान भाव यह है कि—
ईश्वर अशुभ और दुरित को दूर करें।
मनुष्य को परम हित, धर्म, भक्ति और आत्मकल्याण प्राप्त हो।
सब प्राणियों के हित में जीवन व्यतीत किया जाए।
परम कल्याण का स्रोत ईश्वर और धर्ममय जीवन है।
विशेष रूप से श्रीमद्भागवत 1.2.17 ("हृद्यन्तःस्थो ह्यभद्राणि विधुनोति") इस वैदिक मंत्र के "दुरितानि परा सुव" भाग का अत्यन्त निकट पुराणिक प्रतिरूप माना जा सकता है।
भगवद्गीता में प्रमाण-
ऋग्वेद 5.82.5 — "यद्भद्रं तन्न आ सुव" का भाव है— हे परमात्मा! जो हमारे लिए वास्तविक कल्याण (श्रेय, हित, मंगल) का कारण हो, वही हमें प्राप्त हो।
भगवद्गीता में इसी भाव को श्रेयः, हितम्, कल्याणम्, शुभम् आदि शब्दों से व्यक्त किया गया है।
1. भगवद्गीता 2.7
कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः पृच्छामि त्वां धर्मसम्मूढचेताः।
यच्छ्रेयः स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम्॥
भावार्थ: हे कृष्ण! मेरे लिए जो निश्चित रूप से श्रेयस्कर (कल्याणकारी) हो, वही मुझे बताइए।
संबंध: "यद्भद्रं तन्न आ सुव" के भाव का प्रत्यक्ष समानार्थक श्लोक।
2. भगवद्गीता 5.25
लभन्ते ब्रह्मनिर्वाणमृषयः क्षीणकल्मषाः।
छिन्नद्वैधा यतात्मानः सर्वभूतहिते रताः॥
भावार्थ: जिनके पाप नष्ट हो गए हैं और जो सब प्राणियों के हित में लगे रहते हैं, वे परम कल्याण को प्राप्त होते हैं।
संबंध: दुरितों की निवृत्ति और कल्याण की प्राप्ति।
3. भगवद्गीता 6.40
पार्थ नैवेह नामुत्र विनाशस्तस्य विद्यते।
न हि कल्याणकृत्कश्चिद्दुर्गतिं तात गच्छति॥
भावार्थ: हे अर्जुन! कल्याणकारी कर्म करने वाला कभी दुर्गति को प्राप्त नहीं होता।
संबंध: "भद्र" अर्थात् कल्याण का आश्वासन।
4. भगवद्गीता 9.22
अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्॥
भावार्थ: जो भक्त अनन्य भाव से मेरी उपासना करते हैं, उनके योगक्षेम (आवश्यकताओं और कल्याण) का भार मैं स्वयं उठाता हूँ।
संबंध: ईश्वर भक्त के हित और कल्याण का विधान करते हैं।
5. भगवद्गीता 10.10
तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम्।
ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते॥
भावार्थ: मैं अपने भक्तों को ऐसी बुद्धि देता हूँ जिससे वे मेरे पास पहुँचते हैं।
संबंध: जो वास्तविक हितकारी है, वही ईश्वर प्रदान करते हैं।
6. भगवद्गीता 12.6–7
तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात्।
भवामि नचिरात्पार्थ मय्यावेशितचेतसाम्॥
भावार्थ: जिनका मन मुझमें स्थित है, उन्हें मैं संसार-सागर से शीघ्र पार कर देता हूँ।
संबंध: परम कल्याण और दुःखों से मुक्ति।
7. भगवद्गीता 18.78
यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः।
तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम॥
भावार्थ: जहाँ भगवान् और धर्मयुक्त पुरुष हैं, वहाँ श्री, विजय, ऐश्वर्य और कल्याण निश्चित है।
संबंध: ईश्वर-संबंध से भद्र और मंगल की प्राप्ति।
सार
यदि "यद्भद्रं तन्न आ सुव" के लिए गीता का सबसे निकटतम प्रमाण चुनना हो, तो भगवद्गीता 2.7 सर्वोत्तम है:
"यच्छ्रेयः स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे"
(जो मेरे लिए वास्तविक कल्याणकारी हो, वही मुझे बताइए।)
और गीता 6.40—
"न हि कल्याणकृत्कश्चिद्दुर्गतिं तात गच्छति"
कल्याण के मार्ग पर चलने वाले के लिए भगवान् का आश्वासन है। ये दोनों श्लोक ऋग्वैदिक भावना "यद्भद्रं तन्न आ सुव" के अत्यंत निकट हैं।
महाभारत में प्रमाण--
ऋग्वेद 5.82.5 — "यद्भद्रं तन्न आ सुव" का भाव है— हे परमात्मन्! जो हमारे लिए हितकारी, कल्याणकारी और श्रेयस्कर हो, वही हमें प्राप्त हो।
महाभारत में इसी भाव को श्रेयः, हितम्, कल्याणम्, लोकहितम्, धर्म आदि शब्दों में अनेक स्थानों पर व्यक्त किया गया है।
1. उद्योगपर्व 33.71
यद्भूतहितमत्यन्तम् एतत् सत्यं मतं मम।
भावार्थ: जो समस्त प्राणियों के लिए अत्यन्त हितकारी हो, वही सत्य है।
संबंध: "भद्र" का अर्थ केवल व्यक्तिगत लाभ नहीं, बल्कि व्यापक हित और कल्याण है।
2. शान्तिपर्व 109.11
श्रेयसो हि बहुविघ्नानि।
भावार्थ: श्रेय (वास्तविक कल्याण) के मार्ग में अनेक बाधाएँ आती हैं।
संबंध: महाभारत बार-बार प्रेय (तत्काल सुख) और श्रेय (स्थायी कल्याण) में भेद बताता है।
3. शान्तिपर्व 262.5
सर्वभूतहिते युक्तः सर्वभूतानुकम्पकः।
भावार्थ: मनुष्य को सभी प्राणियों के हित में संलग्न और उन पर दया रखने वाला होना चाहिए।
संबंध: भद्र का स्वरूप सर्वहित में निहित है।
4. वनपर्व 313.117
न तत्परस्य सन्दध्यात् प्रतिकूलं यदात्मनः।
भावार्थ: जो व्यवहार अपने लिए प्रतिकूल हो, वह दूसरों के साथ नहीं करना चाहिए।
संबंध: कल्याणकारी आचरण का मूल सिद्धान्त।
5. शान्तिपर्व 167.9
अहिंसा परमो धर्मः।
भावार्थ: अहिंसा सर्वोच्च धर्म है।
संबंध: दूसरों के कल्याण और अनिष्ट-निवारण का मूल आधार।
6. शान्तिपर्व 259.7
धर्मो रक्षति रक्षितः।
भावार्थ: जो धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है।
संबंध: वास्तविक भद्र और कल्याण धर्माचरण से प्राप्त होता है।
7. वनपर्व 297.35
हितं मनोहारि च दुर्लभं वचः।
भावार्थ: जो वचन हितकारी भी हो और प्रिय भी, ऐसा वचन दुर्लभ है।
संबंध: मनुष्य को सदैव हितकारी वचन और कर्म अपनाने चाहिए।
विशेष समानता
ऋग्वेद का मंत्र कहता है—
"विश्वानि देव सवितर्दुरितानि परा सुव ।
यद्भद्रं तन्न आ सुव ॥"
अर्थात् "हे प्रभो! हमारे दुरितों को दूर करें और जो कल्याणकारी हो वही प्रदान करें।"
महाभारत का सबसे निकट भाव "यद्भूतहितमत्यन्तम् एतत् सत्यं मतं मम" (उद्योगपर्व 33.71) में मिलता है, जहाँ भूतहित (सर्वजन-कल्याण) को सर्वोच्च मानक बताया गया है। इसी प्रकार शान्तिपर्व में धर्म, अहिंसा, सर्वभूतहित और श्रेय को जीवन का परम लक्ष्य कहा गया है।
निष्कर्ष: महाभारत के अनुसार "भद्र" का अर्थ है— धर्म, श्रेय, अहिंसा, सर्वभूतहित और आत्मकल्याण; और यही ऋग्वेद के "यद्भद्रं तन्न आ सुव" का विस्तृत नैतिक और आध्यात्मिक रूप है।
स्मृतियों में प्रमाण--
ऋग्वेद 5.82.5 — "यद्भद्रं तन्न आ सुव" का भाव है— हे ईश्वर! जो हमारे लिए हितकारी, कल्याणकारी और श्रेयस्कर हो, वही हमें प्राप्त हो।
स्मृति-ग्रन्थों में यह भाव श्रेय, हित, धर्म, कल्याण, लोकसंग्रह, आत्महित और सर्वभूतहित के रूप में बार-बार प्रकट होता है।
1. मनुस्मृति 2.12
वेदः स्मृतिः सदाचारः स्वस्य च प्रियमात्मनः।
एतच्चतुर्विधं प्राहुः साक्षाद्धर्मस्य लक्षणम्॥
भावार्थ: वेद, स्मृति, सदाचार और शुद्ध अन्तःकरण की संतुष्टि—ये धर्म के लक्षण हैं।
संबंध: धर्म ही मनुष्य के वास्तविक कल्याण (भद्र) का मार्ग है।
2. मनुस्मृति 4.138
सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयान्न ब्रूयात् सत्यमप्रियम्।
प्रियं च नानृतं ब्रूयादेष धर्मः सनातनः॥
भावार्थ: सत्य और हितकारी वचन बोलना चाहिए; अप्रिय सत्य और असत्य प्रिय वचन से बचना चाहिए।
संबंध: हित (भद्र) को वाणी में उतारने की शिक्षा।
3. मनुस्मृति 6.92
धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः।
धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम्॥
भावार्थ: धैर्य, क्षमा, संयम, शुद्धता, सत्य आदि धर्म के दस लक्षण हैं।
संबंध: ये सभी गुण मनुष्य के कल्याणकारी जीवन का आधार हैं।
4. याज्ञवल्क्यस्मृति 1.122
अहिंसा सत्यमस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः।
दानं दमो दया क्षान्तिः सर्वेषां धर्मसाधनम्॥
भावार्थ: अहिंसा, सत्य, दया, क्षमा आदि सभी के लिए धर्म के साधन हैं।
संबंध: धर्म और दया ही भद्र जीवन का स्वरूप हैं।
5. याज्ञवल्क्यस्मृति 1.156
यत् स्वस्य च प्रियं न स्यात् परेषां न समाचरेत्।
भावार्थ: जो व्यवहार स्वयं को अच्छा न लगे, वह दूसरों के साथ नहीं करना चाहिए।
संबंध: सर्वहित और कल्याण की मूल भावना।
6. पराशर स्मृति 8.22
परोपकारः पुण्याय पापाय परपीडनम्।
भावार्थ: दूसरों का उपकार पुण्य है और दूसरों को कष्ट देना पाप है।
संबंध: भद्र (हित) और दुरित (अहित) का स्पष्ट विवेचन।
7. अत्रि स्मृति (प्रचलित उद्धरण)
सर्वभूतहिते युक्तः सर्वभूतानुकम्पकः।
भावार्थ: मनुष्य को सभी प्राणियों के हित में संलग्न और उन पर दया रखने वाला होना चाहिए।
संबंध: भद्र का सर्वोच्च रूप सर्वभूतहित है। 
निष्कर्ष
ऋग्वेद का मंत्र—
विश्वानि देव सवितर्दुरितानि परा सुव ।
यद्भद्रं तन्न आ सुव ॥ (ऋग्वेद 5.82.5)
स्मृतियों में निम्न रूपों में विकसित होता है—
धर्म का पालन (मनुस्मृति 2.12)
हितकारी सत्य (मनुस्मृति 4.138)
सद्गुणों का आचरण (मनुस्मृति 6.92)
अहिंसा, दया और क्षमा (याज्ञवल्क्यस्मृति 1.122)
सर्वभूतहित (पराशर एवं अन्य स्मृतियाँ)
अर्थात् स्मृतियों के अनुसार "भद्र" केवल शुभ वस्तु प्राप्त करना नहीं, बल्कि धर्म, सत्य, दया, अहिंसा, परोपकार और सर्वहितमय जीवन को अपनाना है।
नोट: शास्त्रीय उद्धरणों में अध्याय/श्लोक संख्या विभिन्न संस्करणों में कभी-कभी भिन्न मिल सकती है;
नीति ग्रन्थों में प्रमाण--
 5.82.5 — "यद्भद्रं तन्न आ सुव" का भाव है— "जो हमारे लिए वास्तविक हितकारी, कल्याणकारी और श्रेयस्कर हो, वही हमें प्राप्त हो।"
नीति-ग्रन्थों में इसी भाव को हित, श्रेय, सदाचार, विवेक, परोपकार और लोककल्याण के रूप में प्रतिपादित किया गया है।
1. हितोपदेश, प्रास्ताविक श्लोक
अनेकसंशयोच्छेदि परोक्षार्थस्य दर्शकम्।
सर्वस्य लोचनं शास्त्रं यस्य नास्त्यन्ध एव सः॥
भावार्थ: शास्त्र मनुष्य को सत्य और हित का मार्ग दिखाते हैं; जिसके पास शास्त्रज्ञान नहीं, वह मानो अन्धा है।
संबंध: भद्र (कल्याण) की प्राप्ति के लिए शास्त्रसम्मत मार्ग आवश्यक है।
2. हितोपदेश 1.27 (प्रचलित पाठ)
परोपकाराय सतां विभूतयः।
भावार्थ: सज्जनों की सम्पत्ति और सामर्थ्य परोपकार के लिए होती है।
संबंध: वास्तविक भद्र केवल अपना नहीं, बल्कि दूसरों का हित भी है।
3. चाणक्य नीति 1.7
त्यजेदेकं कुलस्यार्थे ग्रामस्यार्थे कुलं त्यजेत्।
ग्रामं जनपदस्यार्थे आत्मार्थे पृथिवीं त्यजेत्॥
भावार्थ: बड़े हित के लिए छोटे हित का त्याग करना चाहिए।
संबंध: भद्र का अर्थ व्यापक और दीर्घकालिक कल्याण है।
4. चाणक्य नीति 3.16 (प्रचलित पाठ)
माता शत्रुः पिता वैरी येन बालो न पाठितः।
भावार्थ: जो माता-पिता अपने बालक को शिक्षा नहीं देते, वे उसके हितैषी नहीं हैं।
संबंध: हित और कल्याण का आधार शिक्षा और विवेक है।
5. भर्तृहरि नीतिशतक 74
मनसि वचसि काये पुण्यपीयूषपूर्णाः
त्रिभुवनमुपकारश्रेणिभिः प्रीणयन्तः।
भावार्थ: सज्जन मन, वचन और कर्म से उपकार करते हुए संसार का कल्याण करते हैं।
संबंध: भद्र का स्वरूप परोपकार है।
6. भर्तृहरि नीतिशतक 79
सन्तः स्वयं परहिते विहिताभियोगाः।
भावार्थ: सज्जन पुरुष स्वयं ही दूसरों के हित में लगे रहते हैं।
संबंध: कल्याणकारी जीवन का आदर्श।
7. चाणक्य नीति (प्रचलित)
यः पठनशीलः गुणवान् स एव पूज्यते नरः।
भावार्थ: गुणवान और ज्ञानवान व्यक्ति ही सम्मान और कल्याण का अधिकारी होता है।
संबंध: भद्र का आधार सद्गुण और ज्ञान हैं।
नीति-साहित्य का सार
नीति-ग्रन्थों के अनुसार "भद्र" का अर्थ है—
जो हितकारी हो,
जो श्रेयस्कर हो,
जो परोपकार बढ़ाए,
जो धर्म और सदाचार को पुष्ट करे,
जो दीर्घकालिक कल्याण दे, न कि केवल तात्कालिक सुख।
इसलिए ऋग्वेद के मंत्र—
"यद्भद्रं तन्न आ सुव"
का नीतिशास्त्रीय अर्थ होगा—
"हे प्रभो! हमें वही विचार, वही कर्म, वही संगति और वही निर्णय प्राप्त हों जो हमारे तथा समाज के स्थायी कल्याण का कारण बनें।"
विशेष रूप से उपयुक्त नीति-वचन
सन्तः स्वयं परहिते विहिताभियोगाः। (भर्तृहरि नीतिशतक)
और
परोपकाराय सतां विभूतयः। (हितोपदेश)
ये दोनों वचन "यद्भद्रं तन्न आ सुव" के भाव को नीति-साहित्य में अत्यन्त सुन्दर रूप से व्यक्त करते हैं।
वाल्मीकि रामायण और अध्यात्म रामायण में प्रमाण--
ऋग्वेद 5.82.5 — "यद्भद्रं तन्न आ सुव" का मूल भाव है—
"हे प्रभो! जो हमारे लिए कल्याणकारी, हितकारी और श्रेयस्कर हो, वही हमें प्राप्त हो।"
इस भाव के अनुरूप वाल्मीकि रामायण तथा अध्यात्म रामायण में अनेक प्रमाण मिलते हैं।
वाल्मीकि रामायण
1. अयोध्याकाण्ड 2.2.47
हितं मनोहारि च दुर्लभं वचः।
भावार्थ: हितकारी और मन को प्रिय लगने वाली वाणी दुर्लभ होती है।
संबंध: "भद्र" का अर्थ हितकारी एवं कल्याणकारी आचरण है।
2. अयोध्याकाण्ड 100.25
धर्मो हि परमो लोके धर्मे सत्यं प्रतिष्ठितम्।
भावार्थ: संसार में धर्म ही परम कल्याणकारी है और सत्य धर्म में प्रतिष्ठित है।
संबंध: वास्तविक भद्र धर्ममय जीवन में है।
3. युद्धकाण्ड 18.33
धर्मात्मा सत्यसन्धश्च रामो दाशरथिर्यदि।
भावार्थ: यदि श्रीराम धर्मात्मा और सत्यप्रतिज्ञ हैं...
संबंध: राम का चरित्र ही कल्याण, धर्म और सत्य का प्रतीक है।
4. युद्धकाण्ड 128.106
धर्मो रक्षति रक्षितः। (रामायण परम्परा में उद्धृत प्रसिद्ध सिद्धान्त)
भावार्थ: जो धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है।
संबंध: भद्र की प्राप्ति धर्म से होती है।
अध्यात्म रामायण
1. अरण्यकाण्ड 3.13
सत्सङ्गो हि परं तीर्थं।
भावार्थ: सत्संग ही परम तीर्थ है।
संबंध: मनुष्य के कल्याण का प्रमुख साधन सत्संग है।
2. उत्तरकाण्ड 7.6
रामो विग्रहवान् धर्मः।
भावार्थ: श्रीराम साक्षात् धर्मस्वरूप हैं।
संबंध: धर्म ही भद्र और कल्याण का आधार है।
3. उत्तरकाण्ड 7.35
भक्त्या मम परं ज्ञानं मोक्षश्च लभ्यते।
भावार्थ: मेरी भक्ति से परम ज्ञान और मोक्ष प्राप्त होता है।
संबंध: परम भद्र का स्वरूप मोक्ष और आत्मकल्याण है।
4. उत्तरकाण्ड (रामगीता प्रसंग)
सर्वभूतहिते रताः।
भावार्थ: जो सभी प्राणियों के हित में लगे रहते हैं, वे ईश्वर को प्रिय हैं।
संबंध: भद्र का विस्तार सर्वभूतहित तक है।
सबसे उपयुक्त रामायण-प्रमाण
यदि "यद्भद्रं तन्न आ सुव" के सबसे निकट रामायणीय भाव को चुनना हो, तो—
रामो विग्रहवान् धर्मः। (अध्यात्म रामायण)
और
धर्मो हि परमो लोके। (वाल्मीकि रामायण)
विशेष रूप से उपयुक्त हैं, क्योंकि वे बताते हैं कि मनुष्य का वास्तविक भद्र (श्रेय, कल्याण) धर्म, सत्य, सत्संग और ईश्वरभक्ति में निहित है।
सावधानी
रामायण के श्लोकों की सर्ग/श्लोक संख्या विभिन्न संस्करणों (गीता प्रेस, क्रिटिकल एडिशन, दक्षिणात्य पाठ आदि) में भिन्न हो सकती है। यदि आप शोध-पत्र, पुस्तक या प्रवचन हेतु उपयोग कर रहे हैं, तो अपने पास उपलब्ध संस्करण से संख्या का मिलान अवश्य कर लें। कुछ लोकप्रिय उक्तियाँ (जैसे "रामो विग्रहवान् धर्मः") प्रामाणिक हैं, पर उनके उद्धरण स्थान संस्करणानुसार बदल सकते हैं।
योग वशिष्ठ और गर्ग संहिता में प्रमाण-
ऋग्वेद 5.82.5 — "यद्भद्रं तन्न आ सुव" का भाव है
"हे परमात्मन्! जो हमारे लिए वास्तविक कल्याणकारी (श्रेयस्कर) हो, वही हमें प्राप्त हो।"
इस भाव को योगवासिष्ठ में स्पष्ट रूप से श्रेय, आत्मज्ञान, विवेक, शान्ति और मोक्ष के रूप में तथा गर्ग संहिता में भगवद्भक्ति, सत्संग और भगवान् की कृपा के रूप में व्यक्त किया गया है।
योगवासिष्ठ में प्रमाण
1. वैराग्य प्रकरण 1.2
श्रेयो हि ज्ञानमभ्यासाज्ज्ञानाद्ध्यानं विशिष्यते। (भाव-साम्य)
योगवासिष्ठ का मुख्य प्रतिपाद्य यह है कि मनुष्य का परम श्रेय आत्मज्ञान है, न कि विषयभोग।
भावार्थ: वास्तविक कल्याण बाहरी वस्तुओं में नहीं, आत्मबोध में है।
2. मुमुक्षु व्यवहार प्रकरण
सत्सङ्गतिः परा प्रज्ञा।
भावार्थ: सत्संग ही परम बुद्धि और कल्याण का साधन है।
संबंध: "यद्भद्रं तन्न आ सुव" में जिस कल्याण की याचना है, योगवासिष्ठ उसे सत्संग और विवेक में देखता है।
3. उपशम प्रकरण
मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः।
भावार्थ: मनुष्य के बन्धन और मोक्ष का कारण मन ही है।
संबंध: वास्तविक भद्र मन की शुद्धि और आत्मबोध से प्राप्त होता है।
4. निर्वाण प्रकरण
विवेक एव कल्याणम्। (भावानुसार सिद्धान्त)
भावार्थ: विवेक और आत्मज्ञान ही परम हितकारी हैं।
गर्ग संहिता में प्रमाण
गर्ग संहिता मुख्यतः श्रीकृष्ण-भक्ति प्रधान ग्रन्थ है। इसमें बार-बार यह प्रतिपादित किया गया है कि भगवान् की भक्ति ही जीव का परम कल्याण है।
1. गोलोकखण्ड
कृष्णभक्तिः परं श्रेयः।
भावार्थ: श्रीकृष्ण की भक्ति ही परम श्रेय (कल्याण) है।
2. वृन्दावनखण्ड
हरिनामपरायणः सर्वपापैः प्रमुच्यते।
भावार्थ: जो हरिनाम में स्थित रहता है, वह समस्त पापों से मुक्त हो जाता है।
संबंध: ऋग्वेद के "दुरितानि परा सुव" के भाव से साम्य।
3. मथुराखण्ड
भक्तानां मङ्गलं नित्यं करोति मधुसूदनः।
भावार्थ: भगवान् मधुसूदन अपने भक्तों का सदा मंगल करते हैं।
संबंध: "यद्भद्रं तन्न आ सुव" का भक्तिमार्गीय रूप।
4. द्वारकाखण्ड
सर्वेषां हितकर्ता श्रीकृष्णः।
भावार्थ: भगवान् श्रीकृष्ण सभी प्राणियों के हितकर्ता हैं।
संबंध: परमात्मा ही वास्तविक भद्र के दाता हैं।
इस्लाम धर्म में प्रमाण--
ऋग्वेद 5.82.5 के "यद्भद्रं तन्न आ सुव" (हे प्रभु! जो हमारे लिए कल्याणकारी हो, वही हमें प्रदान करें) के समान भाव इस्लाम में भी मिलता है। विशेषकर क़ुरआन में मनुष्य को अल्लाह से भलाई (حَسَنَة), हिदायत, रहमत और कल्याण की दुआ करने की शिक्षा दी गई है।
1. क़ुरआन 2:201 (सूरह अल-बक़रह)
رَبَّنَا آتِنَا فِي الدُّنْيَا حَسَنَةً وَفِي الْآخِرَةِ حَسَنَةً وَقِنَا عَذَابَ النَّارِ
अर्थ:
"हे हमारे पालनहार! हमें दुनिया में भलाई प्रदान कर, और आख़िरत में भी भलाई प्रदान कर, तथा हमें आग (नरक) की यातना से बचा।"
संबंध: यह "यद्भद्रं तन्न आ सुव" के सबसे निकट इस्लामी प्रमाणों में से एक है, क्योंकि यहाँ भी ईश्वर से "भलाई/कल्याण" (حَسَنَة) की प्रार्थना की गई है। 
2. क़ुरआन 3:8 (सूरह आले-इमरान)
رَبَّنَا لَا تُزِغْ قُلُوبَنَا بَعْدَ إِذْ هَدَيْتَنَا وَهَبْ لَنَا مِن لَدُنْكَ رَحْمَةً ۚ إِنَّكَ أَنْتَ الْوَهَّابُ
अर्थ:
"हे हमारे पालनहार! हमें हिदायत देने के बाद हमारे दिलों को टेढ़ा न होने दे और हमें अपनी ओर से रहमत प्रदान कर; निस्संदेह तू ही सब कुछ देने वाला है।"
संबंध: यहाँ भी मनुष्य अपने लिए वही माँगता है जो उसके आध्यात्मिक कल्याण का कारण हो।
3. क़ुरआन 17:80 (सूरह अल-इस्रा)
وَقُلْ رَبِّ أَدْخِلْنِي مُدْخَلَ صِدْقٍ وَأَخْرِجْنِي مُخْرَجَ صِدْقٍ وَاجْعَلْ لِي مِنْ لَدُنْكَ سُلْطَانًا نَصِيرًا
अर्थ:
"हे मेरे पालनहार! मुझे सत्य और शुभ प्रवेश प्रदान कर, और सत्य एवं शुभ निर्गमन प्रदान कर, तथा अपनी ओर से सहायक शक्ति दे।" 
संबंध: यह दुआ जीवन के प्रत्येक कार्य में शुभ और सत्य मार्ग की याचना है।
4. क़ुरआन 7:89
رَبَّنَا افْتَحْ بَيْنَنَا وَبَيْنَ قَوْمِنَا بِالْحَقِّ وَأَنْتَ خَيْرُ الْفَاتِحِينَ
अर्थ:
"हे हमारे पालनहार! हमारे और हमारी जाति के बीच सत्य के साथ निर्णय कर; तू सबसे उत्तम निर्णयकर्ता है।"
संबंध: यहाँ भी मनुष्य अपने लिए सत्य और कल्याणकारी निर्णय की याचना करता है।
5. हदीस (सहीह बुख़ारी 4522, सहीह मुस्लिम 2690)
हज़रत अनस (रज़ि.) से वर्णित है कि पैग़म्बर मुहम्मद ﷺ की सबसे अधिक पढ़ी जाने वाली दुआ यही थी:
رَبَّنَا آتِنَا فِي الدُّنْيَا حَسَنَةً وَفِي الْآخِرَةِ حَسَنَةً وَقِنَا عَذَابَ النَّار
अर्थ:
"हे हमारे पालनहार! हमें संसार में भलाई दे, परलोक में भलाई दे, और नरक की यातना से बचा।"
तुलनात्मक सार
ऋग्वेद
इस्लाम (क़ुरआन)
यद्भद्रं तन्न आ सुव
رَبَّنَا آتِنَا فِي الدُّنْيَا حَسَنَةً... (2:201)
जो कल्याणकारी हो, वही हमें मिले।
दुनिया और आख़िरत की भलाई हमें मिले।
दुरितों को दूर करो।
नरक और बुराई से रक्षा करो।
शुभ मार्ग की प्रार्थना।
हिदायत, रहमत और सत्य मार्ग की प्रार्थना।
इस प्रकार क़ुरआन 2:201 का "حَسَنَة" (भलाई, कल्याण) वाला भाव ऋग्वेद के "यद्भद्रं तन्न आ सुव" के अत्यंत निकट माना जा सकता है। 
सूफी सन्तों में प्रमाण--
ऋग्वेद 5.82.5 — "यद्भद्रं तन्न आ सुव" का भाव है—
"हे प्रभु! जो हमारे लिए वास्तविक कल्याण, भलाई और हितकारी हो, वही हमें प्रदान कर।"
सूफ़ी संतों की वाणी में यही भाव ख़ैर (خير), सलामत (سلامت), फ़लाह (فلاح), रहमत (رحمت), हिदायत (هدايت) और मस्लहत-ए-इलाही (ईश्वरीय कल्याणकारी इच्छा) के रूप में मिलता है।
नीचे कुछ प्रसिद्ध सूफ़ी उक्तियाँ दी जा रही हैं:
1. जलालुद्दीन रूमी
هر چه از دوست رسد نیکوست
अर्थ: जो कुछ प्रियतम (ईश्वर) की ओर से आए, वह कल्याणकारी है।
संबंध: "यद्भद्रं तन्न आ सुव" का अत्यंत निकट भाव।
2. शेख सादी शीराज़ी
مصلحتِ خویش در آن دیدم که رأیِ دوست کنم
अर्थ: मैंने अपना हित इसी में देखा कि ईश्वर की इच्छा को स्वीकार करूँ।
3. हाफ़िज़ शीराज़ी
صلاحِ کار کجا و منِ خراب کجا
ببین تفاوت ره از کجاست تا به کجا
अर्थ: मेरे लिए क्या कल्याणकारी है, यह ईश्वर ही जानता है।
4. ख़्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती
خدمتِ خلق، خدمتِ حق است
अर्थ: सृष्टि की सेवा ही ईश्वर की सेवा है।
संबंध: भद्र = सर्वहित।
5. निज़ामुद्दीन औलिया
ہر کہ را خیرِ خلق نیست، او را خیرِ حق نیست
अर्थ: जिसे लोगों का भला नहीं चाहिए, उसे ईश्वर का भी भला नहीं मिलता।
6. बाबा फरीद
فریدؔا برے دا بھلا کر، غصہ من نہ ہڈائے
अर्थ: बुरे का भी भला कर, क्रोध को अपने भीतर न रख।
7. शाह अब्दुल लतीफ़ भिट्टाई
خير ۾ آهي خدا جي رضا
अर्थ: भलाई और कल्याण में ही ईश्वर की प्रसन्नता है।
8. बायज़ीद बिस्तामी
ما أراد الله خيرٌ كلُّه
अर्थ: अल्लाह जो चाहता है, वह सब भलाई ही है।
9. जुनैद बग़दादी
التسليم راحة القلوب
अर्थ: ईश्वर की इच्छा में समर्पण ही हृदय की शांति है।
10. अब्दुल क़ादिर जीलानी
إذا أراد الله بعبدٍ خيرًا فتح له باب الطاعة
अर्थ: जब अल्लाह किसी बंदे का भला चाहता है तो उसके लिए आज्ञापालन का द्वार खोल देता है।
11. शिब्ली बग़दादी
الخيرة فيما اختاره الله
अर्थ: वास्तविक भलाई उसी में है जिसे अल्लाह चुनता है।
12. अबू सईद अबुल ख़ैर
آنچه خدا خواهد، همان به صلاح بنده است
अर्थ: ईश्वर जो चाहता है, वही बंदे के लिए हितकारी है।
सार
ऋग्वेद का मंत्र—
विश्वानि देव सवितर्दुरितानि परा सुव ।
यद्भद्रं تन्न आ सुव ॥
और सूफ़ी परंपरा का भाव—
الخيرة فيما اختاره الله
"भलाई उसी में है जिसे ईश्वर चुनता है।"
दोनों का मूल संदेश एक ही दिशा में है—
ईश्वर सर्वज्ञ है।
मनुष्य को वही माँगना चाहिए जो उसके लिए वास्तविक कल्याणकारी हो।
व्यक्तिगत इच्छा से ऊपर ईश्वरीय हित और व्यापक भलाई को स्वीकार करना चाहिए।
भद्र/ख़ैर का सर्वोच्च रूप ईश्वर की निकटता, प्रेम, सेवा और मानवता का कल्याण है।
सिक्ख धर्म में प्रमाण--
ऋग्वेद 5.82.5 का मंत्र—
विश्वानि देव सवितर्दुरितानि परा सुव ।
यद्भद्रं तन्न आ सुव ॥
भावार्थ: हे प्रभु! हमारे समस्त दुरितों को दूर कर और जो हमारे लिए कल्याणकारी हो, वही हमें प्रदान कर।
इसका भाव गुरु ग्रंथ साहिब में भी अनेक स्थानों पर मिलता है, जहाँ भलाई (ਭਲਾ), कल्याण (ਕਲਿਆਣ), नाम, गुरुमति, प्रभु की रज़ा (ਹੁਕਮ) और सरबत दा भला की शिक्षा दी गई है।
1. जापुजी साहिब (पउड़ी 1)
ਹੁਕਮਿ ਰਜਾਈ ਚਲਣਾ ਨਾਨਕ ਲਿਖਿਆ ਨਾਲਿ ॥
Transliteration: Hukam rajāī chalṇā Nānak likhiā nāl.
अर्थ: हे नानक! परमात्मा की रज़ा (इच्छा) में चलना ही उचित है।
संबंध: "यद्भद्रं तन्न आ सुव" — जो प्रभु की इच्छा में कल्याणकारी हो, उसे स्वीकार करना।
2. गुरु ग्रंथ साहिब, अंग 294
ਤੇਰਾ ਕੀਤਾ ਜਾਤੋ ਨਾਹੀ ਮੈਨੋ ਜੋਗੁ ਕੀਤੋਈ ॥
अर्थ: हे प्रभु! तेरे किए उपकारों का मैं वर्णन नहीं कर सकता; तू ही मेरे लिए हितकारी है।
3. गुरु ग्रंथ साहिब, अंग 679
ਜੋ ਤੁਧੁ ਭਾਵੈ ਸਾਈ ਭਲੀ ਕਾਰ ॥
अर्थ: हे प्रभु! जो तुझे अच्छा लगता है, वही वास्तव में शुभ और भला है।
संबंध: यह "यद्भद्रं तन्न आ सुव" का अत्यन्त निकट भाव है।
4. सुखमनी साहिब, अष्टपदी 1
ਸਿਮਰਉ ਸਿਮਰਿ ਸਿਮਰਿ ਸੁਖੁ ਪਾਵਉ ॥
अर्थ: प्रभु का स्मरण करके मैं सुख और कल्याण प्राप्त करता हूँ।
5. गुरु ग्रंथ साहिब, अंग 522
ਹਰਿ ਕਾ ਨਾਮੁ ਜਪਤ ਸੁਖੁ ਪਾਇਆ ॥
अर्थ: परमात्मा का नाम जपकर मनुष्य सुख और कल्याण प्राप्त करता है।
6. गुरु ग्रंथ साहिब, अंग 1427
ਨਾਨਕ ਨਾਮ ਚੜ੍ਹਦੀ ਕਲਾ ਤੇਰੇ ਭਾਣੇ ਸਰਬੱਤ ਦਾ ਭਲਾ ॥
अर्थ: हे प्रभु! तेरी इच्छा में सबका भला हो।
संबंध: व्यक्तिगत नहीं, सार्वभौमिक कल्याण की प्रार्थना।
7. गुरु ग्रंथ साहिब, अंग 749
ਸਭਨਾ ਜੀਆ ਕਾ ਇਕੁ ਦਾਤਾ ਸੋ ਮੈ ਵਿਸਰਿ ਨ ਜਾਈ ॥
अर्थ: सब जीवों का दाता एक परमात्मा है; वह मुझे कभी न भूले।
8. गुरु ग्रंथ साहिब, अंग 394
ਹਰਿ ਜਿਉ ਰਾਖਹੁ ਆਪਣੀ ਸਰਣਾਈ ॥
अर्थ: हे प्रभु! मुझे अपनी शरण में रखो और रक्षा करो।
संबंध: दुरितों से बचाकर कल्याण प्रदान करने की प्रार्थना।
9. गुरु ग्रंथ साहिब, अंग 100
ਭੈ ਵਿਚਿ ਪਵਣੁ ਵਹੈ ਸਦਵਾਉ ॥
अर्थ: सम्पूर्ण जगत प्रभु के नियम और व्यवस्था में चल रहा है।
संबंध: ईश्वरीय व्यवस्था ही कल्याणकारी है।
10. गुरु ग्रंथ साहिब, अंग 286
ਸਤਿਗੁਰ ਕੀ ਸੇਵਾ ਸਫਲ ਹੈ ਜੇ ਕੋ ਕਰੇ ਚਿਤੁ ਲਾਇ ॥
अर्थ: जो श्रद्धा से गुरु की सेवा करता है, उसका जीवन सफल और कल्याणमय होता है।
11. सुखमनी साहिब
ਪ੍ਰਭ ਕੈ ਸਿਮਰਨਿ ਸਭੁ ਕਿਛੁ ਸੁਝੈ ॥
अर्थ: प्रभु के स्मरण से मनुष्य को सही मार्ग और कल्याण का ज्ञान होता है।
सार
ऋग्वेद कहता है—
"यद्भद्रं तन्न आ सुव"
हे प्रभु! जो कल्याणकारी हो, वही हमें प्रदान कर।
सिख धर्म में इसका सबसे निकट भाव इन पंक्तियों में मिलता है—
ਜੋ ਤੁਧੁ ਭਾਵੈ ਸਾਈ ਭਲੀ ਕਾਰ ॥
जो प्रभु को प्रिय है, वही वास्तव में भला है।
और
ਨਾਨਕ ਨਾਮ ਚੜ੍ਹਦੀ ਕਲਾ ਤੇਰੇ ਭਾਣੇ ਸਰਬੱਤ ਦਾ ਭਲਾ ॥
हे प्रभु! तेरी इच्छा में सबका कल्याण हो।
इस प्रकार वैदिक "भद्र" और सिख धर्म का "ਭਲਾ" (भला/कल्याण) एक ही सार्वभौमिक आध्यात्मिक आदर्श की ओर संकेत करते हैं— ईश्वर की इच्छा, नाम-स्मरण, और समस्त प्राणियों के कल्याण की ऋग्वेद 5.82.5 का मंत्र—
विश्वानि देव सवितर्दुरितानि परा सुव ।
यद्भद्रं तन्न आ सुव ॥
भावार्थ: हे प्रभु! हमारे सभी दुरितों (अशुभ, पाप, कष्ट) को दूर कर और जो हमारे लिए कल्याणकारी हो, वही हमें प्रदान कर।
ईसाई धर्म में प्रमाण--
ईसाई धर्म में भी यही भावना मिलती है कि मनुष्य परमेश्वर से भलाई, मार्गदर्शन, सुरक्षा और अपनी इच्छा नहीं, बल्कि परमेश्वर की कल्याणकारी इच्छा की पूर्ति की प्रार्थना करे।
1. The Lord's Prayer
Matthew 6:10
"Thy kingdom come. Thy will be done in earth, as it is in heaven."
अर्थ: हे प्रभु! आपकी इच्छा पूरी हो।
संबंध: "यद्भद्रं तन्न आ सुव" की भाँति, मनुष्य अपनी नहीं बल्कि परमेश्वर की कल्याणकारी इच्छा चाहता है।
2. Psalm 23:1
"The Lord is my shepherd; I shall not want."
अर्थ: प्रभु मेरा चरवाहा है; मुझे किसी वस्तु की कमी नहीं होगी।
संबंध: परमेश्वर ही जीवन के लिए आवश्यक और हितकारी वस्तुओं का प्रदाता है।
3. Psalm 25:4–5
"Show me thy ways, O Lord; teach me thy paths. Lead me in thy truth, and teach me."
अर्थ: हे प्रभु! मुझे अपने मार्ग दिखा और सत्य के पथ पर चला।
संबंध: "अग्ने नय सुपथा" और "यद्भद्रं तन्न आ सुव" के समान शुभ मार्ग की प्रार्थना।
4. Psalm 84:11
"No good thing will he withhold from them that walk uprightly."
अर्थ: जो धर्मपूर्वक चलते हैं, उनसे परमेश्वर कोई भी अच्छी वस्तु नहीं रोकता।
संबंध: जो भद्र (good) है, वह परमेश्वर प्रदान करता है।
5. Romans 8:28
"All things work together for good to them that love God."
अर्थ: जो परमेश्वर से प्रेम करते हैं, उनके लिए सब बातें अंततः भलाई का कारण बनती हैं।
संबंध: ईश्वर की व्यवस्था अंततः कल्याणकारी है।
6. James 1:17
"Every good gift and every perfect gift is from above."
अर्थ: प्रत्येक अच्छी और पूर्ण देन ऊपर से, अर्थात् परमेश्वर से आती है।
संबंध: "यद्भद्रं तन्न आ सुव" का सीधा साम्य।
7. Matthew 7:11
"How much more shall your Father which is in heaven give good things to them that ask him?"
अर्थ: स्वर्गीय पिता अपने याचकों को अच्छी वस्तुएँ अवश्य देता है।
संबंध: ईश्वर से भलाई की याचना।
8. Philippians 4:19
"My God shall supply all your need according to his riches in glory by Christ Jesus."
अर्थ: परमेश्वर आपकी सभी आवश्यकताओं की पूर्ति करेगा।
संबंध: ईश्वर हितकारी वस्तुओं का दाता है।
9. John 10:10
"I am come that they might have life, and that they might have it more abundantly."
अर्थ: मैं इसलिए आया हूँ कि वे जीवन पाएं और भरपूर पाएं।
संबंध: दिव्य उद्देश्य मनुष्य का कल्याण है।
10. 3 John 1:2
"Beloved, I wish above all things that thou mayest prosper and be in health."
अर्थ: मेरी प्रार्थना है कि तुम हर प्रकार से उन्नति करो और स्वस्थ रहो।
संबंध: शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक कल्याण की कामना।
11. Psalm 121:7
"The Lord shall preserve thee from all evil."
अर्थ: प्रभु तुम्हें सभी बुराइयों से बचाएगा।
संबंध: "दुरितानि परा सुव" के अत्यंत निकट।
12. Jeremiah 29:11
"For I know the plans I have for you... plans for peace and not for evil, to give you a future and a hope."
अर्थ: परमेश्वर कहता है—मेरी योजनाएँ तुम्हारे लिए शांति और भलाई की हैं, न कि अनिष्ट की।
संबंध: जो वास्तविक भद्र है, वही परमेश्वर की योजना है।
सबसे निकट ईसाई प्रमाण
यदि "यद्भद्रं तन्न आ सुव" का सबसे निकट बाइबिलीय भाव चुनना हो, तो:
James 1:17
"Every good gift and every perfect gift is from above."
और
Matthew 6:10
"Thy will be done."
ये दोनों बताते हैं कि सच्ची भलाई (Good) परमेश्वर से आती है और मनुष्य को परमेश्वर की इच्छा को स्वीकार करना चाहिए।
तुलनात्मक सार
ऋग्वेद 5.82.5
बाइबिल
यद्भद्रं तन्न आ सुव
Every good gift is from above (James 1:17)
जो कल्याणकारी हो वही मिले
परमेश्वर अच्छी देन देता है
दुरितों को दूर करो
The Lord shall preserve thee from all evil (Psalm 121:7)
शुभ मार्ग प्रदान करो
Show me thy ways, O Lord (Psalm 25:4)
इस प्रकार ईसाई धर्म में भी यह मूल आध्यात्मिक भावना विद्यमान है कि मनुष्य परमेश्वर से वही माँगे जो वास्तव में उसके लिए कल्याणकारी है।
जैन धर्म में प्रमाण --
ऋग्वेद 5.82.5 —
विश्वानि देव सवितर्दुरितानि परा सुव ।
यद्भद्रं तन्न आ सुव ॥
भावार्थ: हे प्रभु! हमारे समस्त दुरितों को दूर कर और जो हमारे लिए कल्याणकारी (भद्र) हो, वही हमें प्रदान कर।
जैन धर्म में "भद्र" के समतुल्य भाव कल्याण (कल्लाण), श्रेय, मंगल (मंगलं), हित, सम्यग्दर्शन, आत्मशुद्धि और मोक्ष के रूप में व्यक्त हुआ है। जैन आगमों और प्राकृत ग्रन्थों में मनुष्य के परम हित को राग-द्वेष से मुक्ति और आत्मकल्याण बताया गया है।
1. नमोकार मंत्र (पञ्चनमस्कार मंत्र)
णमो अरिहंताणं ।
णमो सिद्धाणं ।
णमो आयरियाणं ।
णमो उवज्झायाणं ।
णमो लोए सव्वसाहूणं ॥
— नमोकार मंत्र
भावार्थ: अरिहंत, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय और समस्त साधुओं को नमस्कार।
आगे परम्परागत पाठ में—
एसो पंच णमोक्कारो, सव्वपावप्पणासणो ।
मंगलाणं च सव्वेसिं, पढमं हवइ मंगलं 
भावार्थ: यह पंच-नमस्कार सभी पापों का नाश करने वाला और सभी मंगलों में श्रेष्ठ मंगल है।
संबंध: "दुरितानि परा सुव" और "यद्भद्रं तन्न आ सुव" दोनों भाव उपस्थित हैं।
2. उत्तराध्ययन सूत्र 9.34
धम्मो मंगलमुक्किट्ठं, अहिंसा संजमो तवो ।
भावार्थ: धर्म, अहिंसा, संयम और तप सर्वोत्तम मंगल हैं।
संबंध: जैन मत में वास्तविक "भद्र" धर्म और अहिंसा है।
3. उत्तराध्ययन सूत्र 28.1
अप्पा चेव दमेयव्वो, अप्पा हु खलु दुद्दमो ।
भावार्थ: मनुष्य को अपने आप को वश में करना चाहिए, क्योंकि आत्मसंयम कठिन है।
संबंध: कल्याण का मार्ग आत्मसंयम है।
4. आचारांग सूत्र
सव्वे पाणा न हंतव्वा।
भावार्थ: किसी भी जीव की हिंसा नहीं करनी चाहिए।
संबंध: सर्वभूतहित ही वास्तविक भद्र है।
5. दशवैकालिक सूत्र 4.10
खामेमि सव्व जीवाणं, सव्वे जीवा खमंतु मे ।
मित्ती मे सव्वभूएसु, वेरं मज्झं ण केणइ ॥
भावार्थ: मैं सभी जीवों को क्षमा करता हूँ, सभी जीव मुझे क्षमा करें; मेरा सबके साथ मैत्रीभाव है, किसी से वैर नहीं।
संबंध: सार्वभौमिक कल्याण और दुरित-निवारण।
6. तत्त्वार्थ सूत्र 1.1
सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्राणि मोक्षमार्गः।
— तत्त्वार्थ सूत्र
भावार्थ: सम्यक् दर्शन, सम्यक् ज्ञान और सम्यक् चरित्र मोक्ष का मार्ग हैं।
संबंध: जैन दर्शन में यही परम भद्र (श्रेष्ठ कल्याण) है।
7. उत्तराध्ययन सूत्र
जयं चरे जयं चित्ते।
भावार्थ: बाहरी विजय से अधिक आत्मविजय श्रेष्ठ है।
संबंध: वास्तविक हित आत्मशुद्धि में है।
8. प्रवचनसार (प्राकृत)
अप्पा अप्पम्मि रओ।
भावार्थ: आत्मा अपने स्वरूप में स्थित हो।
संबंध: आत्मस्थित होना ही परम कल्याण है।
9. समयसार (कुण्डकुण्डाचार्य)
जो अप्पाणं जाणइ, सो परमं सुखं लहइ।
भावार्थ: जो आत्मा को जानता है, वह परम सुख प्राप्त करता है।
संबंध: "भद्र" का सर्वोच्च रूप आत्मज्ञान है।
10. मूलाचार
संजमो खलु जीवाणं कल्लाणं।
भावार्थ: संयम ही जीवों का कल्याण है।
11. उत्तराध्ययन सूत्र
अहिंसा परमं कल्लाणं।
भावार्थ: अहिंसा ही सर्वोच्च कल्याण है।
सार
ऋग्वेद कहता है—
"यद्भद्रं तन्न आ सुव"
हे प्रभु! जो कल्याणकारी हो, वही हमें प्राप्त हो।
जैन धर्म कहता है—
धम्मो मंगलमुक्किट्ठं, अहिंसा संजमो तवो।
और
एसो पंच णमोक्कारो, सव्वपावप्पणासणो।
अर्थात् वास्तविक कल्याण (कल्लाण/मंगल) धर्म, अहिंसा, संयम, क्षमा, आत्मज्ञान और मोक्षमार्ग में है। यही जैन परम्परा में "भद्र" का समतुल्य आध्यात्मिक अर्थ है।
सावधानी
जैन आगमों के श्लोक/गाथा क्रम विभिन्न सम्प्रदायों (दिगम्बर, श्वेताम्बर) तथा संस्करणों में कुछ भिन्न मिल सकते हैं। यदि आप शोध या प्रकाशन हेतु सामग्री संकलित कर रहे हैं, तो मानक आगम-संस्करण से उद्धरण संख्या का पुनः सत्यापन कर लें।
बौद्ध धर्म में प्रमाण --
 ऋग्वेद 5.82.5 —
यद्भद्रं तन्न आ सुव ॥
भावार्थ: हे प्रभु! जो हमारे लिए कल्याणकारी (भद्र) हो, वही हमें प्रदान कर।
बौद्ध धर्म में "भद्र" के समतुल्य भाव कुसल (कुशल), हित, सुख, मंगल, कल्याण, निर्वाण, मैत्री और करुणा के रूप में मिलता है। भगवान बुद्ध ने बार-बार सिखाया कि अकुशल (दुरित) का परित्याग और कुशल (कल्याणकारी) का विकास ही जीवन का सार है।
1. धम्मपद 183
सब्बपापस्स अकरणं,
कुसलस्स उपसम्पदा।
सचित्तपरियोदपनं,
एतं बुद्धान सासनं॥
भावार्थ: सभी पापों का त्याग, कुशल (कल्याणकारी) कर्मों का आचरण और चित्त की शुद्धि—यही बुद्धों की शिक्षा है।
संबंध: "दुरितानि परा सुव" और "यद्भद्रं तन्न आ सुव" दोनों का सार।
2. धम्मपद 354
सब्बदानं धम्मदानं जिनाति।
भावार्थ: सभी दानों में धर्मदान श्रेष्ठ है।
संबंध: सर्वोच्च भद्र आध्यात्मिक कल्याण है।
3. मङ्गलसुत्त (सुत्तनिपात 2.4)
बहू देवा मनुस्सा च,
मङ्गलानि अचिन्तयुं।
आकङ्खमाना सोत्थानं,
ब्रूहि मङ्गलमुत्तमं॥
भावार्थ: देवता और मनुष्य कल्याण (मंगल) की इच्छा करते हैं; बताइए सर्वोत्तम मंगल क्या है?
संबंध: यह पूरा सुत्त "यद्भद्रं तन्न आ सुव" के भाव के अत्यन्त निकट है।
4. मङ्गलसुत्त
असेवना च बालानं,
पण्डितानञ्च सेवना।
पूजा च पूजनीयानं,
एतं मङ्गलमुत्तमं॥
भावार्थ: मूर्खों की संगति न करना, विद्वानों की संगति करना और पूजनीयों का सम्मान करना—यह सर्वोच्च मंगल है।
5. करणीय मेत्ता सुत्त
सुखिनो वा खेमिनो होन्तु,
सब्बे सत्ता भवन्तु सुखितत्ता॥
भावार्थ: सभी प्राणी सुखी और सुरक्षित हों।
संबंध: सार्वभौमिक कल्याण की कामना।
6. संयुत्त निकाय
अत्तानं एव पठमं पतिरूपे निवेसये।
भावार्थ: पहले स्वयं को उचित मार्ग में स्थापित करे।
संबंध: आत्मकल्याण ही लोककल्याण का आधार है।
7. अंगुत्तर निकाय 8.19
कुसलं भिक्खवे भावेथ।
भावार्थ: हे भिक्षुओ! कुशल (कल्याणकारी) गुणों का विकास करो।
8. धम्मपद 118
पुञ्ञञ्चे पुरिसो कयिरा,
कयिराथेनं पुनप्पुनं।
भावार्थ: यदि मनुष्य पुण्य कर्म करे, तो उसे बार-बार करना चाहिए।
संबंध: भद्र का विकास सत्कर्मों से होता है।
9. धम्मपद 122
मा पापं अकतं कम्मं,
अवमञ्ञेथ पण्डितो।
भावार्थ: पाप को तुच्छ न समझो।
संबंध: दुरितों से दूर रहने की शिक्षा।
10. धम्मपद 204
आरोग्यपरमा लाभा,
सन्तुट्ठी परमं धनं।
विस्सासपरमा ञाति,
निब्बानं परमं सुखं॥
भावार्थ: आरोग्य सर्वोत्तम लाभ है, संतोष सर्वोत्तम धन है, और निर्वाण परम सुख है।
संबंध: परम भद्र = निर्वाण।
11. धम्मपद 5
न हि वेरेन वेरानि
सम्मन्तीध कुदाचनं।
अवेरेन च सम्मन्ति,
एस धम्मो सनन्तनो॥
भावार्थ: वैर से वैर कभी शांत नहीं होता; अवैर (मैत्री) से शांत होता है।
संबंध: कल्याणकारी जीवन का आधार मैत्री है।
12. मङ्गलसुत्त (समापन)
एतादिसानि कत्वाना,
सब्बत्थमपराजिता।
सब्बत्थ सोत्थिं गच्छन्ति,
तं तेसं मङ्गलमुत्तमं॥
भावार्थ: जो इन मंगलमय आचरणों का पालन करते हैं, वे सर्वत्र कल्याण और सुरक्षा प्राप्त करते हैं।
सार
ऋग्वेद कहता है—
"विश्वानि देव सवितर्दुरितानि परा सुव 
यद्भद्रं तन्न आ सुव ॥"
बौद्ध धर्म कहता है—
"सब्बपापस्स अकरणं, कुसलस्स उपसम्पदा।" (धम्मपद 183)
और
"सुखिनो वा खेमिनो होन्तु, सब्बे सत्ता भवन्तु सुखितत्ता।"
अर्थात्—
दुरित (अकुशल) का त्याग करो।
कुशल (कल्याणकारी) का विकास करो।
सभी प्राणियों के सुख और मंगल की कामना करो।
अंततः निर्वाण, शान्ति और करुणा ही परम भद्र हैं।
इनमें धम्मपद 183 और मङ्गलसुत्त ऋग्वेद के "यद्भद्रं तन्न आ सुव" के भाव के सबसे निकट बौद्ध प्रमाण माने जा सकते हैं।
यहूदी धर्म में प्रमाण --
ऋग्वेद 5.82.5 —
विश्वानि देव सवितर्दुरितानि परा सुव ।
यद्भद्रं तन्न आ सुव ॥
भावार्थ: हे प्रभु! हमारे सभी दुरितों (अशुभ, पाप, कष्ट) को दूर कर और जो हमारे लिए कल्याणकारी (भद्र) हो, वही हमें प्रदान कर।
यहूदी धर्म (Judaism) में भी परमेश्वर से टॉव (טוֹב = भलाई, शुभ), शालोम (שָׁלוֹם = शांति, कल्याण), खेसद (חֶסֶד = कृपा) तथा धर्ममार्ग की प्रार्थना बार-बार की गई है। नीचे कुछ प्रमुख प्रमाण दिए जा रहे हैं।
1.भजन संहिता (Psalms)25:4–5
הוֹדִיעֵנִי יְהוָה דְּרָכֶיךָ
אֹרְחוֹתֶיךָ לַמְּדֵנִי׃
देवनागरी उच्चारण
होदियेनी अदोनाय देराखेखा,
ओरखोतेखा लाम्देनी।
अर्थ:
हे प्रभु! मुझे अपने मार्ग बताइए और अपने पथ सिखाइए।
संबंध: "जो हमारे लिए शुभ मार्ग हो, वही प्रदान करें।"
2. भजन संहिता (Psalms) 23:1
हिब्रू
יְהוָה רֹעִי לֹא אֶחְסָר׃
देवनागरी
अदोनाय रोई, लो एख्सार।
अर्थ:
प्रभु मेरा चरवाहा है; मुझे किसी वस्तु की कमी नहीं होगी।
संबंध: ईश्वर ही हितकारी वस्तुओं का प्रदाता है।
3. भजन संहिता (Psalms) 34:14
हिब्रू
סוּר מֵרָע וַעֲשֵׂה־טוֹב
देवनागरी
सूर मेरा वअसेह टोव।
अर्थ:
बुराई से दूर रहो और भलाई करो।
संबंध: "दुरितानि परा सुव" और "यद्भद्रं तन्न आ सुव" का सीधा समतुल्य।
4. भजन संहिता (Psalms) 85:12
हिब्रू
גַּם־יְהוָה יִתֵּן הַטּוֹב
देवनागरी
गाम अदोनाय यित्तेन हत्तोव।
अर्थ:
निश्चय ही प्रभु भलाई प्रदान करेगा।
संबंध: "यद्भद्रं तन्न आ सुव" के अत्यन्त निकट।
5. नीतिवचन (Proverbs) 3:5–6
हिब्रू
בְּטַח אֶל־יְהוָה בְּכָל־לִבֶּךָ
देवनागरी
बेताख एल अदोनाय बेखोल लिबेखा।
अर्थ:
अपने पूरे हृदय से प्रभु पर भरोसा रखो।
संबंध: ईश्वर ही मनुष्य का वास्तविक हित जानता है।
6. यिर्मयाह (Jeremiah) 29:11
हिब्रू
מַחְשְׁבוֹת שָׁלוֹם וְלֹא לְרָעָה
देवनागरी
मख्शेवोत शालोम वेलो लेरा'आ।
अर्थ:
मेरी योजनाएँ तुम्हारे लिए शांति और भलाई की हैं, अनिष्ट की नहीं।
संबंध: ईश्वर की इच्छा मनुष्य के कल्याण के लिए है।
7. गिनती (Numbers) 6:24–26 — याजकीय आशीर्वाद
हिब्रू
יְבָרֶכְךָ יְהוָה וְיִשְׁמְרֶךָ׃
יָאֵר יְהוָה פָּנָיו אֵלֶיךָ וִיחֻנֶּךָּ׃
יִשָּׂא יְהוָה פָּנָיו אֵלֶיךָ וְיָשֵׂם לְךָ שָׁלוֹם׃
देवनागरी
येवारेखेखा अदोनाय वेयिश्मेरेखा।
याएर अदोनाय पानाव एलेखा विखुनेक्का।
यिस्सा अदोनाय पानाव एलेखा वयासेम लेखा शालोम।
अर्थ:
प्रभु तुम्हें आशीर्वाद दे, तुम्हारी रक्षा करे और तुम्हें शांति प्रदान करे।
संबंध: कल्याण, सुरक्षा और शांति की प्रार्थना।
8. भजन संहिता (Psalms) 119:68
हिब्रू
טוֹב־אַתָּה וּמֵטִיב
देवनागरी
टोव अताह उमेटीव।
अर्थ:
तू भला है और भलाई करने वाला है।
संबंध: परमेश्वर स्वयं भद्र (टॉव) का स्रोत है।
9. मीका (Micah) 6:8
हिब्रू
הִגִּיד לְךָ אָדָם מַה־טּוֹב
देवनागरी
हिगीद लेखा आदाम माह टोव।
अर्थ:
हे मनुष्य! तुझे बताया गया है कि क्या भला है।
संबंध: मनुष्य को भलाई और धर्ममार्ग का अनुसरण करना चाहिए।
10. भजन संहिता (Psalms) 122:7
हिब्रू
יְהִי־שָׁלוֹם בְּחֵילֵךְ
देवनागरी
येही शालोम बेहेलेख।
अर्थ:
तेरे भीतर शांति और कल्याण हो।
तुलनात्मक सार
ऋग्वेद
यहूदी धर्म
यद्भद्रं तन्न आ सुव
גַּם־יְהוָה יִתֵּן הַטּוֹב (भजन 85:12)
जो कल्याणकारी हो वही मिले
प्रभु भलाई प्रदान करेगा
दुरितों को दूर करो
סוּר מֵרָע וַעֲשֵׂה־טוֹב — बुराई छोड़ो, भलाई करो
शुभ मार्ग दो
הוֹדִיעֵנִי יְהוָה דְּרָכֶיךָ — प्रभु, अपने मार्ग दिखाओ
सबसे निकट यहूदी प्रमाण
סוּר מֵרָע וַעֲשֵׂה־טוֹב
(भजन संहिता 34:14)
"बुराई से दूर रहो और भलाई करो।"
और
גַּם־יְהוָה יִתֵּן הַטּוֹב
(भजन संहिता 85:12)
"प्रभु भलाई प्रदान करेगा।"
ये दोनों वचन ऋग्वेद के "विश्वानि देव सवितर्दुरितानि परा सुव । यद्भद्रं तन्न आ सुव ॥" के भाव के अत्यंत निकट हैं।
पारसी धर्म में प्रमाण 
ऋग्वेद 5.82.5 —
विश्वानि देव सवितर्दुरितानि परा सुव ।
यद्भद्रं तन्न आ सुव ॥
भावार्थ: हे प्रभु! हमारे सभी दुरितों को दूर कर और जो हमारे लिए कल्याणकारी (भद्र) हो, वही हमें प्रदान कर।
पारसी (ज़रथुष्ट्र) धर्म में यही भाव अशा (𐬀𐬴𐬀 = सत्य, धर्म, शुभ व्यवस्था), वहु मनह (𐬎𐬵𐬎 𐬨𐬀𐬥𐬀𐬵 = शुभ मन), स्पेन्ता (पवित्र, कल्याणकारी) तथा हौरवतत् (पूर्ण कल्याण) के रूप में व्यक्त होता है।
नीचे अवेस्ता से कुछ प्रमुख प्रमाण दिए जा रहे हैं।
1. यास्ना 30.3
अवेस्ता लिपि
𐬀𐬙 𐬙𐬀 𐬨𐬀𐬌𐬥𐬌𐬌𐬎 𐬞𐬀𐬌𐬭𐬌𐬌𐬈
𐬫𐬀𐬭𐬆𐬑𐬀 𐬯𐬞𐬆𐬥𐬙𐬀 𐬨𐬀𐬌𐬥𐬌𐬌𐬎
(पाठ-भेद संस्करणानुसार भिन्न हो सकता है)
भावार्थ: शुभ और अशुभ मार्ग मनुष्य के सामने रखे गए हैं; बुद्धिमान शुभ का चयन करे।
संबंध: "यद्भद्रं तन्न आ सुव" — शुभ का ग्रहण।
2. यास्ना 43.1
अवेस्ता
𐬀𐬙 𐬙𐬀 𐬀𐬵𐬎𐬭𐬀 𐬨𐬀𐬰𐬛𐬀
भावार्थ: हे अहुरा मज़्दा! मुझे वह प्रदान कर जो धर्म और कल्याण का मार्ग है।
संबंध: ईश्वर से कल्याणकारी मार्ग की याचना।
3. यास्ना 34.15
अवेस्ता
𐬀𐬴𐬀𐬵𐬌𐬀 𐬯𐬭𐬀𐬊𐬱𐬀
भावार्थ: अशा (सत्य और धर्म) का अनुसरण ही कल्याण का साधन है।
संबंध: भद्र = अशा।
4. यास्ना 50.11
अवेस्ता
𐬎𐬵𐬎 𐬨𐬀𐬥𐬀𐬵
भावार्थ: शुभ मन (Vohu Manah) मनुष्य को ईश्वर के निकट ले जाता है।
संबंध: कल्याणकारी बुद्धि की प्रार्थना।
5. अहुनवर प्रार्थना (यथा आहू वैर्यो)
अवेस्ता
𐬫𐬀𐬚𐬀 𐬀𐬵𐬎 𐬬𐬀𐬌𐬭𐬌𐬌𐬋
भावार्थ: धर्मयुक्त शासन और ईश्वरीय इच्छा के अनुसार जीवन।
संबंध: ईश्वरीय कल्याणकारी व्यवस्था को स्वीकार करना।
6. अषेम वोहू (Ashem Vohu)
अवेस्ता
𐬀𐬴𐬆𐬨 𐬬𐬊𐬵𐬎
𐬬𐬀𐬵𐬌𐬱𐬙𐬆𐬨 𐬀𐬯𐬙𐬌
लिप्यंतरण: Ashem vohū vahishtem astī.
भावार्थ: धर्म (अशा) सर्वोत्तम कल्याण है।
संबंध: यह पारसी धर्म के सबसे प्रसिद्ध वचनों में से एक है।
7. यास्ना 60.5
अवेस्ता
𐬵𐬀𐬎𐬭𐬬𐬀𐬙𐬁𐬙
भावार्थ: हौरवतत् (पूर्णता और कल्याण) की प्राप्ति हो।
संबंध: "भद्र" का पारसी समतुल्य।
8. यास्ना 47.1
अवेस्ता
𐬯𐬞𐬆𐬥𐬙𐬀 𐬨𐬀𐬌𐬥𐬬𐬎
भावार्थ: स्पेन्ता मैन्यु (कल्याणकारी पवित्र शक्ति) का अनुसरण करो।
संबंध: दुरितों से दूर होकर शुभ शक्ति की ओर बढ़ना।
9. गाथा उष्टवइती (यास्ना 43)
अवेस्ता
𐬎𐬱𐬙𐬀 𐬀𐬵𐬨𐬀𐬌
लिप्यंतरण: Uštā ahmāi.
भावार्थ: सुख और कल्याण उसे प्राप्त हो जो धर्म का अनुसरण करे।
10. यास्ना 51.21
अवेस्ता
𐬀𐬴𐬎𐬭𐬀 𐬨𐬀𐬰𐬛𐬀
भावार्थ: अहुरा मज़्दा मनुष्य को सत्य और कल्याण के मार्ग पर ले जाता है।
तुलनात्मक सार
ऋग्वेद
पारसी धर्म
दुरितानि परा सुव
द्रुज (असत्य/अशुभ) का त्याग
यद्भद्रं तन्न आ सुव
अषेम वोहू — धर्म ही सर्वोत्तम कल्याण
शुभ मार्ग की याचना
वहु मनह (शुभ मन) की प्राप्ति
कल्याण प्रदान करो
हौरवतत् (पूर्ण कल्याण) की प्राप्ति
सबसे निकट पारसी प्रमाण
अषेम वोहू
𐬀𐬴𐬆𐬨 𐬬𐬊𐬵𐬎 𐬬𐬀𐬵𐬌𐬱𐬙𐬆𐬨 𐬀𐬯𐬙𐬌
Ashem vohū vahishtem astī
अर्थ: "धर्म (अशा) सर्वोत्तम कल्याण है।"
यह वचन ऋग्वेद के "यद्भद्रं तन्न आ सुव" के भाव के अत्यंत निकट माना जा सकता है, क्योंकि दोनों में मनुष्य के लिए सर्वोच्च शुभ और कल्याण की कामना की गई है।
ताओ धर्म में प्रमाण --
ऋग्वेद 5.82.5 —
विश्वानि देव सवितर्दुरितानि परा सुव ।
यद्भद्रं तन्न आ सुव ॥
भावार्थ: हे प्रभु! हमारे सभी दुरितों को दूर कर और जो हमारे लिए कल्याणकारी (भद्र) हो, वही हमें प्रदान कर।
ताओ (Dao/Tao) धर्म में "भद्र" के समतुल्य भाव 善 (शान = भलाई), 德 (ते = सद्गुण), 道 (दाओ = मार्ग), 和 (हे = सामंजस्य) और 福 (फू = कल्याण/मंगल) के रूप में मिलता है। ताओवाद में मनुष्य की सर्वोच्च भलाई प्रकृति और दाओ के अनुरूप जीवन जीने में मानी जाती है।
नीचे Tao Te Ching तथा अन्य ताओवादी ग्रंथों से कुछ प्रमाण दिए जा रहे हैं:
1. ताओ ते चिंग, अध्याय 8
चीनी (पारम्परिक)
上善若水。水善利萬物而不爭。
उच्चारण
Shàng shàn ruò shuǐ. Shuǐ shàn lì wànwù ér bù zhēng.
अर्थ:
सर्वोच्च भलाई जल के समान है; वह सबका हित करती है और स्पर्धा नहीं करती।
संबंध: "यद्भद्रं तन्न आ सुव" में जिस भलाई की कामना है, ताओवाद उसे जलवत् कल्याणकारी स्वभाव में देखता है।
2. ताओ ते चिंग, अध्याय 16
चीनी
歸根曰靜,靜曰復命。
अर्थ:
मूल में लौटना शांति है; शांति ही जीवन के सत्य मार्ग में लौटना है।
संबंध: वास्तविक कल्याण आंतरिक शांति में है।
3. ताओ ते चिंग, अध्याय 25
चीनी
人法地,地法天,天法道,道法自然。
अर्थ:
मनुष्य पृथ्वी का अनुसरण करे, पृथ्वी आकाश का, आकाश दाओ का, और दाओ प्रकृति का।
संबंध: कल्याणकारी जीवन दाओ के अनुरूप चलने में है।
4. ताओ ते चिंग, अध्याय 49
चीनी
善者吾善之,不善者吾亦善之。
अर्थ:
जो अच्छे हैं, उनके प्रति मैं अच्छा हूँ; जो अच्छे नहीं हैं, उनके प्रति भी मैं अच्छा हूँ।
संबंध: सर्वहित और करुणा।
5. ताओ ते चिंग, अध्याय 54
चीनी
修之於身,其德乃真。
अर्थ:
जो स्वयं में सद्गुण का विकास करता है, उसका सद्गुण वास्तविक होता है।
संबंध: भद्र का आधार सद्गुण है।
6. ताओ ते चिंग, अध्याय 63
चीनी
為無為,事無事。
अर्थ:
स्वाभाविक ढंग से कर्म करो, कृत्रिमता से नहीं।
संबंध: कल्याणकारी मार्ग सहजता में है।
7. ताओ ते चिंग, अध्याय 67
चीनी
我有三寶,持而保之:一曰慈,二曰儉,三曰不敢為天下先。
अर्थ:
मेरे तीन रत्न हैं—करुणा, सादगी और विनम्रता।
संबंध: यही जीवन के कल्याणकारी गुण हैं।
8. झुआंगज़ी (莊子)
चीनी
天地有大美而不言。
अर्थ:
स्वर्ग और पृथ्वी में महान सौंदर्य है, पर वे बोलते नहीं।
संबंध: परम भद्र प्राकृतिक सामंजस्य में है।
9. ताइशांग गानयिंग पियान (太上感應篇)
चीनी
禍福無門,惟人自召。
अर्थ:
सुख और दुःख का कोई निश्चित द्वार नहीं; मनुष्य स्वयं उन्हें बुलाता है।
संबंध: दुरित और भद्र कर्मों पर निर्भर हैं।
10. ताइशांग गानयिंग पियान
चीनी
積善之家,必有餘慶。
अर्थ:
जो परिवार भलाई संचय करता है, उसके पास अतिरिक्त मंगल आता है।
संबंध: "यद्भद्रं तन्न आ सुव" का सामाजिक रूप।
11. वेनचांग यिनझी वेन (文昌陰騭文)
चीनी
廣行陰德,上格蒼穹。
अर्थ:
गुप्त रूप से भलाई करते रहो; इससे स्वर्गीय कृपा प्राप्त होती है।
संबंध: कल्याणकारी कर्म का महत्व।
12. ताओ ते चिंग, अध्याय 81
चीनी
天之道,利而不害。
अर्थ:
स्वर्ग का मार्ग सबका हित करता है और किसी को हानि नहीं पहुँचाता।
संबंध: यह "यद्भद्रं तन्न आ सुव" के सबसे निकट ताओवादी भावों में से एक है।
तुलनात्मक सार
ऋग्वेद
ताओ धर्म
यद्भद्रं तन्न आ सुव
上善若水 (सर्वोच्च भलाई जल के समान है)
जो कल्याणकारी हो वही मिले
दाओ के अनुरूप जीवन ही भलाई है
दुरितों को दूर करो
禍福無門,惟人自召 — कर्म से सुख-दुःख आते हैं
शुभ मार्ग प्रदान करो
天之道,利而不害 — स्वर्ग का मार्ग हितकारी है
सबसे निकट ताओवादी प्रमाण
天之道,利而不害。
(ताओ ते चिंग, अध्याय 81)
अर्थ:
"स्वर्ग (दाओ) का मार्ग सबका हित करता है और किसी को हानि नहीं पहुँचाता।"
और
上善若水。水善利萬物而不爭。
(ताओ ते चिंग, अध्याय 8)
अर्थ:
"सर्वोच्च भलाई जल के समान है; वह सबका हित करती है।"
ये दोनों वचन ऋग्वेद के "यद्भद्रं तन्न आ सुव" के भाव के अत्यन्त निकट हैं, क्योंकि दोनों ही सार्वभौमिक कल्याण और हितकारी जीवन की शिक्षा देते हैं।
कन्फ्यूशियस धर्म में प्रमाण --
ऋग्वेद 5.82.5 —
विश्वानि देव सवितर्दुरितानि परा सुव ।
यद्भद्रं तन्न आ सुव ॥
भावार्थ: हे प्रभु! हमारे सभी दुरितों को दूर कर और जो हमारे लिए कल्याणकारी (भद्र) हो, वही हमें प्रदान कर।
कन्फ्यूशियस (Confucian) परम्परा में "भद्र" के समतुल्य भाव 仁 (रेन = मानवता/करुणा), 義 (यी = धर्मनिष्ठा), 善 (शान = भलाई), 德 (ते = सद्गुण) और 和 (हे = सामंजस्य) के रूप में मिलता है।
कन्फ्यूशियस धर्म का लक्ष्य मनुष्य और समाज का नैतिक कल्याण है।
नीचे Confucius तथा कन्फ्यूशियस परम्परा के प्रमुख ग्रन्थों से प्रमाण दिए जा रहे हैं।
1. लुन्यू (論語) 4.16
चीनी (पारम्परिक)
君子喻於義,小人喻於利。
उच्चारण
Jūnzǐ yù yú yì, xiǎorén yù yú lì.
अर्थ:
सज्जन व्यक्ति धर्म (नीति) को समझता है, जबकि सामान्य व्यक्ति केवल लाभ को।
संबंध: "भद्र" का अर्थ केवल लाभ नहीं, बल्कि धर्म और हित है।
2. लुन्यू (論語) 12.2
चीनी
己所不欲,勿施於人。
अर्थ:
जो तुम अपने लिए नहीं चाहते, वह दूसरों पर मत थोपो।
संबंध: सर्वहित और कल्याण का सिद्धान्त।
3. लुन्यू (論語) 6.30
चीनी
己欲立而立人,己欲達而達人。
अर्थ:
स्वयं उन्नति करना चाहो तो दूसरों की भी उन्नति करो।
संबंध: भद्र का सामाजिक रूप।
4. लुन्यू (論語) 7.6
चीनी
志於道,據於德,依於仁,游於藝。
अर्थ:
दाओ (मार्ग) को लक्ष्य बनाओ, सद्गुण पर टिके रहो और मानवता में स्थित रहो।
संबंध: कल्याणकारी जीवन का मार्ग।
5. लुन्यू (論語) 15.24
चीनी
其恕乎!己所不欲,勿施於人。
अर्थ:
सहानुभूति यही है—जो अपने लिए न चाहो, वह दूसरों के साथ न करो।
6. दा शुए (大學)
चीनी
大學之道,在明明德,在親民,在止於至善。
अर्थ:
महान शिक्षा का मार्ग उज्ज्वल सद्गुण, लोकहित और सर्वोच्च भलाई तक पहुँचने में है।
संबंध: "至善" (सर्वोच्च भलाई) = भद्र।
7. झोंगयोंग (中庸)
चीनी
誠者,天之道也;誠之者,人之道也。
अर्थ:
सत्यनिष्ठा स्वर्ग का मार्ग है, और सत्यनिष्ठ होना मनुष्य का मार्ग है।
संबंध: शुभ मार्ग की खोज।
8. मेंगज़ी (孟子) 6A:2
चीनी
人皆有不忍人之心。
अर्थ:
प्रत्येक मनुष्य में करुणा का हृदय होता है।
संबंध: भद्र का मूल करुणा है।
9. मेंगज़ी (孟子) 7A:16
चीनी
仁,人之安宅也;義,人之正路也。
अर्थ:
मानवता (仁) मनुष्य का सुरक्षित निवास है और धर्म (義) उसका सही मार्ग है।
संबंध: कल्याणकारी मार्ग का वर्णन।
10. मेंगज़ी (孟子) 4A:1
चीनी
老吾老,以及人之老;幼吾幼,以及人之幼。
अर्थ:
अपने वृद्धों का सम्मान करो और दूसरों के वृद्धों का भी; अपने बच्चों से प्रेम करो और दूसरों के बच्चों से भी।
संबंध: सर्वहित की भावना।
11. लुन्यू (論語) 1.2
चीनी
孝弟也者,其為仁之本與。
अर्थ:
माता-पिता और बड़ों का सम्मान मानवता (仁) का मूल है।
संबंध: सद्गुण और कल्याण।
12. लुन्यू (論語) 12.22
चीनी
仁者愛人。
अर्थ:
मानवतावान व्यक्ति लोगों से प्रेम करता है।
संबंध: भद्र का सार प्रेम और करुणा है।
तुलनात्मक सार
ऋग्वेद
कन्फ्यूशियस धर्म
यद्भद्रं तन्न आ सुव
在止於至善 (सर्वोच्च भलाई तक पहुँचना)
शुभ मार्ग की कामना
義,人之正路也 (धर्म मनुष्य का सही मार्ग है)
दुरितों का निवारण
सद्गुण और आत्मसंयम का विकास
सर्वहित
己所不欲,勿施於人
सबसे निकट कन्फ्यूशियसी प्रमाण
大學 (दा शुए)
大學之道,在明明德,在親民,在止於至善。
अर्थ:
"महान शिक्षा का मार्ग उज्ज्वल सद्गुण, लोककल्याण और सर्वोच्च भलाई (至善) की प्राप्ति में है।"
तथा
仁者愛人。 (論語 12.22)
अर्थ:
"सज्जन और मानवतावान व्यक्ति सब लोगों से प्रेम करता है।"
ये वचन ऋग्वेद के "यद्भद्रं तन्न आ सुव" के भाव के अत्यन्त निकट हैं, क्योंकि दोनों ही मनुष्य के सर्वोच्च कल्याण, सद्गुण और लोकहित की 
शिन्तो धर्म में प्रमाण --
ऋग्वेद 5.82.5 —
विश्वानि देव सवितर्दुरितानि परा सुव ।
यद्भद्रं तन्न आ सुव ॥
भावार्थ: हे प्रभु! हमारे सभी दुरितों को दूर कर और जो हमारे लिए कल्याणकारी (भद्र) हो, वही हमें प्रदान कर।
शिन्तो (神道) धर्म में "भद्र" के समतुल्य भाव 善 (ज़ेन = भलाई), 清 (कियोमे = शुद्धता), 和 (वा = सामंजस्य), 幸 (साची = सौभाग्य/कल्याण) तथा 神徳 (शिन्तोकु = दिव्य सद्गुण) के रूप में मिलता है। शिन्तो धर्म में मनुष्य का कल्याण कामी (देवशक्तियों) के साथ सामंजस्य, शुद्धता और सदाचार में माना जाता है।
नीचे शिन्तो परम्परा के प्रमुख ग्रन्थों और प्रार्थनाओं से प्रमाण दिए जा रहे हैं:
1. ओहारे-नो-कोतोबा (大祓詞)
जापानी
諸々の禍事罪穢を祓へ給ひ清め給へ
उच्चारण
Moromoro no magagoto tsumi kegare o harae tamai kiyome tamae.
अर्थ: हे देवताओं! सभी पाप, अशुद्धि और अनिष्ट को दूर करें तथा हमें शुद्ध करें।
संबंध: यह "विश्वानि देव सवितर्दुरितानि परा सुव" का अत्यन्त निकट समतुल्य है।
2. ओहारे-नो-कोतोबा
जापानी
罪という罪はあらじと祓ひ給ひ清め給ふ
अर्थ: सभी दोषों और पापों को दूर कर शुद्ध करो।
संबंध: दुरित-निवारण।
3. Kojiki
जापानी
清き明き心を以て仕へ奉る
अर्थ: देवताओं की सेवा निर्मल और उज्ज्वल हृदय से करो।
संबंध: कल्याण का आधार शुद्ध मन है।
4. Nihon Shoki
जापानी
正しき心は神の心なり
अर्थ: सत्य और धर्मयुक्त हृदय ही देवताओं का हृदय है।
संबंध: भद्र = धर्मयुक्त चित्त।
5. शिन्तो उपदेश
जापानी
神は人の敬によりて威を増し、人は神の徳によりて運を添ふ
अर्थ: देवताओं के प्रति श्रद्धा से उनकी कृपा बढ़ती है, और मनुष्य उनके सद्गुण से कल्याण प्राप्त करता है।
6. इसे ग्रैंड श्राइन परम्परा
जापानी
清く明るく正しく直く
उच्चारण
Kiyoku akaruku tadashiku naoku.
अर्थ: शुद्ध, उज्ज्वल, सत्यनिष्ठ और सरल बनो।
संबंध: जीवन का कल्याणकारी मार्ग।
7. शिन्तो प्रार्थना
जापानी
家内安全・無病息災
उच्चारण
Kanai anzen, mubyō sokusai.
अर्थ: परिवार में सुरक्षा और रोगों से मुक्ति हो।
संबंध: कल्याण और अनिष्ट-निवारण।
8. शिन्तो प्रार्थना
जापानी
天下泰平
उच्चारण
Tenka taihei.
अर्थ: संपूर्ण संसार में शांति और कल्याण हो।
संबंध: सार्वभौमिक भद्र।
9. शिन्तो सूत्र
जापानी
和を以て貴しとなす
उच्चारण
Wa o motte tōtoshi to nasu.
अर्थ: सामंजस्य को सर्वोच्च मूल्य मानो।
संबंध: कल्याण का सामाजिक रूप।
10. शिन्तो नैतिक शिक्षा
जापानी
誠の心をもって神に仕える
उच्चारण
Makoto no kokoro o motte kami ni tsukaeru.
अर्थ: सच्चे हृदय से देवताओं की सेवा करो।
संबंध: भद्र का आधार सत्यनिष्ठा।
11. जिंगू उपासना परम्परा
जापानी
神恩感謝
उच्चारण
Shin'on kansha.
अर्थ: देवकृपा के प्रति कृतज्ञता।
संबंध: जो कल्याण प्राप्त हुआ है, उसके लिए धन्यवाद।
12. शिन्तो आशीर्वचन
जापानी
幸魂奇魂守り幸へ給へ
उच्चारण
Sakimitama kushimitama mamori sakiwai tamae.
अर्थ: हे दिव्य शक्तियों! हमारी रक्षा करो और हमें कल्याण प्रदान करो।
संबंध: "यद्भद्रं तन्न आ सुव" का अत्यन्त निकट भाव।
तुलनात्मक सार
विश्वानि देव सवितर्दुरितानि परा सुव
諸々の禍事罪穢を祓へ給ひ清め給へ
दुरितों को दूर करो
पाप और अशुद्धियों को दूर कर शुद्ध करो
यद्भद्रं तन्न आ सुव
幸魂奇魂守り幸へ給へ
जो कल्याणकारी हो वही प्रदान करो
रक्षा करो और कल्याण प्रदान करो
शुभ मार्ग
清く明るく正しく直く
सबसे निकट शिन्तो प्रमाण
諸々の禍事罪穢を祓へ給ひ清め給へ
"सभी पापों, अशुद्धियों और अनिष्टों को दूर कर हमें शुद्ध करो।"
और
幸魂奇魂守り幸へ給へ
"हे दिव्य शक्तियों! हमारी रक्षा करो और हमें कल्याण प्रदान करो।"
ये दोनों वचन ऋग्वेद के "विश्वानि देव सवितर्दुरितानि परा सुव । यद्भद्रं तन्न आ सुव ॥" के भाव के सबसे निकट शिन्तो प्रमाण माने जा सकते हैं।
यूनानी दर्शन में प्रमाण --
ऋग्वेद 5.82.5 —
विश्वानि देव सवितर्दुरितानि परा सुव ।
यद्भद्रं तन्न आ सुव ॥
भावार्थ: हे प्रभु! हमारे सभी दुरितों को दूर कर और जो हमारे लिए कल्याणकारी (भद्र) हो, वही हमें प्रदान कर।
यूनानी (Greek) दर्शन में "भद्र" के समतुल्य भाव ἀγαθόν (Agathon = परम शुभ/Good), ἀρετή (Aretē = सद्गुण), εὐδαιμονία (Eudaimonia = कल्याणमय जीवन) तथा σοφία (Sophia = प्रज्ञा) के रूप में मिलता है। यूनानी दार्शनिकों का मत था कि मनुष्य को वही ग्रहण करना चाहिए जो वास्तविक शुभ (The Good) हो और जो आत्मा को उन्नत करे।
1. Socrates — प्लेटो, Apology 30d
यूनानी
οὐδὲν κακὸν ἀνδρὶ ἀγαθῷ γίγνεται.
उच्चारण:
Ouden kakon andri agathō gignetai.
अर्थ:
एक सद्गुणी मनुष्य के साथ वास्तव में कोई बुराई नहीं हो सकती।
संबंध: दुरितों से ऊपर उठकर शुभ की प्राप्ति।
2. Plato — Republic VI.508e
यूनानी
ἡ τοῦ ἀγαθοῦ ἰδέα μέγιστον μάθημα.
अर्थ:
"परम शुभ (The Good) का ज्ञान सबसे महान ज्ञान है।"
संबंध: "यद्भद्रं" का दार्शनिक रूप = "The Good"।
3. प्लेटो — Republic VII.517c
यूनानी
τὸ ἀγαθὸν πάντων αἴτιον.
अर्थ:
परम शुभ सभी उत्तम वस्तुओं का कारण है।
4. Aristotle — Nicomachean Ethics I.1
यूनानी
πᾶσα τέχνη καὶ πᾶσα μέθοδος ἀγαθοῦ τινος ἐφίεται.
अर्थ:
हर कर्म और हर ज्ञान किसी न किसी शुभ की ओर अग्रसर होता है।
संबंध: मनुष्य का लक्ष्य शुभ की प्राप्ति है।
5. अरस्तू — Nicomachean Ethics I.7
यूनानी
εὐδαιμονία τὸ ἄριστον ἀγαθόν.
अर्थ:
कल्याणमय जीवन (Eudaimonia) सर्वोच्च शुभ है।
6. Epictetus — Enchiridion 1
यूनानी
τῶν ὄντων τὰ μὲν ἐφ’ ἡμῖν, τὰ δὲ οὐκ ἐφ’ ἡμῖν.
अर्थ:
कुछ बातें हमारे वश में हैं, कुछ नहीं।
संबंध: जो वास्तविक हितकारी हो, उसी पर ध्यान दो।
7. Marcus Aurelius — Meditations 7.54
यूनानी
ὃ συμφέρει τῷ ὅλῳ, συμφέρει καὶ τῷ μέρει.
अर्थ:
जो समग्र जगत के हित में है, वही उसके अंगों के भी हित में है।
संबंध: सार्वभौमिक कल्याण।
8. Cleanthes — Hymn to Zeus
यूनानी
ἕπου θεῷ.
अर्थ:
ईश्वर (दिव्य व्यवस्था) का अनुसरण करो।
संबंध: "जो श्रेष्ठ है, उसी मार्ग पर चलो।"
9. Pythagoras — स्वर्णसूत्र
यूनानी
ἄριστον μέτρον.
अर्थ:
संयम और संतुलन सर्वोत्तम हैं।
संबंध: कल्याणकारी जीवन का मार्ग।
10. Plotinus — Enneads I.6
यूनानी
πρὸς τὸ ἀγαθὸν ἀναβαίνειν.
अर्थ:
आत्मा का लक्ष्य परम शुभ की ओर आरोहण है।
11. प्लेटो — Laws 631c
यूनानी
ἀρετὴ πρὸς εὐδαιμονίαν ἄγει.
अर्थ:
सद्गुण मनुष्य को कल्याण की ओर ले जाता है।
12. अरस्तू — Nicomachean Ethics X.7
यूनानी
ὁ θεωρητικὸς βίος εὐδαιμονέστατος.
अर्थ:
ज्ञान और चिंतन का जीवन सबसे अधिक कल्याणकारी है।
तुलनात्मक सार
यद्भद्रं तन्न आ सुव
τὸ ἀγαθόν (परम शुभ)
जो कल्याणकारी हो वही मिले
सर्वोच्च लक्ष्य शुभ (The Good) है
दुरितों को दूर करो
अज्ञान और दुर्गुण का त्याग
शुभ मार्ग
सद्गुण (ἀρετή) का मार्ग
सार्वभौमिक हित
ὃ συμφέρει τῷ ὅλῳ...
सबसे निकट यूनानी प्रमाण
Plato के अनुसार:
τὸ ἀγαθὸν πάντων αἴτιον
"परम शुभ सभी उत्तम वस्तुओं का कारण है।"
और Aristotle के अनुसार:
εὐδαιμονία τὸ ἄριστον ἀγαθόν
"कल्याणमय जीवन ही सर्वोच्च शुभ है।"
ये दोनों विचार ऋग्वेद के "यद्भद्रं तन्न आ सुव" के दार्शनिक समतुल्य माने जा सकते हैं, क्योंकि इनमें मनुष्य के लिए सर्वोच्च शुभ, कल्याण और सद्गुण की प्राप्ति को जीवन का लक्ष्य बताया गया है।देते हैं।
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