(81) मुक्तिकोपनिषद

मुक्तिकोपनिषद--
 नीचे मुक्तिकोपनिषद् का पूरा उपलब्ध संस्कृत पाठ क्रम से दिया जा रहा है और प्रत्येक मंत्र/श्लोक के बाद सरल हिन्दी अर्थ है। मैंने पाठ को संस्कृत मूल के अनुसार रखा है; यह पाठ शुक्ल यजुर्वेद से सम्बद्ध सामान्य उपनिषद् के रूप में संकलित है।
॥ मुक्तिकोपनिषत् ॥
मंगलाचरण
ईशाद्यष्टोत्तरशतवेदान्तपटलाशयम् ।
मुक्तिकोपनिषद्वेद्यं रामचन्द्रपदं भजे ॥
अर्थ:
ईशावास्य आदि १०८ उपनिषदों में निहित वेदान्त के सारस्वरूप तथा मुक्तिकोपनिषद् द्वारा प्रतिपादित भगवान् श्रीराम के परम पद का मैं भजन करता हूँ।
शान्तिपाठ
हरिः ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते ।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ॥
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
अर्थ:
वह परम ब्रह्म पूर्ण है और यह जगत भी उसी पूर्ण ब्रह्म से प्रकट हुआ है। पूर्ण से पूर्ण की अभिव्यक्ति होने पर भी वह पूर्ण ही रहता है। तीनों प्रकार के तापों से शान्ति हो।
प्रथम अध्याय
श्रीराम–हनुमान संवाद
१--ॐ अयोध्यानगरे रम्ये रत्नमण्डपमध्यमे ।
सीताभरतसौमित्रिशत्रुघ्नाद्यैः समन्वितम् ॥ १॥
अर्थ:
सुन्दर अयोध्या नगरी में रत्नों से बने मण्डप के मध्य श्रीराम सीता, भरत, लक्ष्मण, शत्रुघ्न आदि के साथ विराजमान थे।
२--सनकाद्यैर्मुनिगणैर्वसिष्ठाद्यैः शुकादिभिः ।
अन्यैर्भागवतैश्चापि स्तूयमानमहर्निशम् ॥ २॥
अर्थ:
सनक आदि मुनि, वसिष्ठ आदि ऋषि, शुकदेव आदि तथा अन्य भक्त दिन-रात श्रीराम की स्तुति करते थे।
३--धीविक्रियासहस्राणां साक्षिणं निर्विकारिणम् ।
स्वरूपध्याननिरतं समाधिविरमे हरिम् ॥ ३॥
अर्थ:
श्रीराम बुद्धि में होने वाले असंख्य परिवर्तनों के साक्षी और स्वयं निर्विकार हैं। वे अपने वास्तविक स्वरूप के ध्यान में स्थित हैं।
४--भक्त्या शुश्रूषया रामं स्तुवन्पप्रच्छ मारुतिः ।
राम त्वं परमात्मसि सच्चिदानन्दविग्रहः ॥ ४॥
अर्थ:
भक्ति और सेवा से श्रीराम की स्तुति करते हुए हनुमान ने पूछा—हे राम! आप परमात्मा हैं और आपका स्वरूप सत्-चित्-आनन्द है।
५--इदानीं त्वां रघुश्रेष्ठ प्रणमामि मुहुर्मुहुः ।
त्वद्रूपं ज्ञातुमिच्छामि तत्त्वतो राम मुक्तये ॥ ५॥
अर्थ:
हे रघुश्रेष्ठ! मैं आपको बार-बार प्रणाम करता हूँ। मोक्ष प्राप्त करने के लिए आपके वास्तविक स्वरूप को तत्त्वतः जानना चाहता हूँ।
६--अनायासेन येनाहं मुच्येयं भवबन्धनात् ।
कृपया वद मे राम येन मुक्तो भवाम्यहम् ॥ ६॥
अर्थ:
हे राम! कृपा करके वह उपाय बताइए जिससे मैं संसार के बन्धन से मुक्त हो सकूँ।
७--साधु पृष्टं महाबाहो वदामि शृणु तत्त्वतः ।
वेदान्ते सुप्रतिष्ठोऽहं वेदान्तं समुपाश्रय ॥ ७॥
अर्थ:
हे महाबाहु! तुमने बहुत अच्छा प्रश्न किया है। मैं तत्त्वतः बताता हूँ—वेदान्त में मेरा दृढ़ आश्रय है; इसलिए वेदान्त का आश्रय लो।
८--वेदान्ताः के रघुश्रेष्ठ वर्तन्ते कुत्र ते वद ।
हनूमञ्छृणु वक्ष्यामि वेदान्तस्थितिमञ्जसा ॥ ८॥
अर्थ:
हनुमान पूछते हैं—हे रघुश्रेष्ठ! वेदान्त कौन-कौन से हैं और वे कहाँ स्थित हैं? श्रीराम कहते हैं—हे हनुमान! सुनो, मैं तुम्हें वेदान्त की स्थिति बताता हूँ।
९--निश्वासभूता मे विष्णोर्वेदा जाताः सुविस्तराः ।
तिलेषु तैलवद्वेदे वेदान्तः सुप्रतिष्ठितः ॥ ९॥
अर्थ:
वेद मेरे निश्वास के समान प्रकट हुए हैं और अत्यन्त विस्तृत हैं। जैसे तिल में तेल छिपा रहता है, वैसे ही वेदों में वेदान्त का तत्त्व प्रतिष्ठित है।
१०--राम वेदाः कतिविधास्तेषां शाखाश्च राघव ।
तासूपनिषदाः काः स्युः कृपया वद तत्त्वतः ॥ १०॥
अर्थ:
हनुमान पूछते हैं—हे राम! वेद कितने प्रकार के हैं? उनकी कितनी शाखाएँ हैं और उन शाखाओं में कौन-कौन से उपनिषद् हैं? कृपा करके बताइए।
११--श्रीराम उवाच ।
ऋग्वेदादिविभागेन वेदाश्चत्वार ईरिताः ।
तेषां शाखा ह्यनेकाः स्युस्तासूपनिषदस्तथा ॥ ११॥
अर्थ:
श्रीराम बोले—ऋग्वेद आदि के विभाग से वेद चार हैं। उनकी अनेक शाखाएँ हैं और उन शाखाओं में उपनिषद् हैं।
१२--ऋग्वेदस्य तु शाखाः स्युरेकविंशतिसङ्ख्यकाः ।
नवाधिकशतं शाखा यजुषो मारुतात्मज ॥ १२॥
अर्थ:
हे हनुमान! ऋग्वेद की २१ शाखाएँ और यजुर्वेद की १०९ शाखाएँ कही गई हैं।
१३--सहस्रसङ्ख्यया जाताः शाखाः साम्नः परन्तप ।
अथर्वणस्य शाखाः स्युः पञ्चाशद्भेदतो हरे ॥ १३॥
अर्थ:
हे परन्तप! सामवेद की १००० शाखाएँ और अथर्ववेद की ५० शाखाएँ कही गई हैं।
१४--एकैकस्यास्तु शाखाया एकैकोपनिषन्मता ।
तासामेकामृचं यश्च पठते भक्तितो मयि ॥ १४॥
अर्थ:
प्रत्येक शाखा में एक उपनिषद् माना गया है। जो व्यक्ति उनमें से किसी एक के एक मंत्र का भी मेरी भक्ति से पाठ करता है—
१५--स मत्सायुज्यपदवीं प्राप्नोति मुनिदुर्लभाम् ।
राम केचिन्मुनिश्रेष्ठा मुक्तिरेकेति चक्षिरे ॥ १५॥
अर्थ:
वह मुनियों के लिए भी दुर्लभ मेरे सायुज्य पद को प्राप्त करता है। हनुमान कहते हैं—हे राम! कुछ श्रेष्ठ मुनि मुक्ति को केवल एक ही मानते हैं।
१६--केचित्त्वन्नामभजनात्काश्यां तारोपदेशतः ।
अन्येतु साङ्ख्ययोगेन भक्तियोगेन चापरे ॥ १६॥
अर्थ:
कुछ मुनि आपके नाम के भजन से, कुछ काशी में तारक-मन्त्र के उपदेश से, कुछ सांख्ययोग से और कुछ भक्तियोग से मुक्ति मानते हैं।
१७--अन्ये   वेदान्तवाक्यार्थविचारात्परमर्षयः
सालोक्यादिविभागेन चतुर्धा मुक्तिरीरिता ॥ १७॥
अर्थ:
अन्य श्रेष्ठ ऋषि वेदान्त-वाक्यों के अर्थ के विचार से मुक्ति बताते हैं। उपासना की दृष्टि से मुक्ति को सालोक्य आदि चार प्रकार की भी कहा गया है।
१८--सहोवाच श्रीरामः ।
कैवल्यमुक्तिरेकैव परमार्थिकरूपिणी ।
दुराचाररतो वापि मन्नामभजनात्कपे ॥ १८॥
अर्थ:
श्रीराम बोले—हे कपि! परमार्थ की दृष्टि से कैवल्यमुक्ति ही वास्तविक मुक्ति है। मेरे नाम का भजन करने वाला भी उससे सम्बन्धित मुक्ति प्राप्त कर सकता है।
१९--सालोक्यमुक्तिमाप्नोति न तु लोकान्तरादिकम् ।
काश्यां तु ब्रह्मनालेऽस्मिन्मृतो मत्तारमाप्नुयात् ॥ १९॥
अर्थ:
नामभजन से सालोक्य मुक्ति कही गई है। काशी में देह त्याग करने वाले को तारक-मन्त्र द्वारा मुक्ति प्राप्त होने की परम्परा बताई गई है।
२०--पुनरावृत्तिरहितां मुक्तिं प्राप्नोति मानवः ।
यत्र कुत्रापि वा काश्यां मरणे स महेश्वरः ॥ २०॥
अर्थ:
मनुष्य ऐसी मुक्ति प्राप्त कर सकता है जिसमें पुनर्जन्म नहीं होता। काशी में मृत्यु को भी इस दृष्टि से विशेष माना गया है।
२१--जन्तोर्दक्षिणकर्णे तु मत्तारं समुपादिशेत् ।
निर्धूताशेषपापौघो मत्सारूप्यं भजत्ययम् ॥ २१॥
अर्थ:
प्राणी के दाहिने कान में तारक-मन्त्र का उपदेश किया जाए तो उसके पापों का नाश होकर वह मेरे स्वरूप की समानता प्राप्त करता है।
२२--सैव सालोक्यसारूप्यमुक्तिरत्यभिधीयते । सदाचाररतो भूत्वा द्विजो नित्यमनन्यधीः ॥ २२॥
अर्थ:
इसे सालोक्य और सारूप्य से सम्बन्धित मुक्ति कहा गया है। जो द्विज सदाचार में लगा हुआ और एकाग्रचित्त रहता है—
२३--मयि सर्वात्मको भावो मत्सामीप्यं भजत्ययम् ।
सैव सालोक्यसारूप्यसामीप्या मुक्तिरिष्यते ॥ २३॥
अर्थ:
और मुझमें सभी आत्माओं का भाव देखता है, वह मेरी समीपता प्राप्त करता है। इसे सालोक्य, सारूप्य और सामीप्य से युक्त मुक्ति कहा गया है।
२४--गुरूपदिष्टमार्गेण ध्यायन्मद्गुणमव्ययम् ।
मत्सायुज्यं द्विजः सम्यग्भजेद्भ्रमरकीटवत् ॥ २४॥
अर्थ:
गुरु द्वारा बताए मार्ग से मेरे अविनाशी गुणों का ध्यान करने वाला व्यक्ति, भ्रमर-क्रीट न्याय के समान, मेरे सायुज्य को प्राप्त करता है।
२५--सैव सायुज्यमुक्तिः स्याद्ब्रह्मानन्दकरी शिवा ।
चतुर्विधा तु या मुक्तिर्मदुपासनया भवेत् ॥ २५॥
अर्थ:
वह सायुज्य मुक्ति है, जो ब्रह्मानन्द प्रदान करती है। मेरी उपासना से बताई गई ये चार प्रकार की मुक्तियाँ हैं।
२६--इयं कैवल्यमुक्तिस्तु केनोपायेन सिद्ध्यति ।
माण्डूक्यमेकमेवालं मुमुक्षूणां विमुक्तये ॥ २६॥
अर्थ:
अब प्रश्न है कि कैवल्यमुक्ति किस उपाय से प्राप्त हो? मुमुक्षुओं के लिए माण्डूक्योपनिषद् अकेला ही पर्याप्त है।
२७--तथाप्यसिद्धं चेज्ज्ञानं दशोपनिषदं पठ ।
ज्ञानं लब्ध्वा चिरादेव मामकं धाम यास्यसि ॥ २७॥
अर्थ:
यदि उससे ज्ञान सिद्ध न हो तो दस प्रमुख उपनिषदों का अध्ययन करो। ज्ञान प्राप्त होने पर शीघ्र ही मेरे परम धाम को प्राप्त होगे।
२८--तथापि दृढता न चेद्विद्ज्ञानस्याञ्जनासुत ।
द्वात्रिंशाख्योपनिषदं समभ्यस्य निवर्तय ॥ २८॥
अर्थ:
हे अञ्जना-पुत्र! यदि ज्ञान अभी दृढ़ न हुआ हो तो ३२ उपनिषदों का अभ्यास करो।
२९--विदेहमुक्ताविच्छा चेदष्टोत्तरशतं पठ ।
तासां क्रम सशान्तिं च श्रुणु वक्ष्यामि तत्त्वतः ॥ २९॥
अर्थ:
यदि विदेहमुक्ति की इच्छा हो तो १०८ उपनिषदों का अध्ययन करो। अब मैं उनके क्रम और उनके शान्ति-मन्त्रों सहित विवरण बताता हूँ।
३०–३९ : १०८ उपनिषदों की सूची
ईशकेनकठप्रश्नमुण्डमाण्डूक्यतित्तिरिः ।
ऐतरेयं च छान्दोग्यं बृहदारण्यकं तथा ॥ ३०॥
अर्थ:
ईश, केन, कठ, प्रश्न, मुण्डक, माण्डूक्य, तैत्तिरीय, ऐतरेय, छान्दोग्य और बृहदारण्यक।
ब्रह्मकैवल्यजाबालश्वेताश्वो हंस आरुणिः ।
गर्भो नारायणो हंसो बिन्दुर्नादशिरः शिखा ॥ ३१॥
अर्थ:
ब्रह्म, कैवल्य, जाबाल, श्वेताश्वतर, हंस, आरुणि, गर्भ, नारायण, हंस, बिन्दु, नाद, शिरः और शिखा आदि उपनिषद्।
मैत्रायणी कौषीतकी बृहज्जाबालतापनी ।
कालाग्निरुद्रमैत्रेयी सुबालक्षुरिमन्त्रिका ॥ ३२॥
अर्थ:
मैत्रायणी, कौषीतकी, बृहज्जाबाल, तापनी, कालाग्निरुद्र, मैत्रेयी, सुबाल, क्षुरिका और मन्त्रिका आदि।
सर्वसारं निरालम्बं रहस्यं वज्रसूचिकम् ।
तेजोनादध्यानविद्यायोगतत्त्वात्मबोधकम् ॥ ३३॥
अर्थ:
सर्वसार, निरालम्ब, रहस्य, वज्रसूचिका, तेजोबिन्दु, नादबिन्दु, ध्यानबिन्दु, विद्या, योगतत्त्व और आत्मबोध आदि।
परिव्राट् त्रिशिखी सीता चूडा निर्वाणमण्डलम् ।
दक्षिणा शरभं स्कन्दं महानारायणाह्वयम् ॥ ३४॥
अर्थ:
परिव्राट्, त्रिशिखी, सीता, चूड़ामणि, निर्वाण, मण्डल, दक्षिणा, शरभ, स्कन्द और महानारायण आदि।
रहस्यं रामतपनं वासुदेवं च मुद्गलम् ।
शाण्डिल्यं पैङ्गलं भिक्षुमहच्छारीरकं शिखा ॥ ३५॥
अर्थ:
रहस्य, रामतापनी, वासुदेव, मुद्गल, शाण्डिल्य, पैङ्गल, भिक्षु, महच्छारीरक और शिखा आदि।
तुरीयातीतसंन्यासपरिव्राजाक्षमालिका ।
अव्यक्तैकाक्षरं पूर्णा सूर्याक्ष्यध्यात्मकुण्डिका ॥ ३६॥
अर्थ:
तुरीयातीत, संन्यास, परिव्राजक, अक्षमालिका, अव्यक्त, एकाक्षर, पूर्ण, सूर्य, अक्षि और अध्यात्म-कुण्डिका आदि।
सावित्र्यात्मा पाशुपतं परं ब्रह्मावधूतकम् ।
त्रिपुरातपनं देवीत्रिपुरा कठभावना ।
हृदयं कुण्डली भस्म रुद्राक्षगणदर्शनम् ॥ ३७॥
अर्थ:
सावित्री, आत्मा, पाशुपत, परब्रह्म, अवधूत, त्रिपुरातापिनी, देवी, त्रिपुरा, कठभावना, हृदय, कुण्डली, भस्म, रुद्राक्ष और गणदर्शन आदि।
तारसारमहावाक्य पञ्चब्रह्माग्निहोत्रकम् ।
गोपालतपनं कृष्णं याज्ञवल्क्यं वराहकम् ॥ ३८॥
अर्थ:
तारसार, महावाक्य, पञ्चब्रह्म, अग्निहोत्र, गोपालतापनी, कृष्ण, याज्ञवल्क्य और वराह आदि।
शाट्यायनी हयग्रीवं दत्तात्रेयं च गारुडम् ।
कलिजाबाबलिसौभाग्यरहस्यऋचमुक्तिका ॥ ३९॥
अर्थ:
शाट्यायनी, हयग्रीव, दत्तात्रेय, गारुड, कलिजाबालि, सौभाग्य, रहस्य, ऋच और मुक्तिका आदि—इस प्रकार १०८ उपनिषदों की सूची पूर्ण होती है।
नोट: विभिन्न पाठ-संस्करणों में कुछ नामों की वर्तनी/क्रम में छोटे पाठभेद मिलते हैं।
४०--एवमष्टोत्तरशतं भावनात्रयनाशनम् ।
ज्ञानवैराग्यदं पुंसां वासनात्रयनाशनम् ॥ ४०॥
अर्थ:
ये १०८ उपनिषद् तीन प्रकार की भावनाओं/बन्धनों का नाश करने वाले, मनुष्य को ज्ञान और वैराग्य देने वाले तथा तीन प्रकार की वासनाओं का क्षय करने वाले बताए गए हैं।
४१--पूर्वोत्तरेषु विहिततत्तच्छान्तिपुरःसरम् ।
वेदविद्याव्रतस्नातदेशिकस्य मुखात्स्वयम् ॥ ४१॥
अर्थ:
इनका अध्ययन उचित शान्ति-मन्त्रों के साथ, वेदविद्या में निपुण और विधिवत् शिक्षित आचार्य के मुख से करना चाहिए।
४२--गृहीत्वाष्टोत्तरशतं ये पठन्ति द्विजोत्तमाः ।
प्रारब्धक्षयपर्यन्तं जीवन्मुक्ता भवन्ति ते ॥ ४२॥
अर्थ:
जो श्रेष्ठ साधक १०८ उपनिषदों का अध्ययन करते हैं, वे प्रारब्ध कर्म के समाप्त होने तक जीवन्मुक्त रहते हैं।
४३--ततः कालवशादेव प्रारब्धे तु क्षयं गते ।
वैदेहीं मामकीं मुक्तिं यान्ति नास्त्यत्रसंशयः ॥ ४३॥
अर्थ:
जब समय के अनुसार प्रारब्ध कर्म समाप्त हो जाता है, तब वे मेरी विदेहमुक्ति को प्राप्त होते हैं—इसमें कोई संशय नहीं।
४४--सर्वोपनिषदां मध्ये सारमष्टोत्तरशतम् ।
सकृच्छ्रवणमात्रेण सर्वाघौघनिकृन्तनम् ॥ ४४॥
अर्थ:
सभी उपनिषदों में १०८ उपनिषदों को साररूप कहा गया है। इनके श्रवण मात्र से पापों के समूह का नाश होने की महिमा कही गई है।
४५--मयोपदिष्टं शिष्याय तुभ्यं पवननन्दन ।
इदं शास्त्रं मयादिष्टं गुह्यमष्टोत्तरं शतम् ॥ ४५॥
अर्थ:
हे पवननन्दन! मैंने तुम्हें यह १०८ उपनिषदों का गुप्त शास्त्र शिष्य के रूप में बताया है।
४६--ज्ञानतोऽज्ञानतो वापि पठतां बन्धमोचकम् ।
राज्यं देयं धनं देयं याचतः कामपूरणम् ॥ ४६॥
अर्थ:
ज्ञानपूर्वक अथवा अज्ञानवश भी इसका पाठ करने वाले के लिए यह बन्धन-मोचक कहा गया है। पाठ में आगे राज्य, धन और इच्छापूर्ति आदि के फल भी वर्णित हैं।
४७--इदमष्टोत्तरशतं न देयं यस्य कस्यचित् ।
नास्तिकाय कृतघ्नाय दुराचाररताय वै ॥ ४७॥
अर्थ:
इस १०८ उपनिषदों के ज्ञान को किसी भी व्यक्ति को बिना विचार के नहीं देना चाहिए—विशेषतः नास्तिक, कृतघ्न और दुराचार में लगे व्यक्ति को नहीं।
४८--मद्भक्तिविमुखायापि शास्त्रगर्तेषु मुह्यते ।
गुरुभक्तिविहीनाय दातव्यं न कदाचन ॥ ४८॥
अर्थ:
जो मेरी भक्ति से विमुख होकर केवल शास्त्रों में उलझा रहता है और जिसमें गुरु के प्रति श्रद्धा नहीं है, उसे यह ज्ञान नहीं देना चाहिए।
४९--सेवापराय शिष्याय हितपुत्राय मारुते ।
मद्भक्ताय सुशीलाय कुलीनाय सुमेधसे ॥ ४९॥
अर्थ:
हे हनुमान! यह ज्ञान ऐसे शिष्य को देना चाहिए जो सेवा में तत्पर, हितकारी, भक्त, सुशील और बुद्धिमान हो।
५०--सम्यक् परीक्ष्य दातव्यमेवमष्टोत्तरं शतम् ।
यः पठेच्छृणुयाद्वापि स मामेति न संशयः ।
अर्थ:
अतः शिष्य की उचित परीक्षा करके ही १०८ उपनिषदों का ज्ञान देना चाहिए। जो इसका पाठ या श्रवण करता है, वह मुझे प्राप्त होता है—इसमें संशय नहीं।
इसके बाद उपनिषद् में विद्या की रक्षा और योग्य शिष्य को ही ज्ञान देने का वैदिक ऋचा द्वारा निर्देश आता है। 
प्रथम अध्याय का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष--
मुमुक्षवः पुरुषाः साधनचतुष्टयसम्पन्नाः
श्रद्धावन्तः ...
अष्टोत्तरशतोपनिषदं विधिवदधीत्य
श्रवणमनननिदिध्यासनानि नैरन्तर्येण कृत्वा
प्रारब्धक्षयाद्देहत्रयभंगं प्राप्योपाधिविनिर्मुक्त-
घटाकाशवत्परिपूर्णता विदेहमुक्तिः ।
सैव कैवल्यमुक्तिरिति ।
सरल अर्थ:
जो साधक आवश्यक साधन-सम्पत्ति से सम्पन्न होकर श्रद्धापूर्वक सद्गुरु के पास जाता है, १०८ उपनिषदों का विधिपूर्वक अध्ययन करता है तथा श्रवण, मनन और निदिध्यासन निरन्तर करता है, उसके प्रारब्ध के क्षय पर देह-त्रय का सम्बन्ध समाप्त होता है। उपाधियों से मुक्त होकर वह घटाकाश की तरह अपने पूर्ण स्वरूप को प्राप्त करता है। यही विदेहमुक्ति और कैवल्यमुक्ति है।
आगे स्पष्ट कहा गया है—
अतः सर्वेषां कैवल्यमुक्तिर्ज्ञानमात्रेणोक्ता ।
न कर्मसांख्ययोगोपासनादिभिरित्युपनिषत् ॥
अर्थ:
कैवल्यमुक्ति का अन्तिम आधार ज्ञान बताया गया है। 
इति प्रथमोऽध्यायः ॥ १॥
द्वितीय अध्याय — जीवन्मुक्ति और मनोनाश
अब मुक्तिकोपनिषद् का दूसरा अध्याय आपके पहले प्रश्न से सीधे जुड़ता है।
आरम्भ
तथा हैनं श्रीरामचन्द्रं मारुतिः पप्रच्छ ।
केयं वा तत्सिद्धिः सिद्ध्या वा किं प्रयोजनमिति ।
अर्थ:
हनुमान ने श्रीराम से पूछा—वह सिद्धि क्या है और उस सिद्धि का प्रयोजन क्या है?
श्रीराम कहते हैं—
पुरुषस्य कर्तृत्वभोक्तृत्वसुखदुःखादिलक्षणश्चित्तधर्मः
क्लेशरूपत्वाद्बन्धो भवति ।
तन्निरोधनं जीवन्मुक्तिः ।
उपाधिविनिर्मुक्तघटाकाशवत्प्रारब्धक्षयाद्विदेहमुक्तिः ॥
अर्थ:
मन में “मैं कर्ता हूँ”, “मैं भोक्ता हूँ”, “मुझे सुख मिला”, “मुझे दुःख हुआ”—इस प्रकार की वृत्तियाँ बन्धन का कारण हैं। उनका निरोध जीवन्मुक्ति है। प्रारब्ध कर्म के समाप्त होने पर उपाधियों से मुक्त होना, घटाकाश के महाकाश में विलीन होने के समान, विदेहमुक्ति है।
जीवन्मुक्तिविदेहमुक्त्योरष्टोत्तरशतोपनिषदः प्रमाणम् ।
कर्तृत्वादिदुःखनिवृत्तिद्वारा नित्यानन्दावाप्तिः प्रयोजनं भवति 
तत्पुरुषप्रयत्नसाध्यं भवति ।
अर्थ:
जीवन्मुक्ति और विदेहमुक्ति के लिए १०८ उपनिषदों को प्रमाण बताया गया है। कर्तापन आदि से उत्पन्न दुःख की निवृत्ति और नित्य आनन्द की प्राप्ति इसका प्रयोजन है। यह पुरुषार्थ और साधना से प्राप्त होने वाली अवस्था है। 
द्वितीय अध्याय के श्लोक
१--उच्छास्त्रं शास्त्रितं चेति पौरुषं द्विविधं मतम् ।
अत्रोच्छस्त्रमनर्थाय परमार्थाय शास्त्रितम् ॥ १॥
अर्थ:
पुरुषार्थ दो प्रकार का है—शास्त्र-विरुद्ध और शास्त्रानुकूल। शास्त्र-विरुद्ध पुरुषार्थ अनर्थ का कारण है, जबकि शास्त्रानुकूल पुरुषार्थ परमार्थ की ओर ले जाता है।
२--लोकवासनया जन्तोः शास्त्रवासनयापि च ।
देहवासनया ज्ञानं यथावन्नैव जायते ॥ २॥
अर्थ:
लोक-प्रतिष्ठा की इच्छा, केवल शास्त्रों में उलझे रहने की प्रवृत्ति और देह के प्रति अत्यधिक आसक्ति—इनसे यथार्थ ज्ञान उत्पन्न नहीं होता।
३--द्विविधा वासनाव्यूहः शुभश्चैवाशुभश्च तौ ।
वासनौघेन शुद्धेन तत्र चेदनुनीयसे ॥ ३॥
अर्थ:
वासनाएँ दो प्रकार की हैं—शुभ और अशुभ। यदि मनुष्य शुद्ध अर्थात् शुभ वासनाओं के मार्ग पर चलता है—
४--तत्क्रमेणाशु तेनैव मामकं पदमाप्नुहि ।
अथ चेदशुभो भावस्त्वां योजयति संकटे ॥ ४॥
अर्थ:
तो उसी मार्ग से शीघ्र मेरे पद को प्राप्त कर सकता है। लेकिन यदि अशुभ प्रवृत्तियाँ संकट में डालें—
५--प्राक्तनस्तदसौ यत्नाज्जेतव्यो भवता कपे ।
शुभाशुभाभ्यां मार्गाभ्यां वहन्ती वासनासरित् ॥ ५॥
अर्थ:
हे कपि! पूर्व संस्कारों से उत्पन्न उन अशुभ प्रवृत्तियों को प्रयत्नपूर्वक जीतना चाहिए। वासनाओं की धारा शुभ और अशुभ दोनों मार्गों में बहती है।
६--पौरुषेण प्रयत्नेन योजनीया शुभे पथि ।
अशुभेषु समाविष्टं शुभेष्वेवावतारयेत् ॥ ६॥
अर्थ:
प्रयत्न द्वारा मन को शुभ मार्ग पर लगाना चाहिए। जब वह अशुभ में चला जाए, तब उसे फिर शुभ मार्ग पर लाना चाहिए।
७--अशुभाच्चालितं याति शुभं तस्मादपीतरत् ।
पौरुषेण प्रयत्नेन लालयेच्चित्तबालकम् ॥ ७॥
अर्थ:
मन अशुभ से शुभ और शुभ से फिर दूसरी ओर जा सकता है। इसलिए चंचल बालक की तरह मन को धैर्यपूर्वक साधना चाहिए।
८--द्रागभ्यासवशाद्याति यदा ते वासनोदयम् ।
तदाभ्यासस्य साफल्यं विद्धि त्वममरिमर्दन ॥ ८॥
अर्थ:
जब अभ्यास के कारण शुभ वासनाएँ सहज रूप से उठने लगें, तब समझना चाहिए कि अभ्यास सफल हो रहा है।
९--सन्दिग्धायामपि भृशं शुभामेव समाचर ।
शुभायां वासनावृद्धौ न दोषाय मरुत्सुत ॥ ९॥
अर्थ:
सन्देह की स्थिति में भी शुभ आचरण ही करो। शुभ वासनाओं की वृद्धि कोई दोष नहीं है।
१०--वासनाक्षयविज्ञानमनोनाशा महामते ।
समकालं चिराभ्यस्ता भवन्ति फलदा मताः ॥ १०॥
अर्थ:
वासनाक्षय, आत्मज्ञान और मनोनाश—इन तीनों का दीर्घकाल तक साथ-साथ अभ्यास करने पर फल मिलता है।
११--त्रय एवं समं यावन्नाभ्यस्ताश्च पुनः पुनः ।
तावन्न पदसम्प्राप्तिर्भवत्यपि समाशतैः ॥ ११॥
अर्थ:
जब तक इन तीनों का बार-बार समान रूप से अभ्यास नहीं किया जाता, तब तक परम पद की प्राप्ति कठिन है।
१२--एकैकशो निषेव्यन्ते यद्येते चिरमप्यलम् ।
तन्न सिद्धिं प्रयच्छन्ति मन्त्राः संकीर्तिता इव ॥ १२॥
अर्थ:
यदि इनका अलग-अलग बहुत समय तक अभ्यास किया जाए, तब भी पूर्ण सिद्धि नहीं होती—जैसे केवल मन्त्रों का अलग-अलग उच्चारण पर्याप्त नहीं।
१३--त्रिभिरेतैश्चिराभ्यस्तैर्हृदय ग्रन्थयो दृढाः ।
निःशङ्कमेव त्रुठ्यन्ति बिसच्छेदाद्गुणा इव ॥ १३॥
अर्थ:
इन तीनों—वासनाक्षय, ज्ञान और मनोनाश—के दीर्घ अभ्यास से हृदय की दृढ़ गाँठें उसी प्रकार टूट जाती हैं जैसे कमलनाल के तन्तु कट जाते हैं।
१४--जन्मान्तशताभ्यस्ता मिथ्या संसारवासना ।
सा चिराभ्यासयोगेन विना न क्षीयते क्वचित् ॥ १४॥
अर्थ:
असंख्य जन्मों से बनी संसार की मिथ्या वासनाएँ दीर्घकालीन अभ्यास के बिना समाप्त नहीं होतीं।
१५--तस्मात्सौम्य प्रयत्नेन पौरुषेण विवेकिना ।
भोगेच्छां दूरतस्त्यक्त्वा त्रयमेव समाश्रय ॥ १५॥
अर्थ:
इसलिए विवेकपूर्वक पुरुषार्थ करते हुए भोगों की आसक्ति छोड़कर इन तीनों साधनों का आश्रय लो।
१६--तस्माद्वासनया युक्तं मनो बद्धं विदुर्बुधाः ।
सम्यग्वासनया त्यक्तं मुक्तमित्यभिधीयते ।
मनोनिर्वासनीभावमाचराशु महाकपे ॥ १६॥
अर्थ:
ज्ञानी कहते हैं कि वासनाओं से बँधा मन ही बन्धन है और वासनाओं से मुक्त मन ही मुक्ति है। इसलिए हे महाकपि! मन को वासनारहित बनाने का अभ्यास करो।
१७--सम्यगालोचनात्सत्याद्वासना प्रविलीयते ।
वासनाविलये चेतः शममायाति दीपवत् ॥ १७॥
अर्थ:
सत्य का ठीक प्रकार से विचार करने पर वासनाएँ विलीन होती हैं। वासनाओं के समाप्त होने पर मन दीपक की लौ के समान शान्त हो जाता है।
१८--वासनां सम्परित्यज्य मयि चिन्मात्र विग्रहे ।
यस्तिष्ठति गतो व्यग्रः सोऽहं सच्चित्सुखात्मकः ॥ १८॥
अर्थ:
जो व्यक्ति वासनाओं को छोड़कर मुझे शुद्ध चैतन्यस्वरूप जानकर स्थित रहता है और जिसकी व्यग्रता समाप्त हो गई है, वह सत्-चित्-सुखस्वरूप हो जाता है।
१९--समाधिमथ कार्याणि मा करोतु करोतु वा ।
हृदयेनात्तसर्वेहो मुक्त एवोत्तमाशयः ॥ १९॥
अर्थ:
वह समाधि में रहे या अपने कार्य करता रहे—यदि उसके हृदय की सभी आसक्तियाँ समाप्त हो गई हैं, तो वह मुक्त है।
२०--नैष्कर्म्येण न तस्यार्थस्तस्यार्थोऽस्ति न कर्मभिः 
न ससाधनजाप्याभ्यां यस्य निर्वासनं मनः ॥ २०॥
अर्थ:
जिसका मन वासनारहित हो गया है, उसके लिए केवल कर्मत्याग या कर्म करना ही साध्य नहीं है; उसके लिए बाहरी जप-साधन भी अंतिम लक्ष्य नहीं हैं।
२१--संत्यक्तवासनान्मौनादृते नास्त्युत्तमं पदम् ॥ २१॥
अर्थ:
वासनाओं का पूर्ण त्याग करके प्राप्त होने वाली आन्तरिक मौन-अवस्था से श्रेष्ठ कोई पद नहीं है।
२२--
वासनाहीनमप्येतच्चक्षुरादीन्द्रियं स्वतः ।
प्रवर्तते बहिः स्वाऽर्थे वासनामात्रकारणम् ॥ २२॥
अर्थ:
ज्ञानी का मन वासनारहित हो जाने पर भी आँख आदि इन्द्रियाँ अपने-अपने विषयों में स्वाभाविक रूप से कार्य करती रहती हैं।
२३--
अयत्नोपनतेष्वक्षि दृग्द्रव्येषु यथा पुनः ।
नीरागमेव पतति तद्वत्कार्येषु धीरधीः ॥ २३॥
अर्थ:
जैसे आँख सामने आए हुए दृश्य को बिना विशेष प्रयास के देखती है, वैसे ही स्थिर बुद्धि वाला ज्ञानी आसक्ति के बिना अपने कार्य करता है।
२४--भावसंवित्प्रकटितामनुरूपा च मारुते ।
चित्तस्योत्पत्युपरमा वासनां मुनयो विदुः ॥ २४॥
अर्थ:
हे हनुमान! मुनि कहते हैं कि जिस प्रकार की वासना होती है, उसी के अनुरूप चित्त की प्रवृत्ति और निवृत्ति होती है।
२५--
दृढाभ्यस्तपदार्थैकभावनादतिचञ्चलम् ।
चित्तं संजायते जन्मजरामरणकारणम् ॥ २५॥
अर्थ:
किसी विषय के प्रति अत्यधिक और दृढ़ चिन्तन से चित्त चंचल होता है और जन्म, जरा तथा मृत्यु के चक्र का कारण बनता है।
२६--वासनावशतः प्राणस्पन्दस्तेन च वासना ।
क्रियते चित्तबीजस्य तेन बीजाङ्कुरक्रमः ॥ २६॥
अर्थ:
वासनाओं से प्राणों की गति प्रभावित होती है और प्राण की गति से फिर वासनाएँ पुष्ट होती हैं। इस प्रकार चित्त का बीज और अंकुर एक-दूसरे को उत्पन्न करते रहते हैं।
२७--द्वे बीजे चित्तवृक्षस्य प्राणस्पन्दनवासने ।
एकस्मिंश्च तयोः क्षीणे क्षिप्रं द्वे अपि नश्यतः ॥ २७॥
अर्थ:
चित्तरूपी वृक्ष के दो बीज हैं—प्राण की गति और वासना। इनमें से एक भी क्षीण हो जाए तो दोनों शीघ्र नष्ट हो जाते हैं।
२८-असङ्गव्यवहारत्वाद्भवभावनवर्जनात् ।
शरीरनाशदर्शित्वाद्वासना न प्रवर्तते ।
वासनासम्परित्यागाच्चितं गच्छत्यचित्तताम् ॥ २८॥
अर्थ:
असंग भाव से व्यवहार करने, संसार को ही अंतिम सत्य न मानने और शरीर की नश्वरता को समझने से वासना नहीं बढ़ती। वासनाओं के त्याग से चित्त अपनी चंचलता खो देता है।
२९--अवासनत्वात्सततं यदा न मनुते मनः ।
अमनस्ता तदोदेति परमोपशमप्रदा ॥ २९॥
अर्थ:
जब मन निरन्तर वासनारहित होकर विषयों के पीछे नहीं दौड़ता, तब मन की अत्यन्त शान्त अवस्था प्रकट होती है।
३०--अव्युत्पन्नमना यावद्भवानज्ञाततत्पदः ।
गुरुशास्त्रप्रमाणैस्तु निर्णीतं तावदाचर ॥ ३०॥
अर्थ:
जब तक आत्मतत्त्व का प्रत्यक्ष ज्ञान नहीं हुआ है, तब तक गुरु और शास्त्र के प्रमाण से निर्धारित साधना का आचरण करते रहो।
३१--ततः पक्वकषायेण नूनं विज्ञात वस्तुना ।
शुभोऽप्यसौ त्वया त्याज्यो वासनौघो निराधिना ॥ ३१॥
अर्थ:
जब अन्तःकरण शुद्ध हो जाए और वस्तु अर्थात् आत्मतत्त्व का ज्ञान हो जाए, तब शुभ वासनाओं को भी अन्ततः छोड़ देना चाहिए।
३२--द्विविधचित्तनाशोऽस्ति सरूपोऽरूप एव च ।
जीवन्मुक्तः सरूपः स्यादरूपो देहमुक्तिगः ॥ ३२॥
अर्थ:
चित्त के नाश के दो प्रकार बताए गए हैं—सरूप और अरूप। शरीर रहते हुए होने वाला चित्तनाश जीवन्मुक्ति से सम्बन्धित है; देह के छूटने पर होने वाला अरूप मनोनाश विदेहमुक्ति से सम्बन्धित है।
३३--अस्य नाशमिदानीं त्वं पावने श्रुणु सादरम् ॥ ३३॥
अर्थ:
हे पवित्र हनुमान! अब चित्तनाश का स्वरूप ध्यानपूर्वक सुनो।
३४--चित्तानाशाभिधानं हि यदा ते विद्यते पुनः ।
मैत्र्यादिभिर्गुणैर्युक्तं शान्तिमेति न संशयः ।
भूयोजन्मविनिर्मुक्तं जीवन्मुक्तस्य तन्मनः ॥ ३४॥
अर्थ:
जब चित्तनाश की अवस्था आती है और मन मैत्री आदि सद्गुणों से युक्त होकर शान्त हो जाता है, तब उसमें पुनर्जन्म का बन्धन नहीं रहता। यही जीवन्मुक्त के मन की अवस्था है।
३५--सरूपोऽसौ मनोनाशो जीवन्मुक्तस्य विद्यते ।
अरूपस्तु मनोनाशो वैदेही मुक्तिगो भवेत् ॥ ३५॥
अर्थ:
जीवन्मुक्त में मनोनाश सरूप होता है—अर्थात् शरीर रहते हुए मन की व्यवहारगत उपस्थिति रहती है। विदेहमुक्ति में मनोनाश अरूप हो जाता है।
३६–३८
सहस्राङ्कुरशाखात्मफलपल्लवशालिनः ॥ ३६॥
अस्य संसारवृक्षस्य मनोमूलमिदं स्थितम् ।
संकल्प एव तन्मन्ये संकल्पोपशमेन तत् ॥ ३७॥
शोषयाशु यथा शोषमेति संसारपादपः ।
उपाय एक एवास्ति मनसः स्वस्य निग्रहे ॥ ३८॥
अर्थ:
हजारों शाखाओं, अंकुरों, फलों और पत्तों से युक्त संसार-वृक्ष की जड़ मन है। उसका मूल संकल्प है। संकल्प के शान्त होने पर संसार-वृक्ष सूखने लगता है। इसलिए मन को साधना ही प्रमुख उपाय है।
३९--मनसोऽभ्युदयो नाशो मनोनाशो महोदयः ।
ज्ञमनो नाशमभ्येति मनो ज्ञस्य हि श‍ृङ्खला ॥ ३९॥
अर्थ:
मन की चंचल वृद्धि ही बन्धन है और मन का शमन महान् उपलब्धि है। ज्ञानी का मन अपनी बन्धनकारी श्रृंखला को खो देता है।
४०--तावन्निशीव वेताला वल्गन्ति हृदि वासनाः ।
एकतत्त्वदृढाभ्यासाद्यावन्न विजितं मनः ॥ ४०॥
अर्थ:
जब तक एक सत्य तत्त्व का दृढ़ अभ्यास करके मन को जीता नहीं जाता, तब तक वासनाएँ रात में घूमते भूतों की तरह हृदय में विचरण करती रहती हैं।
४१--प्रक्षीणचित्तदर्पस्य निगृहीतेन्द्रियद्विषः ।
पद्मिन्य इव हेमन्ते क्षीयन्ते भोगवासनाः ॥ ४१॥
अर्थ:
जिसका चित्त-अहंकार क्षीण हो गया और इन्द्रियाँ संयमित हैं, उसकी भोग-वासनाएँ वैसे ही सूख जाती हैं जैसे शीत ऋतु में कमलिनी मुरझा जाती है।
४२--हस्तं हस्तेन सम्पीड्य दन्तैर्दन्तान्विचूर्ण्य च ।
अङ्गान्यङ्गैः समाक्रम्य जयेदादौ स्वकं मनः ॥ ४२॥
अर्थ:
अत्यन्त दृढ़ पुरुषार्थ के द्वारा पहले अपने मन को जीतना चाहिए। यहाँ हाथ-दाँत आदि के उदाहरण से कठोर आत्मसंयम का संकेत है।
४३--उपविश्योपविश्यैकां चिन्तकेन मुहुर्मुहुः ।
न शक्यते मनो जेतुं विना युक्तिमनिन्दिताम् ॥ ४३॥
अर्थ:
केवल बार-बार बैठकर सोचते रहने से मन को नहीं जीता जा सकता; उचित साधन और युक्ति आवश्यक है।
४४–४५
अङ्कुशेन विना मत्तो यथा दुष्टमतङ्गजः ।
अध्यात्मविद्याधिगमः साधुसंगतिरेव च ॥ ४४॥
वासनासम्परित्यागः प्राणस्पन्दनिरोधनम् ।
एतास्ता युक्तयः पुष्टाः सन्ति चित्तजये किल ॥ ४५॥
अर्थ:
जैसे अंकुश के बिना मदमस्त हाथी को नियंत्रित करना कठिन है, वैसे ही मन को युक्ति के बिना जीतना कठिन है। इसके उपाय हैं—अध्यात्मविद्या, साधुसंगति, वासनाओं का त्याग और प्राण की गति का संयम।
४६–४७
सतीषु युक्तिष्वेतासु हठान्नियमन्ति ये ।
चेतसो दीपमुत्सृज्य विचिन्वन्ति तमोऽञ्जनैः ॥ ४६॥
विमूढाः कर्तुमुद्युक्ता ये हठाच्चेतसो जयम् ।
ते निबध्नन्ति नागेन्द्रमुन्मत्तं बिसतन्तुभिः ॥ ४७॥
अर्थ:
जब उचित साधन उपलब्ध हैं, तब जो लोग केवल हठ से मन को जीतना चाहते हैं, वे ऐसे मूर्ख हैं जैसे दीपक छोड़कर अँधेरे को अंजन से खोजना, या पागल हाथी को कमल के तन्तुओं से बाँधना।
४८–४९
द्वे बीजे चित्तवृक्षस्य वृत्तिव्रततिधारणः ।
एकं प्राणपरिस्पन्दो द्वितीयं दृढभावना ॥ ४८॥
सा हि सर्वगता संवित्प्राणास्पन्देन चाल्यते ।
चित्तैकाग्र्याद्यतो ज्ञानमुक्तं समुपजायते ॥ ४९॥
अर्थ:
चित्तरूपी वृक्ष के दो प्रमुख कारण हैं—प्राण की गति और दृढ़ मानसिक भावना। चित्त की एकाग्रता से ज्ञान उत्पन्न होता है।
५०--तत्साधनमथो ध्यानं यथावदुपदिश्यते ।
विनाप्यविकृतिं कृत्स्नां संभवव्यत्ययक्रमात् ।
यशोऽरिष्टं च चिन्मात्रं चिदानन्दं विचिन्तय ॥ ५०॥
अर्थ:
इसके लिए ध्यान का अभ्यास बताया जाता है। अपने शुद्ध चैतन्य और चिदानन्द स्वरूप का चिन्तन करो।
५१–५२
अपानेऽस्तंगते प्राणो यावन्नाभ्युदितो हृदि ।
तावत्सा कुंभकावस्था योगिभिर्यानुभूयते ॥ ५१॥
बहिरस्तंगते प्राणे यावन्नापान उद्गतः ।
तावत्पूर्णां समावस्थां बहिष्ठं कुम्भकं विदुः ॥ ५२॥
अर्थ:
प्राण और अपान की गति के बीच जो स्थिर अवस्था आती है, उसे योगी कुम्भक की अवस्था के रूप में अनुभव करते हैं।
५३---
ब्रह्माकारमनोवृत्तिप्रवाहोऽहंकृतं विना ।
सम्प्रज्ञातसमाधिः स्याद्ध्यानाभ्यासप्रकर्षतः ॥ ५३॥
अर्थ:
अहंकार से रहित होकर मन की वृत्तियाँ जब ब्रह्माकार हो जाती हैं, तो गहन ध्यान-अभ्यास से सम्प्रज्ञात समाधि की अवस्था आती है।
५४--प्रशान्तवृत्तिकं चित्तं परमानन्ददायकम् ।
असम्प्रज्ञातनामायं समाधिर्योगिनां प्रियः ॥ ५४॥
अर्थ:
जब चित्त की वृत्तियाँ पूर्णतः शान्त हो जाती हैं और परम आनन्द की अनुभूति होती है, उसे असम्प्रज्ञात समाधि कहा जाता है।
५५--प्रभाशून्यं मनःशून्यं बुद्धिशून्यं चिदात्मकम् ।
अतद्व्यावृत्तिरूपोऽसौ समाधिर्मुनिभावितः ॥ ५५॥
अर्थ:
जहाँ मन और बुद्धि की सामान्य क्रियाएँ शान्त हो जाती हैं और केवल चैतन्य का स्वरूप रह जाता है, उस समाधि का मुनियों ने ध्यान किया है।
५६--ऊर्ध्वपूर्णमधःपूर्णं मध्यपूर्णं शिवात्मकम् ।
साक्षाद्विधिमुखो ह्येष समाधिः पारमार्थिकः ॥ ५६॥
अर्थ:
ऊपर, नीचे और बीच—सब ओर पूर्णता का अनुभव होना और सबको शिवस्वरूप देखना पारमार्थिक समाधि का लक्षण बताया गया है।
५७--दृढभावनया त्यक्तपूर्वापरविचारणम् ।
यदादानं पदार्थस्य वासना सा प्रकीर्तिता ॥ ५७॥
अर्थ:
किसी वस्तु को दृढ़ भावना से ग्रहण करके उसके पूर्व-पश्चात् का विचार छोड़ देना—उससे उत्पन्न मानसिक ग्रहणशीलता को वासना कहा गया है।
५८--भावितं तीव्रसंवेगादात्मना यत्तदेव सः ।
भवत्याशु कपिश्रेष्ठ विगतेतरवासनः ॥ ५८॥
अर्थ:
हे कपिश्रेष्ठ! मनुष्य जिस वस्तु का तीव्र भावना से निरन्तर चिन्तन करता है, वैसा ही बन जाता है। अन्य वासनाओं के क्षय से यह और शीघ्र होता है।
५९–६०
तादृग्रूपो हि पुरुषो वासनाविवशीकृतः ।
सम्पश्यति यदैवैतत्सद्वस्त्विति विमुह्यति ॥ ५९॥
वासनावेगवैचित्र्यात्स्वरूपं न जहाति तत् ।
भ्रान्तं पश्यति दुर्दृष्टिः सर्वं मदवशादिव ॥ ६०॥
अर्थ:
वासनाओं के अधीन व्यक्ति उन्हीं के अनुरूप संसार को देखता है और भ्रमित हो जाता है। वासनाओं की विविधता के कारण उसकी दृष्टि वास्तविक स्वरूप को ठीक प्रकार नहीं पहचान पाती।
६१--वासना द्विविधा प्रोक्ता शुद्धा च मलिना तथा ।
मलिना जन्महेतुः स्याच्छुद्धा जन्मविनाशिनी ॥ ६१॥
अर्थ:
वासना दो प्रकार की कही गई है—शुद्ध और मलिन। मलिन वासना जन्म का कारण बनती है, जबकि शुद्ध वासना जन्म-बन्धन को समाप्त करने में सहायक होती है।
६२--अज्ञानसुघनाकारा घनाहंकारशालिनी ।
पुनर्जन्मकरी प्रोक्ता मलिना वासना बुधैः ।
पुनर्जन्माङ्कुरं त्यक्त्वा स्थितिः संभृष्टबीजवत् ॥ ६२॥
अर्थ:
अज्ञान और घने अहंकार से युक्त मलिन वासना पुनर्जन्म का कारण है। जब पुनर्जन्म का बीज नष्ट हो जाता है, तब वह भुने हुए बीज के समान फिर अंकुरित नहीं होता।
६३--बहुशास्त्रकथाकन्थारोमन्थेन वृथैव किम् ।
अन्वेष्टव्यं प्रयत्नेन मारुते ज्योतिरान्तरम् ॥ ६३॥
अर्थ:
हे हनुमान! केवल अनेक शास्त्रों की चर्चाओं को दोहराने से क्या लाभ? प्रयत्नपूर्वक अपने भीतर स्थित ज्ञान-ज्योति को खोजो।
६४--दर्शनादर्शने हित्वा स्वयं केवलरूपतः ।
य आस्ते कपिशार्दूल ब्रह्म स ब्रह्मवित्स्वयम् ॥ ६४॥
अर्थ:
जो देखने और न देखने के द्वन्द्व से परे होकर अपने शुद्ध स्वरूप में स्थित रहता है, वही ब्रह्म है और वही वास्तविक ब्रह्मज्ञानी है।
६५--अधीत्य चतुरो वेदान्सर्वशास्त्राण्यनेकशः ।
ब्रह्मतत्त्वं न जानाति दर्वी पाकरसं यथा ॥ ६५॥
अर्थ:
जो चारों वेद और अनेक शास्त्र पढ़ ले, लेकिन ब्रह्मतत्त्व को न जाने, वह उस चम्मच के समान है जो भोजन के रस को छूते हुए भी स्वयं उसका स्वाद नहीं जानता।
६६--स्वदेहाशुचिगन्धेन न विरज्येत यः पुमान् ।
विरागकारणं तस्य किमन्यदुपदिश्यते ॥ ६६॥
अर्थ:
जो अपने ही नश्वर शरीर की अशुद्धता और क्षणभंगुरता देखकर भी वैराग्य प्राप्त नहीं करता, उसे वैराग्य के लिए और क्या समझाया जाए?
६७--अत्यन्तमलिनो देहो देही चात्यन्तनिर्मलः ।
उभयोरन्तरं ज्ञात्वा कस्य शौचं विधीयते ॥ ६७॥
अर्थ:
शरीर नश्वर और मलिन है, जबकि आत्मा अत्यन्त निर्मल है। दोनों के अन्तर को जान लेने पर वास्तविक शुद्धता का स्वरूप समझ में आता है।
६८--बद्धो हि वासनाबद्धो मोक्षः स्याद्वासनाक्षयः ।
वासनां सम्परित्यज्य मोक्षार्थित्वमपि त्यज ॥ ६८॥
अर्थ:
मनुष्य वासनाओं से बँधा हुआ है और वासनाओं के क्षय से मुक्ति होती है। अन्ततः वासनाओं को छोड़कर “मैं मोक्ष प्राप्त करूँ”—इस इच्छा को भी छोड़ देना चाहिए।
६९--मानसीर्वासनाः पूर्वं त्यक्त्वा विषयवासनाः ।
मैत्र्यादिवासनानाम्नीर्गृहाणामलवासनाः ॥ ६९॥
अर्थ:
पहले विषयों से जुड़ी मानसिक वासनाओं का त्याग करो और मैत्री आदि शुद्ध वासनाओं को अपनाओ।
७०--ता अप्यतः परित्यज्य ताभिर्व्यवहरन्नपि ।
अन्तःशान्तः समस्नेहो भव चिन्मात्रवासनः ॥ ७०॥
अर्थ:
बाद में उन शुभ वासनाओं से भी भीतर से मुक्त हो जाओ। व्यवहार करते हुए भी भीतर शान्त और सबके प्रति समान स्नेह रखने वाले बनो।
७१--तामप्यथ परित्यज्य मनोबुद्धिसमन्विताम् ।
शेषस्थिरसमाधानो मयि त्वं भव मारुते ॥ ७१॥
अर्थ:
अन्ततः उस सूक्ष्म मानसिक आसक्ति को भी छोड़कर मन और बुद्धि को स्थिर समाधि में स्थित करो और मुझमें स्थित हो जाओ।
आत्मस्वरूप का ध्यान
७२--अशब्दमस्पर्शमरूपमव्ययं
तथाऽरसं नित्यमगन्धवच्च यत् ।
अनामगोत्रं मम रूपमीदृशं
भजस्व नित्यं पवनात्मजार्तिहन् ॥ ७२॥
अर्थ:
हे हनुमान! मेरे उस स्वरूप का नित्य ध्यान करो जो शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध से परे है; जो अविनाशी, नित्य और नाम-गोत्र से रहित है।
७३--दृशिस्वरूपं गगनोपमं परं
सकृद्विभातं त्वजमेकमक्षरम् ।
अलेपकं सर्वगतं यदद्वयं
तदेव चाहं सकलं विमुक्तॐ ॥ ७३॥
अर्थ:
मेरा स्वरूप शुद्ध दृष्टा-चैतन्य के समान, आकाशवत् व्यापक, अजन्मा, एक, अक्षर, असंग और सर्वव्यापक है। वही अद्वैत स्वरूप मैं हूँ—पूर्णतः मुक्त।
७४--
दृशिस्तु शुद्धोऽहमविक्रियात्मको
न मेऽस्ति कश्चिद्विषयः स्वभावतः 
पुरस्तिरश्चोर्ध्वमधश्च सर्वतः
सुपूर्णभूमाहमितीह भावय ॥ ७४॥
अर्थ:
मैं शुद्ध दृष्टा और निर्विकार आत्मा हूँ। मेरा स्वभाव किसी विषय में बँधा हुआ नहीं है। आगे, पीछे, ऊपर, नीचे और चारों ओर मैं ही पूर्ण चेतना हूँ—ऐसा चिन्तन करो।
७५--अजोऽमरश्चैव तथाजरोऽमृतः
स्वयंप्रभः सर्वगतोऽहमव्ययः ।
न कारणं कार्यमतीत्य निर्मलः
सदैव तृप्तोऽहमितीह भावय ॥ ७५॥
अर्थ:
मैं अजन्मा, अमर, अजर, अमृत, स्वयंप्रकाश, सर्वव्यापक और अविनाशी हूँ। कारण और कार्य दोनों से परे, निर्मल और सदा तृप्त हूँ—ऐसा भाव रखो।
७६ — विदेहमुक्ति
जीवन्मुक्तपदं त्यक्त्वा स्वदेहे कालसात्कृते ।
विशत्यदेहमुक्तत्वं पवनोऽस्पन्दतामिव ॥ ७६॥
अर्थ:
जब जीवन्मुक्त ज्ञानी का शरीर काल के अधीन होकर समाप्त हो जाता है, तब वह विदेहमुक्ति में प्रवेश करता है—जैसे वायु अपनी गति के रुक जाने पर स्पन्दनरहित हो जाए।
उपसंहार
तदेतदृचाभ्युक्तम् ।
तद्विष्णोः परमं पदं सदा पश्यन्ति सूरयः ।
दिवीव चक्षुराततम् ॥
तद्विप्रासो विपन्यवो जागृवांसः समिन्धते ।
विष्णोर्यत्परमं पदम् ॥
अर्थ:
ऋचा में कहा गया है—ज्ञानी पुरुष विष्णु के उस परम पद को सदा देखते हैं, जो आकाश में फैली हुई आँख के समान सर्वत्र प्रकाशित है। जागरूक और ज्ञानवान् साधक उसी परम पद की ओर अग्रसर होते हैं।
अन्तिम शान्तिपाठ
ॐ सत्यमित्युपनिषत् ।
ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते ।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ॥
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
हरिः ॐ तत्सत् ॥
अर्थ:
ॐ सत्य है। वह ब्रह्म पूर्ण है और यह जगत भी उसी पूर्ण से प्रकट हुआ है। पूर्ण में से पूर्ण प्रकट होने पर भी पूर्ण ही शेष रहता है। शान्ति हो, शान्ति हो, शान्ति हो।
इति मुक्तिकोपनिषत्समाप्ता ॥
इस प्रकार मुक्तिकोपनिषद् समाप्त है।
विशेष बात--
आपके पहले प्रश्न के संदर्भ में मुक्तिकोपनिषद् का मूल निष्कर्ष बहुत स्पष्ट है:
ज्ञान → वासनाक्षय/चित्तशुद्धि → जीवन्मुक्ति → प्रारब्ध का क्षय → देह का अन्त → विदेहमुक्ति।
और उपनिषद् स्वयं कहता है कि जीवन्मुक्ति में ज्ञानी शरीर रहते हुए मुक्त है, जबकि विदेहमुक्ति में शरीर और उसकी उपाधियों का पूर्ण अन्त हो जाता है। 
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