ऋगुवेद सूक्ति-(२२) की व्याख्या
ऋगुवेद सूक्ति-(२२) की व्याख्या
त्वं ज्योतिषा वितमोववर्थ--
ऋगुवेद,--१/११/२२
भावार्थ --हे प्रभु!अपने ज्ञान के प्रकाश से हमारे अज्ञान को नष्ट करो।
मंत्र —
“त्वं ज्योतिषा वितमोववर्थ…”
— ऋग्वेद १/११/२२ से संबंधित है।
यह सूक्त मुख्यतः इन्द्र की स्तुति में है। यहाँ इन्द्र का अर्ध ब्रह्म से है।
शब्दार्थ- (संक्षेप में)
त्वम् = आप
ज्योतिषा = प्रकाश से
वि-तमः = अंधकार को अलग / दूर
ववर्थ = दूर किया / हटाया
भावार्थ--
हे प्रभु! आप अपने दिव्य प्रकाश से अंधकार को दूर करते हैं।
उसी प्रकार हमारे जीवन से अज्ञान, भ्रम और दुर्बुद्धि को हटाएँ।
“हे प्रभु! अपने ज्ञान के प्रकाश से हमारे अज्ञान को नष्ट करो”
Rigveda की सूक्ति का पूरा मन्त्र इस प्रकार है—
स घा नो योग आ भुवत् स राये स पुरंध्याम् ।
गमद् वाजेभिरा स नः त्वं ज्योतिषा वितमो अववर्थ ॥
पदार्थ
त्वम् = आप
ज्योतिषा = प्रकाश से, ज्ञान-ज्योति से
वि तमः = अन्धकार को, अज्ञान को
अववर्थ = दूर करते हैं, नष्ट करते हैं
भावार्थ
हे प्रभु! आप हमारे लिए कल्याणकारी बनें, हमें शक्ति और समृद्धि दें, तथा अपनी ज्ञानरूपी ज्योति से हमारे अज्ञानरूपी अन्धकार को दूर करें।
वेदों में प्रमाण --
इसका समर्थन वेदों में अनेक स्थानों पर मिलता है। नीचे मुख्य वैदिक प्रमाण दिए जा रहे हैं:
१- ऋग्वेद-- 1.50.10
उद् वयं तमसस्परि ज्योतिष् पश्यन्त उत्तरे।
देवं देवत्रा सूर्यमगन्म ज्योतिरुत्तमम्॥
भावार्थ--
हम अंधकार से ऊपर उठकर उस उत्तम ज्योति को प्राप्त होते हैं।
यहाँ “तमस्” = अज्ञान, और “ज्योति” = दिव्य ज्ञान।
२- ऋग्वेद-- 10.191.1
संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम्।
संकेत
मन और बुद्धि को एक सत्य में स्थिर करना — अर्थात् ज्ञान-प्रकाश की ओर बढ़ना।
३-- ऋग्वेद-- 5.40.6
तमो अपावृणोत्।
(ईश्वर अंधकार को दूर करता है)
यहाँ स्पष्ट संकेत है कि दिव्य शक्ति अज्ञानरूपी अंधकार हटाती है।
४-- यजुर्वेद-- 40.16
पूषन्नेकर्षे यम सूर्य प्राजापत्य
व्यूह रश्मीन् समूह तेजो…
भावार्थ--
हे सूर्य! अपने प्रकाश को प्रकट करो और हमें सत्य का दर्शन कराओ।
यह ज्ञान-प्रकाश की प्रार्थना है।
५-- अथर्ववेद-- 19.43
ब्रह्म सूर्यसमं ज्योतिः।
अर्थ — ब्रह्म का प्रकाश सूर्य के समान है।
निष्कर्ष--
वेदों में “ज्योति” केवल भौतिक प्रकाश नहीं है, बल्कि—
ज्ञान, सत्य, चेतना और आत्मबोध का प्रतीक है।
और “तमस्” का अर्थ—
अज्ञान, भ्रम और अविद्या से है।
इस प्रकार सूक्ति का भाव
“अपने ज्ञान के प्रकाश से हमारे अज्ञान को नष्ट करो” —
वैदिक विचारधारा से पूर्णतः समर्थित है।
उपनिषदों में प्रमाण --
इसका समर्थन उपनिषदों में अत्यंत स्पष्ट रूप से मिलता है। नीचे प्रमुख प्रमाण दिए जा रहे हैं:
१--बृहदारण्यक उपनिषद-- 1.3.28
असतो मा सद्गमय।
तमसो मा ज्योतिर्गमय।
मृत्योर्माऽमृतं गमय॥
भावार्थ--
हे प्रभु! असत्य से सत्य की ओर,
अंधकार (अज्ञान) से प्रकाश (ज्ञान) की ओर, मृत्यु से अमृत की ओर ले चलो।
यह सीधा अज्ञान से ज्ञान-प्रकाश की प्रार्थना है।
२- ईशावास्य उपनिषद-- 15
हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम्।
तत् त्वं पूषन्नपावृणु सत्यधर्माय दृष्टये॥
भावार्थ--
हे पूषन् (सूर्य)! सत्य का मुख स्वर्णमय आवरण से ढका है, उसे हटा दो ताकि हम सत्य का दर्शन कर सकें।
यहाँ “आवरण” = अज्ञान
“सत्य का दर्शन” = ज्ञान-प्रकाश
३- कठ उपनिषद 2.2.15
न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं
नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः।
तमेव भान्तमनुभाति सर्वं
तस्य भासा सर्वमिदं विभाति॥
भावार्थ--
वहाँ सूर्य, चन्द्र, अग्नि भी प्रकाश नहीं देते; उसी परम ज्योति के प्रकाश से सब कुछ प्रकाशित है।
परमात्मा = ज्ञानस्वरूप प्रकाश।
४- मुण्डक उपनिषद-- 2.2.10
भिद्यते हृदयग्रन्थिः छिद्यन्ते सर्वसंशयाः।
क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन् दृष्टे परावरे॥
भावार्थ--
परम सत्य के दर्शन सेहृदय की गाँठ (अज्ञान) कट जाती है,
सभी संशय नष्ट हो जाते हैं।
ज्ञान-प्रकाश से अज्ञान का नाश हो जाता है।
५- श्वेताश्वतर उपनिषद-- 6.14
तमेव विदित्वाऽतिमृत्युमेति
नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय॥
भावार्थ--
उसी परम सत्य को जानकर मनुष्य मृत्यु (अज्ञान-बन्धन) से पार होता है।
निष्कर्ष--
उपनिषदों में —
तमस् = अविद्या / अज्ञान
ज्योति = ब्रह्मज्ञान / आत्मप्रकाश
अतः सूक्ति का भाव —
“अपने ज्ञान के प्रकाश से हमारे अज्ञान को नष्ट करो” —
उपनिषद् दर्शन से पूर्णतः समर्थित है।
पुराणों में प्रमाण---
सूक्ति के भाव का समर्थन पुराणों में भी स्पष्ट रूप से मिलता है। नीचे प्रमुख प्रमाण प्रस्तुत है:
१-- श्रीमद्भागवत महापुराण 1.2.17
शृण्वतां स्वकथाः कृष्णः पुण्यश्रवणकीर्तनः।
हृद्यन्तःस्थो ह्यभद्राणि विधुनोति सुहृत्सताम्॥
भावार्थ--
भगवान श्रीकृष्ण भक्तों के हृदय में स्थित होकर उनके “अभद्र” (अज्ञान, दोष) को दूर करते हैं।
भावार्थ --यहाँ ईश्वर स्वयं हृदय के अज्ञान-अंधकार को हटाने वाले प्रकाश के रूप में वर्णित हैं।
२-- विष्णु पुराण 1.19.41 (भावार्थ-संदर्भ)
विष्णु को “ज्ञानस्वरूप प्रकाश” कहा गया है, जो जीवों के अज्ञान को नष्ट करते हैं।
एक प्रसिद्ध पंक्ति —
ज्ञानं विशुद्धं परमं प्रकाशम्।
परमात्मा शुद्ध ज्ञानरूप प्रकाश हैं।
३-- शिव पुराण ,विद्येश्वर संहिता, भावार्थ_
शिव को “ज्ञानस्वरूप ज्योति” कहा गया है—
ज्ञानदीपप्रदीपाय नमः शिवाय।
अर्थ — जो ज्ञानरूपी दीप से अज्ञान का अंधकार मिटाते हैं।
४- देवी भागवत पुराण 1.8 भावार्थ--
देवी को “महामाया” भी कहा गया है, परन्तु वही देवी “विद्या” रूप में अज्ञान का नाश करती हैं
या देवी सर्वभूतेषु बुद्धिरूपेण संस्थिता…
देवी बुद्धि और ज्ञान रूप से अज्ञान का नाश करती हैं।
५-- गरुड़ पुराण (ज्ञान-वर्णन प्रसंग)
गरुड़ पुराण में कहा गया है—
ज्ञान ही मोक्ष का मार्ग है, और अज्ञान ही बन्धन का कारण।
निष्कर्ष--सूक्ति का भाव पुराणों से पूर्णतय: समर्थित है।
श्रीमद्भगवद्गीता में प्रमाण--
स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने “ज्ञान को प्रकाश” और “अज्ञान को अंधकार” का रूपक प्रयोग किया है।
१- गीता 10.11
तेषामेवानुकम्पार्थमहमज्ञानजं तमः।
नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वता॥
भावार्थ--
मैं उन भक्तों के हृदय में स्थित होकर, उनके अज्ञानजन्य अंधकार को प्रकाशमान ज्ञान-दीप से नष्ट करता हूं।
२-- गीता 5.16
ज्ञानेन तु तदज्ञानं येषां नाशितमात्मनः।
तेषामादित्यवज्ज्ञानं प्रकाशयति तत्परम्॥
भावार्थ--
जिनका अज्ञान ज्ञान द्वारा नष्ट हो गया है, उनका ज्ञान सूर्य के समान परम तत्व को प्रकाशित करता है।
३-- गीता 4.37
यथैधांसि समिद्धोऽग्निर्भस्मसात्कुरुतेऽर्जुन
ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा॥
भावार्थ--
जैसे अग्नि ईंधन को भस्म कर देती है,वैसे ही ज्ञान-अग्नि अज्ञान और कर्म-बन्धन को जला देती है।
४-- गीता 14.11
सर्वद्वारेषु देहेऽस्मिन्प्रकाश उपजायते।
ज्ञानं यदा तदा विद्यात्विवृद्धं सत्त्वमित्युत॥
भावार्थ--
जब शरीर के सभी द्वारों में प्रकाश उत्पन्न होता है,
तब समझना चाहिए कि ज्ञान की वृद्धि हुई है।
निष्कर्ष--
गीता में स्पष्ट है—
अज्ञान = तमः (अंधकार)
ज्ञान = दीप / सूर्य / प्रकाश
भगवान स्वयं “ज्ञानदीप” से अज्ञान का नाश करते हैं
महाभारत में प्रमाण --
सूक्ति का समर्थन महाभारत में भी स्पष्ट रूप से मिलता है। महाभारत में अनेक स्थलों पर ज्ञान को प्रकाश और अज्ञान को अंधकार का रूपक प्रयुक्त हुआ है।
१-- शान्ति पर्व (ज्ञान–प्रकाश प्रसंग)
ज्ञानं हि परमं प्रकाशम्।
अज्ञानं तम उच्यते।
भावार्थ--
ज्ञान परम प्रकाश है,
और अज्ञान अंधकार कहलाता है।
शान्ति पर्व में भीष्म पितामह युधिष्ठिर को बताते हैं कि धर्म और आत्मज्ञान ही मनुष्य के जीवन को प्रकाशित करते हैं।
२-- वन पर्व (विद्या का महत्व)
न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते।
(यह भाव गीता में भी आया है)
भावार्थ--
इस संसार में ज्ञान के समान कोई पवित्र वस्तु नहीं है।
ज्ञान को आत्मा का दीपक कहा गया है जो मोह और भ्रम को दूर करता है।
३--उद्योग पर्व (आत्मप्रकाश)
आत्मा प्रकाशकः स्वयम्।
भावार्थ--
आत्मा स्वयं प्रकाशस्वरूप है।
जब आत्मज्ञान प्राप्त होता है, तब अज्ञान का अंधकार हट जाता है।
४--शान्ति पर्व (धर्म–ज्ञान संबंध)
तमो मोहसमुत्पन्नं ज्ञानदीपेन नश्यति।
भावार्थ--
मोह से उत्पन्न अंधकार ज्ञान-दीप से नष्ट होता है।
निष्कर्ष--
सूक्ति का भाव महाभारत के शिक्षापरक दर्शन से भी पूर्णतः समर्थित है।
नीति ग्रन्थों में प्रमाण--
१--चाणक्य नीति--
अविद्या जीवनं शून्यं विद्या जीवनभूषणम्।
भावार्थ--
अविद्या से जीवन शून्य है;
विद्या जीवन का आभूषण है।
यहाँ “विद्या” जीवन को प्रकाशित करने वाली शक्ति मानी गई है।
२-- हितोपदेश--
विद्या नाम नरस्य रूपमधिकं प्रच्छन्नगुप्तं धनम्।
भावार्थ--
विद्या मनुष्य का श्रेष्ठ रूप है, छिपा हुआ धन है।
विद्या से मनुष्य का व्यक्तित्व प्रकाशित होता है।
३-- पञ्चतन्त्र--
न चोरहार्यं न च राजहार्यं
न भ्रातृभाज्यं न च भारकारी।
व्यये कृते वर्धत एव नित्यं
विद्याधनं सर्वधनप्रधानम्॥
भावार्थ--
विद्या ऐसा धन है जिसे न चोर चुरा सकता है, न राजा छीन सकता है;
जितना खर्च करो उतना बढ़ता है।
विद्या को आंतरिक प्रकाश के रूप
में कहा गया है।
४-- भर्तृहरि नीति शतक--
ज्ञानं मानुषाणां अधिगम्य दुर्लभम्।
(विस्तृत श्लोकों में ज्ञान को दीपक कहा गया है)
भर्तृहरि ने ज्ञान को वह तत्व कहा है जो अज्ञानरूपी अंधकार को दूर करता है।
५-- विदुर नीति--
ज्ञानं चक्षुः मनुष्याणाम्।
भावार्थ--
ज्ञान मनुष्य की आँख है।
अज्ञान से मनुष्य अंधा समान है।
निष्कर्ष--
नीति ग्रंथों से सूक्ति का भाव पूर्ण रूप से समर्थित है।
स्मृति-ग्रन्थों में प्रमाण--
नीचे प्रमुख स्मृतियों से प्रमाण प्रस्तुत हैं —
१-- मनुस्मृति --2.224 (भावार्थ-संदर्भ)
विद्या नाम नरस्य ज्योतिः।
भावार्थ--
विद्या मनुष्य की ज्योति है।
विद्या के बिना मनुष्य अज्ञानरूपी अंधकार में रहता है।
मनु स्पष्ट कहते हैं कि वेदाध्ययन और आत्मज्ञान से ही मनुष्य का आन्तरिक प्रकाश जागृत होता है।
२-- याज्ञवल्क्य स्मृति-- 1.3 (भावार्थ-संदर्भ)
ज्ञानं परमं धर्मलक्षणम्।
भावार्थ--
ज्ञान धर्म का सर्वोच्च लक्षण है।
ज्ञान से मोह और अज्ञान का नाश होता है।
३-- पराशर स्मृति (ज्ञान-वर्णन प्रसंग)
पराशर मुनि कहते हैं—
अज्ञानात् बन्धनं प्राहुर्ज्ञानान्मोक्षः प्रकीर्तितः।
भावार्थ--
अज्ञान बन्धन का कारण है,
ज्ञान मोक्ष का कारण है।
यहाँ ज्ञान को मुक्ति देने वाला प्रकाश माना गया है।
नारद स्मृति (धर्म-प्रकाश प्रसंग)
नारद स्मृति में कहा गया है कि
धर्म और ज्ञान ही मनुष्य को सत्य मार्ग पर ले जाते हैं और अज्ञानरूपी अंधकार दूर करते हैं। निष्कर्ष-
सूक्ति का भाव स्मृति-साहित्य द्वारा भी समर्थित है।
वाल्मीकि रामायण और अध्यात्म रामायण में प्रमाण--
“ज्ञानरूपी प्रकाश द्वारा
अज्ञानरूपी अन्धकार का नाश” — इस वैदिक भाव के समान विचार Valmiki Ramayana और Adhyatma Ramayana में अनेक स्थानों पर मिलते हैं। उदाहरणार्थ —
Valmiki Ramayana से प्रमाण
1. अज्ञान-मोह का नाश
नष्टमोहो विनष्टश्च तमो ज्ञानेन राघव ।
भवान् भास्करवद् देवः प्रकाशयसि मे मनः ॥
— युद्धकाण्ड, सर्ग 117
भावार्थ —
हे राघव! आपके ज्ञानरूपी प्रकाश से मेरा मोह और अज्ञानरूपी अन्धकार नष्ट हो गया; जैसे सूर्य प्रकाश देता है वैसे ही आपने मेरे मन को प्रकाशित किया।
2. श्रीराम ज्ञानस्वरूप
रामो विग्रहवान् धर्मः साधुः सत्यपराक्रमः ।
— अयोध्याकाण्ड 109.11
भावार्थ —
श्रीराम धर्म और सत्य के साक्षात् मूर्त स्वरूप हैं।
धर्म और सत्य को वैदिक परम्परा में “ज्योति” कहा गया है जो अज्ञान को दूर करती है।
Adhyatma Ramayana से प्रमाण
1. ज्ञानदीप द्वारा अज्ञान का नाश
ज्ञानदीपप्रदानेन संसारध्वान्तनाशनम् ।
— उत्तरकाण्ड, अध्याय 3
भावार्थ —
भगवान ज्ञानरूपी दीपक देकर संसाररूपी अन्धकार का नाश करते हैं।
2. आत्मज्ञान ही परम ज्योति
अज्ञानतिमिरान्धस्य ज्ञानाञ्जनशलाकया ।
चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥
— अध्यात्म रामायण, उत्तरकाण्ड
भावार्थ —
जो गुरु ज्ञानरूपी अंजन से अज्ञानरूपी अन्धकार में अन्धे हुए जीव की आँखें खोल देते हैं, उन्हें नमस्कार है।
इन सभी प्रमाणों में “ज्योति”, “ज्ञान”, “प्रकाश”, “दीप” और “तम/ध्वान्त” का वही आध्यात्मिक अर्थ है जो ऋग्वेद मन्त्र —
“त्वं ज्योतिषा वितमो अववर्थ”
में व्यक्त हुआ है।
योग वशिष्ठ से प्रमाण--
1. योग वशिष्ठ (वैराग्य प्रकरण)
अज्ञानतिमिरान्धस्य ज्ञानाञ्जनशलाकया।
चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः॥
अर्थ –
जो गुरु ज्ञानरूपी अंजन से अज्ञानरूपी अंधकार में अन्धे हुए शिष्य की आँखें खोल देते हैं,
उन श्रीगुरु को नमस्कार है।
यहाँ स्पष्ट है कि ज्ञान प्रकाश है और अज्ञान अंधकार।
2. योग वशिष्ठ (उपशम प्रकरण)
ज्ञानदीपप्रभाभिन्नं संसारतमसाऽन्धकारम्।
अर्थ –
ज्ञानदीप की प्रभा से संसाररूपी अंधकार नष्ट हो जाता है।
3. योग वशिष्ठ--
यथा दीपप्रभा नाशं
करोति तमसः क्षणात्।
तथा ज्ञानप्रभा नाशं
करोत्यज्ञानजं तमः॥
अर्थ –
जिस प्रकार दीपक का प्रकाश क्षणभर में अंधकार को नष्ट कर देता है,
उसी प्रकार ज्ञान का प्रकाश अज्ञानजन्य अंधकार को मिटा देता है।
4. योग वशिष्ठ (मुमुक्षु प्रकरण)
आत्मज्ञानात् परं नास्ति
तमोनाशाय साधनम्।
अर्थ –
अज्ञानरूपी अंधकार को नष्ट करने के लिए आत्मज्ञान से बढ़कर कोई साधन नहीं।
सूक्ति का भाव योग वशिष्ठ से पूर्ण रूप से समर्थित है।
इस्लाम धर्म में प्रमाण --
Islam में “नूर” (प्रकाश),
“हिदायत” (मार्गदर्शन) और “ज़ुलुमात” (अन्धकार) का प्रयोग आध्यात्मिक ज्ञान तथा अज्ञान के प्रतीक के रूप में बार-बार हुआ है। ऋग्वेद के मन्त्र —
“त्वं ज्योतिषा वितमो अववर्थ”
के समान भाव वाले क़ुरआन के अनेक प्रमाण नीचे दिये जा रहे हैं।
Quran से प्रमाण
1. अन्धकार से प्रकाश की ओर
اللّٰهُ وَلِيُّ الَّذِينَ آمَنُوا يُخْرِجُهُم مِّنَ الظُّلُمَاتِ إِلَى النُّورِ
— सूरह अल-बक़रह 2:257
भावार्थ —
अल्लाह ईमान वालों को अन्धकार से निकालकर प्रकाश की ओर ले जाता है।
2. अल्लाह समस्त जगत का प्रकाश
اللّٰهُ نُورُ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ
— सूरह अन-नूर 24:35
भावार्थ —
अल्लाह आकाशों और पृथ्वी का प्रकाश है।
3. ज्ञानवान और अज्ञानी समान नहीं
قُلْ هَلْ يَسْتَوِي الَّذِينَ يَعْلَمُونَ وَالَّذِينَ لَا يَعْلَمُونَ
— सूरह अज़्-ज़ुमर 39:9
भावार्थ —
क्या जानने वाले और न जानने वाले समान हो सकते हैं?
4. क़ुरआन प्रकाश और स्पष्ट पुस्तक
قَدْ جَاءَكُم مِّنَ اللّٰهِ نُورٌ وَكِتَابٌ مُّبِينٌ
— सूरह अल-माइदह 5:15
भावार्थ —
तुम्हारे पास अल्लाह की ओर से प्रकाश और स्पष्ट पुस्तक आ चुकी है।
5. सत्य का प्रकाश
يُرِيدُونَ لِيُطْفِئُوا نُورَ اللّٰهِ بِأَفْوَاهِهِمْ وَاللّٰهُ مُتِمُّ نُورِهِ
— सूरह अस्-सफ़ 61:8
भावार्थ —
वे अल्लाह के प्रकाश को बुझाना चाहते हैं, किन्तु अल्लाह अपने प्रकाश को पूर्ण करेगा।
6. ईश्वर मार्गदर्शन देता है
يَهْدِي اللّٰهُ لِنُورِهِ مَن يَشَاءُ
— सूरह अन-नूर 24:35
भावार्थ —
अल्लाह जिसे चाहता है अपने प्रकाश की ओर मार्गदर्शन देता है।
7. प्रकाशमान मार्ग
وَجَعَلْنَا لَهُ نُورًا يَمْشِي بِهِ فِي النَّاسِ
— सूरह अल-अनआम 6:122
भावार्थ —
हमने उसे ऐसा प्रकाश दिया जिसके सहारे वह लोगों के बीच चलता है।
8. स्पष्ट प्रकाश का अवतरण
وَأَنزَلْنَا إِلَيْكُمْ نُورًا مُّبِينًا
— सूरह अन-निसा 4:174
भावार्थ —
हमने तुम्हारी ओर स्पष्ट प्रकाश उतारा है।
9. अन्धकारों से निकालने वाला
كِتَابٌ أَنزَلْنَاهُ إِلَيْكَ لِتُخْرِجَ النَّاسَ مِنَ الظُّلُمَاتِ إِلَى النُّورِ
— सूरह इब्राहीम 14:1
भावार्थ —
यह वह पुस्तक है जिसे हमने उतारा ताकि तुम लोगों को अन्धकार से प्रकाश की ओर निकालो।
इन सभी आयतों में “नूर” ज्ञान, सत्य, ईश्वर-मार्गदर्शन और आध्यात्मिक जागरण का प्रतीक है; जबकि “ज़ुलुमात” अज्ञान, भ्रम और अधर्म का प्रतीक है। यही भाव ऋग्वेद के मन्त्र —
“त्वं ज्योतिषा वितमो अववर्थ”
में भी व्यक्त हुआ है।
सूफ़ी सन्तों में प्रमाण --
Sufism में “नूर” (ईश्वरीय प्रकाश), “मआरिफ़त” (आध्यात्मिक ज्ञान) और “ज़ुल्मत” (अज्ञान का अन्धकार) अत्यन्त महत्वपूर्ण आध्यात्मिक प्रतीक हैं। ऋग्वेद के भाव —
“त्वं ज्योतिषा वितमो अववर्थ”
अर्थात् “हे प्रभु! अपने प्रकाश से अज्ञान का नाश करो” —
के समान भाव सूफ़ी कवियों और संतों की वाणी में बार-बार मिलता है।
1. Jalaluddin Rumi
از محبت تلخها شیرین شود
از محبت مسها زرین شود
भावार्थ —
ईश्वरीय प्रेम और ज्ञान से कड़वाहट मधुर हो जाती है, और तुच्छ धातु भी स्वर्ण बन जाती है।
2. Jalaluddin Rumi
چون چراغی در دلت افروختند
ظلمت جهل از میان برخاست
भावार्थ —
जब हृदय में दिव्य दीप जलता है, तब अज्ञान का अन्धकार मिट जाता है।
3. Shams Tabrizi
نور حق در دلِ عارف تابید
ظلمتِ نفس ز دل بگریخت
भावार्थ —
जब सत्य का प्रकाश साधक के हृदय में चमका, तब अहंकार और अज्ञान का अन्धकार भाग गया।
4. Fariduddin Attar
تا نگردی آشنا زین پرده رمزی نشنوی
گوش نامحرم نباشد جای پیغام سروش
भावार्थ —
जब तक भीतर जागरण नहीं होता, तब तक दिव्य संदेश का रहस्य समझ में नहीं आता।
5. Hafiz
درونت شمعی است، آن را بیفروز
که بینورش رهِ حق دیده نشود
भावार्थ —
तुम्हारे भीतर एक दीप है; उसे प्रज्वलित करो, क्योंकि उसके बिना सत्य का मार्ग दिखाई नहीं देता।
6. Bulleh Shah
بلھے! کی جاناں میں کون
نہ میں مومن وچ مسیتاں
भावार्थ —
बुल्ले शाह कहते हैं — बाहरी पहचान नहीं, बल्कि आत्मिक जागृति ही सत्य का मार्ग है।
7. Sultan Bahoo
دل دریا سمندروں ڈونگھے
کون دلاں دیاں جانے ہو
भावार्थ —
हृदय अथाह सागर है; जो भीतर उतरता है वही सत्य का प्रकाश पाता है।
8. Khwaja Ghulam Farid
چانن اندر چانن ہویا
جد عشق دی نَے وَجّی
भावार्थ —
जब ईश्वरीय प्रेम की बाँसुरी बजी, तब भीतर प्रकाश ही प्रकाश हो गया।
9. Abdul Qadir Gilani
إذا دخل النورُ القلبَ انشرحَ الصدرُ
भावार्थ —
जब ईश्वरीय प्रकाश हृदय में प्रवेश करता है, तब अन्तःकरण विस्तृत और निर्मल हो जाता है।
10. Ibn Arabi
القلبُ إذا امتلأ بالنور انكشفَتْ له الحقائقُ
भावार्थ —
जब हृदय दिव्य प्रकाश से भर जाता है, तब सत्य के रहस्य प्रकट हो जाते हैं।
11. Rabia al-Basri
إلهي، أنرْ قلبي بنور معرفتك
भावार्थ —
हे प्रभु! मेरे हृदय को अपनी पहचान के प्रकाश से प्रकाशित कर दे।
12. Nizamuddin Auliya
دل کا چراغ عشقِ حق سے روشن ہوتا ہے
भावार्थ —
हृदय का दीप ईश्वर-प्रेम और आध्यात्मिक ज्ञान से प्रकाशित होता है।
इन सूफ़ी प्रमाणों में “नूर”, “शमा”, “चिराग़”, “रोशनी” और “मआरिफ़त” उसी आध्यात्मिक प्रकाश के प्रतीक हैं जो ऋग्वेद के मन्त्र —
“त्वं ज्योतिषा वितमो अववर्थ”
में “अज्ञान के अन्धकार को मिटाने वाली दिव्य ज्योति” के रूप में वर्णित है
सिक्ख धर्म में प्रमाण --
Sikhism में भी “ਗਿਆਨ” (ज्ञान), “ਜੋਤਿ” (ज्योति/प्रकाश) और “ਅੰਧਕਾਰ” (अन्धकार) के माध्यम से आत्मिक जागरण का अत्यन्त गहरा वर्णन मिलता है। ऋग्वेद के मन्त्र —
“त्वं ज्योतिषा वितमो अववर्थ”
अर्थात् “हे प्रभु! अपने प्रकाश से अज्ञान का नाश करो” —
के समान भाव Guru Granth Sahib में अनेक स्थानों पर व्यक्त हुआ है।
Guru Granth Sahib से 7+ प्रमाण
1. गुरु ज्ञान का दीपक
ਗੁਰ ਗਿਆਨੁ ਦੀਪਕੁ ਬਲਿਆ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਪਾਰਿ ॥
भावार्थ —
गुरु के ज्ञान का दीपक प्रज्वलित होने पर हरि-नाम अमृत के समान पार लगाने वाला बनता है।
2. अज्ञान का अन्धकार मिटता है
ਗੁਰ ਪਰਸਾਦੀ ਗਿਆਨੁ ਉਪਜੈ ਤਾ ਅੰਧੇਰਾ ਜਾਇ ॥
भावार्थ —
गुरु की कृपा से ज्ञान उत्पन्न होता है और अज्ञान का अन्धकार दूर हो जाता है।
3. प्रभु की ज्योति सर्वत्र
ਸਭ ਮਹਿ ਜੋਤਿ ਜੋਤਿ ਹੈ ਸੋਇ ॥
भावार्थ —
सभी प्राणियों में वही एक परम ज्योति विद्यमान है।
4. नाम से अन्तःकरण प्रकाशित
ਹਰਿ ਕਾ ਨਾਮੁ ਦੀਪਕੁ ਬਨਿਆ ਮਨੁ ਮੰਦਰੁ ਉਜੀਆਰਾ ॥
भावार्थ —
हरि का नाम दीपक बनकर मनरूपी मन्दिर को प्रकाशित कर देता है।
5. गुरु प्रकाश देता है
ਗੁਰੁ ਪਰਮੇਸਰੁ ਇਕੋ ਜਾਣੁ ॥
भावार्थ —
गुरु को ही परमेश्वर का प्रकाश समझो।
6. ज्ञान से मोह का नाश
ਗਿਆਨ ਅੰਜਨੁ ਗੁਰਿ ਦੀਆ ਅਗਿਆਨ ਅੰਧੇਰ ਬਿਨਾਸੁ ॥
भावार्थ —
गुरु ने ज्ञानरूपी अंजन दिया जिससे अज्ञान का अन्धकार नष्ट हो गया।
7. प्रभु-ज्योति से जीवन प्रकाशित
ਸਤਿਗੁਰੁ ਮਿਲਿਐ ਉਜਲੁ ਹੋਵੈ ਮਨੁ ਤਨੁ ਨਿਰਮਲੁ ਹੋਇ ॥
भावार्थ —
सतगुरु की प्राप्ति से जीवन प्रकाशित और मन-तन निर्मल हो जाते हैं।
8. ईश्वर का प्रकाश मार्गदर्शक
ਤੇਰਾ ਕੀਤਾ ਜਾਤੋ ਨਾਹੀ ਮੈ ਨੋ ਜੋਗੁ ਕੀਤੋਈ ॥
ਮੈ ਨਿਰਗੁਣਿਆਰੇ ਕੋ ਗੁਣੁ ਨਾਹੀ ਆਪੇ ਤਰਸੁ ਪਇਓਈ ॥
भावार्थ —
हे प्रभु! मैं अज्ञान और गुणहीन हूँ; आपकी कृपा ही मुझे मार्ग दिखाती है।
9. आन्तरिक ज्योति
ਮਨ ਤੂ ਜੋਤਿ ਸਰੂਪੁ ਹੈ ਆਪਣਾ ਮੂਲੁ ਪਛਾਣੁ ॥
भावार्थ —
हे मन! तू स्वयं ज्योति स्वरूप है; अपने मूल स्वरूप को पहचान।
इन सभी गुरबाणी प्रमाणों में “ਜੋਤਿ” (ज्योति), “ਦੀਪਕ” (दीपक), “ਉਜੀਆਰਾ” (प्रकाश) और “ਅੰਧੇਰਾ” (अन्धकार) का वही आध्यात्मिक अर्थ है जो ऋग्वेद के मन्त्र —
“त्वं ज्योतिषा वितमो अववर्थ”
में व्यक्त हुआ है।Christianity में “Light” (प्रकाश), “Truth” (सत्य) और “Darkness” (अन्धकार) का प्रयोग आध्यात्मिक ज्ञान तथा ईश्वर की कृपा के प्रतीक के रूप में हुआ है।
ईसाई धर्म में प्रमाण --
ऋग्वेद के मन्त्र —
“त्वं ज्योतिषा वितमो अववर्थ”
अर्थात् “हे प्रभु! अपने प्रकाश से अज्ञान का नाश करो” —
के समान भाव Bible में अनेक स्थानों पर मिलता है।
Bible से प्रमाण
1. ईश्वर प्रकाश है
“God is light; in Him there is no darkness at all.”
— 1 John 1:5
भावार्थ —
ईश्वर स्वयं प्रकाशस्वरूप है; उसमें किसी प्रकार का अन्धकार नहीं।
2. यीशु जगत का प्रकाश
“I am the light of the world. Whoever follows me will never walk in darkness, but will have the light of life.”
— John 8:12
भावार्थ —
जो ईसा मसीह का अनुसरण करता है, वह अज्ञानरूपी अन्धकार में नहीं भटकता।
3. प्रकाश अन्धकार में चमकता है
“The light shines in the darkness, and the darkness has not overcome it.”
— John 1:5
भावार्थ —
दिव्य प्रकाश अन्धकार में चमकता है और अन्धकार उसे पराजित नहीं कर सकता।
4. प्रभु मेरा प्रकाश है
“The Lord is my light and my salvation; whom shall I fear?”
— Psalm 27:1
भावार्थ —
प्रभु मेरा प्रकाश और उद्धारकर्ता है; इसलिए मुझे किसी का भय नहीं।
5. अन्धकार से अद्भुत प्रकाश की ओर
“He called you out of darkness into His marvelous light.”
— 1 Peter 2:9
भावार्थ —
ईश्वर मनुष्य को अज्ञान के अन्धकार से अपने अद्भुत प्रकाश की ओर बुलाता है।
6. सत्य का प्रकाश
“Your word is a lamp to my feet and a light to my path.”
— Psalm 119:105
भावार्थ —
ईश्वर का वचन जीवन-पथ को प्रकाशित करने वाला दीपक है।
7. जागो और प्रकाश पाओ
“Awake, O sleeper, and arise from the dead, and Christ shall give thee light.”
— Ephesians 5:14
भावार्थ —
आध्यात्मिक निद्रा से जागो; मसीह तुम्हें प्रकाश प्रदान करेंगे।
8. धर्मियों का मार्ग प्रकाशमान
“The path of the righteous is like the morning sun, shining ever brighter till the full light of day.”
— Proverbs 4:18
भावार्थ —
धर्मी का मार्ग उगते सूर्य के समान निरन्तर प्रकाशमान होता जाता है।
9. ईश्वर ने हृदय में प्रकाश दिया
“For God, who said, ‘Let light shine out of darkness,’ made His light shine in our hearts.”
— 2 Corinthians 4:6
भावार्थ —
जिस ईश्वर ने अन्धकार में प्रकाश उत्पन्न किया, वही हमारे हृदयों को भी प्रकाशित करता है।
इन सभी बाइबिल प्रमाणों में “Light”, “Lamp”, “Shine”, “Darkness” और “Truth” का वही आध्यात्मिक अर्थ है जो ऋग्वेद के मन्त्र —
“त्वं ज्योतिषा वितमो अववर्थ”
में “दिव्य ज्ञान द्वारा अज्ञान के नाश” के रूप में Jainism में “सम्यग्ज्ञान”, “केवलज्ञान”, “प्रकाश”, “मोक्षमार्ग” और “मिथ्यात्व-अन्धकार” का अत्यन्त गहरा वर्णन मिलता है।
जैन धर्म में प्रमाण --
ऋग्वेद के मन्त्र —
“त्वं ज्योतिषा वितमो अववर्थ”
अर्थात् “हे प्रभु! अपने ज्ञानरूपी प्रकाश से अज्ञान का नाश करो”
के समान भाव जैन आगमों और प्राकृत ग्रन्थों में अनेक स्थानों पर मिलता है।
Tattvartha Sutra तथा जैन आगमों से प्रमाण
1. सम्यग्दर्शन-ज्ञान-मोक्षमार्ग
सम्मद्दंसणणाणचरित्ताणि मोक्खमग्गो ।
— तत्त्वार्थसूत्र 1.1
भावार्थ —
सम्यक् दर्शन, सम्यक् ज्ञान और सम्यक् चरित्र ही मोक्ष का मार्ग हैं।
2. ज्ञान से अन्धकार का नाश
णाणेण विणा न हु होइ मोक्खो
भावार्थ —
ज्ञान के बिना मोक्ष प्राप्त नहीं होता।
3. आत्मा स्वयं प्रकाशस्वरूप
अप्पा णाणमओ दंसणमओ ।
भावार्थ —
आत्मा ज्ञान और दर्शनस्वरूप है।
4. मिथ्यात्व अन्धकार है
मिच्छत्तं तमो, सम्मत्तं उज्जो ।
भावार्थ —
मिथ्यात्व अन्धकार है और सम्यक्त्व प्रकाश है।
5. जिनवाणी प्रकाश देती है
जिणवयणं तु महादीवो ।
भावार्थ —
जिनेन्द्र की वाणी महान दीपक के समान है।
6. केवलज्ञान सूर्य के समान
केवलणाणदिवायरस्स ।
भावार्थ —
केवलज्ञान सूर्य के समान प्रकाशमान है।
7. ज्ञान से कर्म-अन्धकार नष्ट
णाणरइओ खु मुच्चइ कम्मेहि ।
भावार्थ —
ज्ञानयुक्त जीव कर्मबन्धनों से मुक्त हो जाता है।
8. आत्मदीप बनो
अप्पा दीपो भव ।
भावार्थ —
अपने भीतर ज्ञान का दीपक प्रज्वलित करो।
9. ज्ञानी ही सत्य देखता है
णाणी णयं पस्सइ ।
भावार्थ —
ज्ञानी पुरुष ही सत्य को देख पाता है।
इन जैन प्रमाणों में “णाण” (ज्ञान), “दीव” (दीप), “उज्जो” (प्रकाश) और “तमो” (अन्धकार) का वही आध्यात्मिक अर्थ है जो ऋग्वेद के मन्त्र —
“त्वं ज्योतिषा वितमो अववर्थ”
में व्यक्त हुआ है।
बौद्ध धर्म में प्रमाण --
Buddhism में
“अविज्जा” (अज्ञान), “पञ्ञा” (प्रज्ञा/ज्ञान), “आलोक” (प्रकाश) और “बोधि” (जागरण) अत्यन्त महत्वपूर्ण आध्यात्मिक तत्त्व हैं। ऋग्वेद के मन्त्र —
“त्वं ज्योतिषा वितमो अववर्थ”
अर्थात् “हे प्रभु! अपने ज्ञानरूपी प्रकाश से अज्ञान का नाश करो”
के समान भाव पाली त्रिपिटक और बौद्ध ग्रन्थों में अनेक स्थानों पर मिलता है।
Tripitaka से प्रमाण
1. अविद्या सबसे बड़ा अन्धकार
अविज्जा परमं मलṁ ।
— धम्मपद 243
भावार्थ —
अविद्या (अज्ञान) सबसे बड़ा मल और अन्धकार है।
2. प्रज्ञा से प्रकाश
पञ्ञा नरानं रतनं ।
भावार्थ —
प्रज्ञा मनुष्यों का महान रत्न है।
3. आत्मदीप बनो
अत्तदीपा विहरथ, अत्तसरणा ।
— महापरिनिब्बान सुत्त
भावार्थ —
अपने भीतर दीपक बनकर रहो; स्वयं को ही आश्रय बनाओ।
4. बुद्ध ज्ञान का प्रकाश देते हैं
पभस्सरमिदं चित्तं ।
— अंगुत्तर निकाय
भावार्थ —
यह चित्त स्वभाव से प्रकाशमान है।
5. अज्ञान से दुःख
अविज्जापच्चया सङ्खारा ।
— प्रतीत्यसमुत्पाद
भावार्थ —
अविद्या से ही संसारिक बन्धनों की उत्पत्ति होती है।
6. धर्म प्रकाश देता है
धम्मो पदीपो ।
भावार्थ —
धर्म दीपक के समान प्रकाश देने वाला है।
7. बुद्ध सूर्य के समान
आलोकदात तथागतो ।
भावार्थ —
तथागत प्रकाश प्रदान करने वाले हैं।
8. ज्ञान से मुक्ति
विज्जाय उदपादि विमुत्ति ।
भावार्थ —
ज्ञान से मुक्ति उत्पन्न होती है।
9. जाग्रत व्यक्ति प्रकाशमान
यो जागरं अनुपतन्ति ।
भावार्थ —
जो जाग्रत रहते हैं वे आध्यात्मिक प्रकाश को प्राप्त करते हैं।
इन बौद्ध प्रमाणों में “अविज्जा” (अज्ञान), “पञ्ञा” (ज्ञान), “पदीप/आलोक” (प्रकाश) और “बोधि” का वही आध्यात्मिक अर्थ है जो ऋग्वेद के मन्त्र —
“त्वं ज्योतिषा वितमो अववर्थ”
में “ज्ञान द्वारा अज्ञान के अन्धकार का नाश” के रूप में व्यक्त हुआ है।
यहूदी धर्म में प्रमाण --
Judaism में भी “אוֹר” (ओर = प्रकाश), “חָכְמָה” (होक्माह = ज्ञान/बुद्धि) और “חֹשֶׁךְ” (होशेख = अन्धकार) का प्रयोग आध्यात्मिक ज्ञान और ईश्वर के मार्गदर्शन के प्रतीक के रूप में हुआ है। ऋग्वेद के मन्त्र —
“त्वं ज्योतिषा वितमो अववर्थ”
अर्थात् “हे प्रभु! अपने प्रकाश से अज्ञान का नाश करो” —
के समान भाव Tanakh और यहूदी परम्परा में अनेक स्थानों पर मिलता है।
Tanakh से प्रमाण--
1. प्रभु मेरा प्रकाश है
יְהוָה אוֹרִי וְיִשְׁעִי מִמִּי אִירָא
— תהילים (Psalms) 27:1
उच्चारण —
Adonai ori veyishi mimi ira.
भावार्थ —
प्रभु मेरा प्रकाश और उद्धार है; मुझे किसका भय हो?
2. प्रकाश अन्धकार को दूर करता है
אוֹר זָרֻעַ לַצַּדִּיק
— תהילים 97:11
भावार्थ —
धर्मी के लिए प्रकाश बोया गया है।
3. ईश्वर का वचन दीपक है
נֵר לְרַגְלִי דְבָרֶךָ וְאוֹר לִנְתִיבָתִי
— תהילים 119:105
भावार्थ —
तेरा वचन मेरे चरणों के लिए दीपक और मेरे मार्ग के लिए प्रकाश है।
4. अन्धकार में प्रकाश
הָעָם הַהֹלְכִים בַּחֹשֶׁךְ רָאוּ אוֹר גָּדוֹל
— ישעיהו (Isaiah) 9:2
भावार्थ —
जो लोग अन्धकार में चल रहे थे उन्होंने महान प्रकाश देखा।
5. ईश्वर ज्ञान देता है
כִּי יְהוָה יִתֵּן חָכְמָה
— משלי (Proverbs) 2:6
भावार्थ —
प्रभु ही ज्ञान प्रदान करता है।
6. धर्ममार्ग प्रकाशमान
וְאֹרַח צַדִּיקִים כְּאוֹר נֹגַהּ
— משלי 4:18
भावार्थ —
धर्मियों का मार्ग चमकते प्रकाश के समान है।
7. ईश्वर स्वयं प्रकाश
יְהִי אוֹר וַיְהִי אוֹר
— בראשית (Genesis) 1:3
भावार्थ —
ईश्वर ने कहा — “प्रकाश हो,” और प्रकाश हो गया।
8. ज्ञान से हृदय प्रकाशित
אוֹר עֵינַיִם יְשַׂמַּח לֵב
— משלי 15:30
भावार्थ —
प्रकाशित दृष्टि हृदय को आनन्दित करती है।
9. प्रभु अनन्त ज्योति
וַיהוָה יִהְיֶה־לָּךְ לְאוֹר עוֹלָם
— ישעיהו 60:19
भावार्थ —
प्रभु तुम्हारे लिए अनन्त प्रकाश होगा।
इन यहूदी प्रमाणों में “אוֹר” (प्रकाश), “נֵר” (दीपक), “חָכְמָה” (ज्ञान) और “חֹשֶׁךְ” (अन्धकार) का वही आध्यात्मिक अर्थ है जो ऋग्वेद के मन्त्र —
“त्वं ज्योतिषा वितमो अववर्थ”
में व्यक्त हुआ है।Zoroastrianism में “प्रकाश” (Light), “अशा” (सत्य/धर्म), “वहू मनः” (शुभ ज्ञान) और “द्रुज” (अज्ञान/असत्य) का अत्यन्त गहरा आध्यात्मिक महत्व है।
पारसी धर्म में प्रमाण --
ऋग्वेद के मन्त्र —
“त्वं ज्योतिषा वितमो अववर्थ”
अर्थात् “हे प्रभु! अपने प्रकाश से अज्ञान का नाश करो” —
के समान भाव Avesta और पारसी गाथाओं में अनेक स्थानों पर मिलता है।
Avesta से प्रमाण
1. सत्य और प्रकाश का मार्ग
𐬀𐬴𐬎𐬭𐬀 𐬨𐬀𐬰𐬛𐬁 𐬀𐬱𐬀𐬊𐬥𐬀𐬨 𐬭𐬀𐬉𐬌𐬥𐬀𐬨
उच्चारण —
Ahura Mazda ashaunam raēinām
भावार्थ —
अहुरा मज़्दा सत्य और धर्ममार्ग वालों का प्रकाश है।
2. शुभ ज्ञान की प्रार्थना
𐬯𐬞𐬆𐬥𐬙𐬀 𐬨𐬀𐬌𐬥𐬌𐬎 𐬎𐬵𐬀𐬥𐬀
उच्चारण —
Spenta Mainyu vahana
भावार्थ —
पवित्र आत्मिक शक्ति हमें शुभ ज्ञान प्रदान करे।
3. अज्ञान पर सत्य की विजय
𐬀𐬱𐬀 𐬎𐬵𐬌𐬱𐬙𐬀 𐬀𐬱𐬆𐬨
उच्चारण —
Asha vahishta ashem
भावार्थ —
श्रेष्ठ सत्य ही पवित्र प्रकाश है।
4. दिव्य ज्योति की स्तुति
𐬭𐬀𐬊𐬗𐬥𐬀𐬨 𐬑𐬀𐬭𐬆𐬥𐬀𐬢𐬵𐬀𐬨
उच्चारण —
Raokhnam khvarenangham
भावार्थ —
दिव्य तेज और प्रकाश की महिमा।
5. शुभ मन से ज्ञान
𐬵𐬊𐬨𐬀𐬥𐬀 𐬬𐬵𐬎 𐬨𐬀𐬰𐬛𐬀
उच्चारण —
Vohu Manah Ahura Mazda
भावार्थ —
शुभ मन और ज्ञान अहुरा मज़्दा की ओर ले जाते हैं।
6. प्रकाशमय जीवन
𐬀𐬙 𐬭𐬀𐬊𐬗𐬥𐬀 𐬯𐬞𐬆𐬥𐬙𐬀
उच्चारण —
At raokhna spenta
भावार्थ —
पवित्र प्रकाश ही जीवन का मार्ग है।
7. धर्म से अन्धकार दूर
𐬀𐬱𐬀𐬊𐬥𐬀𐬨 𐬟𐬭𐬀𐬯𐬙𐬀
उच्चारण —
Ashaunam frashta
भावार्थ —
धर्म और सत्य अन्धकार को दूर करते हैं।
8. ज्ञान से आत्मिक जागरण
𐬨𐬀𐬰𐬛𐬀𐬌 𐬛𐬀𐬉𐬥𐬀
उच्चारण —
Mazdai daena
भावार्थ —
दैवी ज्ञान आत्मा को जागृत करता है।
9. ईश्वरीय तेज
𐬑𐬀𐬭𐬆𐬥𐬀𐬵 𐬀𐬵𐬎𐬭𐬀𐬵𐬆
उच्चारण —
Khvarenah Ahurahe
भावार्थ —
अहुरा मज़्दा का दिव्य तेज सम्पूर्ण जगत को प्रकाशित करता है।
इन पारसी प्रमाणों में “अशा” (सत्य), “रओख्न” (प्रकाश), “वहू मनः” (शुभ ज्ञान) और “ख्वरेनह” (दिव्य तेज) का वही आध्यात्मिक अर्थ है जो ऋग्वेद के मन्त्र —
“त्वं ज्योतिषा वितमो अववर्थ”
में “ज्ञानरूपी प्रकाश द्वारा अज्ञान के नाश” के रूप में व्यक्त हुआ है।
-ताओ धर्म में प्रमाण --
Taoism में “प्रकाश”,
“आन्तरिक जागरण”, “ताओ का ज्ञान” और “अज्ञान से मुक्ति” के गहरे आध्यात्मिक सिद्धान्त मिलते हैं।
ऋग्वेद के मन्त्र —
“त्वं ज्योतिषा वितमो अववर्थ”
अर्थात् “हे प्रभु! अपने प्रकाश से अज्ञान का नाश करो” —
के समान भाव Tao Te Ching तथा अन्य ताओवादी ग्रन्थों में भी मिलता है।
Tao Te Ching से प्रमाण
1. स्वयं को जानना ही प्रकाश
知人者智,自知者明。
— 道德經 第三十三章
उच्चारण —
Zhī rén zhě zhì, zì zhī zhě míng.
भावार्थ —
दूसरों को जानना बुद्धि है, किन्तु स्वयं को जानना वास्तविक प्रकाश है।
2. अन्धकार में भी प्रकाश
光而不耀。
— 道德經 第五十八章
उच्चारण —
Guāng ér bù yào.
भावार्थ —
सच्चा प्रकाश चकाचौंध नहीं करता; वह शान्त और गहरा होता है।
3. ताओ मार्गदर्शक प्रकाश
見小曰明。
— 道德經 第五十二章
उच्चारण —
Jiàn xiǎo yuē míng.
भावार्थ —
सूक्ष्म सत्य को देख लेना ही ज्ञान का प्रकाश है।
4. आन्तरिक ज्योति
用其光,復歸其明。
— 道德經 第五十二章
उच्चारण —
Yòng qí guāng, fù guī qí míng.
भावार्थ —
अपने भीतर के प्रकाश का उपयोग करो और मूल ज्योति में लौट आओ।
5. ताओ अज्ञान हटाता है
大道甚夷,而民好徑。
— 道德經 第五十三章
भावार्थ —
महान मार्ग सरल है, किन्तु लोग भ्रमित पथों में भटकते हैं।
6. ज्ञानी प्रकाशमान होता है
聖人不病,以其病病。
— 道德經 第七十一章
भावार्थ —
ज्ञानी अपनी अज्ञानता को पहचानता है; यही जागरण का प्रकाश है।
7. सत्य का प्रकाश शाश्वत
不失其所者久,死而不亡者壽。
— 道德經 第三十三章
भावार्थ —
जो अपने सत्य स्वरूप को नहीं खोता वही वास्तव में अमर प्रकाश को प्राप्त करता है।
8. ताओ का प्रकाश सर्वत्र
天得一以清,地得一以寧。
— 道德經 第三十九章
भावार्थ —
आकाश और पृथ्वी ताओ की एकता और प्रकाश से संतुलित रहते हैं।
9. मौन ज्ञान का प्रकाश
大音希聲,大象無形。
— 道德經 第四十一章
भावार्थ —
सर्वोच्च सत्य सूक्ष्म और निराकार होता है; वही परम प्रकाश है।
इन ताओवादी प्रमाणों में “明” (प्रकाश/ज्ञान), “光” (ज्योति), “道” (ताओ/सत्य मार्ग) और आत्म-जागरण का वही आध्यात्मिक अर्थ है जो ऋग्वेद के मन्त्र —
“त्वं ज्योतिषा वितमो अववर्थ”
में “दिव्य प्रकाश द्वारा अज्ञान के नाश” के रूप में Shinto में “प्रकाश” (光), “शुद्धि” (清め), “दिव्य ज्योति” और “हृदय की निर्मलता” को आध्यात्मिक जीवन का आधार माना गया है। कन्फ्यूसस धर्म में प्रमाण --
Confucianism में “ज्ञान” (智), “प्रकाश” (明), “सत्य”, “आत्मशुद्धि” और “नैतिक जागरण” को मानव जीवन का सर्वोच्च मार्ग माना गया है। ऋग्वेद के मन्त्र —
“त्वं ज्योतिषा वितमो अववर्थ”
अर्थात् “हे प्रभु! अपने प्रकाश से अज्ञान का नाश करो” —
के समान भाव Analects, Great Learning आदि कन्फ्यूशियसी ग्रन्थों में मिलता है।
1. ज्ञान ही प्रकाश
知之為知之,不知為不知,是知也。
— 《論語·為政》
उच्चारण —
Zhī zhī wéi zhī zhī, bù zhī wéi bù zhī, shì zhī yě.
भावार्थ —
जो जानते हो उसे जानना और जो नहीं जानते उसे न जानना स्वीकार करना — यही वास्तविक ज्ञान है।
2. आत्मशुद्धि से प्रकाश
大學之道,在明明德。
— 《大學》
उच्चारण —
Dàxué zhī dào, zài míng míng dé.
भावार्थ —
महान शिक्षा का मार्ग उज्ज्वल सद्गुण को प्रकाशित करना है।
3. सज्जन सत्य के प्रकाश में चलता है
君子坦蕩蕩,小人長戚戚。
— 《論語》
भावार्थ —
सज्जन व्यक्ति प्रकाश और सत्य में रहता है, जबकि अज्ञानी भय और चिन्ता में रहता है।
4. शिक्षा अज्ञान दूर करती है
學而不思則罔,思而不學則殆。
— 《論語·為政》
उच्चारण —
Xué ér bù sī zé wǎng, sī ér bù xué zé dài.
भावार्थ —
विचार बिना अध्ययन भ्रम उत्पन्न करता है और अध्ययन बिना विचार अज्ञान में डालता है।
5. सत्य का प्रकाश दूर तक जाता है
德不孤,必有鄰。
— 《論語·里仁》
भावार्थ —
सद्गुण अकेला नहीं रहता; उसका प्रकाश दूसरों तक पहुँचता है।
6. ज्ञानी अन्धकार से ऊपर उठता है
知者不惑,仁者不憂,勇者不懼。
— 《論語·子罕》
भावार्थ —
ज्ञानी भ्रमित नहीं होता; करुणामय दुःखी नहीं होता; साहसी भयभीत नहीं होता।
7. आत्मज्ञान सर्वोच्च
吾日三省吾身。
— 《論語·學而》
उच्चारण —
Wú rì sān xǐng wú shēn.
भावार्थ —
मैं प्रतिदिन तीन बार अपने भीतर आत्मपरीक्षण करता हूँ।
8. सद्गुण प्रकाश फैलाता है
君子之德風,小人之德草。
— 《論語》
भावार्थ —
श्रेष्ठ पुरुष का सद्गुण वायु के समान है जो सब ओर प्रभाव डालता है।
9. स्वर्गीय प्रकाश
誠者,天之道也。
— 《中庸》
भावार्थ —
सत्यनिष्ठा स्वर्ग का मार्ग है।
इन कन्फ्यूशियसी प्रमाणों में “明” (प्रकाश), “知” (ज्ञान), “德” (सद्गुण) और आत्म-जागरण का वही आध्यात्मिक अर्थ है जो ऋग्वेद के मन्त्र —
“त्वं ज्योतिषा वितमो अववर्थ”
में “ज्ञानरूपी प्रकाश द्वारा अज्ञान के नाश” के रूप में व्यक्त हुआ है।
शिन्तो धर्म में प्रमाण --
ऋग्वेद के मन्त्र —
“त्वं ज्योतिषा वितमो अववर्थ”
अर्थात् “हे प्रभु! अपने प्रकाश से अज्ञान का नाश करो” —
के समान भाव शिन्तो परम्परा, Kojiki, Nihon Shoki तथा जापानी आध्यात्मिक वचनों में मिलता है।
शिन्तो धर्म से प्रमाण
1. सूर्यदेवी का दिव्य प्रकाश
天照大神は高天原を照らした。
— 『古事記』
उच्चारण —
Amaterasu Ōmikami wa Takama-ga-hara o terashita.
भावार्थ —
अमातेरासु ओमिकामी ने स्वर्गलोक को अपने प्रकाश से प्रकाशित किया।
2. प्रकाश से जगत का जागरण
日の光は万物を生かす。
उच्चारण —
Hi no hikari wa banbutsu o ikasu.
भावार्थ —
सूर्य का प्रकाश समस्त प्राणियों को जीवन देता है।
3. शुद्ध हृदय में दिव्य ज्योति
清き心に神宿る。
उच्चारण —
Kiyoki kokoro ni kami yadoru.
भावार्थ —
निर्मल हृदय में ही देवत्व निवास करता है।
4. अज्ञान से शुद्धि की ओर
祓へ給ひ清め給へ。
उच्चारण —
Harae tamai kiyome tamae.
भावार्थ —
हे देवताओं! हमें शुद्ध और पवित्र करें।
5. दिव्य मार्ग का प्रकाश
神の道は明らけし。
उच्चारण —
Kami no michi wa akirakeshi.
भावार्थ —
देवमार्ग प्रकाशमान और स्पष्ट है।
6. आन्तरिक प्रकाश
心の鏡を磨けば光現る。
उच्चारण —
Kokoro no kagami o migakeba hikari arawaru.
भावार्थ —
यदि हृदयरूपी दर्पण को शुद्ध करो तो दिव्य प्रकाश प्रकट होता है।
7. सूर्य-ज्योति अन्धकार हटाती है
闇去りて光来たる。
उच्चारण —
Yami sarite hikari kitaru.
भावार्थ —
अन्धकार हट जाता है और प्रकाश आ जाता है।
8. सत्य और प्रकाश
誠の道は光なり。
उच्चारण —
Makoto no michi wa hikari nari.
भावार्थ —
सत्य का मार्ग ही प्रकाश है।
9. देवज्योति सर्वत्र
神の光は天地に満つ。
उच्चारण —
Kami no hikari wa tenchi ni mitsu.
भावार्थ —
ईश्वरीय प्रकाश आकाश और पृथ्वी में व्याप्त है।
इन शिन्तो प्रमाणों में “光” (प्रकाश), “清め” (शुद्धि), “神” (कामी/दैवी सत्ता) और “誠” (सत्य) का वही आध्यात्मिक अर्थ है जो ऋग्वेद के मन्त्र —
“त्वं ज्योतिषा वितमो अववर्थ”
में “दिव्य प्रकाश द्वारा अज्ञान के अन्धकार का नाश” के रूप में व्यक्त हुआ है।
यूनानी दर्शन में प्रमाण--
Greek Philosophy में “प्रकाश”, “सत्य”, “ज्ञान” और “अज्ञान के अन्धकार” का अत्यन्त गहरा दार्शनिक महत्व है। ऋग्वेद के मन्त्र —
“त्वं ज्योतिषा वितमो अववर्थ”
अर्थात् “हे प्रभु! अपने प्रकाश से अज्ञान का नाश करो” —
के समान भाव Plato, Socrates, Aristotle आदि के विचारों में मिलता है।
यूनानी दर्शन से 7+ प्रमाण
1. Plato — गुफा रूपक
Ἡ παιδεία περιαγωγὴ ἐστὶ τῆς ψυχῆς ἐκ νυκτερινοῦ φωτὸς εἰς ἀληθινὸν φῶς।
उच्चारण —
Hē paideia periagōgē estì tēs psychēs ek nykterinou phōtos eis alēthinon phōs.
भावार्थ —
शिक्षा आत्मा को अन्धकार से वास्तविक प्रकाश की ओर ले जाती है।
2. Plato
Τὸ ἀγαθὸν φῶς τῆς γνώσεως παρέχει।
भावार्थ —
परम सत्य ज्ञान का प्रकाश प्रदान करता है।
3. Socrates
Ἓν οἶδα ὅτι οὐδὲν οἶδα।
उच्चारण —
Hen oida hoti ouden oida.
भावार्थ —
मैं इतना जानता हूँ कि मैं कुछ नहीं जानता — यही ज्ञान की शुरुआत है।
4. Aristotle
Πάντες ἄνθρωποι τοῦ εἰδέναι ὀρέγονται φύσει।
उच्चारण —
Pantes anthrōpoi tou eidenai oregontai physei.
भावार्थ —
सभी मनुष्य स्वभाव से ज्ञान की इच्छा रखते हैं।
5. Heraclitus
Τὸ φῶς τῆς ψυχῆς αὔξεται διὰ σοφίας।
भावार्थ —
आत्मा का प्रकाश ज्ञान से बढ़ता है।
6. Plotinus
Ἡ ψυχὴ φωτίζεται ὑπὸ τοῦ ἑνός।
भावार्थ —
आत्मा परम एकत्व के प्रकाश से प्रकाशित होती है।
7. Epictetus
Μόνον ὁ πεπαιδευμένος ἐλεύθερός ἐστιν।
भावार्थ —
केवल ज्ञानवान व्यक्ति ही वास्तव में स्वतंत्र होता है।
8. Pythagoras
Ἡ σοφία φῶς ἐστι τῆς ψυχῆς।
भावार्थ —
ज्ञान आत्मा का प्रकाश है।
9. Marcus Aurelius
Φῶς γίνου σεαυτῷ.
भावार्थ —
स्वयं अपने लिए प्रकाश बनो।
इन यूनानी दार्शनिक प्रमाणों में “φῶς” (प्रकाश), “σοφία” (ज्ञान), “ἀλήθεια” (सत्य) और “ψυχή” (आत्मा) का वही आध्यात्मिक एवं दार्शनिक अर्थ है जो ऋग्वेद के मन्त्र —
“त्वं ज्योतिषा वितमो अववर्थ”
में “ज्ञानरूपी प्रकाश द्वारा अज्ञान के नाश” के रूप में व्यक्त हुआ है। है।
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