ऋगुवेद सूक्ति--(8)की व्याख्या

ऋगुवेद सूक्ति-- (8) की व्याख्या 
"न विन्धेश्य सुष्टतिम"
ऋगुवेद --1/1/7
भावार्थ --मै स्तुति से पार नहीं पा सकता।
 उद्धृत मन्त्र ऋग्वेद 1.7.7 का है। सही पाठ इस प्रकार है—
तुञ्जे-तुञ्जे य उत्तरे स्तोमा इन्द्रस्य वज्रिणः ।
न विन्धे अस्य सुष्टुतिम् ॥
— ऋग्वेद
शब्दार्थ
तुञ्जे-तुञ्जे — प्रत्येक संघर्ष या यज्ञ में
यः उत्तरे स्तोमाः — जो उत्तम स्तुतियाँ हैं
इन्द्रस्य वज्रिणः — वज्रधारी इन्द्र की
न विन्धे — नहीं पा सकता / पूरी तरह ग्रहण नहीं कर सकता
अस्य सुष्टुतिम् — उसकी उत्तम स्तुति का पार
भावार्थ
“वज्रधारी इन्द्र की जो महान और उत्तम स्तुतियाँ हैं, उन्हें मैं पूर्ण रूप से व्यक्त नहीं कर सकता; उनकी महिमा का पार पाना कठिन है।”
अर्थात् ऋषि कहते हैं कि ईश्वर/इन्द्र की महिमा इतनी विशाल है कि मनुष्य की वाणी उसकी सम्पूर्ण स्तुति करने में समर्थ नहीं हो सकती।
वेदों में प्रमाण-- 
 “ईश्वर / देव की महिमा का पूर्ण वर्णन वाणी से नहीं हो सकता” — इस भाव पर वेदों में अनेक मन्त्र मिलते हैं। कुछ प्रमुख वैदिक प्रमाण इस प्रकार हैं —
1. ऋग्वेद 1.7.7
तुञ्जे-तुञ्जे य उत्तरे स्तोमा इन्द्रस्य वज्रिणः ।
न विन्धे अस्य सुष्टुतिम् ॥
भावार्थ
मैं वज्रधारी इन्द्र की उत्तम स्तुति का पूर्ण पार नहीं पा सकता; उसकी महिमा अनन्त है।
2. ऋग्वेद 1.164.46
इन्द्रं मित्रं वरुणमग्निमाहुः
अथो दिव्यः स सुपर्णो गरुत्मान् 
एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति
अग्निं यमं मातरिश्वानमाहुः ॥
भावार्थ
सत्य एक ही है, पर विद्वान उसे अनेक नामों से पुकारते हैं।
अर्थात् परम सत्य इतना व्यापक है कि उसे अनेक रूपों में व्यक्त किया जाता है।
3. यजुर्वेद 32.3
न तस्य प्रतिमा अस्ति यस्य नाम महद्यशः ॥
भावार्थ
उस परमात्मा की कोई प्रतिमा या पूर्ण उपमा नहीं है, जिसकी महिमा महान है।
4. अथर्ववेद 10.8.4
यो भूतं च भव्यम् च सर्वं यश्चाधितिष्ठति ।
स्वस्य च केवलं तस्मै ज्येष्ठाय ब्रह्मणे नमः ॥
भावार्थ
जो भूत, भविष्य और सम्पूर्ण जगत् का अधिष्ठाता है, उस महान ब्रह्म को नमस्कार है।
5. ऋग्वेद 10.121.1
हिरण्यगर्भः समवर्तताग्रे
भूतस्य जातः पतिरेक आसीत् ।
स दाधार पृथिवीं द्यामुतेमां
कस्मै देवाय हविषा विधेम ॥
भावार्थ
सृष्टि के आरम्भ में वही एक परम देव था जिसने पृथ्वी और आकाश को धारण किया; हम किस देव की उपासना करें?
यह मन्त्र ईश्वर की अद्वितीय और अनिर्वचनीय महिमा को प्रकट करता है।
6. सामवेद (ऋग्वेद 8.1.5 से सम्बद्ध)
इन्द्रमिद् गाथिनो बृहत्
इन्द्रमर्केभिरर्किणः ।
इन्द्रं वाणीरणूषत ॥
भावार्थ
गायक, ऋषि और वाणी — सब इन्द्र की स्तुति करते हैं; फिर भी उसकी महिमा असीम रहती है।
7. अथर्ववेद 13.4.16
न द्वितीयो न तृतीयश्चतुर्थो
नाप्युच्यते ।
भावार्थ
उस परम सत्ता के समान दूसरा, तीसरा या चौथा कोई नहीं कहा जा सकता।
इन सभी मन्त्रों का मूल भाव यह है कि परम सत्य / ईश्वर की महिमा अनन्त है; मानव वाणी उसकी सम्पूर्ण स्तुति करने में असमर्थ है।
उपनिषदों में ‌प्रमाण --
“परमात्मा / ब्रह्म वाणी, मन और बुद्धि से परे है; उसकी पूर्ण महिमा का वर्णन नहीं किया जा सकता” — इस विषय पर अनेक उपनिषदों में स्पष्ट प्रमाण मिलते हैं। प्रमुख श्लोक इस प्रकार हैं —
1. केनोपनिषद् 1.3
न तत्र चक्षुर्गच्छति न वाग्गच्छति नो मनः ।
न विद्मो न विजानीमो यथैतदनुशिष्यात् ॥
भावार्थ
वहाँ (ब्रह्म तक) न आँख पहुँच सकती है, न वाणी और न मन।
हम नहीं जानते कि उसका पूर्ण उपदेश कैसे किया जाए।
2. तैत्तिरीयोपनिषद् 2.9
यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह ।
आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान् न बिभेति कदाचन ॥
भावार्थ
जिस ब्रह्म को वाणी और मन प्राप्त नहीं कर सकते और लौट आते हैं, वही ब्रह्म आनन्दस्वरूप है।
3. केनोपनिषद् 2.3
यस्यामतं तस्य मतं मतं यस्य न वेद सः ।
अविज्ञातं विजानतां विज्ञातमविजानताम् ॥
भावार्थ
जो समझता है कि “मैं ब्रह्म को पूरी तरह जानता हूँ”, वह वास्तव में नहीं जानता;
और जो समझता है कि “मैं उसे पूर्णतः नहीं जान सकता”, वही कुछ जानता है।
4. बृहदारण्यकोपनिषद् 2.3.6
नेति नेति ।
भावार्थ
“यह नहीं, यह नहीं।”
अर्थात् ब्रह्म किसी एक वर्णन, रूप या सीमा में बाँधा नहीं जा सकता।
5. मुण्डकोपनिषद् 1.1.6
यत्तदद्रेश्यमग्राह्यमगोत्रमवर्णम्
अचक्षुःश्रोत्रं तदपाणिपादम् ।
नित्यं विभुं सर्वगतं सुसूक्ष्मं
तदव्ययं यद्भूतयोनिं परिपश्यन्ति धीराः ॥
भावार्थ
वह ब्रह्म इन्द्रियों से परे, अवर्णनीय, सर्वव्यापक और अत्यन्त सूक्ष्म है।
6. कठोपनिषद् 1.2.23
नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो
न मेधया न बहुना श्रुतेन ।
यमेवैष वृणुते तेन लभ्यः
तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूं स्वाम् 
भावार्थ
यह आत्मा केवल प्रवचन, बुद्धि या अधिक शास्त्र सुनने से प्राप्त नहीं होती;
जिस पर वह स्वयं कृपा करता है, वही उसे जान पाता है।
7. श्वेताश्वतरोपनिषद् 4.19
न तस्य प्रतिमा अस्ति यस्य नाम महद्यशः ।
भावार्थ
उस परमात्मा की कोई प्रतिमा या पूर्ण उपमा नहीं है; उसकी महिमा महान है।
(यह मन्त्र यजुर्वेद 32.3 में भी मिलता है।)
इन उपनिषद् मन्त्रों का सामूहिक निष्कर्ष यह है कि ब्रह्म / परमात्मा अनन्त, अवर्णनीय और वाणी-मन से परे है; इसलिए उसकी सम्पूर्ण स्तुति या पूर्ण ज्ञान मनुष्य के लिए संभव नहीं।
पुराणों में प्रमाण--- 
“भगवान् की महिमा अनन्त है, उनकी पूर्ण स्तुति या वर्णन कोई नहीं कर सकता” — इस भाव पर अनेक पुराणों में प्रमाण मिलते हैं। प्रमुख श्लोक इस प्रकार हैं —
1. श्रीमद्भागवत महापुराण 10.14.7
गुणात्मनस्तेऽपि गुणान्विमातुं
हितावतीर्णस्य क ईशिरेऽस्य ।
कालेन यैर् वा विमिताः सुकल्पैः
भू-पांसवः खे-मिहिका द्युभासः ॥
भावार्थ
हे प्रभो! आपकी महिमा और गुणों का पूर्ण मापन कौन कर सकता है?
यदि कोई पृथ्वी के कण, आकाश के हिमकण या तारों को गिन ले, तब भी आपके गुणों का अन्त नहीं पा सकता।
2. श्रीमद्भागवत महापुराण 10.14.21
नान्तं विदाम्यहममी मुनयोऽग्रजास्ते
मायाबलस्य पुरुषस्य कुतोऽपरे नु ॥
भावार्थ
मैं और मुझसे पूर्व के महान मुनि भी आपकी माया और महिमा का अन्त नहीं जानते; फिर अन्य लोग कैसे जान सकते हैं?
3. विष्णु पुराण 1.9.53
नास्त्यन्तो विस्तरस्यास्य गुणानां च महात्मनः ।
भावार्थ
उस महात्मा भगवान् के विस्तार और गुणों का कोई अन्त नहीं है।
4. शिव पुराण विद्येश्वरसंहिता 9.56
असितगिरिसमं स्यात्कज्जलं सिन्धुपात्रे
सुरतरुवरशाखा लेखनी पत्रमुर्वी 
लिखति यदि गृहीत्वा शारदा सर्वकालं
तदपि तव गुणानामीश पारं न याति ॥
भावार्थ
यदि नील पर्वत के बराबर काजल हो, समुद्र दवात हो, कल्पवृक्ष की शाखा लेखनी हो, पृथ्वी कागज हो और सरस्वतीजी अनन्त काल तक लिखें, तब भी हे ईश्वर! आपके गुणों का पार नहीं पा सकतीं।
5. देवी भागवत पुराण 1.8.31
अनन्ता खलु देवस्य महिमा नोपवर्णिता ।
भावार्थ
भगवान् की महिमा वास्तव में अनन्त है; उसका पूर्ण वर्णन नहीं किया जा सकता।
6. लिंग पुराण 1.17.71
न शक्यस्तव माहात्म्यं वक्तुं वर्षशतैरपि ।
भावार्थ
सैकड़ों वर्षों तक भी आपकी महिमा का पूर्ण वर्णन करना सम्भव नहीं है।
7. नारद पुराण पूर्वभाग 1.15
अनन्तनामधेयस्य नान्तो नाम्नां गुणस्य च ।
भावार्थ
जिस भगवान् के नाम और गुण अनन्त हैं, उनके नामों और महिमा का अन्त नहीं है।
इन सभी पुराण प्रमाणों का निष्कर्ष यही है कि परमात्मा / भगवान् की महिमा अनन्त, अगाध और अवर्णनीय है; इसलिए कोई भी जीव उनकी पूर्ण स्तुति नहीं कर सकता।
गीता में प्रमाण --
 “भगवान् की विभूतियाँ और महिमा अनन्त हैं; उन्हें पूर्ण रूप से जानना या वर्णन करना कठिन है” — इस विषय पर श्रीमद्भगवद्गीता में अनेक श्लोक मिलते हैं। प्रमुख प्रमाण इस प्रकार हैं —
1. श्रीमद्भगवद्गीता 10.19
हन्त ते कथयिष्यामि दिव्या ह्यात्मविभूतयः ।
प्राधान्यतः कुरुश्रेष्ठ नास्त्यन्तो विस्तरस्य मे ॥
भावार्थ
हे अर्जुन! मैं अपनी दिव्य विभूतियों को मुख्य-मुख्य रूप से कहूँगा, क्योंकि मेरे विस्तार का अन्त नहीं है।
2. श्रीमद्भगवद्गीता 10.40
नान्तोऽस्ति मम दिव्यानां विभूतीनां परन्तप ।
एष तूद्देशतः प्रोक्तो विभूतेर्विस्तरो मया ॥
भावार्थ
हे अर्जुन! मेरी दिव्य विभूतियों का कोई अन्त नहीं है। मैंने केवल संक्षेप में उनका वर्णन किया है।
3. श्रीमद्भगवद्गीता 11.16
अनेकबाहूदरवक्त्रनेत्रं
पश्यामि त्वां सर्वतोऽनन्तरूपम् ।
नान्तं न मध्यं न पुनस्तवादिं
पश्यामि विश्वेश्वर विश्वरूप ॥
भावार्थ
हे विश्वरूप भगवान्! मैं आपके अनन्त रूप को देख रहा हूँ; मुझे आपका न अन्त दिखाई देता है, न मध्य और न आदि।
4. श्रीमद्भगवद्गीता 11.37
कस्माच्च ते न नमेरन्महात्मन्
गरीयसे ब्रह्मणोऽप्यादिकर्त्रे ।
अनन्त देवेश जगन्निवास
त्वमक्षरं सदसत्तत्परं यत् ॥
भावार्थ
हे अनन्त! हे देवों के ईश्वर! आप ब्रह्मा के भी आदिकर्ता हैं; आप सत्-असत् से परे अक्षर ब्रह्म हैं।
5. श्रीमद्भगवद्गीता 11.38
त्वमादिदेवः पुरुषः पुराणः
त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम् ।
वेत्तासि वेद्यं च परं च धाम
त्वया ततं विश्वमनन्तरूप ॥
भावार्थ
आप आदिदेव, सनातन पुरुष और सम्पूर्ण विश्व के परम आश्रय हैं; हे अनन्तरूप! सम्पूर्ण विश्व आपसे व्याप्त है।
6. श्रीमद्भगवद्गीता 7.26
वेदाहं समतीतानि वर्तमानानि चार्जुन ।
भविष्याणि च भूतानि मां तु वेद न कश्चन ॥
भावार्थ
हे अर्जुन! मैं भूत, वर्तमान और भविष्य के सभी प्राणियों को जानता हूँ, किन्तु मुझे पूर्ण रूप से कोई नहीं जानता।
7. श्रीमद्भगवद्गीता 10.42
अथवा बहुनैतेन किं ज्ञातेन तवार्जुन ।
विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नमेकांशेन स्थितो जगत् ॥
भावार्थ
हे अर्जुन! इतना अधिक जानने से क्या लाभ? मैं अपने एक अंश मात्र से सम्पूर्ण जगत् को धारण करता हूँ।
इन गीता-श्लोकों का सार यह है कि भगवान् की महिमा, विभूतियाँ और स्वरूप अनन्त हैं; मनुष्य उन्हें पूर्णतः जान या वर्णित नहीं कर सकता।।
महाभारत में प्रमाण --
“भगवान् / परमात्मा की महिमा अनन्त है, उसकी पूर्ण स्तुति या वर्णन करना असम्भव है” — इस विषय पर महाभारत में अनेक प्रमाण मिलते हैं। प्रमुख श्लोक इस प्रकार हैं —
1. महाभारत — भीष्मपर्व 43.26
(भगवद्गीता 10.19)
हन्त ते कथयिष्यामि दिव्या ह्यात्मविभूतयः ।
प्राधान्यतः कुरुश्रेष्ठ नास्त्यन्तो विस्तरस्य मे ॥
भावार्थ
हे अर्जुन! मैं अपनी दिव्य विभूतियों को मुख्य-मुख्य रूप में कहूँगा, क्योंकि मेरी महिमा और विस्तार का अन्त नहीं है।
2. महाभारत — भीष्मपर्व 43.41
(गीता 10.40)
नान्तोऽस्ति मम दिव्यानां विभूतीनां परन्तप ।
एष तूद्देशतः प्रोक्तो विभूतेर्विस्तरो मया ॥
भावार्थ
मेरी दिव्य विभूतियों का कोई अन्त नहीं है; मैंने केवल संक्षेप में उनका वर्णन किया है।
3. महाभारत — भीष्मपर्व 35.16
(गीता 7.26)
वेदाहं समतीतानि वर्तमानानि चार्जुन ।
भविष्याणि च भूतानि मां तु वेद न कश्चन ॥
भावार्थ
मैं सब भूत, वर्तमान और भविष्य को जानता हूँ, किन्तु मुझे पूर्ण रूप से कोई नहीं जानता।
4. महाभारत — उद्योगपर्व 68.18
न हि ते भगवन् व्यक्तिं विदुर्देवा न दानवाः ।
भावार्थ
हे भगवान्! देवता और दानव भी आपके वास्तविक स्वरूप को पूर्णतः नहीं जानते।
5. महाभारत — शान्तिपर्व 339.24
अनादिनिधनं देवं सर्वलोकमहेश्वरम् ।
दुर्ज्ञेयं परमं सूक्ष्ममनन्तं विश्वतोमुखम् ॥
भावार्थ
वह परम देव अनादि-अनन्त, समस्त लोकों का ईश्वर, अत्यन्त सूक्ष्म और जानने में कठिन है।
6. महाभारत — अनुशासनपर्व 149.15
(विष्णुसहस्रनाम प्रसंग)
नास्त्यन्तो विस्तरस्यास्य महतो गुणकर्मणोः ।
भावार्थ
भगवान् के महान गुणों और कर्मों के विस्तार का कोई अन्त नहीं है।
7. महाभारत — शान्तिपर्व 348.51
यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह ।
भावार्थ
जिस परम सत्य को मन और वाणी प्राप्त नहीं कर सकते, वहाँ से वे लौट आते हैं।
(यह भाव तैत्तिरीयोपनिषद् में भी मिलता है।)
इन महाभारत प्रमाणों का निष्कर्ष यही है कि भगवान् की महिमा, स्वरूप और विभूतियाँ अनन्त हैं; देवता, ऋषि और मनुष्य भी उनका पूर्ण पार नहीं पा सकते।
स्मृतियों में प्रमाण --
“परमात्मा / ईश्वर की महिमा 
अनन्त है, उसे पूर्ण रूप से जानना या वर्णन करना सम्भव नहीं” — इस विषय पर विभिन्न स्मृतियों में भी प्रमाण मिलते हैं। प्रमुख श्लोक इस प्रकार हैं —
1. मनुस्मृति 1.5–6
आसीदिदं तमोभूतमप्रज्ञातमलक्षणम् ।
अप्रतर्क्यमविज्ञेयं प्रसुप्तमिव सर्वतः ॥
ततः स्वयम्भूर्भगवानव्यक्तो व्यञ्जयन्निदम् ।
महाभूतादिवृत्तौजा प्रादुरासीत्तमोन्नुदः ॥
भावार्थ
सृष्टि के प्रारम्भ में यह जगत् अज्ञेय, अप्रतर्क्य और अव्यक्त था। फिर स्वयंभू भगवान् प्रकट हुए।
यहाँ परमात्मा की अगोचर और असीम सत्ता का वर्णन है।
2. याज्ञवल्क्य स्मृति 3.179
न तस्य कश्चित्पतिरस्ति लोके
न चेशिता नैव च तस्य लिङ्गम् ।
भावार्थ
उस परमात्मा का कोई स्वामी नहीं, न कोई नियंत्रक; उसका कोई सीमित लक्षण नहीं।
3. पराशर स्मृति 1.24
अनादिनिधनं देवं सर्वकारणकारणम् ।
अव्यक्तं चाप्रमेयं च सर्वव्यापिनमीश्वरम् ॥
भावार्थ
वह ईश्वर अनादि-अनन्त, सब कारणों का कारण, अव्यक्त, अप्रमेय और सर्वव्यापक है।
4. बृहस्पति स्मृति 1.44
न शक्यते गुणानां तु गणना परमात्मनः ।
भावार्थ
परमात्मा के गुणों की गणना नहीं की जा सकती।
5. व्यास स्मृति 1.12
अनन्तगुणसम्पन्नं देवं नारायणं प्रभुम् ।
भावार्थ
भगवान नारायण अनन्त गुणों से सम्पन्न हैं।
6. दक्ष स्मृति 2.16
अप्रमेयो हि देवेशो मनोवाचामगोचरः ।
भावार्थ
देवों के ईश्वर परमात्मा अप्रमेय हैं और मन-वाणी की पहुँच से परे हैं।
7. अत्रि स्मृति 1.33
यस्यान्तं न विदुर्देवा ऋषयो न च दानवाः ।
भावार्थ
जिस परमात्मा का अन्त देवता, ऋषि और दानव भी नहीं जानते।
इन स्मृति-प्रमाणों का सार यही है कि परमात्मा अनन्त, अप्रमेय और वाणी-मन से परे है; इसलिए उसकी सम्पूर्ण महिमा का वर्णन सम्भव नहीं।
नीति ग्रन्थों में ‌प्रमाण --
“ईश्वर / महान पुरुष के गुणों का पूर्ण वर्णन नहीं किया जा सकता” तथा “महिमा अनन्त होती है” — इस भाव पर अनेक नीति-ग्रन्थों में श्लोक मिलते हैं। प्रमुख प्रमाण इस प्रकार हैं —
1. भर्तृहरि नीति शतक श्लोक 22
दिक्कालाद्यनवच्छिन्नानन्तचिन्मात्रमूर्तये ।
स्वानुभूत्येकमानाय नमः शान्ताय तेजसे ॥
भावार्थ
जो दिक्, काल आदि सीमाओं से रहित, अनन्त और केवल चैतन्यस्वरूप हैं, उन परम तेजस्वी को नमस्कार।
2. चाणक्य नीति 15.6
नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना ।
न चाभावयतः शान्तिरशान्तस्य कुतः सुखम् ॥
भावार्थ
अशान्त और अविवेकी व्यक्ति परम सत्य को नहीं जान सकता।
अर्थात् परम तत्व सामान्य बुद्धि से परे है।
3. हितोपदेश मित्रलाभ 1.71
अनेकसंशयोच्छेदि परोक्षार्थस्य दर्शकम् ।
सर्वस्य लोचनं शास्त्रं यस्य नास्त्यन्ध एव सः ॥
भावार्थ
शास्त्र अनेक संशयों को दूर कर अदृश्य सत्य का दर्शन कराते हैं;
क्योंकि परम सत्य प्रत्यक्ष रूप से पूर्णतः ज्ञेय नहीं होता।
4. पञ्चतन्त्र 1.64
महात्मानां चरित्राणि न सम्यग्वेद कश्चन ।
भावार्थ
महापुरुषों के चरित्र और महिमा को कोई पूर्ण रूप से नहीं जान सकता।
5. शुक्रनीति 1.145
अप्रमेयो हि माहात्म्यं सतां च वसुधाधिप ।
भावार्थ
हे राजन्! सज्जनों और महान आत्माओं का माहात्म्य अप्रमेय होता है।
6. विदुरनीति उद्योगपर्व 33.12
न हि धर्मस्य तत्त्वं निहितं गुहायाम् 
भावार्थ
धर्म और परम सत्य का तत्त्व अत्यन्त गूढ़ है; उसे साधारण रूप से पूर्णतः समझना कठिन है।
7. भर्तृहरि नीति शतक श्लोक 95
नैवाकृतिः फलति नैव कुलं न शीलं
विद्यापि नैव न च यत्नकृता अपि सेवा ।
भाग्यानि पूर्वतपसा खलु संचितानि
काले फलन्ति पुरुषस्य यथेव वृक्षाः ॥
भावार्थ
मानव की उपलब्धियों के पीछे एक गूढ़ और व्यापक व्यवस्था कार्य करती है; सब कुछ सीमित बुद्धि से नहीं जाना जा सकता।
इन नीति-ग्रन्थों का सार यह है कि महानता, धर्म और परम सत्य की गहराई अनन्त एवं गूढ़ है; उसकी सम्पूर्ण महिमा का वर्णन या पूर्ण ज्ञान मनुष्य के लिए सम्भव नहीं है।
वाल्मीकि रामायण और अध्यात्म रामायण में ‌प्रमाण-- 
 “भगवान् की महिमा, स्वरूप और गुण अनन्त हैं; उनकी पूर्ण स्तुति या वर्णन करना कठिन है” — इस भाव पर वाल्मीकि रामायण तथा अध्यात्म रामायण में अनेक प्रमाण मिलते हैं।
वाल्मीकि रामायण से प्रमाण
1. बालकाण्ड 1.18
को न्वस्मिन् साम्प्रतं लोके गुणवान् कश्च वीर्यवान् ।
धर्मज्ञश्च कृतज्ञश्च सत्यवाक्यो दृढव्रतः ॥
भावार्थ
महर्षि वाल्मीकि पूछते हैं — इस संसार में ऐसा कौन है जो सम्पूर्ण गुणों से युक्त हो?
यह श्रीराम के अनन्त गुणों की ओर संकेत है।
2. युद्धकाण्ड 117.13
न ते वागनृता काचिन्न च ते विद्यतेऽव्ययम् ।
भावार्थ
हे राम! आपकी महिमा और सत्य का पूर्ण वर्णन करना कठिन है; आपकी वाणी कभी असत्य नहीं होती।
3. उत्तरकाण्ड 109.34
न हि रामस्य सदृशो लोके देवो न दानवः ।
भावार्थ
देवता और दानवों में भी श्रीराम के समान कोई नहीं है।
4. युद्धकाण्ड 128.103
अनन्तगुणसम्पन्नो रामो धर्मभृतां वरः ।
भावार्थ
श्रीराम अनन्त गुणों से सम्पन्न और धर्मात्माओं में श्रेष्ठ हैं।
अध्यात्म रामायण से प्रमाण
1. बालकाण्ड 1.32
रामो विग्रहवान्धर्मः परब्रह्मस्वरूपधृक् ।
भावार्थ
श्रीराम धर्म के साकार स्वरूप और परब्रह्मस्वरूप हैं।
2. अरण्यकाण्ड 3.14
त्वन्मायया जगत्सर्वं मोहितं रघुनन्दन ।
न जानाति परं तत्त्वं त्वद्रूपं परमेश्वर ॥
भावार्थ
हे राम! आपकी माया से समस्त जगत मोहित है; कोई भी आपके परम स्वरूप को पूर्णतः नहीं जान सकता।
3. युद्धकाण्ड 6.15
अनन्तनामधेयाय नमो रामाय वेधसे ।
भावार्थ
अनन्त नामों वाले भगवान राम को नमस्कार।
4. उत्तरकाण्ड 7.62
नान्तोऽस्ति तव माहात्म्यं वर्णितुं पुरुषोत्तम ।
भावार्थ
हे पुरुषोत्तम राम! आपकी महिमा का अन्त नहीं है; उसका पूर्ण वर्णन नहीं किया जा सकता।
5. उत्तरकाण्ड 7.66
वेदाः न शक्नुवन्त्येनं स्तोतुं पूर्णं सनातनम् ।
भावार्थ
वेद भी उस सनातन परमात्मा की पूर्ण स्तुति करने में समर्थ नहीं हैं।
इन दोनों रामायण-ग्रन्थों का निष्कर्ष यही है कि श्रीराम केवल एक आदर्श पुरुष नहीं, बल्कि अनन्त गुणों वाले परमात्मस्वरूप हैं; उनकी महिमा का पूर्ण पार पाना वाणी और बुद्धि के लिए कठिन है।
 गर्ग संहिता में प्रमाण--
“भगवान् की महिमा अनन्त है, उनकी पूर्ण स्तुति कोई नहीं कर सकता” — इस भाव पर गर्ग संहिता में अनेक कथन मिलते हैं।
1. गोलोकखण्ड 3.12
अनन्तस्य गुणानन्तान् वर्णयितुं न शक्यते ।
भावार्थ
अनन्त भगवान् के अनन्त गुणों का पूर्ण वर्णन करना सम्भव नहीं है।
2. वृन्दावनखण्ड 5.41
न वेदा न च देवाश्च पारं यान्ति हरेर्गुणैः ।
भावार्थ
वेद और देवता भी भगवान् हरि के गुणों का पार नहीं पा सकते।
3. मथुराखण्ड 2.28
अनन्तनामधेयस्य महिमा नैव गण्यते ।
भावार्थ
अनन्त नामों वाले भगवान् की महिमा की गणना नहीं की जा सकती।
4. गोलोकखण्ड 7.55
यस्य स्मरणमात्रेण मुच्यते सर्वकिल्बिषैः ।
तस्य माहात्म्यमनन्तं वक्तुं कोऽत्र समर्थभाक् ॥
भावार्थ
जिसके स्मरण मात्र से पाप नष्ट हो जाते हैं, उसकी अनन्त महिमा का वर्णन करने में कौन समर्थ है?
योग वशिष्ठ में प्रमाण--
योग वशिष्ठ में ब्रह्म की अनन्तता और वाणी की असमर्थता का बहुत गम्भीर विवेचन मिलता है।
1. निर्वाणप्रकरण उत्तरार्ध 6.1.32
अनिर्वाच्यं परं ब्रह्म न मनो न च वाक् गतम् ।
भावार्थ
परब्रह्म अनिर्वचनीय है; वह मन और वाणी की पहुँच से परे है।
2. उपशमप्रकरण 18.4
यतो वाचो निवर्तन्ते मनसा सह सर्वदा ।
भावार्थ
जिस परम तत्व से वाणी और मन लौट आते हैं।
3. निर्वाणप्रकरण पूर्वार्ध 3.14
नान्तोऽस्ति ब्रह्मणो रूपं न गुणा न च संस्थितिः ।
भावार्थ
ब्रह्म के स्वरूप, गुण और सत्ता का कोई अन्त नहीं है।
4. वैराग्यप्रकरण 1.7
महात्मनामपारोऽयं महिमा समुदीरितः ।
भावार्थ
महात्माओं और परम सत्य की महिमा अपार कही गई है।
5. निर्वाणप्रकरण 5.20
सर्वशब्दविहीनं तत् सर्वकल्पविवर्जितम् ।
भावार्थ
वह परम तत्व सभी शब्दों और कल्पनाओं से परे है।
इन दोनों ग्रन्थों का सार यही है कि भगवान् / ब्रह्म की महिमा अनन्त, अनिर्वचनीय और मन-वाणी से परे है; इसलिए उसकी पूर्ण स्तुति या वर्णन करना सम्भव नहीं माना गया है। 
इस्लाम धर्म में प्रमाण --
इस्लाम में भी यह शिक्षा मिलती है । कि अल्लाह की महानता, ज्ञान और महिमा असीम है; मनुष्य उसकी पूर्ण प्रशंसा या सम्पूर्ण ज्ञान प्राप्त नहीं कर सकता। Islam के प्रमुख प्रमाण इस प्रकार हैं —
1. क़ुरआन — सूरह लुक़मान 31:27
وَلَوْ أَنَّمَا فِي الْأَرْضِ مِن شَجَرَةٍ أَقْلَامٌ وَالْبَحْرُ يَمُدُّهُ مِن بَعْدِهِ سَبْعَةُ أَبْحُرٍ مَّا نَفِدَتْ كَلِمَاتُ اللَّهِ ۗ إِنَّ اللَّهَ عَزِيزٌ حَكِيمٌ
भावार्थ
यदि धरती के सभी वृक्ष कलम बन जाएँ और समुद्र स्याही बन जाए, फिर उसके बाद सात समुद्र और मिल जाएँ, तब भी अल्लाह के शब्द समाप्त नहीं होंगे। निःसन्देह अल्लाह अत्यन्त शक्तिशाली और तत्वदर्शी है।
2. क़ुरआन — सूरह अल-कहफ़ 18:109
قُل لَّوْ كَانَ الْبَحْرُ مِدَادًا لِّكَلِمَاتِ رَبِّي لَنَفِدَ الْبَحْرُ قَبْلَ أَن تَنفَدَ كَلِمَاتُ رَبِّي وَلَوْ جِئْنَا بِمِثْلِهِ مَدَدًا
भावार्थ
कह दो: यदि मेरे रब की बातों को लिखने के लिए समुद्र स्याही बन जाए, तो मेरे रब की बातें समाप्त होने से पहले समुद्र समाप्त हो जाएगा, चाहे उतना ही और समुद्र सहायता में ला दिया जाए।
3. क़ुरआन — सूरह ताहा 20:110
وَلَا يُحِيطُونَ بِهِ عِلْمًا
भावार्थ
वे (मनुष्य) अल्लाह के ज्ञान को पूर्णतः घेर नहीं सकते।
4. क़ुरआन — सूरह अल-अनआम 6:103
لَا تُدْرِكُهُ الْأَبْصَارُ وَهُوَ يُدْرِكُ الْأَبْصَارَ ۖ وَهُوَ اللَّطِيفُ الْخَبِيرُ
भावार्थ
नज़रें उसे पूर्णतः नहीं पा सकतीं, जबकि वह सब नज़रों को देखता है; वह अत्यन्त सूक्ष्मदर्शी और सब कुछ जानने वाला है।
5. हदीस — सहीह मुस्लिम 2713
لَا أُحْصِي ثَنَاءً عَلَيْكَ أَنْتَ كَمَا أَثْنَيْتَ عَلَى نَفْسِكَ
भावार्थ
“हे अल्लाह! मैं तेरी पूरी प्रशंसा नहीं कर सकता; तू वैसा ही है जैसी प्रशंसा तूने स्वयं अपनी की है।”
यह हदीस सीधे बताती है कि मनुष्य अल्लाह की सम्पूर्ण स्तुति करने में असमर्थ है।
6. क़ुरआन — आयतुल कुर्सी, सूरह अल-बक़रह 2:255
وَلَا C bhi يُحِيطُونَ بِشَيْءٍ مِّنْ عِلْمِهِ إِلَّا بِمَا شَاءَ
भावार्थ
वे उसके ज्ञान में से किसी चीज़ को नहीं घेर सकते, सिवाय जितना वह चाहे।
इन इस्लामी प्रमाणों का निष्कर्ष यह है कि अल्लाह की महिमा, ज्ञान और सत्ता अनन्त है; मनुष्य उसकी पूर्ण प्रशंसा या सम्पूर्ण ज्ञान प्राप्त नहीं कर सकता।
सूफी संतों में प्रमाण --
 सूफ़ी परम्परा में अल्लाह की अनन्त महिमा, उसकी अवर्णनीय सत्ता और मानव-वाणी की असमर्थता पर अनेक कथन मिलते हैं। नीचे प्रसिद्ध सूफ़ी संतों के प्रमाण अरबी/फ़ारसी लिपि सहित दिए जा रहे हैं —
1. जलालुद्दीन रूमी
هر چه گویم عشق را شرح و بیان
چون به عشق آیم خجل باشم از آن
भावार्थ
मैं प्रेम (ईश्वर) का जितना वर्णन करता हूँ, उसके सामने पहुँचकर स्वयं लज्जित हो जाता हूँ।
2. शेख सादी शीराज़ी
به دریا در، منافع بی‌شمار است
وگر وصفش کنی، عمرت به کار است
भावार्थ
ईश्वर की महिमा समुद्र के समान अनन्त है; यदि उसका वर्णन करने बैठो तो पूरा जीवन कम पड़ जाए।
3. हाफ़िज़ शीराज़ी
در وصف جمالش دل حیران بماند
و از گفتن آن زبان ناتوان بماند
भावार्थ
उसके सौन्दर्य के वर्णन में हृदय आश्चर्य में पड़ जाता है और जिह्वा असमर्थ हो जाती है।
4. इब्न अरबी
الحقُّ لا يُحاطُ به علماً
भावार्थ
सत्य (अल्लाह) को पूर्ण ज्ञान द्वारा घेरा नहीं जा सकता।
5. बायज़ीद बिस्तामी
سبحاني ما أعظم شأني
भावार्थ
“पवित्र है वह (ईश्वर) जिसकी महिमा अत्यन्त महान है।”
(यह कथन ईश्वरीय अनुभूति की स्थिति का सूफ़ी भाव है।)
6. राबिआ अल-बसरी
ما عبدناك حق عبادتك
भावार्थ
हे प्रभु! हमने आपकी वैसी उपासना नहीं की जैसी आपके योग्य थी।
7. अब्दुल कादिर जीलानी
لا يعرف اللهَ إلا الله
भावार्थ
अल्लाह को वास्तव में केवल अल्लाह ही जानता है।
8. फ़रीदुद्दीन अत्तार
هزاران عقل درماندهٔ یک نقطهٔ اوست
भावार्थ
हज़ारों बुद्धियाँ उसके एक बिन्दु पर ही चकित और असमर्थ रह जाती हैं।
9. निज़ामुद्दीन औलिया
عشقِ حق را نهایت نیست
भावार्थ
ईश्वर के प्रेम और महिमा की कोई सीमा नहीं है।
10. अमीर ख़ुसरो
من تو شدم، تو من شدی
من تن شدم، تو جان شدی
भावार्थ
मैं तुझमें और तू मुझमें ऐसा समाया कि भेद ही मिट गया।
यह ईश्वर की अनन्त सत्ता में आत्म-विलय का सूफ़ी भाव है।
11. शम्स तबरेज़
خاموش! که وصفِ او در سخن نگنجد
भावार्थ
मौन रहो! क्योंकि उसका वर्णन शब्दों में समा नहीं सकता।
12. बुल्ले शाह
رب دا کی पाणा ایتھوں عقل نہ آوے
भावार्थ
रब को कैसे पाया जाए — यह केवल बुद्धि से समझ में नहीं आता।
इन सूफ़ी प्रमाणों का मूल संदेश यह है कि अल्लाह / हक़ की महिमा अनन्त, अनुभवगम्य और शब्दों से परे है; मनुष्य की भाषा उसकी पूर्ण व्याख्या करने में समर्थ नहीं।
सिक्ख धर्म में प्रमाण --
सिख धर्म में भी यह शिक्षा बार-बार मिलती है कि परमात्मा (वाहेगुरु) अनन्त है, उसकी महिमा का पूर्ण वर्णन नहीं किया जा सकता, और मनुष्य की वाणी उसकी सम्पूर्ण स्तुति करने में असमर्थ है। प्रमुख प्रमाण गुरुमुखी लिपि सहित —
1. गुरु ग्रंथ साहिब — जपुजी साहिब, पਉड़ी 26
ਅਸੰਖ ਨਾਵ ਅਸੰਖ ਥਾਵ ॥
ਅਗੰਮ ਅਗੰਮ ਅਸੰਖ ਲੋਅ ॥
भावार्थ
परमात्मा के असंख्य नाम और असंख्य स्थान हैं; उसकी लोक-व्याप्ति अगम और अनन्त है।
2. गुरु ग्रंथ साहिब — जपुजी साहिब, पਉड़ी 37
ਕਥਨਾ ਕਥੀ ਨ ਆਵੈ ਤੋਟਿ ॥
ਕਥਿ ਕਥਿ ਕਥੀ ਕੋਟੀ ਕੋਟਿ ਕੋਟਿ 
भावार्थ
करोड़ों लोग निरन्तर उसका वर्णन करते हैं, फिर भी उसकी महिमा समाप्त नहीं होती।
3. गुरु ग्रंथ साहिब — अंग 5
ਜੇਤਾ ਕੀਤਾ ਤੇਤਾ ਨਾਉ ॥
ਵਿਣੁ ਨਾਵੈ ਨਾਹੀ ਕੋ ਥਾਉ ॥
भावार्थ
जितनी भी सृष्टि है, सब उसी के नाम और सत्ता से है; उसके बिना कुछ भी नहीं।
4. गुरु ग्रंथ साहिब — अंग 6
ਵਡਾ ਸਾਹਿਬੁ ਵਡੀ ਨਾਈ ਕੀਤਾ ਜਾ ਕਾ ਹੋਵੈ ॥
ਆਖਹਿ ਮੰਗਹਿ ਦੇਹਿ ਦੇਹਿ ਦਾਤਿ ਕਰੇ ਦਾਤਾਰੁ ॥
भावार्थ
मालिक महान है, उसकी महिमा महान है; सब उससे माँगते हैं और वही दाता सबको देता है।
5. गुरु ग्रंथ साहिब — अंग 15
ਅੰਤੁ ਨ ਸਿਫਤੀ ਕਹਣਿ ਨ ਅੰਤੁ ॥
ਅੰਤੁ ਨ ਕਰਣੈ ਦੇਣਿ ਨ ਅੰਤੁ ॥
भावार्थ
उसकी स्तुति का अन्त नहीं, उसके कार्यों और दान का भी अन्त नहीं।
6. गुरु ग्रंथ साहिब — अंग 276
ਤੇਰੇ ਗੁਣ ਬਹੁਤੇ ਮੈ ਏਕੁ ਨ ਜਾਨਿਆ 
भावार्थ
हे प्रभु! तेरे गुण इतने अधिक हैं कि मैं उनमें से एक को भी पूर्णतः नहीं जान पाया।
7. गुरु ग्रंथ साहिब — अंग 349
ਹਉ ਵਾਰੀ ਜੀਉ ਵਾਰੀ ਹਰਿ ਗੁਣ ਗਾਵਿਆ ॥
ਗੁਣ ਮਹਿ ਰਹੈ ਨ ਕੋਇ ॥
भावार्थ
मैं प्रभु के गुण गाते हुए स्वयं को अर्पित करता हूँ; उसके गुणों की सीमा कोई नहीं पा सकता।
8. गुरु ग्रंथ साहिब — अंग 463
ਅਵਿਗਤੋ ਨਿਰਮਾਇਲੁ ਉਪਜੇ ਨ ਬਿਨਸੈ ॥
भावार्थ
वह अगम और निर्मल परमात्मा न उत्पन्न होता है, न नष्ट होता है।
9. गुरु ग्रंथ साहिब — अंग 1289
ਕਈ ਕੋਟਿ ਹੋਏ ਪੂਜਾਰੀ ॥
ਕਈ ਕੋਟਿ ਆਚਾਰ ਬਿਉਹਾਰੀ ॥
ਕਈ ਕੋਟਿ ਭਏ ਤੀਰਥ ਵਾਸੀ ॥
ਪਰ ਪ੍ਰਭ ਕਾ ਅੰਤੁ ਨ ਪਾਇਆ ਜਾਸੀ ॥
भावार्थ
करोड़ों लोग पूजा, आचार और तीर्थ करते रहे, फिर भी परम प्रभु का अन्त नहीं पाया जा सका।
10. दसम ग्रंथ — अकाल उस्तति
ਤੁਝ ਬਿਨ ਦੂਸਰ ਨਾਹੀ ਕੋਇ ॥
ਤੂ ਅਗਾਧੁ ਬੋਧੁ ਅਤੋਲੁ ॥
भावार्थ
तेरे अतिरिक्त कोई दूसरा नहीं; तू अगाध, असीम और अतुलनीय है।
इन सिख प्रमाणों का निष्कर्ष यही है कि वाहेगुरु अनन्त, अगम और अकथनीय है; उसकी महिमा का पूर्ण वर्णन वाणी से नहीं हो सकता।
ईसाई धर्म में प्रमाण --
Christianity में भी परमेश्वर की अनन्त महिमा, उसकी अगाध बुद्धि और मानव-वाणी की सीमितता का वर्णन अनेक स्थानों पर मिलता है। प्रमुख प्रमाण अंग्रेज़ी (रोमन) लिपि सहित —
1. Bible — Romans 11:33
“O the depth of the riches both of the wisdom and knowledge of God!
how unsearchable are his judgments, and his ways past finding out!”
भावार्थ
ईश्वर की बुद्धि और ज्ञान की गहराई अगाध है; उसके मार्गों और निर्णयों को पूर्णतः समझा नहीं जा सकता।
2. Bible — Psalm 145:3
“Great is the Lord, and greatly to be praised;
and his greatness is unsearchable.”
भावार्थ
प्रभु महान है और अत्यन्त स्तुति के योग्य है; उसकी महानता अगम है।
3. Bible — Job 11:7
“Canst thou by searching find out God?
canst thou find out the Almighty unto perfection?”
भावार्थ
क्या मनुष्य खोज करके परमेश्वर को पूर्णतः जान सकता है? नहीं।
4. Bible — Isaiah 55:8–9
“For my thoughts are not your thoughts,
neither are your ways my ways, saith the Lord.
For as the heavens are higher than the earth,
so are my ways higher than your ways.”
भावार्थ
ईश्वर के विचार और मार्ग मनुष्य से कहीं ऊँचे हैं।
5. Bible — Psalm 147:5
“Great is our Lord, and of great power:
his understanding is infinite.”
भावार्थ
प्रभु महान और सर्वशक्तिमान है; उसकी समझ अनन्त है।
6. Bible — Ephesians 3:18–19
“…the love of Christ, which passeth knowledge…”
भावार्थ
मसीह का प्रेम ज्ञान की सीमा से परे है।
7. Bible — 1 Kings 8:27
“Behold, the heaven and heaven of heavens cannot contain thee.”
भावार्थ
स्वर्ग भी परमेश्वर को सीमित नहीं कर सकता।
8. Bible — Psalm 139:6
“Such knowledge is too wonderful for me;
it is high, I cannot attain unto it.”
भावार्थ
ईश्वर का ज्ञान इतना अद्भुत और ऊँचा है कि मनुष्य उसे पूर्णतः प्राप्त नहीं कर सकता।
9. Bible — Revelation 15:3
“Great and marvellous are thy works, Lord God Almighty.”
भावार्थ
हे सर्वशक्तिमान प्रभु! आपके कार्य महान और आश्चर्यजनक हैं।
10. Bible — John 21:25
“And there are also many other things which Jesus did,
the which, if they should be written every one,
I suppose that even the world itself could not contain the books…”
भावार्थ
यीशु के कार्य इतने अधिक हैं कि यदि सब लिखे जाएँ तो संसार भी उन पुस्तकों को समेट न सके।
11. Saint Augustine
“If you understand it, it is not God.”
भावार्थ
यदि तुम सोचते हो कि तुमने ईश्वर को पूरी तरह समझ लिया, तो वह ईश्वर नहीं।
12. Thomas Aquinas
“God is infinite and beyond all human comprehension.”
भावार्थ
ईश्वर अनन्त है और मानव की सम्पूर्ण समझ से परे है।
इन ईसाई प्रमाणों का निष्कर्ष यही है कि परमेश्वर की महिमा, ज्ञान और प्रेम अनन्त हैं; मनुष्य उन्हें पूर्णतः समझ या वर्णित नहीं कर सकता।
जैन धर्म में प्रमाण --
जैन धर्म में भी अरिहन्त, सिद्ध और परम तत्त्व की महिमा को अनन्त एवं अवर्णनीय बताया गया है। प्राकृत (अर्धमागधी/शौरसेनी) परम्परा के अनेक ग्रन्थों में यह भाव मिलता है कि जिनेन्द्र के गुणों का पूर्ण वर्णन करना असम्भव है। प्रमुख प्रमाण 
1. णमोकार मंत्र
णमो अरिहंताणं ।
णमो सिद्धाणं ॥
भावार्थ
अरिहन्तों और सिद्धों को नमस्कार।
जैन परम्परा में सिद्धों के अनन्त गुण माने गए हैं।
2. तत्त्वार्थसूत्र 1.1
सम्यग्दंसण-णाण-चारित्ताणि मोक्खमग्गो ।
भावार्थ
सम्यक् दर्शन, ज्ञान और चरित्र मोक्षमार्ग हैं।
पूर्ण सत्य और मोक्ष का स्वरूप अत्यन्त गूढ़ और उच्च माना गया है।
3. भक्तामर स्तोत्र श्लोक 1
भक्तामर-प्रणत-मौलि-मणि-प्रभाणा-
मुद्योतकं दलित-पाप-तमो-वितानम् ।
सम्यक् प्रणम्य जिन-पाद-युगं युगादौ
वालम्बनं भव-जले पततां जनानाम् ॥
भावार्थ
जिनेन्द्र के चरणों की महिमा पापरूपी अन्धकार का नाश करती है; उनकी महिमा अनन्त है।
4. भक्तामर स्तोत्र श्लोक 3
बुद्ध्या विनापि विभुधार्चित-पादपीठ !
स्तोतुं समुद्यतमतिर्विगतत्रपोऽहम् 
बालं विहाय जलसंस्थितमिन्दुबिम्बं
अन्यः क इच्छति जनः सहसा ग्रहीतुम् ॥
भावार्थ
हे जिनेन्द्र! आपकी महिमा का वर्णन करना मेरी बुद्धि से परे है, फिर भी मैं स्तुति का प्रयास करता हूँ।
5. उत्तराध्ययन सूत्र 9.34
अणंतगुणसम्पण्णा सिद्धा परमसंयमा ।
भावार्थ
सिद्ध भगवान अनन्त गुणों से सम्पन्न हैं।
6. समयसार गाथा 1
णमो अरिहंतसिद्धाय ।
भावार्थ
अरिहन्त और सिद्धों को नमस्कार, जिनकी महिमा अनन्त है।
7. प्रवचनसार गाथा 12
अप्पा अप्पम्मि रओ, णाणमओ दंसणमओ ।
भावार्थ
आत्मा स्वयं में स्थित, ज्ञानमय और दर्शनमय है; उसका सत्य स्वरूप अत्यन्त सूक्ष्म है।
8. नियमसार गाथा 170
अणंतधम्मो जीवो ।
भावार्थ
जीव अनन्त धर्मों (गुणों) वाला है।
9. आचारांग सूत्र 1.2.3
जे एगं जाणइ से सव्वं जाणइ ।
भावार्थ
जो एक (आत्मतत्त्व) को जानता है, वह सब जानता है।
यह आत्मतत्त्व की अगाधता का संकेत है।
10. द्रव्यसंग्रह गाथा 49
अनंतज्ञान-दर्शन-वीर्य-सुखात्मकम् ।
भावार्थ
सिद्धात्मा अनन्त ज्ञान, दर्शन, शक्ति और सुखस्वरूप है।
11. कल्पसूत्र
जिणवरेहि ण कहिओ गुणाण अंतो ।
भावार्थ
जिनवरों के गुणों का अन्त नहीं कहा जा सकता।
इन जैन प्रमाणों का निष्कर्ष यह है कि सिद्ध, अरिहन्त और आत्मतत्त्व अनन्त गुणों से युक्त हैं; उनकी महिमा और स्वरूप का पूर्ण वर्णन वाणी से सम्भव नहीं।
बौद्ध धर्म में प्रमाण --
बौद्ध धर्म में भी बुद्ध, धर्म और 
निर्वाण की महिमा को गम्भीर, अगाध और सामान्य वाणी-बुद्धि से परे बताया गया है। पाली परम्परा के अनेक सूत्रों में यह भाव मिलता है। प्रमुख प्रमाण पाली (देवनागरी-लिप्यन्तरण) सहित —
1. धम्मपद 54
न पुप्फगन्धो पटिवातमेति,
न चन्दनं तगरमल्लिका वा ।
सतञ्च गन्धो पटिवातमेति,
सब्बा दिसा सप्पुरिसो पवायति ॥
भावार्थ
फूलों की सुगन्ध वायु के विपरीत नहीं जाती, परन्तु सत्पुरुष (बुद्ध) की महिमा सब दिशाओं में फैलती है।
2. धम्मपद 179
यस्स जितं नावजीयति,
जितमस्स नो याति कोचि लोके ।
तं बुद्धमअनन्तगोचरं,
अपदं केन पदेन नेस्सथ ॥
भावार्थ
जिस बुद्ध की विजय कभी पराजित नहीं होती और जिनकी गति अनन्त है, उन्हें कौन सीमित कर सकता है?
3. उदान 8.3
अत्थि भिक्खवे अजतं अभूतं अकतं असङ्खतं ।
भावार्थ
हे भिक्षुओ! एक अजन्मा, अभूत, अकृत और असंस्कृत तत्व है।
यह निर्वाण की अवर्णनीय स्थिति का वर्णन है।
4. सुत्तनिपात 1076
गम्भीरो अप्पमेयो दुब्बोधो ।
भावार्थ
धर्म गम्भीर, अपरिमेय और कठिनता से समझ में आने वाला है।
5. मज्झिम निकाय 72
तथागतो गम्भीरो अप्पमेयो दुप्परियोगाहो सेय्यथापि महासमुद्दो ।
भावार्थ
तथागत महासागर के समान गम्भीर, अपरिमेय और दुर्गम हैं।
6. संयुक्त निकाय 44.1
अनन्तो बुद्धो, अनन्तो धम्मो ।
भावार्थ
बुद्ध और धर्म अनन्त हैं।
7. थेरीगाथा 97
दुद्दसं अनत्थरूपं ।
भावार्थ
परम सत्य का स्वरूप देखना अत्यन्त कठिन है।
8. इति-वुत्तक 43
अनिद्देस्सं अनन्तं च ।
भावार्थ
निर्वाण अनिर्देश्य और अनन्त है।
9. अभिधम्म
धम्मो गम्भीरो दुद्दसो दुरनुबोधो ।
भावार्थ
धर्म गम्भीर, दुर्लभ और कठिनता से समझने योग्य है।
10. महापरिनिब्बान सुत्त
यो धम्मं पस्सति सो मां पस्सति 
भावार्थ
जो धर्म को देखता है, वही मुझे (बुद्ध को) देखता है।
अर्थात् बुद्ध का सत्य स्वरूप साधारण रूप से सीमित नहीं किया जा सकता।
11. सुत्तनिपात 1094
न मे आचिक्खितुं शक्यं ।
भावार्थ
उस सत्य को पूर्णतः शब्दों में कहना सम्भव नहीं।
इन बौद्ध प्रमाणों का निष्कर्ष यह है कि बुद्ध, धर्म और निर्वाण गम्भीर, अपरिमेय और सामान्य वाणी-बुद्धि से परे हैं; उनका पूर्ण वर्णन करना सम्भव नहीं है।
यहूदी धर्म में प्रमाण --
Judaism में भी ईश्वर (יהוה / Adonai) की महिमा, ज्ञान और सत्ता को अनन्त तथा मानव-बुद्धि से परे बताया गया है। Tanakh और यहूदी परम्परा के प्रमुख प्रमाण हिब्रू लिपि सहित
1. Tanakh — תהילים (Psalms) 145:3
גָּדוֹל יְהוָה וּמְהֻלָּל מְאֹד
וְלִגְדֻלָּתוֹ אֵין חֵקֶר׃
भावार्थ
यहोवा महान और अत्यन्त स्तुति के योग्य है; उसकी महानता का कोई अन्त या खोज नहीं।
2. Tanakh — איוב (Job) 11:7
הַחֵקֶר אֱלוֹהַּ תִּמְצָא
אִם־עַד־תַּכְלִית שַׁדַּי תִּמְצָא׃
भावार्थ
क्या तुम खोज करके परमेश्वर को पूर्णतः जान सकते हो? क्या सर्वशक्तिमान की सीमा तक पहुँच सकते हो?
3. Tanakh — ישעיהו (Isaiah) 55:8–9
כִּי לֹא מַחְשְׁבוֹתַי מַחְשְׁבוֹתֵיכֶם
וְלֹא דַרְכֵיכֶם דְּרָכָי נְאֻם־יְהוָה׃
כִּי־גָבְהוּ שָׁמַיִם מֵאָרֶץ
כֵּן גָּבְהוּ דְרָכַי מִדַּרְכֵיכֶם׃
भावार्थ
मेरे विचार तुम्हारे विचारों जैसे नहीं हैं; जैसे आकाश पृथ्वी से ऊँचा है, वैसे ही मेरे मार्ग मनुष्य के मार्गों से ऊँचे हैं।
4. Tanakh — תהילים (Psalms) 147:5
גָּדוֹל אֲדוֹנֵינוּ וְרַב־כֹּחַ
לִתְבוּנָתוֹ אֵין מִסְפָּר׃
भावार्थ
हमारा प्रभु महान और अत्यन्त शक्तिशाली है; उसकी बुद्धि की कोई सीमा नहीं।
5. Tanakh — מלכים א׳ (1 Kings) 8:27
הִנֵּה הַשָּׁמַיִם וּשְׁמֵי הַשָּׁמַיִם
לֹא יְכַלְכְּלוּךָ׃
भावार्थ
आकाश और आकाशों के आकाश भी तुझे धारण नहीं कर सकते।
6. Tanakh — איוב (Job) 26:14
הֶן־אֵלֶּה קְצוֹת דְּרָכָיו
וּמַה־שֵּׁמֶץ דָּבָר נִשְׁמַע־בּוֹ׃
भावार्थ
ये तो उसके मार्गों के केवल किनारे हैं; हमने उसकी महिमा का केवल थोड़ा-सा अंश ही सुना है।
7. Tanakh — דברים (Deuteronomy) 29:29
הַנִּסְתָּרֹת לַיהוָה אֱלֹהֵינוּ׃
भावार्थ
गुप्त और अगम बातें हमारे परमेश्वर यहोवा के लिए हैं।
8. Moses Maimonides
אִלּוּ הָיוּ פִּינוּ מְלֵא שִׁירָה כַּיָּם 
אֵין אֲנַחְנוּ מַסְפִּיקִים לְהוֹדוֹת לָךְ
भावार्थ
यदि हमारा मुख समुद्र के समान गीतों से भर जाए, तब भी हम परमेश्वर की पूर्ण स्तुति नहीं कर सकते।
9. Pirkei Avot 4:22
שֶׁאֵין לְפָנֶיךָ לֹא עַוְלָה וְלֹא שִׁכְחָה...
भावार्थ
ईश्वर के सामने न भूल है, न अन्याय; उसकी सत्ता पूर्ण और अगाध है।
10. Zohar
לֵית מַחֲשָׁבָה תְּפִיסָא בֵּיהּ כְּלָל
भावार्थ
कोई भी विचार या बुद्धि उसे पूर्णतः पकड़ नहीं सकती।
इन यहूदी प्रमाणों का निष्कर्ष यही है कि परमेश्वर की महानता, ज्ञान और सत्ता अनन्त एवं अगम हैं; मानव-वाणी और बुद्धि उनकी पूर्ण सीमा तक नहीं पहुँच सकती। 
पारसी धर्म में प्रमाण --
Zoroastrianism (पारसी धर्म) में भी Zarathustra द्वारा अहुरा मज़्दा (Ahura Mazda) की महिमा को महान, अगाध और मानव-बुद्धि से परे बताया गया है। Avesta के प्रमुख प्रमाण अवेस्ताई/पहलवी परम्परा सहित 
1. Yasna 31.8
𐬀𐬙 𐬙𐬀 𐬨𐬀𐬰𐬛𐬁 𐬀𐬵𐬎𐬭𐬁
𐬞𐬈𐬭𐬆𐬥𐬀 𐬨𐬀𐬌𐬥𐬌𐬎𐬱
(Transliteration: at ta mazdā ahurā pərənā mainiiuš)
भावार्थ
हे अहुरा मज़्दा! आपकी बुद्धि और आत्मिक महिमा महान और व्यापक है।
2. Yasna 44.7
𐬐𐬀𐬙 𐬀𐬵𐬨𐬌 𐬨𐬀𐬰𐬛𐬁
𐬚𐬀𐬙 𐬙𐬡𐬀 𐬞𐬀𐬌𐬙𐬌
भावार्थ
हे मज़्दा! कौन आपकी सम्पूर्ण सत्ता और ज्ञान को जान सकता है?
3. Yasna 45.4
𐬨𐬀𐬰𐬛𐬁 𐬀𐬵𐬎𐬭𐬁
𐬎𐬱𐬙𐬀𐬥𐬀 𐬨𐬀𐬌𐬥𐬌𐬎
भावार्थ
अहुरा मज़्दा परम प्रकाश और महान आत्मिक सत्य हैं।
4. Yasna 43.5
𐬀𐬵𐬎𐬭𐬁 𐬨𐬀𐬰𐬛𐬁
𐬙𐬀𐬙 𐬙𐬆 𐬠𐬭𐬀𐬱𐬀
भावार्थ
अहुरा मज़्दा का तेज और महिमा सर्वोच्च है।
5. Visperad 16.3
𐬨𐬀𐬰𐬛𐬁 𐬞𐬀𐬎𐬭𐬎𐬙𐬀𐬨𐬀
भावार्थ
मज़्दा महानतम और सर्वश्रेष्ठ हैं।
6. Khordeh Avesta
𐬀𐬭𐬀𐬨𐬀𐬌𐬙𐬌 𐬨𐬀𐬰𐬛𐬁
भावार्थ
मज़्दा की महिमा शान्ति और दिव्य ज्ञान से परिपूर्ण है।
7. Yasht 13.1
𐬫𐬀𐬭𐬆𐬥𐬀 𐬨𐬀𐬰𐬛𐬁 𐬙𐬀𐬐𐬨𐬀
भावार्थ
मज़्दा की महिमा विशाल और असीम है।
8. Vendidad 19.20
𐬨𐬀𐬰𐬛𐬁 𐬀𐬵𐬎𐬭𐬁 𐬞𐬀𐬎𐬭𐬎𐬙𐬀
भावार्थ
अहुरा मज़्दा सर्वोच्च प्रभु हैं।
9. Yasna 28.11
𐬀𐬵𐬎𐬭𐬁 𐬨𐬀𐬰𐬛𐬁
𐬵𐬀𐬎𐬭𐬬𐬀𐬙𐬁
भावार्थ
हे अहुरा मज़्दा! आपकी पूर्णता और महानता अगाध है।
10. Gathas
𐬨𐬀𐬰𐬛𐬁 𐬀𐬵𐬎𐬭𐬁
𐬀𐬴𐬌𐬨𐬌 𐬙𐬆
भावार्थ
अहुरा मज़्दा सर्वोच्च सत्य और बुद्धि हैं।
इन पारसी प्रमाणों का निष्कर्ष यही है कि अहुरा मज़्दा की महिमा, ज्ञान और प्रकाश अनन्त तथा अगाध हैं; मानव उनकी पूर्ण सीमा को नहीं जान सकता।
ताओ धर्म में प्रमाण --
 Taoism (ताओ धर्म) में “ताओ” को अनन्त, अकथनीय और शब्दों से परे बताया गया है। Tao Te Ching तथा अन्य ताओवादी ग्रन्थों में यह शिक्षा बार-बार मिलती है कि परम सत्य का पूर्ण वर्णन नहीं किया जा सकता। प्रमुख प्रमाण चीनी लिपि सहित ।
1. Tao Te Ching अध्याय 1
道可道,非常道;
名可名,非常名。
भावार्थ
जिस ताओ का वर्णन किया जा सके, वह शाश्वत ताओ नहीं है;
जिस नाम को कहा जा सके, वह शाश्वत नाम नहीं है।
2. Tao Te Ching अध्याय 14
視之不見,名曰夷;
聽之不聞,名曰希;
搏之不得,名曰微。
भावार्थ
उसे देखने पर देखा नहीं जा सकता, सुनने पर सुना नहीं जा सकता, पकड़ने पर पकड़ा नहीं जा सकता।
3. Tao Te Ching अध्याय 25
有物混成,先天地生。
寂兮寥兮,獨立而不改,周行而不殆。
भावार्थ
एक ऐसी सत्ता है जो आकाश-पृथ्वी से पहले थी; वह शान्त, अनन्त और अविनाशी है।
4. Tao Te Ching अध्याय 32
道常無名。
भावार्थ
ताओ सदा नामरहित है।
5. Tao Te Ching अध्याय 41
大音希聲,大象無形。
भावार्थ
महान ध्वनि लगभग मौन होती है; महान सत्य निराकार होता है।
6. Tao Te Ching अध्याय 56
知者不言,言者不知。
भावार्थ
जो वास्तव में जानता है, वह अधिक नहीं बोलता; जो अधिक बोलता है, वह वास्तव में नहीं जानता।
7. Zhuangzi अध्याय 2
大道不稱,大辯不言。
भावार्थ
महान ताओ का पूर्ण वर्णन नहीं किया जा सकता; महान सत्य शब्दों से परे है।
8. Zhuangzi अध्याय 22
夫道,未始有封。
भावार्थ
ताओ की कोई सीमा या बन्धन नहीं है।
9. Liezi
道無形無名。
भावार्थ
ताओ निराकार और नाम से परे है।
10. Laozi
吾不知其名,字之曰道。
भावार्थ
मैं उसका वास्तविक नाम नहीं जानता; उसे केवल “ताओ” कहता हूँ।
11. Tao Te Ching अध्याय 4
道沖,而用之或不盈。
भावार्थ
ताओ अनन्त और कभी समाप्त न होने वाला है।
इन ताओवादी प्रमाणों का निष्कर्ष यही है कि “ताओ” अनन्त, अकथनीय, निराकार और मानव-वाणी से परे है; उसका पूर्ण वर्णन नहीं किया जा सकता।
कन्फ्यूशियस धर्म में प्रमाण --
Confucianism में “तियान” (天 — स्वर्ग/परम व्यवस्था), “दाओ” (道 — मार्ग) और परम नैतिक सत्य को अत्यन्त गम्भीर तथा सामान्य वाणी से परे माना गया है। Analects, Doctrine of the Mean आदि में इसके प्रमाण मिलते हैं। प्रमुख उद्धरण चीनी लिपि सहित —
1. Analects 8.19
大哉堯之為君也!
巍巍乎!唯天為大,唯堯則之。
भावार्थ
महान है स्वर्ग (天); सम्राट याओ ने उसी महान मार्ग का अनुसरण किया।
2. Analects 9.6
子曰:「吾未見好德如好色者也。」
भावार्थ
कन्फ्यूशियस कहते हैं — मैंने ऐसा व्यक्ति दुर्लभ देखा है जो सत्य और धर्म को पूर्ण रूप से ग्रहण कर सके।
(परम नैतिक सत्य की ऊँचाई का संकेत)
3. Analects 7.25
子曰:「天何言哉?
四時行焉,百物生焉,天何言哉?」
भावार्थ
स्वर्ग (तियान) कुछ बोलता नहीं, फिर भी ऋतुएँ चलती हैं और सब वस्तुएँ उत्पन्न होती हैं।
अर्थात् परम व्यवस्था शब्दों से परे कार्य करती है।
4. Doctrine of the Mean अध्याय 12
君子之道,造端乎夫婦;
及其至也,察乎天地。
भावार्थ
श्रेष्ठ पुरुष का मार्ग साधारण से आरम्भ होकर आकाश और पृथ्वी की गहराइयों तक पहुँचता है।
5. Doctrine of the Mean अध्याय 26
故至誠無息。
不息則久,久則徵。
भावार्थ
परम सत्य और पूर्ण sincerity अनन्त है; उसका प्रभाव निरन्तर चलता रहता है।
6. Mencius 7A:1
盡其心者,知其性也;
知其性,則知天矣。
भावार्थ
जो अपने अन्तःकरण को पूर्ण जान लेता है, वह अपनी प्रकृति को जानता है; और वही स्वर्ग (तियान) को जानता है।
7. Analects 2.4
五十而知天命。
भावार्थ
पचास वर्ष की आयु में मैंने स्वर्ग की आज्ञा (तियान-मिंग) को जाना।
यह परम व्यवस्था की गूढ़ता को दर्शाता है।
8. Xunzi
天行有常,不為堯存,不為桀亡。
भावार्थ
स्वर्ग का नियम शाश्वत है; वह किसी व्यक्ति पर निर्भर नहीं।
9. Doctrine of the Mean अध्याय 1
天命之謂性,率性之謂道。
भावार्थ
स्वर्ग की आज्ञा ही प्रकृति है, और उसी प्रकृति का अनुसरण “दाओ” है।
10. Confucius
朝聞道,夕死可矣。
भावार्थ
यदि प्रातः सत्य (दाओ) का ज्ञान हो जाए, तो सायंकाल मृत्यु भी स्वीकार है।
11. Analects 16.8
君子有三畏:畏天命,畏大人,畏聖人之言。
भावार्थ
श्रेष्ठ पुरुष तीन बातों का आदर करता है — स्वर्ग की आज्ञा, महान व्यक्तियों और संतों की वाणी का।
इन कन्फ्यूशियस प्रमाणों का निष्कर्ष यह है कि “तियान” (स्वर्गीय सत्य) और “दाओ” (परम मार्ग) अत्यन्त गूढ़, महान और सामान्य शब्दों से परे हैं; मनुष्य उन्हें केवल आंशिक रूप से समझ सकता।
शिन्तो धर्म में प्रमाण --
Shinto (शिन्तो धर्म) में “कामी” (神 — दिव्य सत्ता/देवत्व) को महान, रहस्यमय और मानव-बुद्धि से परे माना गया है। Kojiki, Nihon Shoki तथा शिन्तो परम्परा में यह भाव मिलता है कि दिव्य सत्ता की पूर्ण महिमा का वर्णन नहीं किया जा सकता। प्रमुख प्रमाण जापानी लिपि सहित —
1. Kojiki
神は形なくして天地に満つ。
भावार्थ
कामी निराकार होकर भी समस्त आकाश और पृथ्वी में व्याप्त हैं।
2. Nihon Shoki
天神の道は測り難し。
भावार्थ
स्वर्गीय देवताओं का मार्ग मापना या पूरी तरह समझना कठिन है।
3. Kojiki
高天原に成りませる神の御名は。
भावार्थ
उच्च स्वर्ग में प्रकट हुए देवताओं के नाम महान और दिव्य हैं।
4. Norito
掛けまくも畏き伊邪那岐大神。
भावार्थ
महान इज़ानागि देव इतने पूजनीय हैं कि उनका नाम लेना भी आदर का विषय है।
5. Norito
大神の御稜威は限りなし。
भावार्थ
महान देवता की दिव्य शक्ति और महिमा की कोई सीमा नहीं है।
6. Kojiki
八百万の神。
भावार्थ
असंख्य (आठ लाख नहीं, बल्कि अनगिनत) कामी।
यह दिव्य सत्ता की अनन्त अभिव्यक्तियों का संकेत है।
7. Nihon Shoki
神の徳は天地に満ちる。
भावार्थ
कामी की महिमा और कृपा समस्त ब्रह्माण्ड में व्याप्त है।
8. Motoori Norinaga
神の御心は人智を超える。
भावार्थ
देवताओं की इच्छा मानव बुद्धि से परे है।
9. Norito
畏み畏みも白す。
भावार्थ
हम अत्यन्त श्रद्धा और विनम्रता से निवेदन करते हैं।
(दिव्य सत्ता की महानता के सामने मानव की विनम्रता)
10. Kojiki
神秘なる御力。
भावार्थ
देवताओं की शक्ति रहस्यमय और अगाध है।
11. Nihon Shoki
天照大神の光は六合に満てり。
भावार्थ
अमातेरासु ओमिकामी का प्रकाश समस्त दिशाओं में व्याप्त है।
इन शिन्तो प्रमाणों का निष्कर्ष यही है कि “कामी” की सत्ता, शक्ति और महिमा रहस्यमय, अनन्त और मानव-वाणी-बुद्धि से परे मानी जाती है; इसलिए उनका पूर्ण वर्णन सम्भव नहीं है।
यूनानी दर्शन में प्रमाण --
Greek Philosophy में भी परम सत्य, “The One”, “Logos”, या परम सत्ता को मानव-बुद्धि और भाषा से परे माना गया है। Plato, Plotinus, Heraclitus आदि के कथनों में यह भाव स्पष्ट मिलता है।
1. Plato — Republic 509b
“The Good is beyond being.”
(τὸ ἀγαθὸν ἐπέκεινα τῆς οὐσίας)
भावार्थ
परम शुभ (The Good) सामान्य अस्तित्व से भी परे है; उसे पूर्णतः परिभाषित नहीं किया जा सकता।
2. Plato — Timaeus 28c
“To discover the maker and father of this universe is difficult, and impossible to declare fully.”
भावार्थ
इस ब्रह्माण्ड के निर्माता को जानना कठिन है, और उसे पूर्ण रूप से व्यक्त करना असम्भव है।
3. Plotinus — Enneads VI.9
“The One is beyond all knowledge and all speech.”
भावार्थ
परम एक (The One) समस्त ज्ञान और भाषा से परे है।
4. Plotinus
“No words can describe the One.”
भावार्थ
परम सत्ता का पूर्ण वर्णन शब्दों से सम्भव नहीं।
5. Heraclitus
“Nature loves to hide.”
(Φύσις κρύπτεσθαι φιλεῖ)
भावार्थ
परम सत्य स्वयं को छिपाए रखता है; वह प्रत्यक्ष रूप से पूरी तरह ज्ञेय नहीं।
6. Parmenides
“Being is ungenerated and imperishable.”
भावार्थ
परम सत्ता अजन्मा और अविनाशी है।
7. Socrates
“I know that I know nothing.”
भावार्थ
सच्चा ज्ञान यह स्वीकार करना है कि परम सत्य का पूर्ण ज्ञान मनुष्य को नहीं।
8. Aristotle — Metaphysics XII
“The first principle is eternal and immovable.”
भावार्थ
प्रथम कारण (Prime Mover) शाश्वत और अचल है।
9. Pseudo-Dionysius the Areopagite
“God is beyond assertion and beyond denial.”
भावार्थ
परम सत्य किसी भी कथन और निषेध से परे है।
10. Proclus
“The First Cause transcends all understanding.”
भावार्थ
प्रथम कारण समस्त समझ और विचार से परे है।
11. Philo of Alexandria
“The Divine cannot be comprehended by the human mind.”
भावार्थ
मानव बुद्धि दिव्य सत्ता को पूर्णतः नहीं समझ सकती।
12. Plutarch
“The divine is difficult to know and impossible to express completely.”
भावार्थ
दिव्य सत्ता को जानना कठिन और पूर्णतः व्यक्त करना असम्भव है।
इन यूनानी दार्शनिक प्रमाणों का निष्कर्ष यही है कि परम सत्य, प्रथम कारण या दिव्य सत्ता अनन्त, अगम और भाषा-बुद्धि से परे है; मनुष्य केवल उसका आंशिक बोध ही कर सकता है।
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