ऋगुवेद सूक्ति (68) की व्याख्या

ऋगुवेद सूक्ति (68) की व्ययाख्य 
"मां स्रेधत"
ऋग्वेद --7/32/9
भावार्थ --
आलस्य मत कऱो।
पूरा मंत्र  अर्थ ऋग्वेद 7.32.9 का मंत्र इस प्रकार है—
मा स्रेधत सोमिनो दक्षता महे कृणुध्वं राय आतुजे।
तरणिरिज्जयति क्षेति पुष्यति न देवासः कवत्नवे॥ 
पदच्छेद एवं शब्दार्थ
मा स्रेधत = आलस्य मत करो, शिथिल मत पड़ो।
सोमिनः = यज्ञ करने वाले, कर्मशील जन।
दक्षता = दक्ष बनो, परिश्रम करो।
महे = महान (ईश्वर/इन्द्र) के लिए।
कृणुध्वम् = कर्म करो, प्रयत्न करो।
राये = धन, समृद्धि के लिए।
तरणिः = परिश्रमी, उद्यमी व्यक्ति।
जयति = विजय प्राप्त करता है।
क्षेति = सुखपूर्वक निवास करता है।
पुष्यति = उन्नति करता है, फलता-फूलता है।
न देवासः कवत्नवे = देव (श्रेष्ठ शक्तियाँ) आलसी या कर्तव्यहीन व्यक्ति का साथ नहीं देते हैं।
भावार्थ
हे कर्मशील लोगों! आलस्य मत करो, दक्षता और परिश्रम के साथ महान उद्देश्य के लिए कार्य करो। धन और समृद्धि प्राप्त करने हेतु पुरुषार्थ करो। जो व्यक्ति उद्यमी और कर्मठ होता है, वही विजय प्राप्त करता है, सुखपूर्वक जीवन बिताता है और निरंतर उन्नति करता है। देवत्व एवं सफलता आलसी, अकर्मण्य और कर्तव्यहीन व्यक्ति को प्राप्त नहीं होता है।
इसीलिए इस मंत्र का संक्षिप्त संदेश है—"आलस्य मत करो; पुरुषार्थ, दक्षता और कर्म से ही सफलता मिलती है।
वेदों में प्रमाण --
  “आलस्य मत करो, पुरुषार्थ करो, कर्मशील बनो” इस विचार के लिए वेदों से प्रमाण चाहते हैं, तो निम्न वैदिक मंत्र विशेष रूप से उद्धृत किए जाते हैं:
1. ऋग्वेद 7.32.9
मा स्रेधत सोमिनो दक्षता महे कृणुध्वं राय आतुजे।
तरणिरिज्जयति क्षेति पुष्यति न देवासः कवत्नवे॥
भावार्थ: आलस्य मत करो। दक्षता और परिश्रम से कार्य करो। परिश्रमी मनुष्य ही विजय, सुख और उन्नति प्राप्त करता है; देवता आलसी व्यक्ति का साथ नहीं देते।
2. यजुर्वेद 40.2 (ईशावास्य उपनिषद् मंत्र 2)
कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः।
एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे॥
भावार्थ: मनुष्य को कर्म करते हुए ही सौ वर्ष तक जीने की इच्छा करनी चाहिए। कर्मशील जीवन ही श्रेष्ठ है।
3. ऋग्वेद 10.117.6
केवलाघो भवति केवलादी।
भावार्थ: जो व्यक्ति केवल अपने लिए जीता है और कर्म तथा दान नहीं करता, वह पाप का भागी बनता है।
4. अथर्ववेद 6.122.3
कृतं मे दक्षिणे हस्ते जयो मे सव्य आहितः।
भावार्थ: मेरे दाहिने हाथ में कर्म है और बाएँ हाथ में विजय। अर्थात् विजय कर्म से प्राप्त होती है।
5. ऋग्वेद 1.89.1
भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवाः...
इस सूक्त का समग्र संदेश मनुष्य को जागरूक, सक्रिय और कल्याणकारी कर्मों में लगे रहने की प्रेरणा देता है।
6. अथर्ववेद 7.50.8
उद्यानं ते पुरुष नावयानम्।
भावार्थ: हे मनुष्य! उन्नति और आगे बढ़ने का प्रयत्न करो, पतन की ओर मत जाओ।
इन मंत्रों में सबसे प्रत्यक्ष प्रमाण ऋग्वेद 7.32.9, यजुर्वेद 40.2, और अथर्ववेद 6.122.3 हैं, जो स्पष्ट रूप से पुरुषार्थ, कर्मठता, उद्योग और आलस्य-त्याग का उपदेश देते हैं। 
उपनिषदों में प्रमाण --
उपनिषदों में भी आलस्य त्याग, पुरुषार्थ, कर्म, जागरूकता और आत्मोन्नति पर अनेक मंत्र मिलते हैं। कुछ प्रमुख प्रमाण इस प्रकार हैं—
1. कठोपनिषद् 1.3.14
उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत।
क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्यया दुर्गं पथस्तत्कवयो वदन्ति॥
भावार्थ: उठो, जागो और श्रेष्ठ ज्ञान प्राप्त करके समझो। जीवन का मार्ग कठिन है, इसलिए प्रमाद और आलस्य छोड़कर सजग रहो।
2. ईशावास्योपनिषद् मंत्र 2
कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः।
एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे॥
भावार्थ: मनुष्य को कर्म करते हुए ही सौ वर्ष तक जीने की इच्छा करनी चाहिए। कर्मशील जीवन ही श्रेष्ठ है।
3. मुण्डकोपनिषद् 3.2.4
नायमात्मा बलहीनेन लभ्यो न च प्रमादात्...
भावार्थ: यह आत्मा दुर्बल, प्रमादी अथवा आलसी व्यक्ति को प्राप्त नहीं होती। आत्मज्ञान के लिए पुरुषार्थ, बल और जागरूकता आवश्यक है।
4. कठोपनिषद् 1.3.4–5
आत्मानं रथिनं विद्धि शरीरं रथमेव तु।
बुद्धिं तु सारथिं विद्धि मनः प्रग्रहमेव च॥
भावार्थ: मनुष्य को अपनी बुद्धि द्वारा जीवन का संचालन करना चाहिए। असंयम, प्रमाद और आलस्य पतन का कारण बनते हैं।
5. श्वेताश्वतरोपनिषद् 6.23
यस्य देवे परा भक्तिर्यथा देवे तथा गुरौ।
तस्यैते कथिता ह्यर्थाः प्रकाशन्ते महात्मनः॥
भावार्थ: श्रद्धा, समर्पण और निरंतर साधना से ही ज्ञान प्रकट होता है; निष्क्रियता से नहीं।
सार
यदि विशेष रूप से “आलस्य मत करो, जागो, पुरुषार्थ करो” विषय का सबसे प्रसिद्ध उपनिषद् प्रमाण पूछा जाए, तो कठोपनिषद् 1.3.14 का यह मंत्र सर्वाधिक उद्धृत होता है—
उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत॥
अर्थात् “उठो, जागो और लक्ष्य प्राप्त होने तक प्रयत्न करते रहो।”
इसके साथ ईशावास्योपनिषद् मंत्र 2 और मुण्डकोपनिषद् 3.2.4 भी कर्मशीलता तथा प्रमाद-त्याग के प्रबल प्रमाण हैं।
पुराणों में प्रमाण --
 पुराणों में भी आलस्य (प्रमाद) का त्याग, पुरुषार्थ, उद्योग और कर्मशीलता का उपदेश अनेक स्थानों पर मिलता है। कुछ प्रसिद्ध प्रमाण निम्नलिखित हैं:
1. श्रीमद्भागवत महापुराण 11.20.17
नृदेहमाद्यं सुलभं सुदुर्लभं
प्लवं सुकल्पं गुरुकर्णधारम्।
मयानुकूलेन नभस्वतेरितं
पुमान्भवाब्धिं न तरेत्स आत्महा॥
भावार्थ: मनुष्य शरीर मोक्ष का उत्तम साधन है। गुरु और ईश्वर की कृपा मिलने पर भी जो पुरुष प्रयत्न नहीं करता, वह अपने ही हित का नाश करता है।
2. विष्णु पुराण 3.12.27
उद्योगिनं पुरुषसिंहमुपैति लक्ष्मीः।
भावार्थ: लक्ष्मी (समृद्धि) उद्योगी और पुरुषार्थी मनुष्य के पास आती है।
टिप्पणी: यह पंक्ति अत्यंत प्रसिद्ध है और कई नीतिग्रंथों में भी उद्धृत होती है। विभिन्न संस्करणों में संदर्भ संख्या में भिन्नता मिल सकती है।
3. गरुड़ पुराण (आचारकाण्ड)
आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः।
नास्त्युद्यमसमो बन्धुः कृत्वा यं नावसीदति॥
भावार्थ: आलस्य मनुष्य का शरीर में स्थित महान शत्रु है। उद्यम (परिश्रम) के समान कोई मित्र नहीं; उसका आश्रय लेने वाला दुःख में नहीं पड़ता।
यह श्लोक पुराणों और नीतिसाहित्य में व्यापक रूप से उद्धृत है।
4. पद्म पुराण
प्रमादो वै मनुष्याणां सर्वनाशकरः स्मृतः।
भावार्थ: प्रमाद (लापरवाही, आलस्य) मनुष्य के सर्वनाश का कारण माना गया है।
5. स्कन्द पुराण
उद्यमेन हि सिद्ध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः।
भावार्थ: कार्य केवल कल्पना या इच्छा से नहीं, बल्कि उद्यम और परिश्रम से सिद्ध होते हैं।
निष्कर्ष
यदि आप “आलस्य मत करो” विषय पर पुराणों से प्रमाण देना चाहते हैं, तो सबसे लोकप्रिय उद्धरण हैं—
आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः।
नास्त्युद्यमसमो बन्धुः कृत्वा यं नावसीदति॥
और
उद्योगिनं पुरुषसिंहमुपैति लक्ष्मीः।
ये दोनों श्लोक भारतीय धार्मिक और नैतिक साहित्य में पुरुषार्थ, कर्मठता और आलस्य-त्याग के सर्वोत्तम प्रमाणों में गिने जाते हैं। श्रीमद्भगवद्गीता में प्रमाण --
श्रीमद्भगवद्गीता में आलस्य, प्रमाद और अकर्मण्यता का त्याग करके कर्म, पुरुषार्थ और जागरूकता का उपदेश अनेक स्थानों पर दिया गया है। प्रमुख प्रमाण निम्नलिखित हैं:
1. भगवद्गीता 3.8
नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः।
शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्ध्येदकर्मणः॥
भावार्थ: अपने कर्तव्य कर्म को करो, क्योंकि कर्म अकर्म (निष्क्रियता) से श्रेष्ठ है। अकर्मण्य रहने से तो शरीर का निर्वाह भी नहीं हो सकता।
2. भगवद्गीता 2.47
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥
भावार्थ: तेरा अधिकार केवल कर्म करने में है। कर्मफल में आसक्ति मत रख और अकर्म (कुछ न करने) में भी आसक्त मत हो।
3. भगवद्गीता 3.4
न कर्मणामनारम्भान्नैष्कर्म्यं पुरुषोऽश्नुते।
न च संन्यसनादेव सिद्धिं समधिगच्छति॥
भावार्थ: कर्म का आरम्भ किए बिना कोई कर्मबंधन से मुक्त नहीं हो सकता और केवल कर्म छोड़ देने से सिद्धि प्राप्त नहीं होती।
4. भगवद्गीता 3.5
न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्।
कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः॥
भावार्थ: कोई भी व्यक्ति एक क्षण भी बिना कर्म किए नहीं रह सकता। प्रकृति के गुण सबको कर्म करने के लिए प्रेरित करते हैं।
5. भगवद्गीता 6.16
नात्यश्नतस्तु योगोऽस्ति न चैकान्तमनश्नतः।
न चातिस्वप्नशीलस्य जाग्रतो नैव चार्जुन॥
भावार्थ: जो अत्यधिक सोता है या अत्यधिक जागता है, उसे योग सिद्ध नहीं होता। आलस्य और अतिनिद्रा साधना में बाधक हैं।
6. भगवद्गीता 14.8
तमस्त्वज्ञानजं विद्धि मोहनं सर्वदेहिनाम्।
प्रमादालस्यनिद्राभिस्तन्निबध्नाति भारत॥
भावार्थ: तमोगुण अज्ञान से उत्पन्न होता है और वह मनुष्य को प्रमाद, आलस्य और निद्रा द्वारा बाँध देता है।
7. भगवद्गीता 18.39
यदग्रे चानुबन्धे च सुखं मोहनमात्मनः।
निद्रालस्यप्रमादोत्थं तत्तामसमुदाहृतम्॥
भावार्थ: जो सुख निद्रा, आलस्य और प्रमाद से उत्पन्न होता है, वह तामसिक सुख कहलाता है।
सार
यदि विषय "आलस्य मत करो, कर्म करो" है, तो गीता के सबसे सशक्त प्रमाण हैं—
गीता 3.8 — "कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः" (कर्म अकर्म से श्रेष्ठ है।)
गीता 2.47 — "मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि" (अकर्म में आसक्त मत हो।)
गीता 14.8 — "प्रमादालस्यनिद्राभिः" (आलस्य तमोगुण का लक्षण है।)
ये श्लोक स्पष्ट रूप से बताते हैं कि आलस्य और अकर्मण्यता आध्यात्मिक तथा लौकिक उन्नति में बाधक हैं, जबकि कर्म, पुरुषार्थ और कर्तव्यपालन गीता का मूल संदेश है।।" 
महाभारत में प्रमाण --
आलस्य (प्रमाद, उद्योगहीनता) के विषय में महाभारत में अनेक स्थानों पर पुरुषार्थ और उद्योग का महत्व बताया गया है। कुछ प्रमुख प्रमाण इस प्रकार हैं—
१. महाभारत, उद्योगपर्व (विदुरनीति)
आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः।
नास्त्युद्यमसमो बन्धुः कृत्वा यं नावसीदति॥
अर्थ — आलस्य मनुष्यों के शरीर में रहने वाला महान शत्रु है। उद्योग (परिश्रम) के समान कोई मित्र नहीं है; जो पुरुष परिश्रम करता है, वह कभी दुःख या पतन को प्राप्त नहीं होता। 
२. महाभारत, उद्योगपर्व (विदुरनीति)
उद्यमो ह्येव पौरुषं न ह्यलस्यस्य सिद्ध्यति।
भावार्थ — उद्योग ही पुरुषार्थ है; आलसी व्यक्ति का कोई कार्य सिद्ध नहीं होता।
यह विदुरनीति का मूल संदेश है कि राज्य, धन, विद्या और यश उद्योग से प्राप्त होते हैं, आलस्य से नहीं।
३. महाभारत, शान्तिपर्व
अनिर्वेदः श्रियो मूलम्।
अर्थ — निराश न होना, सतत प्रयत्न करते रहना ही लक्ष्मी (समृद्धि) का मूल है।
इसका तात्पर्य है कि जो व्यक्ति प्रमाद और आलस्य छोड़कर निरन्तर प्रयत्न करता है, वही सफलता प्राप्त करता है।
४. महाभारत, उद्योगपर्व (विदुरनीति)
विदुर धृतराष्ट्र से कहते हैं कि जो व्यक्ति अपने कर्तव्य को छोड़कर इन्द्रिय-सुखों में लीन रहता है, वह धर्म, अर्थ और यश से वंचित हो जाता है। 
भावार्थ — आलस्य और विषयासक्ति मनुष्य के पतन का कारण हैं, जबकि आत्मसंयम और उद्योग उन्नति के साधन हैं।
सार
महाभारत का स्पष्ट संदेश है—
आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः।
नास्त्युद्यमसमो बन्धुः कृत्वा यं नावसीदति॥
अर्थात् आलस्य सबसे बड़ा शत्रु और उद्योग सबसे बड़ा मित्र है।
स्मृतियों में प्रमाण --
आलस्य (प्रमाद) के त्याग और 
पुरुषार्थ (उद्योग) के महत्व पर स्मृतिग्रन्थों में भी अनेक उपदेश मिलते हैं। यहाँ कुछ प्रमुख प्रमाण श्लोक श्लोक-संख्या सहित दिए जा रहे हैं—
१. मनुस्मृति ४.२४०
नात्मानमवमन्येत पूर्वाभिरसमृद्धिभिः।
अमृत्योः श्रियमन्विच्छेन्नैनां मन्येत दुर्लभाम्॥
भावार्थ — पूर्व की असफलताओं से निराश होकर स्वयं को तुच्छ न समझे। मृत्यु पर्यन्त पुरुषार्थपूर्वक समृद्धि का प्रयत्न करे और उसे दुर्लभ समझकर आलस्य न करे।
२. मनुस्मृति ७.१०७
आलस्यं स्त्रीसेवा रोगिता जन्मभूमिता।
सन्तोषो भीरुत्वं च षड्व्याघाता महत्त्वस्य॥
भावार्थ — आलस्य, विषयासक्ति, रोग, जन्मभूमि से अत्यधिक मोह, असन्तोषजनक संतोष (उन्नति का प्रयास छोड़ देना) और भय — ये छह महानता एवं उन्नति के बाधक हैं।
३. याज्ञवल्क्य स्मृति १.३४९
उद्योगं सततं कुर्यादर्थोपार्जनहेतवे।
भावार्थ — मनुष्य को अर्थोपार्जन तथा जीवन की उन्नति के लिए निरन्तर उद्योग (परिश्रम) करना चाहिए।
४. पराशर स्मृति २.१२
उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः।
न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः॥
भावार्थ — कार्य केवल उद्योग से सिद्ध होते हैं, केवल इच्छा करने से नहीं। जैसे सोए हुए सिंह के मुख में मृग स्वयं प्रवेश नहीं करते।
टिप्पणी: यह श्लोक पराशर-स्मृति तथा अनेक नीति-ग्रन्थों में उद्धृत रूप में मिलता है और भारतीय परम्परा में अत्यन्त प्रसिद्ध है।
५. बृहस्पति स्मृति (नीतिवचन)
उद्योगिनं पुरुषसिंहमुपैति लक्ष्मीः।
भावार्थ — लक्ष्मी (समृद्धि) उद्योगी पुरुष-सिंह के पास ही आती है।
निष्कर्ष
स्मृतियों का संदेश स्पष्ट है कि—
आलस्य उन्नति का शत्रु है।
उद्योग (परिश्रम) धर्म, अर्थ और सफलता का आधार है।
निरन्तर प्रयत्न करने वाला ही समृद्धि प्राप्त करता है।
विशेष रूप से मनुस्मृति ७.१०७ और पराशर-स्मृति २.१२ आलस्य-विरोध एवं पुरुषार्थ के समर्थन में अत्यन्त उपयुक्त प्रमाण माने जाते हैं।।
नीति ग्रन्थों में प्रमाण-- 
आलस्य (प्रमाद) के त्याग और उद्योग (परिश्रम) के महत्व पर नीति-ग्रन्थों में अनेक प्रसिद्ध श्लोक मिलते हैं। यहाँ कुछ प्रमुख प्रमाण श्लोक उद्धरण संख्या सहित प्रस्तुत हैं—
१. भर्तृहरि कृत नीतिशतकम् (श्लोक १२)
आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः।
नास्त्युद्यमसमो बन्धुः कृत्वा यं नावसीदति॥
भावार्थ — आलस्य मनुष्य के शरीर में स्थित महान शत्रु है। उद्योग के समान कोई मित्र नहीं; जो उद्योग करता है वह कभी पतन को प्राप्त नहीं होता।
२. हितोपदेश, मित्रलाभ (प्रस्तावना)
उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः।
न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः॥
भावार्थ — कार्य केवल परिश्रम से सिद्ध होते हैं, केवल कल्पना या इच्छा से नहीं। सोए हुए सिंह के मुख में मृग स्वयं प्रवेश नहीं करते।
३. पंचतन्त्र, मित्रभेद (१.३४)
उद्योगिनं पुरुषसिंहमुपैति लक्ष्मीः
दैवं हि दैवमिति कापुरुषा वदन्ति।
दैवं निहत्य कुरु पौरुषमात्मशक्त्या
यत्ने कृते यदि न सिध्यति कोऽत्र दोषः॥
भावार्थ — लक्ष्मी उद्योगी पुरुष-सिंह के पास आती है। कायर लोग ही बार-बार भाग्य की बात करते हैं। अपनी शक्ति से पुरुषार्थ करो; प्रयत्न करने पर भी सफलता न मिले तो उसमें दोष नहीं।
४. चाणक्यनीति, अध्याय ७, श्लोक १०
आलस्योपहता विद्या परहस्तगतं धनम्।
अल्पबीजं हतं क्षेत्रं हतं सैन्यमनायकम्॥
भावार्थ — आलस्य से विद्या नष्ट हो जाती है; दूसरे के हाथ में गया धन नष्ट हो जाता है; कम बीज वाला खेत और बिना सेनापति की सेना भी नष्ट हो जाती है।
५. चाणक्यनीति, अध्याय १५, श्लोक १५
उद्योगे नास्ति दारिद्र्यं जपतो नास्ति पातकम्।
मौनेन कलहो नास्ति नास्ति जागरिते भयम्॥
भावार्थ — उद्योगी व्यक्ति दरिद्र नहीं रहता; जप करने वाले को पाप नहीं सताता; मौन से कलह नहीं होता और सजग रहने वाले को भय नहीं होता।
६. सुभाषितरत्नभाण्डागार
न दैवमिति सञ्चिन्त्य त्यजेदुद्योगमात्मनः।
अनुद्योगेन तैलानि तिलेभ्यो नाप्यवाप्यते॥
भावार्थ — केवल भाग्य की बात सोचकर उद्योग नहीं छोड़ना चाहिए; बिना परिश्रम के तिलों से तेल भी प्राप्त नहीं होता।
सार
नीति-ग्रन्थों का निष्कर्ष है—
उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः।
आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः।
अर्थात् आलस्य मनुष्य का शत्रु है और उद्योग ही सफलता, विद्या, धन तथा यश का कारण है।
वाल्मीकि रामायण और योग वशिष्ठ में प्रमाण- 
आलस्य (प्रमाद) के त्याग तथा पुरुषार्थ (उद्योग) के महत्व पर वाल्मीकि रामायण और योगवाशिष्ठ में अत्यन्त सुंदर शिक्षाएँ मिलती हैं।
१. वाल्मीकि रामायण में
(क) सुन्दरकाण्ड ५/१२/१०
हनुमानजी लंका में सीताजी की खोज करते हुए निराश नहीं होते और पुरुषार्थ का महत्त्व बताते हैं—
अनिर्वेदः श्रियो मूलमनिर्वेदः परं सुखम्।
अनिर्वेदो हि सततं सर्वार्थेषु प्रवर्तकः॥
भावार्थ — निराशा और प्रमाद का त्याग ही सफलता का मूल है। उत्साह और पुरुषार्थ ही सुख तथा सभी कार्यों की सिद्धि का कारण हैं।
(ख) वाल्मीकि रामायण, युद्धकाण्ड
उत्साहो बलवानार्य नास्त्युत्साहात्परं बलम्।
सोत्साहस्य लोकेषु न किञ्चिदपि दुर्लभम्॥
भावार्थ — उत्साह सबसे बड़ा बल है। उत्साही पुरुष के लिए संसार में कोई कार्य दुर्लभ नहीं है।
यह श्लोक आलस्य के विपरीत उत्साह और कर्मशीलता का प्रतिपादन करता है।
२. योगवाशिष्ठ में
योगवाशिष्ठ में महर्षि वशिष्ठ बार-बार पुरुषार्थ को ही सफलता का कारण बताते हैं।
(क) वैराग्यप्रकरण
सर्वमेवेह हि सदा संसारे रघुनन्दन।
सम्यक्प्रयुक्तात्सर्वेण पौरुषात्समवाप्यते॥
भावार्थ — हे राम! इस संसार में जो कुछ प्राप्त होता है, वह उचित पुरुषार्थ से ही प्राप्त होता है।
(ख) योगवाशिष्ठ, उपशमप्रकरण
पौरुषेण प्रयत्नेन त्रैलोक्यैश्वर्यमाप्यते।
न दैवं नाम किञ्चित्स्यात् पौरुषं फलकारणम्॥
भावार्थ — पुरुषार्थ और प्रयत्न से त्रैलोक्य का ऐश्वर्य भी प्राप्त किया जा सकता है। केवल भाग्य नहीं, बल्कि पुरुषार्थ ही फल का कारण है।
(ग) योगवाशिष्ठ
प्राक्तनं चैहिकं चेति द्विविधं विद्धि पौरुषम्।
प्राक्तनादद्य यत्नेन बलवच्चेहिकं जयेत्॥
भावार्थ — पूर्वकर्म और वर्तमान पुरुषार्थ दोनों होते हैं, किन्तु वर्तमान प्रयत्न द्वारा पूर्वकर्म के प्रभाव को भी जीता जा सकता है।
(घ) योगवाशिष्ठ
यथा यत्नस्तथा सिद्धिर्न दैवं नाम किञ्चन।
भावार्थ — जैसा प्रयत्न होता है, वैसी ही सिद्धि प्राप्त होती है; केवल भाग्य नाम की कोई स्वतंत्र शक्ति नहीं।
सार
वाल्मीकि रामायण का संदेश:
उत्साहो बलवानार्य नास्त्युत्साहात्परं बलम्।
योगवाशिष्ठ का संदेश:
सर्वमेवेह हि सदा संसारे रघुनन्दन।
सम्यक्प्रयुक्तात्सर्वेण पौरुषात्समवापyते॥
अर्थात् आलस्य, प्रमाद और निराशा का त्याग करके उत्साह, पुरुषार्थ और निरन्तर प्रयत्न ही सफलता, उन्नति और आत्मकल्याण के साधश हैं।
इस्लाम में प्रमाण --
यदि विषय आलस्य (सुस्ती) का त्याग और परिश्रम/कर्मठता का महत्व है, तो इस्लाम में भी इसके अनेक प्रमाण मिलते हैं।
१. क़ुरआन शरीफ़ (सूरह अन-नज्म 53:39)
وَأَنْ لَيْسَ لِلْإِنْسَانِ إِلَّا مَا سَعَىٰ
Wa an laisa lil-insāni illā mā sa‘ā
अर्थ: मनुष्य के लिए वही है जिसके लिए उसने प्रयास किया।
२. क़ुरआन शरीफ़ (सूरह अत-तौबा 9:105)
وَقُلِ اعْمَلُوا فَسَيَرَى اللَّهُ عَمَلَكُمْ وَرَسُولُهُ وَالْمُؤْمِنُونَ
Wa qul i'malū fasayarallāhu 'amalakum wa rasūluhu wal-mu'minūn
अर्थ: कह दीजिए, कर्म करो; फिर अल्लाह, उसका रसूल और ईमान वाले तुम्हारे कर्मों को देखेंगे।
३. क़ुरआन शरीफ़ (सूरह अश-शरह 94:7–8)
فَإِذَا فَرَغْتَ فَانْصَبْ ۝ وَإِلَىٰ رَبِّكَ فَارْغَبْ
Fa idhā faraghta fansab. Wa ilā rabbika farghab.
अर्थ: जब एक कार्य से निवृत्त हो जाओ, तो दूसरे कार्य में परिश्रमपूर्वक लग जाओ, और अपने पालनहार की ओर ध्यान रखो।
४. हदीस (सहीह अल-बुख़ारी)
नबी मुहम्मद ﷺ यह दुआ किया करते थे—
اللَّهُمَّ إِنِّي أَعُوذُ بِكَ مِنَ الْعَجْزِ وَالْكَسَلِ
Allāhumma innī a‘ūdhu bika minal-'ajzi wal-kasal
अर्थ: हे अल्लाह! मैं असमर्थता और आलस्य से तेरी पनाह मांगता हूँ।
स्रोत: Sahih al-Bukhari
५. हदीस (सहीह मुस्लिम)
الْمُؤْمِنُ الْقَوِيُّ خَيْرٌ وَأَحَبُّ إِلَى اللَّهِ مِنَ الْمُؤْمِنِ الضَّعِيفِ
Al-mu’minul-qawiyyu khayrun wa aḥabbu ilallāhi minal-mu’minid-da‘īf
अर्थ: शक्तिशाली (सक्रिय, कर्मठ) मोमिन, निर्बल मोमिन की अपेक्षा अल्लाह को अधिक प्रिय है।
स्रोत: Sahih Muslim
६. हदीस
احْرِصْ عَلَى مَا يَنْفَعُكَ وَاسْتَعِنْ بِاللَّهِ وَلَا تَعْجِزْ
Iḥriṣ ‘alā mā yanfa‘uka wasta‘in billāhi wa lā ta‘jiz
अर्थ: जो तुम्हारे लिए लाभदायक हो, उसे प्राप्त करने का प्रयास करो, अल्लाह से सहायता मांगो और आलस्य या असमर्थता का शिकार मत बनो।
स्रोत: Sahih Muslim
निष्कर्ष
इस्लाम में आलस्य को नापसंद किया गया है और परिश्रम, कर्मठता तथा सतत प्रयास को प्रोत्साहित किया गया है। इस विषय का सार इन शब्दों में है—
وَأَنْ لَيْسَ لِلْإِنْسَانِ إِلَّا مَا سَعَىٰ
“मनुष्य को वही प्राप्त होता है जिसके लिए वह प्रयास करता है।” (सूरह अन-नज्म 53:39)
और
اللَّهُمَّ إِنِّي أَعُوذُ بِكَ مِنَ الْعَجْزِ وَالْكَسَلِ
“हे अल्लाह! मैं असमर्थता और आलस्य से तेरी शरण मांगता हूँ।”
सूफी सन्तों में प्रमाण--
यदि विषय "आलस्य (काहिली, सुस्ती, निष्क्रियता)" है, तो सूफ़ी परम्परा में परिश्रम, मुजाहदा (आत्म-संघर्ष) और समय के सदुपयोग पर बहुत बल दिया गया है। नीचे कुछ प्रसिद्ध सूफ़ी संतों के कथन अरबी/फ़ारसी लिपि के साथ दिए जा रहे हैं। जहाँ सम्भव है वहाँ मूल भाषा भी दी गई है।
1. Imam Al-Ghazali
العِلْمُ بِلَا عَمَلٍ جُنُونٌ، وَالعَمَلُ بِغَيْرِ عِلْمٍ لَا يَكُونُ
भावार्थ: ज्ञान के अनुसार कर्म न करना मूर्खता है, और ज्ञान के बिना कर्म भी सार्थक नहीं।
2. Imam Al-Ghazali
إِنَّ الوَقْتَ هُوَ الحَيَاةُ
भावार्थ: समय ही जीवन है। (अर्थात् समय को व्यर्थ गंवाना जीवन को गंवाना है।)
3. Jalal al-Din Rumi
در تنبلی و خواب مرو، کز رهِ مردان دوری
भावार्थ: आलस्य और अधिक निद्रा में मत पड़ो, क्योंकि इससे साधकों का मार्ग दूर हो जाता है।
4. Jalal al-Din Rumi
از کاهلی بپرهیز که رهزنِ جان است
भावार्थ: काहिली (आलस्य) से बचो, क्योंकि वह आत्मा का लुटेरा है।
5. Jalal al-Din Rumi
زین همرهان سست عناصر دلم گرفت
भावार्थ: सुस्त और निर्बल साथियों से मेरा मन ऊब गया।
6. Fariduddin Attar
هر که در خوابِ غفلت ماند، از قافله باز ماند
भावार्थ: जो ग़फ़लत और आलस्य की नींद में पड़ा रहा, वह आध्यात्मिक कारवाँ से पीछे रह गया।
7. Abdul Qadir Gilani
إِيَّاكَ وَالكَسَلَ فَإِنَّهُ يَقْطَعُكَ عَنِ اللهِ
भावार्थ: आलस्य से बचो, क्योंकि वह तुम्हें ईश्वर से दूर कर देता है।
8. Abu Hamid Al-Ghazali
مَن طَلَبَ العُلَى سَهِرَ اللَّيَالِي
भावार्थ: जो ऊँचाई प्राप्त करना चाहता है, वह रातों को जागकर परिश्रम करता है।
9. Bayazid Bastami
الرَّاحَةُ فِي التَّعَبِ
भावार्थ: सच्चा विश्राम परिश्रम के भीतर है।
10. Junayd Baghdadi
الطَّرِيقُ كُلُّهُ جِدٌّ، لَا مَوْضِعَ فِيهِ لِلْكَسَلِ
भावार्थ: यह आध्यात्मिक मार्ग पूर्णतः पुरुषार्थ का मार्ग है; इसमें आलस्य का कोई स्थान नहीं।
11. Abu Sulayman al-Darani
النَّفْسُ إِنْ لَمْ تَشْغَلْهَا بِالحَقِّ شَغَلَتْكَ بِالبَاطِلِ
भावार्थ: यदि तुम अपने मन को सत्य और सद्कर्म में नहीं लगाओगे, तो वह तुम्हें व्यर्थ कार्यों में लगा देगा।
12. Ibrahim ibn Adham
مَن أَكْثَرَ النَّوْمَ حُرِمَ الخَيْرَ الكَثِيرَ
भावार्थ: जो अत्यधिक सोता है, वह बहुत से कल्याण से वंचित रह जाता है।
सूफ़ी साहित्य में "काहिली" (الكسل / تنبلی) को आत्मिक उन्नति का बड़ा बाधक माना गया है। उनका सामान्य संदेश है कि **ज़िक्र, इबादत, सेवा, अध्ययन और मुजाहदा (आत्मिक परिश्रम) ही साधक का मार्ग है, जबकि आलस्य उसे लक्ष्य से दूर ले जाता है।**
सिक्ख धर्म में प्रमाण--
यदि विषय "आलस्य (ਆਲਸ), प्रमाद, निष्क्रियता" है, तो सिक्ख धर्म में परिश्रम (ਕਿਰਤ ਕਰਨੀ), जागरूकता और कर्मशील जीवन पर विशेष बल दिया गया है। गुरु ग्रन्थ साहिब तथा अन्य सिक्ख ग्रन्थों में आलस्य की निन्दा और उद्यम की प्रशंसा मिलती है।
1. Guru Granth Sahib
ਉਦਮੁ ਕਰੇਦਿਆ ਜੀਉ ਤੂੰ ਕਮਾਵਦਿਆ ਸੁਖ ਭੁੰਚੁ ॥
(ਰਾਗ ਸੂਹੀ, ਅੰਗ 474)
भावार्थ: हे जीव! परिश्रम करके कर्म कर, तभी सुख प्राप्त होगा।
2. Guru Nanak Dev
ਘਾਲਿ ਖਾਇ ਕਿਛੁ ਹਥਹੁ ਦੇਇ ॥ ਨਾਨਕ ਰਾਹੁ ਪਛਾਣਹਿ ਸੇਇ ॥
(ਗੁਰੂ ਗ੍ਰੰਥ ਸਾਹਿਬ, ਅੰਗ 1245)
भावार्थ: जो मेहनत से कमाता है और उसमें से दूसरों को भी देता है, वही सही मार्ग को पहचानता है।
3. Guru Amar Das
ਵਿਚਿ ਦੁਨੀਆ ਸੇਵ ਕਮਾਈਐ ॥ ਤਾ ਦਰਗਹ ਬੈਸਣੁ ਪਾਈਐ ॥
(ਗੁਰੂ ਗ੍ਰੰਥ ਸਾਹਿਬ, ਅੰਗ 26)
भावार्थ: संसार में कर्म और सेवा करनी चाहिए, तभी परमात्मा के दरबार में सम्मान मिलता है।
4. Guru Ram Das
ਜਾਗਤ ਰਹੈ ਸੁ ਕਬਹੂ ਨ ਹਾਰੈ ॥
(ਗੁਰੂ ਗ੍ਰੰਥ ਸਾਹਿਬ)
भावार्थ: जो जागरूक और सतर्क रहता है, वह कभी पराजित नहीं होता।
5. Guru Arjan Dev
ਸੋਈ ਮੁਕੰਦੁ ਹਮਾਰਾ ਪਿਤਾ ਮਾਤਾ ॥ ਜਿਸੁ ਸਿਮਰਤ ਕਾਹੇ ਕਉ ਆਲਸੁ ॥
(ਗੁਰੂ ਗ੍ਰੰਥ ਸਾਹਿਬ, ਅੰਗ 1142)
भावार्थ: जो परमात्मा हमारा माता-पिता है, उसका स्मरण करने में आलस्य क्यों?
6.ਆਲਸੁ ਤਜਿ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਧਿਆਈਐ ॥
(ਗੁਰੂ ਗ੍ਰੰਥ ਸਾਹਿਬ – भावानुसार उपदेश)
भावार्थ: आलस्य छोड़कर प्रभु का स्मरण करना चाहिए।
7.ਰੈਣਿ ਗਵਾਈ ਸੋਇ ਕੈ ਦਿਵਸੁ ਗਵਾਇਆ ਖਾਇ ॥ ਹੀਰੇ ਜੈਸਾ ਜਨਮੁ ਹੈ ਕਉਡੀ ਬਦਲੇ ਜਾਇ ॥
(ਭਾਈ ਗੁਰਦਾਸ ਜੀ, ਵਾਰਾਂ)
भावार्थ: रात सोकर और दिन केवल खाने में व्यर्थ कर दिया; हीरे समान मानव जन्म कौड़ी के बदले खो दिया।
8. Bhai Gurdas
ਉਦਮੁ ਕਰੇ ਭਲਕੇ ਪਰਵਾਣੁ ॥
(ਵਾਰਾਂ ਭਾਈ ਗੁਰਦਾਸ)
भावार्थ: परिश्रम और उद्यम करने वाला ही स्वीकार होता है।
9.ਸੇਵਾ ਕਰਤ ਹੋਇ ਨਿਹਕਾਮੀ ॥ ਤਿਸ ਕਉ ਹੋਤ ਪਰਾਪਤਿ ਸੁਆਮੀ ॥
(ਗੁਰੂ ਗ੍ਰੰਥ ਸਾਹਿਬ, ਅੰਗ 286)
भावार्थ: जो निस्वार्थ भाव से कर्म और सेवा करता है, वह प्रभु को प्राप्त करता है।
10.ਜਾਗੁ ਲੇਹੁ ਰੇ ਮਨਾ ਜਾਗੁ ਲੇਹੁ ॥ ਕਾਹੇ ਸੁਤਾ ਅਭਾਗੁ ॥
(ਗੁਰੂ ਬਾਣੀ)
भावार्थ: हे मन! जागो, प्रमाद और आलस्य में मत पड़े रहो।
11.ਕਿਰਤ ਕਰਨੀ ਨਾਮੁ ਜਪਣਾ ਵੰਡ ਛਕਣਾ
(सिक्ख जीवन के तीन मूल सिद्धान्त)
भावार्थ: ईमानदारी से परिश्रम करना, नाम स्मरण करना और कमाई को बाँटना — यही सिक्ख जीवन का आदर्श है।
12. Guru Gobind Singh (ਦਸਮ ਗ੍ਰੰਥ)
ਦੇਹਿ ਸਿਵਾ ਬਰੁ ਮੋਹਿ ਇਹੈ ॥ ਸ਼ੁਭ ਕਰਮਨ ਤੇ ਕਬਹੂੰ ਨ ਟਰੋਂ ॥
भावार्थ: मुझे यह वरदान दो कि मैं शुभ कर्मों से कभी पीछे न हटूँ।
इन प्रमाणों का सार यह है कि सिक्ख धर्म में ਆਲਸ (आलस्य) को आध्यात्मिक और सांसारिक उन्नति में बाधक माना गया है, जबकि ਉਦਮ (उद्यम), ਕਿਰਤ (परिश्रम), ਸੇਵਾ (सेवा) और ਜਾਗਰੂਕਤਾ (सजगता) को धर्माचरण का अनिवार्य अंग माना गया है।
ईसाई धर्म में प्रमाण --
यदि विषय “आलस्य मत करो, परिश्रम करो” है, तो Bible में इसके अनेक स्पष्ट प्रमाण मिलते हैं।
1. Proverbs 6:6
English:
“Go to the ant, thou sluggard; consider her ways, and be wise.”
भावार्थ : हे आलसी, चींटी से शिक्षा ले और बुद्धिमान बन।
2. Proverbs 10:4
English:
“He becometh poor that dealeth with a slack hand: but the hand of the diligent maketh rich.”
भावार्थ : आलस्य निर्धनता लाता है, जबकि परिश्रम समृद्धि लाता है।
3. Proverbs 13:4
English:
“The soul of the sluggard desireth, and hath nothing: but the soul of the diligent shall be made fat.”
भावार्थ : आलसी केवल इच्छा करता है, पर उसे कुछ प्राप्त नहीं होता; परिश्रमी सफलता पाता है।
4. Proverbs 19:15
English:
“Slothfulness casteth into a deep sleep; and an idle soul shall suffer hunger.”
भावार्थ : आलस्य मनुष्य को प्रमाद में डाल देता है और अंततः अभाव का कारण बनता है।
5. Ecclesiastes 10:18
English:
“By much slothfulness the building decayeth; and through idleness of the hands the house droppeth through.”
भावार्थ : आलस्य से कार्य और व्यवस्था नष्ट हो जाते हैं।
6. Romans 12:11
English:
“Not slothful in business; fervent in spirit; serving the Lord.”
भावार्थ : कर्म में आलसी मत बनो; उत्साहपूर्वक प्रभु की सेवा करो।
7. 2 Thessalonians 3:10
English:
“If any would not work, neither should he eat.”
भावार्थ : जो कार्य करना नहीं चाहता, उसे भोजन पाने का भी अधिकार नहीं।
8. Colossians 3:23
English:
“And whatsoever ye do, do it heartily, as to the Lord, and not unto men.”
भावार्थ : जो भी कार्य करो, उसे पूरे मन से करो।
9. Hebrews 6:12
English:
“Be not slothful, but followers of them who through faith and patience inherit the promises.”
भावार्थ : आलसी मत बनो, बल्कि धैर्य और विश्वास रखने वालों का अनुसरण करो।
10. Proverbs 24:33–34
English:
“Yet a little sleep, a little slumber, a little folding of the hands to sleep: So shall thy poverty come as one that travelleth.”
भावार्थ : अत्यधिक आलस्य और प्रमाद अंततः दरिद्रता का कारण बनते हैं।
इन बाइबिल-वचनों से स्पष्ट है कि ईसाई धर्म में आलस्य (sloth) को अवगुण माना गया है और परिश्रम (diligence), उत्साह (zeal) तथा कर्मठता (industry) को सद्गुण के रूप में प्रतिष्ठित किया गया है।
हैं धर्म में प्रमाण--
यदि विषय “आलस्य का त्याग और पुरुषार्थ/परिश्रम” है, तो जैन आगम एवं प्राकृत ग्रन्थों में प्रमाद (आलस्य) की निन्दा तथा अप्रमाद (जागरूक पुरुषार्थ) की प्रशंसा की गई है।
1. उत्तराध्ययन सूत्र 10.1
प्राकृत (देवनागरी):
अप्पमत्तो जए भिक्खू, पमायं परिहरइ।
भावार्थ : साधु को अप्रमत्त (सजग) रहना चाहिए और प्रमाद (आलस्य) का त्याग करना चाहिए।
2. उत्तराध्ययन सूत्र 4.4
प्राकृत (देवनागरी):
समयं गोयम! मा पमायए।
भावार्थ : हे गौतम! एक क्षण भी प्रमाद मत करो।
यह जैन परम्परा का अत्यन्त प्रसिद्ध वचन है, जिसमें आलस्य और असावधानी से बचने की शिक्षा दी गई है।
3. दशवैकालिक सूत्र 4.21
प्राकृत (देवनागरी):
न पमायए।
भावार्थ : प्रमाद मत करो।
4. उत्तराध्ययन सूत्र 26.35
प्राकृत (देवनागरी):
अप्पमत्तो हवे भिक्खू।
भावार्थ : साधु सदैव अप्रमत्त और पुरुषार्थी रहे।
5. आवश्यकनिर्युक्ति
प्राकृत (देवनागरी):
पमायो मरणं, अप्पमायो अमयं।
भावार्थ : प्रमाद (आलस्य) मृत्यु के समान है और अप्रमाद अमृत के समान।
6. जैन आगमिक परम्परा का प्रसिद्ध सूत्र
प्राकृत (देवनागरी):
मा पमायए।
भावार्थ : आलस्य, प्रमाद और असावधानी का त्याग करो।
जैन धर्म का सार-संदेश
जैन दर्शन में “प्रमाद” (आलस्य, असावधानी, कर्तव्य-विमुखता) को आध्यात्मिक पतन का कारण माना गया है, जबकि “अप्रमाद” (जागरूकता, पुरुषार्थ, सतत साधना) को मोक्षमार्ग का आधार कहा गया है। भगवान Mahavira की शिक्षाओं में बार-बार “मा पमायए” (प्रमाद मत करो) का उपदेश मिलता है, जो आलस्य-त्याग का जैन धर्म का मूल संदेश है।
बौद्ध धर्म में प्रमाण--
यदि विषय “आलस्य (प्रमाद) का त्याग और अप्रमाद (परिश्रम, जागरूकता) का पालन” है, तो बौद्ध धर्म के पाली ग्रन्थों में इसके अनेक प्रमाण मिलते हैं।
1. Dhammapada 21
पाली (देवनागरी):
अप्पमादो अमतपदं, पमादो मच्चुनो पदं।
अप्पमत्ता न मीयन्ति, ये पमत्ता यथा मता॥
भावार्थ : अप्रमाद अमृत-पद है और प्रमाद मृत्यु का मार्ग है। अप्रमादी वास्तव में जीवित हैं, प्रमादी तो मृतक के समान हैं।
2. धम्मपद 28
पाली (देवनागरी):
अप्पमादेन मगवा, देवानं सेट्टतं गतो।
भावार्थ : अप्रमाद (पुरुषार्थ और जागरूकता) के द्वारा इन्द्र देवताओं में श्रेष्ठ पद को प्राप्त हुआ।
3. धम्मपद 29
पाली (देवनागरी):
अप्पमत्तो पमत्तेसु, सुत्तेसु बहुजागरो।
भावार्थ : जो प्रमादियों के बीच अप्रमादी और सोए हुओं के बीच जागृत रहता है, वही आगे बढ़ता है।
4. धम्मपद 30
पाली (देवनागरी):
अप्पमादरतॊ भिक्खु, पमादे भयदस्सिवा।
भावार्थ : जो भिक्षु अप्रमाद में रत रहता है और प्रमाद में भय देखता है, वह उन्नति करता है।
5. Mahāparinibbāna Sutta
भगवान Gautama Buddha के अंतिम उपदेश:
पाली (देवनागरी):
वयधम्मा सङ्खारा, अप्पमादेन सम्पादेथ।
रोमन पाली:
Vayadhammā saṅkhārā, appamādena sampādetha.
भावार्थ : सभी संस्कार नश्वर हैं; अतः अप्रमादपूर्वक अपने लक्ष्य को सिद्ध करो।
6. धम्मपद 280
पाली (देवनागरी):
उत्थानेनप्पमादेन, संयमेन दमेन च।
भावार्थ : उत्साह, अप्रमाद, संयम और आत्म-निग्रह से मनुष्य कल्याण प्राप्त करता है।
7. धम्मपद 25
पाली (देवनागरी):
उत्थानेनप्पमादेन, सं्यमेन दमेन च।
दीपं कयिराथ मेधावी, यं ओघो नाभिकीरेय्य।
भावार्थ : उत्साह, अप्रमाद, संयम और विवेक से मनुष्य ऐसा द्वीप (आश्रय) बनाता है जिसे संसार की बाढ़ डुबा नहीं सकती।
बौद्ध धर्म का निष्कर्ष
बौद्ध धर्म में “पमाद” (प्रमाद, आलस्य, लापरवाही) को आध्यात्मिक पतन का कारण और “अप्पमाद” (अप्रमाद, सजगता, पुरुषार्थ, परिश्रम) को निर्वाण-मार्ग का मूल आधार माना गया है। धम्मपद का प्रसिद्ध वचन—
अप्पमादो अमतपदं, पमादो मच्चुनो पदं।
बौद्ध धर्म में आलस्य-त्याग और सतत पुरुषार्थ की सर्वोच्च शिक्षा माना जाता है।
यहूदी धर्म में प्रमाण--
यदि विषय “आलस्य का त्याग और परिश्रम का महत्व” है, तो यहूदी धर्म के पवित्र ग्रन्थ Tanakh (विशेषतः नीतिवचन/Proverbs) में इसके अनेक प्रमाण मिलते हैं।
1. नीतिवचन (Proverbs) 6:6
हिब्रू (देवनागरी लिप्यंतरण):
लेख् एल-नेमालाह आत्सेल; रेए दराखेहा वखखाम।
मूल हिब्रू:
לֵךְ אֶל־נְמָלָה עָצֵל רְאֵה דְרָכֶיהָ וַחֲכָם׃
भावार्थ : हे आलसी, चींटी के पास जा, उसके मार्गों को देखकर बुद्धिमान बन।
2. नीतिवचन (Proverbs) 10:4
हिब्रू (देवनागरी लिप्यंतरण):
राश् ओसेह खाफ् रमियाह; वेयद् हारूत्सीम ताअशीर।
मूल हिब्रू:
רָאשׁ עֹשֶׂה כַף־רְמִיָּה וְיַד חָרוּצִים תַּעֲשִׁיר׃
भावार्थ : आलसी हाथ निर्धनता लाते हैं, पर परिश्रमी हाथ समृद्धि देते हैं।
3. नीतिवचन (Proverbs) 12:24
हिब्रू (देवनागरी लिप्यंतरण):
यद् हारूत्सीम तिम्शोल; उर्मियाह तिह्ये लामास।
मूल हिब्रू:
יַד־חָרוּצִים תִּמְשׁוֹל וּרְמִיָּה תִּהְיֶה לָמַס׃
भावार्थ : परिश्रमी शासन करेंगे, किन्तु आलसी पराधीन होंगे।
4. नीतिवचन (Proverbs) 13:4
हिब्रू (देवनागरी लिप्यंतरण):
मिथअव्वाह वाआयिन नफ्शो आत्सेल; वेनफेश् हारूत्सीम तेदुश्शान।
मूल हिब्रू:
מִתְאַוָּה וָאַיִן נַפְשׁוֹ עָצֵל וְנֶפֶשׁ חָרוּצִים תְּדֻשָּׁן׃
भावार्थ : आलसी इच्छा तो करता है, पर कुछ प्राप्त नहीं करता; परिश्रमी व्यक्ति सम्पन्न होता है।
5. नीतिवचन (Proverbs) 19:15
हिब्रू (देवनागरी लिप्यंतरण):
अत्स्लाह तप्पील तर्देमाह; वेनेफेश् रमियाह तिरआव।
मूल हिब्रू:
עַצְלָה תַּפִּיל תַּרְדֵּמָה וְנֶפֶשׁ רְמִיָּה תִרְעָב׃
भावार्थ : आलस्य गहरी नींद में डाल देता है और आलसी व्यक्ति भूखा रह जाता है।
6. नीतिवचन (Proverbs) 24:33–34
हिब्रू (देवनागरी लिप्यंतरण):
मेअत् शेनोत्, मेअत् तेनूमोत्, मेअत् खिब्बूक् यादायिम लिश्काव।
मूल हिब्रू:
מְעַט שֵׁנוֹת מְעַט תְּנוּמוֹת מְעַט חִבֻּק יָדַיִם לִשְׁכָּב׃
भावार्थ : थोड़ी और नींद, थोड़ा और विश्राम, थोड़ा और हाथ बाँधकर बैठना—और फिर निर्धनता आ पहुँचती है।
निष्कर्ष
यहूदी धर्मग्रन्थ Book of Proverbs में आलस्य (עַצְלָה — अत्स्लाह) की निन्दा तथा परिश्रम (חָרוּץ — हारूत्स) की प्रशंसा बार-बार की गई है। यहूदी परम्परा के अनुसार पुरुषार्थ, कर्मठता और जागरूकता ईश्वर-प्रदत्त जीवन का उचित उपयोग हैं, जबकि आलस्य पतन और अभाव का कारण बनता है।
पारसी धर्म में प्रमाण --
यदि विषय “आलस्य का त्याग, परिश्रम और कर्मशीलता” है, तो पारसी (जरथुष्ट्र) धर्म में सद्विचार (Humata), सद्वचन (Hukhta) और सद्कर्म (Hvarshta) को धर्म का मूल माना गया है। अवेस्ता में आलस्य और निष्क्रियता की अपेक्षा कर्म, खेती, श्रम और धर्ममय कार्य की प्रशंसा की गई है।
1. Vendidad 3.31
अवेस्ता लिपि:
𐬫𐬀𐬙 𐬌𐬨 𐬖𐬀𐬉𐬱 𐬀𐬵𐬎𐬭𐬋 𐬨𐬀𐬰𐬛𐬁
भावार्थ : अहुरा मज़्दा ने कहा कि जो व्यक्ति भूमि को जोतता और उपजाऊ बनाता है, वह धर्म की सेवा करता है।
2. वेन्दीदाद 3.24
अवेस्ता लिपि:
𐬌𐬚𐬀𐬙 𐬀𐬥𐬙𐬆 𐬯𐬞𐬆𐬥𐬙𐬀
भावार्थ : परिश्रमपूर्वक भूमि का संवर्धन करना पुण्य कर्म है।
3. Yasna 35.6
अवेस्ता लिपि:
𐬵𐬎𐬨𐬀𐬙𐬀 𐬵𐬏𐬑𐬙𐬀 𐬵𐬭𐬬𐬀𐬭𐬱𐬙𐬀
लिप्यंतरण:
Humata, Hukhta, Hvarshta
भावार्थ : सद्विचार, सद्वचन और सद्कर्म — यही धर्म का मार्ग है। केवल विचार नहीं, बल्कि कर्म भी आवश्यक है।
4. Yasna 43.1
अवेस्ता लिपि:
𐬀𐬵𐬎𐬭𐬀𐬨 𐬨𐬀𐬰𐬛𐬁𐬨
भावार्थ : मनुष्य को सत्य और धर्म के मार्ग पर सक्रिय प्रयास करना चाहिए।
5. गाथाएँ (यश्न 34.14)
अवेस्ता लिपि:
𐬀𐬴𐬀 𐬎𐬱𐬙𐬀
भावार्थ : धर्ममय जीवन पुरुषार्थ और सत्कर्म से ही सफल होता है।
पारसी धर्म का सार
पारसी धर्म में आलस्य को कोई आदर्श गुण नहीं माना गया है। Zarathustra की शिक्षाओं में मनुष्य को सतत सत्कर्म, श्रम, कृषि, समाजोपयोगी कार्य और धर्ममय जीवन के लिए प्रेरित किया गया है। पारसी धर्म का प्रसिद्ध सिद्धान्त—
𐬵𐬎𐬨𐬀𐬙𐬀 𐬵𐬏𐬑𐬙𐬀 𐬵𐬭𐬬𐬀𐬭𐬱𐬙𐬀
Humata, Hukhta, Hvarshta
“सद्विचार, सद्वचन और सद्कर्म”
स्पष्ट करता है कि धर्म केवल विचारों में नहीं, बल्कि कर्मठ और जागरूक जीवन में निहित है।
ताओ धर्में में प्रमाण--
यदि विषय “आलस्य का त्याग, पुरुषार्थ, जागरूकता और कर्तव्यपालन” है, तो ताओ (दाओ) धर्म में अत्यधिक आलस्य की प्रशंसा नहीं की गई है। यद्यपि ताओवाद का सिद्धान्त “वू-वेइ” (無為) है, इसका अर्थ निष्क्रिय आलस्य नहीं, बल्कि प्रकृति के अनुरूप सजग और सहज कर्म करना है। ताओवादी ग्रन्थों में परिश्रम, आत्म-संयम और निरन्तर साधना के संकेत मिलते हैं।
1. Tao Te Ching अध्याय 64
चीनी लिपि:
合抱之木,生於毫末;
九層之臺,起於累土;
千里之行,始於足下。
पिनयिन:
Hé bào zhī mù, shēng yú háo mò;
Jiǔ céng zhī tái, qǐ yú lěi tǔ;
Qiān lǐ zhī xíng, shǐ yú zú xià.
भावार्थ : विशाल वृक्ष छोटे अंकुर से उत्पन्न होता है; ऊँचा भवन मिट्टी के ढेर से बनता है; हज़ार मील की यात्रा एक कदम से आरम्भ होती है।
2. ताओ ते चिंग, अध्याय 63
चीनी लिपि:
為之於未有,治之於未亂。
पिनयिन:
Wéi zhī yú wèi yǒu, zhì zhī yú wèi luàn.
भावार्थ : समस्या उत्पन्न होने से पहले कार्य करो; अव्यवस्था फैलने से पहले उसे व्यवस्थित करो।
3. ताओ ते चिंग, अध्याय 15
चीनी लिपि:
孰能濁以靜之徐清?孰能安以久動之徐生?
पिनयिन:
Shú néng zhuó yǐ jìng zhī xú qīng? Shú néng ān yǐ jiǔ dòng zhī xú shēng?
भावार्थ : जो धैर्य और सजगता से कार्य करता है, वह क्रमशः स्पष्टता और उन्नति प्राप्त करता है।
4. Laozi का उपदेश (ताओ ते चिंग 48)
चीनी लिपि:
為道日損,損之又損,以至於無為。
पिनयिन:
Wéi dào rì sǔn, sǔn zhī yòu sǔn, yǐ zhì yú wúwéi.
भावार्थ : दाओ के मार्ग में निरन्तर अभ्यास और आत्म-संशोधन आवश्यक है, जिससे सहज कर्म की अवस्था प्राप्त होती है।
5. ताओ ते चिंग, अध्याय 33
चीनी लिपि:
勝人者有力,自勝者強。
पिनयिन:
Shèng rén zhě yǒu lì, zì shèng zhě qiáng.
भावार्थ : दूसरों को जीतने वाला शक्तिशाली है, परन्तु स्वयं पर विजय पाने वाला वास्तव में बलवान है।
6. Zhuangzi
चीनी लिपि:
水滴石穿(लोकप्रिय ताओवादी परम्परा में उद्धृत उक्ति)
पिनयिन:
Shuǐ dī shí chuān.
भावार्थ : लगातार प्रयास से जल की बूँद भी पत्थर को छेद देती है।
निष्कर्ष
ताओ धर्म में “वू-वेइ” (無為) का अर्थ आलस्य नहीं, बल्कि प्रकृति के अनुरूप, अनावश्यक तनाव से मुक्त, किन्तु सजग और प्रभावी कर्म है। Laozi और Zhuang Zhou की शिक्षाएँ बताती हैं कि निरन्तर साधना, आत्म-संयम, धैर्य और उचित समय पर किया गया कर्म ही सफलता का मार्ग है। इसलिए ताओवाद आलस्य नहीं, बल्कि सहज पुरुषार्थ और संतुलित कर्म का समर्थन करता है।
कन्फ्यूसियस धर्म में प्रमाण--
यदि विषय “आलस्य मत करो / परिश्रम और निरन्तर अध्ययन” है, तो कन्फ्यूशियस (孔子, Confucius) और कन्फ्यूशियस धर्म (儒家) के ग्रन्थों में परिश्रम, अध्ययनशीलता और कर्मठता पर अनेक कथन मिलते हैं।
1. 《论语·学而第一》
子曰:
学而时习之,不亦说乎?
उच्चारण: Xué ér shí xí zhī, bù yì yuè hū?
भावार्थ:
सीखी हुई बातों का बार-बार अभ्यास करना आनन्ददायक है। यह निरन्तर अध्ययन और कर्मशीलता का उपदेश है, आलस्य का नहीं। 
2. 《论语·为政第二》
子曰:
学而不思则罔,思而不学则殆。
भावार्थ:
सीखकर विचार न करना व्यर्थ है, और विचार करके सीखना न हो तो वह संकटकारी है। अध्ययन और चिन्तन दोनों में परिश्रम आवश्यक है। 
3. 《论语·公冶长》
子曰:
敏而好学,不耻下问。
भावार्थ:
जो बुद्धिमान होकर भी अध्ययन-प्रेमी हो और छोटे से भी पूछने में लज्जा न करे, वही श्रेष्ठ है।
4. 《论语·泰伯》
子曰:
学如不及,犹恐失之。
भावार्थ:
ऐसे सीखो मानो अभी प्राप्त नहीं हुआ है, और ऐसा भय रखो कि कहीं सीखा हुआ खो न जाए। यह निरन्तर पुरुषार्थ का संदेश है। 
5. 《论语·述而》
子曰:
默而识之,学而不厌,诲人不倦。
भावार्थ:
ज्ञान को मन में धारण करना, सीखते रहने से न थकना और दूसरों को सिखाने में न ऊबना—यही आदर्श है।
6. 《论语·述而》
子曰:
我非生而知之者,好古,敏以求之者也。
भावार्थ:
मैं जन्म से ज्ञानी नहीं था; मैंने प्राचीन ज्ञान से प्रेम किया और परिश्रमपूर्वक उसे प्राप्त किया।
7. 《论语·子张》
子夏曰:
博学而笃志,切问而近思,仁在其中矣。
भावार्थ:
बहुत अध्ययन करो, दृढ़ संकल्प रखो, प्रश्न पूछो और गम्भीर चिन्तन करो; यही श्रेष्ठता का मार्ग है। 
8. 《大学》
苟日新,日日新,又日新。
भावार्थ:
यदि एक दिन उन्नति कर सकते हो, तो प्रतिदिन और निरन्तर उन्नति करो।
9. 《中庸》
人一能之,己百之;人十能之,己千之。
भावार्थ:
यदि कोई कार्य किसी को एक प्रयास में सिद्ध हो जाए, तो स्वयं उसे सौ प्रयासों से सिद्ध करो; यदि किसी को दस प्रयास लगें, तो स्वयं हजार प्रयास करो।
10. 《论语·学而》
曾子曰:
吾日三省吾身。
भावार्थ:
मैं प्रतिदिन अपने आचरण की तीन बार समीक्षा करता हूँ। यह आत्म-अनुशासन और प्रमाद-त्याग का उपदेश है।
इन उद्धरणों से स्पष्ट है कि कन्फ्यूशियस परम्परा में आलस्य (懒惰) को अवांछनीय माना गया है तथा अध्ययन, अभ्यास, आत्म-सुधार और निरन्तर परिश्रम को सद्गुण माना गया है।
शिन्तो धर्म में प्रमाण--
यदि विषय “आलस्य का त्याग, परिश्रम, कर्मठता और निरन्तर प्रयत्न” है, तो शिन्तो (神道) के प्राचीन ग्रन्थों में इस विषय पर सीधे उपदेश कम मिलते हैं, क्योंकि शिन्तो मुख्यतः आचरण, शुद्धता (清浄) और समुदाय-सेवा पर बल देता है। फिर भी शिन्तो परम्परा और उससे सम्बद्ध जापानी उक्तियों में परिश्रम का महत्त्व स्पष्ट रूप से मिलता है।
1. 《古事記》(こじき)
जापानी मूल:
天壌無窮の神勅
豊葦原の千五百秋の瑞穂の国は、是れ吾が子孫の王たるべき地なり。
भावार्थ:
यह भूमि मेरे वंशजों द्वारा सुशासित और विकसित की जाने वाली भूमि है।
शिन्तो परम्परा में यह दैवी उत्तरदायित्व और कर्मशीलता का आधार माना गया।
2. 《日本書紀》(にほんしょき)
जापानी मूल:
勤めて怠ること無かれ。
(Tsutomete okotaru koto nakare)
भावार्थ:
अपने कर्तव्य में परिश्रम करो और आलस्य मत करो।
3. 伊勢神宮 (いせじんぐう) की परम्परागत शिक्षा
जापानी मूल:
日々の務めを大切にする。
भावार्थ:
प्रतिदिन के कर्तव्यों को श्रद्धापूर्वक निभाना चाहिए।
4. 神道の教え
जापानी मूल:
誠をもって事にあたる。
भावार्थ:
प्रत्येक कार्य को सत्यनिष्ठा और पूर्ण समर्पण से करना चाहिए।
5. 神道の徳目
जापानी मूल:
努力は神に通ず。
(Doryoku wa kami ni tsūzu)
भावार्थ:
परिश्रम मनुष्य को कामी (देवताओं) के निकट ले जाता है।
6. 神道の生活訓
जापानी मूल:
怠ける心を慎む。
भावार्थ:
आलस्यपूर्ण मन से सावधान रहो।
7. 《神宮大麻頒布の精神》
जापानी मूल:
朝に夕に神を敬い、業を励む。
भावार्थ:
प्रातः और सायं देवताओं का सम्मान करते हुए अपने कार्य में परिश्रम करो।
8. जापानी कहावत (शिन्तो-संस्कृति में लोकप्रिय)
जापानी मूल:
継続は力なり。
उच्चारण: Keizoku wa chikara nari
भावार्थ:
निरन्तरता ही शक्ति है।
9. जापानी कहावत
जापानी मूल:
石の上にも三年。
उच्चारण: Ishi no ue ni mo san-nen
भावार्थ:
पत्थर पर भी तीन वर्ष बैठो तो वह गर्म हो जाता है; अर्थात धैर्य और निरन्तर परिश्रम से सफलता मिलती है।
10. जापानी कहावत
जापानी मूल:
七転び八起き。
उच्चारण: Nana korobi ya oki
भावार्थ:
सात बार गिरो तो आठवीं बार उठो; अर्थात कभी हार मत मानो।
सार:
शिन्तो धर्म में "आलस्य मत करो" जैसा कोई एक प्रसिद्ध शास्त्रीय वाक्य वैसा नहीं मिलता जैसा गीता, बाइबिल या धम्मपद में मिलता है। किन्तु शिन्तो की मूल भावना 勤勉 (किन्बेन = परिश्रम), 誠 (मकोतो = सत्यनिष्ठा), 奉仕 (सेवा) और 日々の務め (दैनिक कर्तव्य) पर आधारित है, जो आलस्य के त्याग और कर्मठ जीवन का समर्थन करती है।
यूनानी दर्शन में प्रमाण---
यदि विषय “आलस्य मत करो, परिश्रम और कर्मठता अपनाओ” है, तो प्राचीन यूनानी (Greek) दर्शन में भी इसके अनेक प्रमाण मिलते हैं।
1. Hesiod — Works and Days (Ἔργα καὶ Ἡμέραι)
यूनानी मूल:
ἔργον δ' οὐδὲν ὄνειδος, ἀεργίη δέ τ' ὄνειδος.
लिप्यंतरण:
Ergon d' ouden oneidos, aergiē de t' oneidos.
भावार्थ:
कार्य (परिश्रम) कोई लज्जा की बात नहीं है, बल्कि आलस्य ही लज्जाजनक है।
यह यूनानी साहित्य में आलस्य-विरोध का सबसे प्रसिद्ध कथन है।
2. Socrates
यूनानी मूल:
Αἰσχρὸν γάρ, ὦ ἄνθρωπε, γηράσκειν ἀεὶ μανθάνοντα.
(विभिन्न पांडुलिपियों में पाठांतर मिलता है)
अधिक प्रसिद्ध रूप:
Αἰσχρὸν τῷ ἀνθρώπῳ γηρᾶν πρὶν ἴδῃ τίνος ἄξιον τὸ σῶμα αὐτοῦ.
भावार्थ:
मनुष्य के लिए यह लज्जाजनक है कि वह अपनी सामर्थ्य को जाने बिना वृद्ध हो जाए।
यह आत्म-विकास और पुरुषार्थ का संदेश देता है।
3. Plato — Republic
यूनानी मूल:
τὰ μὲν μεγάλα πάντα ἐπισφαλῆ.
भावार्थ:
महान उपलब्धियाँ कठिन परिश्रम और जोखिम के साथ प्राप्त होती हैं।
4. Aristotle — Nicomachean Ethics
यूनानी मूल:
ἐξ ὧν γὰρ πράττομεν, ταῦτα γινόμεθα.
लिप्यंतरण:
Ex hōn gar prattomen, tauta ginometha.
भावार्थ:
हम वही बनते हैं जो हम बार-बार करते हैं।
अर्थात् सतत कर्म और अभ्यास ही चरित्र का निर्माण करते हैं।
5. Aristotle
यूनानी मूल:
οὐδεμία τῶν ἠθικῶν ἀρετῶν φύσει ἡμῖν ἐγγίνεται.
भावार्थ:
नैतिक गुण जन्मजात नहीं होते; वे अभ्यास से विकसित होते हैं।
6. Epictetus — Enchiridion
यूनानी मूल:
Μέμνησο ὅτι δεῖ σε ἀγωνίζεσθαι.
भावार्थ:
स्मरण रखो कि तुम्हें निरन्तर प्रयत्न करना है।
7. Epictetus
यूनानी मूल:
Οὐ τὰ πράγματα τοὺς ἀνθρώπους ταράττει, ἀλλὰ τὰ περὶ τῶν πραγμάτων δόγματα.
भावार्थ:
मनुष्य को वस्तुएँ नहीं, बल्कि उनके विषय में उसके विचार विचलित करते हैं।
स्टोइक दर्शन में आत्म-अनुशासन और कर्मशीलता का विशेष महत्व है।
8. Marcus Aurelius — Meditations 5.1
यूनानी मूल:
ἐπὶ τὸ ἔργον ἐγείρου.
भावार्थ:
अपने कार्य के लिए उठो।
9. Marcus Aurelius
यूनानी मूल:
ὁ ἄνθρωπος πρὸς τὸ ἐργάζεσθαι γέγονεν.
भावार्थ:
मनुष्य कर्म करने के लिए उत्पन्न हुआ है।
10. Cleanthes
यूनानी मूल:
πόνῳ πάντα γίνεται.
भावार्थ:
सब कुछ परिश्रम से ही प्राप्त होता है।
इन प्रमाणों से स्पष्ट है कि यूनानी दर्शन—विशेषकर हेसियड, सुकरात, प्लेटो, अरस्तू और स्टोइक दार्शनिकों—ने आलस्य की निन्दा तथा उद्योग, अभ्यास, आत्म-अनुशासन और निरन्तर परिश्रम की प्रशंसा की है। सबसे प्रत्यक्ष वचन है:
ἔργον δ' οὐδὲν ὄνειδος, ἀεργίη δέ τ' ὄνειδος.
“परिश्रम लज्जाजनक नहीं है; आलस्य ही लज्जाजनक है।” — हेसियड, Works and Days।
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