(79) हयग्रीव उपनिषद


हयग्रीव उपनिषद--
हयग्रीव उपनिषद वैष्णव परम्परा का एक लघु उपनिषद है, जिसमें भगवान हयग्रीव को परम ज्ञान, विद्या और ब्रह्मविद्या के स्वरूप के रूप में वर्णित किया गया है।
हयग्रीवोपनिषद् अथर्ववेद से सम्बद्ध वैष्णव उपनिषद् है और उपलब्ध पाठ में इसे दो मुख्य भागों/उपनिषदों में प्रस्तुत किया गया है।
हयग्रीवोपनिषद् — प्रथम भाग
मंगलाचरण
स्वज्ञोऽपि यत्प्रसादेन ज्ञानं तत्फलमाप्नुयात्।
सोऽयं हयास्यो भगवान् हृदि मे भातु सर्वदा॥
अर्थ:
जिन भगवान् हयग्रीव की कृपा से स्वयं ज्ञानी पुरुष भी अपने ज्ञान का परम फल प्राप्त करता है, वे अश्वमुख भगवान् हयग्रीव सदा मेरे हृदय में प्रकाशित हों।
शान्तिपाठ
ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवाः।
भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः।
स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवाँसस्तनूभिः।
व्यशेम देवहितं यदायुः॥
स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः।
स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः।
स्वस्ति नस्तार्क्ष्योऽरिष्टनेमिः।
स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु॥
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥
अर्थ:
हे देवो! हम अपने कानों से कल्याणकारी वचन सुनें, अपनी आँखों से शुभ दृश्य देखें और स्वस्थ अंगों से आपकी स्तुति करते हुए देवहित में प्राप्त जीवन को पूर्ण करें। इन्द्र, पूषा, गरुड़ और बृहस्पति हमारा कल्याण करें। हमारे भीतर, बाहर और आधिदैविक स्तर पर शान्ति हो।
प्रथम उपनिषद्
हरिः ॐ।
नारदो ब्रह्माणमुपसमेत्योवाच—
अधीहि भगवन् ब्रह्मविद्यां वरिष्ठां
यया चिरात्सर्वपापं व्यपोह्य
ब्रह्मविद्यां लब्ध्वैश्वर्यवान् भवति।
ब्रह्मोवाच—
हयग्रीवदैवत्यात्मन्त्रान् यो वेद
स श्रुतिस्मृतीतिहासपुराणानि वेद।
स सर्वैश्वर्यवान् भवति।
अर्थ:
नारद ब्रह्माजी के पास जाकर बोले—
“हे भगवन्! मुझे वह श्रेष्ठ ब्रह्मविद्या बताइए, जिसके द्वारा मनुष्य शीघ्र ही पापों से मुक्त होकर ब्रह्मविद्या को प्राप्त करता है और ऐश्वर्यवान् होता है।”
ब्रह्माजी ने कहा—
“जो हयग्रीव देवता से सम्बन्धित मन्त्रों को जानता है, वह श्रुति, स्मृति, इतिहास और पुराणों के तत्त्व को जानने वाला होता है और समस्त ऐश्वर्य को प्राप्त करता है।”
मन्त्र १
विश्वोत्तीर्णस्वरूपाय चिन्मयानन्दरूपिणे।
तुभ्यं नमो हयग्रीव विद्याराजाय स्वाहा स्वाहा नमः॥ १॥
अर्थ:
जो सम्पूर्ण विश्व से परे परम स्वरूप वाले हैं, जो चैतन्य और आनन्दस्वरूप हैं, उन विद्याराज भगवान् हयग्रीव को नमस्कार है।
मन्त्र २
ऋग्यजुःसामरूपाय वेदाहरणकर्मणे।
प्रणवोद्गीथवपुषे महाश्वशिरसे नमः स्वाहा स्वाहा नमः॥ २॥
अर्थ:
जो ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद के स्वरूप हैं, जिन्होंने वेदों को प्रकट किया, जिनका स्वरूप प्रणव और उद्गीथ से सम्बन्धित है तथा जिनका महान् अश्व-मस्तक है—उन भगवान् हयग्रीव को नमस्कार है। 
मन्त्र ३
उद्गीथ प्रणवोद्गीथ सर्ववागीश्वरेश्वर।
सर्ववेदमयाचिन्त्य सर्वं बोधय बोधय स्वाहा स्वाहा नमः॥ ३॥
अर्थ:
हे उद्गीथस्वरूप! हे प्रणवस्वरूप! हे समस्त वाणी के ईश्वर के भी ईश्वर! हे समस्त वेदमय और अचिन्त्य प्रभु! हमें सब कुछ—विशेषतः दिव्य ज्ञान—बोध कराइए। आपको नमस्कार है। 
ध्यान
शङ्खचक्रमहामुद्रापुस्तकाढ्यं चतुर्भुजम्।
सम्पूर्णचन्द्रसंकाशं हयग्रीवमुपास्महे॥
अर्थ:
हम उन भगवान् हयग्रीव की उपासना करते हैं जो चार भुजाओं वाले हैं, जिनके हाथों में शंख, चक्र, महामुद्रा तथा पुस्तक सुशोभित हैं और जिनका तेज पूर्ण चन्द्रमा के समान प्रकाशमान है। 
यहाँ पुस्तक विशेष रूप से ज्ञान और विद्या का प्रतीक है।
हयग्रीव-मन्त्र का वर्णन
ॐ श्रीमिति द्वे अक्षरे।
ह्लौमित्येकाक्षरम्।
ॐ नमो भगवत इति सप्ताक्षराणि।
हयग्रीवायेति पञ्चाक्षराणि।
विष्णव इति त्र्यक्षराणि।
मह्यं मेधां प्रज्ञामिति षडक्षराणि।
प्रयच्छ स्वाहेति पञ्चाक्षराणि।
हयग्रीवस्य तुरीयो भवति॥ ४॥
सरल अर्थ:
इस मन्त्र में विभिन्न बीजाक्षरों और पदों का विन्यास बताया गया है। इसमें भगवान् हयग्रीव को सम्बोधित करते हुए मेधा और प्रज्ञा प्रदान करने की प्रार्थना की गई है। 
विस्तृत मन्त्र-विन्यास
ॐ श्रीमिति द्वे अक्षरे।
ह्लौमित्येकाक्षरम्।
ऐमैमैमिति त्रीण्यक्षराणि।
क्लीं क्लीमिति द्वे अक्षरे।
सौः सौरिति द्वे अक्षरे।
ह्रीमित्येकाक्षरम्।
ॐ नमो भगवत इति सप्ताक्षराणि।
मह्यं मेधां प्रज्ञामिति षडक्षराणि।
प्रयच्छ स्वाहेति पञ्चाक्षराणि।
पञ्चमो मनुर्भवति॥ ५॥
अर्थ:
यहाँ हयग्रीव-विद्या के विस्तृत मन्त्र-विन्यास का वर्णन है। इसका मुख्य भाव है—भगवान् हयग्रीव की उपासना द्वारा मेधा, प्रज्ञा और दिव्य ज्ञान की प्राप्ति।
इति हयग्रीवोपनिषत्सु प्रथमोपनिषत्॥ १॥ 
आगे का भाग
इसके बाद उपनिषद् “हयग्रीवैकाक्षरेण ब्रह्मविद्यां प्रवक्ष्यामि” से दूसरे भाग में प्रवेश करता है। वहाँ हयग्रीव के एकाक्षर मन्त्र, उसके ज्ञान-परम्परा, ब्रह्मविद्या तथा अन्त में चार अत्यन्त महत्वपूर्ण वाक्यों से उसके दार्शनिक अर्थ को समझाया गया है—
“प्रज्ञानमानन्दं ब्रह्म”
“तत्त्वमसि”
“अयमात्मा ब्रह्म”
“अहं ब्रह्मास्मि”
इसके बाद वाणी और ज्ञान से सम्बन्धित चार मन्त्र आते हैं और अन्त में जीवन्मुक्ति का फल बताया जाता है।
हयग्रीवोपनिषद् — द्वितीय भाग
अब प्रथम भाग के बाद आने वाला द्वितीय उपनिषद् मूल संस्कृत पाठ और हिन्दी अर्थ सहित प्रस्तुत है।
मूल पाठ
हरिः ॐ।
हयग्रीवैकाक्षरेण ब्रह्मविद्यां प्रवक्ष्यामि।
ब्रह्मा महेश्वराय प्रोवाच।
महेश्वरो नारदाय प्रोवाच।
नारदो हयग्रीवाय प्रोवाच।
हयग्रीवोऽथर्वणे प्रोवाच।
अथर्वा शाण्डिल्याय प्रोवाच।
शाण्डिल्यो मुनिभ्यः प्रोवाच।
अर्थ:
अब मैं हयग्रीव के एकाक्षर मन्त्र से सम्बन्धित ब्रह्मविद्या का वर्णन करता हूँ। यह ब्रह्मविद्या ब्रह्माजी ने महेश्वर को, महेश्वर ने नारद को, नारद ने हयग्रीव को, हयग्रीव ने अथर्वा को, अथर्वा ने शाण्डिल्य को और शाण्डिल्य ने अन्य मुनियों को प्रदान की।
ब्रह्मविद्या और महावाक्य
प्रज्ञानमानन्दं ब्रह्म।
तत्त्वमसि।
अयमात्मा ब्रह्म।
अहं ब्रह्मास्मि॥
अर्थ:
“प्रज्ञानमानन्दं ब्रह्म” — ब्रह्म ज्ञानस्वरूप और आनन्दस्वरूप है।
“तत्त्वमसि” — वह परम सत्य तू ही है।
“अयमात्मा ब्रह्म” — यह आत्मा ही ब्रह्म है।
“अहं ब्रह्मास्मि” — मैं ब्रह्म हूँ।
इन चार वाक्यों द्वारा उपनिषद् यह बताता है कि परम ब्रह्म कोई बाहरी वस्तु मात्र नहीं, बल्कि आत्मा के वास्तविक स्वरूप का ही परम सत्य है।
ज्ञान की प्रार्थना
ॐ हयग्रीवाय नमः।
मेधां मेधां मेधां प्रयच्छ स्वाहा।
प्रज्ञां प्रज्ञां प्रज्ञां प्रयच्छ स्वाहा।
बुद्धिं बुद्धिं बुद्धिं प्रयच्छ स्वाहा।
विद्यां विद्यां विद्यां प्रयच्छ स्वाहा।
अर्थ:
हे भगवान् हयग्रीव! आपको नमस्कार है। हमें मेधा प्रदान करें, हमें प्रज्ञा प्रदान करें, हमें बुद्धि प्रदान करें और हमें विद्या प्रदान करें।
यहाँ हयग्रीव की उपासना का मुख्य उद्देश्य केवल सांसारिक ऐश्वर्य नहीं, बल्कि ज्ञान, मेधा, प्रज्ञा और विद्या की प्राप्ति बताया गया है।
फलश्रुति
य एवं वेद स ब्रह्मविद्भवति।
सर्वपापैः प्रमुच्यते।
सर्ववेदाध्ययनफलमाप्नोति।
सर्वशास्त्राध्ययनफलमाप्नोति।
सर्वयज्ञफलमाप्नोति।
सर्वतीर्थस्नानफलमाप्नोति।
सर्वैश्वर्यवान् भवति।
सर्वविद्याधिपो भवति।
स जीवन्मुक्तो भवति।
अर्थ:
जो इस विद्या के तत्त्व को जानता है, वह ब्रह्मवेत्ता होता है। वह पापों से मुक्त होता है। उसे वेदों के अध्ययन का फल, शास्त्रों के अध्ययन का फल, यज्ञों का फल और समस्त तीर्थों में स्नान करने का फल प्राप्त होता है।
वह ऐश्वर्यवान् और समस्त विद्याओं का अधिकारी होता है तथा जीवन्मुक्त होता है—अर्थात् शरीर में रहते हुए भी आत्मज्ञान के कारण बन्धन से मुक्त अवस्था को प्राप्त करता है।
समापन
इति हयग्रीवोपनिषत्सु द्वितीयोपनिषत्॥
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥
॥ हयग्रीवोपनिषत् — द्वितीय भाग ॥
मूल संस्कृत पाठ एवं हिन्दी अर्थ
नीचे द्वितीय भाग का पाठ उपलब्ध संस्कृत पाठ के अनुसार दिया जा रहा है। यह भाग हयग्रीव के एकाक्षर मन्त्र से ब्रह्मविद्या का विवेचन करता है और अन्त में चार अनुमन्त्र तथा फलश्रुति आती है। 
१. हयग्रीव एकाक्षर ब्रह्मविद्या
हयग्रीवैकाक्षरेण ब्रह्मविद्यां प्रवक्ष्यामि ।
ब्रह्मा महेश्वराय महेश्वरः संकर्षणाय ।
संकर्षणो नारदाय नारदो व्यासाय 
व्यासो लोकेभ्यः प्रायच्छदिति ॥
अर्थ:
अब मैं हयग्रीव के एकाक्षर मन्त्र के द्वारा ब्रह्मविद्या का वर्णन करता हूँ। यह विद्या ब्रह्मा ने महेश्वर को, महेश्वर ने संकर्षण को, संकर्षण ने नारद को, नारद ने व्यास को और व्यास ने लोक के लोगों को प्रदान की।
२. एकाक्षर मन्त्र का स्वरूप
हकारोंसकारोमकारों त्रयमेकस्वरूपं भवति ।
ह्लौं(ह्सौं) बीजाक्षरं भवति ।
बीजाक्षरेण ह्लौं(ह्सौं) ह्सौं रूपेण तज्जापकानां
सम्पत्सारस्वतौ भवतः ।
अर्थ:
हकार, सकार और मकार—इन तीनों के सम्मिलित स्वरूप से हयग्रीव का बीजाक्षर बताया गया है। इस बीजाक्षर का जप करने वालों को सम्पत्ति और सरस्वती अर्थात् विद्या की प्राप्ति होती है।
पाठ-टिप्पणी: मूल स्रोत में बीजाक्षर के पाठ में “ह्लौं (ह्सौं)” जैसे पाठांतर दिए गए हैं। इसलिए मुद्रण में इसे पाठांतर सहित रखना अधिक उचित है। 
३. ज्ञान और मुक्ति
तत्स्वरूपज्ञानां वैदेही मुक्तिश्च भवति ।
दिक्पालानां राज्ञां नागानां किन्नराणामधिपतिर्भवति ।
अर्थ:
जो साधक हयग्रीव के उस स्वरूप को जानता है, उसे विदेहमुक्ति प्राप्त होती है। वह दिक्पालों, राजाओं, नागों और किन्नरों का अधिपति होने योग्य बनता है।
४. जप की महिमा
हयग्रीवैकाक्षरजपशीलाज्ञया
सूर्यादयः स्वतः स्वस्वकर्मणि प्रवर्तन्ते ।
अर्थ:
जो साधक हयग्रीव के एकाक्षर मन्त्र का निरन्तर जप करता है, उसकी आज्ञा से सूर्य आदि देवता अपने-अपने कार्यों में प्रवृत्त होते हैं—ऐसा इस उपनिषद् में मन्त्र-माहात्म्य के रूप में कहा गया है।
५. मन्त्रराज
सर्वेषां बीजानां हयग्रीवैकाक्षरबीजमनुत्तमं
मन्त्रराजात्मकं भवति ।
अर्थ:
सभी बीजमन्त्रों में हयग्रीव का एकाक्षर बीज अनुत्तम अर्थात् श्रेष्ठ और मन्त्रराजस्वरूप कहा गया है।
६. अमृतत्व और सिद्धियाँऐ
ह्लौं(ह्सौं) हयग्रीवस्वरूपो भवति 
अमृतं कुरु कुरु स्वाहा ।
अर्थ:
ह्लौं/ह्सौं बीज हयग्रीव के स्वरूप का प्रतीक है। “अमृतस्वरूप करो, करो”—इस प्रकार साधक भगवान् से अमृतत्व की प्रार्थना करता है।
तज्जापकानां वाक्सिद्धिः श्रीसिद्धिरष्टाङ्गयोगसिद्धिश्च
भवति ।
अर्थ:
इस मन्त्र का जप करने वाले को वाक्सिद्धि, श्री-सिद्धि तथा अष्टाङ्गयोग की सिद्धि प्राप्त होती है—ऐसा उपनिषद् में कहा गया है।
ह्लौं(ह्सौं) सकलसाम्राज्येन सिद्धिं कुरु कुरु स्वाहा ॥
अर्थ:
हे हयग्रीव! सम्पूर्ण ऐश्वर्य और सामर्थ्य की सिद्धि प्रदान करें—यह प्रार्थना है। 
७. मन्त्रों का शुद्धिकारक प्रभाव
तानेतान्मन्त्रान्यो वेद अपवित्रः पवित्रो भवति ।
अब्रह्मचारी सुब्रह्मचारी भवति ।
अगम्यागमनात्पूतो भवति ।
पतितसम्भाषणात्पूतो भवति ।
ब्रह्महत्यादिपातकैर्मुक्तो भवति ।
अर्थ:
जो इन मन्त्रों को जानता और साधता है, वह अपवित्र अवस्था से पवित्र होता है। जो ब्रह्मचर्य से विमुख हो गया हो, वह पुनः श्रेष्ठ आचरण वाला बनता है। अनुचित आचरण तथा पतित-संसर्ग से उत्पन्न दोषों से शुद्ध होता है और ब्रह्महत्या आदि महापातकों से मुक्त होने का फल बताया गया है।
यहाँ इन कथनों को उपनिषद् की पारम्परिक फलश्रुति के रूप में समझना चाहिए।
८. ब्रह्मज्ञान की ओर
गृहं ऋहपतिरिव देही देहान्ते परमात्मानं प्रविशति ।
प्रज्ञानमानन्दं ब्रह्म ।
तत्त्वमसि ।
अयमात्मा ब्रह्म ।
अहं ब्रह्मास्मीति महावाक्यैः
प्रतिपादितमर्थं त एते मन्त्राः प्रतिपादयन्ति ॥
अर्थ:
देही जीव शरीर का त्याग करने के बाद परमात्मा में प्रवेश करता है। इन मन्त्रों का तात्पर्य उन महावाक्यों में प्रतिपादित ब्रह्मज्ञान को प्रकट करना है—
प्रज्ञानं ब्रह्म — प्रज्ञान ही ब्रह्म है।
तत्त्वमसि — वह परम तत्त्व तुम हो।
अयमात्मा ब्रह्म — यह आत्मा ही ब्रह्म है।
अहं ब्रह्मास्मि — मैं ब्रह्म हूँ।
भावार्थ:
अर्थात् हयग्रीवोपासना का अन्तिम लक्ष्य केवल विद्या, वाणी या ऐश्वर्य की प्राप्ति नहीं, बल्कि परमात्मतत्त्व का ज्ञान और आत्म-ब्रह्म की एकता का बोध है। 
९. चार अनुमन्त्र
उपनिषद् इसके बाद कहता है—
स्वरव्यञ्जनभेदेन द्विधा एते ।
अथानुमन्त्राञ्जपति ॥
अर्थ:
इन मन्त्रों के स्वर और व्यञ्जन के भेद से दो प्रकार बताए गए हैं। अब अनुमन्त्रों का जप किया जाता है।
अनुमन्त्र १
यद्वाग्वदन्त्यविचेतनानि राष्ट्री देवानां निषसाद मन्द्रा ।
चतस्र ऊर्जं दुदुहे पयांसि क्व स्विदस्याः परमं जगाम ॥ १॥
अर्थ:
वाणी देवशक्तियों के मध्य प्रतिष्ठित होकर विविध शक्तियों को प्रकट करती है। उसने चार प्रकार की शक्ति और पोषण प्रदान किया। उसका परम स्वरूप कहाँ स्थित है—यह जानने का प्रयत्न किया जाता है।
अनुमन्त्र २
गौरीर्मिमाय सलिलानि तक्षत्येकपदी द्विपदी सा चतुष्पदी 
अष्टापदी नवपदी बभूवुषी सहस्राक्षरा परमे व्योमन् ॥ २॥
अर्थ:
गौरी अर्थात् वाणी जलधाराओं के समान विभिन्न रूपों को गढ़ती और प्रकट करती है। वह एकपदी, द्विपदी, चतुष्पदी, अष्टापदी और नवपदी आदि अनेक रूपों वाली होकर परम आकाश में सहस्राक्षरा रूप में स्थित है।
भाव:
यह मन्त्र वाणी के स्थूल से सूक्ष्म और परम रूप की ओर संकेत करता है।
अनुमन्त्र ३
ओष्ठापिधाना नकुली दन्तैः परिवृता पविः ।
सर्वस्यै वाच ईशाना चारु मामिह वादयेति च वाग्रसः ॥ ३॥
अर्थ:
ओष्ठों से आच्छादित और दाँतों से घिरी हुई वाणी सबकी अधीश्वरी है। हे वाणी! मुझसे यहाँ सुन्दर, मधुर और मनोहर वचन कहलाओ।
भाव:
मनुष्य की वाणी केवल बोलने का साधन न होकर एक शक्ति है; इसलिए प्रार्थना है कि उससे शुभ और मधुर वचन ही निकलें।
अनुमन्त्र ४
ससर्परीरमतिं बाधमान बृहन्मिमाय जमदग्निदत्त ।
आसूर्यस्य दुरिता तनान श्रवो देवेष्वमृतमजुर्यम् ॥ ४॥
अर्थ:
यह मन्त्र अज्ञान तथा दोषों को दूर करने वाली महान् शक्ति का स्मरण करता है और सूर्य के समान प्रकाशमान होकर पाप-दोषों को दूर करने तथा देवतुल्य अमर यश प्राप्त करने की भावना व्यक्त करता है।
१०. फलश्रुति
य इमां ब्रह्मविद्यामेकादश्यां पठेद्धयग्रीवप्रभावेन
महापुरुषो भवति । स जीवन्मुक्तो भवति ॥
अर्थ:
जो इस ब्रह्मविद्या का पाठ करता है, वह भगवान् हयग्रीव के प्रभाव से महापुरुष बनता है और जीवन्मुक्त होता है—ऐसी फलश्रुति कही गई है। 
११. अन्तिम प्रार्थना
ॐ नमो ब्रह्मणे ।
धारणं मे अस्त्वनिराकरणं धारयिता भूयासं ।
कर्णयोः श्रुतं मा च्योढ्वं ममामुष्य 
ओमित्युपनिषत् ॥
अर्थ:
ॐ! ब्रह्म को नमस्कार। मेरे भीतर सुना हुआ ज्ञान धारण करने की शक्ति बनी रहे; वह मुझसे कभी दूर न हो। मेरे कानों से जो ज्ञान सुना गया है, वह नष्ट न हो। ॐ ही उपनिषद् का सार है।
शान्तिपाठ
ॐ भद्रं कर्णेभिः श्रुणुयाम देवाः ।
भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः ।
स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवाꣳसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायुः ॥
ॐ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः ।
स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः ।
स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः ।
स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
हरिः ॐ तत्सत् ॥
इति हयग्रीवोपनिषत्समाप्त
विशेष बात
इस द्वितीय भाग का मुख्य संदेश यह है कि हयग्रीव केवल विद्या देने वाले देवता के रूप में नहीं, बल्कि ब्रह्मविद्या और परमात्मज्ञान के अधिष्ठाता के रूप में प्रस्तुत हैं। एकाक्षर मन्त्र से आरम्भ होकर उपनिषद् अन्ततः “प्रज्ञानं ब्रह्म”, “तत्त्वमसि”, “अयमात्मा ब्रह्म”, “अहं ब्रह्मास्मि” जैसे महावाक्यों के अर्थ तक पहुँचता है।
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