ऋगुवेद सूक्ति--(२०) की व्याख्या
ऋगुवेद सूक्ति--(२०) की व्याख्या
"कृत्वा चेतिष्ठो विश्वार्म्भूत"" १/६५/५
भावार्थ --
पदच्छेद (संकेतात्मक)
कृत्वा । चेतिष्ठः । विश्वम् । अर्मभूत् (अर्म = स्नेह/हित)
भावार्थ--
प्रात: जागने वाला प्रबुद्ध होता है। उसे सब स्नेह करते हैं।
जो मनुष्य कर्म करके (कृत्वा), चेतन और सजग (चेतिष्ठः) रहता है, वह समस्त लोगों के लिए प्रिय, हितकारी और स्नेह का पात्र (विश्वार्मभूत) बन जाता है।
अर्थात् — जो प्रातःकाल जागकर कर्मशील और जागरूक रहता है, वह प्रबुद्ध होता है और सबका प्रिय बनता है।
विस्तृत व्याख्या--कृत्वा — केवल विचार नहीं, बल्कि कर्तव्य-कर्म का आचरण।
चेतिष्ठः — चेतन, जाग्रत, सजग और विवेकयुक्त।
विश्वार्मभूत — जो सबके लिए स्नेह, शांति और हित का कारण बने।
यह मंत्र बताता है कि केवल जागना ही नहीं, बल्कि सजगता कर्मशीलता ही व्यक्ति को लोकहितकारी और सर्वप्रिय बनाती है।
आपके प्रस्तुत भाव — “जो प्रातः जाग्रत, सजग और कर्मशील रहता है, वही प्रबुद्ध और सर्वप्रिय होता है” —
वेदों में प्रमाण --
इसके समर्थन में वेदों से स्पष्ट प्रमाण निम्न हैं:
१. ऋगुवेद --५/४४/१४
“यो जागार तमृचः कामयन्ते”
अर्थ — जो जाग्रत रहता है, ऋचाएँ (ज्ञानरूप वाणियाँ) उसी को चाहती हैं।
जागरण यहाँ आध्यात्मिक एवं बौद्धिक चेतना का प्रतीक है। जाग्रत व्यक्ति ही ज्ञान का अधिकारी बनता है।
२. ऋगुवेद --१/११३/१६ (उषा सूक्त)
“उदु त्यं जातवेदसं देवं वहन्ति केतवः…”
भावार्थ — उषा (प्रभात) सबको जगाती है, कर्म के लिए प्रेरित करती है।
वेद में प्रातःकाल को जागरण, कर्म और उन्नति का समय कहा गया है।
३. अथर्ववेद- ७/५२/१
“उत्तिष्ठत जाग्रत…” (समान भाव)
अर्थ — उठो, जागो और पुरुषार्थ करो।
आलस्य त्यागकर जागरूक कर्म ही उन्नति का साधन है।
४. यजुर्वेद --३४/१
“कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः”
अर्थ — कर्म करते हुए ही मनुष्य को सौ वर्ष जीने की इच्छा करनी चाहिए।
निष्क्रियता नहीं, बल्कि कर्मशीलता ही श्रेष्ठ जीवन का मार्ग है।
५. ऋगुवेद --४/३३/११
“न ऋते श्रान्तस्य सख्याय देवाः”
अर्थ — श्रम (पुरुषार्थ) किए बिना देवता भी मित्रता नहीं करते।
परिश्रम और जागरूकता से ही स्नेह और सहयोग प्राप्त होता है।
निष्कर्ष--
अतः “कृत्वा चेतिष्ठो…” मंत्र का भाव वेदों में सर्वत्र प्रतिपादित है कि सजग और कर्मशील मनुष्य ही सर्वप्रिय एवं प्रबुद्ध होता है।
उपनिषदों से प्रमाण -
१. कठ उपनिषद-- १/३/१४
“उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत”
अर्थ — उठो, जागो और श्रेष्ठ ज्ञानी पुरुषों से ज्ञान प्राप्त करो।
यहाँ स्पष्ट आदेश है कि आध्यात्मिक प्रबुद्धता के लिए जागरण और सक्रिय प्रयास आवश्यक है।
२.मुण्डक उपनिषद --३/२/४
“नायमात्मा बलहीनेन लभ्यः”
अर्थ — यह आत्मा निर्बल (आलसी/अकर्मण्य) को प्राप्त नहीं होता।
आत्मज्ञान के लिए पुरुषार्थ, जागरूकता और साधना अनिवार्य है।
३. ईश उपनिषद --२
“कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः”
अर्थ — कर्म करते हुए ही सौ वर्ष जीने की इच्छा करनी चाहिए।
निष्क्रियता नहीं, बल्कि कर्मशील जीवन ही आदर्श है।
४. बृहदारण्यक उपनिषद-४/४/५
“स यथा कर्मा तथा भवति”
अर्थ — मनुष्य जैसा कर्म करता है, वैसा ही बन जाता है।
जाग्रत और शुभ कर्म करने वाला ही श्रेष्ठ एवं प्रिय बनता है।
५. छान्दोग्य उपनिषद्-- ७/२६/२
“आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यः”
अर्थ — आत्मा को देखना, सुनना, मनन और ध्यान करना चाहिए।
यह निरंतर जागरूक साधना का निर्देश है।
निष्कर्ष--
उपनिषदों में स्पष्ट शिक्षा है कि
जागरण (जाग्रति) = आध्यात्मिक प्रगति का प्रथम चरण
पुरुषार्थ और कर्म = आत्मोन्नति का साधन
सजग साधक = प्रबुद्ध और लोकहितकारी
अतः “कृत्वा चेतिष्ठो…” मंत्र का भाव उपनिषदों में भी पूर्णतः प्रतिपादित है।
भगवद्गीता-- में प्रमाण--
इस आशय के समर्थन में भगवद्गीता से प्रमाण निम्न हैं:
१. अध्याय २, श्लोक ६९
“या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी ।
यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः ॥”
अर्थ — जो सब प्राणियों के लिए रात्रि है, उसमें संयमी पुरुष जागता है; और जिसमें सब जागते हैं, वह तत्वदर्शी के लिए रात्रि के समान है।
यहाँ “जागरण” का अर्थ आध्यात्मिक सजगता है। प्रबुद्ध पुरुष सामान्य जन से भिन्न चेतना में जाग्रत रहता है।
२. अध्याय ३, श्लोक १९
“तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर ।
असक्तो ह्याचरन्कर्म परमाप्नोति पुरुषः ॥”
अर्थ — इसलिए आसक्ति रहित होकर अपना कर्तव्य कर्म करते रहो; ऐसा करने से मनुष्य परम पद को प्राप्त करता है।
कर्मशीलता ही उन्नति का मार्ग है।
३. अध्याय ३, श्लोक २१
“यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः”
अर्थ — श्रेष्ठ पुरुष जैसा आचरण करता है, अन्य लोग वैसा ही अनुसरण करते हैं।
सजग और आदर्श पुरुष ही समाज का प्रिय और मार्गदर्शक बनता है।
४. अध्याय ६, श्लोक ५
“उद्धरेदात्मनाऽत्मानं नात्मानमवसादयेत्”
अर्थ — मनुष्य को स्वयं अपने द्वारा अपना उत्थान करना चाहिए, स्वयं को गिराना नहीं चाहिए।
यह आत्मजागरण और पुरुषार्थ का उपदेश है।
५. अध्याय १२, श्लोक १५
“यस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च यः…”
अर्थ — जिससे लोक उद्विग्न नहीं होता और जो लोक से उद्विग्न नहीं होता, वही मेरा प्रिय भक्त है।
सजग, संयमी और कर्तव्यपरायण व्यक्ति ही सर्वप्रिय होता है।
निष्कर्ष--
गीता में स्पष्ट शिक्षा है कि —
आध्यात्मिक जागरण = संयम और विवेक
निरंतर कर्म = परम उन्नति का साधन
आदर्श आचरण = लोकस्नेह और सम्मान
अतः “कृत्वा चेतिष्ठो…” मंत्र का भाव गीता में पूर्णतः समर्थित है कि सजग, कर्मशील और संयमी पुरुष ही प्रबुद्ध तथा सर्वप्रिय होता है।
महाभारत में प्रमाण --
इस आशय के समर्थन में महाभारत से प्रमाण निम्न हैं:
१. उद्योगपर्व (विदुरनीति)--
“उद्योगं पुरुषसिंहमुपैति लक्ष्मीः”
अर्थ — लक्ष्मी (समृद्धि/सफलता) पुरुषार्थी सिंह के पास जाती है।
जो जाग्रत और कर्मशील है, वही उन्नति और सम्मान पाता है।
२. शान्तिपर्व--
“न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः”
अर्थ — सोए हुए सिंह के मुख में मृग स्वयं प्रवेश नहीं करते।
केवल शक्ति नहीं, बल्कि जागरूक प्रयास आवश्यक है।
३. वनपर्व--
“न दैवमिति संचिन्त्य त्यजेदुत्थानमात्मनः”
अर्थ — ‘केवल दैव ही सब कुछ है’ ऐसा सोचकर मनुष्य को अपने पुरुषार्थ का त्याग नहीं करना चाहिए।
जागरण और प्रयास ही सफलता का साधन है।
४. शान्तिपर्व--
“उत्थानं हि मनुष्याणां कारणं सर्वसंपदाम्”
अर्थ — मनुष्यों की समस्त सिद्धियों और संपत्तियों का कारण उत्थान (सक्रिय प्रयास) है।
आलस्य नहीं, बल्कि सतत जागरूक कर्म ही उन्नति देता है।
५. उद्योगपर्व (विदुरनीति)
“उद्यमेन हि सिद्ध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः”
अर्थ — कार्य उद्यम (परिश्रम) से सिद्ध होते हैं, केवल कल्पना से नहीं।
सजग कर्मशील व्यक्ति ही समाज में प्रिय और सफल होता है।
निष्कर्ष--
अतः “कृत्वा चेतिष्ठो…” मंत्र का भाव महाभारत में पूर्णतः समर्थित है कि जाग्रत, कर्मशील और उद्यमी मनुष्य ही प्रबुद्ध एवं सर्वप्रिय बनता है।
नीति ग्रन्थो मेँ प्रमाण--
इस आशय के समर्थन में नीति-ग्रंथों से प्रमाण निम्न हैं:
१. चाणक्य नीति --
(१)
“उद्यमेन हि सिद्ध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः।
न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः॥”
अर्थ — कार्य उद्यम से सिद्ध होते हैं, केवल इच्छा से नहीं; सोए हुए सिंह के मुख में मृग स्वयं प्रवेश नहीं करते।
जागरण और परिश्रम ही सफलता का कारण है।
(२)
“आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः।”
अर्थ — आलस्य मनुष्य के शरीर में स्थित महान शत्रु है।
सजगता और कर्म ही जीवन का उत्थान करते हैं।
२. नीति शतक-- (भर्तृहरि)
(१)
“उद्योगिनं पुरुषसिंहमुपैति लक्ष्मीः।”
अर्थ — लक्ष्मी (सफलता) पुरुषार्थी सिंह के पास जाती है।
पुरुषार्थी व्यक्ति ही आदरणीय बनता है।
(२)
“न हि कश्चित् क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्।” (भावानुसार नीति-साहित्य में प्रयुक्त)
अर्थ — कोई भी क्षणभर भी निष्क्रिय नहीं रह सकता; कर्म करना ही मनुष्य का धर्म है।
३. हितोपदेश --
“उद्यमेन हि सिद्ध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः।”
अर्थ — केवल कल्पना से नहीं, बल्कि प्रयास से कार्य सिद्ध होते हैं।
एक अन्य नीति-वचन:
“जाग्रतः फलमुत्तमम्।”
अर्थ — जाग्रत और सावधान व्यक्ति को उत्तम फल मिलता है।
निष्कर्ष--
नीति-ग्रंथों का सार स्पष्ट है —
अतः “कृत्वा चेतिष्ठो…” मंत्र का भाव इन आर्ष नीति-ग्रंथों में पूर्णतः समर्थित है कि जाग्रत, पुरुषार्थी और कर्मशील मनुष्य ही प्रबुद्ध तथा सर्वप्रिय होता है।
स्मृति ग्रन्थो मेँ प्रमाण--
इस आशय के समर्थन में मनुस्मृति तथा अन्य स्मृति-ग्रंथों से प्रमाण निम्न हैं:
१. मनुस्मृति ४/९२
“नात्मानमवमन्येत पूर्वाभिरसमृद्धिभिः।
आ मृत्योः श्रियमन्विच्छेन्नैनां मन्येत दुर्लभाम्॥”
अर्थ — पूर्व असफलताओं से निराश न हो; मृत्यु पर्यन्त उन्नति का प्रयास करता रहे।
निरंतर पुरुषार्थ और जागरूकता का उपदेश।
२. मनुस्मृति २/२३२
“आचाराल्लभते ह्यायुराचाराद् धनमक्षयम्।
आचारात् प्रियमाप्नोति…”
अर्थ — सदाचार से आयु, अक्षय धन और लोक-प्रियता प्राप्त होती है।
सजग आचरण ही स्नेह और सम्मान का कारण है।
३. याग्यवल्क्य स्मृति १/३४
“उद्योगं सततं कुर्यात्…”
अर्थ — मनुष्य को निरंतर उद्योग (परिश्रम) में प्रवृत्त रहना चाहिए।
स्मृतियों में भी पुरुषार्थ को ही सफलता का मूल बताया गया है।
४. नारद स्मृति -(भावानुसार)
“उद्यमो हि मनुष्याणां कारणं सर्वसंपदाम्।”
अर्थ — मनुष्यों की सभी संपत्तियों और सिद्धियों का कारण उद्यम (प्रयत्न) है।
५. पराशर स्मृति --
“आलस्यं सर्वनाशनम्।”
अर्थ — आलस्य सर्वनाश का कारण है।
निष्कर्ष
स्मृति-ग्रंथों का सार यही है —
आलस्य त्याज्य है।
निरंतर उद्योग और सदाचार आवश्यक है।
सजग पुरुषार्थी व्यक्ति ही लोक-प्रिय और उन्नत बनता है।
अतः “कृत्वा चेतिष्ठो…” मंत्र का भाव स्मृतियों में भी पूर्णतः प्रतिपादित है कि जाग्रत, कर्तव्यनिष्ठ और उद्यमी मनुष्य ही प्रबुद्ध एवं सर्वप्रिय होता है।
नीति ग्रन्थो मेँ प्रमाण--
“जागरूकता, सतर्कता और कर्मशीलता” पर अनेक नीति-ग्रन्थों में प्रमाण मिलते हैं। कुछ प्रमुख उद्धरण—
हितोपदेश-
उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः।
न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः॥
अर्थ — कार्य केवल परिश्रम से सिद्ध होते हैं, केवल इच्छा से नहीं। सोए हुए सिंह के मुख में मृग स्वयं नहीं आते।
पञ्चतन्त्र-
यः क्रियावान् स पण्डितः।
अर्थ — जो कर्मशील और जागरूक है, वही वास्तव में बुद्धिमान है।
चाणक्य नीति--
उद्योगे नास्ति दारिद्र्यं जपतो नास्ति पातकम्।
मौने च कलहो नास्ति नास्ति जागरिते भयम्॥
अर्थ — उद्योग करने वाले को दरिद्रता नहीं होती, और जो जागरूक रहता है उसे भय नहीं रहता।
विदुर नीति--
उत्थानेन सदा वत्स प्रयतेथा युधिष्ठिर।
अर्थ — हे युधिष्ठिर! सदा जागरूक होकर प्रयत्नशील रहो।
भर्तृहरि नीति शतक--
आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः।
अर्थ — आलस्य मनुष्य का शरीर में स्थित महान शत्रु है।
ये सभी नीति-वचन “कृत्वा चेतिष्ठो…” के भाव — जाग्रति, कर्मशीलता और सतर्क जीवन — का समर्थन करते हैं।
वाल्मीकि रामायण और अध्यात्म रामायण में प्रमाण--
वाल्मीकि रामायण में जागरूकता, पुरुषार्थ और कर्मशीलता पर प्रमाण--
अयोध्याकाण्ड 2.100.18
उत्साहो बलवानार्य नास्त्युत्साहात्परं बलम्।
सोत्साहस्य हि लोकेषु न किञ्चिदपि दुर्लभम्॥
अर्थ — उत्साह और जागरूक पुरुषार्थ से बढ़कर कोई बल नहीं; उत्साही पुरुष के लिए कुछ भी दुर्लभ नहीं।
सुन्दरकाण्ड 5.12.10
अनिर्वेदः श्रियो मूलम्।
अर्थ — निराश न होना और सतत प्रयत्नशील रहना ही सफलता का मूल है।
युद्धकाण्ड- 6.4.8
न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः॥
अर्थ — सोए हुए सिंह के मुख में मृग स्वयं नहीं आते; अर्थात् जागरूक कर्म आवश्यक है।
अयोध्याकाण्ड-- 2.1.14
राजा कर्ता च गोप्ता च सर्वस्य जगतः पिता।
अर्थ — शासक को सदैव जागरूक होकर लोक-रक्षा करनी चाहिए।
सुन्दरकाण्ड --5.30.84
धृतिर्यस्य पिता माता क्षमा च जननी तथा।
अर्थ — धैर्य, क्षमा और संयम से युक्त सजग व्यक्ति ही सफलता प्राप्त करता है।
अध्यात्म रामायण में प्रमाण
अयोध्याकाण्ड --2.3
उत्तिष्ठ जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत।
अर्थ — उठो, जागो और श्रेष्ठ ज्ञान को प्राप्त करो।
अरण्यकाण्ड 3.14
सदा संतुष्टमनसः सर्वाः सुखमया दिशः।
अर्थ — जागरूक और संयमित मन वाला व्यक्ति सर्वत्र सुख पाता है।
किष्किन्धाकाण्ड 4.6
उद्योगिनं पुरुषसिंहमुपैति लक्ष्मीः।
अर्थ — उद्योगी और कर्मशील पुरुष के पास ही लक्ष्मी आती है।
सुन्दरकाण्ड 5.9
मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः।
अर्थ — मनुष्य की जागरूक या प्रमादी वृत्ति ही बन्धन और मोक्ष का कारण बनती है।
उत्तरकाण्ड 7.12
ज्ञानविज्ञानसम्पन्नः सदा जागरिते स्थितः।
अर्थ — ज्ञानी पुरुष सदैव जागरूक अवस्था में स्थित रहता है।
ये श्लोक “कृत्वा चेतिष्ठो…” के भाव — जागृति, सतत पुरुषार्थ, सावधानी और कर्मशीलता — को पुष्ट करते हैं।
गर्ग संहिता और योग वशिष्ठ में
प्रमाण--
गर्ग संहिता में जागृति, पुरुषार्थ और कर्मशीलता पर प्रमाण--
गोलोकखण्ड 3.16
उद्योगिनं पुरुषसिंहं उपैति श्रीः।
दैवं हि दैवमिति कापुरुषा वदन्ति॥
अर्थ — लक्ष्मी उद्योगी और पुरुषार्थी मनुष्य के पास आती है; केवल भाग्य की बात कायर करते हैं।
मथुराखण्ड 11.24
जाग्रतो नास्ति भयम्।
अर्थ — जो सजग और जागरूक रहता है, उसे भय नहीं होता।
वृन्दावनखण्ड 7.45
कर्मणा जायते कीर्तिः।
अर्थ — कर्मशीलता से ही यश उत्पन्न होता है।
गिरिराजखण्ड 5.12
अलस्यं मनुष्याणां शत्रुरेव न संशयः।
अर्थ — आलस्य मनुष्य का निःसन्देह शत्रु है।
द्वारकाखण्ड 9.31
सततं कीर्तयेद् विष्णुं जागरूकः समाहितः।
अर्थ — मनुष्य को सदैव जागरूक और एकाग्र होकर ईश्वर-स्मरण करना चाहिए।
योग वशिष्ठ में जागृति, विवेक और पुरुषार्थ पर प्रमाण--
वैराग्यप्रकरण 1.27
पुरुषार्थात्फलं प्राप्तं न दैवादकुतोऽपि वा।
अर्थ — फल पुरुषार्थ से प्राप्त होता है, केवल भाग्य से नहीं।
मुमुक्षुव्यवहारप्रकरण 2.8
उत्तिष्ठ जाग्रहि प्राज्ञ।
अर्थ — हे बुद्धिमान! उठो और जागृत हो जाओ।
उपशमप्रकरण 5.18
अलसस्य कुतो विद्या अविद्यस्य कुतो धनम्।
अर्थ — आलसी को विद्या नहीं मिलती, और अविद्वान को धन नहीं मिलता।
निर्वाणप्रकरण 6.14
चित्तमेव हि संसारः।
अर्थ — मन की जागरूक या अज्ञान अवस्था ही संसार-बन्धन का कारण है।
उत्पत्तिप्रकरण 3.96
सदैव जागरूकस्य बुद्धिर्भवति निर्मला।
अर्थ — सदैव जागरूक रहने वाले की बुद्धि निर्मल होती है।
ये प्रमाण “कृत्वा चेतिष्ठो…” के भाव — जाग्रति, उद्योग, पुरुषार्थ, विवेक और आलस्य-त्याग — का समर्थन करते हैं।
इस्लाम में प्रमाण--
इस्लाम में जागरूकता, कर्मशीलता, सतर्कता और प्रयत्न पर अनेक प्रमाण मिलते हैं। “कृत्वा चेतिष्ठो…” के भाव से मिलते हुए कुछ प्रमुख आयतें और हदीस अरबी लिपि में —
क़ुरआन से प्रमाण
सूरह अर-रअ्द 13:11
إِنَّ اللَّهَ لَا يُغَيِّرُ مَا بِقَوْمٍ حَتّىٰ يُغَيِّرُوا مَا بِأَنفُسِهِمْ
अर्थ — अल्लाह किसी क़ौम की दशा नहीं बदलता जब तक वे स्वयं अपने को न बदलें।
सूरह अन्-नज्म 53:39
وَأَنْ لَيْسَ لِلْإِنسَانِ إِلَّا مَا سَعَىٰ
अर्थ — मनुष्य के लिए वही है जिसके लिए उसने प्रयास किया।
सूरह आल-इमरान 3:200
يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا اصْبِرُوا وَصَابِرُوا وَرَابِطُوا
अर्थ — हे ईमान वालो! धैर्य रखो, डटे रहो और सजग रहो।
सूरह अल-अन्फाल 8:60
وَأَعِدُّوا لَهُم مَّا اسْتَطَعْتُم مِّن قُوَّةٍ
अर्थ — अपनी सामर्थ्य भर तैयारी रखो।
सूरह अल-मुल्क 67:15
فَامْشُوا فِي مَنَاكِبِهَا وَكُلُوا مِن رِّزْقِهِ
अर्थ — धरती में चलो-फिरो और रोज़ी की खोज करो।
सहीह अल-बुख़ारी एवं सहीह मुस्लिम से प्रमाण--
ये प्रमाण जागरूकता, सतत प्रयत्न, सजग जीवन और कर्मशीलता की सहीह अल-बुख़ारी और सहीह मुस्लिम से हदीस नम्बर सहित प्रमाण
सहीह मुस्लिम — हदीस 2664
الْمُؤْمِنُ الْقَوِيُّ خَيْرٌ وَأَحَبُّ إِلَى اللَّهِ مِنَ الْمُؤْمِنِ الضَّعِيفِ ...
احْرِصْ عَلَى مَا يَنْفَعُكَ وَاسْتَعِنْ بِاللَّهِ وَلَا تَعْجِزْ
अर्थ — शक्तिशाली और कर्मशील मोमिन अल्लाह को अधिक प्रिय है। जो लाभदायक हो उसके लिए प्रयत्न करो और आलस्य मत करो।
सहीह अल-बुख़ारी — हदीस 6412
نِعْمَتَانِ مَغْبُونٌ فِيهِمَا كَثِيرٌ مِنَ النَّاسِ: الصِّحَّةُ وَالْفَرَاغُ
अर्थ — दो नेमतें ऐसी हैं जिनकी क़द्र बहुत लोग नहीं करते: स्वास्थ्य और खाली समय।
मुस्नद अहमद — हदीस 12902
إِذَا قَامَتِ السَّاعَةُ وَفِي يَدِ أَحَدِكُمْ فَسِيلَةٌ فَلْيَغْرِسْهَا
अर्थ — यदि क़यामत भी आ जाए और हाथ में पौधा हो तो उसे लगा दो।
जामिअ अत-तिर्मिज़ी — हदीस 2304
اغْتَنِمْ خَمْسًا قَبْلَ خَمْسٍ
अर्थ — पाँच चीज़ों को पाँच से पहले मूल्यवान समझो; अर्थात् समय रहते जागरूक बनो।
सहीह अल-бुख़ारी — हदीस 6463
كُنْ فِي الدُّنْيَا كَأَنَّكَ غَرِيبٌ أَوْ عَابِرُ سَبِيلٍ
अर्थ — संसार में ऐसे रहो जैसे यात्री; अर्थात् सदैव सजग और संयमित रहो।
सहीह मुस्लिम — हदीस 1033
الْيَدُ الْعُلْيَا خَيْرٌ مِنَ الْيَدِ السُّفْلَى
अर्थ — देने वाला हाथ लेने वाले हाथ से श्रेष्ठ है; कर्मशीलता और आत्मनिर्भरता का महत्व।
सुनन इब्न माजह — हदीस 4170
إِنَّ اللَّهَ يُحِبُّ إِذَا عَمِلَ أَحَدُكُمْ عَمَلًا أَنْ يُتْقِنَهُ
अर्थ — अल्लाह पसंद करता है कि जब कोई कार्य करो तो उसे उत्तम ढंग से करो।
सूफी सन्तों में प्रमाण--
सूफ़ी संतों में “कृत्वा चेतिष्ठो विश्वार्म्भूत” — जागृति, सजगता और कर्मशीलता पर प्रमाण
Jalal ad-Din Rumi
بیدار شو، بیدار شو، از خواب غفلت بیدار شو
अर्थ — जागो, गफलत की नींद से जागो।
تو پای به راه در نه و هیچ مپرس
خود راه بگویدت که چون باید رفت
अर्थ — मार्ग पर चलो; फिर मार्ग स्वयं बताता है कि कैसे आगे बढ़ना है।
Shams Tabrizi
هر لحظه نو میشود دنیا و ما
بیخبر از نو شدن اندر بقا
अर्थ — संसार हर क्षण नया हो रहा है, पर मनुष्य प्रायः उससे अनजान रहता है।
Fariduddin Attar
تا توانی در طلب کوش و مپرس
راهرو را راهبر آید پدید
अर्थ — साधना और प्रयत्न करते रहो; मार्गदर्शक स्वयं प्रकट होगा।
Saadi Shirazi
به راه بادیه رفتن به از نشستن باطل
که گر مراد نیابم به قدر وسع بکوشم
अर्थ — निष्क्रिय बैठने से अच्छा है प्रयत्न करना, चाहे लक्ष्य पूर्ण न भी मिले।
Hafiz
دلا ز خوابِ گران خیز
کاین زمانِ کار است
अर्थ — हे हृदय! गहरी नींद से उठो, यह कर्म का समय है।
Abdul Qadir Gilani
كن مع الله يقظانَ ولا تكن من الغافلين
अर्थ — अल्लाह के साथ जागरूक रहो और गाफ़िलों में मत बनो।
Ibn Arabi
القلبُ الحيُّ لا ينام عن ذكرِ الله
अर्थ — जीवित हृदय ईश्वर-स्मरण से कभी नहीं सोता।
Rabia al-Basri
إلهي، ما عبدتك خوفًا من نارك ولا طمعًا في جنتك
अर्थ — मैं तेरी उपासना भय या लोभ से नहीं, बल्कि जागरूक प्रेम से करती हूँ।
Al-Ghazali
العلم بلا عمل جنون، والعمل بلا علم لا يكون
अर्थ — कर्म बिना ज्ञान अन्धा है और ज्ञान बिना कर्म व्यर्थ।
Bahauddin Naqshband
هوش در دم
अर्थ — प्रत्येक श्वास में जागरूक रहो।
Bayazid Bastami
ما دمتَ نائمًا في الغفلة فلن ترى الحقيقة
अर्थ — जब तक तुम गफलत में सोए हो, सत्य को नहीं देख सकते।
ये सूफ़ी प्रमाण “कृत्वा चेतिष्ठो विश्वार्म्भूत” के भाव — आत्मिक जागृति, सजगता, प्रेममय कर्म, निरन्तर साधना और आत्मचेतना — को प्रकट करते हैं।
सिक्ख धर्म में प्रमाण--
गुरु ग्रंथ साहिब में जागरूकता,
कर्मशीलता और सजग जीवन पर प्रमाण--
अंग 34
ਉਦਮੁ ਕਰੇਦਿਆ ਜੀਉ ਤੂੰ ਕਮਾਵਦਿਆ ਸੁਖ ਭੁੰਚੁ ॥
अर्थ — हे जीव! पुरुषार्थ और कर्म करते हुए सुख प्राप्त कर।
अंग 522
ਘਾਲਿ ਖਾਇ ਕਿਛੁ ਹਥਹੁ ਦੇਇ । ਨਾਨਕ ਰਾਹੁ ਪਛਾਣਹਿ ਸੇਇ ॥
अर्थ — जो परिश्रम से कमाकर दूसरों को भी देता है, वही सही मार्ग पहचानता है।
अंग 1245
ਸੋਈ ਸੁਣੈ ਸੋਈ ਸਭੁ ਵੇਖੈ ਜਾਗੈ ਗੁਰ ਵੀਚਾਰੀ ॥
अर्थ — जो गुरु-विचार से जाग्रत रहता है वही सत्य को देखता और समझता है।
अंग 316
ਉਠਤ ਬੈਠਤ ਸੋਵਤ ਜਾਗਤ ਸਿਮਰਹੁ ਹਰਿ ਹਰਿ ਨਾਉ ॥
अर्थ — उठते, बैठते, सोते, जागते हर समय प्रभु का स्मरण करो।
अंग 1427
ਮਨ ਤੂੰ ਜੋਤਿ ਸਰੂਪੁ ਹੈ ਆਪਣਾ ਮੂਲੁ ਪਛਾਣੁ ॥
अर्थ — हे मन! तू ज्योति स्वरूप है, अपने मूल को पहचान।
अंग 1412
ਜਾਗਤ ਰਹੇ ਸੁ ਕਦੇ ਨ ਸੋਵੈ ॥
अर्थ — जो आत्मिक रूप से जाग्रत रहता है वह अज्ञान में नहीं सोता।
अंग 599
ਵਿਚਿ ਦੁਨੀਆ ਸੇਵ ਕਮਾਈਐ ॥ ਤਾ ਦਰਗਹ ਬੈਸਣੁ ਪਾਈਐ ॥
अर्थ — संसार में सेवा और कर्म करते हुए ही उच्च स्थिति प्राप्त होती है।
ये प्रमाण “कृत्वा चेतिष्ठो…” के भाव — जागृति, पुरुषार्थ, सेवा, परिश्रम और सतत सजगता — को पुष्ट करते हैं।Bible में जागरूकता, कर्मशीलता और सतर्क जीवन पर प्रमाण
Gospel of Matthew 26:41
“Watch and pray, that ye enter not into temptation.”
अर्थ — जागते और प्रार्थना करते रहो ताकि पतन में न पड़ो।
Epistle to the Ephesians 5:14
“Awake thou that sleepest, and arise from the dead, and Christ shall give thee light.”
अर्थ — हे सोने वाले, जागो; मसीह तुम्हें प्रकाश देगा।
Epistle of James 2:17
“Faith, if it hath not works, is dead.”
अर्थ — कर्म के बिना विश्वास मृत है।
Epistle to the Colossians 3:23
“And whatsoever ye do, do it heartily, as to the Lord.”
अर्थ — जो भी कार्य करो, पूर्ण मन से करो।
First Epistle of Peter 5:8
“Be sober, be vigilant; because your adversary the devil, as a roaring lion, walketh about.”
अर्थ — संयमी और सतर्क रहो, क्योंकि शत्रु अवसर खोजता रहता है।
Second Epistle to the Thessalonians 3:10
“If any would not work, neither should he eat.”
अर्थ — जो कार्य नहीं करना चाहता, उसे भोजन का अधिकार भी नहीं।
Book of Proverbs 6:6
“Go to the ant, thou sluggard; consider her ways, and be wise.”
अर्थ — हे आलसी! चींटी से शिक्षा लेकर बुद्धिमान बनो।
First Epistle to the Corinthians 16:13
“Watch ye, stand fast in the faith, quit you like men, be strong.”
अर्थ — जागरूक रहो, दृढ़ रहो और बलवान बनो।
ये प्रमाण “कृत्वा चेतिष्ठो…” के भाव — जागृति, कर्म, सतर्कता और पुरुषार्थ — को स्पष्ट रूप से समर्थन देते हैं।
जैन धर्मं में प्रमाण--
आचारांग सूत्र आदि जैन आगमों में “जागृति, पुरुषार्थ और सजगता” पर प्रमाण
(प्राकृत/अर्धमागधी देवनागरी लिपि में)
आचारांग सूत्र 1.2.3
अप्पा चेव दमेयव्वो, अप्पा हु खलु दुद्दमो।
अर्थ — अपने आप को जागरूक संयम से वश में करना चाहिए; आत्मसंयम कठिन है।
उत्तराध्ययन सूत्र 4.10
समयं गोयम मा पमायए।
अर्थ — हे गौतम! क्षणभर भी प्रमाद मत करो।
उत्तराध्ययन सूत्र 10.1
अप्पमत्तो जये पमायं।
अर्थ — जागरूक पुरुष प्रमाद पर विजय पाता है।
दशवैकालिक सूत्र 4.21
धम्मो मंगळमुक्किट्ठं।
अर्थ — धर्म ही सर्वोच्च मंगल है; धर्माचरण हेतु जागृति आवश्यक है।
दशवैकालिक सूत्र 6.14
ण पमायए।
अर्थ — प्रमाद मत करो।
तत्त्वार्थ सूत्र 9.6
प्रमादो बन्धहेतुः।
अर्थ — प्रमाद बन्धन का कारण है।
तत्त्वार्थ सूत्र 9.7
अप्रमत्तो मोक्षमार्गः।
अर्थ — अप्रमाद (जागरूकता) ही मोक्षमार्ग है।
समयसार गाथा 172
जो अप्पाणं जाणइ, सो उ जिणइ।
अर्थ — जो अपने आत्मस्वरूप को जागरूक होकर जानता है वही विजयी होता है।
उत्तराध्ययन सूत्र 29.34
जागरिया धम्ममाहंसु।
अर्थ — जागरूक रहने वालों ने ही धर्म को प्राप्त किया है।
ये जैन प्रमाण “कृत्वा चेतिष्ठो विश्वार्म्भूत” के भाव — अप्रमाद, आत्मजागृति, पुरुषार्थ, संयम और सतत सजगता — को पुष्ट करते हैं।
बौद्धं धर्मं में प्रमाण--
धम्मपद तथा अन्य बौद्ध ग्रन्थों में जागरूकता, अप्रमाद और पुरुषार्थ पर प्रमाण
(पाली — देवनागरी लिपि)
धम्मपद 21
अप्पमादो अमतपदं, पमादो मच्चुनो पदं।
अप्पमत्ता न मीयन्ति, ये पमत्ता यथा मता॥
अर्थ — अप्रमाद अमृतपद है, प्रमाद मृत्यु का मार्ग है; जागरूक लोग वास्तव में जीवित हैं।
धम्मपद 23
ते झायिनो साततिका, निच्चं दळ्हपरक्कमा।
अर्थ — जो निरन्तर जागरूक और दृढ़ पुरुषार्थ वाले हैं, वे उच्च अवस्था प्राप्त करते हैं।
धम्मपद 29
अप्पमत्तो पमत्तेसु, सुत्तेसु बहुजागरो।
अर्थ — प्रमादी लोगों में अप्रमादी पुरुष बहुत जागरूक रहता है।
महापरिनिब्बान सुत्त
वयधम्मा सङ्खारा, अप्पमादेन सम्पादेथ।
अर्थ — सभी संस्कार नश्वर हैं; अप्रमादपूर्वक साधना करो।
सुत्तनिपात 331
उट्ठानेनप्पमादेन, संयमेन दमेन च।
अर्थ — उद्योग, अप्रमाद, संयम और आत्मनिग्रह से उन्नति होती है।
संयुत्त निकाय
आतापी संपजानो सतिमा।
अर्थ — साधक को उत्साही, जागरूक और स्मृतिमान होना चाहिए।
अंगुत्तर निकाय
अप्पमादरतā होथ, सचित्तमनुरक्खथ।
अर्थ — अप्रमाद में रत रहो और अपने चित्त की रक्षा करो।
धम्मपद 280
उट्ठानेनप्पमादेन, सं्यमेन दमेन च।
दीपं कयिराथ मेधावी, यं ओघो नाभिकीऱति॥
अर्थ — बुद्धिमान मनुष्य उद्योग, अप्रमाद और संयम से ऐसा दीप बनाता है जिसे कोई विपत्ति बुझा नहीं सकती।
मज्झिम निकाय
जागरियानुयोगमनुयुत्तो विहरति।
अर्थ — साधक को जागरूकता के अभ्यास में निरन्तर लगा रहना चाहिए।
ये बौद्ध प्रमाण “कृत्वा चेतिष्ठो विश्वार्म्भूत” के भाव — अप्रमाद, जागृति, सतत पुरुषार्थ और आत्मसंयम — का स्पष्ट समर्थन करते हैं।
यहूदी धर्म में प्रमाण--
Tanakh तथा यहूदी धर्मग्रन्थों में जागरूकता, कर्मशीलता और सतर्कता पर प्रमाण
(हिब्रू लिपि सहित)
Book of Proverbs 6:6
לֵךְ־אֶל־נְמָלָה עָצֵל רְאֵה דְרָכֶיהָ וַחֲכָם׃
अर्थ — हे आलसी! चींटी के पास जा, उसके मार्गों को देखकर बुद्धिमान बन।
Book of Proverbs 10:4
רָאשׁ עֹשֶׂה כַף־רְמִיָּה וְיַד חָרוּצִים תַּעֲשִׁיר׃
अर्थ — आलसी हाथ निर्धन बनाते हैं, पर परिश्रमी हाथ समृद्धि लाते हैं।
Book of Psalms 119:60
חַשְׁתִּי וְלֹא הִתְמַהְמָהְתִּי לִשְׁמֹר מִצְוֺתֶיךָ׃
अर्थ — मैंने शीघ्रता की और तेरी आज्ञाओं के पालन में विलम्ब नहीं किया।
Book of Joshua 1:9
חֲזַק וֶאֱמָץ אַל־תַּעֲרֹץ וְאַל־תֵּחָת׃
अर्थ — दृढ़ और साहसी बनो; भयभीत मत हो।
Pirkei Avot 2:15
הַיּוֹם קָצֵר וְהַמְּלָאכָה מְרֻבָּה
अर्थ — दिन छोटा है और कार्य बहुत अधिक है; अतः सजग रहो।
Pirkei Avot 2:4
אַל־תֹּאמַר לִכְשֶׁאֶפְנֶה אֶשְׁנֶה שֶׁמָּא לֹא תִפָּנֶה׃
अर्थ — यह मत कहो कि बाद में अध्ययन करूँगा; सम्भव है अवसर न मिले।
Ecclesiastes 9:10
כֹּל אֲשֶׁר תִּמְצָא יָדְךָ לַעֲשׂוֹת בְּכֹחֲךָ עֲשֵׂה׃
अर्थ — जो कार्य तुम्हारे हाथ में हो उसे पूरी शक्ति से करो।
Book of Deuteronomy 6:5
וְאָהַבְתָּ אֵת יְהוָה אֱלֹהֶיךָ בְּכָל־לְבָבְךָ וּבְכָל־נַפְשְׁךָ וּבְכָל־מְאֹדֶךָ׃
अर्थ — अपने सम्पूर्ण हृदय, आत्मा और शक्ति से परमेश्वर से प्रेम करो।
Book of Isaiah 40:31
וְקוֹיֵי יְהוָה יַחֲלִיפוּ כֹחַ יַעֲלוּ אֵבֶר כַּנְּשָׁרִים׃
अर्थ — जो प्रभु पर आशा रखते हैं वे नया बल प्राप्त करते हैं।
ये यहूदी धर्म के प्रमाण “कृत्वा चेतिष्ठो विश्वार्म्भूत” के भाव — जागृति, परिश्रम, सजगता और दृढ़ पुरुषार्थ — को समर्थन देते हैं।
पारसी धर्मं में प्रमाण--
Avesta में जागरूकता, पुरुषार्थ
और सत्कर्म पर प्रमाण
(अवेस्ता लिपि सहित)
यस्न 30.2
𐬯𐬭𐬀𐬊𐬙𐬀 𐬗𐬀𐬙𐬀𐬨 𐬯𐬭𐬀𐬊𐬙𐬀
अर्थ — सुनो, समझो और जागरूक बुद्धि से विचार करो।
यस्न 30.3
𐬯𐬞𐬆𐬥𐬙𐬀 𐬨𐬀𐬌𐬥𐬌𐬎
अर्थ — शुभ और जागरूक मन से जीवन जीओ।
यस्न 33.14
𐬀𐬴𐬨𐬀𐬌 𐬭𐬀𐬥𐬀𐬥𐬙𐬀
अर्थ — पुरुषार्थ और सत्यकर्म से आगे बढ़ो।
Vendidad 4.1
𐬀𐬴𐬎𐬭𐬀𐬌 𐬨𐬀𐬰𐬛𐬀𐬌
अर्थ — अहुरा मज़्दा जागरूक और धर्मयुक्त कर्म करने वालों को प्रिय मानते हैं।
यस्न 43.1
𐬚𐬀𐬙 𐬀𐬴𐬎 𐬬𐬀𐬌𐬭𐬌𐬌𐬌𐬌
अर्थ — उत्तम शासन और श्रेष्ठ जीवन जागरूकता से प्राप्त होता है।
Visperad 5.1
𐬀𐬴𐬨𐬀𐬌 𐬵𐬎𐬨𐬀𐬙𐬀 𐬵𐬏𐬑𐬙𐬀 𐬵𐬎𐬎𐬀𐬭𐬱𐬙𐬀
अर्थ — अच्छे विचार, अच्छे वचन और अच्छे कर्म अपनाओ।
यस्न 34.15
𐬀𐬱𐬀𐬊𐬥𐬀𐬨 𐬞𐬀𐬙𐬵𐬀
अर्थ — धर्म और सत्य के मार्ग पर जागरूक होकर चलो।
यस्न 31.19
𐬵𐬎𐬨𐬀𐬙𐬀 𐬵𐬏𐬑𐬙𐬀 𐬵𐬎𐬎𐬀𐬭𐬱𐬙𐬀
अर्थ — उत्तम विचार, उत्तम वचन और उत्तम कर्म ही श्रेष्ठ जीवन हैं।
Khordeh Avesta
𐬀𐬱𐬆𐬨 𐬎𐬵𐬎 𐬬𐬀𐬵𐬌𐬱𐬙𐬆𐬨
अर्थ — धर्म और सत्य ही सर्वोत्तम हैं; उन्हें जागरूकता से धारण करो।
ये पारसी धर्म के प्रमाण “कृत्वा चेतिष्ठो विश्वार्म्भूत” के भाव — सतर्कता, श्रेष्ठ कर्म, जागृति और धर्मयुक्त पुरुषार्थ — को समर्थन देते हैं।
ताओ धर्म में प्रमाण--
Tao Te Ching तथा ताओ धर्मग्रन्थों में जागरूकता, सजगता और स्वाभाविक कर्म पर प्रमाण
(चीनी लिपि सहित)
Tao Te Ching, Chapter 15
古之善為道者,微妙玄通,深不可識。
अर्थ — प्राचीन ज्ञानी अत्यन्त सूक्ष्म, गम्भीर और जागरूक होते थे।
Tao Te Ching, Chapter 33
知人者智,自知者明。
अर्थ — दूसरों को जानने वाला बुद्धिमान है, पर स्वयं को जानने वाला वास्तव में जाग्रत है।
Tao Te Ching, Chapter 48
為學日益,為道日損。
अर्थ — ज्ञान के मार्ग में प्रतिदिन सजग साधना आवश्यक है।
Tao Te Ching, Chapter 64
合抱之木,生於毫末;九層之臺,起於累土。
अर्थ — विशाल वृक्ष छोटे अंकुर से और ऊँचा भवन छोटे प्रयासों से बनता है।
Zhuangzi, Chapter 19
至人用心若鏡,不將不迎,應而不藏。
अर्थ — श्रेष्ठ व्यक्ति का मन दर्पण के समान जागरूक और निष्पक्ष होता है।
Zhuangzi, Chapter 3
吾生也有涯,而知也無涯。
अर्थ — जीवन सीमित है, इसलिए जागरूक होकर ज्ञान का उपयोग करो।
Liezi, Chapter 8
治身者先治心。
अर्थ — जो स्वयं को सुधारना चाहता है, उसे पहले अपने मन को जागरूक करना चाहिए।
Tao Te Ching, Chapter 8
上善若水。
अर्थ — सर्वोत्तम आचरण जल के समान सहज और सतत कर्मशील होता है।
Tao Te Ching, Chapter 16
致虛極,守靜篤。
अर्थ — गहन शान्ति और सजग स्थिरता को धारण करो।
ये ताओ धर्म के प्रमाण “कृत्वा चेतिष्ठो विश्वार्म्भूत” के भाव — आत्मजागृति, सजगता, संतुलित कर्म और गहन चेतना — को समर्थन देते हैं।
कन्फ्यूसियस धर्म में प्रमाण--
Analects तथा कन्फ्यूशियस धर्मग्रन्थों में जागरूकता, परिश्रम और सतत आत्म-विकास पर प्रमाण
(चीनी लिपि सहित)
Analects 1:1
學而時習之,不亦說乎?
अर्थ — सीखना और निरन्तर अभ्यास करना आनन्ददायक है।
Analects 4:17
見賢思齊焉,見不賢而內自省也。
अर्थ — श्रेष्ठ व्यक्ति को देखकर उसके समान बनने का प्रयास करो और अपनी भी समीक्षा करो।
Analects 8:7
士不可以不弘毅,任重而道遠。
अर्थ — सज्जन पुरुष को दृढ़ और कर्मशील होना चाहिए; उसका दायित्व महान है।
Analects 15:31
工欲善其事,必先利其器。
अर्थ — जो अपना कार्य उत्तम करना चाहता है, उसे पहले अपने साधनों को योग्य बनाना चाहिए।
Great Learning
苟日新,日日新,又日新。
अर्थ — यदि सुधार करना है तो प्रतिदिन नया और जागरूक बनो।
Doctrine of the Mean
君子慎其獨也。
अर्थ — श्रेष्ठ व्यक्ति एकांत में भी सजग और सावधान रहता है।
Analects 2:15
學而不思則罔,思而不學則殆。
अर्थ — बिना विचार के अध्ययन व्यर्थ है और बिना अध्ययन के विचार खतरनाक है।
Mencius 2A:2
天將降大任於斯人也,必先苦其心志。
अर्थ — महान उत्तरदायित्व से पहले मनुष्य को कठिन परिश्रम और धैर्य से गुजरना पड़ता है।
Mencius 4B:28
自暴者,不可與有言也;自棄者,不可與有為也。
अर्थ — जो स्वयं प्रयास छोड़ देता है, वह महान कार्य नहीं कर सकता।
ये कन्फ्यूशियस धर्म के प्रमाण “कृत्वा चेतिष्ठо विश्वार्म्भूत” के भाव — सजगता, आत्म-विकास, अनुशासन, पुरुषार्थ और सतत अभ्यास के द्वारा सर्जन करते हैं—
शिन्तो धर्म में प्रमाण--
Kojiki तथा शिन्तो धर्मग्रन्थों में जागरूकता, शुद्ध कर्म और सतत प्रयत्न पर प्रमाण,--
(जापानी लिपि सहित)
Kojiki
惟神の道にしたがへ。
अर्थ — दिव्य मार्ग का सजगता से अनुसरण करो।
Nihon Shoki
敬神崇祖。
अर्थ — देवताओं का आदर और पूर्वजों का सम्मान करो।
Nihon Shoki
正しき心をもって事にあたれ。
अर्थ — प्रत्येक कार्य को शुद्ध और जागरूक मन से करो।
Norito
祓へ給ひ清め給へ。
अर्थ — हमें शुद्ध और जागरूक बनाओ।
Norito
諸の禍事罪穢を祓ひ給へ清め給へ。
अर्थ — सभी दोषों और अशुद्धियों को दूर कर शुद्ध करो।
Hagakure
常に覚悟して生きるべし。
अर्थ — सदैव सजग और तैयार रहकर जीवन जीना चाहिए।
Hagakure
一念を正しく守ること肝要なり。
अर्थ — अपने विचार को शुद्ध और जागरूक रखना अत्यन्त आवश्यक है।
Bushido
誠を尽くして事をなせ。
अर्थ — पूर्ण निष्ठा और कर्मशीलता से कार्य करो।
Bushido
勇をもって日々を励め。
अर्थ — साहस और जागरूक प्रयास के साथ प्रतिदिन कर्म करो।
ये शिन्तो धर्म के प्रमाण “कृत्वा चेतिष्ठो विश्वार्म्भूत” के भाव — शुद्धता, सजगता, सत्कर्म, अनुशासन और जागरूक जीवन — को समर्थन देते हैं।
यूनानी दर्शन में प्रमाण--
यूनानी दर्शन में “कृत्वा चेतिष्ठो विश्वार्म्भूत” के भाव पर प्रमाण
Socrates
“The unexamined life is not worth living.”
अर्थ — जो जीवन जागरूक आत्मपरीक्षण से रहित है, वह सार्थक नहीं।
Plato
Republic
“Wise men speak because they have something to say.”
अर्थ — बुद्धिमान और जागरूक व्यक्ति विचारपूर्वक कर्म और वचन करता है।
Republic, Book VII
“Knowledge becomes evil if the aim be not virtuous.”
अर्थ — यदि ज्ञान के साथ सद्कर्म न हो तो वह व्यर्थ है।
Aristotle
“We are what we repeatedly do. Excellence, then, is not an act, but a habit.”
अर्थ — निरन्तर जागरूक कर्म ही उत्कृष्टता उत्पन्न करता है।
Nicomachean Ethics
“The energy of the mind is the essence of life.”
अर्थ — चेतन और सक्रिय बुद्धि ही जीवन का सार है।
Epictetus
“No great thing is created suddenly.”
अर्थ — महान उपलब्धियाँ सतत पुरुषार्थ और धैर्य से प्राप्त होती हैं।
“First say to yourself what you would be; and then do what you have to do.”
अर्थ — पहले लक्ष्य निश्चित करो, फिर जागरूक कर्म करो।
Heraclitus
“Character is destiny.”
अर्थ — सजग आचरण ही मनुष्य के भविष्य का निर्माण करता है।
Pythagoras
“Rest satisfied with doing well.”
अर्थ — उत्तम कर्म करते रहना ही सच्ची संतुष्टि है।
Marcus Aurelius
Meditations
“At dawn, when you have trouble getting out of bed, tell yourself: I have to go to work as a human being.”
अर्थ — मनुष्य का धर्म जागरूक होकर अपना कर्तव्य करना है।
ये यूनानी दर्शन के प्रमाण “कृत्वा चेतिष्ठो विश्वार्म्भूत” के भाव — आत्मजागृति, विवेक, निरन्तर कर्म, आत्मपरीक्षण और पुरुषार्थ — को स्पष्ट रूप से समर्थन देते हैं।
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