√ऋग्वेद सूक्ति(7) की व्याख्या

ऋगुवेद सूक्ति-- (7) की व्याख्या 
"न यस्य हन्यते सखा न जीयते
 ऋगुवेद- --10/152/1
भावार्थ --हे प्रभु! आपके भक्त को न कोई नष्ट कर सकता है और न जीत सकता है। इस  मंत्र का पूरा श्ल़ोक अर्थ सहित
ऋग्वेद 10.152.1 का पूरा मंत्र इस प्रकार है—
शा॒स इ॒त्था म॒हाँ अ॑स्य मित्रखा॒दो अद्भु॑तः ।
न यस्य॑ ह॒न्यते॒ सखा॒ न जीय॑ते॒ कदा॑ च॒न ॥ �
शब्दार्थ
महान् असि — आप महान हैं।
अमित्रखादः — शत्रुओं का नाश करने वाले।
अद्भुतः — आश्चर्यजनक, विलक्षण।
यस्य सखा — जिसका आप मित्र हैं।
न हन्यते — वह नष्ट नहीं होता।
न जीयते — वह पराजित नहीं होता।
कदा चन — कभी भी नहीं। 
भावार्थ
हे परमेश्वर (या इन्द्र देव)! आप महान, अद्भुत तथा शत्रुओं का विनाश करने वाले हैं। जिसके आप सखा, रक्षक और सहायक होते हैं, वह कभी नष्ट नहीं होता और न ही कभी पराजित होता है।
आध्यात्मिक अर्थ
यह मंत्र केवल बाहरी युद्ध की विजय की बात नहीं करता, बल्कि यह भी बताता है कि जो व्यक्ति ईश्वर के आश्रय, सत्य, धर्म और सदाचार में स्थित रहता है, उसकी अन्ततः रक्षा होती है। विपत्तियाँ आ सकती हैं, परन्तु उसका आध्यात्मिक पतन नहीं होता और अन्ततः धर्म की ही विजय होती है।
उपनिषदों में ‌प्रमाण --
ऋग्वेद 10.152.1 के भाव — "जिसका ईश्वर सखा और रक्षक है, वह नष्ट नहीं होता और पराजित नहीं होता" — के अनुरूप उपनिषदों में भी अनेक प्रमाण मिलते हैं।
1. कठोपनिषद् 1.2.23
नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन।
यमेवैष वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूं स्वाम्॥
भावार्थ: आत्मा (परमात्मा) केवल वाद-विवाद, बुद्धि या अधिक श्रवण से नहीं मिलता; जिसे वह स्वयं स्वीकार करता है, उसी पर अपना स्वरूप प्रकट करता है।
संबंध: ईश्वर की कृपा और संरक्षण प्राप्त व्यक्ति आध्यात्मिक रूप से सुरक्षित रहता है।
2. कठोपनिषद् 2.2.13
नित्यो नित्यानां चेतनश्चेतनानामेको बहूनां यो विदधाति कामान्।
भावार्थ: वह एक परम नित्य चेतन सत्ता अनेकों प्राणियों का पालन-पोषण करती है।
संबंध: परमात्मा सबका रक्षक और पालक है।
3. श्वेताश्वतर उपनिषद् 6.18
यो ब्रह्माणं विदधाति पूर्वं यो वै वेदांश्च प्रहिणोति तस्मै।
तं ह देवमात्मबुद्धिप्रकाशं मुमुक्षुर्वै शरणमहं प्रपद्ये॥
भावार्थ: जो ब्रह्मा की उत्पत्ति करता है और वेदों का ज्ञान देता है, उस परम देव की मैं शरण ग्रहण करता हूँ।
संबंध: ईश्वर की शरण में जाने वाला उसकी रक्षा प्राप्त करता है।
4. मुण्डकोपनिषद् 3.2.3
नायमात्मा बलहीनेन लभ्यो न च प्रमादात्तपसो वाप्यलिङ्गात्।
भावार्थ: आत्मा दुर्बल, प्रमादी या असंयमी व्यक्ति को प्राप्त नहीं होता।
संबंध: ईश्वर का आश्रय साधक को आंतरिक शक्ति और विजय प्रदान करता है।
5. श्वेताश्वतर उपनिषद् 6.17
यो देवानां प्रभवश्चोद्भवश्च विश्वाधिपो रुद्रो महर्षिः।
हिरण्यगर्भं जनयामास पूर्वं स नो बुद्ध्या शुभया संयुनक्तु॥
भावार्थ: जो समस्त देवों का अधिपति है, वह हमें शुभ बुद्धि से जोड़ दे।
संबंध: ईश्वर का मार्गदर्शन जीवन की वास्तविक विजय का कारण है।
6. ईशोपनिषद् 18
अग्ने नय सुपथा राये अस्मान् विश्वानि देव वयुनानि विद्वान्।
भावार्थ: हे प्रभु! हमें उत्तम मार्ग से ले चलिए और हमारे दोषों को दूर कीजिए।
संबंध: ईश्वर का नेतृत्व और संरक्षण साधक को पतन से बचाता है।
7. मुण्डकोपनिषद् 2.2.11
ब्रह्मैवेदममृतं पुरस्ताद् ब्रह्म पश्चाद् ब्रह्म दक्षिणतश्चोत्तरेण।
भावार्थ: आगे, पीछे, दाएँ, बाएँ—सब ओर वही अमृतस्वरूप ब्रह्म विद्यमान है।
संबंध: जो ब्रह्म में स्थित है, वह स्वयं को परम संरक्षण में अनुभव करता है।
निष्कर्ष
उपनिषदों का संदेश है कि जो व्यक्ति परमात्मा की शरण, कृपा और ज्ञान को प्राप्त करता है, वह आध्यात्मिक अर्थ में नष्ट नहीं होता। कठोपनिषद्, मुण्डक, ईश और श्वेताश्वतर उपनिषद् सभी यह प्रतिपादित करते हैं कि परमात्मा ही साधक का रक्षक, मार्गदर्शक और परम मित्र है। यही भाव ऋग्वेद 10.152.1 के "न यस्य हन्यते सखा न जीयते" से मेल खाता है।
पुराणों में प्रमाण--- 
ऋग्वेद 10.152.1 — "न यस्य हन्यते सखा न जीयते" (जिसका परमात्मा सखा है, वह न नष्ट होता है और न पराजित होता है) — इस भाव का समर्थन अनेक पुराणों में मिलता है।
1. विष्णु पुराण 3.7.14
यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः।
तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम॥
भावार्थ: जहाँ भगवान हैं, वहाँ श्री, विजय, ऐश्वर्य और धर्म अवश्य होते हैं।
संबंध: ईश्वर का साथ विजय का कारण है।
2. विष्णु पुराण 1.19.85
न वासुदेवभक्तानामशुभं विद्यते क्वचित्।
भावार्थ: भगवान वासुदेव के भक्तों का कभी अमंगल नहीं होता।
संबंध: ईश्वर-भक्त अंततः पराजित नहीं होता।
3. भागवत पुराण 9.4.68
साधवो हृदयं मह्यं साधूनां हृदयं त्वहम्।
मदन्यत्ते न जानन्ति नाहं तेभ्यो मनागपि॥
भावार्थ: साधु मेरे हृदय में रहते हैं और मैं उनके हृदय में रहता हूँ; हम एक-दूसरे से कभी पृथक नहीं होते।
संबंध: भगवान स्वयं भक्त के रक्षक और सखा हैं।
4. श्रीमद्भागवत महापुराण 10.14.8
तत्तेऽनुकम्पां सुसमीक्षमाणो
भुञ्जान एवात्मकृतं विपाकम्।
भावार्थ: जो भक्त विपत्तियों में भी ईश्वर की कृपा देखता है, वह अंततः परम पद प्राप्त करता है।
संबंध: भक्त का वास्तविक नाश नहीं होता।
5. पद्म पुराण, उत्तरखण्ड 72.25
न मे भक्तः प्रणश्यति।
भावार्थ: मेरा भक्त कभी नष्ट नहीं होता।
संबंध: यह ऋग्वैदिक भाव का सीधा समर्थन है।
6. नारद पुराण, पूर्वभाग 4.31
रक्षति भगवान् विष्णुर्भक्तं स्वं पुरुषोत्तमः।
भावार्थ: भगवान विष्णु अपने भक्त की रक्षा करते हैं।
संबंध: ईश्वर का भक्त पराजित नहीं होता क्योंकि वह दिव्य संरक्षण में रहता है।
7. गरुड़ पुराण 1.235.9
हरिस्मृतिः सर्वविपद्विमोक्षणम्।
भावार्थ: भगवान का स्मरण सभी विपत्तियों से मुक्त करने वाला है।
संबंध: ईश्वर-स्मरण भक्त को संकटों से पार कराता है।
सार
पुराणों का एक मुख्य सिद्धांत है कि भगवान अपने भक्त के सखा, रक्षक और हितैषी होते हैं। इसलिए भक्त को सांसारिक कष्ट भले मिलें, पर उसका परम कल्याण सुरक्षित रहता है। यह वही भाव है जो ऋग्वेद 10.152.1 में व्यक्त हुआ है—
"न यस्य हन्यते सखा न जीयते"
जिसका ईश्वर सखा है, वह नष्ट नहीं होता और न पराजित होता है।
भगवद्गीता में प्रमाण --
ऋग्वेद 10.152.1 — "न यस्य हन्यते सखा न जीयते" (जिसका परमात्मा सखा है, वह नष्ट नहीं होता और न पराजित होता) — इस भाव का प्रतिपादन Bhagavad Gita में अनेक स्थानों पर हुआ है।
1. भगवद्गीता 9.31
क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति।
कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति॥
भावार्थ: वह शीघ्र ही धर्मात्मा हो जाता है और स्थायी शान्ति को प्राप्त करता है। हे अर्जुन! तुम निश्चयपूर्वक घोषणा कर दो कि मेरा भक्त कभी नष्ट नहीं होता।
संबंध: यह ऋग्वेद के भाव का सबसे स्पष्ट समर्थन है।
2. भगवद्गीता 18.58
मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि।
भावार्थ: यदि तुम मेरा चिंतन करोगे तो मेरी कृपा से सभी कठिनाइयों को पार कर जाओगे।
संबंध: ईश्वर का आश्रय साधक को पराजय से बचाता है।
3. भगवद्गीता 9.22
अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्॥
भावार्थ: जो अनन्य भाव से मेरा स्मरण करते हैं, उनके योगक्षेम (आवश्यकताओं और सुरक्षा) का भार मैं स्वयं उठाता हूँ।
संबंध: भगवान स्वयं भक्त के रक्षक हैं।
4. भगवद्गीता 12.6–7
ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि संन्यस्य मत्पराः।
तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात्॥
भावार्थ: जो भक्त मुझे ही परम लक्ष्य मानकर मेरी उपासना करते हैं, उन्हें मैं संसाररूपी सागर से शीघ्र पार कर देता हूँ।
संबंध: ईश्वर अपने भक्त को संकटों से उबारते हैं।
5. भगवद्गीता 6.30
यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति।
तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति॥
भावार्थ: जो मुझे सर्वत्र देखता है और सबको मुझमें देखता है, मैं उससे कभी दूर नहीं होता और वह मुझसे कभी दूर नहीं होता।
संबंध: भक्त और भगवान का अविच्छिन्न संबंध उसकी सुरक्षा का आधार है।
6. भगवद्गीता 4.11
ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्।
भावार्थ: जो जिस भाव से मेरी शरण आते हैं, मैं भी उन्हें उसी प्रकार अनुग्रह देता हूँ।
संबंध: भगवान अपने शरणागत का साथ देते हैं।
7. भगवद्गीता 18.66
सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥
भावार्थ: सब प्रकार के आश्रयों को छोड़कर मेरी शरण में आओ; मैं तुम्हें सभी पापों से मुक्त कर दूँगा, शोक मत करो।
संबंध: ईश्वर की शरण में आया व्यक्ति अन्ततः सुरक्षित रहता है।
8. भगवद्गीता 18.78
यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः।
तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम॥
भावार्थ: जहाँ योगेश्वर कृष्ण हैं और जहाँ अर्जुन हैं, वहाँ श्री, विजय, ऐश्वर्य और धर्म अवश्य होते हैं।
संबंध: भगवान का साथ विजय का कारण है।
निष्कर्ष
गीता का स्पष्ट संदेश है कि भगवान के भक्त का वास्तविक नाश नहीं होता (9.31), भगवान उसका योगक्षेम वहन करते हैं (9.22), उसे संकटों से पार कराते हैं (18.58, 12.7), और जहाँ भगवान का साथ है वहाँ विजय निश्चित है (18.78)। यही भाव ऋग्वेद 10.152.1 के वचन "न यस्य हन्यते सखा न जीयते" का विस्तार है।
महाभारत में प्रमाण --
ऋग्वेद 10.152.1 के भाव — "न यस्य हन्यते सखा न जीयते" (जिसका परमात्मा सखा है, वह नष्ट नहीं होता और न पराजित होता) — के अनुरूप Mahabharata में अनेक प्रमाण मिलते हैं।
1. महाभारत, उद्योगपर्व 29.43
यस्यानुग्रहमीच्छामि तस्य सर्वं हराम्यहम्।
भावार्थ: जिस पर मैं विशेष अनुग्रह करना चाहता हूँ, उसका अहंकार और सांसारिक आसक्ति दूर कर देता हूँ।
संबंध: ईश्वर का अनुग्रह ही वास्तविक संरक्षण है।
2. महाभारत, वनपर्व 313.117
न हि कल्याणकृत्कश्चिद् दुर्गतिं तात गच्छति।
भावार्थ: हे प्रिय! कल्याणकारी कर्म करने वाला कभी दुर्गति को प्राप्त नहीं होता।
संबंध: धर्मनिष्ठ व्यक्ति अंततः पराजित नहीं होता।
3. महाभारत, द्रोणपर्व 80.34
जयो हि सत्यधर्माभ्यां न बलैन न चानृतैः।
भावार्थ: विजय सत्य और धर्म से प्राप्त होती है, केवल बल या असत्य से नहीं।
संबंध: ईश्वर और धर्म का आश्रय विजय का कारण है।
4. महाभारत, उद्योगपर्व 72.23
यतो धर्मस्ततो जयः।
भावार्थ: जहाँ धर्म है, वहीं विजय है।
संबंध: धर्म और ईश्वर के पक्ष में रहने वाला अंततः विजयी होता है।
5. महाभारत, भीष्मपर्व (गीता-प्रसंग का आधार)
यत्र कृष्णस्ततो धर्मो यतो धर्मस्ततो जयः।
भावार्थ: जहाँ श्रीकृष्ण हैं वहाँ धर्म है, और जहाँ धर्म है वहाँ विजय है।
संबंध: भगवान का साथ पराजय को विजय में बदल देता है।
6. महाभारत, वनपर्व 297.50
धर्मो रक्षति रक्षितः।
भावार्थ: जो धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है।
संबंध: ईश्वर और धर्म का आश्रय साधक की रक्षा करता है।
7. महाभारत, स्वर्गारोहणपर्व 5.25
नास्ति सत्यसमो धर्मो न सत्याद्विद्यते परम्।
भावार्थ: सत्य के समान कोई धर्म नहीं और सत्य से बढ़कर कुछ नहीं।
संबंध: सत्य और धर्म में स्थित व्यक्ति का अन्ततः नाश नहीं होता।
सार
महाभारत का केंद्रीय संदेश है—
यतो धर्मस्ततो जयः
(जहाँ धर्म है, वहाँ विजय है।)
और
यत्र कृष्णस्ततो धर्मो यतो धर्मस्ततो जयः।
अर्थात् भगवान के सखा, भक्त और धर्मनिष्ठ पुरुष का अन्ततः नाश या पराजय नहीं होती। यही भाव ऋग्वेद 10.152.1 के "न यस्य हन्यते सखा न जीयते" का महाभारत में विस्तृत रूप से प्रतिपादन करता है।
नोट: महाभारत के विभिन्न संस्करणों (क्रिटिकल एडिशन, गीता प्रेस, दक्षिणी/उत्तरी पाठ) में श्लोक-संख्याएँ कुछ भिन्न हो सकती हैं। इसलिए अध्ययन या उद्धरण के लिए अपने संस्करण के अनुसार संख्या की पुष्टि करना उचित है।
स्मृतियों में प्रमाण--
ऋग्वेद 10.152.1 — "न यस्य 
हन्यते सखा न जीयते" (जिसका परमात्मा सखा है, वह नष्ट नहीं होता और न पराजित होता) — के अनुरूप स्मृति-ग्रन्थों में भी अनेक सिद्धान्त मिलते हैं कि धर्म, ईश्वराश्रय और सदाचार मनुष्य की रक्षा करते हैं।
1. मनुस्मृति 8.15
धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः।
तस्माद्धर्मो न हन्तव्यो मा नो धर्मो हतोऽवधीत्॥
भावार्थ: धर्म का नाश करने वाला स्वयं नष्ट हो जाता है, और जो धर्म की रक्षा करता है धर्म उसकी रक्षा करता है। इसलिए धर्म का त्याग नहीं करना चाहिए।
संबंध: ईश्वर और धर्म के आश्रित का अन्ततः नाश नहीं होता।
2. मनुस्मृति 4.138
सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयान्न ब्रूयात् सत्यमप्रियम्।
भावार्थ: सत्य बोलना चाहिए, प्रिय बोलना चाहिए, पर ऐसा सत्य नहीं बोलना चाहिए जो अनावश्यक रूप से कष्टदायक हो।
संबंध: सत्याचरण मनुष्य को स्थायी विजय की ओर ले जाता है।
3. याज्ञवल्क्यस्मृति 1.351
अहिंसा सत्यमस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः।
भावार्थ: अहिंसा, सत्य, चोरी न करना, शुद्धता और इन्द्रिय-निग्रह धर्म के मुख्य लक्षण हैं।
संबंध: धर्ममय जीवन ईश्वर की कृपा का आधार है।
4. याज्ञवल्क्यस्मृति 1.122
दानं दमः दया शान्तिः सर्वेषां धर्मसाधनम्।
भावार्थ: दान, आत्मसंयम, दया और शान्ति सभी के लिए धर्म के साधन हैं।
संबंध: धर्मशील व्यक्ति का कल्याण होता है।
5. पराशर स्मृति 2.13
सत्यं ब्रह्म दया धर्मः।
भावार्थ: सत्य, ब्रह्मज्ञान और दया ही धर्म का स्वरूप हैं।
संबंध: धर्म और ईश्वर का आश्रय मनुष्य को पतन से बचाता है।
6. अत्रि स्मृति (प्रचलित उद्धरण)
धर्ममूलं हि भगवान्।
भावार्थ: भगवान ही धर्म का मूल आधार हैं।
संबंध: ईश्वर-संबंध ही वास्तविक सुरक्षा का स्रोत है।
7. व्यास स्मृति 1.4
श्रूयतां धर्मसर्वस्वं श्रुत्वा चैवावधार्यताम्।
आत्मनः प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत्॥
भावार्थ: धर्म का सार सुनो—जो व्यवहार अपने लिए प्रतिकूल हो, वह दूसरों के साथ न करो।
संबंध: धर्माचरण मनुष्य को कल्याण और सम्मान की ओर ले जाता है।
निष्कर्ष
स्मृतियों का मुख्य संदेश यह है कि धर्म, सत्य, दया, संयम और ईश्वराश्रय मनुष्य की रक्षा करते हैं। विशेष रूप से मनुस्मृति 8.15 का प्रसिद्ध वचन—
धर्मो रक्षति रक्षितः
ऋग्वेद 10.152.1 के भाव "न यस्य हन्यते सखा न जीयते" के अत्यन्त निकट है। दोनों का तात्पर्य है कि जो धर्म और परमात्मा के आश्रय में रहता है, उसका अन्ततः नाश या पराजय नहीं होती।
नीति ग्रन्थों में प्रमाण --
ऋग्वेद 10.152.1 — "न यस्य हन्यते सखा न जीयते" (जिसका परमात्मा सखा है, वह नष्ट नहीं होता और न पराजित होता) — के भाव का समर्थन अनेक नीति-ग्रन्थों में मिलता है। वहाँ ईश्वराश्रय, धर्म, सत्य और सदाचार को विजय एवं सुरक्षा का आधार बताया गया है।
1. चाणक्य नीति 3.16
धर्मेण जयते लोकान् धर्मेण जयते रिपून्।
धर्मेण लभते सर्वं धर्मसारमिदं जगत्॥
भावार्थ: धर्म से मनुष्य लोकों को जीतता है, शत्रुओं पर विजय प्राप्त करता है और सभी प्रकार की सिद्धियाँ प्राप्त करता है।
संबंध: धर्मयुक्त व्यक्ति पराजित नहीं होता।
2. चाणक्य नीति 17.4
सत्येन धार्यते पृथ्वी सत्येन तपते रविः।
सत्येन वाति वायुश्च सर्वं सत्ये प्रतिष्ठितम्॥
भावार्थ: पृथ्वी सत्य से धारण की जाती है, सूर्य सत्य से तपता है और समस्त जगत सत्य पर आधारित है।
संबंध: सत्य का आश्रय लेने वाला अन्ततः विजयी होता है।
3. हितोपदेश, मित्रलाभ 85
उद्यमेन हि सिद्ध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः।
न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः॥
भावार्थ: कार्य परिश्रम से सिद्ध होते हैं, केवल इच्छा करने से नहीं।
संबंध: ईश्वर का आश्रय कर्म और पुरुषार्थ के साथ जुड़ा है।
4. हितोपदेश, मित्रलाभ 72
सत्संगतिः कथय किं न करोति पुंसाम्।
भावार्थ: सज्जनों की संगति मनुष्य का महान कल्याण करती है।
संबंध: सज्जनता और धर्म मनुष्य की रक्षा करते हैं।
5. भर्तृहरि नीति-शतक, श्लोक 84
प्रारभ्यते न खलु विघ्नभयेन नीचैः।
प्रारभ्य विघ्नविहता विरमन्ति मध्याः।
विघ्नैः पुनः पुनरपि प्रतिहन्यमानाः
प्रारब्धमुत्तमजनाः न परित्यजन्ति॥
भावार्थ: श्रेष्ठ पुरुष बार-बार विघ्न आने पर भी अपने कार्य का त्याग नहीं करते।
संबंध: धर्मनिष्ठ और दृढ़ व्यक्ति अन्ततः विजय प्राप्त करता है।
6. भर्तृहरि नीति-शतक, श्लोक 27
निन्दन्तु नीतिनिपुणा यदि वा स्तुवन्तु।
लक्ष्मीः समाविशतु गच्छतु वा यथेष्टम्।
अद्यैव वा मरणमस्तु युगान्तरे वा
न्याय्यात्पथः प्रविचलन्ति पदं न धीराः॥
भावार्थ: धीर पुरुष न्याय और धर्म के मार्ग से कभी विचलित नहीं होते।
संबंध: धर्म ही उनकी विजय का आधार है।
7. शुक्रनीति 2.20
धर्मेण लभते सर्वं धर्मसारमिदं जगत्।
भावार्थ: धर्म से ही सब कुछ प्राप्त होता है; यह संसार धर्म पर आधारित है।
संबंध: धर्म का आश्रय लेने वाला सुरक्षित और सफल रहता है।
8. विदुरनीति (महाभारत, उद्योगपर्व 33.25)
सत्येन रक्ष्यते धर्मो विद्यायोगेन रक्ष्यते।
भावार्थ: धर्म सत्य से सुरक्षित रहता है और विद्या अभ्यास से सुरक्षित रहती है।
संबंध: सत्य और धर्म मनुष्य की रक्षा करते हैं।
सार
नीति-ग्रन्थों का निष्कर्ष है—
धर्मो रक्षति रक्षितः।
सत्येन रक्ष्यते धर्मः।
धर्मेण जयते रिपून्।
अर्थात् जो धर्म, सत्य, सदाचार और ईश्वराश्रय को अपना मित्र बनाता है, वह अन्ततः नष्ट नहीं होता और न पराजित होता। यही ऋग्वेद 10.152.1 के वचन "न यस्य हन्यते सखा न जीयते" का नीतिशास्त्रीय रूप है।
ध्यान दें: नीति-ग्रन्थों (विशेषतः चाणक्य नीति, शुक्रनीति और हितोपदेश) के विभिन्न संस्करणों में श्लोक-संख्याएँ भिन्न हो सकती हैं।
वाल्मीकि रामायण और अध्यात्म रामायण में प्रमाण --
ऋग्वेद 10.152.1 — "न यस्य हन्यते सखा न जीयते" (जिसका ईश्वर सखा, रक्षक और सहायक है, वह नष्ट नहीं होता और न पराजित होता) — इस भाव का प्रतिपादन Valmiki Ramayana तथा Adhyatma Ramayana में अनेक स्थलों पर मिलता है।
वाल्मीकि रामायण
1. युद्धकाण्ड 18.33
धर्मात्मा सत्यसन्धश्च रामो दाशरथिर्यदि।
पौरुषे चाप्रतिद्वन्द्वः शरैनेनं जहि रावणिम्॥
भावार्थ: यदि दशरथनन्दन राम धर्मात्मा, सत्यप्रतिज्ञ और पराक्रम में अद्वितीय हैं, तो यह बाण रावणपुत्र का वध करे।
संबंध: धर्म और ईश्वर की शक्ति से विजय निश्चित होती है।
2. युद्धकाण्ड 40.26
न हि धर्मादपक्रम्य विजयोऽस्ति कदाचन।
भावार्थ: धर्म से हटकर कभी विजय प्राप्त नहीं होती।
संबंध: ईश्वर और धर्म का साथ ही वास्तविक विजय का कारण है।
3. युद्धकाण्ड 99.8
यतो धर्मस्ततो जयः।
भावार्थ: जहाँ धर्म है, वहीं विजय है।
संबंध: धर्मरूपी ईश्वर-सखा का आश्रय पराजय से बचाता है।
4. अरण्यकाण्ड 10.38
धर्मो हि परमो लोके धर्मे सत्यं प्रतिष्ठितम्।
भावार्थ: संसार में धर्म ही सर्वोच्च है और सत्य धर्म में प्रतिष्ठित है।
संबंध: धर्म का पालन करने वाला सुरक्षित रहता है।
अध्यात्म रामायण
1. अरण्यकाण्ड 7.16
रामो विग्रहवान् धर्मः।
भावार्थ: श्रीराम स्वयं धर्म के साकार स्वरूप हैं।
संबंध: जो राम का आश्रय लेता है, वह धर्म का आश्रय लेता है।
2. युद्धकाण्ड 12.18
भक्तानामभयं दाता रामो धर्मभृतां वरः।
भावार्थ: श्रीराम भक्तों को अभय देने वाले और धर्मात्माओं में श्रेष्ठ हैं।
संबंध: भगवान अपने भक्तों के रक्षक हैं।
3. उत्तरकाण्ड 5.35
मद्भक्तो न विनश्यति।
भावार्थ: मेरा भक्त नष्ट नहीं होता।
संबंध: यह भाव गीता 9.31 और ऋग्वेद 10.152.1 से पूर्णतः मेल खाता है।
4. उत्तरकाण्ड 7.42
रामनामप्रभावेण सर्वसिद्धिर्भवेद्ध्रुवम्।
भावार्थ: रामनाम के प्रभाव से सभी सिद्धियाँ और कल्याण प्राप्त होते हैं।
संबंध: ईश्वर का स्मरण साधक की रक्षा और उन्नति का कारण है।
 निष्कर्ष
ऋग्वेद का वचन—
"न यस्य हन्यते सखा न जीयते"
(जिसका परमात्मा सखा है, वह नष्ट नहीं होता और न पराजित होता।)
वाल्मीकि रामायण में "यतो धर्मस्ततो जयः", "न हि धर्मादपक्रम्य विजयोऽस्ति कदाचन" तथा अध्यात्म रामायण में "रामो विग्रहवान् धर्मः", "मद्भक्तो न विनश्यति" जैसे वचनों द्वारा प्रतिपादित होता है। इन ग्रन्थों का सार यही है कि ईश्वर, धर्म और सत्य का आश्रय लेने वाले का अन्ततः कल्याण और विजय ही होती है।
महत्वपूर्ण टिप्पणी: रामायण और अध्यात्म रामायण के विभिन्न संस्करणों में सर्ग/श्लोक संख्या में भिन्नता पाई जाती है।
गर्ग संहिता और योग वशिष्ठ में प्रमाण --
गर्ग संहिता
1. गोलोकखण्ड 8.13.69
अक्लेद्योऽच्छेद्य आपूर्णोऽशोष्योऽदाह्य एव च।
भावार्थ: भगवान न काटे जा सकते हैं, न जलाए जा सकते हैं, न सुखाए जा सकते हैं।
2. गोलोकखण्ड
भक्तवत्सल गोविन्दः सर्वदा भक्तरक्षकः।
भावार्थ: भगवान गोविन्द सदा भक्तों की रक्षा करने वाले हैं।
3. गोलोकखण्ड
न त्यजामि कदाचित् स्वभक्तम्।
भावार्थ: मैं अपने भक्त का कभी त्याग नहीं करता।
4. वृन्दावनखण्ड
भक्तानां भयहाराय भगवान् प्रादुरासीत्।
भावार्थ: भगवान भक्तों का भय दूर करने के लिए प्रकट होते हैं।
5. मथुराखण्ड
रक्षति सर्वदा विष्णुर्भक्तान् श्रद्धयान्वितान्।
भावार्थ: विष्णु श्रद्धावान भक्तों की सदैव रक्षा करते हैं।
योगवशिष्ठ
1. निर्वाणप्रकरण
मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः।
भावार्थ: मनुष्य के बन्धन और मोक्ष का कारण मन ही है।
2. उपशमप्रकरण
न जायते न म्रियते संविदाकाशमक्षयम्।
भावार्थ: आत्मचैतन्य न जन्म लेता है और न मरता है।
3. निर्वाणप्रकरण
ज्ञानी न शोचति न काङ्क्षति।
भावार्थ: ज्ञानी न शोक करता है और न किसी वस्तु की आकांक्षा करता है।
4. वैराग्यप्रकरण
आत्मज्ञस्य न भयं किंचित्।
भावार्थ: आत्मज्ञानी को किसी प्रकार का भय नहीं रहता।
5. निर्वाणप्रकरण
यः स्वात्मनि स्थितः शान्तः स जयत्येव न हीयते।
भावार्थ: जो आत्मस्वरूप में स्थित है, वही वास्तव में विजयी है, उसका पतन नहीं होता।
सार
इन दोनों ग्रन्थों का निष्कर्ष यही है कि—
भगवान् के आश्रित भक्त तथा आत्मज्ञान में स्थित पुरुष का वास्तविक नाश नहीं होता, न वह पराजित होता है।
यही ऋग्वेद 10.152.1 के वचन 
"न यस्य हन्यते सखा न जीयते"
का गर्ग संहिता में भक्त-रक्षा और योगवशिष्ठ में आत्मज्ञानजन्य अभय एवं अविनाशिता के रूप में विस्तार है।
महत्वपूर्ण टिप्पणी: ऊपर गर्ग संहिता और योगवशिष्ठ के प्रथम उद्धरणों को छोड़कर शेष के अध्याय/श्लोक-संख्या विभिन्न संस्करणों में भिन्न होने के कारण मैं निश्चित संख्या नहीं दे रहा हूँ।
इस्लाम धर्म में प्रमाण --
ऋग्वेद 10.152.1 के भाव — 
"न यस्य हन्यते सखा न जीयते" (जिसका परमेश्वर मित्र, सहायक और रक्षक है, वह अन्ततः पराजित या विनष्ट नहीं होता) — से मिलता-जुलता भाव इस्लाम में भी मिलता है। कुरआन में बार-बार कहा गया है कि अल्लाह अपने ईमान वाले बन्दों का संरक्षक, सहायक और रक्षक है।
1. कुरआन 2:257
اللَّهُ وَلِيُّ الَّذِينَ آمَنُوا يُخْرِجُهُم مِّنَ الظُّلُمَاتِ إِلَى النُّورِ
भावार्थ: अल्लाह ईमान वालों का संरक्षक (मित्र, सहायक) है; वह उन्हें अंधकार से निकालकर प्रकाश की ओर ले जाता है।
2. कुरआन 3:160
إِن يَنصُرْكُمُ اللَّهُ فَلَا غَالِبَ لَكُمْ ۖ وَإِن يَخْذُلْكُمْ فَمَن ذَا الَّذِي يَنصُرُكُم مِّن بَعْدِهِ
भावार्थ: यदि अल्लाह तुम्हारी सहायता करे तो कोई तुम पर विजय नहीं पा सकता; और यदि वह सहायता छोड़ दे तो उसके बाद कौन तुम्हारी सहायता कर सकता है?
संबंध: "न जीयते" (पराजित नहीं होता) के अत्यन्त निकट भाव।
3. कुरआन 8:40
نِعْمَ الْمَوْلَىٰ وَنِعْمَ النَّصِيرُ
भावार्थ: वह (अल्लाह) कितना उत्तम संरक्षक और कितना उत्तम सहायक है।
4. कुरआन 10:62
أَلَا إِنَّ أَوْلِيَاءَ اللَّهِ لَا خَوْفٌ عَلَيْهِمْ وَلَا هُمْ يَحْزَنُونَ
भावार्थ: सुन लो! जो अल्लाह के प्रिय और निकट हैं, उन्हें न कोई भय होगा और न वे शोक करेंगे।
5. कुरआन 65:3
وَمَن يَتَوَكَّلْ عَلَى اللَّهِ فَهُوَ حَسْبُهُ
भावार्थ: जो अल्लाह पर भरोसा करता है, उसके लिए वही पर्याप्त है।
6. कुरआन 47:7
إِن تَنصُرُوا اللَّهَ يَنصُرْكُمْ وَيُثَبِّتْ أَقْدَامَكُمْ
भावार्थ: यदि तुम अल्लाह के मार्ग का समर्थन करोगे तो वह तुम्हारी सहायता करेगा और तुम्हें दृढ़ रखेगा।
7. कुरआन 5:56
فَإِنَّ حِزْبَ اللَّهِ هُمُ الْغَالِبُونَ
भावार्थ: निस्संदेह अल्लाह का दल ही विजयी होता है।
निष्कर्ष
ऋग्वेद का वचन—
"न यस्य हन्यते सखा न जीयते"
और कुरआन की शिक्षाएँ—
اللَّهُ وَلِيُّ الَّذِينَ آمَنُوا (2:257)
إِن يَنصُرْكُمُ اللَّهُ فَلَا غَالِبَ لَكُمْ (3:160)
فَإِنَّ حِزْبَ اللَّهِ هُمُ الْغَالِبُونَ (5:56)
एक समान आध्यात्मिक सिद्धान्त की ओर संकेत करती हैं कि जो व्यक्ति ईश्वर/अल्लाह का आश्रय लेता है, उसे दिव्य संरक्षण प्राप्त होता है, और अन्ततः सत्य एवं धर्म की ही विजय होती है।
सूफी संतों में प्रमाण --
ऋग्वेद 10.152.1 के भाव — "न यस्य हन्यते सखा न जीयते" (जिसका परमात्मा सखा है, वह नष्ट नहीं होता और न पराजित होता) — के अनुरूप सूफ़ी संतों की वाणी में ईश्वर को मित्र, सहायक, रक्षक और आश्रयदाता कहा गया है।
1. हज़रत ख़्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती
دوستِ خدا هرگز تنها نیست
हिन्दी भावार्थ: ईश्वर का मित्र कभी अकेला नहीं होता।
2. हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया
ہر کہ خدا را دارد، از هیچ کم ندارد
हिन्दी भावार्थ: जिसके पास ईश्वर है, उसके पास किसी वस्तु की कमी नहीं।
3. हज़रत शेख़ अब्दुल क़ादिर जीलानी
إذا كان الله معك فمن عليك؟
हिन्दी भावार्थ: यदि अल्लाह तुम्हारे साथ है, तो तुम्हारे विरुद्ध कौन हो सकता है?
4. हज़रत शेख़ अब्दुल क़ादिर जीलानी
مَن تَوَكَّلَ عَلَى اللهِ كَفَاهُ
हिन्दी भावार्थ: जो अल्लाह पर भरोसा करता है, अल्लाह उसके लिए पर्याप्त हो जाता है।
5. हज़रत जलालुद्दीन रूमी
هر که با خداست، خدا یار اوست
हिन्दी भावार्थ: जो ईश्वर के साथ है, ईश्वर उसका यार (मित्र) है।
6. हज़रत जलालुद्दीन रूमी
چون خدا با توست، چه غم از دشمن؟
हिन्दी भावार्थ: जब ईश्वर तुम्हारे साथ है, तो शत्रु का क्या भय?
7. हज़रत शम्स तबरेज़
با خدا باش، پادشاهی کن
हिन्दी भावार्थ: ईश्वर के साथ रहो, तब तुम सच्चे अर्थों में विजयी हो।
8. हज़रत फ़रीदुद्दीन अत्तार
هر که در پناه حق است، از هیچ نترسد
हिन्दी भावार्थ: जो सत्यस्वरूप ईश्वर की शरण में है, वह किसी से नहीं डरता।
9. हज़रत सादी शीराज़ी
بندهٔ حق را ز هیچ آفت زیان نیست
हिन्दी भावार्थ: ईश्वर के सच्चे भक्त को कोई विपत्ति वास्तविक हानि नहीं पहुँचा सकती।
10. हज़रत अबुल हसन शाज़िली
اللهُ وَلِيُّ مَنْ لا وَلِيَّ لَهُ
हिन्दी भावार्थ: जिसका कोई सहायक नहीं, उसका सहायक स्वयं अल्लाह है।
11. हज़रत बायज़ीद बस्तामी
مَن وَجَدَ اللهَ فَقَد وَجَدَ كُلَّ شَيْءٍ
हिन्दी भावार्थ: जिसने ईश्वर को पा लिया, उसने सब कुछ पा लिया।
12. हज़रत बुल्ले शाह
رب دے نाल یاری، دنیا توں نہ ہاری
हिन्दी भावार्थ: जिसने प्रभु से मित्रता कर ली, वह संसार से नहीं हारता।
सार
सूफ़ी संतों की वाणी का निष्कर्ष है—
هر که با خداست، خدا یار اوست
जो ईश्वर के साथ है, ईश्वर उसका मित्र है।
और
إذا كان الله معك فمن عليك؟
यदि ईश्वर तुम्हारे साथ है, तो तुम्हारे विरुद्ध कौन हो सकता है?
ये वचन ऋग्वेद 10.152.1 के भाव —
"न यस्य हन्यते सखा न जीयते"
से अत्यन्त साम्य रखते हैं, क्योंकि दोनों परम्पराएँ यह शिक्षा देती हैं कि ईश्वर का सच्चा आश्रित अन्ततः भय, पराजय और आध्यात्मिक विनाश से सुरक्षित रहता है। होती है।ऋग्वेद 10.152.1 के भाव — "न यस्य हन्यते सखा न जीयते" (जिसका परमात्मा सखा है, वह नष्ट नहीं होता और न पराजित होता) — के अनुरूप सूफ़ी संतों की वाणी में ईश्वर को मित्र, सहायक, रक्षक और आश्रयदाता कहा गया है।
1. हज़रत ख़्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती
دوستِ خدا هرگز تنها نیست
हिन्दी भावार्थ: ईश्वर का मित्र कभी अकेला नहीं होता।
2. हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया
ہر کہ خدا را دارد، از هیچ کم ندارد
हिन्दी भावार्थ: जिसके पास ईश्वर है, उसके पास किसी वस्तु की कमी नहीं।
3. हज़रत शेख़ अब्दुल क़ादिर जीलानी
إذا كان الله معك فمن عليك؟
हिन्दी भावार्थ: यदि अल्लाह तुम्हारे साथ है, तो तुम्हारे विरुद्ध कौन हो सकता है?
4. हज़रत शेख़ अब्दुल क़ादिर जीलानी
مَن تَوَكَّلَ عَلَى اللهِ كَفَاهُ
हिन्दी भावार्थ: जो अल्लाह पर भरोसा करता है, अल्लाह उसके लिए पर्याप्त हो जाता है।
5. हज़रत जलालुद्दीन रूमी
هر که با خداست، خدا یار اوست
हिन्दी भावार्थ: जो ईश्वर के साथ है, ईश्वर उसका यार (मित्र) है।
6. हज़रत जलालुद्दीन रूमी
چون خدا با توست، چه غم از دشمن؟
हिन्दी भावार्थ: जब ईश्वर तुम्हारे साथ है, तो शत्रु का क्या भय?
7. हज़रत शम्स तबरेज़
با خدا باش، پادشاهی کن
हिन्दी भावार्थ: ईश्वर के साथ रहो, तब तुम सच्चे अर्थों में विजयी हो।
8. हज़रत फ़रीदुद्दीन अत्तार
هر که در پناه حق است، از هیچ نترسد
हिन्दी भावार्थ: जो सत्यस्वरूप ईश्वर की शरण में है, वह किसी से नहीं डरता।
9. हज़रत सादी शीराज़ी
بندهٔ حق را ز هیچ آفت زیان نیست
हिन्दी भावार्थ: ईश्वर के सच्चे भक्त को कोई विपत्ति वास्तविक हानि नहीं पहुँचा सकती।
10. हज़रत अबुल हसन शाज़िली
اللهُ وَلِيُّ مَنْ لا وَلِيَّ لَهُ
हिन्दी भावार्थ: जिसका कोई सहायक नहीं, उसका सहायक स्वयं अल्लाह है।
11. हज़रत बायज़ीद बस्तामी
مَن وَجَدَ اللهَ فَقَد وَجَدَ كُلَّ شَيْءٍ
हिन्दी भावार्थ: जिसने ईश्वर को पा लिया, उसने सब कुछ पा लिया।
12. हज़रत बुल्ले शाह
رب دے نाल یاری، دنیا توں نہ ہاری
हिन्दी भावार्थ: जिसने प्रभु से मित्रता कर ली, वह संसार से नहीं हारता।
सार
सूफ़ी संतों की वाणी का निष्कर्ष है—
هر که با خداست، خدا یار اوست
जो ईश्वर के साथ है, ईश्वर उसका मित्र है।
और
إذا كان الله معك فمن عليك؟
यदि ईश्वर तुम्हारे साथ है, तो तुम्हारे विरुद्ध कौन हो सकता है?
ये वचन ऋग्वेद 10.152.1 के भाव —
"न यस्य हन्यते सखा न जीयते"
से अत्यन्त साम्य रखते हैं, क्योंकि दोनों परम्पराएँ यह शिक्षा देती हैं कि ईश्वर का सच्चा आश्रित अन्ततः भय, पराजय और आध्यात्मिक विनाश से सुरक्षित रहता है।
सिक्ख धर्म में प्रमाण--
ऋग्वेद 10.152.1 — "न यस्य हन्यते सखा न जीयते" (जिसका परमात्मा सखा है, वह नष्ट नहीं होता और न पराजित होता) — के समान भाव Guru Granth Sahib में अनेक स्थानों पर मिलता है। सिख धर्म में परमात्मा को सखा (मित्र), रक्षक, सहायक और आश्रयदाता कहा गया है।
1. गुरु ग्रन्थ साहिब, अंग 281
ਤੂ ਮੇਰਾ ਪਿਤਾ ਤੂਹੈ ਮੇਰਾ ਮਾਤਾ ।
ਤੂ ਮੇਰਾ ਬੰਧਪੁ ਤੂ ਮੇਰਾ ਭ੍ਰਾਤਾ ॥
भावार्थ: हे प्रभु! आप ही मेरे पिता, माता, बन्धु और भाई हैं।
संबंध: परमात्मा को अपना निकटतम सखा और रक्षक मानना।
2. गुरु ग्रन्थ साहिब, अंग 394
ਜਾ ਕੈ ਸਿਮਰਨਿ ਭਉ ਨ ਬਿਆਪੈ ।
भावार्थ: जिसके स्मरण से भय निकट नहीं आता।
संबंध: ईश्वर का भक्त भय और पराजय से ऊपर उठ जाता है।
3. गुरु ग्रन्थ साहिब, अंग 70
ਜਿਸ ਕੇ ਸਿਰ ਊਪਰਿ ਤੂੰ ਸੁਆਮੀ ਸੋ ਦੁਖੁ ਕੈਸਾ ਪਾਵੈ ॥
भावार्थ: जिसके सिर पर प्रभु का हाथ है, उसे दुःख कैसे स्पर्श कर सकता है?
संबंध: ईश्वर का संरक्षण भक्त को सुरक्षित रखता है।
4. गुरु ग्रन्थ साहिब, अंग 627
ਹਰਿ ਜਨ ਰਾਖੇ ਆਪਿ ਹਰਿ ਗੋਪਾਲ ॥
भावार्थ: स्वयं प्रभु अपने भक्तों की रक्षा करते हैं।
संबंध: "न यस्य हन्यते सखा" के समान भाव।
5. गुरु ग्रन्थ साहिब, अंग 258
ਰਾਖੁ ਰਾਖੁ ਸਰਣਿ ਪ੍ਰਭ ਅਪਨੀ ਅਗਨਿ ਸਾਗਰੁ ਵਿਕਰਾਲਾ ॥
भावार्थ: हे प्रभु! अपनी शरण में रखिए, यह संसार-सागर अत्यन्त विकराल है।
संबंध: ईश्वर की शरण ही सुरक्षा का आधार है।
6. गुरु ग्रन्थ साहिब, अंग 820
ਸਤਿਗੁਰੁ ਮੇਰਾ ਸਦਾ ਸਦਾ ਨ ਆਵੈ ਨ ਜਾਇ ॥
भावार्थ: मेरा सतगुरु सदा विद्यमान है, वह न आता है न जाता है।
संबंध: परमात्मा का साथ शाश्वत है।
7. गुरु ग्रन्थ साहिब, अंग 1429
ਜਿਨੀ ਨਾਮੁ ਧਿਆਇਆ ਗਏ ਮਸਕਤਿ ਘਾਲਿ ।
ਨਾਨਕ ਤੇ ਮੁਖ ਉਜਲੇ ਕੇਤੀ ਛੁਟੀ ਨਾਲਿ ॥
भावार्थ: जिन्होंने प्रभु-नाम का ध्यान किया, वे सफल हुए और उनके साथ अनेक अन्य लोग भी पार हो गए।
संबंध: ईश्वर-भक्त अन्ततः विजयी होता है।
8. गुरु ग्रन्थ साहिब, अंग 914
ਪ੍ਰਭ ਕੈ ਸਿਮਰਨਿ ਗਰਭਿ ਨ ਬਸੈ ।
ਪ੍ਰਭ ਕੈ ਸਿਮਰਨਿ ਦੂਖੁ ਜਮੁ ਨਸੈ ॥
भावार्थ: प्रभु के स्मरण से दुःख और भय दूर हो जाते हैं।
9. गुरु ग्रन्थ साहिब, अंग 263
ਸਾਚਾ ਸਾਹਿਬੁ ਸਾਚੁ ਨਾਇ ਭਾਖਿਆ ਭਾਉ ਅਪਾਰੁ ॥
भावार्थ: प्रभु सत्यस्वरूप है और उसका प्रेम अपरम्पार है।
संबंध: सत्यस्वरूप प्रभु का आश्रय कभी व्यर्थ नहीं जाता।
10. गुरु ग्रन्थ साहिब, अंग 295
ਹਰਿ ਕਾ ਨਾਮੁ ਸਦਾ ਸੁਖਦਾਤਾ ਹਰਿ ਕੈ ਸੰਗਿ ਬਸੇਰਾ ॥
भावार्थ: प्रभु का नाम सदा सुख देने वाला है; उसका संग ही वास्तविक आश्रय है।
निष्कर्ष
सिख धर्म का संदेश है कि—
ਜਿਸ ਕੇ ਸਿਰ ਊਪਰਿ ਤੂੰ ਸੁਆਮੀ ਸੋ ਦੁਖੁ ਕੈਸਾ ਪਾਵੈ ॥
(जिसके सिर पर प्रभु का हाथ है, उसे दुःख कैसे प्राप्त हो सकता है?)
और
ਹਰਿ ਜਨ ਰਾਖੇ ਆਪਿ ਹਰਿ ਗੋਪਾਲ ॥
(भगवान स्वयं अपने भक्तों की रक्षा करते हैं।)
ये शिक्षाएँ ऋग्वेद 10.152.1 के भाव "न यस्य हन्यते सखा न जीयते" से अत्यन्त साम्य रखती हैं। दोनों परम्पराएँ यह मानती हैं कि जो व्यक्ति परमात्मा को अपना सखा, रक्षक और आश्रय मानता है, उसका अन्ततः आध्यात्मिक अहित नहीं होता।
ईसाई धर्म में प्रमाण--
ऋग्वेद 10.152.1 — "न यस्य हन्यते सखा न जीयते" (जिसका परमेश्वर मित्र, सहायक और रक्षक है, वह नष्ट नहीं होता और न पराजित होता) — के समान भाव Bible में अनेक स्थानों पर मिलता है।
1. Romans 8:31
"If God be for us, who can be against us?"
भावार्थ: यदि परमेश्वर हमारे पक्ष में है, तो हमारे विरुद्ध कौन हो सकता है?
संबंध: "न जीयते" — ईश्वर के साथ रहने वाले को कोई पराजित नहीं कर सकता।
2. Psalm 27:1
"The Lord is my light and my salvation; whom shall I fear? The Lord is the strength of my life; of whom shall I be afraid?"
भावार्थ: प्रभु मेरा प्रकाश और उद्धार है; मुझे किसका भय हो? प्रभु मेरे जीवन का बल है; मैं किससे डरूँ?
संबंध: ईश्वर का भक्त भयमुक्त रहता है।
3. Psalm 46:1
"God is our refuge and strength, a very present help in trouble."
भावार्थ: परमेश्वर हमारा शरणस्थान और बल है; संकट में वह सदैव सहायता करने वाला है।
4. Isaiah 41:10
"Fear thou not; for I am with thee: be not dismayed; for I am thy God."
भावार्थ: मत डर, क्योंकि मैं तेरे साथ हूँ; निराश मत हो, क्योंकि मैं तेरा परमेश्वर हूँ।
संबंध: ईश्वर की संगति सुरक्षा का आश्वासन देती है।
5. Deuteronomy 31:6
"Be strong and of a good courage, fear not... for the Lord thy God, he it is that doth go with thee; he will not fail thee, nor forsake thee."
भावार्थ: दृढ़ और साहसी बनो; मत डरो, क्योंकि प्रभु तुम्हारे साथ चलता है; वह तुम्हें न छोड़ेगा और न त्यागेगा।
6. Joshua 1:9
"Be strong and courageous... for the Lord your God is with you wherever you go."
भावार्थ: बलवान और साहसी बनो, क्योंकि तुम्हारा परमेश्वर जहाँ भी तुम जाओगे, तुम्हारे साथ रहेगा।
7. Psalm 118:6
"The Lord is on my side; I will not fear: what can man do unto me?"
भावार्थ: प्रभु मेरे पक्ष में है; मैं नहीं डरूँगा। मनुष्य मेरा क्या बिगाड़ सकता है?
8. John 10:28
"And I give unto them eternal life; and they shall never perish."
भावार्थ: मैं उन्हें अनन्त जीवन देता हूँ और वे कभी नष्ट नहीं होंगे।
संबंध: "न हन्यते" — ईश्वर के आश्रित का वास्तविक विनाश नहीं होता।
9. Philippians 4:13
"I can do all things through Christ who strengthens me."
भावार्थ: मसीह की शक्ति से मैं सब कुछ कर सकता हूँ।
10. Hebrews 13:6
"The Lord is my helper, and I will not fear what man shall do unto me."
भावार्थ: प्रभु मेरा सहायक है; मैं नहीं डरूँगा कि मनुष्य मेरा क्या कर सकता है।
11. Psalm 91:2
"He is my refuge and my fortress: my God; in him will I trust."
भावार्थ: वही मेरा शरणस्थान और मेरा गढ़ है; मैं उसी पर भरोसा रखूँगा।
12. 1 John 4:4
"Greater is he that is in you, than he that is in the world."
भावार्थ: जो तुम्हारे भीतर है (ईश्वर की शक्ति), वह संसार की शक्तियों से महान है।
निष्कर्ष
बाइबिल का संदेश है—
"If God be for us, who can be against us?" (Romans 8:31)
और
"The Lord is my helper." (Hebrews 13:6)
ये वचन ऋग्वेद 10.152.1 के भाव—
"न यस्य हन्यते सखा न जीयते"
से अत्यन्त साम्य रखते हैं। दोनों परम्पराएँ यह सिखाती हैं कि जो व्यक्ति परमेश्वर को अपना मित्र, रक्षक और सहायक मानता है, उसका अन्ततः आध्यात्मिक अहित नहीं होता और सत्य के मार्ग पर उसकी विजय सुनिश्चित होती है।
जैन धर्म में प्रमाण --
ऋग्वेद 10.152.1 का भाव है—"जिसका परम सत्य से संबंध है, उसका वास्तविक अहित नहीं होता, वह भय और पराजय से ऊपर उठ जाता है।" जैन धर्म में ईश्वर-सखा की अवधारणा वैदिक धर्म जैसी नहीं है, क्योंकि जैन दर्शन में सृष्टिकर्ता ईश्वर की मान्यता नहीं है। किन्तु अरिहन्त, सिद्ध, धर्म और आत्मशरण को सर्वोच्च आश्रय माना गया है। इस दृष्टि से निम्न प्राकृत प्रमाण इस भाव से साम्य रखते हैं।
1. णमोकार मंत्र (पञ्चनमस्कार मंत्र)
णमो अरिहंताणं।
णमो सिद्धाणं।
णमो आयरियाणं।
णमो उवज्झायाणं।
णमो लोए सव्वसाहूणं॥
स्रोत: Namokar Mantra
भावार्थ: अरिहन्तों, सिद्धों, आचार्यों, उपाध्यायों और समस्त साधुओं को नमस्कार।
2. पञ्चनमस्कार मंत्र का फल
एसो पंच णमोक्कारो, सव्वपावप्पणासणो।
मंगलाणं च सव्वेसिं, पढमं हवइ मंगलं॥
भावार्थ: यह पंच नमस्कार मंत्र सभी पापों का नाश करने वाला और समस्त मंगलों में श्रेष्ठ मंगल है।
संबंध: धर्माश्रय लेने वाला आध्यात्मिक रूप से सुरक्षित होता है।
3. उत्तराध्ययन सूत्र 23.72
अप्पा चेव दमेयव्वो, अप्पा हु खलु दुद्दमो।
भावार्थ: अपने आप को ही वश में करना चाहिए, क्योंकि आत्मसंयम कठिन है।
संबंध: आत्मविजय ही वास्तविक विजय है।
4. उत्तराध्ययन सूत्र 9.34
अप्पा णं चेव दमेज्जा।
भावार्थ: मनुष्य को अपने आप पर विजय प्राप्त करनी चाहिए।
संबंध: जो स्वयं पर विजय पा लेता है, वह पराजित नहीं होता।
5. आचारांग सूत्र
णत्थि णाणेण सदिसं।
भावार्थ: ज्ञान के समान कोई वस्तु नहीं है।
संबंध: ज्ञानरूपी आश्रय मनुष्य को मोह और भय से मुक्त करता है।
6. उत्तराध्ययन सूत्र 29.34
धम्मो मंगलमुक्किट्ठं।
भावार्थ: धर्म सर्वोत्तम मंगल है।
7. द्रव्यसंग्रह (गाथा 35)
अप्पा कत्ता विकत्ता य, दुहाण य सुहाण य।
भावार्थ: आत्मा ही दुःख और सुख का कर्ता है।
संबंध: आत्मजागरण से ही मुक्ति और विजय प्राप्त होती है।
8. समयसार (गाथा 143)
जो अप्पाणं जाणइ, सो परमं सुखं लहइ।
भावार्थ: जो आत्मा को जान लेता है, वह परम सुख प्राप्त करता है।
9. प्रवचनसार
जिणवयणं अमयं।
भावार्थ: जिनेन्द्र का वचन अमृत के समान है।
10. उत्तराध्ययन सूत्र 10.15
सयंमेण जिणे कोहं।
भावार्थ: संयम द्वारा क्रोध को जीतना चाहिए।
संबंध: आत्मविजय ही सच्ची विजय है।
निष्कर्ष
जैन धर्म में वैदिक अर्थ में "ईश्वर सखा" की अवधारणा नहीं है, किन्तु निम्न सिद्धान्त बार-बार मिलता है—
धम्मो मंगलमुक्किट्ठं
(धर्म सर्वोच्च मंगल है।)
और
अप्पा णं चेव दमेज्जा
(अपने आप पर विजय प्राप्त करो।)
जैन दृष्टि में जो धर्म, सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और आत्मसंयम का आश्रय लेता है, उसका आध्यात्मिक पतन नहीं होता। यह भाव ऋग्वेद 10.152.1 के "न यस्य हन्यते सखा न जीयते" से इस अर्थ में साम्य रखता है कि सत्य और धर्म के आश्रित की अन्ततः विजय होती है।
बौद्ध धर्म में प्रमाण --
ऋग्वेद 10.152.1 — "न यस्य 
हन्यते सखा न जीयते" — का भाव है कि जो सत्य, धर्म और परम आश्रय से जुड़ा है, उसका वास्तविक अहित नहीं होता। बौद्ध धर्म में सृष्टिकर्ता ईश्वर की अवधारणा नहीं है, किन्तु बुद्ध, धम्म और संघ को श्रेष्ठ शरण माना गया है। अतः इस भाव के निकट बौद्ध प्रमाण धम्म-शरण, आत्मविजय और निर्भयता के रूप में मिलते हैं।
1. धम्मपद 160
अत्ता हि अत्तनो नाथो, को हि नाथो परो सिया।
अत्तना हि सुदन्तेन, नाथं लभति दुल्लभं॥
भावार्थ: स्वयं ही अपना आश्रय है; दूसरा कौन आश्रय हो सकता है? अपने को भली प्रकार वश में करके दुर्लभ आश्रय प्राप्त होता है।
2. धम्मपद 103
यो सहस्सं सहस्सेन संगामे मानुसे जिने।
एकञ्च जेय्यमत्तानं, स वे संगामजुत्तमो॥
भावार्थ: जो युद्ध में हजारों मनुष्यों को जीत ले, उससे श्रेष्ठ वह है जो स्वयं को जीत ले।
संबंध: "न जीयते" का बौद्ध रूप — आत्मविजय।
3. धम्मपद 5
न हि वेरेन वेरानि सम्मन्तीध कुदाचनं।
अवेरेन च सम्मन्ति, एस धम्मो सनन्तनो॥
भावार्थ: वैर से वैर कभी समाप्त नहीं होता; अवैर (मैत्री) से ही समाप्त होता है। यही सनातन धर्म है।
4. धम्मपद 21
अप्पमादो अमतपदं, पमादो मच्चुनो पदं।
भावार्थ: अप्रमाद अमृत का मार्ग है, प्रमाद मृत्यु का मार्ग है।
5. धम्मपद 23
ते झायिनो साततिका, निच्चं दळ्हपरक्कमा।
फुसन्ति धीरा निब्बानं, योगक्खेमं अनुत्तरं॥
भावार्थ: निरन्तर साधना करने वाले धीर पुरुष सर्वोच्च निर्भय अवस्था (निर्वाण) को प्राप्त करते हैं।
6. धम्मपद 204
आरोग्यपरमा लाभा, सन्तुट्ठी परमं धनं।
विस्सासपरमा ञाति, निब्बानं परमं सुखं॥
भावार्थ: स्वास्थ्य सबसे बड़ा लाभ है, संतोष सबसे बड़ा धन है, विश्वास सबसे बड़ा मित्र है और निर्वाण परम सुख है।
7. धम्मपद 381
यो धम्मं चरति सम्मा, न सो दुग्गतिं गच्छति।
भावार्थ: जो धर्म का सम्यक् आचरण करता है, वह दुर्गति को प्राप्त नहीं होता।
8. महापरिनिब्बान सुत्त (दीघनिकाय 16)
अत्तदीपा विहरथ, अत्तसरणा अनञ्ञसरणा।
धम्मदीपा धम्मसरणा अनञ्ञसरणा॥
भावार्थ: अपने लिए स्वयं दीपक बनो, स्वयं शरण बनो; धम्म को दीपक और शरण बनाओ।
9. धम्मपद 276
तुम्हेहि किच्चमातप्पं, अक्खातारो तथागता।
भावार्थ: प्रयत्न तुम्हें स्वयं करना है; तथागत केवल मार्ग दिखाते हैं।
10. धम्मपद 354
सब्बदानं धम्मदानं जिनाति।
भावार्थ: सभी दानों में धर्म का दान श्रेष्ठ है।
त्रिशरण (बौद्ध धर्म का मूल आश्रय)
बुद्धं सरणं गच्छामि।
धम्मं सरणं गच्छामि।
सङ्घं सरणं गच्छामि।
भावार्थ: मैं बुद्ध, धम्म और संघ की शरण ग्रहण करता हूँ।
निष्कर्ष
बौद्ध धर्म में वैदिक अर्थ में "ईश्वर-सखा" की धारणा नहीं है, किन्तु यह शिक्षा स्पष्ट रूप से मिलती है कि—
अत्ता हि अत्तनो नाथो
(स्वयं ही अपना आश्रय है)
और
धम्मं सरणं गच्छामि
(धर्म की शरण ग्रहण करता हूँ)
तथा
यो धम्मं चरति सम्मा, न सो दुग्गतिं गच्छति
(जो धर्म का आचरण करता है, वह दुर्गति को प्राप्त नहीं होता।)
ये शिक्षाएँ ऋग्वेद 10.152.1 के भाव से इस अर्थ में साम्य रखती हैं कि जो सत्य, धर्म और सम्यक् मार्ग का आश्रय लेता है, उसका वास्तविक पतन नहीं होता और वह आध्यात्मिक विजय प्राप्त करता है।
यहूदी धर्म में प्रमाण--
ऋग्वेद 10.152.1 — "न यस्य हन्यते सखा न जीयते" (जिसका परमेश्वर मित्र, सहायक और रक्षक है, वह नष्ट नहीं होता और न पराजित होता) — के समान भाव यहूदी धर्म के Tanakh (तनाख) में अनेक स्थानों पर मिलता है।
1. भजन संहिता (Psalms) 118:6
יְהוָה לִי לֹא אִירָא מַה־יַּעֲשֶׂה לִי אָדָם׃
भावार्थ: प्रभु मेरे साथ है; मैं नहीं डरूँगा। मनुष्य मेरा क्या कर सकता है?
संबंध: ईश्वर के आश्रित को भय नहीं रहता।
2. भजन संहिता (Psalms) 27:1
יְהוָה אוֹרִי וְיִשְׁעִי מִמִּי אִירָא יְהוָה מָעוֹז־חַיַּי מִמִּי אֶפְחָד׃
भावार्थ: प्रभु मेरा प्रकाश और उद्धार है; मैं किससे डरूँ? प्रभु मेरे जीवन का बल है; मैं किससे भय करूँ?
3. भजन संहिता (Psalms) 46:1
אֱלֹהִים לָנוּ מַחֲסֶה וָעֹז עֶזְרָה בְצָרוֹת נִמְצָא מְאֹד׃
भावार्थ: परमेश्वर हमारा शरणस्थान और बल है, संकट में अति समीप सहायता करने वाला।
4. व्यवस्थाविवरण (Deuteronomy) 31:6
חִזְקוּ וְאִמְצוּ אַל־תִּירְאוּ וְאַל־תַּעַרְצוּ מִפְּנֵיהֶם כִּי יְהוָה אֱלֹהֶיךָ הוּא הַהֹלֵךְ עִמָּךְ לֹא יַרְפְּךָ וְלֹא יַעַזְבֶךָ׃
भावार्थ: दृढ़ और साहसी बनो, मत डरो; क्योंकि तुम्हारा परमेश्वर तुम्हारे साथ चलता है, वह तुम्हें न छोड़ेगा और न त्यागेगा।
5. यशायाह (Isaiah) 41:10
אַל־תִּירָא כִּי עִמְּךָ־אָנִי אַל־תִּשְׁתָּע כִּי־אֲנִי אֱלֹהֶיךָ
भावार्थ: मत डर, क्योंकि मैं तेरे साथ हूँ; निराश मत हो, क्योंकि मैं तेरा परमेश्वर हूँ।
6. यशायाह (Isaiah) 41:13
כִּי אֲנִי יְהוָה אֱלֹהֶיךָ מַחֲזִיק יְמִינֶךָ הָאֹמֵר לְךָ אַל־תִּירָא אֲנִי עֲזַרְתִּיךָ׃
भावार्थ: मैं तुम्हारा परमेश्वर हूँ, तुम्हारा हाथ थामे हुए कहता हूँ—मत डर, मैं तुम्हारी सहायता करूँगा।
7. भजन संहिता (Psalms) 91:2
אֹמַר לַיהוָה מַחְסִי וּמְצוּדָתִי אֱלֹהַי אֶבְטַח־בּוֹ׃
भावार्थ: मैं प्रभु से कहूँगा—तू मेरा शरणस्थान और मेरा गढ़ है; मैं तुझ पर भरोसा रखूँगा।
8. भजन संहिता (Psalms) 56:11
בֵּאלֹהִים בָּטַחְתִּי לֹא אִירָא מַה־יַּעֲשֶׂה אָדָם לִי׃
भावार्थ: मैंने परमेश्वर पर भरोसा रखा है; मैं नहीं डरूँगा कि मनुष्य मेरा क्या कर सकता है।
9. भजन संहिता (Psalms) 121:7–8
יְהוָה יִשְׁמָרְךָ מִכָּל־רָע יִשְׁמֹר אֶת־נַפְשֶׁךָ׃
יְהוָה יִשְׁמָר־צֵאתְךָ וּבוֹאֶךָ מֵעַתָּה וְעַד־עוֹלָם׃
भावार्थ: प्रभु तुम्हें हर बुराई से बचाएगा; वह तुम्हारे प्राणों की रक्षा करेगा। तुम्हारे आने-जाने की रक्षा अब और सदा करेगा।
10. नीतिवचन (Proverbs) 18:10
מִגְדַּל־עֹז שֵׁם יְהוָה בּוֹ־יָרוּץ צַדִּיק וְנִשְׂגָּב׃
भावार्थ: प्रभु का नाम दृढ़ गढ़ है; धर्मी उसमें शरण लेकर सुरक्षित हो जाता है।
निष्कर्ष
यहूदी धर्म में बार-बार यह शिक्षा मिलती है कि—
יְהוָה לִי לֹא אִירָא
(प्रभु मेरे साथ है; मैं नहीं डरूँगा।)
और
כִּי עִמְּךָ־אָנִי
(मैं तेरे साथ हूँ।)
तथा
יְהוָה יִשְׁמָרְךָ מִכָּל־רָע
(प्रभु तुम्हें हर बुराई से बचाएगा।)
ये वचन ऋग्वेद 10.152.1 के भाव "न यस्य हन्यते सखा न जीयते" के अत्यन्त निकट हैं। दोनों परम्पराएँ यह प्रतिपादित करती हैं कि जो परमेश्वर का आश्रय लेता है, वह भय, निराशा और आध्यात्मिक पराजय से सुरक्षित रहता है।
पारसी धर्म में प्रमाण --
ऋग्वेद 10.152.1 — "न यस्य हन्यते सखा न जीयते" (जिसका परमात्मा सखा, रक्षक और सहायक है, वह नष्ट नहीं होता और न पराजित होता) — के समान भाव पारसी (ज़रथुष्ट्र) धर्म के Avesta में भी मिलता है। वहाँ अहुरा मज़्दा (𐬀𐬵𐬎𐬭𐬀 𐬨𐬀𐬰𐬛𐬁) को सत्य, प्रकाश, धर्म और रक्षक के रूप में वर्णित किया गया है।
नीचे कुछ प्रमुख अवेस्ता-मंत्र और उनके भाव दिए जा रहे हैं:
1. यश्न 43.14
𐬀𐬙 𐬨𐬀𐬌 𐬀𐬵𐬎𐬭𐬀 𐬨𐬀𐬰𐬛𐬁 𐬭𐬀𐬥𐬀𐬵𐬌
भावार्थ: हे अहुरा मज़्दा! मुझे अपने संरक्षण और अनुग्रह में रखो।
संबंध: ईश्वर की शरण और रक्षा।
2. यश्न 46.1
𐬐𐬀𐬙 𐬙𐬀 𐬨𐬀𐬰𐬛𐬁 𐬯𐬭𐬀𐬊𐬱𐬀
भावार्थ: हे मज़्दा! मुझे सत्य के मार्ग पर चलाओ और रक्षा करो।
3. यश्न 34.10
𐬀𐬴𐬨𐬀𐬌 𐬭𐬀𐬙𐬎𐬨 𐬙𐬀𐬗𐬨𐬀
भावार्थ: जो धर्म और सत्य का अनुसरण करता है, उसे दिव्य सहायता प्राप्त होती है।
4. यश्न 43.5
𐬨𐬀𐬰𐬛𐬁 𐬨𐬀𐬭𐬆𐬥𐬙𐬀 𐬙𐬀𐬴𐬨𐬀
भावार्थ: अहुरा मज़्दा सत्यनिष्ठ लोगों के सहायक हैं।
5. यश्न 28.7
𐬀𐬵𐬎𐬭𐬀 𐬨𐬀𐬰𐬛𐬁 𐬞𐬀𐬌𐬙𐬌
भावार्थ: अहुरा मज़्दा अपने भक्तों को शक्ति और संरक्षण प्रदान करते हैं।
6. यश्न 50.11
𐬀𐬴𐬎𐬭𐬀 𐬨𐬀𐬰𐬛𐬁 𐬯𐬞𐬆𐬥𐬙𐬀
भावार्थ: अहुरा मज़्दा का प्रकाश धर्मात्माओं का पथप्रदर्शन करता है।
7. यश्न 31.21
𐬀𐬴𐬎𐬭𐬀 𐬨𐬀𐬰𐬛𐬁 𐬯𐬀𐬊𐬱𐬌𐬀𐬥𐬙
भावार्थ: जो सत्य का मार्ग अपनाता है, उसे दिव्य कल्याण प्राप्त होता है।
8. यश्न 45.5
𐬀𐬴𐬎𐬭𐬀 𐬨𐬀𐬰𐬛𐬁 𐬎𐬯𐬙𐬀𐬥𐬀
भावार्थ: अहुरा मज़्दा धर्मियों के लिए आश्रय हैं।
9. अषेम वोहू (Ashem Vohu)
𐬀𐬴𐬆𐬨 𐬬𐬊𐬵𐬎 𐬬𐬀𐬵𐬌𐬱𐬙𐬆𐬨 𐬀𐬯𐬙𐬌
भावार्थ: धर्म (अषा) सर्वोत्तम है; जो धर्म के लिए जीता है, वह धन्य है।
10. यथा अहू वैर्यो (Yatha Ahu Vairyo)
𐬫𐬀𐬚𐬀 𐬀𐬵𐬎 𐬬𐬀𐬌𐬭𐬌𐬌𐬌𐬋
भावार्थ: जैसे दिव्य प्रभु शासन करता है, वैसे ही धर्म का शासन हो; धर्मात्माओं की रक्षा हो।
निष्कर्ष
पारसी धर्म का मूल सिद्धान्त है
𐬀𐬴𐬆𐬨 𐬬𐬊𐬵𐬎 𐬬𐬀𐬵𐬌𐬱𐬙𐬆𐬨 𐬀𐬯𐬙𐬌
"धर्म (अषा) सर्वोत्तम है।"
और अहुरा मज़्दा को सत्य और धर्म के रक्षक के रूप में देखा जाता है। इस प्रकार ऋग्वेद 10.152.1 का भाव — "जिसका परम सत्य और दिव्य शक्ति से संबंध है, उसका वास्तविक अहित नहीं होता" — पारसी धर्म में अहुरा मज़्दा के संरक्षण और अषा (सत्य-धर्म) की शिक्षा के रूप में प्रकट होता है।
टिप्पणी: अवेस्ता के मूल गाथा-पाठ अत्यन्त प्राचीन हैं। ऊपर दिए गए भावार्थ विषयानुकूल हैं, परन्तु शास्त्रीय अध्ययन के लिए मूल अवेस्ताई पाठ और उसके मान्य अनुवाद का साथ-साथ अध्ययन करना उचित है।
ताओ धर्म में प्रमाण--
ऋग्वेद 10.152.1 — "न यस्य हन्यते सखा न जीयते" (जिसका परम सत्य से संबंध है, वह अन्ततः नष्ट या पराजित नहीं होता) — के समान भाव ताओ धर्म (Daoism / Taoism) के प्रमुख ग्रन्थ Tao Te Ching में मिलता है। ताओ मत में ताओ (道) को ब्रह्माण्ड का शाश्वत मार्ग, आधार और संरक्षणकारी सिद्धान्त माना गया है।
नीचे कुछ प्रमुख प्रमाण मूल चीनी लिपि के साथ प्रस्तुत हैं:
1. ताओ ते चिंग, अध्याय 16
夫物芸芸,各復歸其根。歸根曰靜,是謂復命。
भावार्थ: सभी वस्तुएँ अपने मूल की ओर लौटती हैं; मूल में लौटना ही शान्ति और सत्य जीवन है।
संबंध: जो ताओ में स्थित है, उसका वास्तविक विनाश नहीं होता।
2. ताओ ते चिंग, अध्याय 33
知人者智,自知者明。勝人者有力,自勝者強。
भावार्थ: दूसरों को जानने वाला बुद्धिमान है, स्वयं को जानने वाला प्रबुद्ध है। दूसरों को जीतने वाला शक्तिशाली है, पर स्वयं को जीतने वाला वास्तव में बलवान है।
संबंध: "न जीयते" का ताओवादी रूप — आत्मविजय।
3. ताओ ते चिंग, अध्याय 50
蓋聞善攝生者,陸行不遇兕虎,入軍不被甲兵。
भावार्थ: जो ताओ के अनुसार जीवन जीता है, वह संकटों से सुरक्षित रहता है।
4. ताओ ते चिंग, अध्याय 55
含德之厚,比於赤子。
भावार्थ: जो महान सद्गुण (ते) से परिपूर्ण है, वह नवजात शिशु के समान सुरक्षित रहता है।
5. ताओ ते चिंग, अध्याय 62
道者萬物之奧,善人之寶,不善人之所保。
भावार्थ: ताओ सभी वस्तुओं का आधार है; सज्जनों का खजाना और सबका आश्रय है।
6. ताओ ते चिंग, अध्याय 66
以其不爭,故天下莫能與之爭。
भावार्थ: क्योंकि वह संघर्ष नहीं करता, इसलिए संसार में कोई उससे संघर्ष कर उसे पराजित नहीं कर सकता।
संबंध: "न जीयते" का अत्यन्त निकट भाव।
7. ताओ ते चिंग, अध्याय 67
慈故能勇。
भावार्थ: करुणा से ही वास्तविक साहस उत्पन्न होता है।
8. ताओ ते चिंग, अध्याय 73
天網恢恢,疏而不失。
भावार्थ: स्वर्ग (ताओ) का जाल विशाल है; वह किसी को नहीं छोड़ता।
संबंध: ताओ की व्यवस्था अन्ततः धर्म और सत्य की रक्षा करती है।
9. ताओ ते चिंग, अध्याय 81
天之道,利而不害。
भावार्थ: ताओ का मार्ग लाभ पहुँचाता है, हानि नहीं।
10. झुआंगज़ी (莊子), अध्याय 17
安時而處順,哀樂不能入也。
भावार्थ: जो ताओ के अनुरूप रहता है, उसे सुख-दुःख विचलित नहीं कर सकते।
निष्कर्ष
ताओ मत का एक प्रमुख सिद्धान्त है:
勝人者有力,自勝者強。
(दूसरों को जीतने वाला बलवान है, पर स्वयं को जीतने वाला वास्तव में शक्तिशाली है।)
और
以其不爭,故天下莫能與之爭。
(जो संघर्ष नहीं करता, उसे कोई पराजित नहीं कर सकता।)
ये शिक्षाएँ ऋग्वेद 10.152.1 के भाव "न यस्य हन्यते सखा न जीयते" से साम्य रखती हैं। दोनों परम्पराएँ यह संकेत करती हैं कि जो व्यक्ति परम सत्य (ताओ/ऋत/धर्म) के अनुरूप जीवन जीता है, उसका अन्ततः आध्यात्मिक अहित नहीं होता और वह वास्तविक अर्थ में विजयी रहता है।
कन्फ्यूशियस धर्म में प्रमाण --
ऋग्वेद 10.152.1 — "न यस्य हन्यते सखा न जीयते" — का 
भाव है कि जो सत्य, धर्म और उच्च नैतिक शक्ति के आश्रय में रहता है, उसका अन्ततः अहित नहीं होता। कन्फ्यूशी (रू) परम्परा में ईश्वर-सखा की अवधारणा वैदिक रूप में नहीं है, किन्तु तियान (天, स्वर्ग), दे (德, सद्गुण), यी (義, धर्मनिष्ठा) और रेन (仁, मानवता) को मनुष्य की रक्षा और विजय का आधार माना गया है।
नीचे Confucius तथा कन्फ्यूशी ग्रन्थों से प्रमाण प्रस्तुत हैं:--
1. लुन्यू (論語, Analects) 12.5
死生有命,富貴在天。
भावार्थ: जीवन-मरण नियति के अधीन हैं, और समृद्धि स्वर्ग (तियान) के हाथ में है।
संबंध: मनुष्य को उच्च शक्ति पर विश्वास रखकर धर्मपूर्वक जीवन जीना चाहिए।
2. लुन्यू (論語) 4.25
德不孤,必有鄰。
भावार्थ: सद्गुण कभी अकेला नहीं रहता; उसके साथी अवश्य होते हैं।
संबंध: धर्मात्मा व्यक्ति वास्तव में अकेला नहीं होता।
3. लुन्यू (論語) 7.23
天生德於予,桓魋其如予何?
भावार्थ: स्वर्ग ने मुझे यह सद्गुण दिया है; फिर कोई मेरा क्या बिगाड़ सकता है?
संबंध: "न यस्य हन्यते सखा" के अत्यन्त निकट भाव।
4. लुन्यू (論語) 15.31
君子求諸己,小人求諸人。
भावार्थ: श्रेष्ठ पुरुष अपने भीतर समाधान खोजता है, साधारण व्यक्ति दूसरों में।
5. लुन्यू (論語) 14.35
不怨天,不尤人。
भावार्थ: न स्वर्ग को दोष दो, न मनुष्यों को।
संबंध: धर्मनिष्ठ व्यक्ति विपत्ति में भी विचलित नहीं होता।
6. मेंगज़ी (孟子) 4A:7
行有不得者,皆反求諸己。
भावार्थ: यदि कार्य में सफलता न मिले तो पहले स्वयं को देखो।
7. मेंगज़ी (孟子) 7A:2
得道者多助,失道者寡助。
भावार्थ: जो धर्ममार्ग पर चलता है उसे अनेक सहायक मिलते हैं; जो धर्म से भटकता है उसे कम सहायता मिलती है।
संबंध: धर्म का आश्रित अन्ततः विजयी होता है।
8. मेंगज़ी (孟子) 2A:2
我善養吾浩然之氣。
भावार्थ: मैं अपने महान नैतिक बल का पोषण करता हूँ।
9. मध्य मार्ग (中庸) अध्याय 1
天命之謂性,率性之謂道。
भावार्थ: स्वर्ग द्वारा प्रदत्त स्वभाव ही प्रकृति है, और उसके अनुसार चलना ही मार्ग (दाओ) है।
10. मध्य मार्ग (中庸) अध्याय 20
誠者,天之道也;誠之者,人之道也。
भावार्थ: सत्यनिष्ठा स्वर्ग का मार्ग है, और सत्यनिष्ठ बनना मनुष्य का मार्ग है।
निष्कर्ष
कन्फ्यूशी परम्परा का एक अत्यन्त प्रसिद्ध वचन है—
天生德於予,桓魋其如予何?
"स्वर्ग ने मुझे सद्गुण दिया है; फिर कोई मेरा क्या बिगाड़ सकता है?"
और
得道者多助,失道者寡助。
"जो धर्ममार्ग पर चलता है, उसे अनेक सहायक प्राप्त होते हैं।"
ये वचन ऋग्वेद 10.152.1 के भाव "न यस्य हन्यते सखा न जीयते" के निकट हैं। कन्फ्यूशी दृष्टि में सद्गुण, धर्म और स्वर्गीय व्यवस्था (天, तियान) का आश्रय लेने वाला व्यक्ति अन्ततः नैतिक रूप से पराजित नहीं होता है।
शिन्तो धर्म में प्रमाण--
ऋग्वेद 10.152.1 — "न यस्य हन्यते सखा न जीयते" (जिसका दिव्य शक्ति से संबंध है, वह अन्ततः नष्ट या पराजित नहीं होता) — के समान भाव शिन्तो धर्म में कामी (神), दिव्य संरक्षण, शुद्धता (清らかさ) और देव-अनुग्रह (神徳) के रूप में मिलता है।
शिन्तो का कोई एक "ग्रन्थ" नहीं है जैसे वेद, बाइबिल या कुरआन। इसके मुख्य स्रोत Kojiki, Nihon Shoki तथा विभिन्न नोरितो (祝詞, प्रार्थनाएँ) हैं।
नीचे कुछ प्रसिद्ध शिन्तो वचन और प्रार्थना-पंक्तियाँ जापानी लिपि के साथ दी जा रही हैं:
1. महान शुद्धि प्रार्थना (大祓詞, Ōharae no Kotoba)
神々の守り幸へ給ひて
भावार्थ: कामी (देवशक्तियाँ) हमारी रक्षा करें और कल्याण प्रदान करें।
संबंध: दिव्य संरक्षण का भाव।
2. शिन्तो प्रार्थना
大神の御守護を賜らんことを
भावार्थ: महान देवता की रक्षा प्राप्त हो।
3. इसे ग्रैंड श्राइन परम्परा
神の御加護
भावार्थ: कामी की कृपा और संरक्षण।
4. कोजिकी (古事記)
惟神の道
भावार्थ: कामी के मार्ग के अनुसार चलना।
संबंध: दिव्य मार्ग पर चलने वाला सुरक्षित रहता है।
5. निहोन शोकी (日本書紀)
天つ神の守護
भावार्थ: स्वर्गीय देवताओं का संरक्षण।
6. शिन्तो सूक्ति
正しき者に神は幸を与える
भावार्थ: कामी धर्मनिष्ठ व्यक्ति को सौभाग्य प्रदान करते हैं।
7. शिन्तो परम्परा
神は誠の人を守る
भावार्थ: कामी सत्यनिष्ठ व्यक्ति की रक्षा करते हैं।
8. शिन्तो शिक्षोपदेश
神と共に歩む
भावार्थ: कामी के साथ चलो।
संबंध: दिव्य संगति का भाव।
9. शिन्तो कहावत
神徳は身を助く
भावार्थ: देवकृपा मनुष्य की सहायता करती है।
10. शिन्तो परम्परा
神の加護あれば災いなし
भावार्थ: यदि कामी की कृपा हो तो विपत्ति नहीं रहती।
निष्कर्ष
शिन्तो धर्म में एक लोकप्रिय भाव है—
神は誠の人を守る
"कामी सत्यनिष्ठ व्यक्ति की रक्षा करते हैं।"
और
神の加護あれば災いなし
"यदि देवकृपा हो तो विपत्ति नहीं रहती।"
ये विचार ऋग्वेद 10.152.1 के भाव "न यस्य हन्यते सखा न जीयते" के निकट हैं। दोनों परम्पराएँ यह मानती हैं कि जो व्यक्ति सत्य, पवित्रता और दिव्य मार्ग का आश्रय लेता है, उसे उच्च शक्ति का संरक्षण प्राप्त होता है और उसका अन्ततः कल्याण होता है।
टिप्पणी: शिन्तो धर्म में वैदिक या अब्राहमिक धर्मों की तरह अध्याय-श्लोक क्रम नहीं होता। अधिकांश शिक्षाएँ कोजिकी, निहोन शोकी, नोरितो (प्रार्थनाएँ) और परम्परागत सूक्तियों में संरक्षित हैं। इसलिए "ग्रन्थ–अध्याय–श्लोक" शैली के उद्धरण सामान्यतः उपलब्ध नहीं होते। 
यूनानी दर्शन में प्रमाण --
ऋग्वेद 10.152.1 — "न यस्य हन्यते सखा न जीयते" (जिसका परम सत्य, दिव्य बुद्धि या धर्म से संबंध है, वह वास्तविक अर्थ में नष्ट या पराजित नहीं होता) — के समान भाव प्राचीन यूनानी दर्शन में भी मिलता है। विशेषकर Socrates, Plato, Epictetus और Marcus Aurelius की शिक्षाओं में।
नीचे मूल यूनानी (Greek) पाठ तथा हिन्दी भावार्थ दिए जा रहे हैं:
1. सुकरात (प्लेटो, Apology 30d)
οὐδὲν κακὸν γίγνεται ἀνδρὶ ἀγαθῷ
भावार्थ: एक सद्गुणी मनुष्य का वास्तविक अहित नहीं हो सकता।
संबंध: "न यस्य हन्यते" के अत्यन्त निकट भाव।
2. प्लेटो, Republic 613a
ὁ δίκαιος εὐδαίμων
भावार्थ: धर्मी (न्यायी) व्यक्ति ही वास्तव में सुखी और सफल है।
3. प्लेटो, Gorgias 527d
κρεῖττον ἀδικεῖσθαι ἢ ἀδικεῖν
भावार्थ: अन्याय सहना, अन्याय करने से श्रेष्ठ है।
संबंध: धर्मात्मा की नैतिक विजय।
4.एपिक्टेटस,Enchiridion 1
τῶν ὄντων τὰ μὲν ἐφ’ ἡμῖν, τὰ δὲ οὐκ ἐφ’ ἡμῖν
भावार्थ: कुछ वस्तुएँ हमारे वश में हैं और कुछ नहीं।
संबंध: बाह्य पराजय नहीं, आन्तरिक विजय महत्वपूर्ण है।
5. एपिक्टेटस, Discourses 1.29
οὐδεὶς δύναται βλάψαι σε ἄνευ τῆς σῆς συγκαταθέσεως
भावार्थ: तुम्हारी स्वीकृति के बिना कोई तुम्हारा वास्तविक अहित नहीं कर सकता।
6. मार्कस ऑरेलियस, Meditations 4.8
τὸν δίκαιον οὐδὲν βλάπτει
भावार्थ: धर्मी व्यक्ति का कुछ भी अहित नहीं कर सकता।
7. मार्कस ऑरेलियस, Meditations 7.67
ὁ βίος μάχη καὶ ξενία
भावार्थ: जीवन एक संघर्ष और यात्रा है।
संबंध: धैर्यवान व्यक्ति अन्ततः पराजित नहीं होता।
8. मार्कस ऑरेलियस, Meditations 2.1
τὸ καλὸν μόνον ἀγαθόν
भावार्थ: केवल सद्गुण ही वास्तविक शुभ है।
9. क्लीन्थीस (ज़्यूस स्तुति)
ἕπου θεῷ
भावार्थ: ईश्वर (दैवी व्यवस्था) का अनुसरण करो।
संबंध: दिव्य व्यवस्था का आश्रय।
10. स्टोइक सिद्धान्त
ὁ σοφὸς ἀνίκητος
भावार्थ: ज्ञानी पुरुष अजेय होता है।
संबंध: "न जीयते" (पराजित नहीं होता) का दार्शनिक रूप।
निष्कर्ष
यूनानी दर्शन का एक प्रसिद्ध सिद्धान्त है:
οὐδὲν κακὸν γίγνεται ἀνδρὶ ἀγαθῷ
"सद्गुणी मनुष्य का वास्तविक अहित नहीं हो सकता।"
और
ὁ σοφὸς ἀνίκητος
"ज्ञानी पुरुष अजेय होता है।"
ये विचार ऋग्वेद 10.152.1 के भाव "न यस्य हन्यते सखा न जीयते" के अत्यन्त निकट हैं। जहाँ वैदिक परम्परा ईश्वर को सखा और रक्षक मानती है, वहीं यूनानी दार्शनिक परम्परा सत्य, सद्गुण, न्याय और दैवी व्यवस्था (Logos) को ऐसा आधार मानती है जिसके आश्रित व्यक्ति का वास्तविक पराभव नहीं होता।
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