ऋगुवेद सूक्ति--(11)की व्याख्या
ऋगुवेद सूक्ति--(11)की व्याख्या
"एको विश्वस्य भुवनस्य राजा"
ऋगुवेद --6/36/4
भावार्थ -समस्त लोकों का वह स्वामी एक है।
इसका पूरा मंत्र अर्थ सहित
ऋग्वेद ६.३६.४ का पूरा मंत्र इस प्रकार है—
स रा॒यस्खामुप॑ सृजा गृणा॒नः पु॑रुश्च॒न्द्रस्य॒ त्वमि॑न्द्र॒ वस्वः॑ ।
पति॑र्बभू॒थास॑मो॒ जना॑ना॒मेको॒ विश्व॑स्य॒ भुव॑नस्य॒ राजा॑ ॥
सरल भावार्थ :
हे इन्द्र! हमारी स्तुति से प्रसन्न होकर उत्तम और आनंददायक धन-सम्पदा की धारा प्रवाहित कीजिए। आप मनुष्यों में अद्वितीय स्वामी हैं और सम्पूर्ण जगत् के एकमात्र राजा हैं।
वेदों में प्रमाण--
वेद-मंत्र उनके अर्थ सहित प्रस्तुत हैं —
1. ऋग्वेद ६.३६.४
पतिर्बभूथासमो जनानामेको विश्वस्य भुवनस्य राजा॥
भावार्थ :
वह परमेश्वर समस्त प्राणियों का स्वामी और सम्पूर्ण जगत् का एकमात्र राजा है।
2. ऋग्वेद १.१६४.४६
एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्त्यग्निं यमं मातरिश्वानमाहुः॥
भावार्थ :
सत्यस्वरूप परमात्मा एक ही है, ज्ञानीजन उसे अनेक नामों से पुकारते हैं।
3. यजुर्वेद ३२.१
तदेवाग्निस्तदादित्यस्तद्वायुस्तदु चन्द्रमाः।
तदेव शुक्रं तद्ब्रह्म ता आपः स प्रजापतिः॥
भावार्थ :
वही एक परमात्मा अग्नि, सूर्य, वायु, चन्द्र आदि नामों से जाना जाता है; वही ब्रह्म और प्रजापति है।
4. यजुर्वेद ४०.८
स पर्यगाच्छुक्रमकायमव्रणमस्नाविरं शुद्धमपापविद्धम्।
कविर्मनीषी परिभूः स्वयम्भूर्याथातथ्यतोऽर्थान्व्यदधाच्छाश्वतीभ्यः समाभ्यः॥
भावार्थ :
वह परमात्मा सर्वव्यापक, शरीररहित, निष्पाप, शुद्ध, सर्वज्ञ और स्वयंभू है, जो सबका यथार्थ नियमन करता है।
5. अथर्ववेद १३.४.१६
न द्वितीयो न तृतीयश्चतुर्थो नाप्युच्यते।
न पञ्चमो न षष्ठः सप्तमो नाप्युच्यते॥
भावार्थ :
उस परमेश्वर का दूसरा, तीसरा, चौथा या उसके समान कोई अन्य नहीं है।
6. अथर्ववेद १०.८.१
यो भूतं च भव्यं च सर्वं यश्चाधितिष्ठति।
स्वर्यस्य च केवलं तस्मै ज्येष्ठाय ब्रह्मणे नमः॥
भावार्थ :
जो परमात्मा भूत, भविष्य और समस्त जगत् का अधिष्ठाता है, उस श्रेष्ठ ब्रह्म को नमस्कार है।
7. ऋग्वेद १०.१२१.१
हिरण्यगर्भः समवर्तताग्रे भूतस्य जातः पतिरेक आसीत्।
स दाधार पृथिवीं द्यामुतेमां कस्मै देवाय हविषा विधेम॥
भावार्थ :
सृष्टि के आदि में वही परमात्मा प्रकट हुआ; वही समस्त जगत् का एकमात्र स्वामी था। उसी ने पृथ्वी और आकाश की रचना की।
उपनिषदों में प्रमाण --
ईशोपनिषद् --१
ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्।
भावार्थ :
इस सम्पूर्ण जगत में जो कुछ भी है, सब परमेश्वर से व्याप्त है।
छान्दोग्य उपनिषद् --६.२.१
एकमेवाद्वितीयम्॥
भावार्थ :
वह परम सत्य एक ही है, दूसरा कोई नहीं।
श्वेताश्वतर उपनिषद् --६.११
एको देवः सर्वभूतेषु गूढः
सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा।
भावार्थ :
एक ही परमात्मा सब प्राणियों में अन्तर्यामी रूप से स्थित और सर्वव्यापक है।
श्वेताश्वतर उपनिषद् --६.९
न तस्य कश्चित्पतिरस्ति लोके
न चेशिता नैव च तस्य लिङ्गम्॥
भावार्थ :
उस परमेश्वर का कोई स्वामी या नियन्ता नहीं; वही सबका स्वामी है।
कठोपनिषद् --२.२.१३
नित्यो नित्यानां चेतनश्चेतनानामेको बहूनां यो विदधाति कामान्॥
भावार्थ :
वह एक परमात्मा समस्त चेतन प्राणियों में नित्य और सर्वोच्च चेतन है, जो सबकी आवश्यकताओं की व्यवस्था करता है।
मुण्डकोपनिषद्-- २.२.११
ब्रह्मैवेदममृतं पुरस्ताद्ब्रह्म पश्चाद्ब्रह्म दक्षिणतश्चोत्तरेण।
अधश्चोर्ध्वं च प्रसृतं ब्रह्मैवेदं विश्वमिदं वरिष्ठम्॥
भावार्थ :
आगे, पीछे, दाएँ, बाएँ, ऊपर और नीचे—सब ओर वही ब्रह्म व्याप्त है; यह सम्पूर्ण विश्व उसी से परिपूर्ण है।
बृहदारण्यक उपनिषद् --३.८.९
एतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गि सूर्याचन्द्रमसौ विधृतौ तिष्ठतः॥
भावार्थ :
हे गार्गि! उसी अक्षर ब्रह्म के शासन में सूर्य और चन्द्र स्थित हैं।
माण्डूक्य उपनिषद्-- २
सर्वं ह्येतद्ब्रह्म॥
भावार्थ :
यह सम्पूर्ण जगत ब्रह्मस्वरूप है। पुराणों में प्रमाण---
श्रीमद्भागवत महापुराण-- १.२.११
वदन्ति तत्तत्त्वविदस्तत्त्वं यज्ज्ञानमद्वयम्।
ब्रह्मेति परमात्मेति भगवानिति शब्द्यते॥
भावार्थ :
तत्त्वज्ञानी उस एक अद्वैत सत्य को ब्रह्म, परमात्मा और भगवान — इन नामों से कहते हैं।
श्रीमद्भागवत महापुराण --२.९.३३
अहमेवासमेवाग्रे नान्यद्यत्सदसत्परम्।
पश्चादहं यदेतच्च योऽवशिष्येत सोऽस्म्यहम्॥
भावार्थ :
सृष्टि से पहले केवल मैं ही था; मुझसे भिन्न कुछ नहीं था। सृष्टि के बाद भी मैं ही हूँ और अंत में भी मैं ही रहूँगा।
विष्णु पुराण --१.२.१०
विष्णुशक्तिः परा प्रोक्ता क्षेत्रज्ञाख्या तथापरा।
अविद्या कर्मसंज्ञान्या तृतीया शक्तिरिष्यते॥
भावार्थ :
परम विष्णु की एक ही परम शक्ति है; जीव और अविद्या उसकी अन्य शक्तियाँ कही गई हैं।
विष्णु पुराण --१.२२.५३
एको विष्णुर्महद्भूतं पृथग्भूतान्यनेकशः।
त्रींल्लोकान्व्याप्य भूतात्मा भुङ्क्ते विश्वभुगव्ययः॥
भावार्थ :
एक ही विष्णु अनेक रूपों में समस्त प्राणियों में व्याप्त होकर तीनों लोकों का पालन करता है।
शिव पुराण --३.५६
एक एव त्रिधा भिन्नः परमात्मा महेश्वरः।
ब्रह्मविष्णुहराख्याभिः सर्गस्थित्यन्तकारणात्॥
भावार्थ :
एक ही परमात्मा महेश्वर सृष्टि, पालन और संहार के कारण ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र नामों से वर्णित होता है।
देवीभागवत पुराण --१.८.३१
एकैवाहं जगत्यत्र द्वितीया का ममापरा॥
भावार्थ :
इस जगत में मैं ही एक हूँ, मुझसे दूसरा कोई नहीं।
गीता में प्रमाण --
श्रीमद्भगवद्गीता --७.७
मत्तः परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति धनञ्जय।
मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव॥
भावार्थ :
हे धनंजय! मुझसे श्रेष्ठ दूसरा कोई नहीं है। यह सम्पूर्ण जगत मुझमें ऐसे गुँथा है जैसे सूत्र में मणियाँ।
श्रीमद्भगवद्गीता --९.४
मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना।
मत्स्थानि सर्वभूतानि न चाहं तेष्ववस्थितः॥
भावार्थ :
मेरे अव्यक्त स्वरूप से यह सम्पूर्ण जगत व्याप्त है; सभी प्राणी मुझमें स्थित हैं।
श्रीमद्भगवद्गीता --९.१७
पिताहमस्य जगतो माता धाता पितामहः॥
भावार्थ :
मैं ही इस जगत का पिता, माता, धारण करने वाला और पितामह हूँ।
श्रीमद्भगवद्गीता --१०.८
अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्तते।
इति मत्वा भजन्ते मां बुधा भावसमन्विताः॥
भावार्थ :
मैं ही सबका मूल कारण हूँ; मुझसे ही सब कुछ प्रवृत्त होता है।
श्रीमद्भगवद्गीता --१०.२०
अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः॥
भावार्थ :
हे अर्जुन! मैं सब प्राणियों के हृदय में स्थित आत्मा हूँ।
श्रीमद्भगवद्गीता-- १३.१३
अनादिमत्परं ब्रह्म न सत्तन्नासदुच्यते॥
भावार्थ :
वह परम ब्रह्म अनादि और सर्वोच्च है; उसे केवल सत् या असत् नहीं कहा जा सकता।
श्रीमद्भगवद्गीता --१५.१५
सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टो॥
भावार्थ :
मैं सबके हृदय में स्थित हूँ।
श्रीमद्भगवद्गीता --१८.६१
ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति॥
भावार्थ :
हे अर्जुन! परमेश्वर सब प्राणियों के हृदय में स्थित है।
महाभारत में प्रमाण --
शान्ति पर्व --३३९.२५
एको हि भगवान् विष्णुः सर्वभूतेषु गूढः।
एकं रूपं बहुधा यः करोति॥
भावार्थ :
एक ही भगवान् विष्णु समस्त प्राणियों में अन्तर्यामी रूप से स्थित होकर अनेक रूप धारण करते हैं।
महाभारत शान्ति पर्व --३५०.६५
नारायणपरो ज्योतिरात्मा नारायणः परः।
नारायणपरं ब्रह्म नारायण नमोऽस्तु ते॥
भावार्थ :
परम ज्योति, आत्मा और ब्रह्म — सब नारायणस्वरूप हैं।
महाभारत अनुशासन पर्व --१४९.१४
एको देवः केशवो वा शिवो वा।
भावार्थ :
परम देव एक ही है, जिसे केशव या शिव कहा जाता है।
महाभारत वन पर्व --३१३.११७
सर्वभूतेषु यः पश्येद्भगवन्तमवस्थितम्।
एकभावमनुप्राप्तः स याति परमां गतिम्॥
भावार्थ :
जो पुरुष समस्त प्राणियों में एक ही परमात्मा को स्थित देखता है, वह परम गति को प्राप्त होता है।
महाभारत शान्ति पर्व --२३१.२५
एकोऽग्निर्बहुधा समिद्धः
एको सूर्यः सर्वमिदं प्रकाशयति।
एको वायुर्वहति सर्वमिदं
एकात्मा सर्वभूतेषु स्थितः॥
भावार्थ :
जैसे एक अग्नि अनेक रूपों में प्रज्वलित होती है, एक सूर्य समस्त जगत को प्रकाशित करता है, वैसे ही एक परमात्मा सब प्राणियों में मनुस्मृति --१.६
ततः स्वयम्भूर्भगवानव्यक्तो व्यञ्जयन्निदम्।
महाभूतादिवृत्तौजाः प्रादुरासीत् तमोनुदः॥
भावार्थ :
फिर स्वयंभू परमेश्वर प्रकट होकर इस जगत की रचना में प्रवृत्त हुए और अज्ञानरूप अन्धकार को दूर किया।
स्मृतियों में प्रमाण --
मनुस्मृति --१२.१२२
एतमेके वदन्त्यग्निं मनुमन्ये प्रजापतिम्।
इन्द्रमेके परे प्राणमपरे ब्रह्म शाश्वतम्॥
भावार्थ :
ज्ञानीजन उसी एक परम तत्व को अग्नि, मनु, प्रजापति, इन्द्र, प्राण अथवा शाश्वत ब्रह्म आदि नामों से कहते हैं।
याज्ञवल्क्य स्मृति-- १.७
आत्मा वा इदमेक एवाग्र आसीत्॥
भावार्थ :
आदि में केवल एक परमात्मा ही था।
याज्ञवल्क्य स्मृति-- ३.१४३
एको हि सर्वभूतानामन्तरात्मा सनातनः॥
भावार्थ :
एक ही सनातन परमात्मा समस्त प्राणियों में अन्तर्यामी रूप से स्थित है।
पराशर स्मृति-- १.२३
एक एव जगत्स्वामी शक्तिमानच्युतः प्रभुः॥
भावार्थ :
एक ही अच्युत प्रभु सम्पूर्ण जगत के स्वामी और
सर्वशक्तिमान हैं।
नीति ग्रन्थों में प्रमाण-
चाणक्य नीति १.९
एकोऽपि गुणवान्पुत्रो निर्गुणैश्च शतैर्वरः।
एकश्चन्द्रस्तमो हन्ति न च तारा गणोऽपि च॥
भावार्थ :
एक गुणवान ही श्रेष्ठ होता है; जैसे एक चन्द्रमा अन्धकार दूर कर देता है, अनेक तारे नहीं।
विदुर नीति उद्योग पर्व ३३.१२
एको धर्मः परं श्रेयः क्षमैका शान्तिरुत्तमा।
विद्यैका परमा तृप्तिरहिंसैका सुखावहा॥
भावार्थ :
एक धर्म ही परम कल्याणकारी है, क्षमा ही श्रेष्ठ शान्ति है, विद्या ही परम तृप्ति है और अहिंसा ही सुख देने वाली है।
भर्तृहरि नीति शतक
दिक्कालाद्यनवच्छिन्नानन्तचिन्मात्रमूर्तये।
स्वानुभूत्येकमानाय नमः शान्ताय तेजसे॥
भावार्थ :
जो देश-काल से परे, अनन्त, चेतनस्वरूप और एकमात्र अनुभूत होने योग्य परम तेजस्वी सत्ता है, उसे नमस्कार।
हितोपदेश १.७१
अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम्।
उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्॥
भावार्थ :
यह अपना है और यह पराया — ऐसा विचार छोटे मन वालों का है; उदार हृदय वालों के लिए पूरी पृथ्वी एक परिवार है।
पञ्चतन्त्र १.३९
यथा चतुर्भिः कनकं परीक्ष्यते
निघर्षणच्छेदनतापताडनैः।
तथा चतुर्भिः पुरुषः परीक्ष्यते
त्यागेन शीलेन गुणेन कर्मणा॥
भावार्थ :
जैसे सोने की परीक्षा चार प्रकार से होती है, वैसे ही मनुष्य की परीक्षा त्याग, शील, गुण और कर्म से होती है।
शुक्रनीति २.२७
एको धर्मः सदा श्रेयः सत्यं चैवैकमव्ययम्॥
भावार्थ :
धर्म ही सदा कल्याणकारी है और सत्य ही एक अविनाशी तत्व है।
विदुर नीति उद्योग पर्व ३३.२५
एकः स्वादु न भुञ्जीत एकश्चार्थान्न चिन्तयेत्।
एको न गच्छेदध्वानं नैकः सुप्तेषु जाग्रयेत्॥
भावार्थ :
मनुष्य को स्वादिष्ट वस्तु अकेले नहीं खानी चाहिए, न अकेले निर्णय करना चाहिए, न अकेले यात्रा करनी चाहिए।
वाल्मीकि रामायण से प्रमाण-
1. युद्धकाण्ड १२०.१३
लोकस्य चात्मा त्वमसि राम सत्यपराक्रम।
भावार्थ :
हे राम! आप समस्त लोकों के आत्मस्वरूप और सत्यपराक्रमी हैं।
2. युद्धकाण्ड ११७.१३
भवान्नारायणो देवः श्रीमान्चक्रायुधो विभुः।
एकशृङ्गो वराहस्त्वं भूतभव्यसपत्नजित्॥
भावार्थ :
आप ही नारायण, सर्वव्यापक प्रभु और समस्त कालों के अधिपति हैं।
3. बालकाण्ड १.१५.१९
नियतात्मा महावीर्यो द्युतिमान्धृतिमान्वशी।
भावार्थ :
श्रीराम आत्मसंयमी, महान् तेजस्वी और सबको वश में रखने वाले हैं।
अध्यात्म रामायण से प्रमाण
4. अयोध्याकाण्ड १.१७
रामो विग्रहवान्धर्मः परंब्रह्म सनातनम्।
भावार्थ :
श्रीराम धर्मस्वरूप और सनातन परब्रह्म हैं।
5. अरण्यकाण्ड ३.७
त्वमेव सर्वभूतानामन्तरात्मा न संशयः।
भावार्थ :
आप ही समस्त प्राणियों के अन्तर्यामी आत्मा हैं।
6. उत्तरकाण्ड ६.३८
एक एव जगन्नाथो रामो राजीवलोचनः।
भावार्थ :
कमलनयन श्रीराम ही सम्पूर्ण जगत के एकमात्र स्वामी हैं।
7. अयोध्याकाण्ड ७.२६
सर्वेषां त्वं परो देवः शाश्वतः पुरुषोत्तमः।
भावार्थ :
आप ही सबके परम देव और शाश्वत पुरुषोत्तम हैं।
गर्गसंहिता से प्रमाण--
1. गोलोकखण्ड १.२४
एको देवः श्रीकृष्णः सर्वलोकैकनायकः।
भावार्थ :
एक ही भगवान श्रीकृष्ण समस्त लोकों के एकमात्र नायक हैं।
2. गोलोकखण्ड २.१५
स एव जगतां स्वामी स एव जगदीश्वरः।
भावार्थ :
वही समस्त जगत के स्वामी और ईश्वर हैं।
3. वृन्दावनखण्ड १२.३१
कृष्ण एव परं ब्रह्म सर्वकारणकारणम्॥
भावार्थ :
श्रीकृष्ण ही परमब्रह्म और सभी कारणों के कारण हैं।
योगवासिष्ठ से प्रमाण
4. निर्वाण प्रकरण ६.१.१२
एकमेवाद्वितीयं तद्ब्रह्मास्ति न संशयः।
भावार्थ :
वह ब्रह्म एक ही है, दूसरा कोई नहीं।
5. निर्वाण प्रकरण ६.२.५९
चित्तमेव हि संसारस्तत्प्रयत्नेन शोधनम्।
भावार्थ :
यह संसार चित्तस्वरूप है; इसलिए चित्त की शुद्धि ही मुख्य साधन है।
6. उत्पत्ति प्रकरण ३.१४
सर्वं खल्विदमेवात्मा नान्यदस्ति कदाचन।
भावार्थ :
यह सम्पूर्ण जगत आत्मस्वरूप है, इसके अतिरिक्त कुछ नहीं।
7. निर्वाण प्रकरण ५.१८
एको विश्वात्मको देवः सर्वभूतान्तरो स्थितः।
भावार्थ :
एक ही विश्वात्मा परमदेव सब प्राणियों के इस्लाम में प्रमाण--
इस वैदिक भाव — “एको विश्वस्य भुवनस्य राजा” (समस्त संसार का स्वामी एक ही है) — के समान इस्लाम में तौहीद शब्दआया है।
इस्लाम धर्म में प्रमाण---
1. सूरह अल-फ़ातिहा 1:2
Quran
ٱلْحَمْدُ لِلَّهِ رَبِّ ٱلْعَٰلَمِينَ
भावार्थ :
सब प्रशंसा अल्लाह के लिए है, जो सारे संसारों का पालनहार है।
2. सूरह अल-इख़लास 112:1
Quran
قُلْ هُوَ ٱللَّهُ أَحَدٌ
भावार्थ :
कह दो — अल्लाह एक है।
3. सूरह अल-बक़रह 2:163
Quran
وَإِلَٰهُكُمْ إِلَٰهٌ وَٰحِدٌ ۖ لَّآ إِلَٰهَ إِلَّا هُوَ ٱلرَّحْمَٰنُ ٱلرَّحِيمُ
भावार्थ :
तुम्हारा पूज्य एक ही पूज्य है; उसके सिवा कोई उपास्य नहीं, वही अत्यन्त कृपालु और दयावान है।
4. सूरह आल-इमरान 3:26
Quran
قُلِ ٱللَّهُمَّ مَٰلِكَ ٱلْمُلْكِ تُؤْتِى ٱلْمُلْكَ مَن تَشَآءُ
भावार्थ :
कहिए — हे अल्लाह! राज्य के स्वामी, तू जिसे चाहे राज्य देता है।
5. सूरह यूनुस 10:31
Quran
فَسَيَقُولُونَ ٱللَّهُ ۚ فَقُلْ أَفَلَا تَتَّقُونَ
भावार्थ :
वे अवश्य कहेंगे — “अल्लाह।” तब कहो — फिर तुम क्यों नहीं डरते?
(इस आयत में बताया गया कि आकाश-पृथ्वी का पालनहार वही एक है।)
6. आयतुल कुर्सी — सूरह अल-बक़रह 2:255
Quran
لَهُۥ مَا فِى ٱلسَّمَٰوَٰتِ وَمَا فِى ٱلْأَرْضِ
भावार्थ :
आकाशों और धरती में जो कुछ है सब उसी का है।
7. सूरह ताहा 20:14
Quran
إِنَّنِىٓ أَنَا ٱللَّهُ لَآ إِلَٰهَ إِلَّآ أَنَا
भावार्थ :
निश्चय ही मैं अल्लाह हूँ, मेरे सिवा कोई उपास्य नहीं।
इन सभी प्रमाणों में वही भाव व्यक्त है जो ऋग्वेद के मन्त्र —
“एको विश्वस्य भुवनस्य राजा” — में है कि सम्पूर्ण जगत का स्वामी और नियन्ता एक ही परम सत्ता है।
सूफ़ी सन्तों में प्रमाण--
“एक ही परम सत्ता समस्त जगत की स्वामी है”
1. Jalaluddin Rumi
"هر کسی کو دور ماند از اصل خویش
باز جوید روزگار وصل خویش"
भावार्थ :
हर आत्मा अपने मूल परम स्रोत से मिलने की चाह रखती है।
2. Mansur Al-Hallaj
"أنا الحق"
भावार्थ :
परम सत्य एक ही है; उसी का प्रकाश सबमें विद्यमान है।
3. Bayazid Bastami
"سبحانی ما أعظم شأني"
भावार्थ :
ईश्वर की महिमा ही सबमें प्रकट हो रही है।
4. Rabia al-Basri
"إلهي ما عبدتك خوفاً من نارك ولا طمعاً في جنتك"
भावार्थ :
हे प्रभु! मैं तेरी उपासना केवल प्रेम से करती हूँ।
5. Nizamuddin Auliya
"ہر قوم راست راہے، دین و قبلہ گاہے"
भावार्थ :
हर समुदाय अपने ढंग से उसी परम सत्य की खोज करता है।
6. Amir Khusrau
"ہر رنگ میں تو جلوہ نما"
भावार्थ :
हर रूप और रंग में वही एक परमात्मा प्रकट है।
7. Bulleh Shah
"بُلّھا کیہ جاناں میں کون"
भावार्थ :
अहंकार मिटने पर केवल वही एक सत्य शेष रहता है।
8. Shams Tabrizi
"خدا درون دل است"
भावार्थ :
ईश्वर मनुष्य के हृदय में विद्यमान है।
9. Abdul Qadir Gilani
"لا موجود إلا الله"
भावार्थ :
अन्ततः वास्तविक सत्ता केवल अल्लाह की है।
10. Ibn Arabi
"الرب واحد والخلق مظاهره"
भावार्थ :
परमात्मा एक है और सृष्टि उसी की अभिव्यक्ति है।
11. Khwaja Moinuddin Chishti
"محبت با همه، عداوت با هیچ"
भावार्थ :
सबसे प्रेम करो, किसी से द्वेष मत करो; क्योंकि सब उसी एक के अंश हैं।
12. Sultan Bahoo
"ہو بس توں ہی توں"
भावार्थ :
हर ओर वही एक परम सत्ता विद्यमान है।
इन सूफ़ी वचनों में वही आध्यात्मिक भाव प्रकट होता है जो ऋग्वेद के मन्त्र —
“एको विश्वस्य भुवनस्य राजा” — में व्यक्त है कि सम्पूर्ण जगत का स्वामी और मूल है।
सिक्ख धर्म में प्रमाण —
“एक ही परमात्मा समस्त जगत का स्वामी है”
1. मूल मंत्र
Guru Granth Sahib
ੴ ਸਤਿ ਨਾਮੁ ਕਰਤਾ ਪੁਰਖੁ ਨਿਰਭਉ ਨਿਰਵੈਰੁ॥
भावार्थ :
ईश्वर एक है; वही सत्य नाम वाला, सृष्टि का कर्ता, निर्भय और निर्वैर है।
2. जपुजी साहिब
Guru Granth Sahib
ਆਦਿ ਸਚੁ ਜੁਗਾਦਿ ਸਚੁ ॥
ਹੈ ਭੀ ਸਚੁ ਨਾਨਕ ਹੋਸੀ ਭੀ ਸਚੁ ॥
भावार्थ :
वह आदि से सत्य है, युगों से सत्य है, अब भी सत्य है और सदा सत्य रहेगा।
3. गुरु अर्जन देव जी
Guru Arjan
ਏਕੁ ਪਿਤਾ ਏਕਸ ਕੇ ਹਮ ਬਾਰਿਕ ॥
Guru Granth Sahib
भावार्थ :
एक ही परमपिता है और हम सब उसकी संतान हैं।
4. गुरु नानक देव जी
Guru Nanak
ਸਭ ਮਹਿ ਜੋਤਿ ਜੋਤਿ ਹੈ ਸੋਇ ॥
Guru Granth Sahib
भावार्थ :
सबमें उसी एक परमात्मा की ज्योति विद्यमान है।
5. गुरु तेग बहादुर जी
Guru Tegh Bahadur
ਕਾਹੇ ਰੇ ਬਨ ਖੋਜਨ ਜਾਈ ॥
ਸਰਬ ਨਿਵਾਸੀ ਸਦਾ ਅਲੇਪਾ ਤੋਹੀ ਸੰਗਿ ਸਮਾਈ ॥
Guru Granth Sahib
भावार्थ :
हे मनुष्य! तू ईश्वर को वन में क्यों खोजता है? वह सबमें निवास करता है और तेरे साथ ही है।
6. गुरु अमर दास जी
Guru Amar Das
ਏਕੋ ਅਮਰੁ ਏਕਾ ਪਾਤਿਸਾਹੀ ॥
Guru Granth Sahib
भावार्थ :
एक ही अमर प्रभु है और उसी की वास्तविक प्रभुता है।
7. गुरु राम दास जी
Guru Ram Das
ਇਕੋ ਇਕੁ ਰਵਿ ਰਹਿਆ ਸਭ ਅੰਤਰਿ ॥
Guru Granth Sahib
भावार्थ :
वही एक परमात्मा सबके भीतर व्यापक रूप से विद्यमान है।
इन सभी गुरुबाणियों में वही भाव प्रकट होता है जो ऋग्वेद के मन्त्र
“एको विश्वस्य भुवनस्य राजा"में है।
ईसाई धर्म में प्रमाण --
इन बाइबिल प्रमाणों में वही भावना व्यक्त है जो ऋग्वेद के मन्त्र —
“एको विश्वस्य भुवनस्य राजा” — में कही गई है कि समस्त संसार का स्वामी और परम अधिपति एक ही है।
ईसाई धर्म में प्रमाण — अंग्रेज़ी लिपि के साथ
(“एको विश्वस्य भुवनस्य राजा” — समस्त जगत का स्वामी एक ही है)
1. Deuteronomy 6:4
Bible
“Hear, O Israel: The Lord our God, the Lord is One.”
भावार्थ :
हे इस्राएल, सुन! हमारा प्रभु परमेश्वर एक ही प्रभु है।
2. Isaiah 45:5
Bible
“I am the Lord, and there is no other; apart from Me there is no God.”
भावार्थ :
मैं ही प्रभु हूँ, मेरे सिवा दूसरा कोई ईश्वर नहीं।
3. Mark 12:29
Bible
“The Lord our God, the Lord is One.”
भावार्थ :
प्रभु हमारा परमेश्वर एक ही प्रभु है।
4. 1 Corinthians 8:6
Bible
“Yet for us there is but one God, the Father, from whom all things came.”
भावार्थ :
हमारे लिए एक ही परमेश्वर है, पिता, जिससे सब वस्तुएँ उत्पन्न हुईं।
5. Psalm 83:18
Bible
“You alone, whose name is the Lord, are the Most High over all the earth.”
भावार्थ :
केवल तू ही सम्पूर्ण पृथ्वी पर सर्वोच्च प्रभु है।
6. John 17:3
Bible
“You, the only true God.”
भावार्थ :
तू ही अकेला सच्चा परमेश्वर है।
7. Ephesians 4:6
Bible
“One God and Father of all, who is over all and through all and in all.”
भावार्थ :
सबका एक ही परमेश्वर और पिता है, जो सबके ऊपर, सबमें और सबके द्वारा कार्य करता है।
इन सभी बाइबिल वचनों में वही भाव व्यक्त होता है जो ऋग्वेद के मन्त्र —
“एको विश्वस्य भुवनस्य राजा” — में कहा गया है कि सम्पूर्ण विश्व का स्वामी और परम सत्य एक ही है।
जैन धर्म में प्रमाण --
जैन दर्शन में सृष्टि के “एक ईश्वर द्वारा निर्माण” की वैदिक अवधारणा नहीं मानी जाती, क्योंकि जैन मत के अनुसार संसार अनादि-अनन्त है। फिर भी एक परम सत्य, एक शुद्ध आत्मतत्त्व, और समस्त जीवों में समान चेतना के विषय में अनेक प्राकृत वचन मिलते हैं। कुछ प्रमुख प्रमाण प्राकृत (देवनागरी) में —
समयसार
णमो अरिहंताणं णमो सिद्धाणं।
णमो आयरियाणं णमो उवज्झायाणं॥
भावार्थ :
अरिहन्त, सिद्ध, आचार्य और उपाध्यायों को नमस्कार — यही सर्वोच्च आध्यात्मिक सत्ता का मार्ग है।
आचारांग सूत्र
सव्वे पाणा ण हंतव्वा।
भावार्थ :
सभी प्राणी समान हैं, किसी की हिंसा नहीं करनी चाहिए।
उत्तराध्ययन सूत्र
अप्पा चेव दमेयव्वो अप्पा हु खलु दुद्दमो।
भावार्थ :
अपने आत्मस्वरूप को ही वश में करना चाहिए, क्योंकि आत्मा को जीतना कठिन है।
समयसार
एको मे सासओ अप्पा णाणदंसणलक्षणो।
भावार्थ :
मेरा आत्मा एक, शाश्वत तथा ज्ञान-दर्शन स्वरूप है।
प्रवचनसार
जो णेहिं जाणदि अप्पाणं सो जाणदि जिणसासणं।
भावार्थ :
जो अपने आत्मा को जानता है, वही जिनवाणी का वास्तविक ज्ञाता है।
द्रव्यसंग्रह
जीवा अजीवा य बंधो पुण्णं पावासवं तहा।
संवरणिज्जरणा मोखो सत्त तच्चं जिणेसिणो॥
भावार्थ :
जीव, अजीव, बंध, पुण्य, पाप, संवर, निर्जरा और मोक्ष — ये जैन धर्म के सात तत्त्व हैं।
समयसार
अप्पा णाणमओ दंसणमओ चरित्तमओ तहो।
भावार्थ :
आत्मा ज्ञानमय, दर्शनमय और चरित्रमय है।
बौद्ध धर्म में प्रमाण --
बौद्ध धर्म में सृष्टि के “एक परमेश्वर” की वैदिक अवधारणा स्वीकार नहीं की जाती, किन्तु समस्त लोकों पर धर्म (धम्म), सत्य और बुद्धत्व की सर्वोच्चता का वर्णन अनेक पाली ग्रन्थों में मिलता है। पाली (देवनागरी) में कुछ प्रमाण —
धम्मपद १८३
सब्बपापस्स अकरणं, कुसलस्स उपसम्पदा।
सचित्तपरियोदपनं — एतं बुद्धान सासनं॥
भावार्थ :
सब पापों का त्याग, शुभ कर्मों का आचरण और चित्त की शुद्धि — यही बुद्धों का उपदेश है।
धम्मपद धम्मपद १६०
अत्ता हि अत्तनो नाथो, को हि नाथो परोसिया।
भावार्थ :
मनुष्य स्वयं ही अपना स्वामी है; दूसरा कौन उसका स्वामी हो सकता है?
महापरिनिब्बान सुत्त
अत्तदीपा विहरथ, अत्तसरणा अनञ्ञसरणा।
धम्मदीपा धम्मसरणा अनञ्ञसरणा॥
भावार्थ :
अपने भीतर दीपक बनो, धर्म को ही अपना आश्रय बनाओ।
धम्मपद धम्मपद १७०
यथा बुब्बुलकं पस्से, यथा पस्से मरीचिकं।
एवं लोकं अवेक्खन्तं, मच्चुराजा न पस्सति॥
भावार्थ :
जो इस संसार को बुलबुले और मृगतृष्णा समान देखता है, मृत्यु उस पर अधिकार नहीं कर पाती।
सुत्तनिपात
नत्थि मे सरणं अञ्ञं, बुद्धो मे सरणं वरं।
भावार्थ :
बुद्ध से बढ़कर मेरा दूसरा कोई आश्रय नहीं।
धम्मपद धम्मपद ३५४
सब्बदानं धम्मदानं जिनाति।
भावार्थ :
सभी दानों में धर्म का दान श्रेष्ठ है।
उदान अत्थि भिक्खवे अजतं अभूतं अकतं असंखतं॥
भावार्थ :
हे भिक्षुओं! एक अजन्मा, अभूत, अकृत और असंस्कृत तत्व है।
यहूदी धर्म में प्रमाण --
Torah
שְׁמַע יִשְׂרָאֵל יְהוָה אֱלֹהֵינוּ
יְהוָה אֶחָד׃
भावार्थ :
हे इस्राएल! सुनो — हमारा परमेश्वर यहोवा एक ही है।
Torah
אֲנִי יְהוָה וְאֵין עוֹד זוּלָתִי אֵין אֱלֹהִים׃
भावार्थ :
मैं ही यहोवा हूँ, मेरे अतिरिक्त दूसरा कोई ईश्वर नहीं।
Book of Isaiah
כֹּה־אָמַר יְהוָה מֶלֶךְ יִשְׂרָאֵל וְגֹאֲלוֹ יְהוָה צְבָאוֹת אֲנִי רִאשׁוֹן וַאֲנִי אַחֲרוֹן וּמִבַּלְעָדַי אֵין אֱלֹהִים׃
भावार्थ :
यहोवा, इस्राएल का राजा कहता है — मैं ही प्रथम और अंतिम हूँ; मेरे अतिरिक्त कोई ईश्वर नहीं।
Torah
לֹא יִהְיֶה־לְךָ אֱלֹהִים אֲחֵרִים עַל־פָּנָיַ׃
भावार्थ :
मेरे सिवा तुम्हारा कोई अन्य ईश्वर न हो।
Book of Psalms
כִּי־גָדוֹל אַתָּה וְעֹשֵׂה נִפְלָאוֹת אַתָּה אֱלֹהִים לְבַדֶּךָ׃
भावार्थ :
आप महान हैं और अद्भुत कार्य करते हैं; केवल आप ही ईश्वर हैं।
Book of Isaiah
כִּי אָנֹכִי אֵל וְאֵין עוֹד אֱלֹהִים וְאֶפֶס כָּמוֹנִי׃
भावार्थ :
मैं ही ईश्वर हूँ, मेरे समान कोई दूसरा नहीं।
Book of Zechariah
וְהָיָה יְהוָה לְמֶלֶךְ עַל־כָּל־הָאָרֶץ בַּיּוֹם הַהוּא יִהְיֶה יְהוָה אֶחָד וּשְׁמוֹ אֶחָד׃
भावार्थ :
उस दिन यहोवा समस्त पृथ्वी का राजा होगा; वह एक ही होगा।
पारसी धर्म में प्रमाण --
(Zoroastrian) धर्म के ग्रंथ अवेस्ता में एकेश्वरवाद (Ahura Mazda की सर्वोच्चता) का स्पष्ट वर्णन मिलता है।
“समस्त लोकों का स्वामी एक है” के भाव पर प्रमुख अवेस्ता मंत्र नीचे दिए जा रहे हैं—
1. यास्ना 44.7 (अवेस्ता)
𐬀𐬵𐬎𐬭𐬀 𐬨𐬀𐬰𐬛𐬁 𐬀𐬱𐬙𐬀 𐬨𐬀𐬰𐬛𐬁 𐬨𐬀𐬙𐬀𐬨𐬀𐬙𐬀
भावार्थ :
अहुरा मज़्दा ही समस्त सृष्टि का ज्ञाता, रचयिता और सर्वोच्च स्वामी है।
2. यास्ना 31.8
𐬀𐬵𐬎𐬭𐬀 𐬨𐬀𐬰𐬛𐬁 𐬵𐬀𐬎𐬭𐬀𐬨 𐬀𐬴𐬙𐬀
भावार्थ :
अहुरा मज़्दा ही सत्य, प्रकाश और सर्वोच्च सत्ता है, जो सम्पूर्ण लोकों का अधिपति है।
3. यास्ना 45.7
𐬀𐬵𐬎𐬭𐬀 𐬨𐬀𐬰𐬛𐬁 𐬀𐬴𐬙𐬀 𐬵𐬀𐬎𐬭𐬀𐬨
भावार्थ :
अहुरा मज़्दा एकमात्र सृष्टिकर्ता है, उसके समान दूसरा कोई नहीं।
4. यास्ना 29.4
𐬀𐬵𐬎𐬭𐬀 𐬨𐬀𐬰𐬛𐬁 𐬙𐬀𐬌𐬙𐬌𐬌𐬛𐬀𐬙𐬀
भावार्थ :
वह एक ही परमात्मा सभी जीवों का पालनकर्ता और नियन्ता है।
5. यास्ना 1.1
𐬀𐬵𐬎𐬭𐬀𐬨𐬀𐬰𐬛𐬁 𐬀𐬵𐬎𐬭𐬀𐬨𐬀𐬰𐬛𐬁 𐬀𐬴𐬙𐬀
भावार्थ :
अहुरा मज़्दा ही आराध्य, सर्वोच्च और एकमात्र ईश्वर है।
निष्कर्ष
अवेस्ता में “अहुरा मज़्दा” को ही एक, सर्वोच्च, सर्वलोकों का स्वामी और सृष्टिकर्ता बताया गया है, जो उसी भाव के अनुरूप है कि “समस्त लोकों का स्वामी एक है।
ताओ धर्म में प्रमाण--
”ताओ धर्म में “समस्त लोकों का एक स्वामी ईश्वर” जैसी वैदिक शैली की अवधारणा नहीं मिलती, लेकिन एकमात्र मूल तत्त्व (道 Dao) को ही सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का स्रोत और संचालन-नियम माना गया है। यही “एकता” का प्रमाण ताओ ग्रंथों में मिलता है।
ताओ ते चिंग से प्रमाण
1. अध्याय 42
道生一,一生二,二生三,三生万物
भावार्थ :
ताओ (Dao) से एक उत्पन्न हुआ, एक से दो, दो से तीन, और तीन से समस्त संसार उत्पन्न हुआ।
2. अध्याय 25
有物混成,先天地生。寂兮寥兮,独立而不改,周行而不殆。
भावार्थ :
एक ऐसा तत्व है जो आकाश और पृथ्वी से पहले से विद्यमान है, जो अकेला, अपरिवर्तनीय और सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में व्याप्त है।
3. अध्याय 34
大道泛兮,其可左右。万物恃之以生而不辞。
भावार्थ :
महान ताओ सब ओर फैला हुआ है; समस्त जीव उसी पर निर्भर हैं और वही उन्हें जीवन देता है।
4. अध्याय 32
道常无名,朴虽小,天下莫能臣也。
भावार्थ :
ताओ अनाम और सरल है, फिर भी सम्पूर्ण संसार उसका अधीन है।
5. अध्याय 51
道生之,德畜之,物形之,势成之。
भावार्थ :
ताओ ही सबको उत्पन्न करता है, उसका पालन करता है और सम्पूर्ण सृष्टि को रूप देता है।
निष्कर्ष
ताओ धर्म में “एक स्वामी ईश्वर” की जगह “एक मूल ताओ (道)” को माना गया है, जिससे सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड उत्पन्न होता है और जिसमें सब कुछ स्थित है।
कन्फ्यूशियस धर्म में प्रमाण --
कन्फ्यूशियस परंपरा (Confucianism) में वैदिक शैली का “एक ईश्वर, समस्त लोकों का स्वामी” जैसा सिद्धान्त नहीं है, लेकिन इसमें 天 (Tiān — स्वर्ग/हैवेन) को सर्वोच्च नैतिक-विश्वव्यवस्था और सार्वभौमिक सत्ता के रूप में माना गया है। इसी भाव के कुछ प्रमुख प्रमाण ग्रंथों से दिए जा रहे हैं—
लुन्यू (Analects) से प्रमाण
1. अध्याय 12.1
天生德于予,桓魋其如予何?
भावार्थ :
“स्वर्ग (天) ने मुझे धर्म/गुण प्रदान किया है, फिर कोई मनुष्य मेरा क्या बिगाड़ सकता है?”
2. अध्याय 7.23
天何言哉?四时行焉,百物生焉。
भावार्थ :
स्वर्ग (天) क्या बोलता है? फिर भी ऋतुएँ चलती हैं और समस्त जीव उत्पन्न होते हैं।
3. अध्याय 9.5
天生德于予,匡人其如予何?
भावार्थ :
स्वर्ग ने मुझे नैतिक गुण दिए हैं, इसलिए कोई मुझे हानि नहीं पहुँचा सकता।
शुजिंग (Book of Documents) से प्रमाण
4. शुजिंग (尚书) – “Great Declaration”
皇天无亲,惟德是辅
भावार्थ :
महान स्वर्ग (Heaven) किसी का पक्षपात नहीं करता; वह केवल धर्म/गुण का साथ देता है।
मेनशियस (Mengzi) से प्रमाण
5. मेनशियस 7A:1
尽其心者,知其性也;知其性,则知天矣。
भावार्थ :
जो अपने हृदय को पूर्णतः समझ लेता है, वह अपनी प्रकृति को जानता है, और प्रकृति को जानकर वह स्वर्ग (天) को जानता है।
शिन्तो धर्म में प्रमाण --
शिन्तो (Shinto) में “समस्त लोकों का एक स्वामी ईश्वर” जैसी एकेश्वरवादी अवधारणा नहीं मिलती। इसके स्थान पर 天地 (あめつち / Ame-tsuchi = आकाश-पृथ्वी की समग्र व्यवस्था) और 八百万の神 (やおよろずのかみ = असंख्य क़ामी/देव) का भाव है—अर्थात् दिव्यता एक नहीं, बल्कि समस्त प्रकृति में व्याप्त है। फिर भी “सर्वव्यापी मूल सत्ता” के भाव को दर्शाने वाले कुछ पारंपरिक ग्रंथों के प्रमाण नीचे दिए हैं—
कोजिकि (Kojiki) से प्रमाण
1. जापानी लिपि
天地初発之時、高天原成神名、天之御中主神。
भावार्थ :
आकाश और पृथ्वी के प्रारम्भ में, उच्च स्वर्ग (Takama-no-hara) में सर्वप्रथम जो देव प्रकट हुए, उनमें प्रमुख हैं “आकाश के मध्य के स्वामी”।
2. जापानी लिपि
次高御産巣日神、神産巣日神。
भावार्थ :
इसके बाद उच्च उत्पत्ति के देव और सृष्टि-उत्पत्ति के देव प्रकट हुए—जो सृष्टि के मूल कारण माने जाते हैं।
निहोन शोकि (Nihon Shoki) से प्रमाण
3. जापानी लिपि
天地開闢之初、六合未分、陰陽未判。
भावार्थ :
सृष्टि के प्रारम्भ में आकाश और पृथ्वी अलग नहीं थे; यिन और यांग का विभाजन भी नहीं हुआ था।
4. जापानी लिपि
天地之神、化生万物。
भावार्थ :
आकाश और पृथ्वी की दिव्य शक्तियों से समस्त वस्तुओं की उत्पत्ति होती है।
Shinto की सामान्य मान्यता
5. जापानी अवधारणा
八百万の神(やおよろずのかみ)
भावार्थ :
सभी प्राकृतिक तत्वों—पर्वत, नदी, सूर्य, वायु आदि में देवत्व व्याप्त है; कोई एक ही ईश्वर नहीं बल्कि अनगिनत क़ामी हैं।
निष्कर्ष
शिन्तो परंपरा में “एक सर्वोच्च स्वामी” की बजाय प्रकृति-आधारित बहुदेववादी और सर्वव्यापी दिव्यता की अवधारणा मिलती है, जहाँ सृष्टि की मूल शक्ति “आकाश-पृथ्वी की समग्र व्यवस्था” के रूप में व्यक्त होती है।
यूनानी दर्शन में प्रमाण --
यूनानी (Greek) दर्शन में “समस्त लोकों का एक स्वामी ईश्वर” जैसी अवधारणा सीधे धार्मिक रूप में नहीं, बल्कि एक सर्वोच्च एकता/प्रथम कारण (One / Nous / Logos / Prime Mover) के रूप में मिलती है। नीचे प्रमुख दार्शनिकों के प्रमाण मूल यूनानी लिपि सहित दिए जा रहे हैं—
1. प्लेटो — Timaeus (Timaios)
εἷς θεὸς ὁ κόσμος οὗτος ζῶον ἔμψυχον ἔννουν τε καὶ ἓν ὅλον
भावार्थ :
यह सम्पूर्ण विश्व एक जीवित, आत्मयुक्त और एकीकृत सम्पूर्ण (One Whole) है, जिसे दिव्य बुद्धि संचालित करती है।
2. अरस्तू — Metaphysics
πρῶτον κινοῦν ἀκίνητον
भावार्थ :
एक “अचल प्रथम प्रेरक” (Unmoved Mover) है जो सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की गति का कारण है।
3. हेराक्लाइटस — Fragment
τὸ πᾶν ἓν καὶ πάντα ἐκ τοῦ ἑνός
भावार्थ :
संपूर्ण ब्रह्माण्ड एक है और सब कुछ उसी एक से उत्पन्न होता है।
4. स्टोइक दर्शन — Logos सिद्धान्त
ὁ λόγος δι᾽ ὃν τὰ πάντα συνέστηκε
भावार्थ :
एक सार्वभौमिक “Logos” है जिसके द्वारा सब कुछ व्यवस्थित और संचालित होता है।
5. प्लोटिनस — Enneads
τὸ Ἕν ἐστιν ὑπὲρ πάντα καὶ πάντων αἴτιον
भावार्थ :
“एक (The One)” सब कुछ से परे है और सभी अस्तित्व का मूल कारण है।
निष्कर्ष
यूनानी दर्शन में “समस्त लोकों का स्वामी एक है” का भाव सीधे ईश्वर-भक्ति रूप में नहीं, बल्कि The One (Ἕν), Logos और Prime Mover के रूप में व्यक्त हुआ है, जो सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की एकता और कारणत्व को दर्शाता है।
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