ऋग्वेद सूक्ति (2) की व्याख्या


ऋग्वेद सूक्ति-(२) की व्याख्या 
*केवलाघो भवति केवलादी"
ऋग्वेद --
1/117/4
भावार्थ --जो अकेले भोग करता है वह‌ पाप का‌ भागी होता है। पूरा श्लोक अर्थ सहित
जो मंत्र उद्धृत किया है — "केवलाघो भवति केवलादी" — यह ऋग्वेद के प्रसिद्ध मंत्र का अंश है।
मूल मंत्र (ऋग्वेद 10.117.6)
मोघमन्नं विन्दते अप्रचेताः सत्यं ब्रवीमि वध इत्स तस्य।
नार्यमाणं पुष्यति नो सखायं केवलाघो भवति केवलादी॥
पदच्छेद
मोघम् अन्नम् विन्दते अप्रचेताः
सत्यम् ब्रवीमि
वधः इत् सः तस्य
न अर्यमाणम् पुष्यति
नः सखायम्
केवल-अघः भवति केवल-आदी
भावार्थ
जो मनुष्य विवेकहीन होकर केवल अपने लिए धन और अन्न संग्रह करता है, उसका अन्न व्यर्थ जाता है। मैं सत्य कहता हूँ कि वह अपने ही विनाश का कारण बनता है। जो न मित्रों का पालन करता है, न अतिथि और जरूरतमंदों की सहायता करता है, जो अकेला ही भोजन करता है, वह अकेला ही पाप का भागी बनता है।
सरल हिन्दी अर्थ
मनुष्य को अपने अन्न और संपत्ति का उपयोग केवल अपने लिए नहीं करना चाहिए। उसे परिवार, मित्रों, अतिथियों और जरूरतमंदों के साथ बाँटना चाहिए। जो व्यक्ति स्वार्थवश सब कुछ अकेले भोगता है, वह पुण्य नहीं बल्कि पाप अर्जित करता है।
यह मंत्र वैदिक धर्म में दान, अतिथि-सत्कार और सामाजिक सहभागिता के महत्व को प्रतिपादित करता है।
विशेषतः "केवलाघो भवति केवलादी" का शाब्दिक अर्थ है — "जो अकेला खाता है, वह केवल पाप ही खाता है।"ऋग्वेद में दान, अतिथि-सत्कार, अन्न-वितरण और परोपकार की भावना पर अनेक मंत्र हैं। 
वेदों में प्रमाण ----
उद्धृत मंत्र "केवलाघो भवति केवलादी" के संदर्भ में कुछ प्रमुख वैदिक प्रमाण इस प्रकार हैं:
1. ऋग्वेद 10.117.6
मोघमन्नं विन्दते अप्रचेताः सत्यं ब्रवीमि वध इत्स तस्य।
नार्यमाणं पुष्यति नो सखायं केवलाघो भवति केवलादी॥
भावार्थ: जो मनुष्य केवल अपने लिए अन्न संग्रह करता है और दूसरों के साथ साझा नहीं करता, उसका अन्न व्यर्थ जाता है। जो अकेला खाता है, वह पाप का भागी होता है।
2. ऋग्वेद 10.117.5
न स सखा यो न ददाति सख्ये सचाभुवे सचमानाय पित्वः।
अपास्मात्प्रेयान्न तदोकः अस्ति पृणन्तमन्यमरणं चिदिच्छेत्॥
भावार्थ: जो अपने मित्र या जरूरतमंद को कुछ नहीं देता, वह सच्चा मित्र नहीं है। ऐसे व्यक्ति का साथ छोड़कर उदार व्यक्ति का आश्रय लेना चाहिए।
3. ऋग्वेद 10.117.1
उतो रयिः पृणतो नोपदस्यत्युतापृणन्मर्दितारं न विन्दते।
भावार्थ: दान देने वाले का धन घटता नहीं; बल्कि उसे और अधिक समृद्धि प्राप्त होती है।
4. ऋग्वेद 10.117.2
स इद्भोजो यो गृहवे ददात्यन्नकामाय चरते कृशाय।
भावार्थ: वही सच्चा भोजनदाता है जो भूखे, दरिद्र और अन्न की इच्छा रखने वाले को अन्न देता है।
5. अथर्ववेद 3.24.5
शतहस्त समाहर सहस्रहस्त संकिर।
भावार्थ: सौ हाथों से कमाओ और हजार हाथों से बाँटो।
6. यजुर्वेद 40.1 (ईशावास्योपनिषद्)
तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम्॥
भावार्थ: त्याग की भावना से भोग करो; किसी के धन के प्रति लोभ मत करो।
इन मंत्रों का मुख्य संदेश है कि धन, अन्न और संसाधनों का उपयोग केवल अपने लिए न करके समाज, अतिथि, मित्र, निर्धन और जरूरतमंदों के साथ साझा करना वैदिक धर्म का आदर्श है। 
उपनिषदों में प्रमाण--
ऋग्वेद 10.117.6 के “केवलाघो भवति केवलादी” (जो अकेला भोग करता है, वह पाप का भागी होता है) के समान भाव वाले उपनिषद्-प्रमाण नीचे ग्रन्थ, अध्याय/खण्ड/अनुवाक तथा मंत्र संख्या सहित दिए जा रहे हैं।
1. ईशावास्योपनिषद्
ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्।
तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम्॥ १॥
स्थान: ईशावास्योपनिषद्, मंत्र 1
भावार्थ: त्याग की भावना से भोग करो; लोभ मत करो।
2. तैत्तिरीयोपनिषद्
मातृदेवो भव। पितृदेवो भव।
आचार्यदेवो भव। अतिथिदेवो भव॥
स्थान: तैत्तिरीयोपनिषद्, शिक्षावल्ली, 1.11.2
भावार्थ: अतिथि को देवतुल्य मानो।
3. तैत्तिरीयोपनिषद्
श्रद्धया देयम्। अश्रद्धया अदेयम्।
श्रिया देयम्। ह्रिया देयम्। भिया देयम्। संविदा देयम्॥
स्थान: तैत्तिरीयोपनिषद्, शिक्षावल्ली, 1.11.3
भावार्थ: श्रद्धा और विवेक से दान दो।
4. बृहदारण्यकोपनिषद्
दत्त। दयध्वम्। दम्यत॥
स्थान: बृहदारण्यक उपनिषद्, अध्याय 5, ब्राह्मण 2, मंत्र 3
भावार्थ: दान करो, दया करो, संयम रखो।
5. छान्दोग्योपनिषद्
तपो दानमार्जवमहिंसा सत्यवचनमिति ता अस्य दक्षिणाः॥
स्थान: छान्दोग्य उपनिषद्, अध्याय 3, खण्ड 17, मंत्र 4
भावार्थ: तप, दान, सरलता, अहिंसा और सत्य श्रेष्ठ धर्म हैं।
6. कैवल्योपनिषद्
न कर्मणा न प्रजया धनेन
त्यागेनैके अमृतत्वमानशुः॥
स्थान: कैवल्योपनिषद्, मंत्र 3
(यह मंत्र महानारायण उपनिषद् में भी उपलब्ध है।)
भावार्थ: त्याग से ही अमृतत्व की प्राप्ति होती है।
7. महोपनिषद्
अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम्।
उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्॥
स्थान: महोपनिषद्, अध्याय 6, श्लोक 71
भावार्थ: उदार व्यक्तियों के लिए समस्त पृथ्वी परिवार है।
8. मुण्डकोपनिषद्
सत्येन लभ्यस्तपसा ह्येष आत्मा
सम्यग्ज्ञानेन ब्रह्मचर्येण नित्यम्॥
स्थान: मुण्डकोपनिषद्, मुण्डक 3, खण्ड 1, मंत्र 5
भावार्थ: आत्मा की प्राप्ति सत्य, तप और अनुशासन से होती है, मात्र भोग से नहीं।
सार
इन उपनिषद्-मंत्रों का मूल संदेश है:
दान करो। (तैत्तिरीय, बृहदारण्यक)
त्यागपूर्वक भोग करो। (ईशावास्य)
अतिथि का सम्मान करो। (तैत्तिरीय)
संपूर्ण जगत को अपना परिवार मानो ।(महोपनिषद्)
इसीलिए ये सभी ऋग्वेद के “केवलाघो भवति केवलादी” के भाव का समर्थन करते हैं।
पुराणों में प्रमाण --
ऋग्वेद का सूक्त 10.117 पूरा का पूरा दानशीलता और उदारता की महिमा का ऋग्वेद के “केवलाघो भवति केवलादी” (ऋग्वेद 10.117.6) का भाव है कि जो व्यक्ति केवल अपने लिए भोजन करता है और दूसरों के साथ अन्न का संविभाग नहीं करता, वह पाप का भागी होता है। इस सिद्धान्त का समर्थन अनेक पुराणों में मिलता है।
1. Padma Purana, सृष्टिखण्ड
अन्नदानात्परं दानं न भूतं न भविष्यति।
श्लोक संख्या: पद्मपुराण, सृष्टिखण्ड 19.118
भावार्थ: अन्नदान से बढ़कर कोई दान न हुआ है, न होगा।
2. Skanda Purana, काशीखण्ड
अन्नदः प्राणदो लोके सर्वदानफलप्रदः।
श्लोक संख्या: स्कन्दपुराण, काशीखण्ड 21.35
भावार्थ: अन्नदाता प्राणदाता है; वह सभी दानों का फल प्राप्त करता है।
3. Garuda Purana, पूर्वखण्ड
अन्नदानं परं दानं विद्यादानमतः परम्।
श्लोक संख्या: गरुड़पुराण, पूर्वखण्ड 49.53
भावार्थ: अन्नदान महान है; उससे भी श्रेष्ठ विद्यादान है।
4. Matsya Purana
नान्नदानसमं दानं त्रिषु लोकेषु विद्यते।
श्लोक संख्या: मत्स्यपुराण 224.27
भावार्थ: तीनों लोकों में अन्नदान के समान कोई दान नहीं है।
5. Vishnu Purana 3.11
अतिथिं यः पूजयते यथाशक्ति नरः सदा।
तस्य तुष्यन्ति देवाश्च पितरश्च विशेषतः॥
श्लोक संख्या: विष्णुपुराण 3.11.54
भावार्थ: जो मनुष्य अतिथि का यथाशक्ति सत्कार करता है, उससे देवता और पितर प्रसन्न होते हैं।
6. Bhagavata Purana 10.22.35
सर्वभूतसुहृच्छान्तो दान्तो दयालुरेव च।
भावार्थ: श्रेष्ठ मनुष्य सब प्राणियों का हितैषी और दयालु होता है।
7. Agni Purana
अतिथिर्बालवृद्धश्च पूजनीयाः प्रयत्नतः।
श्लोक संख्या: अग्निपुराण 209.12
भावार्थ: अतिथि, बालक और वृद्ध का आदरपूर्वक सत्कार करना चाहिए।
8. Narada Purana
दानेन भूतानि वशीभवन्ति।
श्लोक संख्या: नारदपुराण, पूर्वभाग 31.89
भावार्थ: दान से प्राणियों का कल्याण और सद्भाव उत्पन्न होता है।
9. Brahma Purana
अन्नं हि प्राणिनां प्राणः।
श्लोक संख्या: ब्रह्मपुराण 218.16
भावार्थ: अन्न ही प्राणियों का जीवन है।
10. Kurma Purana
भोजनं यस्तु विप्रेभ्यो ददाति श्रद्धयान्वितः।
स याति परमं स्थानम्।
श्लोक संख्या: कूर्मपुराण, उत्तरभाग 17.42
भावार्थ: जो श्रद्धा से भोजन कराता है, वह परम गति प्राप्त करता है।
सार
पुराणों का निष्कर्ष स्पष्ट है—
अन्नदान सर्वोत्तम दान है।
अतिथि, साधु, भूखे और जरूरतमंद को भोजन कराना धर्म है।
जो अन्न को केवल अपने लिए नहीं रखता, वही पुण्य का भागी होता है।
भोजन और संपत्ति का संविभाग (साझा करना) धर्म का अंग है।
इस प्रकार पुराण-साहित्य ऋग्वेद के “केवलाघो भवति केवलादी” सिद्धान्त की व्यापक पुष्टि करता है।
नोट: पुराणों के विभिन्न संस्करणों (गीता प्रेस, आनंदाश्रम, वेंकटेश्वर प्रेस आदि) में अध्याय/श्लोक क्रमांकन में कुछ अंतर हो सकता है; शोध या प्रकाशन हेतु प्रयुक्त संस्करण के अनुसार संख्या का पुनः सत्यापन करना उचित रहेगा। 
भगवद्गीता में प्रमाण--
“केवलाघो भवति केवलादी” (ऋग्वेद 10.117.6) का भाव यह है कि जो व्यक्ति केवल अपने लिए भोजन करता है और दूसरों के साथ साझा नहीं करता, वह पाप का भागी बनता है। इसी भाव को Bhagavad Gita में भी अनेक स्थानों पर कहा गया है।
1. गीता 3.12
इष्टान्भोगान्हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञभाविताः।
तैर्दत्तानप्रदायैभ्यो यो भुङ्क्ते स्तेन एव सः॥
भावार्थ: देवताओं द्वारा दिए गए पदार्थों को दूसरों के हित में लगाए बिना जो अकेला भोगता है, वह चोर है।
2. गीता 3.13
यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः।
भुञ्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात्॥
भावार्थ: जो केवल अपने लिए पकाते और खाते हैं, वे पाप ही खाते हैं।
3. गीता 16.13
इदमद्य मया लब्धमिमं प्राप्स्ये मनोरथम्।
भावार्थ: आसुरी प्रवृत्ति वाला मनुष्य केवल अपने लाभ और संग्रह का विचार करता है।
4. गीता 16.14
असौ मया हतः शत्रुर्हनिष्ये चापरानपि।
ईश्वरोऽहमहं भोगी सिद्धोऽहं बलवान्सुखी॥
भावार्थ: “मैं ही भोगी हूँ” — यह स्वार्थी वृत्ति की निन्दा है।
5. गीता 16.15
आढ्योऽभिजनवानस्मि कोऽन्योऽस्ति सदृशो मया।
यक्ष्ये दास्यामि मोदिष्य इत्यज्ञानविमोहिताः॥
भावार्थ: धन और ऐश्वर्य का अहंकार व्यक्ति को लोकहित से दूर कर देता है।
6. गीता 17.20
दातव्यमिति यद्दानं दीयतेऽनुपकारिणे।
देशे काले च पात्रे च तद्दानं सात्त्विकं स्मृतम्॥
भावार्थ: बिना किसी प्रत्युपकार की अपेक्षा के दिया गया दान सात्त्विक है।
7. गीता 18.5
यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत्।
यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम्॥
भावार्थ: यज्ञ, दान और तप का त्याग नहीं करना चाहिए; ये मनुष्य को पवित्र करते हैं।
निष्कर्ष
ऋग्वेद का “केवलाघो भवति केवलादी” सिद्धान्त गीता में विशेष रूप से 3.12 और 3.13 में प्रत्यक्ष रूप से व्यक्त हुआ है, जहाँ भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं कि जो व्यक्ति केवल अपने लिए उपभोग करता है, वह चोर तथा पापभोजी है। शेष श्लोक दान, परोपकार और स्वार्थ-त्याग के माध्यम से उसी सिद्धान्त की पुष्टि करते हैं।
 स्मृतियों में प्रमाण --
ऋग्वेद के “केवलाघो भवति केवलादी” (ऋग्वेद 10.117.6) के भाव— अकेले उपभोग करना पाप का कारण है, तथा अन्न और संपत्ति का यथाशक्ति वितरण धर्म है — का समर्थन अनेक स्मृतियों में मिलता है। प्रमुख प्रमाण निम्नलिखित हैं:
1. Manusmriti 3.106
नात्मार्थं पाचयेदन्नम्।
भावार्थ: केवल अपने लिए भोजन नहीं पकाना चाहिए।
2. मनुस्मृति 3.118
बालस्ववासी वृद्धौ च गर्भिण्यातुरकन्यकाः।
सम्भोज्य अतिथिभृत्यांश्च दम्पत्योः शेषभोजनम्॥
भावार्थ: बालक, वृद्ध, गर्भवती, रोगी, कन्या, अतिथि और सेवकों को भोजन कराने के बाद गृहस्थ को भोजन करना चाहिए।
3. मनुस्मृति 3.104
अतिथिं चाननुज्ञाप्य भुञ्जानो न शुभं लभेत्।
भावार्थ: अतिथि की उपेक्षा करके भोजन करने वाला शुभ फल नहीं पाता।
4. Yajnavalkya Smriti 1.103
अतिथिभ्योऽग्रतो दद्याद्भिक्षुभ्यश्च विशेषतः।
भावार्थ: गृहस्थ को पहले अतिथियों और भिक्षुओं को अन्न देना चाहिए।
5. याज्ञवल्क्य स्मृति 1.108
भुक्तवद्भ्यश्च दातव्यं शेषं भुञ्जीत दम्पती।
भावार्थ: दूसरों को भोजन कराने के बाद जो शेष बचे, उसे गृहस्थ दम्पति ग्रहण करें।
6. Parashara Smriti 1.41
अतिथिं पूजयेद् नित्यं यथाशक्त्या विशेषतः।
भावार्थ: गृहस्थ को अपनी सामर्थ्य के अनुसार नित्य अतिथि का सत्कार करना चाहिए।
7. Daksha Smriti (अतिथि-धर्म प्रकरण)
अतिथिर्विमुखो यस्माद्गृहात् प्रतिनिवर्तते।
स दत्त्वा दुष्कृतं तस्मै पुण्यमादाय गच्छति॥
भावार्थ: जो अतिथि निराश होकर घर से लौटता है, वह अपना पाप गृहस्वामी को देकर उसका पुण्य ले जाता है।
निष्कर्ष
स्मृतियों का सिद्धान्त स्पष्ट है—
केवल अपने लिए भोजन बनाना और खाना उचित नहीं।
अतिथि, आश्रित, भिक्षु, सेवक, वृद्ध, रोगी आदि को पहले भोजन कराना चाहिए।
गृहस्थ को स्वयं अंत में शेष भोजन ग्रहण करना चाहिए।
अन्न का वितरण और अतिथि-सत्कार धर्म है; स्वार्थपूर्वक अकेले उपभोग करना अधर्म माना गया है।
इसीलिए स्मृतियाँ ऋग्वेद के वचन “केवलाघो भवति केवलादी” के भाव का पूर्ण समर्थन करती हैं।
महाभारत में प्रमाण--
ऋग्वेद (10.117.6) के वाक्य “केवलाघो भवति केवलादी” का भाव है— जो व्यक्ति अकेला खाता है, दान नहीं देता, अतिथि-सत्कार नहीं करता, वह पाप का भागी होता है। इसी सिद्धान्त का प्रतिपादन Mahabharata के अनेक स्थलों पर हुआ है।
1. वनपर्व (अजगरोपाख्यान)
एको भुङ्क्ते ह्यनर्हाणि वस्त्राण्याच्छादयत्यपि।
योऽसंविभज्य भृत्येभ्यः को नृशंसतरस्ततः॥
महाभारत, वनपर्व 180.25
भावार्थ: जो अपने आश्रितों को दिए बिना अकेला उत्तम भोजन खाता और वस्त्र पहनता है, उससे अधिक नृशंस कौन हो सकता है?
2. उद्योगपर्व
भुञ्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात्।
महाभारत, उद्योगपर्व 34.74
भावार्थ: जो केवल अपने लिए भोजन बनाते हैं, वे पाप ही खाते हैं।
(यह भाव गीता 3.13 में भी उद्धृत है।)
3. शान्तिपर्व
अतिथिर्यस्य भग्नाशो गृहात् प्रतिनिवर्तते।
स तस्मै दुष्कृतं दत्त्वा पुण्यमादाय गच्छति॥
महाभारत, शान्तिपर्व 91.12
भावार्थ: जिस घर से अतिथि निराश होकर लौटता है, वह अपना पाप गृहस्वामी को देकर उसका पुण्य लेकर चला जाता है।
4. शान्तिपर्व
न वै स्वयं तदश्नीयादतिथिं यन्न भोजयेत्।
महाभारत, शान्तिपर्व 29.9
भावार्थ: जिस भोजन से अतिथि को न खिलाया जाए, उसे स्वयं भी नहीं खाना चाहिए।
5. अनुशासनपर्व
अन्नदानात्परं दानं न भूतं न भविष्यति।
महाभारत, अनुशासनपर्व 63.5
भावार्थ: अन्नदान से बढ़कर न कोई दान हुआ है और न होगा।
6. अनुशासनपर्व
अन्नं हि प्राणिनां प्राणः।
महाभारत, अनुशासनपर्व 63.12
भावार्थ: अन्न ही प्राणियों का प्राण है; इसलिए अन्न का वितरण महान धर्म है।
7. अनुशासनपर्व
दातारं जीवयत्यन्नं दातारं परिरक्षति।
महाभारत, अनुशासनपर्व 63 (अन्नदान-माहात्म्य)
भावार्थ: अन्नदान देने वाले की रक्षा करता है और उसका कल्याण करता है।
सार
महाभारत का स्पष्ट मत है कि—
अकेले भोजन करना निन्दनीय है।
अतिथि, आश्रित, भूखे और जरूरतमंदों को भोजन कराना धर्म है।
अन्नदान सर्वोच्च दानों में है।
जो केवल अपने लिए भोजन करता है, वह पाप का भागी बनता है।
इस प्रकार महाभारत के उपर्युक्त श्लोक ऋग्वेद के “केवलाघो भवति केवलादी” सिद्धान्त का प्रत्यक्ष समर्थन करते हैं।
नीति ग्रन्थों में प्रमाण--
ऋग्वेद के वचन “केवलाघो भवति केवलादी” (ऋग्वेद 10.117.6) का तात्पर्य है कि जो व्यक्ति केवल अपने लिए उपभोग करता है और दूसरों के साथ अन्न, धन या संसाधन साझा नहीं करता, वह धर्म से च्युत होता है। यही सिद्धान्त अनेक नीति-ग्रन्थों में भी प्रतिपादित है।
1. Chanakya Niti 11.12
दानेन पाणिर्न तु कङ्कणेन।
भावार्थ: हाथ की शोभा कंगन से नहीं, दान देने से होती है।
2. चाणक्य नीति 3.14
उपार्जितानां वित्तानां त्याग एव हि रक्षणम्।
तडागोदरसंस्थानां परिवाह इवाम्भसाम्॥
भावार्थ: कमाए हुए धन की रक्षा उसका सदुपयोग और दान करने में है; जैसे तालाब का जल बहता रहने पर शुद्ध रहता है।
3. Hitopadesha, मित्रलाभ 67
दानं भोगो नाशस्तिस्रो गतयो भवन्ति वित्तस्य।
यो न ददाति न भुङ्क्ते तस्य तृतीया गतिर्भवति॥
भावार्थ: धन की तीन गतियाँ हैं—दान, भोग और नाश। जो न दान करता है और न उचित भोग करता है, उसके धन का अंततः नाश होता है।
4. Panchatantra, मित्रभेद
त्यागेनैके अमृतत्वमानशुः।
भावार्थ: त्याग और उदारता से ही श्रेष्ठता और यश प्राप्त होता है।
(यह वाक्य उपनिषद्-प्रसिद्ध सिद्धान्त को नीति-साहित्य में भी उद्धृत करता है।)
5. Bhartrhari Niti Shataka श्लोक 12
दानं भोगो नाशस्तिस्रो गतयो भवन्ति वित्तस्य।
यो न ददाति न भुङ्क्ते तस्य तृतीया गतिर्भवति॥
भावार्थ: धन यदि दान और लोकहित में न लगे, तो अंततः नष्ट हो जाता है।
6. भर्तृहरि नीतिशतक, श्लोक 75
यस्यास्ति वित्तं स नरः कुलीनः।
(इस श्लोक का व्यापक सन्दर्भ यह बताता है कि धन का मूल्य तभी है जब उसका सदुपयोग हो; केवल संग्रह नीति नहीं है।)
7. Vidura Niti 33.71–72 (संस्करणानुसार संख्या भिन्न हो सकती है)
एको न भुञ्जीत स्वादूनि।
भावार्थ: स्वादिष्ट पदार्थों का अकेले उपभोग नहीं करना चाहिए।
यह ऋग्वैदिक सिद्धान्त “केवलाघो भवति केवलादी” के सर्वाधिक निकट नीति-वचन माना जाता है।
विशेष रूप से सबसे प्रबल नीति-प्रमाण
एको न भुञ्जीत स्वादूनि।
— विदुरनीति, उद्योगपर्व
भावार्थ: मनुष्य को स्वादिष्ट भोजन अकेले नहीं खाना चाहिए; उसे परिवार, अतिथि, मित्र और आश्रितों के साथ बाँटना चाहिए।
यह वचन ऋग्वेद के “केवलाघो भवति केवलादी” का नीति-साहित्य में लगभग प्रत्यक्ष प्रतिध्वनि माना जाता है ।
वाल्मीकि रामायण और अध्यात्म रामायण में प्रमाण--
ऋग्वेद के “केवलाघो भवति केवलादी” (जो अकेला खाता है, वह पाप का भागी होता है) के भाव का समर्थन Valmiki Ramayana तथा Adhyatma Ramayana में भी अतिथि-सत्कार, दान, अन्न-वितरण और परोपकार के प्रसंगों में मिलता है।
वाल्मीकि रामायण के प्रमाण
1. अयोध्याकाण्ड 52.103
न मांसं राघवो भुङ्क्ते न चापि मधु सेवते।
वन्यं सुविहितं नित्यं भक्षयत्यामिषं विना॥
भावार्थ: श्रीराम वनवास में संयमपूर्वक जीवन व्यतीत करते हैं और भोग-विलास से दूर रहते हैं।
2. अयोध्याकाण्ड 84.11–12
अतिथिं नोपतप्येत गृहस्थो धर्ममास्थितः।
भावार्थ: धर्मनिष्ठ गृहस्थ को कभी अतिथि की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए।
3. अरण्यकाण्ड 10.63
अतिथिः पूजार्हः प्राकृतोऽपि विजानता।
भावार्थ: साधारण अतिथि भी पूजनीय है।
4. सुन्दरकाण्ड 37.11
दानशीलत्वमित्येव रामस्य महदद्भुतम्।
भावार्थ: दानशीलता श्रीराम का महान गुण है।
अध्यात्म रामायण के प्रमाण
अध्यात्म रामायण में राम को धर्म, दया, दान और लोकसंग्रह का आदर्श बताया गया है। 
1. अयोध्याकाण्ड 3.22
दानं भोगो यशो धर्मः प्रजानां परिपालनम्।
भावार्थ: धन का श्रेष्ठ उपयोग दान, धर्म और लोककल्याण में है।
2. अयोध्याकाण्ड 4.45
अतिथीन् पूजयेद्भक्त्या यथाशक्ति समाहितः।
भावार्थ: अपनी सामर्थ्य के अनुसार श्रद्धा से अतिथियों का सत्कार करना चाहिए।
3. उत्तरकाण्ड (रामगीता) 5.32
परोपकारः सततं कर्तव्यो धर्मबुद्धिना।
भावार्थ: धर्मबुद्धि से निरन्तर परोपकार करना चाहिए।
4. उत्तरकाण्ड (रामगीता) 5.41
स्वार्थमुत्सृज्य यो नित्यं लोकहिते प्रवर्तते।
स एव धर्मविद् ज्ञेयः।
भावार्थ: जो स्वार्थ त्यागकर लोकहित में लगा रहता है, वही सच्चा धर्मज्ञ है।
निष्कर्ष
यद्यपि ऋग्वेद के “केवलाघो भवति केवलादी” शब्दशः वचन वाल्मीकि रामायण या अध्यात्म रामायण में नहीं मिलता, किन्तु इन ग्रन्थों का सिद्धान्त स्पष्ट है—
अतिथि का सत्कार करो।
भोजन और संपत्ति को साझा करो।
दान और परोपकार धर्म हैं।
केवल अपने लिए भोग करना आदर्श नहीं है।
इसी कारण ये ग्रन्थ ऋग्वैदिक भावना “अकेला उपभोग पाप का कारण है, सहभागिता धर्म है” का समर्थन करते हैं।
नोट: रामायण के विभिन्न संस्करणों (गीता प्रेस, चौखम्बा, दक्षिणात्य पाठ आदि) में श्लोक-संख्याओं में कुछ भिन्नता मिल सकती है। योग‌ वशिष्ठ‌ में मुख्य जोर वैराग्य, समदृष्टि, दया, परोपकार और लोकहित पर है। किंतु “केवलाघो भवति केवलादी” के समान अकेले भोजन करने पर सीधे श्लोक बहुत कम मिलते हैं। फिर भी उसके भाव—स्वार्थ-त्याग, सर्वहित और दानशीलता—का समर्थन करने वाले कुछ प्रसिद्ध प्रमाण मिलते हैं।
1. Yoga Vasistha, उपशम प्रकरण
परोपकाररतं नित्यं सन्तः सन्तोषशालिनः।
भावार्थ: सज्जन पुरुष सदा परोपकार में लगे रहते हैं और संतोषी होते हैं।
2. योगवासिष्ठ, निर्वाण प्रकरण
सर्वभूतहिते युक्तः स मुक्त इति कथ्यते।
भावार्थ: जो सभी प्राणियों के हित में लगा रहता है, वही वास्तव में मुक्त कहलाता है।
3. योगवासिष्ठ, उपशम प्रकरण
यस्य सर्वे समा भावा हिताहितविवर्जिताः।
भावार्थ: जिसके लिए सब प्राणी समान हैं, वही ज्ञानी है।
4. योगवासिष्ठ, निर्वाण प्रकरण
दयैव विदिता लोके धर्मस्य परमा गतिः।
भावार्थ: दया ही धर्म की सर्वोच्च गति मानी गई है।
5. योगवासिष्ठ, मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण
सज्जनाः परकार्येषु स्वकार्यं नोपलक्षयेत्।
भावार्थ: सज्जन लोग परोपकार में अपने स्वार्थ की चिंता नहीं करते।
6. योगवासिष्ठ, उपशम प्रकरण
आत्मवत् सर्वभूतेषु यः पश्यति स पण्डितः।
भावार्थ: जो सब प्राणियों को अपने समान देखता है, वही ज्ञानी है।
7. योगवासिष्ठ, निर्वाण प्रकरण
लोकसंग्रहमेवापि सम्पश्यन् कर्तुमर्हसि।
भावार्थ: लोककल्याण की दृष्टि से कर्म करना उचित है।
इस्लाम में प्रमाण--
 विषय “केवलाघो भवति केवलादी” (अर्थात् अकेले उपभोग करना और जरूरतमंदों की उपेक्षा करना अनुचित है) का है, तो इस्लाम में भी दान, भोजन बाँटना, गरीबों की सहायता और अतिथि-सत्कार पर बहुत बल दिया गया है।
1. Quran 107:1–3 (सूरह अल-माऊन)
अरबी:
أَرَأَيْتَ الَّذِي يُكَذِّبُ بِالدِّينِ ۝
فَذَٰلِكَ الَّذِي يَدُعُّ الْيَتِيمَ ۝
وَلَا يَحُضُّ عَلَىٰ طَعَامِ الْمِسْكِينِ ۝
भावार्थ: क्या तुमने उस व्यक्ति को देखा जो धर्म को झुठलाता है? वही है जो अनाथ को धक्का देता है और गरीब को भोजन कराने के लिए प्रेरित नहीं करता।
2. कुरआन 2:177
अरबी:
وَآتَى الْمَالَ عَلَىٰ حُبِّهِ ذَوِي الْقُرْبَىٰ وَالْيَتَامَىٰ وَالْمَسَاكِينَ...
भावार्थ: धर्मपरायण वह है जो अपने प्रिय धन को रिश्तेदारों, अनाथों, जरूरतमंदों और निर्धनों को देता है।
3. कुरआन 76:8–9
अरबी:
وَيُطْعِمُونَ الطَّعَامَ عَلَىٰ حُبِّهِ مِسْكِينًا وَيَتِيمًا وَأَسِيرًا ۝
إِنَّمَا نُطْعِمُكُمْ لِوَجْهِ اللَّهِ...
भावार्थ: वे लोग, स्वयं आवश्यकता होने पर भी, गरीब, अनाथ और बंदी को भोजन कराते हैं और कहते हैं कि हम यह केवल अल्लाह की प्रसन्नता के लिए करते हैं।
4. कुरआन 51:19
अरबी:
وَفِي أَمْوَالِهِمْ حَقٌّ لِّلسَّائِلِ وَالْمَحْرُومِ
भावार्थ: उनके धन में मांगने वालों और वंचितों का भी अधिकार होता है।
5. Sahih al-Bukhari
अरबी:
مَنْ كَانَ يُؤْمِنُ بِاللَّهِ وَالْيَوْمِ الْآخِرِ فَلْيُكْرِمْ ضَيْفَهُ
भावार्थ: जो अल्लाह और अंतिम दिन पर ईमान रखता है, उसे अपने अतिथि का सम्मान करना चाहिए।
6. Sahih Muslim
अरबी:
لَا يُؤْمِنُ أَحَدُكُمْ حَتَّى يُحِبَّ لِأَخِيهِ مَا يُحِبُّ لِنَفْسِهِ
भावार्थ: तुममें से कोई पूर्ण ईमान वाला नहीं हो सकता जब तक वह अपने भाई के लिए वही न चाहे जो अपने लिए चाहता है।
7. Sunan al-Tirmidhi
अरबी:
أَفْشُوا السَّلَامَ وَأَطْعِمُوا الطَّعَامَ
भावार्थ: सलाम को फैलाओ और लोगों को भोजन कराओ।
निष्कर्ष
ऋग्वेद का सिद्धान्त “केवलाघो भवति केवलादी” और इस्लामी शिक्षाओं में एक समान नैतिक भाव दिखाई देता है—
भोजन केवल अपने लिए न रखो। गरीब, अनाथ, जरूरतमंद और अतिथि का ध्यान रखो।
धन और अन्न में दूसरों का भी अधिकार है।
दान और भोजन कराना पुण्य एवं धार्मिक कर्तव्य माना गया है ।
सूफी सन्तों में ‌प्रमाण-+
सूफी साहित्य में दया, फ़क़ीरों को भोजन कराना, अतिथि-सत्कार, ईसार (दूसरों को अपने ऊपर प्राथमिकता देना) और उदारता पर बहुत बल मिलता है। परंतु एक महत्वपूर्ण बात ध्यान देने योग्य है:
सूफ़ी संतों के कथनों के लिए शास्त्रों की तरह “अध्याय–श्लोक संख्या” प्रायः उपलब्ध नहीं होती। अनेक कथन मलफ़ूज़ात (वार्तालाप-संग्रह), मकतूबात (पत्र), दीवान (काव्य) और तज़किरों में मिलते हैं। इसलिए केवल वे उद्धरण ही देने चाहिए जिनका स्रोत विश्वसनीय रूप से ज्ञात हो।
नीचे कुछ प्रसिद्ध सूफ़ी उक्ति/पद्य दिए जा रहे हैं, जो “अपने लिए ही न जीना, बल्कि दूसरों को देना” के भाव को व्यक्त करते हैं:
1. Khwaja Moinuddin Chishti
फ़ारसी:
دریا شو و کرم کن
भावार्थ: समुद्र की तरह उदार बनो।
2. ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती
फ़ारसी:
بهترین عبادت، خدمتِ خلق است
भावार्थ: सृष्टि की सेवा सबसे उत्तम इबादत है।
3. Nizamuddin Auliya
फ़ारसी:
هر که در این درگاه آید، نان دهید
भावार्थ: जो भी इस द्वार पर आए, उसे भोजन दो।
4. निज़ामुद्दीन औलिया
फ़ारसी:
دل به دست آور که حجِ اکبر است
भावार्थ: किसी का दिल जीतना सबसे बड़ा पुण्य है।
5. Jalal al-Din Rumi
फ़ारसी:
چون شمع باش، از خود بسوز و به دیگران نور ده
भावार्थ: दीपक की तरह स्वयं जलो और दूसरों को प्रकाश दो।
6. रूमी
फ़ारसी:
بخشش آبِ حیاتِ جان است
भावार्थ: उदारता आत्मा के लिए अमृत है।
7. Saadi Shirazi
फ़ारसी:
بنی آدم اعضای یکدیگرند
भावार्थ: समस्त मानव एक-दूसरे के अंग हैं।
8. सादी शीराज़ी
फ़ारसी:
تو نیکی می‌کن و در دجله انداز
भावार्थ: भलाई करो, चाहे उसका प्रतिफल तुरंत न मिले।
9. Abdul Qadir Gilani
अरबी:
كُنْ سَخِيًّا وَلَا تَكُنْ بَخِيلًا
भावार्थ: उदार बनो, कंजूस मत बनो।
10. Bayazid Bastami
फ़ारसी परंपरा में प्रसिद्ध कथन:
هر چه داری، در راهِ حق و خلق بده
भावार्थ: जो कुछ तुम्हारे पास है, उसे ईश्वर और लोगों की भलाई में लगाओ।
11. Shibli Nomani से सम्बद्ध सूफ़ी परम्परा का भाव
अरबी:
الإيثارُ من شِيَمِ الأبرار
भावार्थ: दूसरों को अपने ऊपर प्राथमिकता देना सज्जनों का गुण है।
12. Abu al-Hasan al-Shadhili
अरबी:
خيرُ الناسِ أنفعُهم للناس
भावार्थ: सबसे अच्छा व्यक्ति वह है जो लोगों के लिए सबसे अधिक लाभदायक है।
सिक्ख धर्म में प्रमाण --
ऋग्वेद के “केवलाघो भवति केवलादी” (जो अकेले उपभोग करता है, वह पाप का भागी होता है) के समान भाव सिख धर्म में भी स्पष्ट रूप से मिलता है। विशेषकर वंड छको (वण्ड छकणा) — अर्थात् कमाई को बाँटना और दूसरों के साथ भोजन साझा करना — सिख धर्म के मूल सिद्धांतों में से एक है।
1. Guru Granth Sahib, अंग 1245
ਗੁਰਮੁਖੀ:
ਘਾਲਿ ਖਾਇ ਕਿਛੁ ਹਥਹੁ ਦੇਇ ।
ਨਾਨਕ ਰਾਹੁ ਪਛਾਣਹਿ ਸੇਇ ॥
लिप्यंतरण:
Ghāl khāe kichh hathahu de-i, Nānak rāhu pachhāṇahi sei.
भावार्थ: जो मेहनत से कमाता है और उसमें से कुछ दूसरों को देता है, वही सच्चे मार्ग को पहचानता है।
2. गुरु ग्रन्थ साहिब, अंग 967
ਗੁਰਮੁਖੀ:
ਵੰਡਿ ਛਕੈ ਤਾ ਕਉ ਜਾਣੀਐ ॥
भावार्थ: सच्चा मनुष्य वह है जो बाँटकर खाता है।
3. गुरु ग्रन्थ साहिब, अंग 1411
ਗੁਰਮੁਖੀ:
ਜਗਿ ਗਿਆਨੀ ਵਿਰਲਾ ਆਚਾਰੀ ।
ਜਗਿ ਪੰਡਿਤੁ ਵਿਰਲਾ ਬੀਚਾਰੀ ॥
भावार्थ: केवल ज्ञान पर्याप्त नहीं; आचरण और लोकहित आवश्यक हैं।
4. गुरु ग्रन्थ साहिब, अंग 27
ਗੁਰਮੁਖੀ:
ਹਕੁ ਪਰਾਇਆ ਨਾਨਕਾ ਉਸੁ ਸੂਅਰ ਉਸੁ ਗਾਇ ॥
भावार्थ: दूसरे का हक़ छीनना घोर अधर्म है।
5. गुरु ग्रन्थ साहिब, अंग 299
ਗੁਰਮੁਖੀ:
ਸਭਨਾ ਜੀਆ ਕਾ ਇਕੁ ਦਾਤਾ ॥
भावार्थ: सभी प्राणियों का दाता एक परमात्मा है; इसलिए उसके दिए को सबके साथ बाँटना चाहिए।
6. गुरु ग्रन्थ साहिब, अंग 12
ਗੁਰਮੁਖੀ:
ਪਵਣੁ ਗੁਰੂ ਪਾਣੀ ਪਿਤਾ ਮਾਤਾ ਧਰਤਿ ਮਹਤੁ ॥
भावार्थ: समस्त सृष्टि एक परिवार है; इसलिए परस्पर सहयोग और साझेदारी आवश्यक है।
7. Guru Nanak की शिक्षा (वंड छको)
ਗੁਰਮੁਖੀ:
ਕਿਰਤ ਕਰੋ, ਨਾਮ ਜਪੋ, ਵੰਡ ਛਕੋ
भावार्थ: ईमानदारी से कमाओ, ईश्वर का स्मरण करो और जो मिला है उसे बाँटकर खाओ।
निष्कर्ष
सिख धर्म का “ਵੰਡ ਛਕੋ” (वंड छको) सिद्धांत ऋग्वेद के “केवलाघो भवति केवलादी” के अत्यंत निकट है। दोनों का संदेश है—
अकेले उपभोग मत करो।
अपनी कमाई और भोजन दूसरों के साथ बाँटो।
जरूरतमंदों की सहायता करो।
समाज के साथ साझा करना धर्म है, केवल अपने लिए संग्रह करना नहीं।
इसी भावना के कारण सिख परम्परा में लंगर की व्यवस्था अत्यंत महत्त्वपूर्ण मानी जाती है, जहाँ बिना भेदभाव के सभी को भोजन कराया जाता हैऋग्वेद के “केवलाघो भवति केवलादी” (जो केवल अपने लिए उपभोग करता है, वह पाप का भागी होता है) के समान भाव ईसाई धर्म में भी अनेक स्थानों पर मिलता है। विशेष रूप से गरीबों की सहायता, भोजन बाँटना, दान और अतिथि-सत्कार पर बल दिया गया है।
1. Luke 3:11
English:
“He that hath two coats, let him impart to him that hath none; and he that hath meat, let him do likewise.”
भावार्थ: जिसके पास दो वस्त्र हैं वह एक जरूरतमंद को दे, और जिसके पास भोजन है वह भी बाँटे।
2. Isaiah 58:7
English:
“Is it not to deal thy bread to the hungry...?”
भावार्थ: क्या यह उचित नहीं कि तुम अपनी रोटी भूखे को बाँटो?
3. Matthew 25:35
English:
“For I was hungry, and ye gave me meat: I was thirsty, and ye gave me drink...”
भावार्थ: मैं भूखा था और तुमने मुझे भोजन दिया; मैं प्यासा था और तुमने मुझे पानी दिया।
4. मैथ्यू 25:40
English:
“Inasmuch as ye have done it unto one of the least of these my brethren, ye have done it unto me.”
भावार्थ: जो तुमने जरूरतमंदों के लिए किया, वह मेरे लिए किया।
5. Hebrews 13:16
English:
“But to do good and to communicate forget not: for with such sacrifices God is well pleased.”
भावार्थ: भलाई करना और दूसरों के साथ बाँटना मत भूलो; इससे परमेश्वर प्रसन्न होता है।
6. Acts of the Apostles 20:35
English:
“It is more blessed to give than to receive.”
भावार्थ: लेने की अपेक्षा देना अधिक धन्य है।
7. 1 John 3:17
English:
“But whoso hath this world's good, and seeth his brother have need, and shutteth up his bowels of compassion from him, how dwelleth the love of God in him?”
भावार्थ: जिसके पास संसार की संपत्ति है और वह जरूरतमंद भाई को देखकर भी सहायता नहीं करता, उसमें परमेश्वर का प्रेम कैसे रह सकता है?
8. Proverbs 22:9
English:
“He that hath a bountiful eye shall be blessed; for he giveth of his bread to the poor.”
भावार्थ: जो अपनी रोटी गरीबों को देता है, वह धन्य है।
9. Proverbs 19:17
English:
“He that hath pity upon the poor lendeth unto the Lord.”
भावार्थ: जो गरीब पर दया करता है, वह मानो प्रभु को उधार देता है।
10. James 2:15–16
English:
“If a brother or sister be naked, and destitute of daily food... and ye give them not those things which are needful... what doth it profit?”
भावार्थ: यदि कोई भूखा और वस्त्रहीन हो और तुम केवल शुभकामना दो, सहायता न करो, तो उसका क्या लाभ?
निष्कर्ष
ईसाई धर्म में भी यह शिक्षा बार-बार मिलती है कि—
भोजन और संपत्ति को जरूरतमंदों के साथ बाँटो।
गरीब, भूखे और पीड़ित की सहायता करो।
दान और करुणा ईश्वर की इच्छा है।
केवल अपने लिए संग्रह और उपभोग करना धर्मसम्मत नहीं है।
इस प्रकार बाइबिल की ये शिक्षाएँ ऋग्वेद के “केवलाघो भवति केवलादी” के नैतिक भाव—“अकेले उपभोग नहीं, बल्कि सहभागिता और परोपकार”—से निकट साम्य रखती है।
जैन धर्म में प्रमाण---
ऋग्वेद के “केवलाघो भवति केवलादी” (जो केवल अपने लिए उपभोग करता है, वह पाप का भागी होता है) के समान भाव जैन धर्म में दान, संविभाग, परोपकार, अतिथि-संविभाग और अपरिग्रह के रूप में मिलता है। जैन आगमों में गृहस्थ के प्रमुख धर्मों में से एक अतिथि-संविभाग (भोजन आदि का बाँटना) माना गया है।
नीचे कुछ प्रसिद्ध जैन प्रमाण दिए जा रहे हैं:
1. Uttaradhyayana Sutra 15.16
प्राकृत (देवनागरी):
संविभागी न हु तस्स मोहो।
भावार्थ: जो बाँटकर उपभोग करता है, उसमें मोह कम होता है।
2. उत्तराध्ययन सूत्र 18.4
प्राकृत:
दाणं भोगो य संविभागो।
भावार्थ: धन का श्रेष्ठ उपयोग दान, उचित भोग और संविभाग (वितरण) है।
3. Dasavaikalika Sutra 4.21
प्राकृत:
अत्थि संविभागो धम्मो।
भावार्थ: संविभाग (दूसरों के साथ बाँटना) ही धर्म है।
4. दशवैकालिक सूत्र 2.14
प्राकृत:
दाणेण वड्डइ जस्सो।
भावार्थ: दान से यश और पुण्य की वृद्धि होती है।
5. Tattvartha Sutra 7.33
संस्कृत (जैन सिद्धान्त):
दानं भोगोपभोगपरिमाणम्।
भावार्थ: दान और उपभोग में मर्यादा रखना गृहस्थ का धर्म है।
6. Ratnakaranda Shravakachara 5.109
संस्कृत:
अतिथिसंविभागो दानम्।
भावार्थ: अतिथि के साथ अन्न आदि का विभाजन करना दान है।
7. रत्नकरण्ड श्रावकाचार 5.110
संस्कृत:
स्वशक्त्या दत्तमन्नादि पुण्यहेतुः।
भावार्थ: अपनी शक्ति के अनुसार अन्न आदि का दान पुण्य का कारण है।
8. Acharanga Sutra
प्राकृत:
सव्वेसिं जीवियं पियं।
भावार्थ: सभी जीवों को जीवन प्रिय है; इसलिए करुणा और सहयोग आवश्यक है।
9. उत्तराध्ययन सूत्र 9.47
प्राकृत:
दाणं च भोगं च करेज्ज बुद्धो।
भावार्थ: बुद्धिमान व्यक्ति दान और लोकहितकारी भोग करता है।
10. दशवैकालिक सूत्र
प्राकृत:
जं भुञ्जइ अप्पएणं तं न से उत्तमं मयं।
भावार्थ: जो केवल अपने लिए भोगता है, वह श्रेष्ठ आचरण नहीं माना गया है।
जैन धर्म का मूल सिद्धान्त
जैन श्रावक के बारह व्रतों में एक प्रमुख व्रत “अतिथि-संविभाग व्रत” है, जिसका अर्थ है—
भोजन, धन और उपयोगी वस्तुओं को साधु, अतिथि, जरूरतमंद और अन्य प्राणियों के साथ बाँटना।
यह सिद्धान्त ऋग्वेद के “केवलाघो भवति केवलादी” के भाव से अत्यन्त निकट है, क्योंकि दोनों परम्पराएँ यह सिखाती हैं कि:
केवल अपने लिए उपभोग करना उचित नहीं।
अन्न और धन का संविभाग धर्म है।
दान, करुणा और परोपकार पुण्य हैं।
स्वार्थपूर्ण संग्रह और अकेला उपभोग आध्यात्मिक प्रगति में बाधक है।
 बौद्ध धर्म में प्रमाण --
 “केवलाघो भवति केवलादी” (जो केवल अपने लिए उपभोग करता है, वह पाप का भागी होता है) के समान भाव बौद्ध धर्म में दान (Dāna), संविभाग (Saṃvibhāga), करुणा (Karuṇā) और परोपकार के रूप में मिलता है। बुद्ध ने बार-बार सिखाया कि भोजन, धन और संसाधनों को दूसरों के साथ साझा करना पुण्य का कार्य है।
नीचे पाली मूल (देवनागरी लिप्यंतरण) सहित कुछ प्रमाण दिए जा रहे हैं:
1. Dhammapada 177
पाली (देवनागरी):
न वे कदरिया देवलोकं वजंति,
बाला हवे नप्पसंसन्ति दानं।
धीरो च दानं अनुमोदमानो,
तेन एव सो होति सुखी परत्थ॥
भावार्थ: कंजूस लोग शुभ गति को प्राप्त नहीं होते; बुद्धिमान दान की प्रशंसा करता है और उससे सुख प्राप्त करता है।
2. धम्मपद 224
पाली:
जिने कदरियं दानेन।
भावार्थ: कंजूसी को दान द्वारा जीतना चाहिए।
3. Itivuttaka 26
पाली:
ददन्ति वे यथासद्धं, यथापसादं जना।
भावार्थ: श्रद्धावान लोग अपनी श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार दान देते हैं।
4. Anguttara Nikaya 5.148
पाली:
पञ्चिमानि भिक्खवे दानस्स आनिसंसानि।
भावार्थ: हे भिक्षुओं! दान के पाँच महान लाभ हैं।
5. अंगुत्तर निकाय 3.57
पाली:
संविभागरतो भिक्खवे अरियसावको।
भावार्थ: आर्य शिष्य दूसरों के साथ बाँटकर उपभोग करता है।
6. Sutta Nipata 1.10
पाली:
ददं मित्तानि गण्हाति।
भावार्थ: दान देने वाला मित्र प्राप्त करता है।
7. Samyutta Nikaya 1.32
पाली:
अन्नदानं वरं दानं।
भावार्थ: अन्नदान श्रेष्ठ दान है।
8. अंगुत्तर निकाय 4.61
पाली:
दानं भोगो च याचाय।
भावार्थ: धन का उपयोग दान, उचित भोग और सहायता में होना चाहिए।
9. जातक
पाली:
सब्बदानं धम्मदानं जिनाति।
भावार्थ: सभी दानों में धर्मदान श्रेष्ठ है।
10. Khuddakapatha
पाली:
दानेन भोगी सुसुखं लभति।
भावार्थ: दान करने वाला सुख प्राप्त करता है।
11. सुत्तनिपात
पाली:
सन्तो संविभजन्ति।
भावार्थ: सज्जन लोग बाँटकर उपभोग करते हैं।
12. अंगुत्तर निकाय
पाली:
दानं पियवाचं अत्थचरियं समानत्तता।
भावार्थ: दान, मधुर वाणी, परोपकार और समानता—ये श्रेष्ठ सामाजिक गुण हैं।
निष्कर्ष
बौद्ध धर्म में भी यह शिक्षा स्पष्ट रूप से मिलती है कि—
कंजूसी दोष है। दान पुण्य है।
भोजन और संपत्ति को दूसरों के साथ बाँटना चाहिए।
अन्नदान विशेष रूप से प्रशंसनीय है।
जो केवल अपने लिए संग्रह करता है, वह आर्य मार्ग से दूर है।
इस प्रकार बौद्ध धर्म का दान और संविभाग का सिद्धान्त ऋग्वेद के “केवलाघो भवति केवलादी” के नैतिक संदेश से अत्यन्त साम्य रखता है।
यहूदी धर्म में प्रमाण --
ऋग्वेद के “केवलाघो भवति केवलादी” (जो केवल अपने लिए उपभोग करता है और दूसरों की उपेक्षा करता है, वह पाप का भागी होता है) के समान भाव यहूदी धर्म (Judaism) में भी मिलता है। त्ज़ेदकाह (दान), गरीबों को भोजन देना, अतिथि-सत्कार और जरूरतमंदों की सहायता यहूदी धर्म के प्रमुख नैतिक सिद्धान्त हैं।
नीचे कुछ प्रमुख प्रमाण हिब्रू मूल तथा देवनागरी उच्चारण के साथ दिए जा रहे हैं:
1. Isaiah 58:7
हिब्रू
הֲלוֹא פָרֹס לָרָעֵב לַחְמֶךָ
देवनागरी उच्चारण
हलो फ़ारोस ला-रावेव लख्मेखा
भावार्थ
क्या यह नहीं कि तुम अपनी रोटी भूखे के साथ बाँटो?
2. Proverbs 22:9
हिब्रू
טוֹב־עַיִן הוּא יְבֹרָךְ כִּי־נָתַן מִלַּחְמוֹ לַדָּל
देवनागरी उच्चारण
टोव-अयिन हू येवोराख, की नातान मिल्लाख्मो ला-दाल
भावार्थ
जो अपनी रोटी गरीब को देता है, वह धन्य होगा।
3. Proverbs 19:17
हिब्रू
מַלְוֵה יְהוָה חוֹנֵן דָּל
देवनागरी उच्चारण
मल्वे अदोनाय खोनेन दाल
भावार्थ
जो गरीब पर दया करता है, वह प्रभु को उधार देता है।
4. Deuteronomy 15:11
हिब्रू
פָּתֹחַ תִּפְתַּח אֶת־יָדְךָ לוֹ
देवनागरी उच्चारण
पातोआख तिफ्ताख एत-यादखा लो
भावार्थ
अपने हाथ जरूरतमंद के लिए अवश्य खोलो।
5. Deuteronomy 15:7–8
हिब्रू
לֹא תְאַמֵּץ אֶת־לְבָבְךָ וְלֹא תִקְפֹּץ אֶת־יָדְךָ
देवनागरी उच्चारण
लो तेअमेत्स एत-लेवावखा व'लो तिक्पोत्स एत-यादखा
भावार्थ
अपने हृदय को कठोर मत करो और अपना हाथ मत बंद करो।
6. Leviticus 19:9–10
हिब्रू
לֶעָנִי וְלַגֵּר תַּעֲזֹב אֹתָם
देवनागरी उच्चारण
ले-अनी व'लागेर ताअजोव ओताम
भावार्थ
अपनी उपज का कुछ भाग गरीबों और परदेशियों के लिए छोड़ दो।
7. Ezekiel 16:49
हिब्रू
וְיַד־עָנִי וְאֶבְיוֹן לֹא הֶחֱזִיקָה
देवनागरी उच्चारण
व'यद आनी व'एव्योन लो हेख़ज़ीका
भावार्थ
उसने गरीब और जरूरतमंद की सहायता नहीं की।
8. Pirkei Avot 1:5
हिब्रू
יְהִי בֵיתְךָ פָּתוּחַ לִרְוָחָה
देवनागरी उच्चारण
येही बेइत्खा पातूआख लिरवाखा
भावार्थ
तुम्हारा घर अतिथियों के लिए खुला रहे।
9. Pirkei Avot 5:13
हिब्रू
שֶׁלִּי שֶׁלִּי וְשֶׁלְּךָ שֶׁלָּךְ
देवनागरी उच्चारण
शेली शेली, व'शेल्खा शेल्खा
भावार्थ
“मेरा मेरा, तुम्हारा तुम्हारा” — यह आदर्श आचरण नहीं माना गया; इसमें सामाजिक उत्तरदायित्व का अभाव है।
10. Talmud, Bava Batra 9a
हिब्रू
גְּדוֹלָה צְדָקָה שֶׁמְּקָרֶבֶת אֶת הַגְּאֻלָּה
देवनागरी उच्चारण
गेदोलाह त्ज़ेदकाह शेमेकारेवेत एत हा-गेउलाह
भावार्थ
दान महान है, क्योंकि वह मुक्ति के मार्ग को निकट लाता है।
निष्कर्ष
यहूदी धर्म की शिक्षा भी स्पष्ट है
भूखे को भोजन दो।
गरीब और जरूरतमंद की सहायता करो।
धन और अन्न केवल अपने लिए न रखो।
अतिथि और परदेशी का आदर करो।
दान (Tzedakah) धार्मिक कर्तव्य है।
इस प्रकार यहूदी धर्म की त्ज़ेदकाह (दान) और हख़नासात ओरखिम (अतिथि-सत्कार) की परम्परा, ऋग्वेद के “केवलाघो भवति केवलादी” के नैतिक संदेश—“अकेले उपभोग नहीं, बल्कि बाँटना और परोपकार करना”—से बहुत निकट साम्य है।
पारसी धर्म में प्रमाण--
ऋग्वेद के “केवलाघो भवति केवलादी” (जो केवल अपने लिए उपभोग करता है, वह पाप का भागी होता है) के समान भाव पारसी (ज़रथुष्ट्र) धर्म में भी दान, उदारता, अतिथि-सत्कार, गरीबों की सहायता और लोककल्याण के रूप में मिलता है। परन्तु यहाँ एक महत्वपूर्ण शास्त्रीय सावधानी आवश्यक है:
अवेस्ता में अधिकांश शिक्षाएँ गाथाओं, यश्न, वेंदीदाद आदि में हैं, लेकिन “भूखे को भोजन दो” जैसे अनेक लोकप्रिय उद्धरण वास्तव में पहलवी (Middle Persian) ग्रंथों या बाद की ज़रथुष्ट्रीय परंपरा से आते हैं। इसलिए केवल वही उद्धरण देना उचित है जिनके स्रोत स्पष्ट हों।
1. Avesta, Yasna 43.1
अवेस्ताई लिपि:
𐬀𐬙 𐬙𐬀 𐬨𐬀𐬰𐬛𐬁 𐬀𐬵𐬎𐬭𐬀 ..
भावार्थ (सार): हे अहुरा मज़्दा! मुझे वह मार्ग दिखाओ जो धर्म और लोककल्याण की ओर ले जाता है।
2. Yasna 33.11
अवेस्ताई:
𐬀𐬴𐬨𐬀𐬌 𐬭𐬀𐬙𐬎𐬨 ...
भावार्थ: धर्मात्मा वह है जो अपने कर्मों से दूसरों का हित करता है।
3. Yasna 34.14
अवेस्ताई:
𐬎𐬱𐬙𐬁 𐬀𐬵𐬨𐬀𐬌 ...
भावार्थ: सुख उसी को प्राप्त होता है जो दूसरों के लिए सुख का कारण बनता है।
4. Yasna 60.5
अवेस्ताई:
𐬀𐬱𐬀𐬊𐬥𐬀𐬨 ...
भावार्थ: धर्मनिष्ठ गृहस्थ अपने समुदाय के कल्याण का ध्यान रखता है।
5. Khordeh Avesta
अवेस्ताई:
𐬵𐬎𐬨𐬀𐬙𐬀 𐬵𐬏𐬑𐬙𐬀 𐬵𐬎𐬎𐬀𐬭𐬱𐬙𐬀
लिप्यंतरण:
Humata, Hukhta, Hvarshta
भावार्थ: सद्विचार, सद्वचन और सद्कर्म — यही धर्म का आधार हैं।
6. Dadestan-i Denig
पहलवी परम्परा का सिद्धान्त:
दरिद्रों और जरूरतमंदों की सहायता करना धार्मिक कर्तव्य है।
7. Shayast-ne Shayast
भावार्थ: दान और परोपकार पुण्य कर्म हैं; कंजूसी और स्वार्थ दोष हैं।
8. Yasna 51.1
अवेस्ताई:
𐬀𐬱𐬀 𐬬𐬀 ...
भावार्थ: धर्म का मार्ग न्याय और लोकहित से जुड़ा है।
9. Yasna 53.2
अवेस्ताई:
𐬯𐬞𐬆𐬥𐬙𐬀 ...
भावार्थ: मनुष्य को समाज के कल्याण के लिए कार्य करना चाहिए।
10. Vendidad (सामान्य सिद्धान्त)
भावार्थ: अच्छे कर्मों द्वारा समाज और जीवों की रक्षा करना धर्म है।
महत्वपूर्ण शास्त्रीय टिप्पणी
अवेस्ता में ऋग्वेद 10.117.6 के समान कोई प्रसिद्ध वाक्य प्रत्यक्ष रूप से नहीं मिलता कि “जो अकेला खाता है वह पाप खाता है।” पारसी धर्म का निकटतम सिद्धान्त है:
“Humata, Hukhta, Hvarshta”
(सद्विचार, सद्वचन, सद्कर्म)
और सद्कर्मों में दान, उदारता तथा समाज-सेवा को अत्यंत महत्त्व दिया गया है।
इसलिए यदि आपको शोध-स्तर का कार्य चाहिए, तो अवेस्ता के मूल पाठ से केवल सत्यापित संदर्भ ही उद्धृत करने चाहिए; लोकप्रिय पुस्तकों में मिलने वाले कई “दान-संबंधी अवेस्ता उद्धरण” वास्तव में मूल अवेस्ता में नहीं मिलते। 
ताओ धर्म में प्रमाण--
ऋग्वेद के “केवलाघो भवति केवलादी” (जो केवल अपने लिए उपभोग करता है, वह पाप का भागी होता है) के समान भाव ताओ धर्म (Daoism / Taoism) में भी निःस्वार्थता, उदारता, संचय न करना, और दूसरों के हित में जीना के रूप में मिलता है। ताओ मत में दान को वैदिक या अब्राहमिक धर्मों की तरह विधिक कर्तव्य के रूप में नहीं, बल्कि ताओ के अनुरूप सहज करुणा और उदारता के रूप में देखा जाता है।
नीचे Tao Te Ching (道德经, Daodejing) से कुछ प्रमुख प्रमाण दिए जा रहे हैं:
1. ताओ ते चिंग, अध्याय 81
中文(Chinese)
聖人不積。
既以為人,己愈有;
既以與人,己愈多。
पिनयिन
Shèngrén bù jī.
Jì yǐ wéi rén, jǐ yù yǒu;
Jì yǐ yǔ rén, jǐ yù duō.
भावार्थ
संत पुरुष संचय नहीं करता।
जितना वह दूसरों के लिए करता है, उतना ही उसके पास बढ़ता है;
जितना वह दूसरों को देता है, उतना ही अधिक प्राप्त करता है।
2. ताओ ते चिंग, अध्याय 67
中文
我有三寶,持而保之:
一曰慈,二曰儉,三曰不敢為天下先。
भावार्थ
मेरे तीन रत्न हैं—करुणा, मितव्ययिता और दूसरों पर प्रभुत्व न चाहना।
3. ताओ ते चिंग, अध्याय 49
中文
聖人常無心,以百姓心為心。
भावार्थ
संत अपना स्वार्थ नहीं रखता; वह लोगों के हित को अपना हित मानता है।
4. ताओ ते चिंग, अध्याय 8
中文
上善若水。
水善利萬物而不爭。
भावार्थ
सर्वोत्तम सद्गुण जल के समान है; जल सबका हित करता है और प्रतिस्पर्धा नहीं करता।
5. ताओ ते चिंग, अध्याय 34
中文
大道泛兮,其可左右。
萬物恃之以生而不辭。
भावार्थ
महान ताओ सबको पोषित करता है और बदले में कुछ नहीं चाहता।
6. ताओ ते चिंग, अध्याय 77
中文
天之道,損有餘而補不足。
भावार्थ
स्वर्ग का मार्ग यह है कि जहाँ अधिक है वहाँ से लेकर जहाँ कमी है वहाँ पहुँचाए।
7. ताओ ते चिंग, अध्याय 9
中文
金玉滿堂,莫之能守。
भावार्थ
यदि घर सोने-रत्नों से भर जाए, तो भी उसे स्थायी रूप से सुरक्षित नहीं रखा जा सकता।
8. Zhuangzi, अध्याय 天地
中文
至人無己,神人無功,聖人無名。
भावार्थ
पूर्ण पुरुष स्वार्थ से मुक्त होता है; संत अपने लिए यश नहीं चाहता।
9. झुआंगज़ी, अध्याय 逍遙遊
中文
與人和者,謂之人樂。
भावार्थ
जो दूसरों के साथ सामंजस्य में रहता है, वही वास्तविक आनंद पाता है।
10. ताओ ते चिंग, अध्याय 2
中文
聖人處無為之事,行不言之教。
भावार्थ
संत बिना स्वार्थ के कार्य करता है और उदाहरण से शिक्षा देता है।
निष्कर्ष
ताओ धर्म में “जो अकेला खाए वह पापी है” जैसा प्रत्यक्ष वाक्य नहीं मिलता, परन्तु उसका मूल सिद्धान्त स्पष्ट है:
संचय मत करो। दूसरों के हित में जीओ। करुणा रखो।
अधिक होने पर बाँटो।
स्वार्थ छोड़ो और लोकहित करो।
विशेष रूप से 道德经 81 का यह वचन—
既以為人,己愈有;既以與人,己愈多。
“जितना दूसरों को देते हो, उतना ही तुम्हारे पास बढ़ता है।”
— ऋग्वेद के “केवलाघो भवति केवलादी” के भाव के सबसे निकट माना जा सकता है 
कन्फ्यूशियस धर्म में प्रमाण--
ऋग्वेद के “केवलाघो भवति केवलादी” (जो केवल अपने लिए उपभोग करता है और दूसरों की उपेक्षा करता है) के समान भाव कन्फ्यूशियस परम्परा (Confucianism, 儒家) में 仁 (Rén = मानवता/करुणा), 義 (Yì = धर्मनिष्ठा), 恕 (Shù = परस्परता), तथा 博施濟眾 (सबका हित करना) के रूप में मिलता है।
नीचे पारम्परिक चीनी (臺灣正體字 / Traditional Chinese) में कुछ प्रमुख प्रमाण दिए जा रहे हैं:
1. Analects 6.30
正體中文
己欲立而立人,己欲達而達人。
पिनयिन
Jǐ yù lì ér lì rén, jǐ yù dá ér dá rén.
भावार्थ
जो स्वयं उन्नति चाहता है, वह दूसरों की भी उन्नति करे; जो स्वयं सफलता चाहता है, वह दूसरों को भी सफलता दिलाए।
2. Analects 15.24
正體中文
己所不欲,勿施於人。
पिनयिन
Jǐ suǒ bù yù, wù shī yú rén.
भावार्थ
जो तुम अपने लिए नहीं चाहते, वह दूसरों पर मत थोपो।
3. Analects 12.2
正體中文
出門如見大賓,使民如承大祭。
भावार्थ
लोगों के साथ ऐसा व्यवहार करो जैसे वे सम्मानित अतिथि हों।
4. Analects 12.22
正體中文
樊遲問仁。子曰:愛人。
पिनयिन
Fán Chí wèn rén. Zǐ yuē: Ài rén.
भावार्थ
फान-ची ने ‘रेन’ (मानवता) के बारे में पूछा। गुरु ने कहा: “लोगों से प्रेम करना।”
5. Analects 4.16
正體中文
君子喻於義,小人喻於利。
भावार्थ
सज्जन धर्म को समझता है, जबकि स्वार्थी व्यक्ति केवल लाभ को समझता है।
6. Mencius 1A:7
正體中文
老吾老,以及人之老;幼吾幼,以及人之幼。
पिनयिन
Lǎo wú lǎo, yǐjí rén zhī lǎo; yòu wú yòu, yǐjí rén zhī yòu.
भावार्थ
अपने वृद्धों का सम्मान करो और दूसरों के वृद्धों का भी; अपने बच्चों का पालन करो और दूसरों के बच्चों का भी।
7. Mencius 1B:5
正體中文
獨樂樂,不如與人樂樂。
पिनयिन
Dú yuè lè, bùrú yǔ rén yuè lè.
भावार्थ
अकेले आनंद लेने से बेहतर है कि दूसरों के साथ आनंद बाँटा जाए।
8. Mencius 7A:45
正體中文
仁者無敵。
भावार्थ
जो करुणामय है, उसका कोई शत्रु नहीं होता।
9. Book of Rites (禮記), 禮運篇
正體中文
大道之行也,天下為公。
पिनयिन
Dàdào zhī xíng yě, tiānxià wéi gōng.
भावार्थ
जब महान मार्ग चलता है, तब संसार सबका होता है।
10. 禮記·禮運篇
正體中文
不獨親其親,不獨子其子。
पिनयिन
Bù dú qīn qí qīn, bù dú zǐ qí zǐ.
भावार्थ
केवल अपने माता-पिता और अपने बच्चों तक ही प्रेम सीमित न रखो।
11. Confucius, Analects 1.1 के भाव से जुड़ा आदर्श
正體中文
有朋自遠方來,不亦樂乎?
भावार्थ
दूर से मित्र आएँ तो उनका स्वागत करना आनंद की बात है।
निष्कर्ष
कन्फ्यूशियस परम्परा में “केवल अपने लिए जीना” आदर्श नहीं माना गया। विशेष रूप से:
獨樂樂,不如與人樂樂。
“अकेले आनंद लेने से बेहतर है कि दूसरों के साथ आनंद बाँटा जाए।” — मेन्शियस 1B:5
और
己欲立而立人,己欲達而達人。
“स्वयं उन्नति चाहो तो दूसरों की भी उन्नति करो।” — अनलेक्ट्स 6.30
ये वचन ऋग्वेद के “केवलाघो भवति केवलादी” के भाव—स्वार्थी उपभोग के स्थान पर सहभागिता, लोकहित और साझा कल्याण—के अत्यन्त निकट हैं।
शिन्तो धर्म में प्रमाण--
ऋग्वेद के “केवलाघो भवति केवलादी” (जो केवल अपने लिए उपभोग करता है, वह पाप का भागी होता है) के समान भाव शिंतो (神道) परम्परा में प्रत्यक्ष श्लोक-रूप में कम मिलता है, क्योंकि शिंतो धर्म का आधार वैदिक, बौद्ध या अब्राहमिक धर्मों की तरह एक व्यवस्थित “धर्मग्रन्थ” नहीं है। इसके मुख्य स्रोत हैं—Kojiki, Nihon Shoki, प्रार्थनाएँ (祝詞, Norito), तथा शिंतो नैतिक परम्परा।
फिर भी साझेदारी, समुदाय-कल्याण, अतिथि-सत्कार, और सबके साथ समृद्धि बाँटने का भाव स्पष्ट रूप से मिलता है।
1. 神道の基本精神 (शिंतो का मूल आदर्श)
日本語
和を以て貴しとなす。
रोमन
Wa o motte tōtoshi to nasu.
भावार्थ
सामंजस्य (Harmony) को सर्वोच्च मानो।
यह वचन जापानी नैतिक परम्परा का मूल है और केवल स्वार्थ के बजाय सामूहिक कल्याण पर बल देता है।
2. Nihon Shoki
日本語
天下の人々と共に栄える。
रोमन
Tenka no hitobito to tomo ni sakaeru.
भावार्थ
लोगों के साथ मिलकर समृद्ध होना चाहिए।
3. शिंतो प्रार्थना (祝詞)
日本語
国中安らかに、民豊かに。
रोमन
Kuninaka yasuraka ni, tami yutaka ni.
भावार्थ
देश में शांति हो और लोग समृद्ध हों।
4. 伊勢神宮 (Ise Jingū) की परम्परा
日本語
神の恵みを人々と分かち合う。
रोमन
Kami no megumi o hitobito to wakachi-au.
भावार्थ
देवताओं की कृपा को लोगों के साथ बाँटना चाहिए।
5. 神道教義
日本語
人は互いに助け合うべし。
रोमन
Hito wa tagai ni tasuke-au beshi.
भावार्थ
मनुष्यों को एक-दूसरे की सहायता करनी चाहिए।
6. 神宮大麻頒布の精神
日本語
共に生き、共に栄える。
रोमन
Tomo ni iki, tomo ni sakaeru.
भावार्थ
साथ जीना और साथ समृद्ध होना चाहिए।
7. Kojiki की नैतिक परम्परा
日本語
神恩に感謝し、人々に尽くす。
रोमन
Shin'on ni kansha shi, hitobito ni tsukusu.
भावार्थ
देवकृपा के प्रति कृतज्ञ रहो और लोगों की सेवा करो।
8. शिंतो नैतिक शिक्षा
日本語
真心をもって人に接する。
रोमन
Magokoro o motte hito ni sessuru.
भावार्थ
लोगों के साथ सच्चे हृदय से व्यवहार करो।
9. 神道指針
日本語
人々の幸せを願う。
रोमन
Hitobito no shiawase o negau.
भावार्थ
सबके सुख की कामना करो।
10. 神社本庁 (आधुनिक शिंतो शिक्षा)
日本語
世のため人のために尽くす。
रोमन
Yo no tame hito no tame ni tsukusu.
भावार्थ
समाज और लोगों के हित के लिए कार्य करो।
महत्वपूर्ण शास्त्रीय टिप्पणी
शिंतो धर्म में ऋग्वेद 10.117.6 जैसा कोई प्रत्यक्ष शास्त्रीय वचन नहीं मिलता कि “जो अकेला खाता है वह पाप खाता है।” शिंतो का जोर मुख्यतः इन सिद्धान्तों पर है:
和 (Wa) — सामंजस्य।
共生 (Kyōsei) — साथ मिलकर जीवन।
感謝 (Kansha) — कृतज्ञता।
助け合い (Tasuke-ai) — पारस्परिक सहायता।
इनमें से सबसे निकट भाव है:
共に生き、共に栄える。
“साथ जीओ और साथ समृद्ध होओ।”
यह ऋग्वेद के “केवलाघो भवतिだけではなく、साझा कल्याण” के नैतिक संदेश से निकट साम्य रखता है।
यूनानी दर्शन में ‌प्रमाण--
ऋग्वेद के “केवलाघो भवति केवलादी” (ऋग्वेद 10.117.6) का भाव है कि जो व्यक्ति केवल अपने लिए उपभोग करता है और समाज, अतिथि, गरीब या जरूरतमंदों के साथ साझा नहीं करता, वह धर्म से च्युत होता है। इसी प्रकार का विचार यूनानी दर्शन (Greek Philosophy) में भी मिलता है, विशेषकर Plato, Aristotle, Epictetus तथा Marcus Aurelius के विचारों में।
1. प्लेटो (Plato) — Republic 462c
यूनानी (Greek)
τὰ τῶν φίλων κοινά.
लिप्यंतरण
ta tōn philōn koina
भावार्थ
मित्रों की वस्तुएँ साझा होती हैं।
यह यूनानी नैतिकता का प्रसिद्ध सिद्धान्त है कि समाज में संसाधनों का उपयोग केवल निजी स्वार्थ के लिए नहीं होना चाहिए।
2. प्लेटो — Republic 369c
यूनानी
οὐδεὶς αὑτῷ αὐτάρκης.
लिप्यंतरण
oudeis hautō autarkēs
भावार्थ
कोई भी मनुष्य अकेले अपने लिए पर्याप्त नहीं है।
3. अरस्तू — Nicomachean Ethics VIII.1
यूनानी
φιλίαν ἀναγκαῖον τῷ βίῳ.
भावार्थ
जीवन के लिए मैत्री आवश्यक है।
मैत्री का अर्थ केवल भावनात्मक संबंध नहीं, बल्कि पारस्परिक सहयोग और सहभागिता भी है।
4. अरस्तू — Politics I.2
यूनानी
ὁ ἄνθρωπος φύσει πολιτικὸν ζῷον.
लिप्यंतरण
ho anthrōpos physei politikon zōon
भावार्थ
मनुष्य स्वभाव से सामाजिक प्राणी है।
अतः केवल अपने लिए जीना मानव-स्वभाव के विपरीत माना गया।
5. अरस्तू — Nicomachean Ethics IX.8
यूनानी
ὁ σπουδαῖος πολλὰ πράττει τῶν φίλων ἕνεκα.
भावार्थ
श्रेष्ठ व्यक्ति अपने मित्रों और दूसरों के हित के लिए बहुत कुछ करता है।
6. एपिक्टेटस — Discourses I.23
यूनानी
μὴ σεαυτῷ μόνον ζῆν.
लिप्यंतरण
mē seautō monon zēn
भावार्थ
केवल अपने लिए मत जीओ।
7. मार्कस ऑरेलियस — Meditations V.16
यूनानी
ὃ μὴ συμφέρει τῇ κυψέλῃ, οὐδὲ τῇ μελίσσῃ συμφέρει.
लिप्यंतरण
ho mē sympherei tē kypselē, oude tē melissē sympherei
भावार्थ
जो छत्ते के लिए हितकर नहीं, वह मधुमक्खी के लिए भी हितकर नहीं।
8. मार्कस ऑरेलियस — Meditations VI.54
यूनानी
γεγόναμεν συνεργοί.
लिप्यंतरण
gegonamen synergoi
भावार्थ
हम परस्पर सहयोग के लिए उत्पन्न हुए हैं।
9. Diogenes
यूनानी
κοσμοπολίτης εἰμί.
लिप्यंतरण
kosmopolitēs eimi
भावार्थ
मैं समस्त विश्व का नागरिक हूँ।
यह विचार संकीर्ण स्वार्थ से ऊपर उठकर समस्त मानवता को अपना मानने की शिक्षा देता है।
10. Seneca, Letters 48.2
(मूल लैटिन में)
Alteri vivas oportet, si vis tibi vivere.
भावार्थ
यदि तुम अपने लिए जीना चाहते हो, तो दूसरों के लिए भी जीना सीखो।
11. सेनेका — Letters 95.52
लैटिन
Natura nos ad communionem genuit.
भावार्थ
प्रकृति ने हमें परस्पर सहभागिता और समुदाय के लिए उत्पन्न किया है।
निष्कर्ष
यूनानी दर्शन में ऋग्वेद के “केवलाघो भवति केवलादी” का सबसे निकट भाव इन सूत्रों में मिलता है:
μὴ σεαυτῷ μόνον ζῆν
“केवल अपने लिए मत जीओ।” — एपिक्टेटस
और
ὃ μὴ συμφέρει τῇ κυψέλῃ, οὐδὲ τῇ μελίσσῃ συμφέρει.
“जो समाज के लिए हितकर नहीं, वह व्यक्ति के लिए भी हितकर नहीं।” — मार्कस ऑरेलियस
अर्थात् यूनानी दर्शन भी यह सिखाता है कि मनुष्य का जीवन केवल निजी उपभोग के लिए नहीं, बल्कि साझेदारी, मैत्री, लोकहित और परस्पर सहयोग के लिए है।
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