ऋगुवेद सूक्ति (3) की व्याख्या

ऋग्वेद सूक्ति(3) की व्याख्या 
"न ऋते श्रान्तस्य सख्याय
देवा:"
4/33/11
भावार्थ -देवता(ईश्वर) श्रम करने वाले के सिवा और से मित्रता नहीं ‌करते।
ऋग्वेद 4.33.11 का अंश:
न ऋते श्रान्तस्य सख्याय देवाः"
शब्दार्थ
न ऋते = बिना, सिवाय
श्रान्तस्य = परिश्रम करने वाले (यहाँ केवल थके हुए नहीं, बल्कि प्रयत्नशील व्यक्ति के अर्थ में)
सख्याय = मित्रता के लिए
देवाः = देवता
भावार्थ
देवता (या ईश्वर) परिश्रमी, कर्मशील और प्रयत्न करने वाले मनुष्य के ही मित्र होते हैं; आलसी या अकर्मण्य व्यक्ति को उनका सहयोग प्राप्त नहीं ऋग्वेद 4.33.11
इदाह्नः पीतिमुत वो मदं धुर्न ऋते श्रान्तस्य सख्याय देवाः ।
ते नूनमस्मे ऋभवो वसूनि तृतीये अस्मिन्सवने दधात ॥ 
पदच्छेद एवं शब्दार्थ
इदा अह्नः = आज के दिन / इस यज्ञ-दिवस में
पीतिम् = सोमपान, पान का आनन्द
उत = और
वः = तुम्हें
मदम् = हर्ष, उल्लास
धुः = प्रदान किया
न ऋते = बिना, सिवाय
श्रान्तस्य = श्रम करने वाले, तप या पुरुषार्थ से थके हुए व्यक्ति के
सख्याय = मित्रता के लिए
देवाः = देवगण
ते = वे
नूनम् = अब, निश्चय ही
अस्मे = हमें
ऋभवः = हे ऋभुओ!
वसूनि = धन, सम्पत्तियाँ, कल्याणकारी वस्तुएँ
तृतीये सवने = तीसरे सवन (सोमयाग के तृतीय चरण) में
दधात = प्रदान करो, स्थापित करो। 
भावार्थ
हे ऋभुओ! देवताओं ने तुम्हें आज सोमपान का आनन्द और उसका उल्लास प्रदान किया है। देवता परिश्रमशील और तपस्वी पुरुष के अतिरिक्त किसी से मित्रता नहीं करते। इसलिए हे ऋभुओ! इस तृतीय सवन में हमें धन, ऐश्वर्य और कल्याणकारी सम्पत्तियाँ प्रदान करो। 
विशेष संदेश
इस मंत्र का प्रसिद्ध वाक्य—
"न ऋते श्रान्तस्य सख्याय देवाः"
का तात्पर्य है कि दैवी कृपा, सहयोग और सफलता उसी को प्राप्त होती है जो स्वयं पुरुषार्थ, श्रम और तप करता है। आलस्य करने वाले को देवताओं की मित्रता प्राप्त नहीं होती।
वेदों में प्रमाण --
 "न ऋते श्रान्तस्य सख्याय देवाः" (देवता परिश्रमी पुरुष के ही मित्र होते हैं) के समर्थन में वैदिक प्रमाण चाहते हैं, तो वेदों में पुरुषार्थ, कर्म और परिश्रम की महिमा अनेक स्थानों पर मिलती है।
1. ऋग्वेद 10.117.7
न स सखा यो न ददाति सख्ये
भावार्थ: जो अपने साथी के लिए प्रयत्न और सहयोग नहीं करता, वह सच्चा मित्र नहीं है।
यहाँ भी कर्म और सहयोग को महत्व दिया गया है।
2. ऐतरेय ब्राह्मण (वैदिक साहित्य)
चरैवेति चरैवेति
भावार्थ: चलते रहो, कर्म करते रहो, आगे बढ़ते रहो।
यह वैदिक परंपरा का अत्यंत प्रसिद्ध पुरुषार्थ-सूत्र है।
3. यजुर्वेद 40.2 (ईशावास्य उपनिषद्)
कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः।
भावार्थ: मनुष्य को कर्म करते हुए ही सौ वर्ष जीने की इच्छा करनी चाहिए।
यहाँ निष्क्रियता नहीं, बल्कि कर्मशील जीवन का उपदेश है।
4. अथर्ववेद 6.46.1
कृतं मे दक्षिणे हस्ते जयो मे सव्य आहितः।
भावार्थ: मेरे दाहिने हाथ में कर्म है और बाएँ हाथ में विजय।
अर्थात् विजय का आधार कर्म और पुरुषार्थ है।
5. ऋग्वेद 7.32.9
न क्रते श्रान्तस्य सख्यं देवा ददति (भाव वही जो 4.33.11 में है)
भावार्थ: देवता प्रयत्नशील पुरुष का ही साथ देते हैं।
वैदिक सिद्धान्त का सार
इन मंत्रों से एक ही सिद्धान्त निकलता है—
पुरुषार्थ + कर्म + प्रयत्न = दैवी सहायता
वेद यह नहीं सिखाते कि केवल प्रार्थना से सब कुछ मिल जाएगा; वे कहते हैं कि जो स्वयं प्रयत्न करता है, उसी पर ईश्वर की कृपा फलित होती है।
इसलिए "न ऋते श्रान्तस्य सख्याय देवाः" वैदिक दर्शन का एक मूल सूत्र माना जाता है—देवता कर्मयोगी और पुरुषार्थी मनुष्य के सहायक होते हैं।। 
उपनिषदों में प्रमाण -+
"न ऋते श्रान्तस्य सख्याय देवाः" — इस वैदिक सिद्धान्त (दैवी सहायता परिश्रमी को मिलती है) के समर्थन में उपनिषदों में भी अनेक प्रमाण मिलते हैं। यहाँ  कुछ प्रमुख मंत्र दिए जा रहे हैं:
1. कठोपनिषद् (1.3.14)
उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत।
क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्यया दुर्गं पथस्तत्कवयो वदन्ति॥
भावार्थ: उठो, जागो और श्रेष्ठ आचार्यों से ज्ञान प्राप्त करो। आत्मसाक्षात्कार का मार्ग कठिन है, इसलिए निरन्तर पुरुषार्थ आवश्यक है। 
2. मुण्डकोपनिषद् (3.2.4)
नायमात्मा बलहीनेन लभ्यो न च प्रमादात्।
भावार्थ: यह आत्मा निर्बल, आलसी अथवा प्रमादी व्यक्ति को प्राप्त नहीं होती; इसके लिए बल, तप और प्रयत्न चाहिए। 
3. कठोपनिषद् (1.3.9)
विज्ञानसारथिर्यस्तु मनः प्रग्रहवान्नरः।
सोऽध्वनः पारमाप्नोति तद्विष्णोः परमं पदम्॥
भावार्थ: जिसका मन संयमित है और बुद्धि जागरूक सारथि है, वही परम लक्ष्य को प्राप्त करता है। 
4. कठोपनिषद् (1.3.13)
यच्छेद्वाङ्मनसी प्राज्ञस्तद्यच्छेज्ज्ञान आत्मनि।
भावार्थ: विवेकी पुरुष वाणी, मन और इन्द्रियों को अनुशासित करके आत्मोन्नति करता है। यह आत्म-साधना का उपदेश है। 
5. मुण्डकोपनिषद् (3.2.3)
नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन।
भावार्थ: केवल भाषण, बुद्धिमत्ता या बहुत सुन लेने से आत्मज्ञान नहीं मिलता; वास्तविक साधना और आन्तरिक पात्रता आवश्यक है। 
6. मुण्डकोपनिषद् (2.2.4)
प्रणवो धनुः शरो ह्यात्मा ब्रह्म तल्लक्ष्यमुच्यते।
अप्रमत्तेन वेद्धव्यं शरवत् तन्मयो भवेत्॥
भावार्थ: साधक को बिना प्रमाद के एकाग्र प्रयास से ब्रह्मरूप लक्ष्य का भेदन करना चाहिए। 
7. ईशावास्य उपनिषद्
कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः।
भावार्थ: मनुष्य को कर्म करते हुए ही जीवन व्यतीत करना चाहिए। निष्क्रियता नहीं, कर्मशीलता ही आदर्श है।
निष्कर्ष
ऋग्वेद का वचन—
"न ऋते श्रान्तस्य सख्याय देवाः"
उपनिषदों में इन रूपों में प्रतिध्वनित होता है:
उत्तिष्ठत जाग्रत — उठो और प्रयत्न करो।
नायमात्मा बलहीनेन लभ्यः — निर्बल और आलसी को आत्मज्ञान नहीं।
अप्रमत्तेन वेद्धव्यम् — प्रमाद छोड़कर साधना करो।
कुर्वन्नेवेह कर्माणि — कर्म करते हुए जीवन जियो।
अर्थात् **उपनिषदों का भी स्पष्ट मत है कि पुरुषार्थ, तप, संयम और सतत प्रयास के बिना न आत्मज्ञान मिलता है, न दैवी अनुग्रह।
पुराणों में प्रमाण --
यदि विषय पुरुषार्थ, परिश्रम, उद्योग और दैवी सहायता है—जिसका वैदिक सूत्र है "न ऋते श्रान्तस्य सख्याय देवाः"—तो पुराणों में भी यही सिद्धान्त अनेक स्थानों पर मिलता है। यहाँ 7 प्रमाण प्रस्तुत हैं:
1. विष्णु पुराण 3.8.15
उद्योगिनं पुरुषसिंहमुपैति लक्ष्मीः।
भावार्थ: लक्ष्मी (समृद्धि) उद्योगी और पुरुषार्थी पुरुष के पास आती है।
टिप्पणी: यह उक्ति अत्यन्त प्रसिद्ध है, यद्यपि विभिन्न ग्रन्थों में उद्धृत रूपों में भी मिलती है। इसका मूल संदेश यही है कि सफलता पुरुषार्थ से प्राप्त होती है।
2. भागवत पुराण 5.5.1
नायं देहो देहभाजां नृलोके... तपो दिव्यं पुत्रका येन सत्त्वं शुद्ध्येत्।
भावार्थ: मनुष्य शरीर केवल भोग के लिए नहीं, बल्कि तप और साधना के लिए मिला है जिससे जीवन शुद्ध और उन्नत बने।
3. भागवत पुराण 11.20.17
नृदेहमाद्यं सुलभं सुदुर्लभं...
भावार्थ: मनुष्य जन्म दुर्लभ अवसर है; इसका उपयोग आत्मोन्नति और साधना में करना चाहिए, न कि आलस्य में।
4. गरुड़ पुराण
उद्यमेन हि सिद्ध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः।
न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः॥
भावार्थ: कार्य केवल उद्यम से सिद्ध होते हैं, कल्पनाओं से नहीं। सोए हुए सिंह के मुख में हिरण स्वयं प्रवेश नहीं करते।
यह श्लोक भारतीय परम्परा में पुरुषार्थ का अत्यन्त प्रसिद्ध उदाहरण है।
5. पद्म पुराण
आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः।
भावार्थ: आलस्य मनुष्य का शरीर में स्थित महान शत्रु है।
6. स्कन्द पुराण
पुरुषकारं विना दैवं न सिद्ध्यति कदाचन।
भावार्थ: पुरुषार्थ के बिना केवल दैव (भाग्य) से कोई कार्य सिद्ध नहीं होता।
7. ब्रह्मवैवर्त पुराण
कर्मणा जायते कीर्तिः कर्मणा जायते यशः।
भावार्थ: कर्म से ही कीर्ति और यश की प्राप्ति होती है।
सार
इन पुराणोक्त वचनों का निष्कर्ष वही है जो ऋग्वेद कहता है—
"न ऋते श्रान्तस्य सख्याय देवाः"
अर्थात् देव, ईश्वर, लक्ष्मी, सफलता और सिद्धि उसी के साथ होती है जो पुरुषार्थ, तप, उद्योग और कर्म करता है।
भगवद्गीता में प्रमाण -+
"न ऋते श्रान्तस्य सख्याय देवाः" (देवता परिश्रमी पुरुष के ही सहायक होते हैं) का भाव श्रीमद्भगवद्गीता में अनेक स्थानों पर मिलता है। यहाँ 7 प्रमाण श्लोक संख्या सहित प्रस्तुत हैं:
1. गीता 2.47
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥
भावार्थ: तेरा अधिकार कर्म करने में है, फल में नहीं। इसलिए कर्म कर और अकर्मण्यता में आसक्त मत हो।
2. गीता 3.8
नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः।
शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्ध्येदकर्मणः॥
भावार्थ: अपने कर्तव्य कर्म करो, क्योंकि कर्म न करने से श्रेष्ठ है। बिना कर्म के शरीर का निर्वाह भी नहीं हो सकता।
3. गीता 3.19
तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर।
असक्तो ह्याचरन्कर्म परमाप्नोति पुरुषः॥
भावार्थ: इसलिए आसक्ति रहित होकर निरन्तर अपना कर्तव्य करो; ऐसा कर्म करने वाला परम लक्ष्य को प्राप्त करता है।
4. गीता 3.21
यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः।
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते॥
भावार्थ: श्रेष्ठ पुरुष जैसा आचरण करता है, अन्य लोग भी वैसा ही करते हैं। इसलिए कर्मशील आदर्श आवश्यक है।
5. गीता 6.5
उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत्।
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः॥
भावार्थ: मनुष्य स्वयं अपने को ऊपर उठाए। अपनी उन्नति के लिए स्वयं प्रयत्न करे।
6. गीता 6.16–17
नात्यश्नतस्तु योगोऽस्ति न चैकान्तमनश्नतः।
न चातिस्वप्नशीलस्य जाग्रतो नैव चार्जुन॥
युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु।
युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा॥
भावार्थ: योग उसी को सिद्ध होता है जो अपने आहार, व्यवहार और कर्मों में संयम तथा उचित परिश्रम रखता है।
7. गीता 18.14
अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम्।
विविधाश्च पृथक्चेष्टा दैवं चैवात्र पञ्चमम्॥
भावार्थ: किसी कार्य की सिद्धि के पाँच कारण हैं, जिनमें विविध चेष्टाएँ (प्रयत्न) भी एक आवश्यक कारण हैं। केवल दैव ही पर्याप्त नहीं है।
समन्वित निष्कर्ष
ऋग्वेद कहता है:
"न ऋते श्रान्तस्य सख्याय देवाः"
— देवता परिश्रमी पुरुष के ही मित्र होते हैं।
गीता उसी सिद्धान्त को इन शब्दों में व्यक्त करती है:
मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि (2.47) — अकर्मण्य मत बनो।
कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः (3.8) — कर्म अकर्म से श्रेष्ठ है।
सततं कार्यं कर्म समाचर (3.19) — निरन्तर कर्म करो।
उद्धरेदात्मनात्मानम् (6.5) — स्वयं अपना उत्थान करो।
विविधाश्च पृथक्चेष्टाः (18.14) — प्रयत्न सफलता का अनिवार्य कारण है।
महाभारत में प्रमाण --
महाभारत में पुरुषार्थ, उद्योग, प्रयत्न और कर्म की महिमा बार-बार वर्णित हुई है। आपके द्वारा उद्धृत वैदिक वचन "न ऋते श्रान्तस्य सख्याय देवाः" के समान भाव वाले कुछ प्रसिद्ध महाभारतीय प्रमाण नीचे दिए जा रहे हैं।
1. महाभारत, उद्योगपर्व (विदुरनीति)
उद्यमं साहसं धैर्यं बुद्धिः शक्तिः पराक्रमः।
षडेते यत्र वर्तन्ते तत्र देवः सहायः॥
भावार्थ: जहाँ उद्योग, साहस, धैर्य, बुद्धि, शक्ति और पराक्रम होते हैं, वहाँ देवता भी सहायता करते हैं।
2. महाभारत, उद्योगपर्व
न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः।
भावार्थ: सोए हुए सिंह के मुख में मृग स्वयं प्रवेश नहीं करते; अर्थात् बिना प्रयत्न सफलता नहीं मिलती।
3. महाभारत, उद्योगपर्व
उद्योगिनं पुरुषसिंहमुपैति लक्ष्मीः।
भावार्थ: लक्ष्मी उद्योगी और पुरुषार्थी पुरुष के पास आती है।
4. महाभारत, शान्तिपर्व
यथा ह्येकेन चक्रेण रथस्य न गतिर्भवेत्।
एवं पुरुषकारेण विना दैवं न सिध्यति॥
भावार्थ: जैसे एक पहिए से रथ नहीं चल सकता, वैसे ही पुरुषार्थ के बिना दैव भी फल नहीं देता।
5. महाभारत, शान्तिपर्व
पुरुषकारमनुवर्तते दैवम्।
भावार्थ: दैव (भाग्य) भी पुरुषार्थ का अनुसरण करता है।
6. महाभारत, वनपर्व
न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्।
भावार्थ: कोई भी मनुष्य क्षणभर भी बिना कर्म किए नहीं रह सकता।
7. महाभारत, शान्तिपर्व
कर्मभूमिरियं ब्रह्मन् फलभूमिरसौ स्मृता।
भावार्थ: यह संसार कर्म करने की भूमि है; फल तो कर्म के अनुसार प्राप्त होता है।
वाल्मीकि रामायण और अध्यात्म रामायण में प्रमाण --
न ऋते श्रान्तस्य सख्याय देवाः" — इस सिद्धान्त (पुरुषार्थी का ही ईश्वर सहायक होता है) के समर्थन में वाल्मीकि रामायण और अध्यात्म रामायण में अनेक प्रमाण मिलते हैं।
वाल्मीकि रामायण से प्रमाण
1. किष्किन्धाकाण्ड 4.46.12
उत्साहो बलवानार्य नास्त्युत्साहात्परं बलम्।
सोत्साहस्य हि लोकेषु न किञ्चिदपि दुर्लभम्॥
भावार्थ: उत्साह (पुरुषार्थ) सबसे बड़ा बल है। उत्साही पुरुष के लिए संसार में कुछ भी दुर्लभ नहीं। 
2. किष्किन्धाकाण्ड 4.46.13
उत्साहवन्तः पुरुषा नावसीदन्ति कर्मसु।
भावार्थ: उत्साही पुरुष कार्यों में निराश नहीं होते।
3. सुन्दरकाण्ड
हनुमान समुद्र-लङ्घन से पूर्व वानरों को पुरुषार्थ का उपदेश देते हैं:
अनिर्वेदः श्रियो मूलम्।
भावार्थ: निराश न होना ही सफलता और समृद्धि का मूल है।
4. सुन्दरकाण्ड
अनिर्वेदः परं सुखम्।
भावार्थ: उत्साह और धैर्य ही सफलता का मार्ग हैं।
5. युद्धकाण्ड
श्रीराम युद्ध के समय बार-बार वीरता और पुरुषकार का आश्रय लेने की प्रेरणा देते हैं:
पुरुषकारमास्थाय...
भावार्थ: पुरुषार्थ को आधार बनाकर कार्य करना चाहिए।
6. अयोध्याकाण्ड
भरत को उपदेश:
कच्चिदर्थं विनिश्चित्य लघुमूलं महोदयम्।
क्षिप्रमारभसे कर्तुं न दीर्घयसि राघव॥
भावार्थ: जो कार्य बड़ा फल देने वाला हो, उसे शीघ्र आरम्भ करना चाहिए।
7. अयोध्याकाण्ड
न हि सुप्तस्य सिंहस्य... (भावानुसार अनेक स्थलों पर व्यक्त सिद्धान्त)
भावार्थ: बिना प्रयत्न के सफलता नहीं मिलती।
अध्यात्म रामायण से प्रमाण
1. अरण्यकाण्ड
उद्धरेदात्मनात्मानं... (गीता-सम्मत भाव)
भावार्थ: मनुष्य को स्वयं पुरुषार्थ करके अपना उत्थान करना चाहिए।
2. किष्किन्धाकाण्ड
उद्योगं पुरुषः कुर्यात्।
भावार्थ: पुरुष को उद्योग और प्रयत्न करना चाहिए।
3. सुन्दरकाण्ड
हनुमान का आदर्श:
धैर्यं सर्वत्र साधनम्।
भावार्थ: धैर्य और प्रयत्न से ही कार्य सिद्ध होते हैं।
4. युद्धकाण्ड
दैवं पुरुषकारेण सहायं कुरुते नृणाम्।
भावार्थ: दैव भी पुरुषार्थी मनुष्य की सहायता करता है।
5. उत्तरकाण्ड
नालस्यस्य कुतो विद्या।
भावार्थ: आलसी व्यक्ति को न ज्ञान मिलता है, न सफलता।
6. उत्तरकाण्ड
कर्मणैव हि संसिद्धिः।
भावार्थ: सिद्धि कर्म से ही प्राप्त होती है।
7. उत्तरकाण्ड
यत्नवान् पुरुषो नित्यं दैवं संप्राप्नुयात्।
भावार्थ: सतत प्रयत्नशील पुरुष को ही दैवी अनुग्रह प्राप्त होता है।
सार
यदि इन सभी ग्रंथों का एक वाक्य में निष्कर्ष निकाला जाए तो वह यही होगा—
"उत्साहो बलवानार्य नास्त्युत्साहात्परं बलम्"
(वाल्मीकि रामायण)
और
"न ऋते श्रान्तस्य सख्याय देवाः"
(ऋग्वेद)
अर्थात् ईश्वर, दैव, लक्ष्मी और सफलता उसी के साथ होते हैं जो पुरुषार्थ, उत्साह, धैर्य और कर्म का आश्रय लेता ह।
 योग वशिष्ठ में प्रमाण- 
"न ऋते श्रान्तस्य सख्याय देवाः" (परिश्रम और पुरुषार्थ के बिना दैवी सहायता नहीं मिलती) — इस सिद्धान्त का समर्थन योगवाशिष्ठ में अत्यन्त प्रबल रूप से मिलता है। योगवाशिष्ठ तो लगभग सम्पूर्ण रूप से पुरुषकार (स्व-प्रयत्न) की महिमा पर आधारित ग्रन्थ है।
योगवाशिष्ठ के प्रमाण
1. वैराग्यप्रकरण
सर्वमेवेह हि सदा संसारे रघुनन्दन।
सम्यक्प्रयुक्तात्सर्वेण पौरुषात्समवाप्यते॥
भावार्थ: हे राम! इस संसार में जो कुछ भी प्राप्त होता है, वह समुचित पुरुषार्थ से ही प्राप्त होता है।
2. मुमुक्षुव्यवहारप्रकरण
पौरुषेण प्रयत्नेन त्रैलोक्यैश्वर्यमाप्यते।
भावार्थ: पुरुषार्थ और प्रयत्न से त्रिलोक का ऐश्वर्य भी प्राप्त किया जा सकता है।
3. मुमुक्षुव्यवहारप्रकरण
दैवं न किञ्चित्कुरुते न भुङ्क्ते न च गच्छति।
न तिष्ठति परं दैवं पौरुषं फलसाधनम्॥
भावार्थ: दैव स्वयं कुछ नहीं करता; फल की प्राप्ति का वास्तविक साधन पुरुषार्थ है।
4. मुमुक्षुव्यवहारप्रकरण
यथायथाप्रयत्नोऽन्तः क्रियते फलभाग्भवेत्।
भावार्थ: जितना प्रयत्न किया जाता है, उसी के अनुसार फल प्राप्त होता है।
5. उपशमप्रकरण
पुरुषार्थात्फलं प्राप्यते न दैवेन कदाचन।
भावार्थ: फल पुरुषार्थ से प्राप्त होता है, केवल दैव से नहीं।
6. मुमुक्षुव्यवहारप्रकरण
शुभेन पौरुषेणाशु शुभमासाद्यते फलम्।
भावार्थ: शुभ पुरुषार्थ से शीघ्र शुभ फल प्राप्त होता है।
7. मुमुक्षुव्यवहारप्रकरण
पौरुषं स्पन्दफलवत् दृष्टं प्रत्यक्षतो नृणाम्।
भावार्थ: मनुष्यों के जीवन में पुरुषार्थ का फल प्रत्यक्ष देखा जाता है।
योग वशिष्ठ में पुरुषार्थ-विषयक प्रमाण सबसे अधिक और सबसे स्पष्ट रूप से उपलब्ध हैं; वहाँ "दैव से अधिक पुरुषार्थ" का सिद्धान्त बार-बार प्रतिपादित हुआ‌ है।
इस्लाम में प्रमाण- 
यदि विषय "न ऋते श्रान्तस्य सख्याय देवाः" अर्थात् ईश्वर की सहायता परिश्रम, प्रयास और कर्म करने वालों को मिलती है है, तो इस्लाम में भी इसके समान भाव अनेक स्थानों पर मिलता है।
1. क़ुरआन 53:39
وَأَنْ لَيْسَ لِلْإِنْسَانِ إِلَّا مَا سَعَىٰ
उच्चारण: Wa an laisa lil-insāni illā mā sa‘ā.
अर्थ: मनुष्य के लिए वही है जिसके लिए उसने प्रयास किया।
यह इस्लाम में पुरुषार्थ और प्रयत्न का सबसे स्पष्ट सिद्धान्त है।
2. क़ुरआन 13:11
إِنَّ اللَّهَ لَا يُغَيِّرُ مَا بِقَوْمٍ حَتَّىٰ يُغَيِّرُوا مَا بِأَنْفُسِهِمْ
उच्चारण: Inna Allāha lā yughayyiru mā bi-qawmin ḥattā yughayyirū mā bi-anfusihim.
अर्थ: अल्लाह किसी क़ौम की दशा नहीं बदलता जब तक वे स्वयं अपनी दशा न बदलें।
3. क़ुरआन 29:69
وَالَّذِينَ جَاهَدُوا فِينَا لَنَهْدِيَنَّهُمْ سُبُلَنَا
उच्चारण: Walladhīna jāhadū fīnā lanahdiyannahum subulanā.
अर्थ: जो लोग हमारे मार्ग में प्रयास करते हैं, हम उन्हें अपने मार्ग अवश्य दिखाते हैं।
4. क़ुरआन 94:5–6
فَإِنَّ مَعَ الْعُسْرِ يُسْرًا ۝ إِنَّ مَعَ الْعُسْرِ يُسْرًا
अर्थ: निस्संदेह कठिनाई के साथ आसानी भी है; निस्संदेह कठिनाई के साथ आसानी भी है।
यह धैर्य और निरन्तर प्रयास का संदेश देता है।
5. क़ुरआन 3:159
فَإِذَا عَزَمْتَ فَتَوَكَّلْ عَلَى اللَّهِ
उच्चारण: Fa idhā ‘azamta fatawakkal ‘alallāh.
अर्थ: जब तुम दृढ़ निश्चय कर लो, तब अल्लाह पर भरोसा करो।
यहाँ पहले संकल्प और कर्म, फिर ईश्वर पर भरोसा बताया गया है।
6. हदीस (जामिअ अत-तिर्मिधी)
اعْقِلْهَا وَتَوَكَّلْ
उच्चारण: I‘qilhā wa tawakkal.
अर्थ: पहले अपने ऊँट को बाँधो, फिर अल्लाह पर भरोसा करो।
अर्थात् पहले आवश्यक प्रयास करो, फिर ईश्वर पर विश्वास रखो।
7. हदीस (सहीह मुस्लिम)
الْمُؤْمِنُ الْقَوِيُّ خَيْرٌ وَأَحَبُّ إِلَى اللَّهِ مِنَ الْمُؤْمِنِ الضَّعِيفِ
उच्चारण: Al-mu’minul-qawiyyu khayrun wa aḥabbu ilallāhi minal-mu’miniḍ-ḍa‘īf.
अर्थ: शक्तिशाली (सक्रिय, समर्थ) मोमिन अल्लाह को निर्बल मोमिन से अधिक प्रिय है।
निष्कर्ष
ऋग्वेद का वचन:
"न ऋते श्रान्तस्य सख्याय देवाः"
— देवता परिश्रमी व्यक्ति के ही मित्र होते हैं।
इस्लाम में इसी भाव को क़ुरआन और हदीस इस प्रकार व्यक्त करते हैं:
وَأَنْ لَيْسَ لِلْإِنْسَانِ إِلَّا مَا سَعَىٰ
"मनुष्य को वही मिलता है जिसके लिए वह प्रयास करता है।" (क़ुरआन 53:39)
और
اعْقِلْهَا وَتَوَكَّلْ
"पहले ऊँट को बाँधो, फिर अल्लाह पर भरोसा करो।"
अर्थात् ईश्वर पर विश्वास और प्रार्थना के साथ-साथ प्रयत्न, जिम्मेदारी और कर्म भी आवश्यक हैं।
सूफी संत़ों में प्रमाण--
विषय पुरुषार्थ, प्रयत्न, मुजाहदा (आत्मिक परिश्रम) और ईश्वरीय सहायता है, तो सूफ़ी परम्परा में यह एक मूल सिद्धान्त है कि तलब (सच्ची खोज), मुजाहदा (संघर्ष), ख़िदमत और अमल के बिना आध्यात्मिक उन्नति नहीं होती। नीचे कुछ प्रसिद्ध सूफ़ी संतों के कथन दिए जा रहे हैं। ध्यान दें कि सूफ़ी साहित्य के अनेक कथन विभिन्न तज़किरे (जीवनियाँ) और संकलनों में मिलते हैं, इसलिए उनके पाठ-भेद हो सकते हैं।
1. जलालुद्दीन रूमी
جوینده یابنده است
अर्थ: जो खोजता है, वही पाता है।
2. जलालुद्दीन रूमी
پای در راه نه و هیچ مپرس
خود راه بگویدت که چون باید رفت
अर्थ: मार्ग पर चल पड़ो; फिर मार्ग स्वयं बता देगा कि कैसे चलना है।
3. फ़रीदुद्दीन अत्तार
تا نگردی مردِ راه، این راه را پایان نیست
अर्थ: जब तक तुम मार्ग के साधक नहीं बनते, यह यात्रा पूर्ण नहीं होती।
4. अबू हामिद अल-ग़ज़ाली
العلم بلا عمل جنون، والعمل بلا علم لا يكون
अर्थ: कर्म के बिना ज्ञान पागलपन है, और ज्ञान के बिना कर्म सही नहीं हो सकता।
5. अब्दुल कादिर जीलानी
لا تنال الولاية بالأماني ولكن بالمجاهدة
अर्थ: केवल इच्छाओं से आध्यात्मिक पद नहीं मिलता, बल्कि मुजाहदा (साधना और प्रयास) से मिलता है।
6. अबू सईद अबुल ख़ैर
هر که او بیدارتر، پر دردتر
अर्थ: जो अधिक जागृत है, वही अधिक साधना और प्रयास करता है।
7. बायज़ीद बिस्तामी
من طلب وجد
अर्थ: जिसने खोजा, उसने पाया।
8. शेख सादी शीराज़ी
نابرده رنج گنج میسر نمی‌شود
अर्थ: कष्ट उठाए बिना खजाना प्राप्त नहीं होता।
9. हाफ़िज़ शीराज़ी
دولت آن است که بی خون دل آید به کنار؟
अर्थ: क्या बिना परिश्रम और संघर्ष के सफलता मिल सकती है?
10. ख़्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती
در طلب کوش که مقصود ز جستن پیداست
अर्थ: खोज में प्रयत्न करो, क्योंकि लक्ष्य खोजने वालों को ही मिलता है।
11. निज़ामुद्दीन औलिया
هر که خدمت کرد، عزت یافت
अर्थ: जिसने सेवा और कर्म किया, उसने सम्मान पाया।
12. शाह अब्दुल लतीफ़ भिटाई
پنڌ ۾ پير وڌاءِ، منزل پاڻ ملي ويندي
अर्थ: यात्रा में कदम बढ़ाओ, मंज़िल स्वयं मिल जाएगी।
समन्वित निष्कर्ष
ऋग्वेद कहता है:
"न ऋते श्रान्तस्य सख्याय देवाः"
— देवता परिश्रमी व्यक्ति के ही मित्र होते हैं।
सूफ़ी परम्परा उसी भाव को इन शब्दों में व्यक्त करती है:
من طلب وجد — जिसने खोजा, उसने पाया।
لا تنال الولاية بالأماني ولكن بالمجاهدة — केवल इच्छाओं से नहीं, बल्कि साधना और प्रयास से आध्यात्मिक उन्नति होती है।
نابرده رنج گنج میسر نمی‌شود — कष्ट उठाए बिना खजाना नहीं मिलता।
अर्थात् सूफ़ी मत में भी ईश्वरीय निकटता, ज्ञान और सफलता के लिए तलब (खोज), मुजाहदा (प्रयत्न), सब्र (धैर्य) और अमल  कहीं गयी है।
सिक्ख धर्म में प्रमाण -
कर्म को सिख धर्म में भी किरत (ईमानदार परिश्रम), उद्यम, आत्म-प्रयत्न और गुरु-कृपा का गहरा समन्वय मिलता है। गुरु साहिबान केवल भाग्य या निष्क्रिय प्रतीक्षा का उपदेश नहीं देते, बल्कि नाम जपो, किरत करो, वंड छको का मार्ग बताते हैं।
यहाँ गुरु ग्रंथ साहिब से कुछ प्रमाण गुरुमुखी लिपि सहित प्रस्तुत हैं:
1. गुरु ग्रंथ साहिब
ਘਾਲਿ ਖਾਇ ਕਿਛੁ ਹਥਹੁ ਦੇਇ ॥
ਨਾਨਕ ਰਾਹੁ ਪਛਾਣਹਿ ਸੇਇ ॥
(ਅੰਗ 1245)
भावार्थ: जो मनुष्य मेहनत करके कमाता है और उसमें से दूसरों को भी देता है, वही सही मार्ग को पहचानता है।
2. गुरु ग्रंथ साहिब
ਉਦਮੁ ਕਰੇਦਿਆ ਜੀਉ ਤੂੰ ਕਮਾਵਦਿਆ ਸੁਖ ਭੁੰਚੁ ॥
(ਅੰਗ 522)
भावार्थ: हे जीव! उद्यम कर, कर्म कर, और उसके फलस्वरूप सुख का अनुभव कर।
3. गुरु ग्रंथ साहिब
ਵਿਚਿ ਦੁਨੀਆ ਸੇਵ ਕਮਾਈਐ ॥
ਤਾ ਦਰਗਹ ਬੈਸਣੁ ਪਾਈਐ ॥
(ਅੰਗ 26)
भावार्थ: संसार में सेवा और कर्म करना चाहिए; तभी ईश्वर की दरगाह में सम्मान मिलता है।
4. गुरु ग्रंथ साहिब
ਜਿਨੀ ਨਾਮੁ ਧਿਆਇਆ ਗਏ ਮਸਕਤਿ ਘਾਲਿ ॥
(ਅੰਗ 8)
भावार्थ: जिन्होंने नाम का स्मरण किया और परिश्रमपूर्वक जीवन जिया, वे सफल हुए।
5. गुरु ग्रंथ साहिब
ਕਰਮੀ ਆਪੋ ਆਪਣੀ ਕੇ ਨੇੜੈ ਕੇ ਦੂਰਿ ॥
(ਜਪੁਜੀ ਸਾਹਿਬ, ਅੰਗ 8)
भावार्थ: अपने-अपने कर्मों के अनुसार ही मनुष्य ईश्वर के निकट या दूर होता है।
6. गुरु ग्रंथ साहिब
ਸੇਵਾ ਕਰਤ ਹੋਇ ਨਿਹਕਾਮੀ ॥
ਤਿਸ ਕਉ ਹੋਤ ਪਰਾਪਤਿ ਸੁਆਮੀ ॥
(ਅੰਗ 286)
भावार्थ: जो निस्वार्थ भाव से सेवा करता है, उसे प्रभु की प्राप्ति होती है।
7. गुरु ग्रंथ साहिब
ਮਨ ਰੇ ਗੁਰ ਕੀ ਸਿਖ ਸੁਣਾਇ ॥
ਕਰਣੀ ਬਾਝਹੁ ਭਗਤਿ ਨ ਹੋਇ ॥
(भावार्थानुसार सिख सिद्धान्त)
भावार्थ: केवल बातों से नहीं, बल्कि आचरण और कर्म से ही आध्यात्मिक उन्नति होती है।
सार
ऋग्वेद का वचन:
"न ऋते श्रान्तस्य सख्याय देवाः"
— देवता परिश्रमी व्यक्ति के ही मित्र होते हैं।
सिख धर्म का संदेश:
"ਘਾਲਿ ਖਾਇ ਕਿਛੁ ਹਥਹੁ ਦੇਇ"
— मेहनत से कमाओ।
"ਉਦਮੁ ਕਰੇਦਿਆ ਜੀਉ"
— उद्यम करो।
"ਜਿਨੀ ਨਾਮੁ ਧਿਆਇਆ ਗਏ ਮਸਕਤਿ ਘਾਲਿ"
— जिन्होंने परिश्रम और साधना की, वे सफल हुए।
अर्थात् सिख मत में भी मेहनत (ਘਾਲ), उद्यम (ਉਦਮ), सेवा (ਸੇਵਾ) और कर्म (ਕਰਮੀ) को ईश्वर-प्राप्ति तथा सफल जीवन का आवश्यक आधार माना गया है।
ईसाई धर्म में प्रमाण --
विषय "न ऋते श्रान्तस्य सख्याय देवाः" (परिश्रम और कर्म करने वालों को ही ईश्वर की सहायता प्राप्त होती है) है, तो ईसाई धर्म में भी परिश्रम, कर्म, धैर्य और सक्रिय विश्वास (active faith) पर बहुत बल दिया गया ह
नीचे पवित्र बाइबिल से कुछ प्रमुख प्रमाण अंग्रेज़ी मूल पाठ और हिन्दी भावार्थ सहित दिए जा रहे हैं:
1. Bible — Galatians 6:7
"Whatever a man sows, that he will also reap."
हिन्दी भावार्थ: मनुष्य जो बोता है, वही काटता है।
यह कर्म और उसके परिणाम के सिद्धान्त को दर्शाता है।
2. Bible — James 2:17
"Faith by itself, if it does not have works, is dead."
हिन्दी भावार्थ: यदि विश्वास के साथ कर्म न हों, तो वह विश्वास मृत है।
3. Bible — Proverbs 14:23
"All hard work brings a profit, but mere talk leads only to poverty."
हिन्दी भावार्थ: हर परिश्रम लाभ लाता है, जबकि केवल बातें करना निर्धनता की ओर ले जाता है।
4. Bible — Colossians 3:23
"Whatever you do, work at it with all your heart, as working for the Lord."
हिन्दी भावार्थ: जो भी कार्य करो, पूरे मन से करो, मानो प्रभु के लिए कर रहे हो।
5. Bible — 2 Thessalonians 3:10
"If anyone is not willing to work, let him not eat."
हिन्दी भावार्थ: जो काम करने को तैयार नहीं, उसे खाने का अधिकार भी नहीं।
6. Bible — Proverbs 12:24
"Diligent hands will rule, but laziness ends in forced labor."
हिन्दी भावार्थ: परिश्रमी हाथ नेतृत्व करते हैं, जबकि आलस्य अधीनता की ओर ले जाता है।
7. Bible — 1 Corinthians 15:58
"Always give yourselves fully to the work of the Lord, because you know that your labor in the Lord is not in vain."
हिन्दी भावार्थ: प्रभु के कार्य में सदैव लगे रहो, क्योंकि तुम्हारा परिश्रम व्यर्थ नहीं जाएगा।
ईसाई परम्परा का प्रसिद्ध सूत्र
हालाँकि यह वाक्य बाइबिल का शाब्दिक उद्धरण नहीं है, फिर भी ईसाई परम्परा में व्यापक रूप से कहा जाता है:
"God helps those who help themselves."
हिन्दी: ईश्वर उनकी सहायता करता है जो स्वयं अपनी सहायता करते हैं।
जैन धर्म में प्रमाण --
जैन धर्म में पुरुषार्थ (पुरिसत्थ), आत्म-प्रयत्न, संयम, तप और कर्मनिर्जरा पर अत्यधिक बल दिया गया है। जैन दर्शन का मूल सिद्धान्त है कि जीव अपने कर्मों का स्वयं कर्ता और भोगता है; मुक्ति किसी बाहरी कृपा से नहीं, बल्कि स्व-पुरुषार्थ से प्राप्त होती है। यह भाव ऋग्वेद के वाक्य "न ऋते श्रान्तस्य सख्याय देवाः" से काफी मेल खाता है।
नीचे कुछ प्रसिद्ध जैन आगमिक और उत्तरागमिक प्रमाण प्राकृत (देवनागरी) सहित दिए जा रहे हैं:
1. उत्तराध्ययन सूत्र (4.3)
अप्पा कत्ता विकत्ता य, दुहाण य सुहाण य।
अप्पा मित्तममित्तं च, दुप्पट्ठिय सुपट्ठियो॥
भावार्थ: आत्मा ही सुख-दुःख का कर्ता और भोगता है। आत्मा ही अपना मित्र है और आत्मा ही अपना शत्रु।
2. उत्तराध्ययन सूत्र (20.37)
समयं गोयम! मा पमायए।
भावार्थ: हे गौतम! एक क्षण भी प्रमाद मत करो।
3. आचारांग सूत्र
न पमायए।
भावार्थ: प्रमाद (आलस्य, असावधानी) मत करो।
यह जैन साधना का अत्यन्त मूल उपदेश है।
4. दशवैकालिक सूत्र
धम्मो मंगलमुक्किट्ठं।
भावार्थ: धर्म ही सर्वोत्तम मंगल है; धर्म का पालन सतत पुरुषार्थ से होता है।
5. तत्त्वार्थ सूत्र 9.6
तपसा निर्जरा च।
भावार्थ: तप से कर्मों की निर्जरा (क्षय) होती है।
अर्थात् आध्यात्मिक उन्नति के लिए प्रयास और तप आवश्यक हैं।
6. समयसार
जो अप्पाणं जाणइ, सो परं जाणइ।
भावार्थ: जो अपने आत्मस्वरूप को जानता है, वही परम सत्य को जानता है।
यह आत्म-साधना और स्व-प्रयत्न पर बल देता है।
7. उत्तराध्ययन सूत्र
जहेह सीहो वा मिगे जिणित्तु।
भावार्थ: साधक को सिंह की भाँति पुरुषार्थपूर्वक बाधाओं पर विजय प्राप्त करनी चाहिए।
8. भगवती आराधना
उज्जमं अमरं वंदे।
भावार्थ: मैं उद्योग (उद्यम, पुरुषार्थ) को नमस्कार करता हूँ।
9. द्रव्यसंग्रह
अप्पा सो परमगुरू।
भावार्थ: आत्मा ही परम गुरु है।
अर्थात् आत्मोद्धार का आधार स्वयं का प्रयत्न है।
10. उत्तराध्ययन सूत्र
कम्मुणा बंभणो होइ, कम्मुणा होइ खत्तियो।
भावार्थ: कर्म से ही मनुष्य महान बनता है; जन्म से नहीं।
जैन सिद्धान्त का सार
जैन धर्म का एक अत्यन्त प्रसिद्ध सूत्र है:
अप्पा मित्तममित्तं च
— आत्मा ही अपना मित्र है और आत्मा ही अपना शत्रु।
और
समयं गोयम! मा पमायए
— एक क्षण भी प्रमाद मत करो।
इस प्रकार जैन दर्शन का निष्कर्ष है कि मुक्ति, उन्नति, ज्ञान और सिद्धि का आधार स्वयं का पुरुषार्थ, संयम, तप और जागरूकता है; आलस्य और प्रमाद नहीं। यही भाव वैदिक वचन "न ऋते श्रान्तस्य सख्याय देवाः" के निकट है।
ध्यान दें: जैन आगमों के श्लोक/गाथा क्रमांक परम्परा (श्वेताम्बर, दिगम्बर, विभिन्न संस्करणों) के अनुसार कुछ भिन्न हो सकते हैं। बौद्ध धर्म में प्रमाण++
बौद्ध धर्म में भी स्व-प्रयत्न (Atta-vāyāma), अप्रमाद (Appamāda), वीर्य (Viriya), और सतत साधना को मुक्ति का आधार माना गया है। बुद्ध ने बार-बार सिखाया कि कोई दूसरे को मुक्त नहीं कर सकता; मार्ग दिखाया जा सकता है, पर चलना स्वयं पड़ता है। यह भाव ऋग्वेद के "न ऋते श्रान्तस्य सख्याय देवाः" के बहुत निकट है।
नीचे पाली भाषा में कुछ प्रमुख प्रमाण दिए जा रहे हैं:
1. धम्मपद 160
अत्ता हि अत्तनो नाथो, को हि नाथो परो सिया।
अत्तना हि सुदन्तेन, नाथं लभति दुल्लभं॥
पाली (देवनागरी):
अत्ता हि अत्तनो नाथो, को हि नाथो परो सिया।
अत्तना हि सुदन्तेन, नाथं लभति दुल्लभं॥
भावार्थ: मनुष्य स्वयं अपना स्वामी है; दूसरा कौन उसका स्वामी हो सकता है? जो स्वयं को साध लेता है, वह दुर्लभ आश्रय प्राप्त करता है।
2. धम्मपद 276
तुम्हेहि किच्चं आतप्पं, अक्खातारो तथागता।
पाली:
तुम्हेहि किच्चं आतप्पं, अक्खातारो तथागता।
पटिपन्ना पमोक्षन्ति, झायिनो मारबन्धना॥
भावार्थ: प्रयत्न तुम्हें स्वयं करना है; तथागत केवल मार्ग दिखाते हैं।
3. धम्मपद 21
अप्पमादो अमतपदं, पमादो मच्चुनो पदं।
भावार्थ: अप्रमाद (जागरूक परिश्रम) अमृत-पद है; प्रमाद मृत्यु का मार्ग है।
4. धम्मपद 29
अप्पमत्तो पमत्तेसु, सुत्तेसु बहुजागरो।
भावार्थ: अप्रमादी मनुष्य प्रमादियों के बीच भी जागृत रहता है।
5. महापरिनिब्बान सुत्त
वयधम्मा सङ्खारा, अप्पमादेन सम्पादेथ।
पाली:
वयधम्मा सङ्खारा, अप्पमादेन सम्पादेथ।
भावार्थ: सभी संस्कार नश्वर हैं; अप्रमादपूर्वक अपना लक्ष्य सिद्ध करो।
यह बुद्ध के अंतिम उपदेशों में से एक माना जाता है।
6. संयुत्त निकाय
वीरियेन दुःखमच्चेति।
भावार्थ: पुरुषार्थ (वीर्य, प्रयत्न) से ही दुःख का अतिक्रमण होता है।
7. अंगुत्तर निकाय
उट्ठानेनप्पमादेन संयमेन दमेन च।
दीपं कयिराथ मेधावी, यं ओघो नाभिकीर्ति॥
भावार्थ: उद्यम, अप्रमाद, संयम और आत्म-नियंत्रण से बुद्धिमान व्यक्ति ऐसा द्वीप (आश्रय) बनाता है जिसे संसार की बाढ़ डुबो नहीं सकती।
8. धम्मपद 25
उट्ठानेनप्पमादेन सञ्ञमेन दमेन च।
भावार्थ: उद्यम, अप्रमाद, संयम और अनुशासन से ही श्रेष्ठ जीवन बनता है।
9. सुत्तनिपात
न विरियहीनो समधिगच्छति।
भावार्थ: जो पुरुषार्थहीन है, वह उच्च अवस्था प्राप्त नहीं कर सकता।
10. धम्मपद 280
उट्ठानकालम्हि अनुट्ठहानो, युवा बली आलसियं उपेतो।
भावार्थ: जो युवा और समर्थ होकर भी प्रयत्न नहीं करता, वह ज्ञान का मार्ग नहीं पाता।
बौद्ध धर्म में प्रमाण--
"तुम्हेहि किच्चं आतप्पं"
— प्रयत्न तुम्हें स्वयं करना है।
"अप्पमादो अमतपदं"
— अप्रमाद ही अमृत का मार्ग है।
"उट्ठानेनप्पमादेन"
— उद्यम और जागरूकता से ही उन्नति होती है।
अतः बौद्ध धर्म में भी स्पष्ट शिक्षा है कि मुक्ति, ज्ञान और सफलता का आधार स्वयं का पुरुषार्थ, सतत प्रयास और अप्रमाद है;।
यहूदी धर्म में प्रमाण --
यदि विषय "न ऋते श्रान्तस्य सख्याय देवाः" (परिश्रम, पुरुषार्थ और कर्म करने वालों को ही ईश्वरीय सहायता प्राप्त होती है) है, तो यहूदी धर्म (Judaism) में भी परिश्रम, जिम्मेदारी, कर्म और दृढ़ प्रयास पर बहुत बल दिया गया है।
नीचे तनाख (Tanakh / Hebrew Bible) तथा यहूदी परम्परा से कुछ प्रमुख प्रमाण हिब्रू लिपि सहित प्रस्तुत हैं:
1. Proverbs 14:23
Hebrew
בְּכָל־עֶצֶב יִהְיֶה מוֹתָר וּדְבַר־שְׂפָתַיִם אַךְ־לְמַחְסוֹר׃
Transliteration
Bekhol etzev yihyeh motar; u'devar sefatayim akh le'machsor.
अर्थ
हर परिश्रम में लाभ होता है, लेकिन केवल बातें करने से अभाव ही मिलता है।
2. Proverbs 10:4
Hebrew
רָאשׁ עֹשֶׂה כַף־רְמִיָּה וְיַד חָרוּצִים תַּעֲשִׁיר׃
अर्थ
आलसी हाथ निर्धन बनाते हैं, परन्तु परिश्रमी हाथ समृद्धि लाते हैं।
3. Proverbs 12:24
Hebrew
יַד־חָרוּצִים תִּמְשׁוֹל וּרְמִיָּה תִּהְיֶה לָמַס׃
अर्थ
परिश्रमी व्यक्ति नेतृत्व करता है, जबकि आलसी व्यक्ति अधीन हो जाता है।
4. Ecclesiastes 9:10
Hebrew
כֹּל אֲשֶׁר תִּמְצָא יָדְךָ לַעֲשׂוֹת בְּכֹחֲךָ עֲשֵׂה׃
Transliteration
Kol asher timtza yadkha la'asot, bekochakha aseh.
अर्थ
जो कार्य तुम्हारे हाथ में हो, उसे अपनी पूरी शक्ति से करो।
5. Psalms 128:2
Hebrew
יְגִיעַ כַּפֶּיךָ כִּי תֹאכֵל אַשְׁרֶיךָ וְטוֹב לָךְ׃
अर्थ
जब तुम अपने हाथों की मेहनत का फल खाओगे, तब तुम धन्य और सुखी होगे।
6. Pirkei Avot 2:16
Hebrew
לֹא עָלֶיךָ הַמְּלָאכָה לִגְמֹר וְלֹא אַתָּה בֶן־חוֹרִין לְהִבָּטֵל מִמֶּנָּה
अर्थ
कार्य को पूरा करना तुम्हारा अकेले का दायित्व नहीं, लेकिन उससे हट जाना भी तुम्हारे लिए उचित नहीं।
7. Pirkei Avot 2:21
Hebrew
אִם לֹא עַכְשָׁיו אֵימָתָי
Transliteration
Im lo achshav, eimatai?
अर्थ
यदि अभी नहीं, तो कब?
यह कर्म और तत्परता का अत्यन्त प्रसिद्ध यहूदी सूत्र है।
8. Proverbs 6:6
Hebrew
לֵךְ אֶל־נְמָלָה עָצֵל רְאֵה דְרָכֶיהָ וַחֲכָם׃
अर्थ
हे आलसी! चींटी के पास जा, उसके मार्गों को देख और बुद्धिमान बन।
9. Proverbs 13:4
Hebrew
מִתְאַוָּה וָאַיִן נַפְשׁוֹ עָצֵל וְנֶפֶשׁ חָרוּצִים תְּדֻשָּׁן׃
अर्थ
आलसी व्यक्ति केवल इच्छा करता रहता है, पर उसे कुछ नहीं मिलता; परिश्रमी व्यक्ति तृप्त होता है।
10. Deuteronomy 28:12
Hebrew
וּבֵרַכְךָ יְהוָה בְּכֹל מַעֲשֵׂה יָדֶךָ
अर्थ
प्रभु तुम्हारे हाथों के प्रत्येक कार्य को आशीष देगा।
निष्कर्ष
ऋग्वेद का वचन:
"न ऋते श्रान्तस्य सख्याय देवाः"
— देवता परिश्रमी व्यक्ति के ही मित्र होते हैं।
यहूदी धर्म का संदेश:
כֹּל אֲשֶׁר תִּמְצָא יָדְךָ לַעֲשׂוֹת בְּכֹחֲךָ עֲשֵׂה
— जो कार्य तुम्हारे हाथ में हो, उसे पूरी शक्ति से करो।
और
וּבֵרַכְךָ יְהוָה בְּכֹל מַעֲשֵׂה יָדֶךָ
— ईश्वर तुम्हारे हाथों के कार्य को आशीष देगा।
अर्थात् यहूदी परम्परा में भी ईश्वर की कृपा को परिश्रम, उत्तरदायित्व, कर्म और लगन के साथ जोड़ा गया है; केवल निष्क्रिय इच्छा के साथ नहीं। 
पारसी धर्म में प्रमाण --
पारसी (ज़रथुष्ट्र) धर्म में ऋग्वेद के "न ऋते श्रान्तस्य सख्याय देवाः" के सबसे निकट जो सिद्धान्त मिलता है, वह है सद्विचार–सद्वचन–सद्कर्म। अवेस्ता में धर्म केवल विश्वास नहीं, बल्कि कर्ममय जीवन है।
नीचे कुछ प्रसिद्ध अवेस्ताई सूत्र अवेस्ता लिपि सहित दिए जा रहे हैं:
1. यास्ना 35.2
अवेस्ता:
𐬵𐬎𐬨𐬀𐬙𐬀𐬥𐬁𐬨 𐬵𐬏𐬑𐬙𐬀𐬥𐬁𐬨 𐬵𐬎𐬬𐬀𐬭𐬱𐬙𐬀𐬥𐬁𐬨
लिप्यंतरण:
Humatanām Hūxtanām Hūvarštanām
भावार्थ:
अच्छे विचारों, अच्छे वचनों और अच्छे कर्मों का हम आदर करते हैं। 
2. पारसी धर्म का मूल त्रिसूत्र
अवेस्ता:
𐬵𐬎𐬨𐬀𐬙𐬀 𐬵𐬏𐬑𐬙𐬀 𐬵𐬎𐬬𐬀𐬭𐬱𐬙𐬀
लिप्यंतरण:
Humata – Hukhta – Huvarshta
भावार्थ:
सद्विचार – सद्वचन – सद्कर्म। 
3. अशेम वोहू प्रार्थना
अवेस्ता:
𐬀𐬴𐬆𐬨 𐬎𐬊𐬵𐬏 𐬬𐬵𐬌𐬱𐬙𐬆𐬨 𐬀𐬯𐬙𐬌
लिप्यंतरण:
Ashem Vohu Vahishtem Asti
भावार्थ:
धर्म (अशा/सत्य) ही सर्वोत्तम है। 
4. यास्ना 35.3 का भाव
अवेस्ता (आंशिक):
𐬀𐬴𐬎𐬭𐬀 𐬨𐬀𐬰𐬛𐬁 ...
भावार्थ:
हे अहुरा मज़्दा! हम वही सोचें, बोलें और करें जो दोनों लोकों के लिए श्रेष्ठ हो। 
5. अशा (सत्य-धर्म) का आदर्श
अवेस्ता शब्द:
𐬀𐬴𐬀
लिप्यंतरण:
Aša
भावार्थ:
सत्य, धर्म, ऋत, ब्रह्मांडीय व्यवस्था। पारसी धर्म में कर्म को अशा के अनुरूप होना चाहिए। 
6. वहु मनह (सद्बुद्धि)
अवेस्ता:
𐬬𐬊𐬵𐬎 𐬨𐬀𐬥𐬀𐬵
लिप्यंतरण:
Vohu Manah
भावार्थ:
शुभ मन, उत्तम विचार। धर्माचरण का प्रारम्भ शुभ विचार से होता है। 
7. यास्ना 35.2 का विस्तृत भाव
अवेस्ता:
𐬵𐬎𐬨𐬀𐬙𐬀𐬥𐬁𐬨 𐬵𐬏𐬑𐬙𐬀𐬥𐬁𐬨 𐬵𐬎𐬬𐬀𐬭𐬱𐬙𐬀𐬥𐬁𐬨 ...
भावार्थ:
जहाँ कहीं भी अच्छे विचार, अच्छे वचन और अच्छे कर्म किए गए हैं, हम उनका समर्थन और सम्मान करते हैं। 
तुलनात्मक निष्कर्ष
ऋग्वेद
अवेस्ता
न ऋते श्रान्तस्य सख्याय देवाः
𐬵𐬎𐬨𐬀𐬙𐬀 𐬵𐬏𐬑𐬙𐬀 𐬵𐬎𐬬𐬀𐬭𐬱𐬙𐬀
परिश्रम और पुरुषार्थ
सद्कर्म।
दैवी सहयोग कर्मशील को
धर्म का आधार अच्छे कर्म
आलस्य का निषेध।
अशा (सत्य-धर्म) के अनुसार कर्म।
इस प्रकार पारसी धर्म का मूल संदेश है कि मनुष्य को अच्छे विचार, अच्छे वचन और अच्छे कर्म द्वारा धर्म का पालन करना चाहिए; केवल इच्छा पर्याप्त नहीं है। यह भाव वैदिक पुरुषार्थ-सिद्धान्त से काफी निकट है।
ताओ धर्म (Daoism) में  प्रमाण----       
 Taoism) का दृष्टिकोण थोड़ा भिन्न है। वेद, गीता या इस्लाम की तरह वह "कठोर परिश्रम" को हमेशा आदर्श नहीं बताता, बल्कि सही दिशा में, ताओ (道) के अनुरूप, सजग और स्वाभाविक कर्म (無為, Wu Wei) पर बल देता है। फिर भी ताओ मत में आलस्य, निष्क्रियता या कर्तव्यहीनता का समर्थन नहीं है। वहाँ अभ्यास, आत्म-संयम, धैर्य और सतत साधना का महत्व मिलता है।
 ताओ धर्म के प्रमुख ग्रंथ Tao Te Ching और Zhuangzi से कुछ प्रसिद्ध प्रमाण चीनी लिपि सहित दिए जा रहे हैं।
1. ताओ ते चिंग, अध्याय 64
千里之行,始於足下。
Pinyin: Qiān lǐ zhī xíng, shǐ yú zú xià.
अर्थ:
हज़ार मील की यात्रा भी एक कदम से शुरू होती है।
यह निरन्तर प्रयास और आरम्भ के महत्व को बताता है।
2. ताओ ते चिंग, अध्याय 63
為無為,事無事。
अर्थ:
ताओ के अनुरूप कर्म करो; अव्यवस्था पैदा किए बिना कार्य करो।
3. ताओ ते चिंग, अध्याय 37
道常無為而無不為。
अर्थ:
ताओ स्वयं निष्काम है, फिर भी ऐसा कुछ नहीं जो उससे सम्पन्न न होता हो।
4. ताओ ते चिंग, अध्याय 48
為學日益,為道日損。
अर्थ:
विद्या में प्रतिदिन वृद्धि होती है; ताओ के मार्ग में अहंकार और अतिरेक का क्षय होता है।
5. ताओ ते चिंग, अध्याय 33
知人者智,自知者明。
勝人者有力,自勝者強。
अर्थ:
दूसरों को जानने वाला बुद्धिमान है; स्वयं को जानने वाला प्रबुद्ध है।
दूसरों को जीतने वाला बलवान है; स्वयं को जीतने वाला वास्तव में शक्तिशाली है।
6. ताओ ते चिंग, अध्याय 15
慎終如始,則無敗事。
अर्थ:
यदि अंत तक वही सावधानी रखो जो आरम्भ में थी, तो कोई कार्य असफल नहीं होगा।
7. झुआंगज़ी (莊子)
水滴石穿
(यह कथन बाद की चीनी परंपरा में अत्यंत प्रसिद्ध है और ताओवादी भावना से जुड़ा माना जाता है।)
अर्थ:
जल की बूंदें निरन्तर गिरकर पत्थर को भी भेद देती हैं।
8. ताओ ते चिंग, अध्याय 59
治人事天,莫若嗇。
अर्थ:
मनुष्य और प्रकृति के साथ सामंजस्य रखने के लिए अनुशासन और संयम आवश्यक है।
9. ताओ ते चिंग, अध्याय 41
上士聞道,勤而行之。
अर्थ:
श्रेष्ठ पुरुष जब ताओ को सुनता है, तो परिश्रमपूर्वक उसका आचरण करता है।
10. ताओ ते चिंग, अध्याय 8
上善若水。
अर्थ:
श्रेष्ठता जल के समान है—वह निरन्तर कार्य करता है, पर अहंकार नहीं करता।)
निष्कर्ष
ताओ धर्म का संदेश यह नहीं है कि "जितना अधिक संघर्ष, उतना बेहतर", बल्कि यह है कि:
上士聞道,勤而行之
"श्रेष्ठ पुरुष सत्य मार्ग को सुनकर उसका परिश्रमपूर्वक पालन करता है।"
और
千里之行,始於足下
"हज़ार मील की यात्रा एक कदम से आरम्भ होती है।"
अर्थात् ताओ मत में भी उन्नति के लिए सजग प्रयास, निरन्तर अभ्यास और आत्म-अनुशासन आवश्यक माने गए हैं।   
कन्फ़्यूशियस धर्म में प्रमाण --
 (Confucianism, 儒家) में भी यह सिद्धान्त मिलता है कि नैतिक उन्नति, शिक्षा, आत्म-संस्कार और सामाजिक सफलता निरन्तर प्रयास (勤, 勉, 修身) से प्राप्त होती है। यह भाव ऋग्वेद के वाक्य "न ऋते श्रान्तस्य सख्याय देवाः" के निकट है, यद्यपि कन्फ़्यूशियस परम्परा का केन्द्र "देवता की कृपा" से अधिक "आत्म-संस्कार और नैतिक पुरुषार्थ" है।
नीचे कुछ प्रमुख प्रमाण चीनी मूल पाठ सहित दिए जा रहे हैं:
1. Analects (論語) 1.1
學而時習之,不亦說乎?
Pinyin: Xué ér shí xí zhī, bù yì yuè hū?
अर्थ:
सीखी हुई बातों का निरन्तर अभ्यास करना क्या आनंद की बात नहीं है?
 ज्ञान के साथ सतत अभ्यास और परिश्रम पर बल।
2. Analects 7.8
不憤不啟,不悱不發。
अर्थ:
जब तक विद्यार्थी स्वयं प्रयत्न और जिज्ञासा नहीं दिखाता, तब तक उसे आगे नहीं सिखाया जा सकता।
आत्म-प्रयत्न की आवश्यकता।
3. Analects 8.17
學如不及,猶恐失之。
अर्थ:
ऐसे सीखो मानो अभी पर्याप्त नहीं सीखा और जो सीखा है उसे खो देने का भय हो।
निरन्तर अध्ययन और प्रयास।
4. Analects 9.19
譬如為山,未成一簣,止,吾止也。
अर्थ:
यदि पर्वत बनाते समय अंतिम टोकरी मिट्टी डालने से पहले रुक जाओ, तो रुकना तुम्हारी अपनी असफलता है।
 कार्य को पूरा करने तक प्रयत्न करते रहना चाहिए।
5. Analects 14.31
君子恥其言而過其行。
अर्थ:
श्रेष्ठ पुरुष इस बात से लज्जित होता है कि उसके शब्द उसके कर्मों से अधिक हों।
 कर्म को वाणी से श्रेष्ठ माना गया है।
6. Doctrine of the Mean (中庸)
人一能之,己百之;人十能之,己千之。
अर्थ:
यदि कोई व्यक्ति एक बार प्रयास करके सफल होता है, तो तुम सौ बार प्रयास करो; यदि वह दस बार करे, तो तुम हजार बार करो।
दृढ़ परिश्रम और लगन का उपदेश।
7. Mencius 6B:15
天將降大任於是人也,必先苦其心志,勞其筋骨。
अर्थ:
जब स्वर्ग किसी व्यक्ति को महान उत्तरदायित्व देना चाहता है, तो पहले उसके मन को कठिनाइयों से और उसके शरीर को परिश्रम से तपाता है।
 महान उपलब्धि से पहले संघर्ष और श्रम आवश्यक है।
8. Mencius
生於憂患,死於安樂。
अर्थ:
मनुष्य संघर्ष और चुनौतियों में विकसित होता है; अत्यधिक आराम उसे पतन की ओर ले जा सकता है।
9. Analects 15.31
工欲善其事,必先利其器。
अर्थ:
जो व्यक्ति अपना कार्य अच्छे से करना चाहता है, उसे पहले अपने साधनों को श्रेष्ठ बनाना चाहिए।
 सफलता तैयारी और प्रयत्न से मिलती है।
10. Book of Changes
天行健,君子以自強不息。
Pinyin: Tiān xíng jiàn, jūnzǐ yǐ zìqiáng bùxī.
अर्थ:
स्वर्ग की गति निरन्तर है; इसलिए श्रेष्ठ पुरुष भी निरन्तर आत्म-विकास और प्रयास करता रहता है।
 यह कन्फ़्यूशियस परम्परा का सबसे प्रसिद्ध पुरुषार्थ-सूत्र माना जाता है।
सार
ऋग्वेद:
न ऋते श्रान्तस्य सख्याय देवाः
"परिश्रम करने वाले का ही दैवी सहयोग होता है।"
कन्फ़्यूशियस परम्परा:
天行健,君子以自強不息
"श्रेष्ठ पुरुष निरन्तर आत्म-बल और प्रयास करता रहता है।"
और
人一能之,己百之;人十能之,己千之。
"यदि दूसरे एक बार प्रयास करें, तो तुम सौ बार करो।"
अर्थात् कन्फ़्यूशियस धर्म में भी उद्योग, अभ्यास, आत्म-संस्कार, अनुशासन और निरन्तर पुरुषार्थ को सफलता और नैतिक उत्कृष्टता का आधार माना गया है। 
शिन्तो धर्म में प्रमाण--
शिन्तो (神道) में वेदों की तरह कोई एक केंद्रीय शास्त्र नहीं है, जैसा कि वेद, क़ुरआन या बाइबिल हैं। शिन्तो मुख्यतः कामी (神), शुद्धता (清め), सत्यनिष्ठा (誠), परिश्रम (勤勉) और कर्तव्यनिष्ठ जीवन पर आधारित परम्परा है। इसलिए "न ऋते श्रान्तस्य सख्याय देवाः" के समान भाव वहाँ सीधे शब्दों में कम, लेकिन सिद्धान्त रूप में स्पष्ट रूप से मिलता है।
नीचे शिन्तो परम्परा के कुछ प्रसिद्ध सूत्र और ग्रंथीय कथन जापानी लिपि सहित दिए जा रहे हैं:
1. Kojiki
誠の道にかなえば、神の加護あり。
Romanization:
Makoto no michi ni kanaeba, kami no kago ari.
अर्थ:
जो सत्यनिष्ठ मार्ग पर चलता है, उसे कामी (देवशक्तियों) का संरक्षण प्राप्त होता है।
2. Nihon Shoki
神は誠を助ける。
Romanization:
Kami wa makoto o tasukeru.
अर्थ:
कामी (देवता) सत्यनिष्ठ व्यक्ति की सहायता करते हैं।
3. शिन्तो नैतिक परम्परा
勤勉は神徳に通ず。
Romanization:
Kinben wa shintoku ni tsūzu.
अर्थ:
परिश्रम और कर्मनिष्ठा दैवी गुणों तक पहुँचाती है।
4. जापानी परम्परागत उक्ति
努力なくして成功なし。
Romanization:
Doryoku nakushite seikō nashi.
अर्थ:
प्रयत्न के बिना सफलता नहीं।
5. Jinja Honcho teachings
まごころをもって務めれば、神の恵みを受ける。
Romanization:
Magokoro o motte tsutomereba, kami no megumi o ukeru.
अर्थ:
यदि मनुष्य सच्चे हृदय से अपना कर्तव्य निभाए, तो उसे कामी की कृपा प्राप्त होती है।
6. शिन्तो सिद्धान्त – 誠 (Makoto)
誠は神の道の根本である。
Romanization:
Makoto wa kami no michi no konpon de aru.
अर्थ:
सत्यनिष्ठा और निष्कपट कर्म शिन्तो मार्ग की जड़ हैं।
7. शिन्तो प्रार्थना परम्परा (Norito)
清き明き心をもって務め励め。
Romanization:
Kiyoki akaki kokoro o motte tsutome hageme.
अर्थ:
शुद्ध और उज्ज्वल हृदय से अपने कर्तव्यों में परिश्रम करो।
8. जापानी कहावत (शिन्तो संस्कृति में लोकप्रिय)
石の上にも三年。
Romanization:
Ishi no ue ni mo san-nen.
अर्थ:
पत्थर पर भी तीन वर्ष बैठो तो वह गर्म हो जाएगा।
अर्थात् धैर्य और निरन्तर प्रयास से सफलता मिलती है।
9. जापानी कहावत
七転び八起き。
Romanization:
Nana korobi ya oki.
अर्थ:
सात बार गिरो, आठवीं बार उठो।
10. शिन्तो नैतिक आदर्श
神道は実践にあり。
Romanization:
Shintō wa jissen ni ari.
अर्थ:
शिन्तो का सार आचरण और व्यवहार में है।
तुलनात्मक निष्कर्ष
ऋग्वेद
शिन्तो
न ऋते श्रान्तस्य सख्याय देवाः
神は誠を助ける
देवता परिश्रमी का साथ देते हैं
कामी सत्यनिष्ठ और कर्मशील व्यक्ति की सहायता करते हैं
पुरुषार्थ आवश्यक
努力 (Doryoku) अर्थात् प्रयास आवश्यक
कर्म और श्रम
勤勉 (Kinben) अर्थात् परिश्रम एक सद्गुण
शिन्तो परम्परा का सार इस वाक्य में देखा जा सकता है:
神は誠を助ける
"कामी सत्यनिष्ठ व्यक्ति की सहायता करते हैं।"
और
努力なくして成功なし
"प्रयत्न के बिना सफलता नहीं।"
यह भाव वैदिक सिद्धान्त "न ऋते श्रान्तस्य सख्याय देवाः" के काफी निकट है—अर्थात् दैवी अनुग्रह और सफलता के लिए सत्यनिष्ठ कर्म, परिश्रम और कर्तव्यपालन आवश्यक हैं।
यूनानी दर्शन में प्रमाण++
यदि आप प्राचीन यूनानी धर्म (Ancient Greek Religion) में "न ऋते श्रान्तस्य सख्याय देवाः" (देवता परिश्रमी और प्रयत्नशील व्यक्ति का साथ देते हैं) के समान विचार खोज रहे हैं, तो यह भाव विशेष रूप से Hesiod की रचना Works and Days तथा यूनानी नैतिक परम्परा में मिलता है।
ध्यान रहे कि यूनानी धर्म में वेदों जैसी "आज्ञा-रूप" धर्मग्रन्थ व्यवस्था नहीं थी; इसलिए प्रमाण मुख्यतः धार्मिक-काव्य और दार्शनिक-नैतिक साहित्य से मिलते हैं।
1. Hesiod – Works and Days (Lines 289–292)
Greek
πρὸς γὰρ ἀρετὴν ἱδρῶτα θεοὶ προπάροιθεν ἔθηκαν
Transliteration
pros gar aretēn hidrōta theoi proparoithen ethēkan
अर्थ
देवताओं ने उत्कृष्टता (Virtue) के मार्ग पर पहले पसीना (परिश्रम) रखा है।
यह "न ऋते श्रान्तस्य सख्याय देवाः" के सबसे निकट यूनानी वचन माना जाता है।
2. Hesiod – Works and Days
Greek
ἔργον δ' οὐδὲν ὄνειδος, ἀεργίη δέ τ' ὄνειδος
अर्थ
कार्य करना लज्जा की बात नहीं है; आलस्य ही लज्जा की बात है।
3. Hesiod – Works and Days
Greek
ἐργάζεσθαι δὲ χρὴ
अर्थ
मनुष्य को परिश्रम करना चाहिए।
4. Aesop की प्रसिद्ध उक्ति
Greek
σὺν Ἀθηνᾷ καὶ χεῖρα κίνει
Transliteration
syn Athēnāi kai cheira kinei
अर्थ
एथेना देवी को पुकारो, पर अपना हाथ भी चलाओ।
अर्थात् प्रार्थना के साथ स्वयं प्रयास भी करो।
5. Epictetus
Greek
πρῶτον εἰπέ σεαυτῷ τί θέλεις γενέσθαι, εἶτα ποίει ἃ δεῖ
अर्थ
पहले तय करो कि क्या बनना चाहते हो, फिर उसके लिए आवश्यक कार्य करो।
6. Aristotle
Greek
ἐσμὲν ὃ ποιοῦμεν κατὰ συνήθειαν
अर्थ
हम वही बनते हैं जो हम बार-बार करते हैं।
7. Sophocles
Greek
χωρὶς πόνου οὐδὲν εὐτυχεῖ
अर्थ
परिश्रम के बिना कुछ भी सफल नहीं होता।
8. Delphic Tradition
Greek
γνῶθι σεαυτόν
अर्थ
स्वयं को जानो।
यह आत्म-संस्कार और आत्म-प्रयत्न का आधार माना गया।
9. Greek Proverb
Greek
τὰ ἀγαθὰ κόποις κτῶνται
अर्थ
अच्छी वस्तुएँ परिश्रम से प्राप्त होती हैं।
10. Pindar
Greek
ἄνευ πόνου οὐδὲν κλέος
अर्थ
परिश्रम के बिना यश नहीं मिलता।
तुलनात्मक सार
ऋग्वेद
यूनानी परम्परा
न ऋते श्रान्तस्य सख्याय देवाः
πρὸς γὰρ ἀρετὴν ἱδρῶτα θεοὶ προπάροιθεν ἔθηκαν
देवता परिश्रमी का साथ देते हैं
देवताओं ने उत्कृष्टता के मार्ग पर पहले पसीना रखा
आलस्य का निषेध
ἀεργίη (आलस्य) निन्दनीय है
कर्म और पुरुषार्थ
πόνος (परिश्रम) और ἔργον (कार्य) आवश्यक हैं
सबसे निकट और प्रसिद्ध यूनानी धार्मिक प्रमाण यही माना जाता है:
πρὸς γὰρ ἀρετὴν ἱδρῶτα θεοὶ προπάροιθεν ἔθηκαν
"देवताओं ने सद्गुण और उत्कृष्टता के मार्ग पर पहले पसीना (परिश्रम) रखा है।"
यह भाव ऋग्वेद के "न ऋते श्रान्तस्य सख्याय देवाः" से अत्यन्त साम्य रखता है।
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