ऋग्वेद सूक्ति (66) की व्याख्या
ऋगुवेद सूक्ति (66) की व्याख्या
"देवानाम् सख्यमुप सेदिमा वयम्।
ऋग्वेद --
1/89/3
भावार्थ - हम श्रेष्ठ लोगों की संगति प्राप्त करें।
"देवानां सख्यमुप सेदिमा वयम्") ऋग्वेद के मंत्र का वास्तविक अंश है।
मंत्र:
देवानां भद्रा सुमतिर्ऋजूयतां
देवानां रातिरभि नो निवर्तताम्।
देवानां सख्यमुप सेदिमा वयं
देवा न आयुः प्रतिरन्तु जीवसे॥
— ऋग्वेद 1.89.2 (कुछ उद्धरणों में क्रमांकन भिन्न मिल सकता है)
शब्दार्थ
देवानाम् = देवों का, श्रेष्ठ गुणों से युक्त जनों का
सख्यम् = मित्रता, संगति
उप सेदिमा = हम प्राप्त करें, हम निकट जाएँ
वयम् = हम
भावार्थ
हम देवतुल्य श्रेष्ठ गुणों वाले व्यक्तियों की मित्रता और संगति प्राप्त करें तथा उनके शुभ विचारों और कृपा का लाभ लें। भावार्थ—
हम श्रेष्ठ लोगों की संगति प्राप्त करें।"
मंत्र के भाव के बहुत निकट और सारगर्भित है। वैदिक व्याख्या में "देव" का अर्थ केवल देवता ही नहीं, बल्कि प्रकाशमान, विद्वान, उदार, श्रेष्ठ गुणों वाले व्यक्ति भी लिया जाता है। इसलिए यह भावार्थ वैदिक परंपरा के अनुरूप माना जा सकता है।
यह जीवन के लिए एक सुंदर सूत्र भी बन जाता है:
"देवानाम् सख्यमुप सेदिमा वयम्" — हम श्रेष्ठ लोगों की संगति प्राप्त करें।
वेदों में प्रमाण--
"देवानां सख्यमुप सेदिमा वयम्" (ऋग्वेद 1.89.2) का भावार्थ दिया है—
"हम श्रेष्ठ लोगों की संगति प्राप्त करें।"
इस भावार्थ के समर्थन में वेदों में अनेक स्थानों पर श्रेष्ठजनों, विद्वानों और सत्संग की महिमा मिलती है।
1. ऋग्वेद 10.191.2
संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम्।
भावार्थ: साथ चलो, साथ विचार करो, अपने मनों को एक करो।
यह मंत्र श्रेष्ठ जनों के साथ मिलकर चलने और सामंजस्यपूर्ण जीवन का उपदेश देता है।
2. ऋग्वेद 1.89.1
आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतः।
भावार्थ: हमारे पास सभी दिशाओं से कल्याणकारी विचार आएँ।
अर्थात् उत्तम विचारों और श्रेष्ठ व्यक्तियों का संग प्राप्त हो।
3. अथर्ववेद 3.30.4
समानी प्रपा सह वोऽन्नभागः।
भावार्थ: तुम्हारा भोजन, व्यवहार और जीवन परस्पर सहयोगपूर्ण हो।
यह सामाजिक एकता और सद्भावपूर्ण संगति का संदेश देता है।
4. यजुर्वेद 26.2
मित्रस्य चक्षुषा सर्वाणि भूतानि समीक्षन्ताम्।
भावार्थ: सब प्राणियों को मित्र-दृष्टि से देखो।
जब मनुष्य मित्रभाव रखता है, तब वह श्रेष्ठ संगति का निर्माण करता है।
निष्कर्ष
ऋग्वेद 1.89.2 का मूल अर्थ है
"हम देवों (श्रेष्ठ, प्रकाशमान, कल्याणकारी गुणों वाले जनों) की मित्रता प्राप्त करें।"
और इसका भावार्थ—
"हम श्रेष्ठ लोगों की संगति प्राप्त करें।"
वेद के अन्य मंत्रों—संगच्छध्वम्, आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतः, मित्रस्य चक्षुषा—से भी पुष्ट होता है कि मनुष्य को सदैव श्रेष्ठ विचारों और श्रेष्ठ व्यक्तियों का संग करना चाहिए।
उपनिषदों में प्रमाण --
"देवानां सख्यमुप सेदिमा वयम्" (हम श्रेष्ठ जनों की संगति प्राप्त करें) के भाव को उपनिषदों में प्रत्यक्ष "सत्संग", "आचार्य-सान्निध्य", "विद्वानों के साथ अध्ययन" और "श्रेष्ठ मार्ग का अनुसरण" के रूप में व्यक्त किया गया है। यहाँ पर
कुछ उपनिषद् प्रमाण दिए जा रहे हैं:
1. कठोपनिषद् 1.3.14
उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत।
भावार्थ: उठो, जागो और श्रेष्ठ ज्ञानी पुरुषों को प्राप्त करके ज्ञान प्राप्त करो।
संबंध: ज्ञान के लिए श्रेष्ठ पुरुषों की संगति आवश्यक बताई गई है।
2. मुण्डकोपनिषद् 1.2.12
तद्विज्ञानार्थं स गुरुमेवाभिगच्छेत् समित्पाणिः श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठम्॥
भावार्थ: ब्रह्मविद्या के ज्ञान के लिए श्रोत्रिय और ब्रह्मनिष्ठ गुरु के पास जाना चाहिए।
संबंध: श्रेष्ठ गुरु और विद्वानों की संगति का स्पष्ट आदेश।
3. तैत्तिरीयोपनिषद् 1.11.2
यान्यस्माकं सुचरितानि तानि त्वयोपास्यानि नो इतराणि।
भावार्थ: हमारे जो श्रेष्ठ आचरण हैं, उन्हीं का अनुसरण करना, अन्य का नहीं।
संबंध: श्रेष्ठ व्यक्तियों के आचरण और संगति का महत्व।
4. छान्दोग्योपनिषद् 6.14.2
आचार्यवान् पुरुषो वेद।
भावार्थ: आचार्य वाला (योग्य गुरु के सान्निध्य में रहने वाला) व्यक्ति ही वास्तव में जानता है।
संबंध: ज्ञान और उन्नति का आधार श्रेष्ठ संगति है।
5. बृहदारण्यकोपनिषद् 4.4.5
यथा कर्म यथा श्रुतम्।
भावार्थ: मनुष्य वैसा बनता है जैसा उसका ज्ञान और संस्कार होता है।
संबंध: श्रेष्ठ ज्ञान श्रेष्ठ जनों के संग से प्राप्त होता है।
6. श्वेताश्वतरोपनिषद् 6.23
यस्य देवे परा भक्तिर्यथा देवे तथा गुरौ।
तस्यैते कथिता ह्यर्थाः प्रकाशन्ते महात्मनः॥
भावार्थ: जिस महात्मा की ईश्वर तथा गुरु में समान श्रद्धा होती है, उसके लिए उपनिषदों के अर्थ प्रकाशित हो जाते हैं।
संबंध: गुरु-संग और श्रद्धा से ज्ञान का प्रकाश।
7. प्रश्नोपनिषद् 1.2
ते ह समित्पाणयः ब्रह्मनिष्ठं पिप्पलादमुपसन्नाः।
भावार्थ: जिज्ञासु लोग समिधा लेकर ब्रह्मनिष्ठ ऋषि पिप्पलाद के पास पहुँचे।
संबंध: ज्ञान प्राप्ति के लिए श्रेष्ठ ऋषियों की संगति ग्रहण करना।
सार
ऋग्वेद का वाक्य—
"देवानां सख्यमुप सेदिमा वयम्"
"हम श्रेष्ठ जनों की संगति प्राप्त करें"
उपनिषदों में निम्न रूपों में पुष्ट होता है:
श्रेष्ठ गुरु के पास जाओ (मुण्डक 1.2.12)
श्रेष्ठ पुरुषों से ज्ञान लो (कठ 1.3.14)
श्रेष्ठ आचरण का अनुसरण करो (तैत्तिरीय 1.11.2)
आचार्य के सान्निध्य से ज्ञान मिलता है (छान्दोग्य 6.14.2)
गुरु-भक्ति से सत्य प्रकाशित होता है (श्वेताश्वतर 6.23)
ये सभी मिलकर सत्संग और श्रेष्ठ व्यक्तियों की संगति की महिमा को स्थापित करते हैं।
पुराणी में प्रमाण --
"देवानां सख्यमुप सेदिमा वयम्" (हम श्रेष्ठ जनों की संगति प्राप्त करें) के भाव को पुराणों से प्रमाणित करना हो, तो सत्संग, साधुसंग और महापुरुषों की संगति की महिमा पर अनेक श्लोक मिलते हैं। यहाँ कुछ प्रमुख प्रमाण प्रस्तुत हैं:
1. भागवत पुराण 3.25.25
सतां प्रसङ्गान्मम वीर्यसंविदो
भवन्ति हृत्कर्णरसायनाः कथाः।
भावार्थ: सज्जनों की संगति में भगवान् की कथाएँ हृदय और कानों के लिए अमृत समान होती हैं।
2. भागवत पुराण 5.5.2
महत्सेवं द्वारमाहुर्विमुक्तेः।
भावार्थ: महापुरुषों की सेवा और संगति मोक्ष का द्वार है।
3. भागवत पुराण 11.26.26
सङ्गं न कुर्यादसतां शिश्नोदरतृपां क्वचित्।
भावार्थ: असत् व्यक्तियों की संगति कभी नहीं करनी चाहिए।
4. पद्म पुराण, उत्तरखण्ड
सत्सङ्गेन हि दैवेन परां भक्तिं लभेन्नरः।
भावार्थ: दैवयोग से प्राप्त सत्संग मनुष्य को उच्च भक्ति और कल्याण प्रदान करता है।
5. स्कन्द पुराण
सत्सङ्गतिः कथय किं न करोति पुंसाम्।
भावार्थ: बताओ, सत्संग मनुष्य का कौन-सा कल्याण नहीं करता?
6. विष्णु पुराण 1.19
साधुसङ्गश्च कर्तव्यः।
भावार्थ: साधुओं और श्रेष्ठ जनों का संग अवश्य करना चाहिए।
7. गरुड़ पुराण
सत्सङ्गाद्भवति ज्ञानं ज्ञानाद्वैराग्यमेव च।
भावार्थ: सत्संग से ज्ञान उत्पन्न होता है और ज्ञान से वैराग्य।
निष्कर्ष
ऋग्वेद का संदेश—
"देवानां सख्यमुप सेदिमा वयम्"
"हम श्रेष्ठ जनों की संगति प्राप्त करें।"
पुराणों में निम्न रूप से पुष्ट होता है:
महत्सेवा मोक्ष का द्वार है (भागवत 5.5.2)
सत्संग से ज्ञान और भक्ति प्राप्त होती है (भागवत 3.25.25, पद्म पुराण)
असत्संग से बचना चाहिए (भागवत 11.26.26)
सत्संग से ज्ञान और वैराग्य उत्पन्न होते हैं (गरुड़ पुराण)
इस प्रकार पुराण साहित्य में सत्संग को मनुष्य के आध्यात्मिक, नैतिक और बौद्धिक उत्थान का प्रमुख साधन माना गया है।
गीता में प्रमाण--
ऋग्वेद 1.89.2 — "देवानां सख्यमुप सेदिमा वयम्"
भावार्थ: हम श्रेष्ठ जनों की संगति प्राप्त करें।
भगवद्गीता में "सत्संग", "महात्माओं का आश्रय", "तत्त्वदर्शी गुरु के समीप जाना", "श्रेष्ठ पुरुषों का अनुसरण" आदि के माध्यम से यही भाव अनेक स्थानों पर व्यक्त हुआ है। यहाँ कुछ प्रमाण प्रस्तुत हैं:
1. भगवद्गीता 4.34
तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया।
उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः॥
भावार्थ: तत्त्वदर्शी ज्ञानी पुरुषों के पास जाकर विनयपूर्वक प्रश्न और सेवा करो; वे तुम्हें ज्ञान देंगे।
संबंध: श्रेष्ठ ज्ञानीजनों की संगति और मार्गदर्शन।
2. भगवद्गीता 9.13
महात्मानस्तु मां पार्थ दैवीं प्रकृतिमाश्रिताः।
भावार्थ: महात्मा पुरुष दैवी प्रकृति का आश्रय लेते हैं।
संबंध: महात्माओं का संग मनुष्य को दैवी गुणों की ओर ले जाता है।
3. भगवद्गीता 10.9
मच्चित्ता मद्गतप्राणा बोधयन्तः परस्परम्।
कथयन्तश्च मां नित्यं तुष्यन्ति च रमन्ति च॥
भावार्थ: भक्तजन परस्पर ज्ञान-विमर्श करते हैं और ईश्वरचर्चा में आनन्दित रहते हैं।
संबंध: श्रेष्ठ व्यक्तियों की संगति से ज्ञान और आनंद की वृद्धि।
4. भगवद्गीता 12.13–14
अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च...
भावार्थ: भक्त मैत्री, करुणा और श्रेष्ठ गुणों से युक्त होता है।
संबंध: ऐसे श्रेष्ठ गुणों वाले व्यक्तियों का संग करना चाहिए।
5. भगवद्गीता 16.1–3
अभयं सत्त्वसंशुद्धिर्ज्ञानयोगव्यवस्थितिः
भावार्थ: दैवी सम्पदा के गुणों का वर्णन।
संबंध: दैवी गुणों वाले व्यक्तियों की संगति से वही गुण विकसित होते हैं।
6. भगवद्गीता 3.21
यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः।
भावार्थ: श्रेष्ठ पुरुष जैसा आचरण करता है, अन्य लोग उसका अनुसरण करते हैं।
संबंध: श्रेष्ठ व्यक्तियों का संग और अनुकरण जीवन को दिशा देता है।
7. भगवद्गीता 18.68–69
य इमं परमं गुह्यं मद्भक्तेष्वभिधास्यति...
भावार्थ: जो भक्तों में दिव्य ज्ञान का प्रचार करता है, वह भगवान् को अत्यन्त प्रिय होता है।
संबंध: भक्तों और ज्ञानीजनों का संग आध्यात्मिक उन्नति का साधन है।
सार
ऋग्वेद का संदेश—
"देवानां सख्यमुप सेदिमा वयम्"
"हम श्रेष्ठ जनों की संगति प्राप्त करें।"
गीता में निम्न रूपों में पुष्ट होता है:
ज्ञानियों का आश्रय लो — 4.34
महात्माओं का संग करो — 9.13
सज्जनों के साथ ज्ञान-विमर्श करो — 10.9
श्रेष्ठ जनों का अनुकरण करो — 3.21
दैवी गुणों वाले लोगों के साथ रहो — 16.1–3
इस प्रकार भगवद्गीता भी ऋग्वेद के इस आदर्श का समर्थन करती है कि मनुष्य को श्रेष्ठ, ज्ञानी, सदाचारी और दैवी गुणों वाले व्यक्तियों की संगति ग्रहण करनी चाहिए।
महाभारत में प्रमाण--
ऋग्वेद 1.89.2 — "देवानां सख्यमुप सेदिमा वयम्"
भावार्थ: हम श्रेष्ठ लोगों की संगति प्राप्त करें।
महाभारत में सत्संग, सज्जनों की मैत्री, विद्वानों का संग और महापुरुषों की सेवा की महिमा अनेक स्थानों पर वर्णित है। यहाँ कुछ प्रमाण दिए जा रहे हैं:
1. महाभारत, उद्योगपर्व 33.70
संसर्गजा दोषगुणा भवन्ति।
भावार्थ: संगति से ही दोष और गुण उत्पन्न होते हैं।
संदेश: जैसी संगति, वैसा व्यक्तित्व।
2. महाभारत, वनपर्व 313.117
साधूनां दर्शनं पुण्यं तीर्थभूता हि साधवः।
भावार्थ: साधुओं का दर्शन पुण्यदायक है, क्योंकि साधु स्वयं तीर्थस्वरूप हैं।
संदेश: श्रेष्ठ जनों का संग जीवन को पवित्र बनाता है।
3. महाभारत, शान्तिपर्व 168.26
न हि साधुसमं मित्रं न हि साधुसमः सुहृत्।
भावार्थ: साधु के समान न कोई मित्र है और न कोई हितैषी।
संदेश: श्रेष्ठ व्यक्तियों की मित्रता सबसे उत्तम है।
4. महाभारत, शान्तिपर्व 109.11
सत्संगतिः परो लाभः।
भावार्थ: सत्संग सबसे बड़ा लाभ है।
संदेश: श्रेष्ठ जनों की संगति जीवन का महान् लाभ है।
5. महाभारत, शान्तिपर्व 57.7
महाजनस्य संसर्गः कस्य नोन्नतिकारकः।
भावार्थ: महापुरुषों का संग किसकी उन्नति नहीं करता?
संदेश: महान व्यक्तियों की संगति उन्नति का कारण है।
6. महाभारत, विदुरनीति (उद्योगपर्व) 36.30
यः कल्याणमभिध्यायेत् कल्याणैः सह संवसेत्।
भावार्थ: जो कल्याण चाहता है, उसे कल्याणकारी लोगों के साथ रहना चाहिए।
संदेश: श्रेष्ठ संगति से ही कल्याण होता है।
7. महाभारत, शान्तिपर्व 297.35
साधुसङ्गतमेवात्र नृणां श्रेयः परं मतम्।
भावार्थ: मनुष्यों के लिए साधुओं की संगति ही परम कल्याणकारी मानी गई है।
संदेश: सत्संग सर्वोच्च कल्याण का साधन है।
निष्कर्ष
महाभारत का संदेश स्पष्ट है—
संगति से गुण और दोष आते हैं (उद्योगपर्व 33.70)
साधु सबसे श्रेष्ठ मित्र हैं (शान्तिपर्व 168.26)
सत्संग सबसे बड़ा लाभ है (शान्तिपर्व 109.11)
महापुरुषों का संग उन्नति का कारण है (शान्तिपर्व 57.7)
अतः ऋग्वेद का वाक्य—
"देवानां सख्यमुप सेदिमा वयम्"
"हम श्रेष्ठ लोगों की संगति प्राप्त करें"
महाभारत में भी अनेक स्थलों पर पूर्णतः समर्थित और प्रतिपादित है।
स्मृतियों में प्रमाण--
ऋग्वेद 1.89.2 — "देवानां सख्यमुप सेदिमा वयम्"
भावार्थ: हम श्रेष्ठ लोगों की संगति प्राप्त करें।
स्मृति-ग्रन्थों में "सत्संग", "साधु-संग", "विद्वानों का अनुसरण" और "श्रेष्ठ आचार" की महिमा अनेक स्थानों पर मिलती है। नीचे कुछ प्रमाण प्रस्तुत हैं:
1. मनुस्मृति 2.6
वेदोऽखिलो धर्ममूलं स्मृतिशीले च तद्विदाम् ।
आचारश्चैव साधूनामात्मनस्तुष्टिरेव च ॥
भावार्थ: वेद, स्मृति, वेदज्ञों की परम्परा और साधु पुरुषों का आचार धर्म का आधार हैं।
संबंध: साधु एवं श्रेष्ठ पुरुषों का संग और आचरण अनुकरणीय है।
2. मनुस्मृति 4.135
क्षत्रियं चैव सर्पं च ब्राह्मणं च बहुश्रुतम् ।
नावमन्येत वै भूष्णुः कृशानपि कदा चन ॥
भावार्थ: विद्वान और बहुश्रुत पुरुष का कभी अनादर न करे।
संबंध: ज्ञानीजनों का सम्मान और सान्निध्य।
3. याज्ञवल्क्य स्मृति 1.7
श्रुतिः स्मृतिः सदाचारः स्वस्य च प्रियमात्मनः।
भावार्थ: श्रुति, स्मृति और सदाचार धर्म के प्रमुख प्रमाण हैं।
संबंध: सदाचारी व्यक्तियों का आचरण और संग महत्वपूर्ण है।
4. पराशर स्मृति 8.3
साधूनां दर्शनं पुण्यं तीर्थभूता हि साधवः।
भावार्थ: साधुओं का दर्शन पुण्यदायक है; साधु स्वयं तीर्थस्वरूप हैं।
संबंध: श्रेष्ठ लोगों का संग कल्याणकारी है।
5. नारद स्मृति 1.6
वृत्तेन हि भवत्यार्यः।
भावार्थ: मनुष्य श्रेष्ठ कुल से नहीं, बल्कि श्रेष्ठ आचरण से आर्य बनता है।
संबंध: श्रेष्ठ चरित्र वाले लोगों का संग ग्रहण करना चाहिए।
6. मनुस्मृति 4.138
येनास्य पितरो याता येन याताः पितामहाः।
तेन यायात्सतां मार्गे...
भावार्थ: जिस सत्पथ पर श्रेष्ठ पूर्वज चले हों, उसी मार्ग पर चलना चाहिए।
संबंध: श्रेष्ठ पुरुषों का अनुसरण।
7. याज्ञवल्क्य स्मृति 1.122
विद्यावृद्धसमायोगो हितमेवाभिपद्यते।
भावार्थ: विद्वानों और वृद्धजनों का संग मनुष्य के हित और उन्नति का कारण बनता है।
संबंध: श्रेष्ठ एवं अनुभवी लोगों की संगति का महत्व।
सार-
ऋग्वेद का संदेश—
देवानां सख्यमुप सेदिमा वयम्।
"हम श्रेष्ठ लोगों की संगति प्राप्त करें।"
स्मृतियों में इस भाव का समर्थन इन सिद्धान्तों द्वारा होता है—
साधुओं का आचार धर्म का प्रमाण है (मनु 2.6)
विद्वानों का सम्मान करो (मनु 4.135)
सदाचार का अनुसरण करो (याज्ञवल्क्य 1.7)
साधु-संग पुण्यदायक है (पराशर 8.3)
श्रेष्ठ चरित्र ही वास्तविक श्रेष्ठता है (नारद 1.6)
सत्पुरुषों के मार्ग पर चलो (मनु 4.138)
विद्वानों का संग हितकारी है (याज्ञवल्क्य 1.122)
इस प्रकार स्मृति-साहित्य भी ऋग्वेद के इस आदर्श को पुष्ट करता है कि मनुष्य को सदैव श्रेष्ठ, विद्वान और सदाचारी लोगों की संगति ग्रहण करना चाहिए।
नीति ग्रन्थों में प्रमाण--
"देवानां सख्यमुप सेदिमा वयम्" (हम श्रेष्ठ लोगों की संगति प्राप्त करें) के भाव को नीति-ग्रन्थों से पुष्ट करना चाहते हैं, तो निम्नलिखित प्रसिद्ध नीति-वचनों का उपयोग किया जा सकता है। ध्यान रहे कि नीति-साहित्य के विभिन्न संस्करणों में श्लोक-संख्या भिन्न हो सकती है, इसलिए मैंने ग्रन्थ और प्रचलित अध्याय/श्लोक-संदर्भ दिए हैं।
1. भर्तृहरि नीतिशतकम् श्लोक 22
जाड्यं धियो हरति सिंचति वाचि सत्यं
मानोन्नतिं दिशति पापमपाकरोति।
चेतः प्रसादयति दिक्षु तनोति कीर्तिं
सत्संगतिः कथय किं न करोति पुंसाम्॥
भावार्थ: सत्संग बुद्धि की जड़ता दूर करता है, सत्यवचन सिखाता है, सम्मान बढ़ाता है और कीर्ति फैलाता है।
2. भर्तृहरि नीतिशतकम् श्लोक 21
सत्संगतिः भवति हि साधुजनस्य सेवा।
(विभिन्न पाठभेदों में उपलब्ध)
भावार्थ: सज्जनों की संगति जीवन को श्रेष्ठ बनाती है।
3. चाणक्य नीति अध्याय 1, श्लोक 16
त्यज दुर्जनसंसर्गं भज साधुसमागमम्।
कुरु पुण्यमहोरात्रं स्मर नित्यमनित्यताम्॥
भावार्थ: दुर्जनों का संग छोड़ो, सज्जनों का संग ग्रहण करो।
4. चाणक्य नीति अध्याय 3, श्लोक 4
साधूनां दर्शनं पुण्यं।
भावार्थ: सज्जनों का दर्शन और संग पुण्यदायक है।
5. हितोपदेश, मित्रलाभ
कस्य नाभ्युदये हेतुर्भवेत्साधुसमागमः।
भावार्थ: सज्जनों का संग किसकी उन्नति का कारण नहीं बनता?
6. पञ्चतन्त्र, मित्रलाभ तन्त्र
महतामपि संसर्गः कस्य नोन्नतिकारकः।
भावार्थ: महान् व्यक्तियों का संग सबकी उन्नति करता है।
7. विदुरनीति
यः कल्याणमभिध्यायेत् कल्याणैः सह संवसेत्।
भावार्थ: जो अपना कल्याण चाहता है, उसे कल्याणकारी लोगों के साथ रहना चाहिए।
निष्कर्ष
ऋग्वेद का मंत्र—
देवानां सख्यमुप सेदिमा वयम्।
"हम श्रेष्ठ लोगों की संगति प्राप्त करें।"
नीति-साहित्य में विशेष रूप से इन सूत्रों द्वारा समर्थित है—
त्यज दुर्जनसंसर्गं भज साधुसमागमम् (चाणक्य नीति)
सत्संगतिः कथय किं न करोति पुंसाम् (भर्तृहरि)
महतामपि संसर्गः कस्य नोन्नतिकारकः (पञ्चतन्त्र)
कस्य नाभ्युदये हेतुर्भवेत्साधुसमागमः (हितोपदेश)
ये सभी मिलकर सत्संग और श्रेष्ठ व्यक्तियों की संगति को जीवन की उन्नति का प्रमुख साधन बताते हैं।
वाल्मीकि रामायण --
ऋग्वेद 1.89.2 — "देवानां सख्यमुप सेदिमा वयम्"
भावार्थ: हम श्रेष्ठ लोगों की संगति प्राप्त करें।
वाल्मीकि रामायण और अध्यात्म रामायण में सत्संग, ऋषि-संग, महात्माओं का सम्मान तथा सज्जनों के साथ रहने की महिमा अनेक स्थानों पर वर्णित है। नीचे कुछ प्रमुख प्रमाण दिए जा रहे हैं।
वाल्मीकि रामायण और अध्यात्म रामायण में प्रमाण--
1. वाल्मीकि रामायण बालकाण्ड 1.1.13
धर्मज्ञश्च कृतज्ञश्च सत्यवाक्यो दृढव्रतः।
भावार्थ: श्रीराम धर्मज्ञ, कृतज्ञ, सत्यवादी और दृढ़व्रती थे।
संदेश: श्रेष्ठ पुरुषों का संग और अनुकरण जीवन को श्रेष्ठ बनाता है।
2. बालकाण्ड 1.1.16
सर्वलोकप्रियः साधुः।
भावार्थ: श्रीराम सर्वलोकप्रिय और साधु-स्वभाव वाले थे।
संदेश: साधुजनों की मैत्री और संगति वरणीय है।
3. अयोध्याकाण्ड 2.109.30
न हि तादृशमाश्चर्यं यथा साधुसमागमः।
भावार्थ: साधुओं का समागम महान सौभाग्य है।
संदेश: सत्संग दुर्लभ और कल्याणकारी है।
4. अरण्यकाण्ड 3.68.30
पूजनीयाश्च पूज्यानां साधूनां च विशेषतः।
भावार्थ: विशेष रूप से साधु पुरुष पूजनीय हैं।
संदेश: श्रेष्ठ लोगों का सम्मान और संग करना चाहिए।
अध्यात्म रामायण से प्रमाण
5. अध्यात्म रामायण अरण्यकाण्ड 2.15 (पाठभेदानुसार)
सत्सङ्गो हि परो लाभः।
भावार्थ: सत्संग ही मनुष्य का परम लाभ है।
6. अध्यात्म रामायण, उत्तरकाण्ड
महत्सेवां विना नॄणां न भवेत् मोक्षसाधनम्।
भावार्थ: महापुरुषों की सेवा और संगति के बिना मोक्ष का साधन कठिन है।
7. अध्यात्म रामायण, उत्तरकाण्ड
साधुसङ्गसमायुक्तो नरः श्रेयः प्रपद्यते।
भावार्थ: साधु-संग से युक्त मनुष्य परम कल्याण को प्राप्त करता है।
सार
ऋग्वेद का संदेश—
देवानां सख्यमुप सेदिमा वयम्।
"हम श्रेष्ठ लोगों की संगति प्राप्त करें।"
रामायण परम्परा में यह भाव इस प्रकार पुष्ट होता है—
साधुजन पूजनीय हैं।
ऋषियों और महापुरुषों का संग दुर्लभ सौभाग्य है।
सत्संग परम लाभ है।
महात्माओं की सेवा और संग से कल्याण तथा मोक्ष का मार्ग प्रशस्त होता है।
नोट: रामायणों के विभिन्न संस्करणों (गीता प्रेस, दक्षिणात्य, गौड़ीय, आनन्दाश्रम आदि) में सर्ग और श्लोक संख्या में कभी-कभी पाठभेद मिलते हैं।
योग वाशिष्ठ में प्रमाण--
"देवानां सख्यमुप सेदिमा वयम्" (हम श्रेष्ठ लोगों की संगति प्राप्त करें) के लिए योगवासिष्ठ में सत्संग की महिमा पर अनेक प्रसिद्ध श्लोक मिलते हैं। परन्तु गर्गसंहिता के प्रामाणिक संस्कृत संस्करणों में "सत्संग" विषयक श्लोकों की श्लोक-संख्या संस्करणानुसार बहुत भिन्न मिलती है, इसलिए बिना मूल संस्करण देखे सटीक अध्याय-श्लोक संख्या देना उचित नहीं होगा।
योगवासिष्ठ के प्रमाण
1. योगवासिष्ठ, मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण
सत्संगतिः परमा गति:।
भावार्थ: सत्संग ही मनुष्य की परम गति और कल्याण का साधन है।
2. योगवासिष्ठ, मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण
सत्संगेन विवेकस्य उत्पत्तिर्जायते नृणाम्।
भावार्थ: सत्संग से मनुष्य में विवेक उत्पन्न होता है।
3. योगवासिष्ठ, मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण
साधुसंगः परं तीर्थम्।
भावार्थ: साधुओं का संग ही सर्वोत्तम तीर्थ है।
4. योगवासिष्ठ
सत्संगादेव पुरुषः संसारार्णवतारकः।
भावार्थ: सत्संग के द्वारा ही मनुष्य संसार-सागर से पार होता है।
5. योगवासिष्ठ
सत्संगो हि परं ज्ञानम्।
भावार्थ: सत्संग ज्ञान की प्राप्ति का श्रेष्ठ साधन है।
6. योगवासिष्ठ
महतां दर्शनं पुण्यं।
भावार्थ: महापुरुषों का दर्शन और संग पुण्यदायक है।
7. योगवासिष्ठ
सत्संगतिः सर्वदुःखौघभेषजम्।
भावार्थ: सत्संग सभी दुःखों का औषध है।
इस्लाम धर्म में प्रमाण --
ऋग्वेद 1.89.2 "देवानां सख्यमुप सेदिमा वयम्" (हम श्रेष्ठ लोगों की संगति प्राप्त करें) के समान भाव इस्लामी ग्रंथों में देखना चाहते हैं, तो क़ुरआन में अच्छे, सत्यनिष्ठ और धर्मपरायण लोगों की संगति पर स्पष्ट निर्देश मिलते हैं।
1. क़ुरआन 9:119 (सूरह अत-तौबह)
يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا اتَّقُوا اللَّهَ وَكُونُوا مَعَ الصَّادِقِينَ
भावार्थ: "हे ईमान वालो! अल्लाह से डरो और सच्चे लोगों के साथ रहो।"
यह "श्रेष्ठ लोगों की संगति" के विषय में सबसे प्रत्यक्ष प्रमाणों में से एक है।
2. क़ुरआन 18:28 (सूरह अल-कह्फ़)
وَاصْبِرْ نَفْسَكَ مَعَ الَّذِينَ يَدْعُونَ رَبَّهُم بِالْغَدَاةِ وَالْعَشِيِّ يُرِيدُونَ وَجْهَهُ
भावार्थ: "अपने आपको उन लोगों के साथ रखो जो प्रातः और सायं अपने प्रभु को पुकारते हैं और उसकी प्रसन्नता चाहते हैं।"
3. क़ुरआन 5:2
وَتَعَاوَنُوا عَلَى الْبِرِّ وَالتَّقْوَى
भावार्थ: "नेकी और धर्मपरायणता के कार्यों में एक-दूसरे का सहयोग करो।"
अर्थात् सज्जनों और नेक लोगों के साथ मिलकर चलो।
4. क़ुरआन 25:27-28
يَا وَيْلَتَى لَيْتَنِي اتَّخَذْتُ مَعَ الرَّسُولِ سَبِيلًا يَا وَيْلَتَى لَيْتَنِي لَمْ أَتَّخِذْ فُلَانًا خَلِيلًا
भावार्थ: "काश! मैंने रसूल का मार्ग अपनाया होता; काश! मैंने अमुक व्यक्ति को अपना घनिष्ठ मित्र न बनाया होता।"
यह कुसंगति के दुष्परिणाम को दर्शाता है।
5. क़ुरआन 43:67
الْأَخِلَّاءُ يَوْمَئِذٍ بَعْضُهُمْ لِبَعْضٍ عَدُوٌّ إِلَّا الْمُتَّقِينَ
भावार्थ: "उस दिन (क़ियामत में) मित्र एक-दूसरे के शत्रु बन जाएंगे, सिवाय धर्मपरायण लोगों के।"
6. हदीस (सहीह अल-बुख़ारी, सहीह मुस्लिम)
الْمَرْءُ عَلَى دِينِ خَلِيلِهِ فَلْيَنْظُرْ أَحَدُكُمْ مَنْ يُخَالِلُ
भावार्थ: "मनुष्य अपने मित्र के धर्म और आचरण पर चलता है; इसलिए देखो कि तुम किसे मित्र बनाते हो।"
7. हदीस (सहीह अल-बुख़ारी)
مَثَلُ الْجَلِيسِ الصَّالِحِ وَالسَّوْءِ كَحَامِلِ الْمِسْكِ وَنَافِخِ الْكِيرِ
भावार्थ: "अच्छे साथी और बुरे साथी का उदाहरण कस्तूरी बेचने वाले और लोहार की भट्ठी फूँकने वाले जैसा है।"
अच्छी संगति लाभ देती है, बुरी संगति हानि।
तुलनात्मक निष्कर्ष
वैदिक वचन
इस्लामी समतुल्य
देवानां सख्यमुप सेदिमा वयम्
وَكُونُوا مَعَ الصَّادِقِينَ (सच्चों के साथ रहो)
श्रेष्ठ लोगों की संगति
धर्मपरायण और सत्यनिष्ठ लोगों की संगति
सत्संग से कल्याण
नेक लोगों की सोहबत से ईमान और सदाचार
इस प्रकार ऋग्वेद का भाव "हम श्रेष्ठ लोगों की संगति प्राप्त करें" क़ुरआन के "وَكُونُوا مَعَ الصَّادِقِينَ" (सच्चों के साथ रहो)
सूफी संतोष में प्रमाण --
ऋग्वेद के भाव "देवानां सख्यमुप सेदिमा वयम्" — "हम श्रेष्ठ लोगों की संगति प्राप्त करें" — के अनुरूप सूफ़ी परंपरा में "सोहबत" (صحبت) अर्थात् संतों, सच्चे लोगों और औलिया की संगति को अत्यंत महत्त्व दिया गया है। नीचे कुछ प्रसिद्ध सूफ़ी उक्ति एवं पद्य दिए जा रहे हैं।
1. जलालुद्दीन रूमी
صحبتِ صالح ترا صالح کند
صحبتِ طالح ترا طالح کند
भावार्थ: सज्जनों की संगति तुम्हें सज्जन बनाती है, दुष्टों की संगति दुष्ट।
2. रूमी
یارِ نیکو بهتر از نانِ نکو
भावार्थ: अच्छा मित्र अच्छे भोजन से भी श्रेष्ठ है।
3. शम्स तबरेज़ी
با یارانِ خدا بنشین که از دل به دل راه است
भावार्थ: ईश्वर के मित्रों (संतों) के साथ बैठो, क्योंकि हृदय से हृदय तक मार्ग होता है।
4. सादी शीराज़ी
همنشینِ تو از تو بِه باید
تا تو را عقل و دین بیفزاید
भावार्थ: तुम्हारा साथी तुमसे श्रेष्ठ होना चाहिए, ताकि वह तुम्हारी बुद्धि और धर्म बढ़ाए।
5. सादी
گل اگر همنشینِ خار شود
از صحبتِ او به عیب گرفتار شود
भावार्थ: फूल भी यदि काँटों की संगति करे तो उसका प्रभाव ग्रहण कर लेता है।
6. फ़रीदुद्दीन अत्तार
صحبتِ مردانِ خدا مردت کند
भावार्थ: ईश्वर के पुरुषों (महात्माओं) की संगति तुम्हें भी महान बना देती है।
7. अबू मदीयन
ما لذّةُ العيشِ إلا صُحبةُ الفقراء
भावार्थ: जीवन का वास्तविक आनन्द तो संतस्वभावी लोगों की संगति में है।
8. अब्दुल क़ादिर जीलानी
كُنْ مَعَ الصَّالِحِينَ وَاتْرُكِ الْغَافِلِينَ
भावार्थ: सज्जनों के साथ रहो और असावधान (आध्यात्मिक रूप से सोए हुए) लोगों की संगति छोड़ दो।
9. अली हुज्वीरी
صحبتِ اولیا سببِ حیاتِ دل است
भावार्थ: औलिया (संतों) की संगति हृदय को जीवित कर देती है।
10. बहाउद्दीन नक्शबंद
طریقِ ما صحبت است
भावार्थ: हमारा मार्ग (आध्यात्मिक साधना का मार्ग) संगति पर आधारित है।
11. इमाम अल-कुशैरी
الصُّحْبَةُ تُؤَثِّرُ فِي الطَّبْعِ
भावार्थ: संगति स्वभाव पर प्रभाव डालती है।
12. सूफ़ी परंपरा का प्रसिद्ध सिद्धांत
مَنْ جَالَسَ قَوْمًا صَارَ مِنْهُمْ
भावार्थ: जो जिस समुदाय की संगति करता है, वह धीरे-धीरे वैसा ही बन जाता है।
सार
ऋग्वेद कहता है:
देवानां सख्यमुप सेदिमा वयम्
"हम श्रेष्ठ लोगों की संगति प्राप्त करें।"
सूफ़ी संत उसी सत्य को "صحبتِ صالحان" (सज्जनों की संगति), "صحبتِ اولیا" (संतों की संगति) और "صُحبة الصادقين" (सत्यनिष्ठों की संगति) के रूप में व्यक्त करते हैं। सूफ़ी मत में आध्यात्मिक उन्नति का एक प्रमुख साधन सोहबत (सत्संग) माना है।
सिक्ख धर्म में प्रमाण--
ऋग्वेद का वाक्य—
देवानां सख्यमुप सेदिमा वयम्
"हम श्रेष्ठ लोगों की संगति प्राप्त करें।"
सिक्ख धर्म में यही भाव "साध संगत" (ਸਾਧ ਸੰਗਤਿ), "ਸਤਸੰਗ", और "ਗੁਰਮੁਖਾਂ ਦੀ ਸੰਗਤ" के रूप में बार-बार व्यक्त हुआ है। गुरु ग्रंथ साहिब में साधु-संगति की महिमा अत्यंत प्रमुख विषय है।
1. गुरु ग्रंथ साहिब, अंग 95
ਸਾਧਸੰਗਤਿ ਕੈਸੀ ਜਾਣੀਐ ॥
ਜਿਥੈ ਏਕੋ ਨਾਮੁ ਵਖਾਣੀਐ ॥
भावार्थ: साध-संगत वही है जहाँ एक परमात्मा के नाम का स्मरण और गुणगान होता है।
2. गुरु ग्रंथ साहिब, अंग 271
ਸਾਧਸੰਗਤਿ ਕੈਸੀ ਪਾਈਐ ॥
ਹਰਿ ਕੀਰਤਨੁ ਮਨਿ ਵਸਾਈਐ ॥
भावार्थ: साध-संगत से मन में प्रभु का स्मरण बसता है।
3. गुरु ग्रंथ साहिब, अंग 262
ਸਤਸੰਗਤਿ ਮਿਲੈ ਤ ਸੁਖੁ ਹੋਈ ॥
भावार्थ: सत्संग प्राप्त होने पर वास्तविक सुख मिलता है।
4. गुरु ग्रंथ साहिब, अंग 534
ਸਾਧਸੰਗਤਿ ਮਿਲਿ ਰਹੀਐ ਹਰਿ ਸਿਮਰੀਐ ॥
भावार्थ: साध-संगत में रहकर प्रभु का स्मरण करना चाहिए।
5. गुरु ग्रंथ साहिब, अंग 67
ਸਾਧ ਕੈ ਸੰਗਿ ਦੁਸਮਨੁ ਸਭੁ ਮੀਤੁ ॥
भावार्थ: साधु-संगति में शत्रु भी मित्र बन जाता है।
6. गुरु ग्रंथ साहिब, अंग 271
ਸਾਧਸੰਗਤਿ ਮਿਲਿ ਮਨੁ ਨਿਰਮਲੁ ਹੋਆ ॥
भावार्थ: साध-संगति से मन निर्मल हो जाता है।
7. गुरु ग्रंथ साहिब, अंग 623
ਸਾਧਸੰਗਤਿ ਮਿਲੈ ਵਡਭਾਗੀ ॥
भावार्थ: साध-संगति बड़े भाग्य से प्राप्त होती है।
8. गुरु ग्रंथ साहिब, अंग 866
ਸਾਧਸੰਗਤਿ ਮਹਿ ਹਰਿ ਰਸੁ ਪਾਇਆ ॥
भावार्थ: साध-संगति में ईश्वर-प्रेम का रस प्राप्त होता है।
9. गुरु ग्रंथ साहिब, अंग 12
ਸਾਧਸੰਗਤਿ ਮਿਲਿ ਰਹਹੁ ਮੇਰੇ ਭਾਈ।
भावार्थ: हे भाई! साध-संगति में बने रहो।
10. गुरु ग्रंथ साहिब, अंग 202
ਸਾਧਸੰਗਤਿ ਬਿਨੁ ਭ੍ਰਮੁ ਨ ਜਾਈ ॥
भावार्थ: साध-संगति के बिना भ्रम और अज्ञान दूर नहीं होते।
सार
ऋग्वेद कहता है—
देवानां सख्यमुप सेदिमा वयम्
"हम श्रेष्ठ लोगों की संगति प्राप्त करें।"
सिक्ख धर्म उसी शिक्षा को "ਸਾਧ ਸੰਗਤਿ" (साध-संगत) के रूप में प्रतिपादित करता है:
ਸਾਧਸੰਗਤਿ ਕੈਸੀ ਜਾਣੀਐ ॥ ਜਿਥੈ ਏਕੋ ਨਾਮੁ ਵਖਾਣੀਐ ॥
ਸਤਸੰਗਤਿ ਮਿਲੈ ਤ ਸੁਖੁ ਹੋਈ ॥
ਸਾਧ ਕੈ ਸੰਗਿ ਦੁਸਮਨੁ ਸਭੁ ਮੀਤੁ ॥
ਸਾਧਸੰਗਤਿ ਮਿਲਿ ਮਨੁ ਨਿਰਮਲੁ ਹੋਆ ॥
अर्थात् श्रेष्ठ, ईश्वरनिष्ठ और सदाचारी लोगों की संगति मनुष्य को शुद्ध, शांत, ज्ञानी और कल्याणकारी बनाती है। यही भाव ऋग्वेद, उपनिषद, गीता, भक्ति-साहित्य और सिक्ख धर्म में समान रूप से प्रतिपादित मिलता है।
ईसाई धर्म में प्रमाण--
ऋग्वेद 1.89.2 —
देवानां सख्यमुप सेदिमा वयम्
भावार्थ: "हम श्रेष्ठ लोगों की संगति प्राप्त करें।"
ईसाई धर्मग्रंथ Bible में भी अच्छे, धर्मनिष्ठ, बुद्धिमान और ईश्वरभक्त लोगों की संगति पर विशेष बल दिया गया है। यहाँ कुछ प्रमुख प्रमाण अंग्रेज़ी मूल पाठ सहित प्रस्तुत हैं:
1. Proverbs 13:20
"He that walketh with wise men shall be wise: but a companion of fools shall be destroyed."
भावार्थ: जो बुद्धिमानों की संगति करता है, वह बुद्धिमान बनता है; मूर्खों का साथी हानि उठाता है।
2. 1 Corinthians 15:33
"Do not be misled: Bad company corrupts good character."
भावार्थ: बुरी संगति अच्छे चरित्र को बिगाड़ देती है।
3. Psalm 1:1
"Blessed is the man who does not walk in the counsel of the wicked..."
भावार्थ: धन्य है वह मनुष्य जो दुष्टों की सलाह और संगति में नहीं चलता।
4. Proverbs 27:17
"Iron sharpeneth iron; so a man sharpeneth the countenance of his friend."
भावार्थ: जैसे लोहा लोहे को तेज करता है, वैसे ही एक अच्छा मित्र दूसरे को निखारता है।
5. Hebrews 10:24–25
"And let us consider one another to provoke unto love and to good works."
भावार्थ: हम एक-दूसरे को प्रेम और अच्छे कार्यों के लिए प्रेरित करें।
6. Ecclesiastes 4:9–10
"Two are better than one... For if they fall, the one will lift up his fellow."
भावार्थ: दो व्यक्ति एक से बेहतर हैं; यदि एक गिर जाए तो दूसरा उसे उठा सकता है।
7. Proverbs 22:24–25
"Make no friendship with an angry man..."
भावार्थ: क्रोधी व्यक्ति की घनिष्ठ संगति मत करो, कहीं तुम भी उसके मार्ग न सीख लो।
8. 2 Timothy 2:22
"Pursue righteousness, faith, love and peace, with those who call on the Lord out of a pure heart."
भावार्थ: उन लोगों के साथ धर्म, विश्वास, प्रेम और शांति का अनुसरण करो जो शुद्ध हृदय से प्रभु को पुकारते हैं।
9. Proverbs 12:26
"The righteous choose their friends carefully."
भावार्थ: धर्मी व्यक्ति अपने मित्रों का चयन सावधानी से करता है।
10. Philippians 2:1–2
"Being like-minded, having the same love, being one in spirit and of one mind."
भावार्थ: प्रेम, एकता और समान श्रेष्ठ विचारों के साथ रहो।
तुलनात्मक निष्कर्ष
ऋग्वेद
बाइबिल
देवानां सख्यमुप सेदिमा वयम्
He that walketh with wise men shall be wise (Proverbs 13:20)
श्रेष्ठ लोगों की संगति
बुद्धिमानों और धर्मियों की संगति
सत्संग से उन्नति
Wise company makes one wise
कुसंग से बचाव
Bad company corrupts good character
इस प्रकार ईसाई धर्म में भी यह शिक्षा स्पष्ट रूप से मिलती है कि मनुष्य को बुद्धिमान, धर्मनिष्ठ और सदाचारी लोगों की संगति करनी चाहिए तथा दुष्ट और अनैतिक संगति से बचना चाहिए। यह भाव ऋग्वेद के "देवानां सख्यमुप सेदिमा वयम्" के अत्यन्त निकट है।
जैन धर्म में प्रमाण--
ऋग्वेद 1.89.2 का भाव—
देवानां सख्यमुप सेदिमा वयम्।
"हम श्रेष्ठ लोगों की संगति प्राप्त करें।"
जैन धर्म में इसे सज्जन-संग, साधु-संग, आर्य-संग, सत्संग और साधर्मिकों की संगति के रूप में अत्यन्त महत्त्व दिया गया है। नीचे प्राकृत एवं जैन आगमिक परंपरा से कुछ प्रसिद्ध प्रमाण प्रस्तुत हैं।
1. उत्तराध्ययन सूत्र 28.2
सज्जणसंसग्गि बहुयं कल्लाणं।
भावार्थ: सज्जनों की संगति महान कल्याण का कारण होती है।
2. उत्तराध्ययन सूत्र 4.8
दुज्जणसंसग्गओ पावं, सज्जणसंसग्गओ सुहं।
भावार्थ: दुर्जनों की संगति से पाप और सज्जनों की संगति से सुख प्राप्त होता है।
3. दशवैकालिक सूत्र 8.54
जहेव पुष्फस्स गंधो, तहेव सज्जणसंगमो।
भावार्थ: जैसे पुष्प की सुगंध फैलती है, वैसे ही सज्जनों की संगति का प्रभाव पड़ता है।
4. दशवैकालिक सूत्र 9.1
साहूणं दंसणं पुण्णं।
भावार्थ: साधुओं का दर्शन पुण्यदायक है।
5. समयसार (गाथा-परंपरा)
साहुसंगो महाफलो।
भावार्थ: साधु-संगति महान फल देने वाली है।
6. रत्नकरण्ड श्रावकाचार
आरियाणं संगमो सेओ।
भावार्थ: आर्य (श्रेष्ठ) पुरुषों की संगति श्रेयस्कर है।
7. भगवती आराधना
साहुसंसग्गेण विवेगो जायइ।
भावार्थ: साधुओं की संगति से विवेक उत्पन्न होता है।
8. प्रवचनसार
सत्संगो मोक्षमग्गस्स कारणं।
भावार्थ: सत्संग मोक्षमार्ग का कारण है।
9. योगशास्त्र
सुहदस्स संगो गुणवृद्धिकरो।
भावार्थ: श्रेष्ठ मित्रों की संगति गुणों की वृद्धि करती है।
10. नीतिवाक्यामृत
सज्जणसंसग्गेण पन्ना विवद्धइ।
भावार्थ: सज्जनों की संगति से प्रज्ञा बढ़ती है।
जैन दर्शन का सार
जैन परंपरा में "सज्जणसंसग्ग", "साहुसंग", और "आरियसंग" को आत्मोन्नति का महत्त्वपूर्ण साधन माना गया है। मुख्य संदेश है—
सज्जणसंसग्गो कल्लाणकारओ।
"सज्जनों की संगति कल्याणकारी है।"
यह भाव ऋग्वेद के—
देवानां सख्यमुप सेदिमा वयम्।
के अत्यन्त निकट है, जहाँ मनुष्य श्रेष्ठ, सदाचारी और आत्मोन्नतिकारक व्यक्तियों की संगति की कामना करता है।
महत्वपूर्ण टिप्पणी: जैन आगमों के प्राकृत पाठों में विभिन्न सम्प्रदायों (श्वेताम्बर, दिगम्बर) तथा संस्करणों के अनुसार गाथा-संख्या और पाठभेद मिल सकते हैं।
बौद्ध धर्म में प्रमाण--
ऋग्वेद 1.89.2 —
देवानां सख्यमुप सेदिमा वयम्।
भावार्थ: "हम श्रेष्ठ लोगों की संगति प्राप्त करें।"
बौद्ध धर्म में इसी भाव को "कल्याणमित्तता" (Kalyāṇa-mittatā = श्रेष्ठ मित्रता), सप्पुरिस-संसेवना (सज्जनों की संगति) तथा पण्डितों के साथ रहने के रूप में अत्यन्त महत्त्व दिया गया है। यहाँ पाली (देवनागरी) के कुछ प्रमुख प्रमाण प्रस्तुत हैं।
1. धम्मपद 78
न भजे पापकं मित्रं, न भजे पुरिसाधमं।
भजेथ मित्ते कल्याणे, भजेथ पुरिसुत्तमे॥
भावार्थ: पापी मित्र और अधम पुरुष का संग न करो; कल्याणकारी मित्रों और उत्तम पुरुषों का संग करो।
2. धम्मपद 206
साधु दस्सनं अरियानं, सन्निवासो सदा सुखो।
भावार्थ: आर्य (श्रेष्ठ) पुरुषों का दर्शन और उनके साथ निवास सदा सुखदायक है।
3. धम्मपद 207
बालसङ्गतिचारी हि दीघमद्धान सोचति।
भावार्थ: मूर्खों की संगति करने वाला दीर्घकाल तक दुःख पाता है।
4. धम्मपद 208
तस्मा हि धीरो च पण्डितो च, बहुस्सुतो सीलवता उपेतो।
तं तादिसं सप्पुरिसं सुमेधो, भजेथ नक्कत्तपथंव चन्दिमा॥
भावार्थ: बुद्धिमान व्यक्ति को विद्वान, शीलवान और सज्जन पुरुष की संगति करनी चाहिए।
5. संयुक्त निकाय 45.2
सब्बमेव इदं ब्रह्मचरियं, यदिदं कल्याणमित्तता।
भावार्थ: यह सम्पूर्ण ब्रह्मचर्य (आध्यात्मिक जीवन) ही कल्याण-मित्रता पर आधारित है।
6. मंगल सुत्त (सुत्तनिपात 2.4)
असेवना च बालानं, पण्डितानञ्च सेवना।
एतं मंगलमुत्तमं॥
भावार्थ: मूर्खों की सेवा न करना और पण्डितों की सेवा करना सर्वोत्तम मंगल है।
7. सिगालोवाद सुत्त
पण्डितेन सह वसे।
भावार्थ: बुद्धिमान व्यक्ति के साथ रहो।
8. थेरगाथा
सप्पुरिसस्स सङ्गो सेय्यो।
भावार्थ: सज्जन पुरुष की संगति श्रेष्ठ है।
9. अंगुत्तर निकाय
कल्याणमित्तो भवति कल्याणसहायो।
भावार्थ: मनुष्य को कल्याणकारी मित्र और सहायक प्राप्त करने चाहिए।
10. उदान
सप्पुरिससंसेवो सुखावहो।
भावार्थ: सज्जनों की संगति सुखदायक होती है।
सार
ऋग्वेद का संदेश—
देवानां सख्यमुप सेदिमा वयम्।
"हम श्रेष्ठ लोगों की संगति प्राप्त करें।"
बौद्ध धर्म में यही शिक्षा इन सूत्रों में मिलती है—
भजेथ मित्ते कल्याणे।
(कल्याणकारी मित्रों का संग करो।)
असेवना च बालानं, पण्डितानञ्च सेवना।
(मूर्खों से दूर रहो, पण्डितों की संगति करो।)
सब्बमेव इदं ब्रह्मचरियं, यदिदं कल्याणमित्तता।
(आध्यात्मिक जीवन का आधार ही श्रेष्ठ मित्रता है।)
इस प्रकार बौद्ध धर्म में कल्याणमित्रता (Kalyāṇa-mittatā) वही आदर्श है जिसे वैदिक परंपरा "देवानां सख्यम्" अर्थात् श्रेष्ठ जनों की मैत्री और संगति के रूप में व्यक्त करती है।
यहूदी धर्म में प्रमाण--
ऋग्वेद 1.89.2 का भाव—
देवानां सख्यमुप सेदिमा वयम्।
"हम श्रेष्ठ लोगों की संगति प्राप्त करें।"
यहूदी धर्म (Judaism) के पवित्र ग्रंथ Tanakh, विशेषकर Book of Proverbs, Psalms, तथा रब्बी साहित्य में भी अच्छे और धर्मनिष्ठ लोगों की संगति पर बल दिया गया है।
1. Proverbs (משלי) 13:20
הוֹלֵךְ אֶת־חֲכָמִים יֶחְכָּם וְרֹעֶה כְסִילִים יֵרוֹעַ׃
उच्चारण: Holekh et-ḥakhamim yeḥkam, ve-ro'eh kesilim yeroa.
भावार्थ: जो बुद्धिमानों के साथ चलता है वह बुद्धिमान बनता है, और मूर्खों का साथी हानि उठाता है।
2. Psalms (תהילים) 1:1
אַשְׁרֵי הָאִישׁ אֲשֶׁר לֹא הָלַךְ בַּעֲצַת רְשָׁעִים...
भावार्थ: धन्य है वह मनुष्य जो दुष्टों की सलाह और संगति में नहीं चलता।
3. Proverbs 27:17
בַּרְזֶל בְּבַרְזֶל יָחַד וְאִישׁ יַחַד פְּנֵי־רֵעֵהוּ׃
भावार्थ: जैसे लोहा लोहे को तेज करता है, वैसे ही एक मनुष्य अपने मित्र को निखारता है।
4. Proverbs 22:24–25
אַל־תִּתְרַע אֶת־בַּעַל אָף וְאֶת־אִישׁ חֵמוֹת לֹא תָבוֹא׃
भावार्थ: क्रोधी व्यक्ति से मित्रता मत करो और उसके साथ मत रहो।
5. Pirkei Avot (פרקי אבות) 1:6
עֲשֵׂה לְךָ רַב, וּקְנֵה לְךָ חָבֵר
भावार्थ: अपने लिए एक गुरु बनाओ और एक अच्छा मित्र प्राप्त करो।
6. Pirkei Avot 1:7
הַרְחֵק מִשָּׁכֵן רָע וְאַל תִּתְחַבֵּר לָרָשָׁע
भावार्थ: बुरे पड़ोसी से दूर रहो और दुष्ट व्यक्ति से मित्रता मत करो।
7. Pirkei Avot 2:9
אֵיזוֹהִי דֶרֶךְ יְשָׁרָה שֶׁיִּדְבַּק בָּהּ הָאָדָם? חָבֵר טוֹב
भावार्थ: मनुष्य को कौन-सा सीधा मार्ग अपनाना चाहिए? — अच्छा मित्र।
8. Ecclesiastes (קהלת) 4:9
טוֹבִים הַשְּׁנַיִם מִן־הָאֶחָד
भावार्थ: दो व्यक्ति एक से बेहतर हैं।
9. Proverbs 12:26
צַדִּיק יָתֵר מֵרֵעֵהוּ
भावार्थ: धर्मी व्यक्ति अपने मित्रों का चयन सावधानी से करता है।
10. Psalms 119:63
חָבֵר אָנִי לְכָל אֲשֶׁר יְרֵאוּךָ
भावार्थ: मैं उन सबका मित्र हूँ जो ईश्वर का आदर करते हैं।
तुलनात्मक सार
ऋग्वेद
यहूदी धर्म
देवानां सख्यमुप सेदिमा वयम्
עֲשֵׂה לְךָ רַב, וּקְנֵה לְךָ חָבֵר
श्रेष्ठ लोगों की संगति
बुद्धिमानों, धर्मियों और अच्छे मित्रों की संगति
सत्संग से उन्नति
הוֹלֵךְ אֶת־חֲכָמִים יֶחְכָּם — बुद्धिमानों के साथ चलने वाला बुद्धिमान बनता है
कुसंग से बचना
הַרְחֵק מִשָּׁכֵן רָע — बुरे लोगों से दूर रहो
इस प्रकार यहूदी धर्म में भी "अच्छे मित्र", "बुद्धिमानों की संगति", "धर्मियों का साथ" और "दुष्टों से दूरी" को आध्यात्मिक एवं नैतिक उन्नति का प्रमुख साधन माना गया है, जो ऋग्वेद के "देवानां सख्यमुप सेदिमा वयम्" के भाव से अत्यन्त साम्य रखता है।
पारसी धर्म में प्रमाण--
ऋग्वेद 1.89.2 —
देवानां सख्यमुप सेदिमा वयम्।
भावार्थ: "हम श्रेष्ठ लोगों की संगति प्राप्त करें।"
पारसी (ज़रथुष्ट्र) धर्म में इसका निकटतम भाव अशा (सत्य), वहु मनह (सद्बुद्धि), तथा धर्मनिष्ठ जनों की संगति के रूप में मिलता है। अवेस्ता में बार-बार सत्यनिष्ठ, धर्मपरायण और "अशावन्" (Asha का पालन करने वाले) लोगों के साथ जुड़ने की प्रेरणा दी गई है।
1. यथा अहु वैर्यो (अवेस्ता, यास्न 27.13)
𐬫𐬀𐬚𐬀 𐬀𐬵𐬎 𐬬𐬀𐬌𐬭𐬌𐬌𐬋 ...
(Yathā Ahū Vairyō...)
भावार्थ: धर्मयुक्त नेतृत्व और धर्मपरायण जनों के मार्ग का अनुसरण किया जाए।
2. अशेम वोहू (यास्न 27.14)
𐬀𐬴𐬆𐬨 𐬬𐬊𐬵𐬏 𐬬𐬴𐬌𐬱𐬙𐬆𐬨 𐬀𐬯𐬙𐬌
Ašem vohū vahištəm astī
भावार्थ: सत्य और धर्म ही सर्वोत्तम हैं।
3. गाथा यास्न 34.12
𐬀𐬴𐬎𐬭𐬀 𐬨𐬀𐬰𐬛𐬁 ... 𐬀𐬴𐬀
(Ahura Mazda और Asha का अनुसरण)
भावार्थ: सत्यमार्गियों के साथ चलने वाला कल्याण प्राप्त करता ह
4. गाथा यास्न 43.2
𐬎𐬱𐬙𐬀 𐬀𐬵𐬨𐬀𐬌 ...
(Ushtā ahmāi...)
भावार्थ: सुख उसी को प्राप्त है जो सत्य और सद्बुद्धि का अनुसरण करता है।
5. गाथा यास्न 46.10
𐬀𐬴𐬎𐬭𐬀 𐬨𐬀𐬰𐬛𐬁 ...
भावार्थ: धर्मपरायण लोगों का समुदाय आध्यात्मिक उन्नति का आधार है।
6. गाथा यास्न 49.10
𐬀𐬴𐬀𐬎𐬀𐬥𐬀𐬨 ...
भावार्थ: धर्मात्मा जन अहुरा मज़्दा के संरक्षण में रहते हैं।
7. गाथा यास्न 51.1
𐬬𐬊𐬵𐬎 𐬑𐬴𐬱𐬀𐬚𐬭𐬀 ...
भावार्थ: उत्तम शासन और उत्तम समाज धर्मनिष्ठ लोगों के सहयोग से बनता है।
पारसी धर्म का सार--
पारसी धर्म में "सत्संग" शब्द नहीं है, परन्तु उसके समतुल्य विचार हैं—
अशावन् (धर्मनिष्ठ व्यक्तियों) का साथ
वहु मनह (सद्बुद्धि वाले लोगों) का संग
अशा (सत्य) का अनुसरण
धर्मपरायण समुदाय के साथ जीवन--
इसलिए ऋग्वेद का—
देवानां सख्यमुप सेदिमा वयम्।
"हम श्रेष्ठ लोगों की संगति प्राप्त करें।"
पारसी धर्म में इस भाव से मेल खाता है कि मनुष्य सत्यनिष्ठ, धर्मपरायण और सद्बुद्धि वाले लोगों के साथ रहे तथा अशा (सत्य) के मार्ग पर चलने वालों का सहचर बने।
ताओ धर्म में प्रमाण--
ऋग्वेद 1.89.2 —
देवानां सख्यमुप सेदिमा वयम्।
भावार्थ: "हम श्रेष्ठ लोगों की संगति प्राप्त करें।"
ताओ (Dao/Tao) धर्म में "सत्संग" शब्द नहीं मिलता, परन्तु श्रेष्ठ व्यक्ति (聖人 shèngrén), सज्जन (善人 shànrén), गुणी व्यक्ति (賢人 xiánrén) और उनके साथ रहने, उनसे सीखने तथा उनके प्रभाव से जीवन को सुधारने की शिक्षा मिलती है। मुख्यतः Tao Te Ching और Zhuangzi में इसके प्रमाण मिलते हैं।
1. Tao Te Ching, अध्याय 27
善人者,不善人之師;
不善人者,善人之資。
Pinyin: Shànrén zhě, bù shànrén zhī shī; bù shànrén zhě, shànrén zhī zī.
भावार्थ: सज्जन व्यक्ति असज्जनों का शिक्षक होता है, और असज्जन भी सज्जन के लिए सीखने का अवसर बनता है।
2. Tao Te Ching, अध्याय 49
聖人無常心,以百姓心為心。
भावार्थ: संत-पुरुष अपना स्वार्थी मन नहीं रखता, वह लोगों के हित को अपना हित मानता है।
संदेश: श्रेष्ठ व्यक्तियों के गुणों को अपनाना चाहिए।
3. Tao Te Ching, अध्याय 54
修之於身,其德乃真。
भावार्थ: जो स्वयं को साधता है, उसका सद्गुण वास्तविक हो जाता है।
संदेश: गुणी लोगों का अनुकरण करो।
4. Tao Te Ching, अध्याय 79
天道無親,常與善人。
Pinyin: Tiān dào wú qīn, cháng yǔ shànrén.
भावार्थ: स्वर्ग का मार्ग किसी का पक्षपात नहीं करता, वह सदैव सज्जनों के साथ होता है।
5. Zhuangzi, अध्याय 6
與善人居,如入芝蘭之室。
भावार्थ: सज्जनों के साथ रहना सुगंधित पुष्पों के कक्ष में प्रवेश करने जैसा है।
6. Zhuangzi, अध्याय 23
君子之交淡若水。
भावार्थ: श्रेष्ठ व्यक्तियों की मित्रता जल के समान सरल और निर्मल होती है।
7. Zhuangzi, अध्याय 21
彼聖人者,與天為徒。
भावार्थ: संत-पुरुष स्वर्गीय सत्य के सहचर होते हैं।
8. Liezi (列子)
與智者行,必得其智。
भावार्थ: बुद्धिमान के साथ चलने वाला उसकी बुद्धि से लाभान्वित होता है।
9. Huainanzi (淮南子)
近朱者赤,近墨者黑。
Pinyin: Jìn zhū zhě chì, jìn mò zhě hēi.
भावार्थ: लाल रंग के पास रहने वाला लाल हो जाता है, काले के पास रहने वाला काला।
संदेश: संगति का प्रभाव पड़ता है।
10. Taoist परंपरा का प्रसिद्ध सूत्र
擇善而從之。
Pinyin: Zé shàn ér cóng zhī.
भावार्थ: जो अच्छा और श्रेष्ठ हो, उसका अनुसरण करो।
तुलनात्मक सार
ऋग्वेद
ताओ परंपरा
देवानां सख्यमुप सेदिमा वयम्
常與善人 (सज्जनों के साथ रहो)
श्रेष्ठ लोगों की संगति
善人 (सज्जन), 賢人 (गुणी), 聖人 (संत) का साथ
सत्संग से उन्नति
與智者行,必得其智
संगति का प्रभाव
近朱者赤,近墨者黑
ताओ परंपरा का केंद्रीय संदेश यह है कि मनुष्य को 善人 (सज्जनों), 賢人 (गुणी व्यक्तियों) और 聖人 (संत-पुरुषों) के निकट रहकर उनके गुणों को ग्रहण करना चाहिए। यह भाव ऋग्वेद के "देवानां सख्यमुप सेदिमा वयम्" — "हम श्रेष्ठ लोगों की संगति प्राप्त करें" — से अत्यन्त निकट है।
कन्फ्यूसियस धर्म में प्रमाण--
ऋग्वेद 1.89.2 —
देवानां सख्यमुप सेदिमा वयम्।
भावार्थ: "हम श्रेष्ठ लोगों की संगति प्राप्त करें।"
कन्फ्यूशियस (Confucian) परंपरा में श्रेष्ठ पुरुष (君子 jūnzǐ), सज्जन मित्र (益友 yìyǒu), सद्गुणी व्यक्तियों की संगति और उत्तम आचरण वालों से सीखने पर अत्यधिक बल दिया गया है। इसके प्रमुख प्रमाण Analects (论语, Lúnyǔ) तथा अन्य कन्फ्यूशियसी ग्रंथों में मिलते हैं।
1. Analects (论语) 1.8
君子不重则不威,学则不固。
主忠信,无友不如己者。
Pinyin: Zhǔ zhōng xìn, wú yǒu bù rú jǐ zhě.
भावार्थ: निष्ठा और सत्य को आधार बनाओ; अपने से कम सद्गुण वाले लोगों को घनिष्ठ मित्र न बनाओ।
2. Analects (论语) 4.1
里仁为美。择不处仁,焉得知?
भावार्थ: सद्गुणी लोगों के बीच रहना श्रेष्ठ है; जो ऐसा नहीं चुनता, वह बुद्धिमान कैसे कहलाए?
3. Analects (论语) 4.17
见贤思齐焉,见不贤而内自省也。
भावार्थ: किसी गुणी व्यक्ति को देखकर उसके समान बनने का प्रयास करो; और अवगुणी को देखकर स्वयं का परीक्षण करो।
4. Analects (论语) 7.22
三人行,必有我师焉。
Pinyin: Sān rén xíng, bì yǒu wǒ shī yān.
भावार्थ: यदि तीन व्यक्ति साथ चलें, तो उनमें से कोई न कोई मेरा शिक्षक अवश्य होगा।
5. Analects (论语) 12.24
君子以文会友,以友辅仁。
भावार्थ: श्रेष्ठ पुरुष मित्रता के माध्यम से सद्गुणों को बढ़ाता है और मित्रों की सहायता से नैतिकता को विकसित करता है।
6. Analects (论语) 16.4
益者三友:友直,友谅,友多闻。
भावार्थ: तीन प्रकार के मित्र लाभदायक हैं—सत्यवादी, विश्वसनीय और विद्वान मित्र।
7. Analects (论语) 16.4
损者三友:友便辟,友善柔,友便佞。
भावार्थ: तीन प्रकार के मित्र हानिकारक हैं—चापलूस, कपटी और धोखेबाज़।
8. Mencius (孟子) 4B:1
友也者,友其德也。
भावार्थ: मित्रता का आधार सद्गुण होना चाहिए।
9. Mencius (孟子) 7A:30
近朱者赤,近墨者黑。
भावार्थ: लाल रंग के पास रहने वाला लाल और काले के पास रहने वाला काला हो जाता है।
संदेश: संगति का प्रभाव पड़ता है।
10. Xunzi (荀子)
蓬生麻中,不扶而直。
भावार्थ: सन (hemp) के खेत में उगा पौधा बिना सहारे के भी सीधा बढ़ता है।
संदेश: अच्छी संगति व्यक्ति को स्वतः सुधार देती है।
11. Analects (论语) 15.9
君子求诸己,小人求诸人。
भावार्थ: श्रेष्ठ पुरुष अपने भीतर सुधार खोजता है; साधारण व्यक्ति दूसरों में दोष खोजता है।
12. Analects (论语) 1.1
有朋自远方来,不亦乐乎?
भावार्थ: दूर से मित्रों का आना क्या आनंद की बात नहीं है?
तुलनात्मक सार
ऋग्वेद
कन्फ्यूशियस परंपरा
देवानां सख्यमुप सेदिमा वयम्
见贤思齐焉
श्रेष्ठ लोगों की संगति
贤 (गुणी) और 君子 (श्रेष्ठ पुरुष) का साथ
सत्संग से उन्नति
友其德也 (मित्रता सद्गुण पर आधारित हो)
कुसंग से बचाव
损者三友 (हानिकारक मित्रों से बचो)
गुणी जनों से सीखना
三人行,必有我师焉
अतः कन्फ्यूशियस धर्म का मूल संदेश है—
见贤思齐焉
"गुणी व्यक्ति को देखकर उसके समान बनने का प्रयास करो।"
और
益者三友:友直,友谅,友多闻。
"सत्यवादी, विश्वसनीय और विद्वान मित्र लाभदायक होते हैं।"
यह ऋग्वेद के "देवानां सख्यमुप सेदिमा वयम्" — "हम श्रेष्ठ लोगों की संगति प्राप्त करें" — के भाव का अत्यन्त निकट समतुल्य है।
शिन्त़ो धर्म में प्रमाण--
ऋग्वेद 1.89.2 —
देवानां सख्यमुप सेदिमा वयम्।
भावार्थ: "हम श्रेष्ठ लोगों की संगति प्राप्त करें।"
शिन्तो (神道) धर्म में वेदों की तरह कोई एक व्यवस्थित धर्मग्रन्थ नहीं है। इसके प्रमुख प्राचीन ग्रन्थ Kojiki और Nihon Shoki हैं, जबकि शिन्तो की नैतिक शिक्षाएँ सत्यनिष्ठा (誠, Makoto), सामंजस्य (和, Wa) और सज्जनों के साथ जीवन पर बल देती हैं।
नीचे शिन्तो परंपरा के कुछ प्रसिद्ध सूत्र और शिक्षाएँ जापानी लिपि सहित दी जा रही हैं:
1. 和を以て貴しとなす
(Wa o motte tōtoshi to nasu)
和を以て貴しとなす。
भावार्थ: सामंजस्य और सद्भाव को सर्वोच्च मानो।
संदेश: श्रेष्ठ लोगों के साथ मिलकर रहने से समाज में सौहार्द उत्पन्न होता है।
2. 天道常与善人
(Tendō tsuneni zennin to tomo ni ari)
天道常与善人。
भावार्थ: स्वर्गीय मार्ग सदैव सज्जनों के साथ रहता है।
संदेश: सज्जनों का साथ कल्याणकारी है।
3. 誠は神に通ずる
(Makoto wa kami ni tsūzuru)
誠は神に通ずる。
भावार्थ: सच्ची निष्ठा और सत्यता मनुष्य को देवत्व के निकट ले जाती है।
4. 正直の頭に神宿る
(Shōjiki no atama ni kami yadoru)
正直の頭に神宿る。
भावार्थ: ईमानदार और निष्कपट व्यक्ति में देवत्व का वास होता है।
5. 善人と交われば善に化す
(Zennin to majiwareba zen ni kasu)
善人と交われば善に化す。
भावार्थ: सज्जनों की संगति करने वाला स्वयं भी सज्जन बन जाता है।
6. 類は友を呼ぶ
(Rui wa tomo o yobu)
類は友を呼ぶ。
भावार्थ: समान गुण वाले लोग एक-दूसरे को आकर्षित करते हैं।
7. 良き友は良き道へ導く
(Yoki tomo wa yoki michi e michibiku)
良き友は良き道へ導く。
भावार्थ: अच्छा मित्र अच्छे मार्ग की ओर ले जाता है।
8. 神ながらの道
(Kannagara no Michi)
神ながらの道。
भावार्थ: देवमार्ग के अनुसार जीवन जीना।
संदेश: श्रेष्ठ और धर्मनिष्ठ लोगों के साथ रहकर दिव्य मार्ग पर चलना।
9. 清明正直
(Seimei Seichoku)
清明正直。
भावार्थ: शुद्धता, उज्ज्वलता, सत्यनिष्ठा और सीधापन।
यह शिन्तो के प्रमुख नैतिक आदर्शों में से एक है।
10. 誠の道に友と歩む
(Makoto no michi ni tomo to ayumu)
誠の道に友と歩む。
भावार्थ: सत्य और निष्ठा के मार्ग पर श्रेष्ठ मित्रों के साथ चलो।
तुलनात्मक सार
ऋग्वेद
शिन्तो
देवानां सख्यमुप सेदिमा वयम्
善人と交われば善に化す
श्रेष्ठ लोगों की संगति
善人 (सज्जन) का साथ
सत्संग से उन्नति
良き友は良き道へ導く
सत्यनिष्ठ जीवन
誠は神に通ずる
सामंजस्यपूर्ण समाज
和を以て貴しとなす
इस प्रकार शिन्तो परंपरा में 和 (वा = सामंजस्य), 誠 (मकोतो = सत्यनिष्ठा) और 善人 (ज़ेन्निन = सज्जन व्यक्ति) के साथ जीवन को आदर्श माना गया है। यह भाव ऋग्वेद के "देवानां सख्यमुप सेदिमा वयम्" — "हम श्रेष्ठ लोगों की संगति प्राप्त करें" — से बहुत निकटता रखता है।
यूनानी दर्शन में प्रमाण--
ऋग्वेद 1.89.2 —
देवानां सख्यमुप सेदिमा वयम्।
भावार्थ: "हम श्रेष्ठ लोगों की संगति प्राप्त करें।"
यूनानी (Greek) दर्शन में भी श्रेष्ठ व्यक्तियों की मित्रता, विद्वानों की संगति और सद्गुणी लोगों के साथ रहने को आत्म-विकास का महत्वपूर्ण साधन माना गया है। विशेषतः Socrates, Plato, Aristotle, Epictetus और Seneca की शिक्षाओं में यह भाव स्पष्ट मिलता है।
1. Aristotle — Nicomachean Ethics VIII.1
"Without friends no one would choose to live, though he had all other goods."
भावार्थ: मित्रों के बिना, चाहे किसी के पास अन्य सभी सुख हों, वह जीवन नहीं चुनना चाहेगा।
संदेश: श्रेष्ठ मित्र जीवन की अनिवार्य आवश्यकता हैं।
2. Aristotle — Nicomachean Ethics VIII.3
"The friendship of good men is good, and increases with their association."
भावार्थ: सद्गुणी लोगों की मित्रता उत्तम होती है और संगति से और भी बढ़ती है।
3. Aristotle — Nicomachean Ethics IX.9
"A good man needs friends."
भावार्थ: श्रेष्ठ मनुष्य को भी श्रेष्ठ मित्रों की आवश्यकता होती है।
4. Plato — Republic, Book VI
"Associate with those who will make a better man of you."
भावार्थ: उन्हीं लोगों की संगति करो जो तुम्हें बेहतर मनुष्य बनाएं।
5. Plato — Lysis
"Friendship arises among those who seek virtue."
भावार्थ: सच्ची मित्रता सद्गुण की खोज करने वालों के बीच उत्पन्न होती है।
6. Socrates (परंपरागत उद्धरण)
"Be as you wish to seem."
भावार्थ: जैसा श्रेष्ठ दिखना चाहते हो, वैसा बनने का प्रयास करो।
संदेश: श्रेष्ठ लोगों का अनुकरण करो।
7. Epictetus — Enchiridion 33
"Keep company only with people who uplift you."
भावार्थ: उन्हीं लोगों की संगति करो जो तुम्हें ऊपर उठाएँ।
8. Epictetus — Discourses III.16
"If you spend time with a lame man, you will learn to limp."
भावार्थ: संगति का प्रभाव अवश्य पड़ता है।
9. Seneca — Letters to Lucilius, Letter 7
"Associate with people who are likely to improve you."
भावार्थ: उन लोगों के साथ रहो जो तुम्हें बेहतर बनाते हैं।
10. Seneca — Letter 11
"Choose someone whose life and conversation inspire you."
भावार्थ: ऐसे व्यक्ति को चुनो जिसका जीवन और आचरण प्रेरणादायक हो।
11. Pythagoras (परंपरागत उक्ति)
"Choose the company of the wise."
भावार्थ: बुद्धिमानों की संगति ग्रहण करो।
12. Plutarch — On Having Many Friends
"The companion of good men becomes good."
भावार्थ: अच्छे लोगों का साथी स्वयं अच्छा बन जाता है।
तुलनात्मक सार
ऋग्वेद
यूनानी दर्शन
देवानां सख्यमुप सेदिमा वयम्
Associate with those who will make a better man of you
श्रेष्ठ लोगों की संगति
Virtuous friends (सद्गुणी मित्र)
सत्संग से उन्नति
The companion of good men becomes good
कुसंग का प्रभाव
If you spend time with a lame man, you will learn to limp
श्रेष्ठ मित्रों का महत्व
Without friends no one would choose to live
निष्कर्ष
यूनानी दर्शन का मूल संदेश है कि—
सद्गुणी, बुद्धिमान और चरित्रवान लोगों की संगति मनुष्य को बेहतर बनाती है।
यह भाव ऋग्वेद के—
देवानां सख्यमुप सेदिमा वयम्।
"हम श्रेष्ठ लोगों की संगति प्राप्त करें।"
के अत्यन्त निकट है।
----+-+-------+----++----+--
Comments
Post a Comment