(77) वराहोपनिषद--

वराहोपनिषद ---
वराहोपनिषद् कृष्ण यजुर्वेद से सम्बद्ध एक योग-वेदान्तप्रधान उपनिषद् है। इसमें भगवान् वराह और ऋषि के संवाद के माध्यम से ब्रह्मज्ञान, आत्मतत्त्व, योग, ध्यान, प्राणायाम और मोक्ष का वर्णन मिलता ह
वराहोपनिषद् में पाँच अध्याय हैं।
प्रथम अध्याय — आत्मज्ञान और ब्रह्मतत्त्व
द्वितीय अध्याय — योग और मन की साधना
तृतीय अध्याय — प्राणायाम, प्रत्याहार आदि योग विधियाँ
चतुर्थ अध्याय — आत्मा, ब्रह्म और अद्वैतज्ञान
पञ्चम अध्याय — मोक्ष, जीवन्मुक्ति और परमज्ञान
प्रथम कध्याय--
 वराहोपनिषद् के प्रथम अध्याय में भगवान् वराह और महर्षि ऋभु का संवाद है। इस अध्याय में मुख्यतः २४, ३६ और ९६ तत्त्वों की गणना, जीव की अवस्थाएँ तथा आत्मज्ञान से मुक्ति का प्रतिपादन किया गया है। उपलब्ध संस्कृत पाठ में प्रथम अध्याय १७ मंत्रों में समाप्त होता है। 
 प्रथम अध्याय का मूल संस्कृत पाठ एवं हिन्दी अर्थ--
हरिः ॐ।
अथ ऋभुर्वै महामुनिर्देवमानेन द्वादशवत्सरं तपश्चचार। तदवसाने वराहरूपी भगवान्प्रादुरभूत्। स होवाचोत्तिष्ठोत्तिष्ठ वरं वृणीश्वेति। सोदतिष्ठत्। तस्मै नमस्कृत्योवाच—भगवन्! कामिभिर्यद्यत्कामितं तत्तत्त्वत्सकाशात्स्वप्नेऽपि न याचे। समस्तवेदशास्त्रेतिहासपुराणानि समस्तविद्याजालानि ब्रह्मादयः सुराः सर्वे त्वद्रूपज्ञानान्मुक्तिमाहुः। अतस्त्वद्रूपप्रतिपादिकां ब्रह्मविद्यां ब्रूहि इति होवाच। तथेति स होवाच वराहरूपी भगवान्—
मन्त्र १
चतुर्विंशतितत्त्वानि केचिदिच्छन्ति वादिनः।
केचित्षट्त्रिंशत्तत्त्वानि केचित्षण्णवतीनि च॥ १॥
अर्थ:
कुछ दार्शनिक इस जगत् में २४ तत्त्व मानते हैं, कुछ ३६ तत्त्व मानते हैं और कुछ ९६ तत्त्वों का प्रतिपादन करते हैं। भगवान् वराह अब इन तत्त्वों का क्रम बताते हैं। 
मन्त्र २
तेषां क्रमं प्रवक्ष्यामि सावधानमनाः शृणु।
ज्ञानेन्द्रियाणि पञ्चैव श्रोत्रत्वग्लोचनादयः॥ २॥
अर्थ:
हे ऋभु! मैं उन तत्त्वों का क्रम तुम्हें बताता हूँ, इसलिए सावधान होकर सुनो। पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ हैं—कान (श्रोत्र), त्वचा (त्वक्), आँख (लोचन/चक्षु) आदि।
मन्त्र ३
कर्मेन्द्रियाणि पञ्चैव वाक्पाण्यङ्घ्र्यादयः क्रमात्।
प्राणादतस्तु पञ्चैव पञ्च शब्दादयस्तथा॥ ३॥
अर्थ:
पाँच कर्मेन्द्रियाँ हैं—वाणी, हाथ, पैर आदि। इसी प्रकार पाँच प्राण हैं तथा पाँच विषय/तन्मात्राएँ हैं—शब्द आदि।
मन्त्र ४
मनोबुद्धिरहङ्कारश्चित्तं चेति चतुष्टयम्।
चतुर्विंशतितत्त्वानि तानि ब्रह्मविदो विदुः॥ ४॥
अर्थ:
मन, बुद्धि, अहंकार और चित्त—ये अन्तःकरण के चार अंग हैं। ज्ञानेन्द्रियाँ, कर्मेन्द्रियाँ, प्राण, विषय और अन्तःकरण आदि को मिलाकर २४ तत्त्व माने जाते हैं। ब्रह्मवेत्ता इनका इस प्रकार विवेचन करते हैं।
मन्त्र ५
एतैस्तत्त्वैः समं पञ्चीकृतभूतानि पञ्च च।
पृथिव्यापस्तथा तेजो वायुराकाशमेव च॥ ५॥
अर्थ:
इन तत्त्वों के साथ पाँच स्थूल महाभूतों को भी समझना चाहिए
पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश।
मन्त्र ६
देहत्रयं स्थूलसूक्ष्मकारणानि विदुर्बुधाः।
अवस्थात्रितयं चैव जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तयः॥ ६॥
अर्थ:
ज्ञानी पुरुष शरीर के तीन प्रकार बताते हैं—स्थूल शरीर, सूक्ष्म शरीर और कारण शरीर।
जीव की तीन अवस्थाएँ हैं—जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति (गहरी निद्रा)।
मन्त्र ७
आहत्य तत्त्वजातानां षट्त्रिंशन्मुनयो विदुः।
पूर्वोक्तैस्तत्त्वजातैस्तु समं तत्त्वानि योजयेत्॥ ७॥
अर्थ:
पूर्व में बताए गए तत्त्वों को शरीर और अवस्थाओं आदि के साथ जोड़कर मुनियों ने ३६ तत्त्वों का भी निरूपण किया है।
मन्त्र ८
षड्भावविकृतिश्चास्ति जायते वर्धतेऽपि च।
परिणामं क्षयं नाशं षड्भावविकृतिं विदुः॥ ८॥
अर्थ:
शरीर और जगत् में छह प्रकार के परिवर्तन देखे जाते हैं—
जन्म लेना, बढ़ना, परिणाम/परिवर्तन होना, क्षीण होना और नष्ट होना आदि। इन्हें षड्भाव-विकार कहा गया है।
मन्त्र ९
अशना च पिपासा च शोकमोहौ जरा मृतिः।
एते षडूर्मयः प्रोक्ताः षट्कोशानथ वच्मि ते॥ ९॥
अर्थ:
भूख, प्यास, शोक, मोह, बुढ़ापा और मृत्यु—ये छह ऊर्मियाँ अर्थात् जीवन को प्रभावित करने वाली अवस्थाएँ हैं। अब मैं तुम्हें छह कोश/शारीरिक धातुओं के विषय में बताता हूँ।
मन्त्र १०
त्वक्च रक्तं मांसमेदोमज्जास्थीनि निबोधत।
कामक्रोधौ लोभमोहौ मदो मात्सर्यमेव च॥ १०॥
अर्थ:
शरीर से सम्बन्धित छह प्रमुख धातु/अवयव हैं—त्वचा, रक्त, मांस, मेद, मज्जा और अस्थि।
और मनुष्य के छह आन्तरिक शत्रु हैं—काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मात्सर्य (ईर्ष्या)।
मन्त्र ११
एतेऽरिषड्वा विश्वश्च तैजसः प्राज्ञ एव च।
जीवत्रयं सत्त्वरजस्तमांसि च गुणत्रयम्॥ ११॥
अर्थ:
काम आदि ये छह अरिषड्वर्ग हैं। जीव की तीन अवस्थागत संज्ञाएँ हैं—विश्व, तैजस और प्राज्ञ।
इसी प्रकार प्रकृति के तीन गुण हैं—सत्त्व, रजस् और तमस्।
मन्त्र १२
प्रारब्धागाम्यर्जितानि कर्मत्रयमितीरितम्।
वचनादानगमनविसर्गानन्दपञ्चकम्॥ १२॥
अर्थ:
कर्म के तीन प्रकार बताए गए हैं—प्रारब्ध, आगामी और अर्जित/संचित कर्म।
कर्मेन्द्रियों के पाँच कार्य हैं—वचन (बोलना), आदान (ग्रहण करना), गमन (चलना), विसर्ग (त्याग/उत्सर्जन) और आनन्द।
मन्त्र १३
सङ्कल्पोऽध्यवसायश्च अभिमानोऽवधारणा।
मुदिता करुणा मैत्री उपेक्षा च चतुष्टयम्॥ १३॥
अर्थ:
अन्तःकरण के चार प्रमुख कार्य हैं—
संकल्प, निश्चय, अभिमान और अवधारणा।
और चार भाव बताए गए हैं—
मुदिता (प्रसन्नता), करुणा (दया), मैत्री (मित्रभाव) और उपेक्षा।
मन्त्र १४
दिग्वातार्कप्रचेतोऽश्विवह्नीन्द्रोपेन्द्रमृत्युकाः।
तथा चन्द्रश्चतुर्वक्त्रो रुद्रः क्षेत्रज्ञ ईश्वरः॥ १४॥
अर्थ:
दिशा, वायु, सूर्य, वरुण, अश्विनीकुमार, अग्नि, इन्द्र, उपेन्द्र (विष्णु), मृत्यु/यम, चन्द्र, चतुर्मुख ब्रह्मा, रुद्र, क्षेत्रज्ञ और ईश्वर—इनको भी तत्त्वों की गणना में सम्मिलित किया गया है। 
मन्त्र १५
आहत्य तत्त्वजातानां षण्णवत्यस्तु कीर्तिताः।
पूर्वोक्ततत्त्वजातानां वैलक्षण्यमनामयम्॥ १५॥
अर्थ:
इस प्रकार इन सभी तत्त्वों को मिलाकर ९६ तत्त्वों का वर्णन किया गया है। लेकिन इन समस्त परिवर्तनशील तत्त्वों से परे जो आत्मतत्त्व है, वह निर्दोष, निर्विकार और रोगरहित है।
मन्त्र १६
वराहरूपिणं मां ये भजन्ति मयि भक्तितः।
विमुक्ताज्ञानतत्कार्या जीवन्मुक्ता भवन्ति ते॥ १६॥
अर्थ:
भगवान् वराह कहते हैं—जो लोग मुझे वराहरूप में भक्ति और श्रद्धा से भजते हैं, वे अज्ञान और उसके कार्यों से मुक्त होकर जीवन्मुक्त हो जाते हैं।
अर्थात् केवल बाहरी पूजा ही नहीं, बल्कि भगवान् के वास्तविक स्वरूप का ज्ञान मनुष्य को अज्ञान के बन्धन से मुक्त करता है।
मन्त्र १७
ये षण्णवतितत्त्वज्ञा यत्र कुत्राश्रमे रताः।
जटी मुण्डी शिखी वापि मुच्यते नात्र संशयः॥ १७॥
अर्थ:
जो व्यक्ति इन ९६ तत्त्वों के वास्तविक स्वरूप को जान लेता है, वह चाहे किसी भी आश्रम में स्थित हो—चाहे जटाधारी हो, मुंडित हो या शिखाधारी—वह मुक्त हो जाता है। इसमें कोई संदेह नहीं।
इति प्रथमोध्यायः ॥ १॥
प्रथम अध्याय का सार--
इस अध्याय का मूल संदेश यह है कि मनुष्य को शरीर, इन्द्रियों, मन, बुद्धि, अहंकार, गुण, कर्म और अवस्थाओं को ही अपना वास्तविक स्वरूप नहीं मानना चाहिए। ये सभी तत्त्व परिवर्तनशील हैं। इनके पीछे स्थित आत्मचैतन्य ही वास्तविक तत्त्व है।
विशेष रूप से अन्तिम दो मन्त्र यह शिक्षा देते हैं कि तत्त्वज्ञान + भक्ति + अज्ञान से मुक्ति = जीवन्मुक्ति। वराहोपनिषद् आगे के अध्यायों में इसी आत्मज्ञान को और विस्तार से समझाया है।
द्वितीय अध्याय--
  इसमें ऋभु को भगवान् वराह द्वारा ब्रह्मविद्या, साधनचतुष्टय, आत्मस्वरूप, मनोनिग्रह और नादानुसन्धान की शिक्षा दी गई है। यह अध्याय कुल ८३ मंत्र/श्लोकों में समाप्त होता है।
वराहोपनिषद्  के द्वितीय अध्याय
का मूल संस्कृत पाठ एवं हिन्दी अर्थ--
१--ऋभुर्नाम महायोगी क्रोडरूपं रमापतिम्।
वरिष्ठां ब्रह्मविद्यां त्वमधीहि भगवन्मम।
एवं स स्पृष्टो भगवान्प्राह भक्तार्तिभञ्जनः॥ १॥
अर्थ:
महायोगी ऋभु ने वराहरूपधारी भगवान् विष्णु से कहा—
हे भगवान्! मुझे उस श्रेष्ठ ब्रह्मविद्या का उपदेश दीजिए, जिससे परम सत्य का ज्ञान हो। भक्तों के दुःखों को दूर करने वाले भगवान् ने ऐसा पूछे जाने पर उपदेश आरम्भ किया।
२--स्ववर्णाश्रमधर्मेण तपसा गुरुतोषणात्।
साधनं प्रभवेत्पुंसां वैराग्यादिचतुष्टयम्॥ २॥
अर्थ:
मनुष्य अपने वर्ण और आश्रम के कर्तव्यों का पालन, तप तथा गुरु को प्रसन्न करने के द्वारा साधनचतुष्टय प्राप्त कर सकता है। इसमें वैराग्य आदि चार साधन प्रमुख हैं।
३--नित्यानित्यविवेकश्च इहामुत्र विरागता।
शमादिषट्कसम्पत्तिर्मुमुक्षा तां समभ्यसेत्॥ ३॥
अर्थ:
साधनचतुष्टय के चार अंग हैं—
नित्य और अनित्य का विवेक,
इस लोक और परलोक के भोगों से वैराग्य,
शम आदि छह गुणों की सम्पत्ति,
मोक्ष की तीव्र इच्छा—मुमुक्षा।
मनुष्य को इनका अभ्यास करना चाहिए। 
४--एवं जितेन्द्रियो भूत्वा सर्वत्र ममतामतिम्।
विहाय साक्षिचैतन्ये मयि कुर्यादहंमतिम्॥ ४॥
अर्थ:
इस प्रकार इन्द्रियों को वश में करके और संसार की वस्तुओं में 'मेरा-मेरा' की भावना छोड़कर मनुष्य को साक्षीस्वरूप चैतन्य अर्थात् मुझ परमात्मा में 'मैं' की भावना स्थापित करनी चाहिए।
५--दुर्लभं प्राप्य मानुष्यं तत्रापि नरविग्रहम्।
ब्राह्मण्यं च महाविष्णोर्वेदान्तश्रवणादिना॥ ५॥
अर्थ:
मनुष्य जन्म अत्यन्त दुर्लभ है। उसमें भी ऐसा मानव शरीर प्राप्त होना दुर्लभ है जिसमें वेदान्त का श्रवण, मनन और आत्मज्ञान की साधना की जा सके।
६--अतिवर्णाश्रमं रूपं सच्चिदानन्दलक्षणम्।
यो न जानाति सोऽविद्वान्कदा मुक्तो भविष्यति॥ ६॥
अर्थ:
परमात्मा का स्वरूप वर्ण और आश्रम से परे है। उसका लक्षण सत्-चित्-आनन्द है। जो इस स्वरूप को नहीं जानता, वह अज्ञानी है; फिर वह कब मुक्त होगा?
७--अहमेव सुखं नान्यदन्यच्चेन्नैव तत्सुखम्।
अमदर्थं न हि प्रेयो मदर्थं न स्वतःप्रियम्॥ ७॥
अर्थ:
वास्तविक सुख मैं ही हूँ; मुझसे अलग कोई वस्तु अपने-आप सुखस्वरूप नहीं है। जो कुछ प्रिय प्रतीत होता है, वह मेरे कारण ही प्रिय है।
८--परप्रेमास्पदतया मा न भूवमहं सदा।
भूयासमिति यो द्रष्टा सोऽहं विष्णुर्मुनीश्वर॥ ८॥
अर्थ:
हे मुनीश्वर! जो यह अनुभव करता है—“मैं किसी दूसरे के लिए प्रेम का विषय न बनूँ, बल्कि मैं स्वयं सदा परम प्रिय रहूँ”—वही आत्मा का स्वरूप है। वही मैं विष्णु हूँ।
९--न प्रकाशोऽहमित्युक्तिर्यत्प्रकाशैकबन्धना।
स्वप्रकाशं तमात्मानमप्रकाशः कथं स्पृशेत्॥ ९॥
अर्थ:
'मैं प्रकाशित नहीं हूँ' ऐसा कहना भी प्रकाश के ज्ञान पर ही निर्भर है। आत्मा स्वयंप्रकाश है; जो स्वयं प्रकाशस्वरूप है, उसे अज्ञान का अन्धकार कैसे स्पर्श कर सकता है?
१--स्वयं भातं निराधारं ये जानन्ति सुनिश्चितम्।
ते हि विज्ञानसम्पन्ना इति मे निश्चिता मतिः॥ १०॥
अर्थ:
जो आत्मा को स्वयं प्रकाशित और किसी अन्य आधार पर निर्भर न रहने वाला जान लेते हैं, वे ही वास्तविक ज्ञान से सम्पन्न हैं—यह मेरा निश्चित मत है।
११--स्वपूर्णात्मातिरेकेण जगज्जीवेश्वरादयः।
न सन्ति नास्ति तेषां च स्वरूपं ह्येतदात्मकम्॥ ११॥
अर्थ:
अपने पूर्ण आत्मस्वरूप से अलग जगत्, जीव और ईश्वर की कोई स्वतंत्र सत्ता नहीं है। इन सबका वास्तविक आधार वही आत्मतत्त्व है।
१२--आत्मानमखिलाधारमाश्रित्य परितः स्थितम्।
आत्मानं संश्रिताः सर्वे नात्मानं संश्रितः क्वचित्॥ १२॥
अर्थ:
आत्मा ही सम्पूर्ण जगत् का आधार है। सब कुछ आत्मा पर आश्रित है, पर आत्मा स्वयं किसी अन्य वस्तु पर आश्रित नहीं है।
१३--सर्वत्र पूर्णरूपेण स्थितमात्मानमव्ययम्।
नित्यानन्दं चिदानन्दं सच्चिदानन्दमद्वयम्॥ १३॥
अर्थ:
आत्मा सर्वत्र पूर्णरूप से स्थित है और अविनाशी है। वह नित्य आनन्द, चैतन्य और सत्-चित्-आनन्द का अद्वैत स्वरूप है।
१४--यः साक्षी सर्वभूतानां यः सर्वत्र व्यवस्थितः।
यः सर्वसाक्षी विज्ञेयः स आत्मा परमेश्वरः॥ १४॥
अर्थ:
जो सभी प्राणियों का साक्षी है और सबमें स्थित है, जो सबका साक्षी है—उसी को आत्मा और परमेश्वर जानना चाहिए।
१५--यथा दीपो निवातस्थो नेङ्गते सोपमा स्मृता।
तथा यः स्थिरचित्तात्मा स योगी परिकीर्तितः॥ १५॥
अर्थ:
जिस प्रकार वायु रहित स्थान में रखा दीपक हिलता नहीं, उसी प्रकार जिसका चित्त स्थिर हो गया है, वही सच्चा योगी कहलाता है।
यहाँ से उपनिषद् आत्मस्वरूप और मन के सम्बन्ध को और सूक्ष्म रूप से समझाता है। 
१६--सत्यज्ञानानन्दपूर्णलक्षणं तमसः परम् ।
ब्रह्मानन्दं सदा पश्यन् कथं बध्येत कर्मणा ॥ १६॥
अर्थ:
जो अज्ञानरूपी अन्धकार से परे, सत्य-ज्ञान-आनन्द से पूर्ण ब्रह्मानन्द का निरन्तर अनुभव करता है, वह कर्मों से कैसे बँध सकता है?
१७--त्रिधामसाक्षिणं सत्यज्ञानानन्दादिलक्षणम् ।
त्वमहंशब्दलक्ष्यार्थमसक्तं सर्वदोषतः ॥ १७॥
अर्थ:
जो जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति—इन तीनों अवस्थाओं का साक्षी है और सत्य, ज्ञान तथा आनन्दस्वरूप है, वही ‘त्वम्’ और ‘अहम्’ शब्दों का वास्तविक लक्ष्यार्थ है। वह सभी दोषों से रहित और आसक्ति से मुक्त है।
१८--सर्वगं सच्चिदात्मानं ज्ञानचक्षुर्निरीक्षते ।
अज्ञानचक्षुर्नेक्षेत भास्वन्तं भानुमन्धवत् ॥ १८॥
अर्थ:
ज्ञान की आँख वाला व्यक्ति सर्वव्यापक सत्-चित् आत्मा को देखता है। अज्ञानी उसे उसी प्रकार नहीं देख पाता, जैसे अन्धा प्रकाशित सूर्य को नहीं देख सकता।
१९--प्रज्ञानमेव तद्ब्रह्म सत्यप्रज्ञानलक्षणम् ।
एवं ब्रह्मपरिज्ञानादेव मर्त्योऽमृतो भवेत् ॥ १९॥
अर्थ:
वह ब्रह्म ही प्रज्ञान अर्थात् शुद्ध चेतना है। उसका स्वरूप सत्य-प्रज्ञान है। इस ब्रह्मज्ञान से ही नश्वर मनुष्य अमृतस्वरूप हो जाता है।
२०--तद्ब्रह्मानन्दमद्वन्द्वं निर्गुणं सत्यचिद्घनम् ।
विदित्वा स्वात्मनो रूपं न बिभेति कुतश्चन ॥ २०॥
अर्थ:
वह ब्रह्म द्वन्द्वों से रहित आनन्दस्वरूप, निर्गुण और सत्य-चैतन्य का घन है। अपने आत्मस्वरूप को जान लेने वाला व्यक्ति किसी से भी भयभीत नहीं होता।
२१--चिन्मात्रं सर्वगं नित्यं सम्पूर्णं सुखमद्वयम् ।
साक्षाद्ब्रह्मैव नान्योऽस्तीत्येवं ब्रह्मविदां स्थितिः ॥ २१॥
अर्थ:
आत्मा केवल चैतन्य है—सर्वव्यापक, नित्य, पूर्ण और अद्वैत आनन्दस्वरूप। ब्रह्मवेत्ताओं की अनुभूति है कि प्रत्यक्ष ब्रह्म के अतिरिक्त कोई दूसरी स्वतंत्र सत्ता नहीं है।
२२--अज्ञस्य दुःखौघमयं ज्ञस्यानन्दमयं जगत् ।
अन्धं भुवनमन्धस्य प्रकाशं तु सुचक्षुषाम् ॥ २२॥
अर्थ:
अज्ञानी को यह संसार दुःखों से भरा दिखाई देता है, जबकि ज्ञानी को यही जगत् आनन्दमय दिखाई देता है। जैसे अन्धे के लिए संसार अन्धकारमय और दृष्टिवान के लिए प्रकाशमय है।
२३--अनन्ते सच्चिदानन्दे मयि वाराहरूपिणी ।
स्थितेऽद्वितीयभावः स्यात्को बन्धः कश्च मुच्यते ॥ २३॥
अर्थ:
जब मैं वराहरूप भगवान् अनन्त सत्-चित्-आनन्दस्वरूप में स्थित हूँ और दूसरा कुछ है ही नहीं, तब बन्धन किसका है और मुक्ति किसकी?
२४--स्वस्वरूपं तु चिन्मात्रं सर्वदा सर्वदेहिनाम् ।
नैव देहादिसङ्घातो घटवद्दृशिगोचरः ॥ २४॥
अर्थ:
सभी शरीरधारियों का वास्तविक स्वरूप सदा शुद्ध चैतन्य है। शरीर और उसके अंग वास्तविक आत्मा नहीं हैं; वे घट की तरह दृश्य हैं।
२५--स्वात्मनोऽन्यदिवाभातं चराचरमिदं जगत् ।
स्वात्ममात्रतया बुद्ध्वा तदस्मीति विभावय ॥ २५॥
अर्थ:
जो चर-अचर जगत् अपने आत्मस्वरूप से अलग दिखाई देता है, उसे आत्मस्वरूप ही समझो और अनुभव करो—“वह मैं ही हूँ।”
२६--स्वस्वरूपं स्वयं भुङ्क्ते नास्ति भोज्यं पृथक् स्वतः ।
अस्ति चेदस्तितारूपं ब्रह्मैवास्तित्वलक्षणम् ॥ २६॥
अर्थ:
आत्मा अपने ही स्वरूप में स्थित है; उससे अलग कोई स्वतंत्र ‘भोज्य’ वस्तु नहीं है। यदि किसी वस्तु की सत्ता है, तो उसकी अस्तित्व-सत्ता भी ब्रह्म से ही है।
२७--ब्रह्मविज्ञानसम्पन्नः प्रतीतमखिलं जगत् ।
पश्यन्नपि सदा नैव पश्यति स्वात्मनः पृथक् ॥ २७॥
अर्थ:
ब्रह्मज्ञान से सम्पन्न व्यक्ति संसार को देखता हुआ भी उसे अपने आत्मस्वरूप से अलग नहीं देखता।
२८--मत्स्वरूपपरिज्ञानात्कर्मभिर्न स बध्यते ॥ २८॥
अर्थ:
मेरे वास्तविक स्वरूप को जान लेने वाला व्यक्ति कर्मों से बँधता नहीं है।
२९--यः शरीरेन्द्रियादिभ्यो विहीनं सर्वसाक्षिणम् ।
परमार्थैकविज्ञानं सुखात्मानं स्वयंप्रभम् ॥ २९॥
अर्थ:
जो शरीर और इन्द्रियों आदि से परे, सबका साक्षी, परम सत्य का ज्ञानस्वरूप, आनन्दस्वरूप और स्वयंप्रकाश आत्मा है—
३०--स्वस्वरूपतया सर्वं वेद स्वानुभवेन यः ।
स धीरः स तु विज्ञेयः सोऽहं तत्त्वं ऋभो भव ॥ ३०॥
अर्थ:
जो अपने अनुभव से सबको अपने आत्मस्वरूप के रूप में जानता है, वही धीर और ज्ञानी है। हे ऋभु! जानो—“वही मैं हूँ।”
३१--अतः प्रपञ्चानुभवः सदा न हि स्वरूपबोधानुभवः सदा खलु 
इति प्रपश्यन्परिपूर्णवेदनो
न बन्धमुक्तो न च बद्ध एव तु ॥ ३१॥
अर्थ:
ज्ञानी के लिए बाहरी प्रपञ्च का अनुभव वास्तविक सत्य नहीं है; आत्मस्वरूप का अनुभव ही नित्य सत्य है। इस पूर्ण ज्ञान में स्थित व्यक्ति न बँधा हुआ है, न उसे अलग से मुक्त होना है।
३२--स्वस्वरूपानुसन्धानान्नृत्यन्तं सर्वसाक्षिणम् ।
मुहूर्तं चिन्तयेन्मां यः सर्वबन्धैः प्रमुच्यते ॥ ३२॥
अर्थ:
जो व्यक्ति कुछ समय भी अपने वास्तविक स्वरूप—सर्वसाक्षी आत्मा—का अनुसंधान करता है, वह सभी बन्धनों से मुक्त हो जाता है।
३३-/सर्वभूतान्तरस्थाय नित्यमुक्तचिदात्मने ।
प्रत्यक्चैतन्यरूपाय मह्यमेव नमोनमः ॥ ३३॥
अर्थ:
सभी प्राणियों के भीतर स्थित, नित्य मुक्त चैतन्यस्वरूप और अन्तरात्मा को बार-बार नमस्कार है।
३४--त्वं वहमस्मि भगवो देवतेऽहं वै त्वमसि ।
तुभ्यं मह्यमनन्ताय मह्यं तुभ्यं चिदात्मने ॥ ३४॥
अर्थ:
हे भगवान्! आप ही मैं हूँ और मैं ही आप हूँ। उस अनन्त चैतन्यस्वरूप आपको और अपने आत्मस्वरूप को नमस्कार है।
३५--नमो मह्यं परेशाय नमस्तुभ्यं शिवाय च ।
किं करोमि क्व गच्छामि किं गृह्णामि त्यजामि किम् ॥ ३५॥
अर्थ:
परमेश्वरस्वरूप अपने आत्मा को नमस्कार और शिवस्वरूप आपको नमस्कार। जब सब कुछ आत्मस्वरूप ही है, तब मैं क्या करूँ, कहाँ जाऊँ, क्या ग्रहण करूँ और क्या त्यागूँ?
३६--अन्तःसङ्गं बहिःसङ्गमात्मसङ्गं च यस्त्यजेत् ।
सर्वसङ्गनिवृत्तात्मा स मामेति न संशयः ॥ ३६॥
अर्थ:
जो भीतर की आसक्ति, बाहर की आसक्ति और ‘मैं’ की देहात्मक आसक्ति—तीनों को छोड़ देता है, वह सभी आसक्तियों से मुक्त होकर मुझे प्राप्त होता है। इसमें कोई संदेह नहीं।
३७--अहिरिव जनयोगं सर्वदा वर्जयेद्यः
कुणपमिव सुनारीं त्यक्तुकामो विरागी ।
विषमिव विषयादीन्मन्यमानो दुरन्ता-
ञ्जगति परमहंसो वासुदेवोऽहमेव ॥ ३७॥
अर्थ:
वैरागी व्यक्ति साँप की तरह अनावश्यक जनसमूह से दूर रहे, सुन्दर शरीर को भी नश्वर शव के समान समझे और विषयों को विष के समान त्यागे। ऐसा परमहंस अन्ततः अनुभव करता है—“मैं ही वासुदेव हूँ।”
३८--इदं सत्यमिदं सत्यं सत्यमेतदिहोच्यते ।
अहं सत्यं परं ब्रह्म मत्तः किञ्चिन्न विद्यते ॥ ३८॥
अर्थ:
यह सत्य है, यह सत्य है और यही परम सत्य है—मैं ही परब्रह्म हूँ; मुझसे अलग कोई स्वतंत्र सत्ता नहीं है।
३९--उप समीपे यो वासो जीवात्मपरमात्मनोः ।
उपवासः स विज्ञेयो न तु कायस्य शोषणम् ॥ ३९॥
अर्थ:
जीवात्मा और परमात्मा के समीप रहना ही वास्तविक उपवास है। केवल शरीर को भूखा रखकर सुखाना उपवास का वास्तविक अर्थ नहीं है।
४०--कायशोषणमात्रेण का तत्र ह्यविवेकिनाम् ।
वल्मीकताडनादेव मृतः किं नु महोरगः ॥ ४०॥
अर्थ:
केवल शरीर को कष्ट देने से क्या लाभ? यदि केवल शरीर को पीड़ा देने से ज्ञान मिलता, तो बाँबी को पीटने मात्र से उसमें रहने वाला सर्प भी मर जाना चाहिए था। अतः विवेक और आत्मज्ञान आवश्यक हैं।
४१--अस्ति ब्रह्मेति चेद्वेद परोक्षज्ञानमेव तत् ।
अहं ब्रह्मेति चेद्वेद साक्षात्कारः स उच्यते ॥ ४१॥
अर्थ:
“ब्रह्म है”—ऐसा केवल जानना परोक्ष ज्ञान है। लेकिन “मैं ब्रह्म हूँ”—इसका प्रत्यक्ष आत्मानुभव होना साक्षात्कार कहलाता है।
४२--यस्मिन्काले स्वमात्मानं योगी जानाति केवलम् ।
तस्मात्कालात्समारभ्य जीवन्मुक्तो भयेदसौ ॥ ४२॥
अर्थ:
जिस क्षण योगी अपने शुद्ध आत्मस्वरूप को जान लेता है, उसी क्षण से वह जीवन्मुक्त हो जाता है।
४३--अहं ब्रह्मेति नियतं मोक्षहेतुर्महात्मनाम् ।
द्वे पदे बन्धमोक्षाय निर्ममेति ममेति च ॥ ४३॥
अर्थ:
महात्माओं के लिए “मैं ब्रह्म हूँ”—यह निश्चित ज्ञान मोक्ष का कारण है। बन्धन और मुक्ति के मूल में दो भाव हैं—“मेरा” और “मेरा नहीं।”
४४--ममेति बध्यते जन्तुर्निर्ममेति विमुच्यते ।
बाह्यचिन्ता न कर्तव्या तथैवान्तरचिन्तिका ।
सर्वचिन्तां समुत्सृज्य स्वस्थो भव सदा ऋभो ॥ ४४॥
अर्थ:
“यह मेरा है”—इस भावना से जीव बँधता है; “यह मेरा नहीं है”—इससे वह मुक्त होता है। बाहरी और भीतरी अनावश्यक चिन्ताओं को छोड़कर आत्मस्वरूप में स्थित रहो।
४५--सङ्कल्पमात्रकलनेन जगत्समग्रं
सङ्कल्पमात्रकलने हि जगद्विलासः ।
सङ्कल्पमात्रमिदमुत्सृज निर्विकल्प-
माश्रित्य मामकपदं हृदि भावयस्व ॥ ४५॥
अर्थ:
संकल्प के कारण ही सम्पूर्ण जगत् का अनुभव और उसका विस्तार प्रतीत होता है। इसलिए संकल्पों को छोड़कर निर्विकल्प अवस्था में मेरे परम पद का हृदय में ध्यान करो।
४६--मच्चिन्तनं मत्कथनमन्योन्यं मत्प्रभाषणम् ।
मदेकपरमो भूत्वा कालं नय महामते ॥ ४६॥
अर्थ:
मेरा चिन्तन करो, मेरी कथाएँ कहो और आपस में मेरे ही विषय में चर्चा करो। हे महामते! मुझे ही परम लक्ष्य मानकर जीवन व्यतीत करो।
४७--चिदिहास्तीति चिन्मात्रमिदं चिन्मयमेव च ।
चित्त्वं चिदहमेते च लोकाश्चिदिति भावय ॥ ४७॥
अर्थ:
जो कुछ यहाँ है वह चैतन्य ही है। यह सम्पूर्ण जगत् चैतन्यमय है। चित्त, “मैं” और ये सभी लोक—सबको चैतन्यस्वरूप समझो।
४८--रागं नीरागतां नीत्वा निर्लेपो भव सर्वदा ।
अज्ञानजन्यकर्त्रादिकारकोत्पन्नकर्मणा ॥ ४८॥
अर्थ:
राग को विराग में परिवर्तित करके सदा निर्लेप रहो। अज्ञान से उत्पन्न कर्तापन और कर्म के बन्धन में मत फँसो।
४९--श्रुत्युत्पन्नात्मविज्ञानप्रदीपो बाध्यते कथम् ।
अनात्मनां परित्यज्य निर्विकारो जगत्स्थितौ ॥ ४९॥
अर्थ:
श्रुति से उत्पन्न आत्मज्ञान का दीपक कैसे नष्ट हो सकता है? अनात्म वस्तुओं का त्याग करके संसार में रहते हुए भी निर्विकार रहो।
५०-एकनिष्ठतयान्तस्थसंविन्मात्र परो भव ।
घटाकाशमठाकाशौ महाकाशे प्रतिष्ठितौ ॥ ५०॥
अर्थ:
एकनिष्ठ होकर भीतर स्थित शुद्ध चैतन्य में ही स्थिर रहो। जैसे घटाकाश और मठाकाश वास्तव में महाकाश में ही स्थित हैं—
५१--एवं मयि चिदाकाशे जीवेशौ परिकल्पितौ ।
या च प्रागात्मनो माया तथान्ते च तिरस्कृता ॥ ५१॥
अर्थ:
उसी प्रकार जीव और ईश्वर भी मेरे चिदाकाश में कल्पित हैं। आत्मज्ञान होने पर प्रारम्भ में प्रतीत होने वाली माया अन्ततः निवृत्त हो जाती है।
५२--ब्रह्मवादिभिरुद्गीता सा मायेति विवेकतः ।
मायातत्कार्यविलये नेश्वरत्वं न जीवता ॥ ५२॥
अर्थ:
ब्रह्मवादियों ने विवेकपूर्वक जिसे ‘माया’ कहा है, उसके और उसके कार्यों के लय होने पर न ईश्वरत्व का भेद रहता है, न जीवत्व का।
५३--ततः शुद्धश्चिदेवाहं व्योमवन्निरुपाधिकः ।
जीवेश्वरादिरूपेण चेतनाचेतनात्मकम् ॥ ५३॥
अर्थ:
तब ज्ञात होता है कि मैं आकाश के समान उपाधिरहित शुद्ध चैतन्य हूँ। जीव, ईश्वर तथा चेतन-अचेतन के रूप में जो भेद दिखाई देते हैं, वे उपाधि के कारण हैं।
५४--ईक्षणादिप्रवेशान्ता सृष्टिरीशेन कल्पिता ।
जाग्रदादिविमोक्षान्तः संसारो जीवकल्पितः ॥ ५४॥
अर्थ:
सृष्टि के आरम्भ से लेकर उसमें प्रवेश तक की प्रक्रिया ईश्वर द्वारा कल्पित कही गई है; जाग्रत् अवस्था से लेकर मोक्ष तक का संसार जीव की कल्पना से सम्बद्ध है।
५५--त्रिणाचिकादियोगान्ता ईश्वरभ्रान्तिमाश्रिताः ।
लोकायतादिसाङ्ख्यान्ता जीवविश्रान्तिमाश्रिताः ॥ ५५॥
अर्थ:
विभिन्न मत ईश्वर के विषय में और विभिन्न दर्शन जीव के विषय में अलग-अलग धारणाएँ रखते हैं। ये सब भेद अन्ततः सीमित दृष्टियों पर आधारित हैं।
५६--तस्मान्मुमुक्षिभिर्नैव मतिर्जीवेशवादयोः ।
कार्या किन्तु ब्रह्मतत्त्वं निश्चलेन विचार्यताम् ॥ ५६॥
अर्थ:
इसलिए मोक्ष की इच्छा रखने वाले को जीव और ईश्वर के भेद में उलझना नहीं चाहिए; उसे स्थिर मन से ब्रह्मतत्त्व का विचार करना चाहिए।
५७--अद्वितीयब्रह्मतत्त्वं न जानन्ति यथा तथा ।
भ्रान्ता एवाखिलास्तेषां क्व मुक्तिः क्वेह वा सुखम् ॥ ५७॥
अर्थ:
जो अद्वितीय ब्रह्मतत्त्व को नहीं जानते, वे भ्रम में हैं। ऐसे लोगों के लिए वास्तविक मुक्ति और स्थायी सुख कहाँ से आएगा?
५८--उत्तमाधमभावश्चेत्तेषां स्यादस्ति तेन किम् ।
स्वप्नस्थराज्यभिक्षाभ्यां प्रबुद्धः स्पृशते खलु ॥ ५८॥
अर्थ:
स्वप्न में कोई राजा हो या भिखारी—जागने पर दोनों अवस्थाएँ समाप्त हो जाती हैं। इसी प्रकार ज्ञान प्राप्त होने पर उच्च-नीच के सांसारिक भेद का वास्तविक महत्व नहीं रहता।
५९--अज्ञाने बुद्धिविलये निद्रा सा भण्यते बुधैः ।
विलीनाज्ञानतत्कार्ये मयि निद्रा कथं भवेत् ॥ ५९॥
अर्थ:
ज्ञानी कहते हैं कि अज्ञान के कारण बुद्धि के लीन हो जाने को निद्रा कहते हैं। लेकिन जिसमें अज्ञान और उसके कार्य ही लीन हो गए हों, उस आत्मा में निद्रा कैसे हो सकती है?
६०--बुद्धेः पूर्णविकासोऽयं जागरः परिकीर्त्यते ।
विकारादिविहीनत्वाज्जागरो मे न विद्यते ॥ ६०॥
अर्थ:
बुद्धि की पूर्ण सक्रियता को जाग्रत् अवस्था कहते हैं। लेकिन आत्मा विकाररहित है, इसलिए आत्मा के लिए जाग्रत् अवस्था का कोई बन्धन नहीं है।
६१--सूक्ष्मनाडिषु सञ्चारो बुद्धेः स्वप्नः प्रजायते ।
सञ्चारधर्मरहिते मयि स्वप्नो न विद्यते ॥ ६१॥
अर्थ:
सूक्ष्म नाड़ियों में बुद्धि की गति से स्वप्न उत्पन्न होता है। परन्तु मैं उस गति से रहित आत्मा हूँ; इसलिए मेरे लिए स्वप्न नहीं है।
६२--सुषुप्तिकाले सकले विलीने तमसावृते ।
स्वरूपं महदानन्दं भुङ्क्ते विश्वविवर्जितः ॥ ६२॥
अर्थ:
सुषुप्ति में जब सब मानसिक व्यापार लीन हो जाते हैं और तमोगुण का आवरण रहता है, तब जीव संसार से रहित होकर महान् आनन्द का अनुभव करता है।
६३--अविशेषेण सर्वं तु यः पश्यति चिदन्वयात् ।
स एव साक्षाद्विज्ञानी स शिवः स हरिर्विधिः ॥ ६३॥
अर्थ:
जो व्यक्ति सबमें बिना भेद के एक ही चैतन्य को देखता है, वही साक्षात् ज्ञानी है। वही शिव है, वही हरि है और वही ब्रह्मा है।
६४--दीर्घस्वप्नमिदं यत्तद्दीर्घं वा चित्तविभ्रमम् ।
दीर्घं वापि मनोराज्यं संसारं दुःखसागरम् ।
सुप्तेरुत्थाय सुप्त्यन्तं ब्रह्मैकं प्रविचिन्त्यताम् ॥ ६४॥
अर्थ:
यह संसार एक दीर्घ स्वप्न के समान है, या चित्त का लम्बा भ्रम, अथवा मन का बनाया हुआ राज्य है। यह दुःख का समुद्र है। इसलिए जागने के क्षण से फिर निद्रा आने तक एकमात्र ब्रह्म का चिन्तन करना चाहिए।
६५--आरोपितस्य जगतः प्रविलापनेन
चित्तं मदात्मकतया परिकल्पितं नः ।
शत्रून्निहत्य गुरुषट्कगणान्निपाता-
द्गन्धद्विपो भवति केवलमद्वितीयः ॥ ६५॥
अर्थ:
इस आरोपित जगत् का मिथ्यात्व समझकर उसे आत्मस्वरूप में विलीन करो। काम आदि आन्तरिक शत्रुओं को और इन्द्रियादि के समूह को जीतकर साधक अकेले, अद्वितीय आत्मस्वरूप में स्थित होता है।
६६--अद्यास्तमेतु वपुराशशितारमास्तां
कस्तावतापि मम चिद्वपुषो विशेषः ।
कुम्भे विनश्यति चिरं समवस्थिते वा
कुम्भाम्बरस्य नहि कोऽपि विशेषलेशः ॥ ६६॥
अर्थ:
शरीर आज नष्ट हो या बहुत समय तक रहे—मेरे चैतन्यस्वरूप में इससे क्या अन्तर पड़ता है? जैसे घड़ा नष्ट हो जाए या बहुत समय तक रहे, उससे उसमें दिखाई देने वाले आकाश में कोई वास्तविक परिवर्तन नहीं होता।
६७--अहिनिर्व्लयनी सर्पनिर्मोको जीववर्जितः ।
वल्मीके पतितस्तिष्ठेत्तं सर्पो नाभिमन्यते ॥ ६७॥
अर्थ:
सर्प अपनी केंचुली छोड़ देता है। वह केंचुली निर्जीव होकर बाँबी के पास पड़ी रहती है और सर्प उसे अपना स्वरूप नहीं मानता।
६८--एवं स्थूलं च सूक्ष्मं च शरीरं नाभिमन्यते ।
प्रत्यग्ज्ञानशिखिध्वस्ते मिथ्याज्ञाने सहेतुके ।
नेति नेतीति रूपत्वादशरीरो भवत्ययम् ॥ ६८॥
अर्थ:
इसी प्रकार आत्मज्ञानी स्थूल और सूक्ष्म शरीर को अपना स्वरूप नहीं मानता। अन्तरात्मा के ज्ञानरूपी अग्नि से मिथ्या ज्ञान नष्ट हो जाने पर “यह नहीं, यह नहीं” के विवेक से वह शरीर से परे आत्मस्वरूप को जानता है।
६९--शास्त्रेण न स्यात्परमार्थदृष्टिः
कार्यक्षमं पश्यति चापरोक्षम् ।
प्रारब्धनाशात्प्रतिभाननाश-
एवं त्रिधा नश्यति चात्ममाया ॥ ६९॥
अर्थ:
केवल शास्त्र पढ़ लेने से परम सत्य का प्रत्यक्ष अनुभव नहीं होता। आत्ममाया का नाश तीन प्रकार से समझाया गया है—ज्ञान से मिथ्यादृष्टि का नाश, उसके कार्य का क्षय और प्रारब्ध के समाप्त होने पर देहादि का अन्त।
७०--ब्रह्मत्वे योजिते स्वामिञ्जीवभावो न गच्छति ।
अद्वैते बोधिते तत्त्वे वासना विनिवर्तते ॥ ७०॥
अर्थ:
जब जीव अपने को ब्रह्मस्वरूप में स्थापित कर लेता है, तब जीवभाव समाप्त हो जाता है। अद्वैत तत्त्व का ज्ञान होने पर वासनाएँ भी धीरे-धीरे निवृत्त हो जाती हैं।
७१--प्रारब्धान्ते देहहानिर्मायेति क्षीयतेऽखिला ।
अस्तीत्युक्ते जगत्सर्वं सद्रसं ब्रह्म तद्भवेत् ॥ ७१॥
अर्थ:
प्रारब्ध कर्म समाप्त होने पर देह का अन्त होता है और माया का प्रभाव भी समाप्त हो जाता है। “यह अस्तित्ववान है”—ऐसा जो कुछ है, उसकी अस्तित्व-सत्ता ब्रह्म ही है।
७२--भातीत्युक्ते जगत्सर्वं भानं ब्रह्मैव केवलम् ।
मरुभूमौ जलं सर्वं मरुभूमात्रमेव तत् ।
जगत्त्रयमिदं सर्वं चिन्मात्रं स्वविचारतः ॥ ७२॥
अर्थ:
जो कुछ प्रकाशित या ज्ञात हो रहा है, उसका प्रकाश भी ब्रह्म ही है। जैसे मरुभूमि में दिखाई देने वाला मृगतृष्णा का जल वास्तव में मरुभूमि से अलग नहीं है, वैसे ही तीनों लोकों का वास्तविक स्वरूप केवल चैतन्य है।
७३--अज्ञानमेव न कुतो जगतः प्रसङ्गो
जीवेशदेशिकविकल्पकथातिदूरे ।
एकान्तकेवलचिदेकरसस्वभावे
ब्रह्मैव केवलमहं परिपूर्णमस्मि ॥ ७३॥
अर्थ:
जहाँ अज्ञान ही नहीं है, वहाँ जगत्, जीव, ईश्वर और गुरु के भेद की चर्चा भी कहाँ ? उस अद्वितीय चैतन्यस्वरूप में केवल ब्रह्म ही है—“मैं वही पूर्ण ब्रह्म हूँ।”
७४--बोधचन्द्रमसि पूर्णविग्रहे
मोहराहुमुषितात्मतेजसि ।
स्नानदानयजनादिकाः
क्रिया मोचनावधि वृथैव तिष्ठते ॥ ७४॥
अर्थ:
जब आत्मज्ञान का पूर्ण चन्द्र उदित हो जाता है और मोह का अन्धकार दूर हो जाता है, तब केवल बाहरी कर्मकाण्ड—स्नान, दान, यज्ञ आदि—मोक्ष के लिए पर्याप्त नहीं रहते। ज्ञान ही प्रधान है।
७सलिले सैन्धवं यद्वत्साम्यं भवति योगतः ।
तथात्ममनसोरैक्यं समाधिरिति कथ्यते ॥ ७५॥
अर्थ:
जिस प्रकार जल में नमक घुलकर जल के साथ एकरस हो जाता है, उसी प्रकार आत्मा और मन की एकता को समाधि कहा जाता है।
७६--दुर्लभो विषयत्यागो दुर्लभं तत्त्वदर्शनम् ।
दुर्लभा सहजावस्था सद्गुरोः करुणां विना ॥ ७६॥
अर्थ:
विषयों का पूर्ण त्याग कठिन है, तत्त्व का प्रत्यक्ष दर्शन कठिन है और सद्गुरु की कृपा के बिना सहज आत्मस्थिति भी दुर्लभ है।
७७--उत्पन्नशक्तिबोधस्य त्यक्तनिःशेषकर्मणः ।
योगिनः सहजावस्था स्वयमेव प्रकाशते ॥ ७७॥
अर्थ:
जिस योगी में आत्मशक्ति का बोध जाग गया है और जिसने कर्मासक्ति को पूर्णतः त्याग दिया है, उसके भीतर सहज आत्मस्थिति स्वयं प्रकाशित हो जाती है।
७८--रसस्य मनसश्चैव चञ्चलत्वं स्वभावतः ।
रसो बद्धो मनो बद्धं किं न सिद्ध्यति भूतले ॥ ७८॥
अर्थ:
रस और मन दोनों स्वभावतः चंचल हैं। यदि रस को बाँध लिया जाए तो मन भी बँध जाता है। तब पृथ्वी पर ऐसी कौन-सी सिद्धि है जो प्राप्त न हो सके?
७९--मूर्च्छितो हरति व्याधिं मृतो जीवयति स्वयम् ।
बद्धः खेचरतां धत्ते ब्रह्मत्वं रसचेतसि ॥ ७९॥
अर्थ:
रस के विषय में योगपरम्परा में कहा गया है कि उसकी साधना से रोगों का नाश, जीवनशक्ति की वृद्धि और उच्च योगिक सिद्धियाँ प्राप्त हो सकती हैं। रस और चित्त के संयोग से साधक ब्रह्मभाव की ओर उन्मुख होता है।
८०--इन्द्रियाणां मनो नाथो मनोनाथस्तु मारुतः ।
मारुतस्य लयो नाथस्तन्नाथं लयमाश्रय ॥ ८०॥
अर्थ:
इन्द्रियों का स्वामी मन है, मन का स्वामी प्राणवायु है और प्राणवायु का लय ही उसका स्वामी है। इसलिए मन को स्थिर करने के लिए प्राण को स्थिर और लीन करने की साधना की जाती है।
८१--निश्चेष्टो निर्विकारश्च लयो जीवति योगिनाम् ।
उच्छिन्नसर्वसङ्कल्पो निःशेषाशेषचेष्टितः ।
स्वावगम्यो लयः कोऽपि मनसां वागगोचरः ॥ ८१॥
अर्थ:
योगियों के लिए मन का लय निश्चेष्ट और निर्विकार अवस्था है। जब सभी संकल्प समाप्त हो जाते हैं और मन की सारी चेष्टाएँ शान्त हो जाती हैं, तब जो अवस्था आती है वह स्वयं अनुभव करने योग्य है; उसका पूर्ण वर्णन वाणी से नहीं किया जा सकता।
८२--पुङ्खानुपुङ्खविषयेक्षण
तत्परोऽपि
ब्रह्मावलोकनधियं न जहाति योगी ।
सङ्गीतताललयवाद्यवशं गतापि
मौलिस्थकुम्भपरिरक्षणधीर्नटीव ॥ ८२॥
अर्थ:
योगी संसार के विषयों को अत्यन्त सावधानी से देखता-समझता हुआ भी ब्रह्मदृष्टि को नहीं छोड़ता। जैसे सिर पर रखा घड़ा सँभालती हुई नर्तकी संगीत और ताल में मग्न होकर भी घड़े की रक्षा नहीं भूलती, वैसे ही योगी संसार में रहते हुए भी ब्रह्मचिन्तन नहीं छोड़ता।
८३--सर्वचिन्तां परित्यज्य सावधानेन चेतसा ।
नाद एवानुसन्धेयो योगसाम्राज्यमिच्छता ॥ ८३॥
अर्थ:
जो योग की परम सिद्धि प्राप्त करना चाहता है, उसे सभी सांसारिक चिन्ताओं को छोड़कर अत्यन्त सावधान और एकाग्र चित्त से नाद का अनुसंधान करना चाहिए।
इति द्वितीयोऽध्यायः ॥ २॥ 
द्वितीय अध्याय का मुख्य संदेश--
इस पूरे अध्याय की धारा बहुत स्पष्ट है—साधनचतुष्टय → आत्मविचार → “अहं ब्रह्मास्मि” का साक्षात्कार → आसक्ति एवं वासनाओं का क्षय → समाधि → सहजावस्था → नादानुसन्धान।
अर्थात् वराहोपनिषद् के अनुसार केवल बाहरी कर्मकाण्ड नहीं, बल्कि अपने वास्तविक चैतन्यस्वरूप को जानना ही मुक्ति का मूल मार्ग है। 
 तृतीय अध्याय--
 इसमें उपनिषद् इसी अद्वैत ज्ञान को और आगे बढ़ाता है और बताता है कि “मैं ही अखण्ड ब्रह्म हूँ”—इस अनुभूति का स्वरूप क्या है ?
अब वराहोपनिषद् के तृतीय अध्याय का पूरा उपलब्ध मूल संस्कृत पाठ और उसके साथ सरल हिन्दी अर्थ --
इस अध्याय में कुल ३० श्लोक हैं और इसका मुख्य विषय अद्वैत आत्मज्ञान है। 
१--नहि नानास्वरूपं स्यादेकं वस्तु कदाचन ।
तस्मादखण्ड एवास्मि यन्मदन्यन्न किञ्चन ॥ १॥
अर्थ:
एक ही वस्तु के अनेक वास्तविक स्वरूप नहीं हो सकते। इसलिए मैं अखण्ड ब्रह्मस्वरूप हूँ; मेरे अतिरिक्त कोई दूसरी स्वतंत्र वस्तु नहीं है।
२--दृश्यते श्रूयते यद्यद्ब्रह्मणोऽन्यन्न तद्भवेत् ।
नित्यशुद्धविमुक्तैकमखण्डानन्दमद्वयम् ।
सत्यं ज्ञानमनन्तं यत्परं ब्रह्माहमेव तत् ॥ २॥
अर्थ:
जो कुछ दिखाई देता है या सुनाई देता है, वह ब्रह्म से अलग नहीं है। वह ब्रह्म नित्य, शुद्ध, मुक्त, अखण्ड और अद्वैत आनन्दस्वरूप है। वह सत्य, ज्ञान और अनन्त परम ब्रह्म ही मैं हूँ।
३--आनन्दरूपोऽहमखण्डबोधः
परात्परोऽहं घनचित्प्रकाशः ।
मेघा यथा व्योम न च स्पृशन्ति
संसारदुःखानि न मां स्पृशन्ति ॥ ३॥
अर्थ:
मैं आनन्दस्वरूप, अखण्ड ज्ञानस्वरूप और सबसे परे घनीभूत चैतन्य-प्रकाश हूँ। जैसे बादल आकाश को वास्तव में स्पर्श नहीं कर सकते, वैसे ही संसार के दुःख मेरे आत्मस्वरूप को स्पर्श नहीं कर सकते।
४--सर्वं सुखं विद्धि सुदुःखनाशात्
सर्वं च सद्रूपमसत्यनाशात् ।
चिद्रूपमेव प्रतिभानयुक्तं
तस्मादखण्डं मम रूपमेतत् ॥ ४॥
अर्थ:
दुःख का नाश होने पर जो शेष रहता है, उसे सुख जानो; असत्य का नाश होने पर जो शेष रहता है, उसे सत् जानो। जो कुछ प्रकाशित होता है, उसका आधार चैतन्य ही है। इसलिए मेरा स्वरूप अखण्ड है।
५--न हि जनिर्मरणं गमनागमौ
न च मलं विमलं न च वेदनम् ।
चिन्मयं हि सकलं विराजते
स्फुटतरं परमस्य तु योगिनः ॥ ५॥
अर्थ:
आत्मा का न जन्म है, न मृत्यु; न कहीं जाना है, न आना। वह न मलिन है, न केवल शुद्ध होने योग्य कोई वस्तु, और न ही शरीर की वेदना से प्रभावित होता है। ज्ञानी योगी के लिए सम्पूर्ण जगत् चैतन्यमय ही प्रकाशित होता है।
६--सत्यचिद्घनमखण्डमद्वयं
सर्वदृश्यरहितं निरामयम् ।
यत्पदं विमलमद्वयं शिवं
तत्सदाहमिति मौनमाश्रय ॥ ६॥
अर्थ:
मैं सत्य और चैतन्य का अखण्ड, अद्वैत, निर्विकार स्वरूप हूँ। जो परम पद निर्मल, अद्वैत और मंगलमय है, उसके विषय में भीतर से दृढ़ भावना रखो—“वह सत् ब्रह्म मैं ही हूँ।” इस अनुभूति के मौन में स्थित रहो।
७--जन्ममृत्युसुखदुःखवर्जितं
जातिनीतिकुलगोत्रदूरगम् ।
चिद्विवर्तजगतोऽस्य कारणं
तत्सदाहमिति मौनमाश्रय ॥ ७॥
अर्थ:
आत्मा जन्म-मृत्यु और सुख-दुःख से रहित है। वह जाति, नीति, कुल और गोत्र आदि सभी सीमाओं से परे है। चैतन्य में दिखाई देने वाले इस जगत् का मूल कारण वही आत्मतत्त्व है। इसलिए अनुभव करो—“वह सत् मैं हूँ।”
८--पूर्णमद्वयमखण्डचेतनं
विश्वभेदकलनादिवर्जितम् ।
अद्वितीयपरसंविदंशकं
तत्सदाहमिति मौनमाश्रय ॥ ८॥
अर्थ:
आत्मा पूर्ण, अद्वैत और अखण्ड चेतना है। उसमें संसार के भेदों की वास्तविक कल्पना नहीं है। वह अद्वितीय परम चेतना है। इसलिए उसी में स्थित होकर जानो—“वह मैं हूँ।”
९--केनाप्यबाधितत्वेन त्रिकालेऽप्येकरूपतः ।
विद्यमानत्वमस्त्येतत्सद्रूपत्वं सदा मम ॥ ९॥
अर्थ:
जो तीनों कालों—भूत, वर्तमान और भविष्य—में किसी के द्वारा बाधित नहीं होता और एक ही रूप में विद्यमान रहता है, वही सत् है। ऐसा नित्य अस्तित्व मेरा वास्तविक स्वरूप है।
१०--निरुपाधिकनित्यं यत्सुप्तौ सर्वसुखात्परम् ।
सुखरूपत्वमस्त्येतदानन्दत्वं सदा मम ॥ १०॥
अर्थ:
जो बिना किसी उपाधि के नित्य है और सुषुप्ति में भी सभी सांसारिक सुखों से परे आनन्दस्वरूप रहता है, वही मेरा वास्तविक आनन्दस्वरूप है।
११--दिनकरकिरणैर्हि शार्वरं तमो
निबिडतरं झटिति प्रणाशमेति ।
घनतरभवकारणं तमो यद्द्
हरिदिनकृत्प्रभया न चान्तरेण ॥ ११॥
अर्थ:
जैसे सूर्य की किरणों से रात का घना अन्धकार तुरंत नष्ट हो जाता है, वैसे ही जन्म-मृत्यु के संसार का गहरा अज्ञान भी परमात्मा के ज्ञानरूपी प्रकाश से नष्ट हो जाता है।
१२--मम चरणस्मरणेन पूजया च
स्वकतमसः परिमुच्यते हि जन्तुः 
न हि मरणप्रभवप्रणाशहेतु-
र्मम चरणस्मरणादृतेऽस्ति किंचित् ॥ १२॥
अर्थ:
मेरे चरणों का स्मरण और पूजा करने से जीव अपने अज्ञानरूपी अन्धकार से मुक्त होता है। जन्म-मृत्यु के बन्धन को नष्ट करने के लिए मेरे स्मरण के अतिरिक्त कोई श्रेष्ठ साधन नहीं है।
१३--आदरेण यथा स्तौति धनवन्तं धनेच्छया ।
तथा चेद्विश्वकर्तारं को न मुच्येत बन्धनात् ॥ १३॥
अर्थ:
जैसे मनुष्य धन की इच्छा से धनवान व्यक्ति की प्रशंसा करता है, वैसे ही यदि वह श्रद्धापूर्वक विश्व के कर्ता परमात्मा की स्तुति करे, तो कौन बन्धन से मुक्त नहीं हो सकता?
१४--आदित्यसंनिधौ लोकश्चेष्टते स्वयमेव तु ।
तथा मत्संनिधावेव समस्तं चेष्टते जगत् ॥ १४॥
अर्थ:
सूर्य की उपस्थिति मात्र से संसार के कार्य स्वतः चलने लगते हैं। उसी प्रकार मेरी उपस्थिति मात्र से सम्पूर्ण जगत् अपनी-अपनी क्रियाएँ करता है।
१५--शुक्तिकाया यथा तारं कल्पितं मायया तथा ।
महदादि जगन्मायामयं मय्येव केवलम् ॥ १५॥
अर्थ:
जैसे सीपी में चाँदी का भ्रम उत्पन्न होता है, वैसे ही माया के कारण महत् आदि से बना यह सम्पूर्ण जगत् मुझमें ही कल्पित दिखाई देता है।
१६-/
चण्डालदेहे पश्वादिस्थावरे ब्रह्मविग्रहे ।
अन्येषु तारतम्येन स्थितेषु न तथा ह्यहम् ॥ १६॥
अर्थ:
चाहे चाण्डाल का शरीर हो, पशु-पक्षी हों, स्थावर वस्तुएँ हों या ब्राह्मण का शरीर—इन सभी में जो बाहरी भेद दिखाई देते हैं, उनमें आत्मा का वास्तविक भेद नहीं है। आत्मा सबमें एक है।
१७--विनष्टदिग्भ्रमस्यापि यथापूर्वं विभाति दिक् ।
तथा विज्ञानविध्वस्तं जगन्मे भाति तन्न हि ॥ १७॥
अर्थ:
दिशा के सम्बन्ध में भ्रम दूर हो जाने पर भी दिशा जैसी पहले थी वैसी ही दिखाई देती है। उसी प्रकार आत्मज्ञान से जगत् के मिथ्या-भ्रम का नाश होने पर भी उसका व्यवहारिक रूप दिखाई दे सकता है, लेकिन ज्ञानी उसे सत्य नहीं मानता।
१८--न देहो नेन्द्रियप्राणो न मनोबुद्ध्यहंकृति ।
न चित्तं नैव माया च न च व्योमादिकं जगत् ॥ १८॥
अर्थ:
मैं न शरीर हूँ, न इन्द्रियाँ, न प्राण; न मन, न बुद्धि, न अहंकार; न चित्त, न माया और न आकाश आदि से बना यह दृश्य जगत् ही मेरा वास्तविक स्वरूप है।
१९--न कर्ता नैव भोक्ता च न च भोजयिता तथा ।
केवलं चित्सदानन्दब्रह्मैवाहं जनार्दनः ॥ १९॥
अर्थ:
मैं न कर्ता हूँ, न भोक्ता और न किसी को भोग कराने वाला। मैं केवल सत्-चित्-आनन्द ब्रह्म हूँ—वही जनार्दन हूँ।
२०--जलस्य चलनादेव चञ्चलत्वं यथा रवेः ।
तथाहंकारसम्बधादेव संसार आत्मनः ॥ २०॥
अर्थ:
जैसे जल के हिलने से सूर्य का प्रतिबिम्ब भी हिलता हुआ दिखाई देता है, वैसे ही अहंकार के सम्बन्ध के कारण आत्मा में संसार का बन्धन प्रतीत होता है। वास्तव में आत्मा स्वयं बन्धित नहीं है।
२१--चित्तमूलं हि संसारस्तत्प्रयत्नेन शोधयेत् ।
हन्त चित्तमहत्तायां कैषा विश्वासता तव ॥ २१॥
अर्थ:
संसार का अनुभव चित्त पर आधारित है। इसलिए साधक को प्रयत्नपूर्वक चित्त को शुद्ध करना चाहिए। चित्त की चंचलता और उसके द्वारा बनाए गए संसार पर पूर्ण विश्वास करना उचित नहीं है।
२२--क्व धनानि महीपानां ब्रह्मणः क्व जगन्ति वा ।
प्राक्तनानि प्रयातानि गताः सर्गपरम्परः ।
कोटयो ब्रह्मणां याता भूपा नष्टाः परागवत् ॥ २२॥
अर्थ:
असंख्य राजाओं का धन कहाँ चला गया ? असंख्य सृष्टियाँ बीत गईं। असंख्य ब्रह्मा भी अपने-अपने काल को प्राप्त हो गए और असंख्य राजा धूल के समान नष्ट हो गए। इसलिए सांसारिक सम्पत्ति और सत्ता पर अहंकार व्यर्थ है।
२३--स चाध्यात्माभिमानोऽपि विदुषोऽयासुरत्वतः ।
विदुषोऽप्यासुरश्चेत्स्यान्निष्फलं तत्त्वदर्शनम् ॥ २३॥
अर्थ:
यदि विद्वान व्यक्ति भी अपने ज्ञान का अहंकार करके आसुरी वृत्ति में पड़ जाए, तो उसका तत्त्वज्ञान निष्फल हो जाता है। केवल ज्ञान का दावा पर्याप्त नहीं; आचरण में भी उसका प्रकाश होना चाहिए।
२४--उत्पाद्यमाना रागाद्या विवेकज्ञानवह्निना ।
यदा तदैव दह्यन्ते कुतस्तेषां प्ररोहणम् ॥ २४॥
अर्थ:
राग आदि विकार जब उत्पन्न होते ही विवेक और ज्ञान की अग्नि से जला दिए जाते हैं, तो फिर वे दोबारा कैसे बढ़ सकते हैं 
२५--यथा सुनिपुणः सम्यक् परदोषेक्षणे रतः ।
तथा चेन्निपुणः स्वेषु को न मुच्येत बन्धनात् ॥ २५॥
अर्थ:
मनुष्य दूसरों के दोष देखने में जितना कुशल होता है, यदि उतना ही अपने दोषों को देखने में कुशल हो जाए, तो कौन बन्धन से मुक्त न हो जाए?
२६--अनात्मविदमुक्तोऽपि सिद्धिजालानि वाञ्छति ।
द्रव्यमन्त्रक्रियाकालयुक्त्याप्नोति मुनीश्वर ॥ २६॥
अर्थ:
जो आत्मज्ञान से रहित है, वह मुक्ति के बाद भी विभिन्न सिद्धियों की इच्छा कर सकता है। हे मुनीश्वर! द्रव्य, मन्त्र, क्रिया, काल आदि साधनों से अनेक सिद्धियाँ प्राप्त हो सकती हैं।
२७--नात्मज्ञस्यैष विषय आत्मज्ञो ह्यात्ममात्रदृक् ।
आत्मनात्मनि सन्तृप्तो नाविद्यामनुधावति ॥ २७॥
अर्थ:
लेकिन आत्मज्ञानी के लिए सिद्धियाँ और बाहरी विषय आकर्षण का कारण नहीं हैं। वह केवल आत्मा को देखता है और आत्मा में ही आत्मा से पूर्ण तृप्त रहता है। इसलिए वह अज्ञान के पीछे नहीं दौड़ता।
२८--ये केचन जगद्भावास्तानविद्यामयान्विदुः ।
कथं तेषु किलात्मज्ञस्त्यक्ताविद्यो निमज्जति ॥ २८॥
अर्थ:
जगत् के जो भी बाहरी भाव और आकर्षण हैं, वे अज्ञान से उत्पन्न माने जाते हैं। जिसने अज्ञान को छोड़ दिया है, वह आत्मज्ञानी फिर उन्हीं में कैसे डूब सकता है?
२९--द्रव्यमन्त्रक्रियाकालयुक्तयः साधुसिद्धिदाः ।
परमात्मपदप्राप्तौ नोपकुर्वन्ति काश्चन ॥ २९॥
अर्थ:
द्रव्य, मन्त्र, क्रिया, काल आदि की विधियाँ विभिन्न सिद्धियाँ प्रदान कर सकती हैं; परन्तु परमात्मा के पद की प्राप्ति में वे स्वयं अन्तिम साधन नहीं हैं।
३०सर्वेच्छाकलनाशान्तावात्मलाभोदयाभिधः ।
स पुनः सिद्धिवाञ्छायां कथमर्हत्यचित्ततः ॥ ३०॥
अर्थ:
जब सभी इच्छाओं और उनके संकल्पों का पूर्ण शमन हो जाता है, तभी आत्मप्राप्ति का उदय होता है। जो आत्मा में स्थित होकर पूर्ण हो गया है, वह फिर सिद्धियों की इच्छा कैसे कर सकता है?
इति तृतीयोऽध्यायः ॥ ३॥
तृतीय अध्याय का सार--
इस अध्याय का सबसे प्रबल संदेश है:
“अहं ब्रह्मास्मि”—मैं शरीर, मन, बुद्धि या अहंकार नहीं, बल्कि अखण्ड सत्-चित्-आनन्द ब्रह्म हूँ।
वराहोपनिषद् यहाँ साधक को सिद्धियों से भी ऊपर उठने की शिक्षा देता है। बाहरी उपलब्धियाँ, द्रव्य, मन्त्र और कर्म अपनी जगह हो सकते हैं, लेकिन परम लक्ष्य आत्मसाक्षात्कार है। आत्मज्ञान होने पर राग-द्वेष, अहंकार और संसार-बन्धन का मूल ही समाप्त हो जाता है। 

 वराहोपनिषद् के चतुर्थ अध्याय के १ से ४४ तक सभी मन्त्र क्रम से, मूल संस्कृत पाठ और सरल हिन्दी अर्थ--
 1--ज्ञानभूमिः शुभेच्छा स्यात्प्रथमा समुदीरिता ।
विचारणा द्वितीया तु तृतीया तनुमानसा ॥१॥
अर्थ:
ज्ञान की पहली भूमि शुभेच्छा है—सत्य को जानने की पवित्र इच्छा। दूसरी विचारणा है—उस सत्य का विचार। तीसरी तनुमानसा है—जिसमें मन की विषयों के प्रति आसक्ति क्षीण होने लगती है।
२--सत्त्वापत्तिश्चतुर्थी स्यात्ततोऽसंसक्तिनामिका ।
पदार्थभावना षष्ठी सप्तमी तुर्यगा स्मृता ॥२॥
अर्थ:
चौथी भूमि सत्त्वापत्ति, पाँचवीं असंसक्ति, छठी पदार्थभावना और सातवीं तुर्यगा कही गई है।
३--स्थितः किं मूढ एवास्मि प्रेक्ष्योऽहं शास्त्रसज्जनैः ।
वैराग्यपूर्णमिच्छेति शुभेच्छेत्युच्यते बुधैः ॥३॥
अर्थ:
“क्या मैं अज्ञान में ही पड़ा हुआ हूँ? मुझे शास्त्र और सत्पुरुषों से सत्य का ज्ञान प्राप्त करना चाहिए”—ऐसी वैराग्यपूर्ण इच्छा को विद्वान शुभेच्छा कहते हैं।
४--शास्त्रसज्जनसंपर्कवैराग्या
भ्यासपूर्वकम् ।
सदाचारप्रवृत्तिर्या प्रोच्यते सा विचारणा ॥४॥
अर्थ:
शास्त्रों और सज्जनों के सम्पर्क, वैराग्य के अभ्यास तथा सदाचार में प्रवृत्ति—इन सबके द्वारा सत्य का जो विवेकपूर्ण अन्वेषण होता है, वही विचारणा है।
५--विचारणाशुभेच्छाभ्यामिन्द्रिया
र्थेषु रक्तता ।
यत्र सा तनुतामेति प्रोच्यते तनुमानसी ॥५॥
अर्थ:
शुभेच्छा और विचारणा के अभ्यास से इन्द्रियों के विषयों में जो आसक्ति है, वह जब क्षीण होने लगती है, तब उस अवस्था को तनुमानसी कहते हैं।
६--भूमिकात्रितयाभ्यासाचित्तेऽर्थविरतेर्वशात् ।
सत्वात्मनि स्थिते शुद्धे सत्त्वापत्तिरुदाहृता ॥६॥
अर्थ:
पहली तीन भूमियों के अभ्यास से जब चित्त विषयों से विरक्त होकर शुद्ध सत्त्वस्वरूप में स्थित हो जाता है, तब उसे सत्त्वापत्ति कहते हैं।
७--दशाचतुष्टयाभ्यासादसंसर्ग
फला तु या ।
रूढसत्त्वचमत्कारा प्रोक्ता संसक्तिनामिका ॥७॥
अर्थ:
अनेक प्रकार के अभ्यास से जब संसार के साथ आसक्ति समाप्त हो जाती है और शुद्ध सत्त्व की अनुभूति दृढ़ हो जाती है, तब वह अवस्था असंसक्ति कहलाती है।
८--भूमिका
पञ्चकाभ्यासात्स्वात्मारामतया भृशम् ।
आभ्यन्तराणां बाह्यानां पदार्थानामभावनात् ॥८॥
अर्थ:
पाँच भूमियों के अभ्यास से साधक अपने आत्मस्वरूप में ही आनन्दित रहने लगता है और बाहरी तथा आन्तरिक पदार्थों को स्वतंत्र सत्य मानकर उनकी कल्पना नहीं करता।
९--परप्रयुक्तेन चिरं प्रत्ययेनावबोधनम् ।
पदार्थभावनानाम षष्ठी भवति भूमिका ॥९॥
अर्थ:
दीर्घकालीन साधना और दृढ़ आत्मबोध के द्वारा पदार्थों के वास्तविक स्वरूप का ज्ञान होना छठी भूमि—पदार्थभावना है।
१०--षड्भूमिकाचिराभ्यासद्भेदस्यानुपलम्भनात् ।
यत्स्वभावैकनिष्ठत्वं सा ज्ञेया तुर्यगा गतिः ॥१०॥
अर्थ:
छः भूमियों के दीर्घ अभ्यास से जब भेद दिखाई देना समाप्त हो जाता है और साधक अपने वास्तविक स्वभाव में पूर्णतः स्थित हो जाता है, वही तुर्यगा अवस्था है।
११--शुभेच्छादित्रयं भूमिभेदाभेदयुतं स्मृतम् ।
यथावद्वेद बुद्ध्येदं जगज्जाग्रति दृश्यते ॥११॥
अर्थ:
पहली तीन भूमियों में भेद और अभेद दोनों का अनुभव रहता है। जाग्रत अवस्था में दिखाई देने वाले संसार को साधक धीरे-धीरे उसके वास्तविक स्वरूप में समझने लगता है।
१२--अद्वैते स्थैर्यमायाते द्वैते च प्रशमं गते ।
पश्यन्ति स्वप्नवल्लोकं तुर्यभूमि सुयोगतः ॥१२॥
अर्थ:
जब अद्वैत में स्थिरता आ जाती है और द्वैत की भावना शांत हो जाती है, तब साधक संसार को स्वप्न के समान देखता है। यह तुरीय अवस्था की ओर बढ़ना है।
१३--विच्छिन्नशरदभ्रांशविलयं प्रविलीयते ।
सत्वावशेष एवास्ते हि निदाघ दृढीकुरु ॥१३॥
अर्थ:
हे निदाघ! जैसे शरद् ऋतु के बादल धीरे-धीरे विलीन हो जाते हैं, वैसे ही मन के भेद और विकार विलीन हो जाते हैं और अन्त में शुद्ध सत्त्व ही शेष रहता है।
१४--पञ्चभूमिं समारुह्य सुषुप्तिपदनामिकाम् ।
शान्ताशेषविशेषांशस्तिष्ठत्यद्वैतमात्रके ॥१४॥
अर्थ:
पाँचवीं भूमि पर पहुँचकर साधक सुषुप्ति के समान अत्यन्त शान्त अवस्था में रहता है। सभी भेद समाप्त होकर केवल अद्वैत का अनुभव शेष रहता है।
१५--अन्तर्मुखतया नित्यं बहिर्वृत्तिपरोऽपि सन् ।
परिश्रान्ततया नित्यं निद्रालुरिव लक्ष्यते ॥१५॥
अर्थ:
उसका मन सदा भीतर की ओर लगा रहता है। बाहर व्यवहार करता हुआ भी वह संसार से अत्यन्त विरक्त होने के कारण मानो सदैव निद्रा में स्थित दिखाई देता है।
१६--कुर्वन्नभ्यासमेतस्यां भूम्यां सम्यग्विवासनः ।
सप्तमी गाढसुप्ताख्या क्रमप्राप्ता पुरातनी ॥१६॥
अर्थ:
इस भूमि का अभ्यास करते-करते जब सभी वासनाएँ क्षीण हो जाती हैं, तब क्रमशः सातवीं भूमि प्राप्त होती है, जिसे गाढ़सुप्त कहा गया है।
१७--यत्र नासन्न सद्रूपो नाहं नाप्यनहंकृतिः ।
केवलं क्षीणमनन आस्तेऽद्वैतेऽतिनिर्भयः ॥१७॥
अर्थ:
उस अवस्था में न ‘असत्’ की धारणा रहती है, न ‘सत्’ की कल्पना; न अहंकार रहता है, न अहंकार का विचार। मन की कल्पनाएँ समाप्त होकर साधक निर्भय अद्वैत में स्थित रहता है।
१८--अन्तःशून्यो बहिःशून्यः शून्यकुम्भ इवाम्बरे ।
अन्तःपूर्णो बहिःपूर्णः पूर्णकुम्भ इवार्णवे ॥१८॥
अर्थ:
वह भीतर से शून्य और बाहर से भी शून्य—आकाश में स्थित खाली घड़े के समान—है; और भीतर-बाहर से पूर्ण—समुद्र में स्थित पूर्ण घड़े के समान—भी है।
१९--मा भव ग्राह्यभावात्मा ग्राहकात्मा च मा भव ।
भावनामखिलां त्यक्त्वा यच्छिष्टं तन्मयो भव ॥१९॥
अर्थ:
अपने को न तो केवल ‘ज्ञेय’ मानो और न केवल ‘ज्ञाता’। सभी मानसिक कल्पनाओं को छोड़कर जो परम सत्य शेष रहता है, उसी के स्वरूप में स्थित हो जाओ।
२०--द्र्ष्टृदर्शनदृश्यानि त्यक्त्वा वासनया सह ।
दर्शनप्रथमाभासमात्मानं केवलं भज ॥२०॥
अर्थ:
द्रष्टा, दर्शन और दृश्य—इन तीनों को उनकी वासनाओं सहित छोड़कर उस मूल आत्मप्रकाश का अनुभव करो, जो प्रत्येक दर्शन के पीछे विद्यमान है।
२१--यथास्थितमिदं यस्य व्यवहारयतोऽपि च ।
अस्तंगतं स्थितं व्योम स जीवन्मुक्त उच्यते ॥२१॥
अर्थ:
जो व्यक्ति संसार में सामान्य व्यवहार करता हुआ भी भीतर से आकाश के समान निर्लिप्त और निर्विकार रहता है, वही जीवन्मुक्त कहलाता है।
२२--नोदेति नास्तमायाति सुखे दुःखे मनःप्रभा ।
यथाप्राप्तस्थितिर्यस्य स जीवन्मुक्त उच्यते ॥२२॥
अर्थ:
जिसका मन सुख में अत्यधिक प्रसन्न होकर उन्मत्त नहीं होता और दुःख में टूटता नहीं है, जो प्राप्त परिस्थिति में समभाव से रहता है, वही जीवन्मुक्त है।
२३--यो जागर्ति सुषुप्तिस्थो यस्य जाग्रन्न विद्यते ।
यस्य निर्वासनो बोधः स जीवन्मुक्त उच्यते ॥२३॥
अर्थ:
जो जाग्रत रहते हुए भी सुषुप्ति जैसी शान्ति में स्थित है और जिसकी चेतना में जाग्रत संसार की वासनाएँ नहीं हैं, उसका ज्ञान निर्वासन है—वह जीवन्मुक्त है।
२४--रागद्वेषभयादीनामनुरूपं चरन्नपि ।
योऽन्तर्व्योमवदच्छन्नः स जीवन्मुक्त उच्यते ॥२४॥
अर्थ:
बाहर से राग, द्वेष, भय आदि के अनुसार व्यवहार करता हुआ दिखाई देने पर भी जिसके भीतर आकाश जैसी निर्लिप्तता है, वह जीवन्मुक्त है।
२५--यस्य नाहंकृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते ।
कुर्वतोऽकुर्वतो वापि स जीवन्मुक्त उच्यते ॥२५॥
अर्थ:
जिसमें अहंकार की भावना नहीं है और जिसकी बुद्धि कर्मों से लिप्त नहीं होती—वह कर्म करे या न करे—वही जीवन्मुक्त कहलाता है।
२६--यस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च यः ।
हर्षामर्षभयोन्मुक्तः स जीवन्मुक्त उच्यते ॥२६॥
अर्थ:
जिससे संसार भयभीत या परेशान नहीं होता और जो संसार से स्वयं भी परेशान नहीं होता, जो हर्ष, क्रोध और भय से मुक्त है, वही जीवन्मुक्त है।
२७--यः समस्तार्थजालेषु व्यवहार्यपि शीतलः ।
परार्थेष्विव पूर्णात्मा स जीवन्मुक्त उच्यते ॥२७॥
अर्थ:
जो संसार के अनेक विषयों में व्यवहार करते हुए भी भीतर से शान्त रहता है और दूसरे के विषयों की तरह अपने विषयों के प्रति भी निर्लिप्त रहता है, वह जीवन्मुक्त है।
२८--प्रजहाति यदा कामान्सर्वांश्चित्तगतान्मुने ।
मयि सर्वात्मके तुष्टः स जीवन्मुक्त उच्यते ॥२८॥
अर्थ:
हे मुनि! जब मन में उठने वाली सभी कामनाओं का त्याग हो जाता है और साधक सर्वात्मस्वरूप मुझमें ही संतुष्ट रहता है, तब वह जीवन्मुक्त कहलाता है।
२९--चैत्यवर्जितचिन्मात्रे पदे परमपावने ।
अक्षुब्धचित्तो विश्रान्तः स जीवन्मुक्त उच्यते ॥२९॥
अर्थ:
जब साधक बाहरी ज्ञेय वस्तुओं से रहित उस परम पवित्र शुद्ध चैतन्य में स्थित होकर, बिना किसी मानसिक क्षोभ के विश्राम करता है, तब वह जीवन्मुक्त है।
३०--इदं जगदहं सोऽयं दृश्यजातमवास्तवम् ।
यस्य चित्ते न स्फुरति स जीवन्मुक्त उच्यते ॥३०॥
अर्थ:
जिसके चित्त में “यह जगत है, मैं हूँ, वह है” जैसी दृश्य-जगत की स्वतंत्र वास्तविकता की कल्पना नहीं उठती, वह जीवन्मुक्त कहलाता है।
३१--सद्ब्रह्मणि स्थिरे स्फारे पूर्णे विषयवर्जिते ।
आचार्यशास्त्रमार्गेण प्रविश्याशु स्थिरो भव ॥३१॥
अर्थ:
उस स्थिर, व्यापक, पूर्ण और विषयों से रहित ब्रह्म में आचार्य और शास्त्र के मार्ग से प्रवेश करके शीघ्र ही उसमें स्थिर हो जाओ।
३२--शिवो गुरुः शिवो वेदः शिव देवः शिवः प्रभुः ।
शिवोऽस्म्यहं शिवः सर्वं शिवदन्यन्न किंचन ॥३२॥
अर्थ:
गुरु शिव हैं, वेद शिव हैं, देव शिव हैं, प्रभु शिव हैं। मैं शिव हूँ, सब कुछ शिव ही है; शिव से भिन्न कुछ भी नहीं है।
३३--तमेव धीरो विज्ञाय प्रज्ञां कुर्वीत ब्राह्मणः ।
नानुध्यायाद्बहूञ्छब्दान्वाचो विग्लापनं हि तत् ॥३३॥
अर्थ:
विवेकी साधक को उसी परम सत्य को जानकर उसमें अपनी बुद्धि स्थिर करनी चाहिए। बहुत-से शब्दों और वाद-विवादों में उलझते रहना वाणी को व्यर्थ थका देना है।
३४--शुको मुक्तो वामदेवोऽपि मुक्तस्ताभ्यां विना मुक्तिभाजो न सन्ति ।
शुकमार्गं येऽनुसरन्ति धीराः सद्यो मुक्तास्ते भवन्तीह लोके ॥३४॥
अर्थ:
शुक मुक्त हुए और वामदेव भी मुक्त हुए। इन दोनों द्वारा बताए मार्गों से मुक्ति प्राप्त की जा सकती है। जो धीर साधक शुकमार्ग का अनुसरण करते हैं, वे इसी जीवन में शीघ्र मुक्ति प्राप्त करते हैं।
३५--वामदेवं येऽनुसरन्ति नित्यं मृत्वा जनित्वा च पुनःपुनस्तत् ।
ते वै लोके क्रममुक्ता भवन्ति योगैः सांख्यैः कर्मभिः सत्त्वयुक्तैः ॥३५॥
अर्थ:
जो वामदेव के मार्ग का निरन्तर अनुसरण करते हैं और बार-बार जन्म-मरण के क्रम में साधना करते हैं, वे योग, सांख्य और सात्त्विक कर्मों के द्वारा क्रममुक्ति प्राप्त करते हैं।
३६--शुकश्च वामदेवश्च द्वे सृती देवनिर्मिते ।
शुकः विहङ्गमः प्रोक्तो वामदेवः पिपीलिका ॥३६॥
अर्थ:
शुक और वामदेव—ये दो मार्ग कहे गए हैं। शुकमार्ग पक्षी के समान सीधा और तीव्र है, जबकि वामदेवमार्ग चींटी के समान धीरे-धीरे आगे बढ़ने वाला है।
३७--अतद्व्यावृत्तिरूपेण साक्षाद्विधिमुखेन वा ।
महावाक्यविचारेण सांख्ययोगसमाधिना ॥३७॥
अर्थ:
ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति के लिए अनात्म का निषेध, प्रत्यक्ष आत्मविचार, महावाक्यों का मनन अथवा सांख्य-योग की समाधि—ये विभिन्न साधन हैं।
३८--विदित्वा स्वात्मनो रूपं संप्रज्ञातसमाधितः ।
शुकमार्गेण विरजाः प्रयान्ति परमं पदम् ॥३८॥
अर्थ:
जो साधक संप्रज्ञात समाधि के द्वारा अपने आत्मस्वरूप को जानकर राग-द्वेष से रहित हो जाते हैं, वे शुकमार्ग से परम पद को प्राप्त होते हैं।
३९--यमाद्यासनजायासहठाभ्या
सात्पुनःपुनः ।
विघ्नबाहुल्यसंजात अणिमादिवशादिह ॥३९॥
अर्थ:
यम, आसन आदि तथा हठयोग के बार-बार किए जाने वाले अभ्यास में अनेक विघ्न उत्पन्न हो सकते हैं। अणिमा आदि योगसिद्धियाँ भी साधक को आकर्षित कर सकती हैं।
४०--अलब्ध्वापि फलं सम्यक्पुनर्भूत्वा महाकुले ।
पुनर्वासनयैवायं योगाभ्यासं पुनश्चरन् ॥४०॥
अर्थ:
यदि साधक को उसी जीवन में पूर्ण फल प्राप्त न हो, तो वह श्रेष्ठ कुल में पुनर्जन्म लेकर अपनी पूर्व संस्कार-वासनाओं के कारण फिर से योगाभ्यास करता है।
४१--अनेकजन्माभ्यासेन वामदेवेन वै पथा ।
सोऽपि मुक्तिं समाप्नोति तद्विष्णोः परमं पदम् ॥४१॥
अर्थ:
अनेक जन्मों के अभ्यास द्वारा वामदेव के क्रमिक मार्ग से चलता हुआ वह साधक भी अन्ततः मुक्ति प्राप्त करता है और भगवान् विष्णु के परम पद को प्राप्त होता है।
४२--द्वाविमावपि पन्थानौ ब्रह्मप्राप्तिकरौ शिवौ ।
सद्योमुक्तिप्रदश्चैकः क्रममुक्तिप्रदः परः ।
अत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः ॥४२॥
अर्थ:
ये दोनों मार्ग कल्याणकारी हैं और ब्रह्म की प्राप्ति कराने वाले हैं। एक सद्यःमुक्ति देता है और दूसरा क्रममुक्ति। जो सम्पूर्ण जगत में एकत्व देखता है, उसके लिए फिर मोह और शोक कहाँ रह सकता है?
४३--यस्यानुभवपर्यन्ता बुद्धिस्तत्त्वे प्रवर्तते ।
तद्दृष्टिगोचराः सर्वे मुच्यन्ते सर्वपातकैः ॥४३॥
अर्थ:
जिसकी बुद्धि तत्त्व के प्रत्यक्ष अनुभव तक पहुँच गई है, ऐसे ब्रह्मज्ञानी की दृष्टि में आने वाले लोग भी सभी पापों से मुक्त होने के योग्य हो जाते हैं।
४४--खेचरा भूचराः सर्वे ब्रह्मविद्दृष्टिगोचराः ।
सद्य एव विमुच्यन्ते कोटिजन्मार्जितैरघैः ॥४४॥ इति॥
अर्थ:
आकाश में विचरण करने वाले हों अथवा पृथ्वी पर रहने वाले—जो भी ब्रह्मज्ञानी की दृष्टि में आते हैं, वे करोड़ों जन्मों से संचित पापों से भी तत्काल मुक्त हो जाते हैं।
इति चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४॥
इस अध्याय का सार--
चतुर्थ अध्याय का मूल संदेश यह है कि आत्मज्ञान क्रमशः सात भूमियों से परिपक्व होता है—शुभेच्छा से तुरीयगा तक। साधक जब अहंकार, वासना, राग-द्वेष और द्वैत-बुद्धि से ऊपर उठकर अपने शुद्ध चैतन्यस्वरूप में स्थित हो जाता है, तब उसे जीवन्मुक्त कहा जाता है। इसके बाद उपनिषद् शुकमार्ग (सद्यःमुक्ति) और वामदेवमार्ग (क्रममुक्ति) का विवेचन करता है।
 पंचम अध्याय-- 
यह अध्याय“योगाभ्यासविधि” पर केन्द्रित है। इसमें देह के पंचभूत, प्राणायाम, अष्टाङ्गयोग, आसन, नाड़ीचक्र, कुण्डलिनी, बन्ध, प्रणव (ॐ), योग की चार भूमिकाएँ और अन्त में जीवन्मुक्ति का वर्णन है। प्रमाणित पाठ में यह अध्याय ७५ मन्त्रों का है।
 १ से ७५ तक क्रम से मूल संस्कृत और हिन्दी में अर्थ  पञ्चमोऽध्यायः
योगाभ्यासविधिः--
१--अथ हैनं ऋभुं भगवन्तं निदाघः पप्रच्छ
योगाभ्यासविधिमनुब्रूहीति ।
तथेति स होवाच ।
पञ्चभूतात्मको देहः पञ्चमण्डलपूरितः ।
काठिन्यं पृथिवी मेका पानीयं तद्द्रवाकृति ॥
अर्थ:
निदाघ ने भगवान् ऋभु से पूछा—हे भगवन्! योगाभ्यास की विधि बताइए। ऋभु बोले—यह शरीर पाँच महाभूतों से बना है और पाँच मण्डलों से युक्त है। शरीर की कठोरता पृथ्वी-तत्त्व का लक्षण है और उसका द्रव रूप जल-तत्त्व का।
२--दीपनं च भवेत्तेजः प्रचारो वायुलक्षणम् ।
आकाशः सत्त्वतः सर्वं ज्ञातव्यं योगमिच्छता ॥२॥
अर्थ:
शरीर में ऊष्मा और प्रकाश अग्नि-तत्त्व के लक्षण हैं, गति वायु का लक्षण है और आकाश व्यापकता का। जो योग करना चाहता है, उसे इन तत्त्वों का स्वरूप जानना चाहिए।
३--षट्शतान्यधिकान्यत्र सहस्राण्येकविंशतिः ।
अहोरात्रवहिः श्वासैर्वायुमण्डलघाततः ॥३॥
अर्थ:
एक दिन-रात में मनुष्य के श्वास-प्रश्वास की संख्या लगभग २१,६०० कही गई है। ये श्वास निरन्तर वायु के प्रवाह को चलाते रहते हैं।
४--तत्पृथ्वीमण्डले क्षीणे वलिरायाति देहिनाम् ।
तद्वदापो गणापाये केशाः स्युः पाण्डुराः क्रमात् ॥४॥
अर्थ:
शरीर में पृथ्वी-तत्त्व की शक्ति क्षीण होने पर वृद्धावस्था की झुर्रियाँ आती हैं। जल-तत्त्व के क्षीण होने पर क्रमशः बाल सफेद होने लगते हैं।
५--तेजःक्षये क्षुधा कान्तिर्नश्यते मारुतक्षये ।
वेपथुः सम्भवेन्नित्यं नाम्भसेनैव जीवति ॥५॥
अर्थ:
अग्नि-तत्त्व के क्षीण होने पर भूख और शरीर की कान्ति कम होती है। वायु-तत्त्व के क्षीण होने पर शरीर में कम्पन उत्पन्न होता है। केवल जल के सहारे जीवन नहीं चलता।
६--इत्थंभूतं क्षयान्नित्यं जीवितं भूतधारणम् ।
उड्ड्याणं कुरुते यस्मादविश्रान्तं महाखगः ॥६॥
अर्थ:
इस प्रकार शरीर के तत्त्व निरन्तर क्षीण होते रहते हैं और जीवन उन्हीं तत्त्वों के संतुलन पर टिका है। जिस प्रकार पक्षी निरन्तर उड़ता है, उसी प्रकार प्राणवायु शरीर में गतिशील रहती है।
७--उड्डियाणं तदेव स्यात्तत्र बन्धोऽभिधीयते ।
उड्डियाणो ह्यसौ बन्धो मृत्युमातङ्गकेशरी ॥७॥
अर्थ:
इस विशेष योग-प्रक्रिया को उड्डियान-बन्ध कहा जाता है। यह मृत्यु रूपी हाथी के लिए सिंह के समान शक्तिशाली बताया गया है।
८॥
तस्य मुक्तिस्तनोः कायात्तस्य बन्धो हि दुष्करः ।
अग्नौ तु चालिते कुक्षौ वेदना जायते भृशम् ॥८॥
अर्थ:
इस अभ्यास से शरीर पर नियंत्रण और मुक्ति का मार्ग प्रशस्त होता है, लेकिन बन्ध का अभ्यास कठिन है। उदर की अग्नि को अनुचित ढंग से चलाने पर तीव्र पीड़ा हो सकती है।
९--न कार्या क्षुधि तेनापि नापि विण्मूत्रवेगिना ।
हितं मितं च भोक्तव्यं स्तोकं स्तोकमनेकधा ॥९॥
अर्थ:
अत्यधिक भूख या मल-मूत्र के वेग की अवस्था में यह अभ्यास नहीं करना चाहिए। भोजन हितकर, मित और थोड़ी-थोड़ी मात्रा में करना चाहिए।
१०--मृदुमध्यममन्त्रेषु क्रमान्मन्त्रं लयं हठम् ।
लयमन्त्रहठा योगा योगो ह्यष्टाङ्गसंयुतः ॥१०॥
अर्थ:
योग में मन्त्र, लय और हठ—अलग-अलग प्रकार के साधन हैं। योग का एक प्रमुख स्वरूप अष्टाङ्गयोग है।
११--यमश्च नियमश्चैव तथा चासनमेव च ।
प्राणायामस्तथा पश्चात्प्रत्याहारस्तथा परम् ॥११॥
अर्थ:
अष्टाङ्गयोग के अंग हैं—यम, नियम, आसन, प्राणायाम और प्रत्याहार।
१२--धारणा च तथा ध्यानं समाधिश्चाष्टमो भवेत् ।
अहिंसा सत्यमस्तेयं ब्रह्मचर्यं दयार्जवम् ॥१२॥
अर्थ:
छठा धारणा, सातवाँ ध्यान और आठवाँ समाधि है। यमों में अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और दया-सरलता आदि बताए गए हैं।
१३--क्षमा धृतिर्मिताहारः शौचं चेति यमा दश ।
तपः सन्तोषमास्तिक्यं दानमीश्वरपूजनम् ॥१३॥
अर्थ:
क्षमा, धैर्य, मिताहार और शौच भी यमों में गिने गए हैं। तप, संतोष, आस्तिकता, दान और ईश्वर-पूजन नियमों के अंग हैं।
१४--सिद्धान्तश्रवणं चैव ह्रीर्मतिश्च जपो व्रतम् ।
एते हि नियमाः प्रोक्ता दशधैव महामते ॥१४॥
अर्थ:
सिद्धान्तों का श्रवण, लज्जा/विनय, सद्बुद्धि, जप और व्रत—ये दस नियम कहे गए हैं।
१५--एकादशासनानि स्युश्चक्रादि मुनिसत्तम ।
चक्रं पद्मासनं कूर्मं मयूरं कुक्कुटं तथा ॥१५॥
अर्थ:
हे श्रेष्ठ मुनि! यहाँ ग्यारह आसन बताए गए हैं—चक्रासन, पद्मासन, कूर्मासन, मयूरासन और कुक्कुटासन आदि।
१६--वीरासनं स्वस्तिकं च भद्रं सिंहासनं तथा ।
मुक्तासनं गोमुखं च कीर्तितं योगवित्तमैः ॥१६॥
अर्थ:
वीरासन, स्वस्तिकासन, भद्रासन, सिंहासन, मुक्तासन और गोमुखासन भी योगविदों द्वारा बताए गए हैं।
१७--सव्योरु दक्षिणे गुल्फे दक्षिणं दक्षिणेतरे ।
निदध्यादृजुकायस्तु चक्रासनमिदं मतम् ॥१७॥
अर्थ:
शरीर को सीधा रखते हुए पैरों की विशेष स्थिति में बैठना चक्रासन कहा गया है।
१८--पूरकः कुम्भकस्तद्वद्रेचकः पूरकः पुनः ।
प्राणायामः स्वनाडीभिस्तस्मान्नाडीः प्रचक्षते ॥१८॥
अर्थ:
श्वास को भीतर लेना पूरक, रोकना कुम्भक और बाहर छोड़ना रेचक है। इन प्रक्रियाओं से सम्बन्धित मार्गों को नाड़ियाँ कहा जाता है।
१९--शरीरं सर्वजन्तूनां षण्णवत्यङ्गुलात्मकम् ।
तन्मध्ये पायुदेशात्तु द्व्यङ्गुलात्परतः परम् ॥१९॥
अर्थ:
योगशास्त्रीय वर्णन में शरीर की लम्बाई छियानवे अंगुल कही गई है। उसके मध्य में विशेष नाड़ी-स्थान का वर्णन किया गया है।
२०--मेढ्रदेशादधस्तात्तु द्व्यङ्गुलान्मध्यमुच्यते ।
मेढ्रान्नवाङ्गुलादूर्ध्वं नाडीनां कन्दमुच्यते ॥२०॥
अर्थ:
जननेन्द्रिय के नीचे और ऊपर के मध्य भाग में नाड़ियों का विशेष केन्द्र अर्थात् कन्द बताया गया है।
२१--चतुरङ्गुलमुत्सेधं चतुरङ्गुलमायतम् 
अण्डाकारं परिवृतं मेदोमज्जास्थिशोणितैः ॥२१॥
अर्थ:
वह कन्द लगभग चार अंगुल ऊँचा और चार अंगुल लम्बा, अण्डाकार तथा मेद, मज्जा, अस्थि और रक्त से घिरा हुआ कहा गया है।
२२--तत्रैव नाडीचक्रं तु द्वादशारं प्रतिष्ठितम् ।
शरीरं ध्रियते येन वर्तते तत्र कुण्डली ॥२२॥
अर्थ:
वहीं बारह भागों वाला नाड़ीचक्र स्थित है। शरीर को धारण करने वाली कुण्डलिनी शक्ति भी वहीं स्थित बताई गई है।
२३--ब्रह्मरन्ध्रं सुषुम्णा या वदनेन पिधाय सा ।
अलम्बुसा सुषुम्णायाः कुहूर्नाडी वसत्यसौ ॥२३॥
अर्थ:
सुषुम्णा नाड़ी ब्रह्मरन्ध्र की ओर जाती है। उसके आसपास अलम्बुसा और कुहू आदि नाड़ियों का वर्णन किया गया है।
२४--अनन्तरारयुग्मे तु वारुणा च यशस्विनी ।
दक्षिणारे सुषुम्णायाः पिङ्गला वर्तते क्रमात् ॥२४॥
अर्थ:
नाड़ीचक्र में वारुणा और यशस्विनी नाड़ियाँ तथा सुषुम्णा के दक्षिण भाग में पिङ्गला नाड़ी स्थित बताई गई है।
२५--
तदन्तरारयोः पूषा वर्तते च पयस्विनी ।
सुषुम्ना पश्चिमे चारे स्थिता नाडी सरस्वती ॥२५॥
अर्थ:
इसके अन्य भागों में पूषा और पयस्विनी नाड़ियाँ हैं तथा सुषुम्णा के पश्चिम भाग में सरस्वती नाड़ी बताई गई है।
२६--शङ्खिनी चैव गान्धारी तदनन्तरयोः स्थिते ।
उत्तरे तु सुषुम्नाया इडाख्या निवसत्यसौ ॥२६॥
अर्थ:
शङ्खिनी और गान्धारी नाड़ियाँ भी वहाँ स्थित हैं। सुषुम्णा के उत्तर भाग में इड़ा नाड़ी का निवास कहा गया है।
२७--अनन्तरं हस्तिजिह्वा ततो विश्वोदरी स्थिता ।
प्रदक्षिणक्रमेणैव चक्रस्यारेषु नाडयः ॥२७॥
अर्थ:
हस्तिजिह्वा और विश्वोदरी आदि नाड़ियाँ भी चक्र के विभिन्न भागों में क्रम से स्थित बताई गई हैं।
२८--वर्तन्ते द्वादश ह्येता द्वादशानिलवाहकाः ।
पटवत्संस्थिता नाड्यो नानावर्णाः समीरिताः ॥२८॥
अर्थ:
ये बारह नाड़ियाँ बारह प्रकार के वायु-प्रवाह की वाहक मानी गई हैं। वे विभिन्न रूप और वर्ण वाली बताई गई हैं।
२९--पटमध्यं तु यत्स्थानं नाभिचक्रं तदुच्यते ।
नादाधारा समाख्याता ज्वलन्ती नादरूपिणी ॥२९॥
अर्थ:
नाड़ी-जाल के मध्य का स्थान नाभिचक्र कहलाता है। इसे नाद का आधार और प्रकाशित नादस्वरूप कहा गया है।
३०--पररन्ध्रा सुषुम्ना च चत्वारो रत्नपूरिताः ।
कुण्डल्या पिहितं शश्वद्ब्रह्मरन्ध्रस्य मध्यमम् ॥३०॥
अर्थ:
सुषुम्णा का परम मार्ग ब्रह्मरन्ध्र की ओर जाता है। ब्रह्मरन्ध्र का मध्य कुण्डलिनी द्वारा निरन्तर आवृत बताया गया है।
३१--एवमेतासु नाडीषु धरन्ति दशवायवः ।
एवं नाडीगतिं वायुगतिं ज्ञात्वा विचक्षणः ॥३१॥
अर्थ:
इन नाड़ियों में दस प्रकार के प्राण-वायु कार्य करते हैं। विवेकी साधक को नाड़ियों और प्राणवायु की गति को समझना चाहिए।
३२--समग्रीवशिरः कायः संवृतास्यः सुनिश्चलः ।
नासाग्रे चैव हृन्मध्ये बिन्दुमध्ये तुरीयकम् ॥३२॥
अर्थ:
गर्दन, सिर और शरीर को सीधा तथा मुख को संयमित रखकर स्थिर बैठना चाहिए। ध्यान में नासाग्र, हृदय और बिन्दु आदि पर एकाग्रता की जाती है।
३३--स्रवन्तममृतं पश्येन्नेत्राभ्यां सुसमाहितः ।
अपानं मुकुलीकृत्य पायुमाकृष्य चोन्मुखम् ॥३३॥
अर्थ:
पूर्ण एकाग्रता से साधक अमृत-धारा का ध्यान करता है। अपानवायु को ऊपर की ओर ले जाने का अभ्यास बताया गया है।
३४--प्रणवेन समुत्थाप्य श्रीबीजेन निवर्तयेत् ।
स्वात्मानं च श्रियं ध्यायेदमृतप्लावनं तथा ॥३४॥
अर्थ:
प्रणव अर्थात् ॐ के द्वारा उस शक्ति को ऊपर उठाकर और मन्त्र के द्वारा उसका नियमन करते हुए अपने आत्मस्वरूप तथा अमृतमय अवस्था का ध्यान करना चाहिए।
३५--कालवञ्चनमेतद्धि सर्वमुख्यं प्रचक्षते ।
मनसा चिन्तिता कार्यं मनसा येन सिध्यति ॥३५॥
अर्थ:
इस साधना को काल पर विजय पाने का प्रमुख उपाय कहा गया है। मन जिस कार्य का दृढ़तापूर्वक चिन्तन करता है, साधना से वह सिद्ध हो सकता है।
३६--जले
ऽग्निज्वलनाच्छाखापल्लवानि भवन्ति हि ।
नाधन्यं जागतं वाक्यं विपरीता भवेत्क्रिया ॥३६॥
अर्थ:
योगशक्ति से असम्भव प्रतीत होने वाली प्रक्रियाएँ भी सम्भव हो सकती हैं। यहाँ साधक के संकल्प और योगाभ्यास की शक्ति का वर्णन है।
३७--मार्गे बिन्दुं समाबध्य वह्निं प्रज्वाल्य जीवने ।
शोषयित्वा तु सलिलं तेन कायं दृढं भवेत् ॥३७॥
अर्थ:
योगमार्ग में बिन्दु को स्थिर करके आन्तरिक अग्नि को जागृत करने और जल-तत्त्व का संयमन करने से शरीर को दृढ़ करने की योगिक प्रक्रिया बताई गई है।
३८--गुदयोनिसमायुक्त आकुञ्चत्येककालतः ।
अपानमूर्ध्वगं कृत्वा समानोन्ने नियोजयेत् ॥३८॥
अर्थ:
मूलस्थान को संकुचित करके अपानवायु को ऊपर उठाना और उसे समानवायु के साथ संयोजित करना योगाभ्यास का एक अंग बताया गया है।
३९--स्वात्मानं च श्रियं ध्यायेदमृतप्लावनं ततः ।
बलं समारभेद्योगं मध्यमद्वारभागतः ॥३९॥
अर्थ:
इसके बाद अपने आत्मस्वरूप और अमृतमय अवस्था का ध्यान करके योगबल को जागृत करना चाहिए और मध्य मार्ग में प्राण की गति स्थापित करनी चाहिए।
४०--भावयेदूर्ध्वगत्यर्थं प्राणापानसुयोगतः ।
एष योगो वरो देहे सिद्धिमार्गप्रकाशकः ॥४०॥
अर्थ:
प्राण और अपान के सम्यक् संयोग द्वारा उनकी ऊर्ध्वगति का ध्यान करना चाहिए। यही श्रेष्ठ योग शरीर में सिद्धि के मार्ग को प्रकाशित करता है।
४१--यथैवापाङ्गतः सेतुः प्रवाहस्य निरोधकः ।
तथा शरीरगा छाया ज्ञातव्या योगिभिः सदा ॥४१॥
अर्थ:
जिस प्रकार बाँध जल के प्रवाह को रोकता है, उसी प्रकार योगी को शरीर में प्राण के प्रवाह और उसके नियन्त्रण की प्रक्रिया को समझना चाहिए।
४२॥--सर्वासामेव नाडीनामेष बन्धः प्रकीर्तितः ।
बन्धस्यास्य प्रसादेन स्फुटीभवति देवता ॥४२॥
अर्थ:
यह बन्ध सभी नाड़ियों से सम्बन्धित बताया गया है। इस बन्ध की सिद्धि से अन्तःस्थित दिव्य शक्ति का अनुभव स्पष्ट होता है।
४३--एवं चतुष्पथो बन्धो मार्गत्रयनिरोधकः ।
एकं विकासयन्मार्गं येन सिद्धाः सुसङ्गताः ॥४३॥
अर्थ:
यह बन्ध अनेक मार्गों के प्रवाह को नियंत्रित करके एक श्रेष्ठ मार्ग को विकसित करता है, जिससे सिद्ध योगी आगे बढ़ते हैं।
४४--उदानमूर्ध्वगं कृत्वा प्राणेन सह वेगतः ।
बन्धोऽयं सर्वनाडीनामूर्ध्वं याति निरोधकः ॥४४॥
अर्थ:
उदानवायु को ऊपर उठाकर प्राण के साथ उसका संयोग किया जाता है। यह बन्ध नाड़ियों की ऊर्ध्वगति को नियंत्रित करता है।
४५--अयं च सम्पुटो योगो मूलबन्धोऽप्ययं मतः ।
बन्धत्रयमनेनैव सिद्ध्यत्यभ्यासयोगतः ॥४५॥
अर्थ:
यह योग सम्पुट के समान है और इसे मूलबन्ध भी कहा गया है। अभ्यास से इसी के द्वारा तीनों बन्धों की सिद्धि होती है।
४६--दिवारात्रमविच्छिन्नं यामेयामे यदा यदा ।
अनेनाभ्यासयोगेन वायुरभ्यसितो भवेत् ॥४६॥
अर्थ:
दिन-रात निरन्तर उचित समय पर इस अभ्यास से प्राणवायु का अभ्यास किया जाता है।
४७--वायावभ्यसिते वह्निः प्रत्यहं वर्धते तनौ ।
वह्नौ विवर्धमाने तु सुखमन्नादि जीर्यते ॥४७॥
अर्थ:
प्राणवायु के अभ्यास से शरीर की आन्तरिक अग्नि बढ़ती है। अग्नि के प्रबल होने पर भोजन आदि अच्छी तरह पचता है।
४८--अन्नस्य परिपाकेन रसवृद्धिः प्रजायते ।
रसे वृद्धिं गते नित्यं वर्धन्ते धातवस्तथा ॥४८॥
अर्थ:
भोजन के ठीक प्रकार पचने से शरीर में रस की वृद्धि होती है और रस के बढ़ने से अन्य धातुओं की भी वृद्धि होती है।
४९--धातूनां वर्धनेनैव प्रबोधो वर्तते तनौ ।
दह्यन्ते सर्वपापानि जन्मकोट्यर्जितानि च ॥४९॥
अर्थ:
धातुओं के संतुलन और योगाभ्यास से शरीर में जागरण और चेतना का विकास होता है। योगाग्नि से अनेक जन्मों के संचित पाप नष्ट होने की बात कही गई है।
५०--गुदमेढ्रान्तरालस्थं मूलाधारं त्रिकोणकम् ।
शिवस्य बिन्दुरूपस्य स्थानं तद्धि प्रकाशकम् ॥५०॥
अर्थ:
गुदा और जननेन्द्रिय के मध्य त्रिकोणाकार मूलाधार स्थित है। यह शिव के बिन्दुरूप स्वरूप का प्रकाशित स्थान कहा गया है।
५१--यत्र कुण्डलिनी नाम परा शक्तिः प्रतिष्ठिता ।
यस्मादुत्पद्यते वायुर्यस्माद्वह्निः प्रवर्धते ॥५१॥
अर्थ:
मूलाधार में कुण्डलिनी नामक पराशक्ति स्थित बताई गई है। वहीं से वायु की गति और अग्नि की वृद्धि का सम्बन्ध बताया गया है।
५२--यस्मादुत्पद्यते बिन्दुर्यस्मान्नादः प्रवर्धते ।
यस्मादुत्पद्यते हंसो यस्मादुत्पद्यते मनः ॥५२॥
अर्थ:
इसी शक्ति-केन्द्र से बिन्दु, नाद, हंस और मन की उत्पत्ति का योगिक वर्णन किया गया है।
५३--मूलाधारादिषट्चक्रं शक्तिस्थानमुदीरितम् ।
कण्ठादुपरि मूर्धान्तं शांभवं स्थानमुच्यते ॥५३॥
अर्थ:
मूलाधार से ऊपर के छः चक्र शक्ति के स्थान कहे गए हैं। कण्ठ से मस्तक तक का क्षेत्र शांभव स्थान कहा गया है।
५४--नाडीनामाश्रयः पिण्डो नाड्यः प्राणस्य चाश्रयः ।
जीवस्य निलयः प्राणो जीवो हंसस्य चाश्रयः ॥५४॥
अर्थ:
शरीर नाड़ियों का आधार है, नाड़ियाँ प्राण का आधार हैं, प्राण जीव का और जीव हंस का आधार कहा गया है।
५५--हंसः शक्तेरधिष्ठानं चराचरमिदं जगत् ।
निर्विकल्पः प्रसन्नात्मा प्राणायां समभ्यसेत् ॥५५॥
अर्थ:
हंस समस्त शक्ति का अधिष्ठान है और यह चराचर जगत उसी शक्ति से जुड़ा है। साधक को निर्विकल्प और प्रसन्नचित्त होकर प्राणायाम का अभ्यास करना चाहिए।
५६--सम्यग्बन्धत्रयस्थोऽपि लक्ष्यलक्षणकारणम् ।
वेद्यं समुद्धरेन्नित्यं सत्यसन्धानमानसः ॥५६॥
अर्थ:
तीनों बन्धों में ठीक प्रकार स्थित होकर सत्य की खोज करने वाले साधक को अपने वास्तविक लक्ष्य का निरन्तर अनुसंधान करना चाहिए।
५७--रेचकं पूरकं चैव कुम्भमध्ये निरोधयेत् ।
दृश्यमाने परे लक्ष्ये ब्रह्मणि स्वयमाश्रितः ॥५७॥
अर्थ:
रेचक और पूरक के बीच कुम्भक में प्राण को स्थिर करके साधक उस परम लक्ष्य—ब्रह्म—में अपना मन स्थिर करे।
५८--बाह्यस्थविषयं सर्वं रेचकः समुदाहृतः ।
पूरकं शास्त्रविज्ञानं कुम्भकं स्वगतं स्मृतम् ॥५८॥
अर्थ:
बाहरी विषयों का त्याग रेचक, शास्त्रीय ज्ञान को भीतर ग्रहण करना पूरक, और अपने आत्मस्वरूप में स्थित होना कुम्भक कहा गया है।
५९--एवमभ्यासचित्तश्चेत्समुक्तो नात्र संशयः ।
कुम्भकेन समारोप्य कुम्भकेन पूरयेत् ॥५९॥
अर्थ:
यदि चित्त इस प्रकार अभ्यास में स्थिर हो जाए तो साधक मुक्त हो जाता है—इसमें संदेह नहीं। कुम्भक द्वारा प्राण को स्थिर और पूर्ण करना चाहिए।
६०--कुम्भेन कुम्भयेत्कुम्भं तदन्तस्थः परं शिवम् ।
पुनरास्फालयेदद्य सुस्थिरं कण्ठमुद्रया ॥६०॥
अर्थ:
कुम्भक के द्वारा प्राण को कुम्भक में स्थिर करके उसके भीतर स्थित परम शिव का ध्यान करना चाहिए। कण्ठ-मुद्रा से इसे स्थिर किया जाता है।
६१--वायूनां गतिमावृत्य धृत्वा पूरककुम्भकौ ।
समहस्तयुगं भूमौ समं पादयुगं तथा ॥६१॥
अर्थ:
प्राणवायु की गति को नियंत्रित करके पूरक और कुम्भक का अभ्यास करना चाहिए। हाथ और पैर उचित स्थिर स्थिति में हों।
६२--वेधकक्रमयोगेन चतुष्पीठं तु वायुना ।
आस्फालयेन्महामेरुं वायुवक्त्रे प्रकोटिभिः ॥६२॥
अर्थ:
योग की विशेष प्रक्रिया द्वारा वायु को ऊपर की ओर ले जाकर मेरुदण्ड के मार्ग में स्थित केन्द्रों को जागृत करने का वर्णन किया गया है।
६३--पुटद्वयं समाकृष्य वायुः स्फुरति सत्वरम् ।
सोमसूर्याग्निसंबधाज्जानीयादमृताय वै ॥६३॥
अर्थ:
प्राण की विशेष गति से चन्द्र, सूर्य और अग्नि के योग का अनुभव होता है। यह अमृततत्त्व की ओर संकेत करता है।
६४--मेरुमध्यगता देवाश्चलन्ते मेरुचालनात् ।
आदौ सञ्जायते क्षिप्रं वेधोऽस्य ब्रह्मग्रन्थितः ॥६४॥
अर्थ:
मेरुदण्ड के मध्य स्थित सूक्ष्म शक्तियाँ योगाभ्यास से जागृत होती हैं। आरम्भ में ब्रह्मग्रन्थि का भेदन बताया गया है।
६५--ब्रह्मग्रन्थिं ततो भित्त्वा विष्णुग्रन्थिं भिनत्त्यसौ ।
विष्णुग्रन्थिं ततो भित्त्वा रुद्रग्रन्थिं भिनत्त्यसौ ॥६५॥
अर्थ:
साधक क्रमशः ब्रह्मग्रन्थि, विष्णुग्रन्थि और रुद्रग्रन्थि का भेदन करता है। यह योगिक चेतना के क्रमिक उत्कर्ष का प्रतीक है।
६६--रुद्रग्रन्थिं ततो भित्त्वा छित्वा मोहमलं तथा ।
अनेकजन्मसंस्कारगुरुदेवप्रसादतः ॥६६॥
अर्थ:
रुद्रग्रन्थि का भेदन और मोह रूपी मल का नाश अनेक जन्मों के संस्कार तथा गुरु और देव की कृपा से सम्भव होता है।
६७--योगाभ्यासात्ततो वेधो जायते तस्य योगिनः ।
इडापिङ्गलयोर्मध्ये सुषुम्नानाडिमण्डले ॥६७॥
अर्थ:
योगाभ्यास से साधक में यह आन्तरिक जागरण उत्पन्न होता है। यह इड़ा और पिङ्गला के बीच स्थित सुषुम्णा नाड़ी के मार्ग में बताया गया है।
६८--मुद्राबन्धविशेषेण वायुमूर्ध्वं च कारयेत् ।
ह्रस्वो दहति पापानि दीर्घो मोक्षप्रदायकः ॥६८॥
अर्थ:
विशेष मुद्रा और बन्ध द्वारा प्राणवायु को ऊपर उठाया जाता है। प्रणव के विभिन्न उच्चारणों का भी यहाँ संकेत है—जो पापों को नष्ट करने और मोक्ष प्रदान करने वाले बताए गए हैं।
६९--आप्यायनः प्लुतो वापि त्रिविधोच्चारणेन तु ।
तैलधारामिवच्छिन्नं दीर्घघण्टानिनादवत् ॥६९॥
अर्थ:
प्रणव का उच्चारण विभिन्न प्रकार से किया जाता है। उसका दीर्घ और अखण्ड नाद तेल की धारा की तरह निरन्तर तथा बड़ी घंटी के नाद जैसा गम्भीर होना चाहिए।
७०--अवाच्यं प्रणवस्याग्रं यस्तं वेद स वेदवित् ।
ह्रस्वं बिन्दुगतं दीर्घं ब्रह्मरन्ध्रगतं प्लुतम् ।
द्वादशान्तगतं मन्त्रं प्रसादं मन्त्रसिद्धये ॥७०॥
अर्थ:
जो प्रणव के उस परम सूक्ष्म, वाणी से परे अन्तिम स्वरूप को जानता है, वही वास्तविक वेदज्ञ है। प्रणव के ह्रस्व, दीर्घ और प्लुत रूपों का वर्णन करके उसे द्वादशान्त तक ले जाने की बात कही गई है।
७१--सर्वविघ्नहरश्चायं प्रणवः सर्वदोषहा ।
आरंभश्च घटश्चैव पुनः परिचयस्तथा ॥७१॥
अर्थ:
प्रणव सभी विघ्नों और दोषों को दूर करने वाला कहा गया है। योग में चार अवस्थाएँ बताई जाती हैं—आरम्भ, घट, परिचय और निष्पत्ति।
७२--निष्पत्तिश्चेति कथिताश्चतस्रस्तस्य भूमिकाः ।
कारणत्रयसंभूतं बाह्यं कर्म परित्यजन् ॥७२॥
अर्थ:
योग की चार भूमिकाएँ हैं—आरम्भ, घट, परिचय और निष्पत्ति। साधक बाहरी कर्मों के बन्धन को छोड़कर आन्तरिक साधना में प्रवृत्त होता है।
७३--आन्तरं कर्म कुरुते यत्रारंभः स उच्यते ।
वायुः पश्चिमतो वेधं कुर्वन्नापूर्य सुस्थिरम् ॥७३॥
अर्थ:
जब साधक बाहरी कर्मों से हटकर आन्तरिक योगकर्म आरम्भ करता है, उसे आरम्भभूमि कहा जाता है। प्राणवायु को विशेष मार्ग में स्थिर करना इसका अंग है।
७४--यत्र तिष्ठति सा प्रोक्ता घटाख्या भूमिका बुधैः ।
न सजीवो न निर्जीवः काये तिष्ठति निश्चलम् ।
यत्र वायुः स्थिरः खे स्यात्सेयं प्रथमभूमिका ॥७४॥
अर्थ:
जहाँ प्राण स्थिर हो जाता है, उसे विद्वान घटभूमि कहते हैं। साधक उस समय न सामान्य अर्थ में जीवित-जैसा चंचल रहता है, न निर्जीव; शरीर स्थिर रहता है और प्राण आकाशवत् स्थिर होता है।
७५--यत्रात्मना सृष्टिलयौ जीवन्मुक्तिदशागतः ।
सहजः कुरुते योगं सेयं निष्पत्तिभूमिका ॥७५॥ इति॥
अर्थ:
जहाँ साधक अपने आत्मस्वरूप में ही सृष्टि और लय का अनुभव करता है, जीवन्मुक्त अवस्था को प्राप्त होकर सहज रूप से योग करता है—वही निष्पत्तिभूमि, अर्थात् योग की पूर्णता की अवस्था है।
उपसंहार
एतदुपनिषदं योऽधीते सोऽग्निपूतो भवति ।
स वायुपूतो भवति । सुरापानात्पूतो भवति ।
स्वर्णस्तेयात्पूतो भवति । स जीवन्मुक्तो भवति ।
अर्थ:
जो इस उपनिषद् का अध्ययन करता है, वह अग्नि और वायु से पवित्र होने के समान पवित्र होता है; सुरापान और स्वर्ण-चोरी जैसे महापापों से भी मुक्त होने का फल बताया गया है और अन्ततः वह जीवन्मुक्त होता है।
तदेतदृचाभ्युक्तम् ।
तद्विष्णोः परमं पदं सदा पश्यन्ति सूरयः ।
दिवीव चक्षुराततम् ।
तद्विप्रासो विपन्यवो जागृवांसः समिन्धते ।
विष्णोर्यत्परमं पदमित्युपनिषत् ॥
अर्थ:
ऋग्वेद की ऋचा में कहा गया है कि ज्ञानीजन भगवान् विष्णु के उस परम पद को सदा देखते हैं, जो आकाश में फैली हुई आँख के समान सर्वत्र प्रकाशित है। जाग्रत और विवेकी ऋषिजन उस परम पद को जानने का प्रयत्न करते हैं।
इति पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५॥
ॐ सह नाववतु सह नौ भुनक्तु सह वीर्यं करवावहै ।
तेजस्विनावधीतमस्तु मा विद्विषावहै ।
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
हरिः ॐ तत्सत् ॥
इति वराहोपनिषत्समाप्ता
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