(82) कुण्डिकोपनिषद
कुण्डिकोपनिषद--
कुण्डिकोपनिषद् सामवेद की संन्यास-उपनिषदों में गिनी जाती है और इसमें 28 मन्त्र/श्लोक हैं। इसका मुख्य विषय संन्यास-विधि, वैराग्य, आत्मचिन्तन और आत्मा के अद्वैत स्वरूप का निरूपण है।
॥ कुण्डिकोपनिषत् ॥
मंगलाचरण
कुण्डिकोपनिषत्ख्यातपरिव्राजकसंततिः ।
यत्र विश्रान्तिमगमत्तद्रामपदमाश्रये ॥
अर्थ:
कुण्डिकोपनिषद् जिस परिव्राजक-संन्यास परम्परा को प्रकाशित करती है, उस ज्ञान-मार्ग में जहाँ परम विश्रान्ति प्राप्त होती है, मैं उस परम रामपद का आश्रय लेता हूँ।
॥ शान्तिपाठ ॥
ॐ आप्यायन्तु ममाङ्गानि वाक्प्राणश्चक्षुः
श्रोत्रमथो बलमिन्द्रियाणि च ॥
सर्वाणि सर्वं ब्रह्मोपनिषदं माहं ब्रह्म निराकुर्यां
मा मा ब्रह्म निराकरोदनिराकरणमस्त्वनिराकरणं
मेऽस्तु तदात्मनि निरते य उपनिषत्सु धर्मास्ते मयि
सन्तु ते मयि सन्तु ॥
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
अर्थ:
मेरे अंग, वाणी, प्राण, नेत्र, कान, बल और सभी इन्द्रियाँ पुष्ट हों। यह सम्पूर्ण उपनिषद्-बोध ब्रह्मस्वरूप है। मैं ब्रह्म का त्याग न करूँ और ब्रह्म भी मुझसे दूर न हो। मेरे आत्मस्वरूप में जो उपनिषदों के धर्म बताए गए हैं, वे सब मुझमें प्रतिष्ठित हों।
प्रथम भाग — आश्रम और संन्यास की तैयारी
॥ १ ॥
ब्रह्मचर्याश्रमे क्षीणे गुरुशुश्रूषणे रतः ।
वेदानधीत्यानुज्ञात उच्यते गुरुणाश्रमी ॥ १॥
अर्थ:
जब ब्रह्मचर्य आश्रम पूर्ण हो जाए, गुरु की सेवा में मन लगा रहे और वेदों का अध्ययन कर लिया जाए, तब गुरु की अनुमति प्राप्त करने वाला व्यक्ति अगले आश्रम में प्रवेश करने योग्य माना जाता है।
॥ २ ॥
दारमाहृत्य सदृशमग्निमाधाय शक्तितः ।
ब्राह्मीमिष्टिं यजेत्तासामहोरात्रेण निर्वपेत् ॥ २॥
अर्थ:
गृहस्थाश्रम में प्रवेश करने के लिए योग्य पत्नी ग्रहण करके, सामर्थ्य के अनुसार अग्नि स्थापित करे और ब्राह्मी इष्टि का यज्ञ करे। उस यज्ञ की विधि को दिन-रात में सम्पन्न करे।
॥ ३ ॥
संविभज्य सुतानर्थे ग्राम्यकामान्विसृज्य च ।
संचरन्वनमार्गेण शुचौ देशे परिभ्रमन् ॥ ३॥
अर्थ:
अपने पुत्रों और परिवार के बीच धन-संपत्ति का उचित विभाजन करके तथा सांसारिक इच्छाओं को छोड़कर वन के मार्ग से पवित्र स्थानों में विचरण करे।
॥ ४ ॥
वायुभक्षोऽम्बुभक्षो वा विहितैः कन्दमूलकैः ।
स्वशरीरे समाप्याथ पृथिव्यां नाश्रु पातयेत् ॥ ४॥
अर्थ:
वनवासी अवस्था में वायु, जल अथवा नियमानुसार प्राप्त कन्द-मूल आदि से जीवन निर्वाह करे। शरीर का अन्त होने पर भी पृथ्वी पर आँसू न बहाए—अर्थात् मृत्यु के प्रति मोह से मुक्त रहे।
॥ ५ ॥
सह तेनैव पुरुषः कथं संन्यस्त उच्यते ।
सनामधेयो यस्मिंस्तु कथं संन्यस्त उच्यते ॥ ५॥
अर्थ:
यदि मनुष्य अभी भी उन्हीं सांसारिक सम्बन्धों और नाम-रूप की आसक्ति में बँधा है, तो उसे वास्तविक संन्यासी कैसे कहा जा सकता है? केवल बाहरी रूप बदल लेने से संन्यास पूर्ण नहीं होता।
॥ ६ ॥
तस्मात्फलविशुद्धाङ्गी संन्यासं संहितात्मनाम् ।
अग्निवर्णं विनिष्क्रम्य वानप्रस्थं प्रपद्यते ॥ ६॥
अर्थ:
इसलिए कर्मों के फल की आसक्ति से शुद्ध होकर और मन को संयमित करके मनुष्य संसार से क्रमशः निवृत्त होता हुआ वानप्रस्थ की ओर अग्रसर होता है।
॥ ७ ॥
लोकवद्भार्ययासक्तो वनं गच्छति संयतः ।
संत्यक्त्वा संसृतिसुखमनुतिष्ठति किं मुधा ॥ ७॥
अर्थ:
यदि मनुष्य बाहर से वन को चला जाए, लेकिन लोक के समान पत्नी और सांसारिक सुखों में आसक्त ही रहे, तो ऐसे बाहरी वनगमन का क्या लाभ? वास्तविक त्याग भीतर की आसक्ति का त्याग है।
॥ ८ ॥
किं वा दुःखमनुस्मृत्य भोगांस्त्यजति चोच्छ्रितान् ।
गर्भवासभयाद्भीतः शीतोष्णाभ्यां तथैव च ॥ ८॥
अर्थ:
अथवा संसार के दुःखों को स्मरण करके मनुष्य अत्यधिक सांसारिक भोगों को छोड़ देता है। गर्भवास के दुःख तथा शीत-उष्ण आदि द्वन्द्वों से भयभीत होकर वह वैराग्य की ओर जाता है।
द्वितीय भाग — संन्यासी का आचरण
इसके बाद उपनिषद् संन्यास की दीक्षा और साधक के आचरण का वर्णन करती है।
गुह्यं प्रवेष्टुमिच्छामि परं पदमनामयमिति ।
संनस्याग्निमपुनरावर्तनं यन्मृत्युर्जायमावहमिति ॥
अर्थ:
संन्यासी का संकल्प है—“मैं उस परम, रोगरहित पद में प्रवेश करना चाहता हूँ।” वह अग्नि और सांसारिक जीवन का ऐसा त्याग करता है जिससे पुनः संसार में लौटने की प्रवृत्ति समाप्त हो।
अथाध्यात्ममन्त्राञ्जपेत् । दीक्षामुपेयात्काषायवासाः ।
कक्षोपस्थलोमानि वर्जयेत् । ऊर्ध्वबाहुर्विमुक्तमार्गो भवति ।
अनिकेतश्चरेद्भिक्षाशी । निदिध्यासनं दध्यात् ।
पवित्रं धारयेज्जन्तुसंरक्षणार्थम् ।
अर्थ:
इसके बाद वह आध्यात्मिक मन्त्रों का जप करे, संन्यास की दीक्षा ले और गेरुए वस्त्र धारण करे। शरीर के अनावश्यक रोमों का त्याग करे। गृह का मोह छोड़कर अनिकेत—अर्थात् किसी एक घर से बँधा हुआ न रहे। भिक्षा से जीवन चलाए और निरन्तर आत्मचिन्तन करे। जीवों की रक्षा के लिए पवित्र वस्तु धारण करे।
संन्यासी के आवश्यक साधन
कुण्डिकां चमकं शिक्यं त्रिविष्टपमुपानहौ ।
शीतोपघातिनीं कन्थां कौपीनाच्छादनं तथा ॥ ९॥
अर्थ:
संन्यासी के लिए कुण्डिका/जलपात्र, पात्र, सामान रखने की रस्सी, पादुकाएँ, ठंड से बचने के लिए कन्था तथा कौपीन आदि आवश्यक साधन बताए गए हैं।
॥ १० ॥
पवित्रं स्नानशाटीं च उत्तरासङ्गमेव च ।
अतोऽतिरिक्तं यत्किंचित्सर्वं तद्वर्जयेद्यतिः ॥ १०॥
अर्थ:
पवित्र वस्तु, स्नान के लिए वस्त्र और ऊपर धारण करने वाला वस्त्र—इनके अतिरिक्त जो भी अनावश्यक वस्तुएँ हों, संन्यासी उनका त्याग करे।
॥ ११ ॥
नदीपुलिनशायी स्याद्देवागारेषु बाह्यतः ।
नात्यर्थं सुखदुःखाभ्यां शरीरमुपतापयेत् ॥ ११॥
अर्थ:
वह नदी के किनारे या देवालय के बाहर भी निवास कर सकता है। न तो अत्यधिक सुख में डूबे और न अत्यधिक दुःख देकर शरीर को कष्ट दे।
॥ १२ ॥
स्नानं पानं तथा शौचमद्भिः पूताभिराचिरेत् ।
स्तूयमानो न तुष्येत निन्दितो न शपेत्परान् ॥ १२॥
अर्थ:
पवित्र जल से स्नान, जलपान और शौच आदि करे। कोई प्रशंसा करे तो अत्यधिक प्रसन्न न हो और कोई निन्दा करे तो दूसरे को शाप न दे।
॥ १३ ॥
भिक्षादिवैदलं पात्रं स्नानद्रव्यमवारितम् ।
एवं वृत्तिमुपासीनो यतेन्द्रियो जपेत्सदा ॥ १३॥
अर्थ:
भिक्षा से प्राप्त भोजन के लिए उचित पात्र रखे और स्नान आदि की आवश्यक वस्तुएँ रखे। इस प्रकार संयमित जीवन जीते हुए, इन्द्रियों को वश में करके निरन्तर जप और साधना करे।
तृतीय भाग — ब्रह्म और आत्मा का चिन्तन
॥ १४ ॥
विश्वायमनुसंयोगं मनसा भावयेत्सुधीः ।
आकाशाद्वायुर्वायोर्ज्योतिर्ज्योतिष आपोऽद्भ्यः पृथिवी ।
एषां भूतानां ब्रह्म प्रपद्ये ।
अजरममरमक्षरमव्ययं प्रपद्ये ।
मय्यखण्डसुखांभोधौ बहुधा विश्ववीचयः ।
उत्पद्यन्ते विलीयन्ते मायामारुतविभ्रमात् ॥ १४॥
अर्थ:
ज्ञानी मनुष्य समस्त विश्व को मन में विचार करे। आकाश से वायु, वायु से अग्नि/ज्योति, ज्योति से जल और जल से पृथ्वी की उत्पत्ति का ध्यान करे। इन समस्त भूतों के मूल ब्रह्म का मैं आश्रय लेता हूँ—जो अजर, अमर, अक्षर और अविनाशी है।
मेरे अखण्ड आनन्द-सागर में संसार की असंख्य लहरें माया और मन के भ्रम से उत्पन्न होती हैं और फिर उसी में विलीन हो जाती हैं।
॥ १५ ॥
न मे देहेन संबन्धो मेघेनेव विहायसः ।
अतः कुतो मे तद्धर्मा जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तिषु ॥ १५॥
अर्थ:
जैसे आकाश का बादल से वास्तविक सम्बन्ध नहीं होता, वैसे ही मेरा वास्तविक सम्बन्ध शरीर से नहीं है। इसलिए जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति—इन तीनों अवस्थाओं के धर्म मुझे कैसे स्पर्श कर सकते हैं?
॥ १६ ॥
आकाशवत्कल्पविदूरगोहं
मादित्यवद्भास्यविलक्षणोऽहम् ।
अहार्यवन्नित्यविनिश्चलोऽहं
अम्भोधिवत्पारविवर्जितोऽहम् ॥ १६॥
अर्थ:
मैं आकाश के समान असीम और कल्पना से परे हूँ। सूर्य के समान स्वयं प्रकाशित और अन्य प्रकाश से भिन्न हूँ। पर्वत के समान स्थिर हूँ और समुद्र के समान जिसका कोई निश्चित पार नहीं है—ऐसा मैं आत्मस्वरूप हूँ।
॥ १७ ॥
नारायणोऽहं नरकान्तकोऽहं
पुरान्तकोऽहं पुरुषोऽहमीशः ।
अखण्डबोधोऽहमशेषसाक्षी
निरीश्वरोऽहं निरहं च निर्ममः ॥ १७॥
अर्थ:
मैं नारायणस्वरूप हूँ; मैं नरक का अन्त करने वाला हूँ; मैं पुरान्तक हूँ; मैं पुरुष और ईश्वरस्वरूप हूँ। मैं अखण्ड ज्ञान हूँ, सम्पूर्ण जगत का साक्षी हूँ। मुझसे ऊपर कोई अन्य स्वामी नहीं है। मैं अहंकार और ममता से रहित हूँ।
चतुर्थ भाग — योगाभ्यास
॥ १८ ॥
तदभ्यासेन प्राणापानौ संयम्य तत्र श्लोका भवन्ति ॥
वृषणापानयोर्मध्ये पाणी आस्थाय संश्रयेत् ।
संदश्य शनकैर्जिह्वां यवमात्रे विनिर्गताम् ॥ १८॥
अर्थ:
उस आत्माभ्यास के साथ प्राण और अपान को संयमित करने की साधना बताई गई है। इस श्लोक में प्राचीन योग-पद्धति की एक विशिष्ट शारीरिक साधना का निर्देश है। इसका उद्देश्य प्राणसंयम और चित्त की एकाग्रता है।
॥ १९ ॥
माषमात्रां तथा दृष्टिं श्रोत्रे स्थाप्य तथा भुवि ।
श्रवणे नासिके गन्धा यतः स्वं न च संश्रयेत् ॥ १९॥
अर्थ:
दृष्टि को अत्यन्त सूक्ष्म और नियंत्रित रखते हुए इन्द्रियों को बाह्य विषयों से हटाने का अभ्यास किया जाए। साधक का उद्देश्य यह है कि श्रवण, दृष्टि, घ्राण आदि इन्द्रियाँ अपने-अपने विषयों में आसक्त न रहें।
॥ २० ॥
अथ शैवपदं यत्र तद्ब्रह्म ब्रह्म तत्परम् ।
तदभ्यासेन लभ्येत पूर्वजन्मार्जितात्मनाम् ॥ २०॥
अर्थ:
जहाँ परम ब्रह्म का परम पद है, वही शिवपद है। निरन्तर उस ब्रह्म का अभ्यास करने से, जिन साधकों ने पूर्व से आत्मिक संस्कार अर्जित किए हैं, उन्हें वह अवस्था प्राप्त हो सकती है।
॥ २१ ॥
संभूतैर्वायुसंश्रावैर्हृदयं तप उच्यते
ऊर्ध्वं प्रपद्यते देहाद्भित्त्वा मूर्धानमव्ययम् ॥ २१॥
अर्थ:
प्राणवायु के संयम और साधना से हृदय में जो तप उत्पन्न होता है, उसके द्वारा साधक की चेतना ऊपर की ओर उन्मुख होती है और शरीर की सीमाओं को पार करके अविनाशी अवस्था की ओर बढ़ती है।
॥ २२ ॥
स्वदेहस्य तु मूर्धानं ये प्राप्य परमां गतिम् ।
भूयस्ते न निवर्तन्ते परावरविदो जनाः ॥ २२॥
अर्थ:
जो साधक परम गति को प्राप्त कर लेते हैं और आत्मतत्त्व को जान लेते हैं, वे फिर संसार में उसी प्रकार लौटकर नहीं आते। वे पर और अपर—दोनों तत्त्वों के ज्ञाता होते हैं।
पंचम भाग — आत्मा का असंग स्वरूप
॥ २३ ॥
न साक्षिणं साक्ष्यधर्माः संस्पृशन्ति विलक्षणम् ।
अविकारमुदासीनं गृहधर्माः प्रदीपवत् ॥ २३॥
अर्थ:
साक्षी आत्मा से दृश्य वस्तुओं के धर्म स्पर्श नहीं करते। वह उनसे भिन्न, विकाररहित और उदासीन है। जैसे दीपक घर के भीतर होने वाले कार्यों का केवल प्रकाश देता है, उनसे स्वयं प्रभावित नहीं होता, वैसे ही आत्मा साक्षी है।
॥ २४ ॥
जले वापि स्थले वापि लुठत्वेष जडात्मकः ।
नाहं विलिप्ये तद्धर्मैर्घटधर्मैर्नभो यथा ॥ २४॥
अर्थ:
यह जड़ शरीर जल में पड़े या भूमि पर, शरीर के गुण मुझे स्पर्श नहीं करते। जैसे घट टूटे, गिरे या गीला हो जाए, फिर भी आकाश उसके धर्मों से लिप्त नहीं होता, वैसे ही आत्मा शरीर के धर्मों से लिप्त नहीं होती।
षष्ठ भाग — अद्वैत आत्मज्ञान
॥ २५ ॥
निष्क्रियोऽस्म्यविकारोऽस्मि निष्कलोऽस्मि निराकृतिः ।
निर्विकल्पोऽस्मि नित्योऽस्मि निरालम्बोऽस्मि निर्द्वयः ॥ २५॥
अर्थ:
मैं कर्मों से परे हूँ, विकाररहित हूँ, अवयवरहित हूँ, किसी विशेष आकार से रहित हूँ। मैं विकल्परहित, नित्य, किसी बाहरी आधार पर निर्भर न रहने वाला और अद्वैत हूँ।
॥ २६ ॥
सर्वात्मकोऽहं सर्वोऽहं सर्वातीतोऽहमद्वयः ।
केवलाखण्डबोधोऽहं स्वानन्दोऽहं निरन्तरः ॥ २६॥
अर्थ:
मैं सबका आत्मस्वरूप हूँ; मैं सबमें व्याप्त हूँ; फिर भी सब सीमाओं से परे हूँ। मैं अद्वैत हूँ। मैं केवल अखण्ड ज्ञानस्वरूप और निरन्तर अपने ही स्वरूप का आनन्द हूँ।
॥ २७ ॥
स्वमेव सर्वतः पश्यन्मन्यमानः स्वमद्वयम् ।
स्वानन्दमनुभुञ्जानो निर्विकल्पो भवाम्यहम् ॥ २७॥
अर्थ:
जब साधक चारों ओर अपने ही आत्मस्वरूप को देखता है और स्वयं को अद्वैत मानता है, तब वह अपने आत्मानन्द का अनुभव करता हुआ विकल्पों से रहित हो जाता है।
॥ २८ ॥
गच्छंस्तिष्ठन्नुपविशञ्छयानो वान्यथापि वा ।
यथेच्छया वसेद्विद्वानात्मारामः सदा मुनिः ॥ २८॥
अर्थ:
चलते हुए, खड़े हुए, बैठे हुए, सोते हुए अथवा किसी भी अवस्था में—ज्ञानी मुनि अपनी इच्छानुसार रहे। वह सदैव आत्मा में ही रमण करने वाला, आत्मतृप्त और भीतर से स्वतंत्र रहता है। �
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॥ उपसंहार ॥
ॐ आप्यायन्तु ममाङ्गानि वाक्प्राणश्चक्षुः
श्रोत्रमथो बलमिन्द्रियाणि च ॥
सर्वाणि सर्वं ब्रह्मोपनिषदं माहं ब्रह्म निराकुर्यां मा मा ब्रह्म निराकरोदनिराकरणमस्त्वनिराकरणं मेऽस्तु तदात्मनि निरते य उपनिषत्सु धर्मास्ते मयि
सन्तु ते मयि सन्तु ॥
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
हरिः ॐ तत्सत् ॥
इति कुण्डिकोपनिषत्समाप्ता
संक्षिप्त सार
कुण्डिकोपनिषद् का मूल संदेश तीन स्तरों में समझा जा सकता है—
बाहरी संन्यास से अधिक महत्त्व आन्तरिक वैराग्य का है।
शरीर, इन्द्रिय, जाग्रत-स्वप्न-सुषुप्ति आदि आत्मा नहीं हैं; आत्मा उनका साक्षी है।
अन्तिम अनुभूति अद्वैत आत्मज्ञान की है—“निष्क्रियोऽस्म्यविकारोऽस्मि… निर्द्वयः”, अर्थात् आत्मा नित्य, विकाररहित और अद्वैत है।
उपलब्ध पाठ-स्रोत इसे सामवेद की संन्यास-उपनिषद् के रूप में सूचीबद्ध करते हैं; संस्कृत पाठ का यह संस्करण 28वें श्लोक पर समाप्त होता है।
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