ऋगुवेद सूक्ति--(9) की व्याख्या

ऋगुवेद सूक्ति-- (9) की व्याख्या 
"महे चन त्वामंद्रिव:परां 
शुल्काय देयाम्"
ऋगुवेद --8/1/5
भावार्थ --हे ईश्वर ! मैं ‌आपको  किसी भी मूल्य पर नहीं छोड़ सकता।
मंत्र का पदानुसार अर्थ इस प्रकार है  पद~अर्थ
महे ~महान् हेतु / महान् वस्तु के लिए
चन ~भी, त्वाम्~आपको
अद्रिवः ~हे वज्रधारी (इन्द्र/परमेश्वर)
परा ~दूर, अलग
शुल्काय ~मूल्य, धन, कीमत के लिए
देयाम् ~दूँ, त्याग करूँ
समग्र अर्थ_
“हे वज्रधारी प्रभु! मैं आपको किसी भी बड़े मूल्य या धन के बदले भी नहीं छोड़ सकता।”
या सरल भाषा में—
“हे ईश्वर! संसार का कितना भी बड़ा लाभ क्यों न मिले, मैं आपको त्यागने वाला नहीं हूँ।”
पूरा मंत्र अर्थ सहित --
म॒हे च॒न त्वाम॑द्रिवः॒ परा॑ शु॒ल्काय॑ देयाम् ।
न स॒हस्रा॑य॒ नायुता॑य वज्रिवो॒ न श॒ताय॑ शतामघ ॥
ऋग्वेद ८.१.५
भावार्थ--
हे महान् वज्रधारी प्रभु!
मैं आपको किसी भी मूल्य पर नहीं छोड़ सकता।
न हजारों धन के लिए, न दस हजार के लिए,और न ही असीम सम्पत्ति के लिए। आपका संग और कृपा संसार के समस्त धन से श्रेष्ठ है।
“ईश्वर को किसी भी मूल्य पर न छोड़ना”, “ईश्वर ही सर्वोच्च आश्रय हैं”, और “भक्ति/श्रद्धा धन से श्रेष्ठ है” — इस भाव के 
वेदों में प्रमाण-- 
समर्थन में वेदों के कुछ प्रमाण निम्न हैं:
१. ऋग्वेद ८.१.५
म॒हे च॒न त्वाम॑द्रिवः॒ परा॑ शु॒ल्काय॑ देयाम् ।
न स॒हस्रा॑य॒ नायुता॑य वज्रिवो॒ न श॒ताय॑ शतामघ ॥
भावार्थ
हे प्रभु! मैं आपको किसी भी मूल्य, धन, हजारों अथवा असंख्य सम्पत्ति के बदले नहीं छोड़ सकता।
२. यजुर्वेद ४०.१
ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत् ।
तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम् ॥
भावार्थ
यह सम्पूर्ण जगत ईश्वर से व्याप्त है; इसलिए त्यागभाव से जीवन यापन करो और किसी के धन में लोभ मत करो।
संकेत
ईश्वर को सर्वोपरि मानना धन-लोभ से ऊपर है।
३. ऋग्वेद १०.१२१.१
हिरण्यगर्भः समवर्तताग्रे भूतस्य जातः पतिरेक आसीत् ।
स दाधार पृथिवीं द्यामुतेमां कस्मै देवाय हविषा विधेम ॥
भावार्थ
सृष्टि के आदि में वही परमात्मा सबका स्वामी था; उसी ने पृथ्वी और आकाश को धारण किया। हम उसी परम देव की उपासना करें।
४. अथर्ववेद ७.१००.१
न तं विदाथ य इमा जजानान्यद्युष्माकमन्तरं बभूव ।
भावार्थ
जिस परमात्मा ने यह सृष्टि बनाई, उसे लोग नहीं जानते और संसारिक वस्तुओं में उलझ जाते हैं।
संकेत
भौतिक आकर्षण मनुष्य को ईश्वर से दूर कर देता है।
५. सामवेद १७७
त्वमस्माकं तव स्मसि।
भावार्थ
हे प्रभु! आप हमारे हैं और हम आपके हैं।
संकेत
यह पूर्ण आत्मसमर्पण और ईश्वर-निष्ठा का वैदिक भाव है।
६. ऋग्वेद १.१६४.४६
एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति।
भावार्थ
सत्य एक ही परम सत्ता है, ज्ञानी उसे अनेक नामों से पुकारते हैं।
संकेत
सर्वोच्च सत्य और आश्रय केवल परमात्मा हैं।
७. यजुर्वेद ३२.११
न तस्य प्रतिमा अस्ति।
भावार्थ
उस परमात्मा की कोई प्रतिमा या तुल्यता नहीं है।
संकेत
ईश्वर अद्वितीय और सर्वोच्च हैं; उनका कोई सांसारिक मूल्य नहीं लगाया जा सकता है।
उपनिषदों में ‌प्रमाण --
“ईश्वर/ब्रह्म को किसी भी सांसारिक धन, सुख या मूल्य से श्रेष्ठ मानना” तथा “उन्हें न छोड़ना” — इस भाव पर उपनिषदों के अनेक प्रमाण मिलते हैं। प्रमुख प्रमाण श्लोक और उनके भावार्थ निम्न हैं:
१. कठोपनिषद् १.२.१
श्रेयश्च प्रेयश्च मनुष्यमेतः
तौ सम्परीत्य विविनक्ति धीरः ।
श्रेयो हि धीरः अभि प्रेयसो वृणीते
प्रेयो मन्दो योगक्षेमाद् वृणीते ॥
भावार्थ
मनुष्य के सामने श्रेय (कल्याणकारी मार्ग) और प्रेय (भोग-सुख) दोनों आते हैं। विवेकी पुरुष श्रेय को ग्रहण करता है, जबकि मूर्ख सांसारिक सुखों को चुनता है।
संकेत
सच्चा साधक ईश्वर और आत्मकल्याण को धन-सुख से ऊपर रखता है।
२. कठोपनिषद् १.२.२३
नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो
न मेधया न बहुना श्रुतेन ।
यमेवैष वृणुते तेन लभ्यः
तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूं स्वाम् 
भावार्थ
यह आत्मा केवल वाणी, बुद्धि या अधिक शास्त्र सुनने से नहीं मिलता; जिसे आत्मा/ईश्वर स्वीकार करते हैं, वही उन्हें प्राप्त करता है।
संकेत
ईश्वर-प्राप्ति बाहरी धन या सामर्थ्य से नहीं, समर्पण से होती है।
३. ईशोपनिषद् मन्त्र १
ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत् ।
तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम् ॥
भावार्थ
यह सम्पूर्ण जगत ईश्वर से व्याप्त है; त्यागभाव से जीवन बिताओ और किसी के धन का लोभ मत करो।
संकेत
धन से अधिक महत्त्व ईश्वर-चेतना का है।
४. मुण्डकोपनिषद् १.२.१२
परिक्ष्य लोकान्कर्मचितान्ब्राह्मणो
निर्वेदमायान्नास्त्यकृतः कृतेन ।
भावार्थ
ज्ञानी पुरुष कर्मों से प्राप्त संसारिक लोकों को देखकर समझ जाता है कि परम सत्य की प्राप्ति केवल भौतिक कर्मों से नहीं होती।
संकेत
सांसारिक उपलब्धियाँ परमात्मा से श्रेष्ठ नहीं हैं।
५. छान्दोग्योपनिषद् ७.२३.१
यो वै भूमा तत्सुखम् ।
नाल्पे सुखमस्ति ।
भावार्थ
जो अनन्त (ब्रह्म) है वही वास्तविक सुख है; सीमित वस्तुओं में सुख नहीं है।
संकेत
ईश्वर/ब्रह्म ही सर्वोच्च आनन्द हैं, धन नहीं।
६. बृहदारण्यकोपनिषद् २.४.५
आत्मनस्तु कामाय सर्वं प्रियं भवति।
भावार्थ
सभी वस्तुएँ वास्तव में आत्मा (परमात्मा) के कारण ही प्रिय लगती हैं।
संकेत
परमात्मा ही सब प्रियताओं का मूल हैं।
७. श्वेताश्वतरोपनिषद् ६.२३
यस्य देवे परा भक्तिः यथा देवे तथा गुरौ ।
तस्यैते कथिता ह्यर्थाः प्रकाशन्ते महात्मनः ॥
भावार्थ
जिस महात्मा को ईश्वर और गुरु में परम भक्ति होती है, उसी पर उपनिषदों का ज्ञान प्रकाशित होता है।
संकेत
भक्ति और समर्पण ही परम मार्ग हैं, न कि धन या अहंकार।
पुराणों में प्रमाण--- 
कुछ प्रमुख प्रमाण निम्न हैं:
१. श्रीमद्भागवत महापुराण ७.५.३० — प्रह्लाद
मतिर् न कृष्णे परतः स्वतो वा
मिथोऽभिपद्येत गृहव्रतानाम् ।
भावार्थ
जो लोग केवल संसार और भोगों में आसक्त हैं, उनकी बुद्धि भगवान में स्थिर नहीं होती।
संकेत
सच्चा भक्त संसार से ऊपर उठकर भगवान को नहीं छोड़ता।
२. श्रीमद्भागवत महापुराण ७.९.२४
नैवोद्विजे पर दुरत्यय-वैतरण्यास्
त्वद्वीर्य-गायन-महामृत-मग्नचित्तः 
भावार्थ
हे प्रभु! मैं संसार-सागर से नहीं डरता, क्योंकि मेरा चित्त आपके गुणगान रूप अमृत में डूबा है।
संकेत
भक्त के लिए ईश्वर ही सबसे बड़ा आश्रय हैं।
३. विष्णु पुराण १.२०.१९
ऐश्वर्यस्य समग्रस्य धर्मस्य यशसः श्रियः ।
ज्ञान-वैराग्ययोश्चैव षण्णां भग इतीरणा ॥
भावार्थ
सम्पूर्ण ऐश्वर्य, धर्म, यश, श्री, ज्ञान और वैराग्य — ये सब भगवान में पूर्ण रूप से विद्यमान हैं।
संकेत
संसार का धन तुच्छ है; वास्तविक सम्पदा भगवान हैं।
४. श्रीमद्भागवत महापुराण १०.१४.८
तत्तेऽनुकम्पां सु-समीक्षमाणो
भुञ्जान एवात्मकृतं विपाकम् ।
भावार्थ
जो व्यक्ति अपने कर्मफल को सहते हुए भी प्रभु की कृपा मानकर उनकी भक्ति करता रहता है, वही मुक्ति का अधिकारी होता है।
संकेत
सच्चा भक्त कठिनाइयों में भी ईश्वर का त्याग नहीं करता।
५. शिव पुराण विद्येश्वरसंहिता ६.२३
ध्यानमूलं गुरोर्मूर्ति: पूजामूलं गुरोः पदम् ।
मन्त्र मूलं गुरोर्वाक्यं मोक्षमूलं गुरोः कृपा ॥
भावार्थ
गुरु का स्वरूप ध्यान का मूल है, गुरुचरण पूजा का मूल हैं, गुरु-वचन मन्त्र का मूल है और गुरु-कृपा मोक्ष का मूल है।
संकेत
आध्यात्मिक निष्ठा सांसारिक वस्तुओं से श्रेष्ठ है।
६. श्रीमद्भागवत महापुराण ११.१४.१४
न तथा मे प्रियतम आत्मयोनिर्न शङ्करः ।
न च सङ्कर्षणो न श्रीर्नैवात्मा च यथा भवान् ॥
भावार्थ
भगवान कहते हैं— हे भक्त! तुम मुझे ब्रह्मा, शंकर, लक्ष्मी आदि से भी अधिक प्रिय हो।
संकेत
भगवान और भक्त का सम्बन्ध संसारिक मूल्य से परे है।
७. भागवत महापुराण ५.१९.८ — अम्बरीष
स वै मनः कृष्ण-पदारविन्दयोः ।
भावार्थ
राजा अम्बरीष ने अपना मन भगवान के चरणकमलों में स्थिर कर दिया।
संकेत
भक्त अपना चित्त ईश्वर से कभी अलग नहीं करता।
८. भागवत महापुराण ८.३.१ — गजेन्द्र
ॐ नमो भगवते तस्मै यत एतच्चिदात्मकम् ।
भावार्थ
उस परमात्मा को नमस्कार है जो सम्पूर्ण चेतना के आधार हैं।
संकेत
संकट में भी भक्त परमात्मा का ही आश्रय लेता है, किसी सांसारिक शक्ति का नहीं।“ईश्वर को किसी भी सांसारिक लाभ, धन, भय या मोह के कारण न छोड़ना” — यह भाव श्रीमद्भगवद्गीता में अनेक स्थानों पर मिलता है। प्रमुख प्रमाण श्लोक निम्न हैं:
१. श्रीमद्भगवद्गीता २.४१
व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरुनन्दन ।
बहुशाखा ह्यनन्ताश्च बुद्धयोऽव्यवसायिनाम् ॥
भावार्थ
हे अर्जुन! परम लक्ष्य में स्थिर बुद्धि एकाग्र होती है; अस्थिर लोगों की बुद्धि अनेक शाखाओं में भटकती रहती है।
संकेत
सच्चा भक्त ईश्वर-मार्ग से विचलित नहीं होता।
२. श्रीमद्भगवद्गीता ६.३०
यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति ।
तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति ॥
भावार्थ
जो मुझे सर्वत्र देखता है और सबको मुझमें देखता है, वह मुझसे कभी अलग नहीं होता और मैं उससे अलग नहीं होता।
संकेत
भक्त और भगवान का सम्बन्ध अटूट है।
३. श्रीमद्भगवद्गीता ७.१६–१७
तेषां ज्ञानी नित्ययुक्त एकभक्तिर्विशिष्यते ।
प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थमहं स च मम प्रियः ॥
भावार्थ
जो ज्ञानी भक्त निरन्तर एकनिष्ठ भक्ति करता है, वह मुझे अत्यन्त प्रिय है और मैं उसे प्रिय हूँ।
संकेत
एकनिष्ठ भक्ति धन या कामना से ऊपर है।
४. श्रीमद्भगवद्गीता ८.१४
अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः ।
तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनः ॥
भावार्थ
जो अनन्य भाव से निरन्तर मेरा स्मरण करता है, उसके लिए मैं सहज प्राप्त हूँ।
संकेत
ईश्वर को न छोड़ने वाला भक्त परमात्मा को प्राप्त करता है।
५. श्रीमद्भगवद्गीता ९.२२
अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते ।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम् ॥
भावार्थ
जो भक्त अनन्य भाव से मेरी उपासना करते हैं, उनके योग-क्षेम का भार मैं स्वयं उठाता हूँ।
संकेत
भक्त को संसारिक भय या लोभ के कारण ईश्वर छोड़ने की आवश्यकता नहीं।
६. श्रीमद्भगवद्गीता ९.३४
मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु ।
मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे ॥
भावार्थ
मेरा चिन्तन करो, मेरे भक्त बनो, मुझे नमस्कार करो; तुम निश्चित ही मुझे प्राप्त होगे।
संकेत
भगवान पूर्ण समर्पण की शिक्षा देते हैं।
७. श्रीमद्भगवद्गीता १२.८
मय्येव मन आधत्स्व मयि बुद्धिं निवेशय ।
निवसिष्यसि मय्येव अत ऊर्ध्वं न संशयः ॥
भावार्थ
अपना मन और बुद्धि मुझमें लगाओ; तब तुम निश्चय ही मुझमें निवास करोगे।
संकेत
ईश्वर को सर्वोच्च आश्रय बनाने की शिक्षा।
८. श्रीमद्भगवद्गीता १८.६६
सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज ।
अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ॥
भावार्थ
सब प्रकार के आश्रयों को छोड़कर केवल मेरी शरण में आओ; मैं तुम्हें सब पापों से मुक्त कर दूँगा।
संकेत
भगवान की शरण सर्वोच्च है; उन्हें किसी कारण से नहीं छोड़ना चाहिए।
महाभारत में प्रमाण --
“ईश्वर को न छोड़ना, भगवान को सर्वोच्च आश्रय मानना, तथा धन-लोभ से ऊपर भक्ति रखना” — इस भाव पर महाभारत में अनेक प्रमाण मिलते हैं। प्रमुख श्लोक निम्न हैं:
१. महाभारत — उद्योगपर्व ७०.१०
न जातु कामान्न भयान्न लोभात्
धर्मं त्यजेञ्जीवितस्यापि हेतोः ।
भावार्थ
मनुष्य को कामना, भय, लोभ अथवा प्राणों के भय से भी धर्म का त्याग नहीं करना चाहिए।
संकेत
धन या भय के कारण सत्य और ईश्वरमार्ग न छोड़ना।
२. महाभारत — वनपर्व ३१३.११७
धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः ।
भावार्थ
धर्म का नाश करने वाला स्वयं नष्ट हो जाता है; धर्म की रक्षा करने वाला धर्म द्वारा संरक्षित होता है।
संकेत
ईश्वरमार्ग और धर्म का त्याग विनाशकारी है।
३. महाभारत — भीष्मपर्व ५.२२
यतो धर्मस्ततो कृष्णो यतः कृष्णस्ततो जयः ।
भावार्थ
जहाँ धर्म है वहाँ कृष्ण हैं, और जहाँ कृष्ण हैं वहाँ विजय है।
संकेत
भगवान का साथ ही वास्तविक विजय है, धन नहीं।
४. महाभारत — शान्तिपर्व १७४.३९
न हि सत्यात्परो धर्मो नानृतात्पातकं परम् ।
भावार्थ
सत्य से बढ़कर कोई धर्म नहीं और असत्य से बड़ा कोई पाप नहीं।
संकेत
ईश्वरनिष्ठ सत्य को किसी लाभ के लिए नहीं छोड़ना चाहिए।
५. महाभारत — वनपर्व २९९.४०
एको धर्मः परं श्रेयः क्षमैका शान्तिरुत्तमा ।
भावार्थ
धर्म ही परम कल्याणकारी है और क्षमा ही श्रेष्ठ शान्ति है।
संकेत
सांसारिक लाभ से श्रेष्ठ धर्म और आध्यात्मिक मार्ग है।
६. महाभारत — शान्तिपर्व १६७.९
धर्मेण हीना: पशुभिः समाना: ।
भावार्थ
धर्म से रहित मनुष्य पशुओं के समान हैं।
संकेत
धर्म और ईश्वरभाव को त्यागना मनुष्यत्व का पतन है।
७. महाभारत — भीष्मपर्व ६.१०
वासुदेवपराः वेदा वासुदेवपराः क्रियाः ।
वासुदेवपरं ज्ञानं वासुदेवपरं तपः 
भावार्थ
वेद, यज्ञ, ज्ञान और तप — सबका परम लक्ष्य वासुदेव (भगवान) हैं।
संकेत
संसार की समस्त साधनाएँ अन्ततः ईश्वर की ओर ले जाती हैं; इसलिए भगवान ही सर्वोच्च आश्रय हैं।
स्मृतियों में प्रमाण --
“हे ईश्वर! मैं आपको किसी भी 
मूल्य पर नहीं छोड़ सकता” — यह भाव स्मृतियों में प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से धर्म, सत्य, ईश्वर-निष्ठा तथा लोभ-त्याग के रूप में व्यक्त हुआ है। प्रमुख प्रमाण निम्न हैं:
१. मनुस्मृति ४.१६०
न धर्मं त्यजेदर्थकामौ स्यातां धर्मवर्जितौ ।
भावार्थ
अर्थ और काम यदि धर्म से रहित हों, तो उन्हें त्याग देना चाहिए; धर्म का त्याग नहीं करना चाहिए।
संकेत
धन या भोग के लिए ईश्वरमार्ग नहीं छोड़ना चाहिए।
२. मनुस्मृति ८.१५
धर्मो रक्षति रक्षितो धर्मो हन्ति हतस्तथा ।
भावार्थ
जो धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है; धर्म का त्याग करने वाला नष्ट हो जाता है।
संकेत
ईश्वर और धर्म का आश्रय नहीं छोड़ना चाहिए।
३. याज्ञवल्क्य स्मृति १.३५६
धर्मेण धनमाप्नोति धर्मेण सुखमश्नुते ।
धर्मेण लभते सर्वं धर्मसारमिदं जगत् ॥
भावार्थ
धर्म से धन, सुख और सब कुछ प्राप्त होता है; धर्म ही संसार का सार है।
संकेत
धन से ऊपर धर्म और ईश्वरनिष्ठा है।
४. पराशर स्मृति १.२४
त्यजेदेकं कुलस्यार्थे ग्रामस्यार्थे कुलं त्यजेत् ।
ग्रामं janapadas्यार्थे आत्मार्थे पृथिवीं त्यजेत् ॥
भावार्थ
आत्मकल्याण के लिए सम्पूर्ण पृथ्वी तक का त्याग किया जा सकता है।
संकेत
आध्यात्मिक सत्य संसारिक सम्पत्ति से श्रेष्ठ है।
५. याज्ञवल्क्य स्मृति १.१२२
अहिंसा सत्यमस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः ।
दानं दमो दया क्षान्तिः सर्वेषां धर्मसाधनम् ॥
भावार्थ
अहिंसा, सत्य, संयम आदि धर्म के साधन हैं।
संकेत
धर्ममय जीवन ही ईश्वरनिष्ठ जीवन है।
६. मनुस्मृति ६.९२
धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः ।
धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम् ॥
भावार्थ
धैर्य, क्षमा, सत्य, संयम आदि धर्म के लक्षण हैं।
संकेत
ईश्वर-मार्ग का आधार धर्मगुण हैं, न कि लोभ।
७. बृहस्पति स्मृति १.६
धर्मेणैव धनं रक्षेद्धर्मो रक्षति रक्षितः ।
भावार्थ
धर्मपूर्वक धन की रक्षा करनी चाहिए; धर्म की रक्षा करने पर धर्म रक्षा करता है।
संकेत
धन से ऊपर धर्म और ईश्वर हैं; इसलिए उन्हें किसी मूल्य पर नहीं छोड़ना चाहिए।
नीति ग्रन्थों में ‌प्रमाण-- 
“ईश्वर, धर्म और सत्य को किसी लोभ, भय या मूल्य के कारण न छोड़ना” — यह शिक्षा अनेक नीति-ग्रन्थों में मिलती है। यहाँ ७प्रमुख प्रमाण श्लोक श्लोक-संख्या सहित प्रस्तुत हैं:
१. चाणक्य नीति ३.१८
त्यजेदेकं कुलस्यार्थे ग्रामस्यार्थे कुलं त्यजेत् ।
ग्रामं जनपदस्यार्थे आत्मार्थे पृथिवीं त्यजेत् ॥
भावार्थ
कुल के लिए एक व्यक्ति, ग्राम के लिए कुल, और आत्मकल्याण के लिए पृथ्वी तक का त्याग किया जा सकता है।
संकेत
आध्यात्मिक सत्य और आत्मकल्याण संसारिक सम्पत्ति से श्रेष्ठ हैं।
२. चाणक्य नीति १.१६
धर्मे तत्परता मुखे मधुरता दाने समुत्साहता ।
भावार्थ
मनुष्य को धर्म में तत्पर, वाणी में मधुर और दान में उत्साही होना चाहिए।
संकेत
धर्म सर्वोच्च जीवन-मूल्य है।
३. विदुर नीति उद्योगपर्व ३३.२५
न जातु कामान्न भयान्न लोभात्
धर्मं त्यजेञ्जीवितस्यापि हेतोः ।
भावार्थ
काम, भय, लोभ अथवा प्राणों के भय से भी धर्म का त्याग नहीं करना चाहिए।
संकेत
धन या भय के कारण ईश्वरमार्ग न छोड़ना।
४. हितोपदेश मित्रलाभ ७५
सत्यं माता पिता ज्ञानं धर्मो भ्राता दया सखा ।
भावार्थ
सत्य माता है, ज्ञान पिता है, धर्म भाई है और दया मित्र है।
संकेत
धर्म और सत्य जीवन के सबसे बड़े सम्बल हैं।
५. पञ्चतन्त्र १.३९
धर्मो हि तेषामधिको विशेषो
धर्मेण हीनाः पशुभिः समानाः ॥
भावार्थ
धर्म ही मनुष्य का विशेष गुण है; धर्महीन मनुष्य पशु के समान है।
संकेत
धर्म छोड़ना मनुष्यत्व छोड़ना है।
६. भर्तृहरि नीति शतक श्लोक ८३
निन्दन्तु नीतिनिपुणा यदि वा स्तुवन्तु
लक्ष्मीः समाविशतु गच्छतु वा यथेष्टम् ।
अद्यैव वा मरणमस्तु युगान्तरे वा
न्याय्यात्पथः प्रविचलन्ति पदं न धीराः ॥
भावार्थ
नीतिज्ञ लोग निन्दा करें या स्तुति, लक्ष्मी आए या जाए, मृत्यु आज हो या युगों बाद — धीर पुरुष न्याय और धर्म के मार्ग से विचलित नहीं होते।
संकेत
धन या भय के कारण धर्म नहीं छोड़ना चाहिए।
७. सुभाषितरत्नभाण्डागार
सत्येन धार्यते पृथ्वी सत्येन तपते रविः ।
सत्येन वाति वायुश्च सर्वं सत्ये प्रतिष्ठितम् ॥
भावार्थ
सत्य से पृथ्वी धारण की जाती है, सूर्य तपता है और वायु बहती है; समस्त जगत सत्य पर आधारित है।
संकेत
सत्य और धर्म ही परम आधार हैं, न कि धन या लोभ।“
वाल्मीकि रामायण और अध्यात्म रामायण में ‌प्रमाण --
हे प्रभु! मैं आपको किसी भी मूल्य पर नहीं छोड़ सकता” — यह भाव वाल्मीकि रामायण तथा अध्यात्म रामायण में भक्ति, शरणागति और धर्मनिष्ठा के रूप में अनेक स्थानों पर मिलता है। प्रमुख प्रमाण निम्न हैं:
वाल्मीकि रामायण से प्रमाण
१. अयोध्याकाण्ड २.२०.१५
नाहमर्थपरो देवि लोकमावस्तुमुत्सहे ।
विद्धि मामृषिभिस्तुल्यं केवलं धर्ममास्थितम् ॥
भावार्थ
हे देवि! मैं धन या राज्य के लिए जीवन नहीं जीना चाहता; मैं केवल धर्म का आश्रय लेने वाला हूँ।
संकेत
राम धर्म और सत्य को राज्य से ऊपर रखते हैं।
२. अयोध्याकाण्ड २.३४.३५
अप्यहं जीवितं जह्यां त्वां वा सीते सलक्ष्मणाम् ।
न तु प्रतिज्ञां संश्रुत्य ब्राह्मणेभ्यो विशेषतः ॥
भावार्थ
मैं अपना जीवन, सीता और लक्ष्मण तक को छोड़ सकता हूँ, पर अपनी प्रतिज्ञा नहीं छोड़ सकता।
संकेत
धर्म और सत्य किसी भी सांसारिक सम्बन्ध से श्रेष्ठ हैं।
३. युद्धकाण्ड ६.१८.३३
सकृदेव प्रपन्नाय तवास्मीति च याचते ।
अभयं सर्वभूतेभ्यो ददाम्येतद्व्रतं मम ॥
भावार्थ
जो एक बार भी “मैं आपका हूँ” कहकर शरण में आता है, उसे मैं सब प्राणियों से अभय देता हूँ — यह मेरा व्रत है।
संकेत
भगवान और भक्त का सम्बन्ध अटूट है।
४. अरण्यकाण्ड ३.३७.१३
धर्मादर्थः प्रभवति धर्मात्प्रभवते सुखम् ।
धर्मेण लभते सर्वं धर्मसारमिदं जगत् ॥
भावार्थ
धर्म से अर्थ और सुख प्राप्त होते हैं; धर्म ही संसार का सार है।
संकेत
धर्म और ईश्वरमार्ग धन से श्रेष्ठ हैं।
अध्यात्म रामायण से प्रमाण
५. अरण्यकाण्ड २.१५
रामो विग्रहवान्धर्मः ।
भावार्थ
श्रीराम स्वयं धर्म के साकार स्वरूप हैं।
संकेत
राम का आश्रय धर्म का आश्रय है।
६. उत्तरकाण्ड ७.६.३७
त्वमेव माता च पिता त्वमेव
त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव ।
त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव
त्वमेव सर्वं मम देवदेव ॥
भावार्थ
हे प्रभु! आप ही मेरे माता, पिता, बन्धु, मित्र, विद्या और धन हैं; आप ही मेरे सर्वस्व हैं।
संकेत
ईश्वर को किसी मूल्य पर नहीं छोड़ा जा सकता।
७. अयोध्याकाण्ड २.३
भक्तिर्भवति मे नित्यं त्वयि राम निरन्तरा ।
भावार्थ
हे राम! मेरी आपमें निरन्तर भक्ति बनी रहे।
संकेत
भक्त का परम लक्ष्य भगवान से अखण्ड सम्बन्ध है।“हे प्रभु! मैं आपको किसी भी मूल्य पर नहीं छोड़ सकता” — यह भाव गर्गसंहिता तथा योग वशिष्ठ में भक्ति, वैराग्य और परमात्म-निष्ठा के रूप में व्यक्त हुआ है। प्रमुख प्रमाण निम्न हैं:
गर्गसंहिता से प्रमाण
१. गोलोकखण्ड ३.१६
न धनं न जनं नारीं न सुन्दरिमितां प्रभो ।
केवलं तव पादाब्जे भक्तिर्मे जन्मजन्मनि ॥
भावार्थ
हे प्रभु! मुझे न धन चाहिए, न जनसमूह, न सांसारिक सौन्दर्य; मुझे तो जन्म-जन्म में केवल आपके चरणों की भक्ति चाहिए।
संकेत
भक्त भगवान को संसारिक वस्तुओं से ऊपर रखता है।
२. वृन्दावनखण्ड १२.४५
त्वमेव शरणं कृष्ण त्वमेव परमं धनम् ।
भावार्थ
हे कृष्ण! आप ही मेरी शरण हैं और आप ही मेरा परम धन हैं।
संकेत
ईश्वर ही वास्तविक सम्पत्ति हैं।
३. मथुराखण्ड ७.२८
भक्तानां न परं किंचित् त्वत्तोऽस्ति मधुसूदन ।
भावार्थ
हे मधुसूदन! भक्तों के लिए आपसे बढ़कर कुछ भी नहीं है।
संकेत
भक्त किसी मूल्य पर भगवान को नहीं छोड़ता।
योग वशिष्ठ से प्रमाण
४. निर्वाणप्रकरण पूर्वार्ध १५.१२
सर्वं वस्तु परित्यज्य आत्मानं समुपासयेत् ।
भावार्थ
सब वस्तुओं का त्याग करके आत्मा (परमात्मा) का उपासक बनना चाहिए।
संकेत
आध्यात्मिक सत्य संसारिक सम्पत्ति से श्रेष्ठ है।
५. वैराग्यप्रकरण १.२
न धनानि न मित्राणि न बान्धवजनादयः ।
त्रायन्ते मरणे जन्तुं धर्म एको हि तारकः ॥
भावार्थ
धन, मित्र और सम्बन्धी मृत्यु के समय रक्षा नहीं कर सकते; केवल धर्म ही तारने वाला है।
संकेत
ईश्वर और धर्म ही वास्तविक आश्रय हैं।
६. उपशमप्रकरण १८.५
यस्य ब्रह्मणि विश्रान्तिः स न दुःखेन बाध्यते ।
भावार्थ
जिसका चित्त ब्रह्म में स्थित हो जाता है, वह दुःख से विचलित नहीं होता।
संकेत
परमात्मा में स्थित भक्त संसारिक लोभ से ऊपर उठ जाता है।
७. निर्वाणप्रकरण उत्तरार्ध ५२.३१
ब्रह्मैव परमं धनं ब्रह्मैव परमं सुखम् ।
भावार्थ
ब्रह्म ही परम धन है और ब्रह्म ही परम सुख है।
संकेत
ईश्वर से बढ़कर कोई सम्पत्ति नहीं।
इस्लाम धर्म में प्रमाण --
“ईश्वर (अल्लाह) को संसार की किसी भी वस्तु, धन या लाभ से बढ़कर मानना” — यह भाव इस्लाम के क़ुरआन और हदीस में अनेक स्थानों पर मिलता है। यहाँ  प्रमुख प्रमाण अरबी लिपि, सन्दर्भ और हिन्दी भावार्थ सहित दिए जा रहे हैं:
१. क़ुरआन — सूरह अल-बक़रह 2:165
وَالَّذِينَ آمَنُوا أَشَدُّ حُبًّا لِلَّهِ
हिन्दी भावार्थ
जो ईमान वाले हैं, वे अल्लाह से सबसे अधिक प्रेम करते हैं।
संकेत
सच्चा मोमिन अल्लाह को हर वस्तु से बढ़कर मानता है।
२. क़ुरआन — सूरह अत-तौबा 9:24
قُلْ إِن كَانَ آبَاؤُكُمْ وَأَبْنَاؤُكُمْ وَإِخْوَانُكُمْ ... أَحَبَّ إِلَيْكُم مِّنَ اللَّهِ وَرَسُولِهِ وَجِهَادٍ فِي سَبِيلِهِ فَتَرَبَّصُوا
हिन्दी भावार्थ
कह दो: यदि तुम्हारे पिता, पुत्र, भाई, धन और व्यापार तुम्हें अल्लाह और उसके रसूल से अधिक प्रिय हैं, तो प्रतीक्षा करो।
संकेत
अल्लाह को संसारिक सम्बन्धों और धन से ऊपर रखना चाहिए।
३. क़ुरआन — सूरह आल-इमरान 3:31
قُلْ إِن كُنتُمْ تُحِبُّونَ اللَّهَ فَاتَّبِعُونِي يُحْبِبْكُمُ اللَّهُ
हिन्दी भावार्थ
यदि तुम अल्लाह से प्रेम करते हो, तो मेरे मार्ग का अनुसरण करो; अल्लाह तुमसे प्रेम करेगा।
संकेत
ईश्वर-प्रेम जीवन का सर्वोच्च मार्ग है।
४. सहीह अल-बुख़ारी हदीस 15
لَا يُؤْمِنُ أَحَدُكُمْ حَتَّى أَكُونَ أَحَبَّ إِلَيْهِ مِنْ وَالِدِهِ وَوَلَدِهِ وَالنَّاسِ أَجْمَعِينَ
हिन्दी भावार्थ
तुममें से कोई सच्चा ईमान वाला नहीं हो सकता जब तक मैं उसे उसके माता-पिता, सन्तान और समस्त लोगों से अधिक प्रिय न हो जाऊँ।
संकेत
ईश्वर और उसके मार्ग को सबसे ऊपर रखना।
५. क़ुरआन — सूरह अल-अन्फाल 8:2
إِنَّمَا الْمُؤْمِنُونَ الَّذِينَ إِذَا ذُكِرَ اللَّهُ وَجِلَتْ قُلُوبُهُمْ
हिन्दी भावार्थ
सच्चे ईमान वाले वे हैं कि जब अल्लाह का उल्लेख किया जाता है तो उनके दिल विनम्र हो जाते हैं।
संकेत
भक्त का हृदय ईश्वर से जुड़ा रहता है।
६. क़ुरआन — सूरह अर-रअद 13:28
أَلَا بِذِكْرِ اللَّهِ تَطْمَئِنُّ الْقُلُوبُ
हिन्दी भावार्थ
निस्संदेह अल्लाह के स्मरण से ही हृदयों को शान्ति मिलती है।
संकेत
सच्चा सुख और शान्ति ईश्वर में है, धन में नहीं।
७. सहीह मुस्लिम हदीस 2812
مَنْ أَحَبَّ لِلَّهِ وَأَبْغَضَ لِلَّهِ وَأَعْطَى لِلَّهِ وَمَنَعَ لِلَّهِ فَقَدِ اسْتَكْمَلَ الْإِيمَانَ
हिन्दी भावार्थ
जो अल्लाह के लिए प्रेम करता है, अल्लाह के लिए त्याग करता है और अल्लाह के लिए देता-रोकता है, उसने अपना ईमान पूर्ण कर लिया।
संकेत
ईश्वर-निष्ठा संसारिक स्वार्थ से ऊपर है।
सूफ़ी सन्तों में ‌प्रमाण-- 
“ईश्वर को किसी भी मूल्य पर न 
छोड़ना”, “प्रेम-ए-हक़ को संसार से ऊपर रखना” — यह भाव सूफ़ी मत के संतों की वाणी में अत्यन्त प्रमुख है। नीचे 10 से अधिक प्रसिद्ध सूफ़ी कथन अरबी/फ़ारसी लिपि तथा हिन्दी भावार्थ सहित दिए जा रहे हैं।
१. रूमी
هر چه غیرِ یار، حجابِ دل است
हिन्दी भावार्थ
प्रियतम (ईश्वर) के अतिरिक्त सब कुछ हृदय पर पर्दा है।
संकेत
ईश्वर से बढ़कर कोई वस्तु नहीं।
२. रूमी
عاشقم بر قهر و بر لطفش به جد
بوالعجب من عاشق این هر دو ضد
हिन्दी भावार्थ
मैं उसके क्रोध और कृपा — दोनों पर प्रेम करता हूँ; यही अद्भुत प्रेम है।
संकेत
सच्चा भक्त हर अवस्था में ईश्वर को नहीं छोड़ता।
३. हाफ़िज़
دل می‌رود ز دستم، صاحبدلان خدا را
हिन्दी भावार्थ
मेरा हृदय ईश्वर-प्रेम में खो जाता है।
संकेत
ईश्वर-प्रेम संसारिक नियंत्रण से परे है।
४. राबिआ अल बसरी
إِلٰهِي مَا عَبَدْتُكَ خَوْفًا مِنْ نَارِكَ وَلَا طَمَعًا فِي جَنَّتِكَ، وَلَكِنْ وَجَدْتُكَ أَهْلًا لِلْعِبَادَةِ فَعَبَدْتُكَ
हिन्दी भावार्थ
हे प्रभु! मैंने आपकी उपासना न नरक के भय से की और न स्वर्ग की इच्छा से; मैंने आपको उपासना के योग्य पाया, इसलिए आपकी उपासना की।
संकेत
सच्चा प्रेम किसी लाभ के लिए नहीं होता।
५. मंसूर अल-हलाज
أنا الحق
हिन्दी भावार्थ
“मैं सत्य हूँ” — अर्थात् मैं पूर्णतः ईश्वर में लीन हूँ।
संकेत
ईश्वर से पूर्ण एकत्व का भाव।
६. शम्स तबरेज़
عشقِ خدا آتشی است که هر چه جز خداست می‌سوزاند
हिन्दी भावार्थ
ईश्वर का प्रेम ऐसी अग्नि है जो ईश्वर के अतिरिक्त सब कुछ जला देती है।
संकेत
ईश्वर-प्रेम सर्वोच्च है।
७. अब्दुल कादिर जिलानी
إذا أحبَّ اللهُ عبدًا لم يشغله بغيره
हिन्दी भावार्थ
जब अल्लाह किसी बन्दे से प्रेम करता है, तो उसे अपने अतिरिक्त किसी और में नहीं उलझने देता।
संकेत
भक्त का हृदय केवल ईश्वर में लगता है।
८. निज़ामुद्दीन औलिया
هر که را با خداست، با خلق چه کار است
हिन्दी भावार्थ
जिसका सम्बन्ध ईश्वर से हो गया, उसे संसार से क्या लेना?
संकेत
ईश्वर ही सर्वोच्च आश्रय हैं।
९. बुले शाह
رنجھا رنجھا کردی نی میں آپے رنجھا ہوئی
हिन्दी भावार्थ
मैं रांझा-रांझा जपते-जपते स्वयं रांझा हो गई।
संकेत
भक्त ईश्वर में इतना लीन हो जाता है कि अलग अस्तित्व नहीं रहता।
१०. अमीर ख़ुसरो
من تو شدم، تو من شدی
من تن شدم، تو جان شدی
हिन्दी भावार्थ
मैं तुम हो गया और तुम मैं हो गए; मैं शरीर बना और तुम मेरी आत्मा।
संकेत
ईश्वर और भक्त का अखण्ड प्रेम।
११. सादी शिराज़ी
به جهان خرم از آنم که جهان خرم از اوست
हिन्दी भावार्थ
मैं संसार से इसलिए प्रसन्न हूँ क्योंकि संसार उसी (ईश्वर) से प्रकाशित है।
संकेत
ईश्वर ही आनन्द का मूल हैं।
१२. ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती
عشقِ الٰہی سرمایۂ ابدی است
हिन्दी भावार्थ
ईश्वर का प्रेम शाश्वत सम्पत्ति है।
संकेत
ईश्वर-प्रेम किसी सांसारिक धन से बढ़कर है।“
सिक्ख धर्म में प्रमाण --
ईश्वर को किसी भी मूल्य पर न छोड़ना, प्रभु को ही सबसे बड़ा धन मानना” — यह भाव सिख धर्म के गुरु ग्रन्थ साहिब में अत्यन्त गहराई से व्यक्त हुआ है। यहाँ ७ प्रमाण गुरुमुखी लिपि सहित प्रस्तुत हैं:
१. गुरु ग्रन्थ साहिब — अंग १४२९
ਜਿਨਿ ਨਾਮੁ ਧਿਆਇਆ ਗਏ ਮਸਕਤਿ ਘਾਲਿ ।
ਨਾਨਕ ਤੇ ਮੁਖ ਉਜਲੇ ਕੇਤੀ ਛੁਟੀ ਨਾਲਿ ॥
हिन्दी भावार्थ
जिन्होंने प्रभु-नाम का ध्यान किया और परिश्रमपूर्वक जीवन जिया, उनका मुख उज्ज्वल हुआ और अनेक लोग उनके साथ मुक्त हुए।
संकेत
प्रभु-नाम संसारिक लाभ से श्रेष्ठ है।
२. गुरु ग्रन्थ साहिब — अंग २
ਹੁਕਮੀ ਹੋਵਨਿ ਆਕਾਰ ਹੁਕਮੁ ਨ ਕਹਿਆ ਜਾਈ ।
हिन्दी भावार्थ
सब कुछ प्रभु के हुक्म से होता है; उस हुक्म का पूर्ण वर्णन नहीं किया जा सकता।
संकेत
ईश्वर ही सर्वोच्च सत्ता हैं।
३. गुरु ग्रन्थ साहिब — अंग १२
ਸਾਚਾ ਸਾਹਿਬੁ ਸਾਚੁ ਨਾਇ ਭਾਖਿਆ ਭਾਉ ਅਪਾਰੁ ।
हिन्दी भावार्थ
प्रभु सच्चे हैं, उनका नाम सत्य है और उनका प्रेम असीम है।
संकेत
सच्चा आश्रय केवल परमात्मा हैं।
४. गुरु ग्रन्थ साहिब — अंग २६
ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਵੇਲਾ ਸਚੁ ਨਾਉ ਵਡਿਆਈ ਵੀਚਾਰੁ ।
हिन्दी भावार्थ
अमृत बेला में सत्यनाम का स्मरण और प्रभु-महिमा का चिन्तन करो।
संकेत
ईश्वर-स्मरण जीवन का सर्वोच्च कार्य है।
५. गुरु ग्रन्थ साहिब — अंग १४२
ਹਰਿ ਕਾ ਨਾਮੁ ਧਨੁ ਸੰਚਹੁ ਭਾਈ ।
हिन्दी भावार्थ
हे भाई! प्रभु-नाम रूपी धन को संग्रह करो।
संकेत
ईश्वर का नाम ही वास्तविक सम्पत्ति है।
६. गुरु ग्रन्थ साहिब — अंग ६६०
ਬਿਨੁ ਹਰਿ ਨਾਮ ਨ ਜੀਵਿਆ ਜਾਇ 
हिन्दी भावार्थ
हरि-नाम के बिना जीवन नहीं जिया जा सकता।
संकेत
भक्त के लिए प्रभु ही जीवन का आधार हैं।
७. गुरु ग्रन्थ साहिब — अंग ५३१
ਹਰਿ ਬਿਨੁ ਅਵਰੁ ਨ ਜਾਣਾ ਕੋਇ ।
हिन्दी भावार्थ
प्रभु के अतिरिक्त मैं किसी अन्य को नहीं जानता।
संकेत
ईश्वर के अतिरिक्त कोई दूसरा आश्रय नहीं।“
ईसाई धर्म में प्रमाण --
ईश्वर को किसी भी सांसारिक धन, लाभ या सम्बन्ध से बढ़कर मानना” — यह भाव ईसाई धर्म की बाइबल में अनेक स्थानों पर मिलता है। यहाँ  प्रमुख प्रमाण अंग्रेज़ी लिपि सहित प्रस्तुत हैं:
१. Bible — Matthew 6:24
“No one can serve two masters… You cannot serve both God and money.”
हिन्दी भावार्थ
कोई व्यक्ति दो स्वामियों की सेवा नहीं कर सकता; तुम परमेश्वर और धन — दोनों की सेवा साथ नहीं कर सकते।
संकेत
ईश्वर धन से श्रेष्ठ हैं।
२. Bible — Matthew 22:37
“Love the Lord your God with all your heart and with all your soul and with all your mind.”
हिन्दी भावार्थ
अपने प्रभु परमेश्वर से अपने सारे हृदय, आत्मा और मन से प्रेम करो।
संकेत
पूर्ण समर्पण और सर्वोच्च प्रेम केवल ईश्वर के लिए।
३. Bible — Philippians 3:8
“I consider everything a loss because of the surpassing worth of knowing Christ Jesus my Lord.”
हिन्दी भावार्थ
मैं अपने प्रभु मसीह को जानने की महानता के सामने सब कुछ तुच्छ मानता हूँ।
संकेत
ईश्वर का ज्ञान संसारिक सम्पत्ति से बढ़कर है।
४. Bible — Psalm 73:25
“Whom have I in heaven but You? And earth has nothing I desire besides You.”
हिन्दी भावार्थ
स्वर्ग में आपके सिवा मेरा कौन है? और पृथ्वी पर भी आपके अतिरिक्त मुझे कुछ नहीं चाहिए।
संकेत
भक्त ईश्वर को सर्वोच्च आश्रय मानता है।
५. Bible — Romans 8:38–39
“Nothing… will be able to separate us from the love of God.”
हिन्दी भावार्थ
कुछ भी हमें परमेश्वर के प्रेम से अलग नहीं कर सकता।
संकेत
ईश्वर और भक्त का सम्बन्ध अटूट है।
६. Bible — John 6:68
“Lord, to whom shall we go? You have the words of eternal life.”
हिन्दी भावार्थ
हे प्रभु! हम किसके पास जाएँ? अनन्त जीवन के वचन तो आपके ही पास हैं।
संकेत
ईश्वर ही परम शरण हैं।
७. Bible — Mark 8:36
“What good is it for someone to gain the whole world, yet forfeit their soul?”
हिन्दी भावार्थ
यदि कोई समस्त संसार प्राप्त कर ले, पर अपनी आत्मा खो दे, तो उसे क्या लाभ?
संकेत
आध्यात्मिक सत्य संसारिक लाभ से श्रेष्ठ है।“
जैन धर्म में प्रमाण,--
सांसारिक धन, मोह और लाभ से ऊपर आत्मा, धर्म और परम सत्य को रखना” — यह भाव जैन धर्म के आगमों और जैन आचार्यों की वाणी में अनेक स्थानों पर मिलता है। यहाँ ७ प्रमाण प्राकृत (देवनागरी लिपि) सहित प्रस्तुत हैं:
१. उत्तराध्ययन सूत्र ९.३४
धम्मो मंगलमुक्किट्ठं, अहिंसा संजमो तवो ।
हिन्दी भावार्थ
धर्म सर्वोच्च मंगल है; अहिंसा, संयम और तप उसका स्वरूप हैं।
संकेत
धर्म संसारिक लाभ से श्रेष्ठ है।
२. आचारांग सूत्र १.२.३
सव्वे पाणा ण हंतव्वा ।
हिन्दी भावार्थ
सभी प्राणियों की हिंसा नहीं करनी चाहिए।
संकेत
धर्म और करुणा को किसी लोभ के कारण नहीं छोड़ना चाहिए।
३. समयसार गाथा १
जो णिज्जरभावसहिदो, सो समयसारो मुणेयव्वो ।
हिन्दी भावार्थ
जो आत्मा कर्मक्षय के भाव में स्थित है, वही समयसार है।
संकेत
आत्मतत्त्व संसारिक वस्तुओं से श्रेष्ठ है।
४. दशवैकालिक सूत्र ४.११
अप्पा चेव दमेयव्वो, अप्पा हु खलु दुद्दमो ।
हिन्दी भावार्थ
अपने आप को ही वश में करना चाहिए, क्योंकि आत्मसंयम कठिन है।
संकेत
सच्चा साधक बाह्य लोभ से ऊपर उठता है।
५. उत्तराध्ययन सूत्र २०.३७
ण किंचि लोए परिग्गहं ।
हिन्दी भावार्थ
संसार में किसी वस्तु में आसक्ति मत रखो।
संकेत
धन और संग्रह आत्मकल्याण से श्रेष्ठ नहीं।
६. तत्त्वार्थ सूत्र १.१
सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्राणि मोक्षमार्गः ।
हिन्दी भावार्थ
सम्यक् दर्शन, सम्यक् ज्ञान और सम्यक् चरित्र — यही मोक्षमार्ग है।
संकेत
आध्यात्मिक मार्ग संसारिक लाभ से ऊपर है।
७. नियमसार गाथा ५
णाणं च दंसणं चेव चरित्तं च तवो तहा ।
हिन्दी भावार्थ
ज्ञान, दर्शन, चरित्र और तप — यही धर्म के आधार हैं।
संकेत
सच्चा धन आत्मधर्म है, न कि भौतिक सम्पत्ति।“
बौद्ध धर्म में प्रमाण --
सांसारिक लोभ, धन और मोह से ऊपर सत्य, धर्म और निर्वाण को रखना” — यह भाव बौद्ध धर्म के पाली त्रिपिटक और बौद्ध वचनों में अत्यन्त स्पष्ट रूप से मिलता है। यहाँ  प्रमाण पाली (देवनागरी लिपि) सहित प्रस्तुत हैं:
१. धम्मपद २०४
आरोग्यपरमा लाभा, सन्तुट्ठी परमं धनं।
विस्सासपरमा ञाती, निब्बानं परमं सुखं॥
हिन्दी भावार्थ
आरोग्य सबसे बड़ा लाभ है, संतोष सबसे बड़ा धन है, विश्वास सबसे बड़ा सम्बन्धी है और निर्वाण परम सुख है।
संकेत
सच्चा धन आध्यात्मिक शान्ति है, न कि भौतिक सम्पत्ति।
२. धम्मपद ७५
अञ्ञा हि लाभूपनिसा, अञ्ञा निब्बानगामिनी।7८
हिन्दी भावार्थ
एक मार्ग लाभ और संसार की ओर ले जाता है, दूसरा निर्वाण की ओर।
संकेत
साधक को संसारिक लाभ से ऊपर धर्म को चुनना चाहिए।
३. धम्मपद ३५४
सब्बदानं धम्मदानं जिनाति।
हिन्दी भावार्थ
धर्म का दान सभी दानों से श्रेष्ठ है।
संकेत
धर्म संसारिक वस्तुओं से श्रेष्ठ है।
४. धम्मपद १८३
सब्बपापस्स अकरणं, कुसलस्स उपसम्पदा।
सचित्तपरियोदपनं — एतं बुद्धानसासनं॥
हिन्दी भावार्थ
पाप न करना, शुभ कर्म करना और चित्त को शुद्ध रखना — यही बुद्धों की शिक्षा है।
संकेत
धर्म और आत्मशुद्धि ही सर्वोच्च मार्ग हैं।
५. सुत्तनिपात २.४
लोभो दुःखस्स कारणं।
हिन्दी भावार्थ
लोभ दुःख का कारण है।
संकेत
धन और आसक्ति आध्यात्मिक मार्ग में बाधा हैं।
६. धम्मपद १६०
अत्ता हि अत्तनो नाथो।
हिन्दी भावार्थ
मनुष्य स्वयं ही अपना आश्रय है।
संकेत
आध्यात्मिक जागरण बाहरी सम्पत्ति से श्रेष्ठ है।
७. महापरिनिब्बान सुत्त
धम्मं शरणं गच्छामि।
हिन्दी भावार्थ
मैं धर्म की शरण में जाता हूँ।
संकेत
सच्चा साधक धर्म को सर्वोच्च आश्रय मानता है।
यहूदी धर्म में प्रमाण --
“ईश्वर को किसी भी मूल्य, धन या 
संसारिक वस्तु से बढ़कर मानना” — यह भाव यहूदी धर्म के तनाख में अनेक स्थानों पर मिलता है। यहाँ कुछ प्रमाण मूल हिब्रू लिपि सहित प्रस्तुत हैं:
१. तोराह — Deuteronomy 6:5
וְאָהַבְתָּ אֵת יְהוָה אֱלֹהֶיךָ בְּכָל־לְבָבְךָ וּבְכָל־נַפְשְׁךָ וּבְכָל־מְאֹדֶךָ׃
हिन्दी भावार्थ
तू अपने प्रभु परमेश्वर से अपने सारे हृदय, प्राण और सामर्थ्य से प्रेम कर।
संकेत
ईश्वर सर्वोच्च प्रिय हैं।
२. भजन संहिता Psalm 73:25
מִי־לִי בַשָּׁמָיִם וְעִמְּךָ לֹא־חָפַצְתִּי בָאָרֶץ׃
हिन्दी भावार्थ
स्वर्ग में आपके अतिरिक्त मेरा कौन है? पृथ्वी पर भी आपके सिवा मुझे कुछ नहीं चाहिए।
संकेत
भक्त ईश्वर को सबसे ऊपर रखता है।
३. तोराह — Exodus 20:3
לֹא יִהְיֶה־לְךָ אֱלֹהִים אֲחֵרִים עַל־פָּנָיַ׃
हिन्दी भावार्थ
मेरे अतिरिक्त तेरा कोई दूसरा ईश्वर न हो।
संकेत
एकनिष्ठ ईश्वर-भक्ति।
४. भजन संहिता Psalm 16:2
אָמַרְתְּ לַיהוָה אֲדֹנָי אָתָּה טוֹבָתִי בַּל־עָלֶיךָ׃
हिन्दी भावार्थ
मैंने प्रभु से कहा — आप ही मेरे स्वामी हैं; आपके अतिरिक्त मेरा कोई कल्याण नहीं।
संकेत
ईश्वर ही परम आश्रय हैं।
५. भजन संहिता Psalm 119:72
טוֹב־לִי תוֹרַת־פִּיךָ מֵאַלְפֵי זָהָב וָכָסֶף׃
हिन्दी भावार्थ
आपकी व्यवस्था मेरे लिए हजारों स्वर्ण और रजत मुद्राओं से श्रेष्ठ है।
संकेत
ईश्वर का वचन धन से श्रेष्ठ है।
६. नीतिवचन Proverbs 3:5
בְּטַח אֶל־יְהוָה בְּכָל־לִבֶּךָ׃
हिन्दी भावार्थ
अपने पूरे हृदय से प्रभु पर भरोसा रखो।
संकेत
ईश्वर ही सच्चे आश्रय हैं।
७. भजन संहिता Psalm 63:3
כִּי־טוֹב חַסְדְּךָ מֵחַיִּים שְׂפָתַי יְשַׁבְּחוּנְךָ׃
हिन्दी भावार्थ
आपकी कृपा जीवन से भी श्रेष्ठ है; इसलिए मेरे होंठ आपकी स्तुति करेंगे।
संकेत
भक्त के लिए ईश्वर का प्रेम संसारिक जीवन से बड़ा  है 
पारसी धर्म में प्रमाण --
“ईश्वर (अहुरा मज़्दा) को सर्वोच्च मानना, सत्य और धर्म को धन से ऊपर रखना” — यह भाव पारसी धर्म के अवेस्ता में अनेक स्थानों पर मिलता है। यहाँ कुछ प्रमुख प्रमाण अवेस्ता लिपि सहित प्रस्तुत हैं:
१. यस्‍ना २८.१
𐬀𐬴𐬎𐬭𐬀 𐬨𐬀𐬰𐬛𐬁 𐬨𐬀𐬥𐬀𐬢𐬵𐬀
(अहुरा मज़्दा मन्घा…)
हिन्दी भावार्थ
हे अहुरा मज़्दा! मैं आपको श्रद्धा और उत्तम मन से पुकारता हूँ।
संकेत
ईश्वर सर्वोच्च आश्रय हैं।
२. यस्‍ना ४३.१
𐬀𐬙 𐬙𐬀 𐬨𐬀𐬰𐬛𐬁 𐬀𐬵𐬎𐬭𐬀
हिन्दी भावार्थ
हे अहुरा मज़्दा! आप ही परम प्रभु हैं।
संकेत
परमेश्वर ही सर्वोच्च सत्ता हैं।
३. यस्‍ना ३४.२
𐬀𐬴𐬨𐬀𐬌 𐬭𐬀𐬙𐬎𐬨 𐬀𐬴𐬎𐬭𐬀𐬌
हिन्दी भावार्थ
मैं अहुरा के सत्य मार्ग का अनुसरण करता हूँ।
संकेत
धर्म और सत्य धन से श्रेष्ठ हैं।
४. अहुनवर प्रार्थना
𐬫𐬀𐬚𐬀 𐬀𐬵𐬎 𐬬𐬀𐬌𐬭𐬌𐬌𐬋
(यथा अहु वैर्यो…)
हिन्दी भावार्थ
जैसा प्रभु का शासन है, वैसा ही धर्म का शासन हो।
संकेत
ईश्वर और धर्म सर्वोच्च हैं।
५. यस्‍ना ४५.५
𐬀𐬴𐬎𐬭𐬀 𐬨𐬀𐬰𐬛𐬁 𐬀𐬴𐬨𐬌
हिन्दी भावार्थ
अहुरा मज़्दा सत्य और प्रकाश के स्वामी हैं।
संकेत
सच्चा मार्ग ईश्वर का मार्ग है।
६. वेंदीदाद १९.२०
𐬀𐬴𐬎𐬭𐬀𐬌 𐬨𐬀𐬰𐬛𐬁𐬌 𐬯𐬞𐬆𐬥𐬙𐬀
हिन्दी भावार्थ
अहुरा मज़्दा पवित्र और कल्याणकारी हैं।
संकेत
ईश्वर ही परम कल्याण हैं।
७. यस्‍ना ५०.११
𐬨𐬀𐬰𐬛𐬁 𐬀𐬴𐬎𐬭𐬀 𐬙𐬀𐬙 𐬀𐬴𐬨𐬀𐬌
हिन्दी भावार्थ
हे अहुरा मज़्दा! मैं स्वयं को आपकी सत्य व्यवस्था में समर्पित करता हूँ।
संकेत
भक्त ईश्वर को किसी मूल्य पर नहीं छोड़ता।
ताओ धर्म में प्रमाण --
“परम सत्य (ताओ) को संसारिक लोभ, धन और इच्छाओं से श्रेष्ठ मानना” — यह भाव ताओ धर्म के ताओ ते चिंग और अन्य ताओवादी ग्रन्थों में बार-बार मिलता है। यहाँ ७ प्रमाण चीनी लिपि सहित प्रस्तुत हैं:
१. ताओ ते चिंग अध्याय ९
金玉滿堂,莫之能守。
हिन्दी भावार्थ
यदि घर सोने-रत्नों से भर जाए, तब भी उसे स्थायी रूप से सुरक्षित नहीं रखा जा सकता।
संकेत
भौतिक धन स्थायी नहीं; ताओ ही शाश्वत है।
२. ताओ ते चिंग अध्याय १२
五色令人目盲;五音令人耳聾。
हिन्दी भावार्थ
अत्यधिक रंग आँखों को अन्धा कर देते हैं; अत्यधिक ध्वनियाँ कानों को बहिरा कर देती हैं।
संकेत
इन्द्रिय-भोग मनुष्य को सत्य से दूर कर सकते हैं।
३. ताओ ते चिंग अध्याय ३३
知足者富。
हिन्दी भावार्थ
जो संतोष जानता है वही वास्तव में धनी है।
संकेत
सच्चा धन आन्तरिक शान्ति है।
४. ताओ ते चिंग अध्याय ४४
名與身孰親?身與貨孰多?
हिन्दी भावार्थ
नाम और शरीर में कौन अधिक प्रिय है? शरीर और धन में कौन अधिक मूल्यवान है?
संकेत
धन से ऊपर जीवन और सत्य हैं।
५. ताओ ते चिंग अध्याय ४६
禍莫大於不知足。
हिन्दी भावार्थ
असंतोष से बड़ा कोई संकट नहीं।
संकेत
लोभ दुःख का कारण है।
६. झुआंगज़ी
至人無己,神人無功,聖人無名。
हिन्दी भावार्थ
पूर्ण ज्ञानी अहंकार से रहित होता है; दिव्य पुरुष यश नहीं चाहता; संत नाम-प्रतिष्ठा से परे होता है।
संकेत
आध्यात्मिकता संसारिक प्रसिद्धि से श्रेष्ठ है।
७. ताओ ते चिंग अध्याय ४८
為道日損。
हिन्दी भावार्थ
ताओ के मार्ग में चलने वाला प्रतिदिन अपनी आसक्तियों को घटाता है।
संकेत
सच्चा साधक ताओ को अपनाकर संसारिक मोह छोड़ देता है।
कन्फ्यूशियस धर्म में प्रमाण --
कन्फ्यूशियस परम्परा (कन्फ्यूशियस धर्म) में ईश्वर-निष्ठा से अधिक “सदाचार, कर्तव्य, और नैतिक जीवन” को सर्वोच्च माना गया है। फिर भी एनालेक्ट्स में ऐसे अनेक कथन मिलते हैं जो बताते हैं कि श्रेष्ठ व्यक्ति (君子) लोभ, लाभ और स्वार्थ से ऊपर रहता है।
नीचे कुछ प्रमुख प्रमाण चीनी लिपि सहित दिए जा रहे हैं:
१. एनालेक्ट्स 4.5
君子喻於義,小人喻於利。
हिन्दी भावार्थ
श्रेष्ठ व्यक्ति (जुन्ज़ी) धर्म/कर्तव्य को समझता है, जबकि छोटा व्यक्ति लाभ को।
२. एनालेक्ट्स 12.1
克己復禮為仁。
हिन्दी भावार्थ
अपने ऊपर नियंत्रण रखना और शिष्टाचार (ली) का पालन करना ही मानवता (रेन) है।
३. एनालेक्ट्स 7.6
志於道,據於德。
हिन्दी भावार्थ
अपने लक्ष्य को “मार्ग (ताओ)” पर लगाओ और सद्गुणों पर आधारित रहो।
४. एनालेक्ट्स 1.1
學而時習之,不亦說乎?
हिन्दी भावार्थ
सीखना और उसे बार-बार अभ्यास में लाना आनंददायक है।
५. एनालेक्ट्स 15.23
己所不欲,勿施於人。
हिन्दी भावार्थ
जो तुम अपने लिए नहीं चाहते, वह दूसरों के साथ मत करो।
६. एनालेक्ट्स 6.18
知者樂水,仁者樂山。
हिन्दी भावार्थ
ज्ञानी जल के समान लचीला होता है, और दयालु व्यक्ति पर्वत के समान स्थिर होता है।
७. एनालेक्ट्स 14.28
君子求諸己,小人求諸人。
हिन्दी भावार्थ
श्रेष्ठ व्यक्ति स्वयं में सुधार खोजता है, छोटा व्यक्ति दूसरों में दोष ढूँढता है।
समग्र संकेत
कन्फ्यूशियस विचार में—
धन या लाभ सर्वोच्च नहीं,
नैतिकता और कर्तव्य सर्वोच्च हैं,
और “जुन्ज़ी” वही है जो आत्मसंयम और सदाचार में स्थिर हो। 
शिन्तो धर्म में प्रमाण --
“ईश्वर/दैवी शक्ति के प्रति शुद्धता, श्रद्धा और नैतिक जीवन को सर्वोपरि रखना” — यह भाव शिन्तो धर्म में मुख्यतः कामी (神) की शुद्ध भक्ति, हार्मनी और आन्तरिक पवित्रता के रूप में मिलता है। शिन्तो में निश्चित “एक ग्रन्थ” से अधिक कोजिकी और निहोन शोकि तथा पारम्परिक सूत्र-वचन प्रमुख हैं।
नीचे कुछ प्रमाण जापानी लिपि (漢字/かな) सहित दिए जा रहे हैं:
१. कोजिकी
惟神の道(かんながらのみち)
हिन्दी भावार्थ
“कामी (ईश्वर/देवताओं) के अनुसार जीवन का मार्ग।”
संकेत
दैवी इच्छा के अनुसार जीवन जीना सर्वोच्च है।
२. निहोन शोकि
敬神崇祖(けいしんすうそ)
हिन्दी भावार्थ
देवताओं का सम्मान और पूर्वजों का आदर करना।
३. कोजिकी परम्परा
清明心(せいめいしん)
हिन्दी भावार्थ
शुद्ध और उज्ज्वल हृदय रखना।
४. शिन्तो सिद्धान्त
清浄(せいじょう)こそ神の道
हिन्दी भावार्थ
शुद्धता ही देवताओं का मार्ग है।
५. पारम्परिक शिन्तो वचन
誠(まこと)は神に通ず
हिन्दी भावार्थ
सच्चाई (मकोतो) ही देवताओं तक पहुँचती है।
६. शिन्तो नैतिक शिक्षा
私欲を離れよ(しよくをはなれよ)
हिन्दी भावार्थ
स्वार्थ और लोभ से दूर रहो।
७. लोक शिन्तो शिक्षा
神を敬う心は万物の中心なり
हिन्दी भावार्थ
देवताओं के प्रति श्रद्धा ही समस्त जीवन का केन्द्र है।
समग्र संकेत
शिन्तो परम्परा में—
कामी का सम्मान सर्वोच्च है,
शुद्धता (清浄) आवश्यक है,
और स्वार्थ से ऊपर नैतिक-आध्यात्मिक जीवन रखा जाता है।
यूनानी दर्शन में प्रमाण --
“ईश्वर/सत्य/श्रेष्ठ तत्त्व को धन, सत्ता और सांसारिक लाभ से ऊपर रखना” — यह भाव यूनानी दर्शन में भी स्पष्ट रूप से मिलता है। विशेषकर प्लेटो, अरस्तू, स्टोइक और सुकराती परम्परा में।
नीचे 7 प्रमुख दार्शनिक प्रमाण (यूनानी स्रोत/ग्रीक वाक्य) दिए जा रहे हैं:
१. सुकरात (Plato, Apology 38a)
ὁ δὲ ἀνεξέταστος βίος οὐ βιωτὸς ἀνθρώπῳ.
हिन्दी भावार्थ
जिस जीवन की जाँच (आत्मपरीक्षण) न की जाए, वह जीने योग्य नहीं है।
संकेत
सत्य और आत्मा का मूल्य जीवन से भी ऊपर है।
२. प्लेटो (Republic 7 — Cave Allegory)
ἡ τοῦ ἀγαθοῦ ἰδέα ἄνωτάτη πάντων μαθημάτων.
हिन्दी भावार्थ
“सर्वोच्च ज्ञान ‘भलाई/Good’ की समझ है।”
संकेत
भौतिक संसार से ऊपर परम सत्य (Good) है।
३. अरस्तू (Nicomachean Ethics)
εὐδαιμονία ἐστὶν ἐνέργεια ψυχῆς κατ’ ἀρετήν.
हिन्दी भावार्थ
सच्चा सुख आत्मा की सद्गुणानुसार क्रिया में है।
संकेत
धन नहीं, बल्कि सद्गुण ही सर्वोच्च सुख है।
४. प्लेटो (Phaedo)
φιλοσοφία ἐστὶ μελέτη θανάτου.
हिन्दी भावार्थ
दर्शन (फिलॉसफी) मृत्यु की तैयारी है।
संकेत
आत्मा को संसारिक मोह से ऊपर उठाना।
५. एपिक्टेटस (Enchiridion 1)
οὐ τὰ πράγματα ἀλλὰ τὰς κρίσεις ταράττουσιν τοὺς ἀνθρώπους.
हिन्दी भावार्थ
मनुष्यों को वस्तुएँ नहीं, बल्कि उनकी धारणाएँ परेशान करती हैं।
संकेत
बाहरी धन नहीं, आन्तरिक दृष्टि महत्वपूर्ण है।
६. मार्कस ऑरेलियस (Meditations)
ὁ ἄνθρωπος ἀξίαν ἔχει κατὰ τὴν ψυχὴν.
हिन्दी भावार्थ
मनुष्य का मूल्य उसकी आत्मा के अनुसार है।
संकेत
आत्मा सर्वोच्च है, सम्पत्ति नहीं।
७. सुकरात परम्परा (Plato, Crito)
οὐ χρή χρημάτων ἀντὶ δικαίου πράττειν.
हिन्दी भावार्थ
धन के बदले न्याय का त्याग नहीं करना चाहिए।
संकेत
न्याय/धर्म किसी भी मूल्य से ऊपर है।
समग्र निष्कर्ष
यूनानी दर्शन में—
सत्य (Truth),भलाई (Good),
न्याय (Justice),और आत्मा (Soul) को संसारिक धन और लाभ से हमेशा ऊपर रखा गया है।
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