(76) अध्यात्मोपनिषद
अध्यात्मोपनिषद--
अध्यात्मोपनिषद् शुक्ल यजुर्वेद से सम्बद्ध एक वेदान्तप्रधान उपनिषद् है। इसमें आत्मा, ब्रह्म, माया, अध्यास, आत्मज्ञान, समाधि और जीवन्मुक्ति का विवेचन है। उपलब्ध पाठ में आरम्भिक मन्त्रों के बाद ६९ क्रमांकित श्लोक तथा अन्त में उपदेश-परम्परा दी गई है।
॥ अध्यात्मोपनिषत् ॥
ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥
हरिः ॐ॥
१--अन्तःशरीरे निहितो गुहायामज एको नित्यमस्य
पृथिवी शरीरं यः पृथिवीमन्तरे सञ्चरन् यं पृथिवी न वेद।
यस्यापः शरीरं योऽपोऽन्तरे सञ्चरन् यमापो न विदुः।
यस्य तेजः शरीरं यस्तेजोऽन्तरे सञ्चरन् यं तेजो न वेद।
यस्य वायुः शरीरं यो वायुमन्तरे सञ्चरन् यं वायुर्न वेद।
यस्याकाशः शरीरं य आकाशमन्तरे सञ्चरन् यमाकाशो न वेद।
यस्य मनः शरीरं यो मनोऽन्तरे सञ्चरन् यं मनो न वेद।
यस्य बुद्धिः शरीरं यो बुद्धिमन्तरे सञ्चरन् यं बुद्धिर्न वेद।
यस्याहंकारः शरीरं योऽहंकारमन्तरे सञ्चरन् यमहंकारो न वेद।
यस्य चित्तं शरीरं यश्चित्तमन्तरे सञ्चरन् यं चित्तं न वेद।
यस्याव्यक्तं शरीरं योऽव्यक्तमन्तरे सञ्चरन् यमव्यक्तं न वेद।
यस्याक्षरं शरीरं योऽक्षरमन्तरे सञ्चरन् यमक्षरं न वेद।
यस्य मृत्युः शरीरं यो मृत्युमन्तरे सञ्चरन् यं मृत्युर्न वेद।
स एष सर्वभूतान्तरात्मापहतपाप्मा दिव्यो देव एको नारायणः।
अहं ममेति यो भावो देहाक्षादावनात्मनि।
अध्यासोऽयं निरस्तव्यो विदुषा ब्रह्मनिष्ठया॥ १॥
अर्थ:
शरीर के भीतर हृदय की गुहा में एक अजन्मा, नित्य आत्मतत्त्व स्थित है। पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि, अहंकार और चित्त—ये सब उसके शरीररूप हैं, परन्तु ये स्वयं उस अन्तर्यामी को नहीं जानते। वही समस्त प्राणियों का अन्तरात्मा, पापरहित, दिव्य और एकमात्र नारायण है।
ज्ञानी पुरुष को शरीर और इन्द्रियों आदि अनात्म वस्तुओं में जो “मैं” और “मेरा” का भाव है, उस मिथ्या अध्यास को ब्रह्मज्ञान द्वारा दूर करना चाहिए।
२--ज्ञात्वा स्वं प्रत्यगात्मानं बुद्धितद्वृत्तिसाक्षिणम्।
सोऽहमित्येव तद्वृत्त्या स्वान्यत्रात्म्यमात्मनः॥ २॥
अर्थ:
अपने भीतर स्थित उस प्रत्यगात्मा को, जो बुद्धि और उसकी वृत्तियों का साक्षी है, जानकर साधक को “वह ब्रह्म ही मैं हूँ—सोऽहम्” इस भावना में स्थित होना चाहिए। आत्मा के अतिरिक्त अन्य वस्तुओं में आत्मभाव नहीं रखना चाहिए।
३--लोकानुवर्तनं त्यक्त्वा त्यक्त्वा देहानुवर्तनम्।
शास्त्रानुवर्तनं त्यक्त्वा स्वाध्यासापनयं कुरु॥ ३॥
अर्थ:
लोकाचार के पीछे अन्धे होकर चलना छोड़ो, शरीर के प्रति अत्यधिक आसक्ति छोड़ो और शास्त्रों के केवल बाहरी आचरण में उलझे रहना भी छोड़कर अपने ऊपर किए गए मिथ्या अध्यास को दूर करो।
४--स्वात्मन्येव सदा स्थित्या मनो नश्यति योगिनः।
युक्त्या श्रुत्या स्वानुभूत्या ज्ञात्वा सार्वात्म्यमात्मनः॥ ४॥
अर्थ:
अपने आत्मस्वरूप में निरन्तर स्थित रहने से योगी का चंचल मन शान्त होकर लीन हो जाता है। युक्ति, श्रुति और आत्मानुभूति द्वारा वह जान लेता है कि आत्मा ही सबका आत्मस्वरूप है।
५--निद्राया लोकवार्तायाः शब्दादेरात्मविस्मृतेः।
क्वचिन्नवसरं दत्त्वा चिन्तयात्मानमात्मनि॥ ५॥
अर्थ:
निद्रा, संसार की व्यर्थ चर्चाओं और शब्द आदि विषयों के कारण आत्मा को भूलने के लिए अवसर न दो। एकान्त में अपने भीतर अपने आत्मस्वरूप का निरन्तर चिन्तन करो।
६--मातापित्रोर्मलोद्भूतं मलमांसमयं वपुः।
त्यक्त्वा चण्डालवद्दूरं ब्रह्मभूय कृती भव॥ ६॥
अर्थ:
माता-पिता से उत्पन्न यह शरीर मल-मांस से बना हुआ है। इसे ही अपना वास्तविक स्वरूप मानने की आसक्ति दूर करके ब्रह्मस्वरूप में स्थित हो।
७--घटाकाशं महाकाश इवात्मानं परात्मनि।
विलाप्याखण्डभावेन तूष्णीं भव सदा मुने॥ ७॥
अर्थ:
जिस प्रकार घड़े के भीतर का आकाश वास्तव में महाकाश से अलग नहीं है, उसी प्रकार जीवात्मा को परमात्मा में अभिन्न जानो। इस अखण्ड भाव में स्थित होकर शान्त रहो।
८--स्वप्रकाशमधिष्ठानं स्वयंभूय सदात्मना।
ब्रह्माण्डमपि पिण्डाण्डं त्यज्यतां मलभाण्डवत्॥ ८॥
अर्थ:
अपने स्वप्रकाश, स्वयं सिद्ध आत्मस्वरूप में स्थित होकर ब्रह्माण्ड और इस शरीररूपी पिण्डाण्ड—दोनों को मल के पात्र के समान त्याज्य समझो। अर्थात् इनमें आसक्ति मत रखो।
९--चिदात्मनि सदानन्दे देहरूढामहंधियम्।
निवेश्य लिङ्गमुत्सृज्य केवलो भव सर्वदा॥ ९॥
अर्थ:
जो आत्मा चैतन्य और नित्य आनन्दस्वरूप है, उसमें शरीर से जुड़ी हुई “मैं शरीर हूँ” की बुद्धि को समाप्त करो। सूक्ष्म शरीर की आसक्ति भी छोड़कर सदा केवल आत्मस्वरूप में स्थित रहो।
१०--यत्रैष जगदाभासो दर्पणान्तःपुरं यथा।
तद्ब्रह्माहमिति ज्ञात्वा कृतकृत्यो भवानघ॥ १०॥
अर्थ:
जिस ब्रह्म में यह सम्पूर्ण जगत दर्पण में दिखाई देने वाले प्रतिबिम्ब के समान प्रतीत होता है, उस ब्रह्म को “मैं वही हूँ” ऐसा जान लेने पर हे निष्पाप साधक ! तू कृतकृत्य हो जाता है—अर्थात् जीवन का परम उद्देश्य पूर्ण हो जाता है।
अध्यात्मोपनिषद् — श्लोक ११–२०
मूल संस्कृत पाठ एवं हिन्दी अर्थ-
॥ ११ ॥
अखण्डैकरसं ब्रह्म निर्विकल्पमनन्तकम्।
अहमस्मीत्यवस्थेयं किमन्यदवशिष्यते॥ ११॥
अर्थ:
ब्रह्म अखण्ड, एकरस, निर्विकल्प और अनन्त है। साधक को दृढ़तापूर्वक यह अनुभव करना चाहिए—“मैं वही ब्रह्म हूँ।” जब यह आत्मज्ञान हो जाता है, तब जानने योग्य और कुछ शेष नहीं रहता।
॥ १२ ॥
आत्मानं चेद्विजानीयादयमस्मीति पूरुषः।
किमिच्छन् कस्य कामाय शरीरमनुसञ्ज्वरेत्॥ १२॥
अर्थ:
यदि मनुष्य वास्तव में यह जान ले कि “मैं ही वह आत्मा हूँ”, तो फिर वह किस वस्तु की इच्छा करेगा? किसकी कामना के लिए इस शरीर को दुःख और क्लेश में डालेगा? आत्मज्ञान के बाद सांसारिक इच्छाओं का आधार समाप्त हो जाता है।
॥ १३ ॥
यस्य नाहंकृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते।
हत्वापि स इमाँल्लोकान्न हन्ति न निबध्यते॥ १३॥
अर्थ:
जिस पुरुष में अहंकार का भाव नहीं है और जिसकी बुद्धि कर्मों में लिप्त नहीं होती, वह आत्मस्वरूप में स्थित रहता है। उसके लिए कर्मों का बन्धन नहीं रहता, क्योंकि वह स्वयं को कर्ता मानने वाले अहंकार से मुक्त हो चुका है।
॥ १४ ॥
यदा सर्वे प्रमुच्यन्ते कामा येऽस्य हृदि श्रिताः।
अथ मर्त्योऽमृतो भवत्यत्र ब्रह्म समश्नुते॥ १४॥
अर्थ:
जब मनुष्य के हृदय में स्थित सभी कामनाएँ पूर्णतः समाप्त हो जाती हैं, तब यह मरणधर्मी मनुष्य अमृतस्वरूप हो जाता है। इसी जीवन में वह ब्रह्मानन्द को प्राप्त करता है।
॥ १५ ॥
यदा सर्वे प्रभिद्यन्ते हृदयस्येह ग्रन्थयः।
अथ मर्त्योऽमृतो भवत्येतावद्ध्यनुशासनम्॥ १५॥
अर्थ:
जब हृदय की सभी गाँठें—अज्ञान, आसक्ति, अहंकार और कामना—टूट जाती हैं, तब मनुष्य अमृतस्वरूप हो जाता है। यही इस उपदेश का सार है।
॥ १६ ॥
ब्रह्मैवाहमिति ज्ञात्वा ब्रह्मभूयाय कल्पते।
ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न काङ्क्षति॥ १६॥
अर्थ:
जो साधक जान लेता है कि “मैं ब्रह्म ही हूँ”, वह ब्रह्मस्वरूप होने योग्य हो जाता है। ब्रह्मभाव को प्राप्त मनुष्य का अन्तःकरण प्रसन्न रहता है; वह न शोक करता है और न किसी वस्तु की लालसा करता है।
॥ १७ ॥
समं पश्यन् हि सर्वत्र समवस्थितमीश्वरम्।
न हिनस्त्यात्मनात्मानं ततो याति परां गतिम्॥ १७॥
अर्थ:
जो साधक सभी प्राणियों में समान रूप से स्थित ईश्वर को देखता है, वह किसी को अपने से अलग नहीं मानता। इसलिए वह अपने ही आत्मस्वरूप को हानि नहीं पहुँचाता और परम गति को प्राप्त होता है।
॥ १८ ॥
यः सर्वाणि भूतान्यात्मन्येवानुपश्यति।
सर्वभूतेषु चात्मानं ततो न विजुगुप्सते॥ १८॥
अर्थ:
जो मनुष्य सभी प्राणियों को अपने आत्मस्वरूप में और अपने आत्मा को सभी प्राणियों में देखता है, उसके भीतर किसी के प्रति घृणा या तिरस्कार नहीं रहता।
॥ १९ ॥
यस्मिन्सर्वाणि भूतान्यात्मैवाभूद्विजानतः।
तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः॥ १९॥
अर्थ:
जिस ज्ञानी के लिए सभी प्राणी आत्मस्वरूप ही हो गए हैं, जो सबमें एक ही आत्मा का दर्शन करता है, उसके लिए फिर मोह और शोक कहाँ रह सकते हैं? एकत्व के ज्ञान से मोह और शोक समाप्त हो जाते हैं।
॥ २० ॥
स पर्यगाच्छुक्रमकायमव्रणमस्नाविरं शुद्धमपापविद्धम्।
कविर्मनीषी परिभूः स्वयंभूर्याथातथ्यतोऽर्थान् व्यदधाच्छाश्वतीभ्यः समाभ्यः॥ २०॥
अर्थ:
वह परमात्मा सर्वव्यापक, प्रकाशस्वरूप, शरीररहित, अविनाशी, नसों से रहित, पूर्णतः शुद्ध और पाप से अछूता है। वह सर्वज्ञ द्रष्टा, मनीषी, सबसे परे और स्वयंभू है। उसने सनातन काल से प्रत्येक वस्तु को उसके वास्तविक स्वरूप और नियम के अनुसार व्यवस्थित किया है
॥ २१ ॥
अविद्यायामन्तरे वर्तमानाः स्वयं धीराः पण्डितंमन्यमानाः।
जङ्घन्यमानाः परियन्ति मूढा अन्धेनैव नीयमाना यथान्धाः॥ २१॥
अर्थ:
जो लोग अज्ञान के भीतर ही रहते हुए अपने को बुद्धिमान और विद्वान समझते हैं, वे वास्तव में मूर्ख हैं। वे बार-बार संसार के दुःखों में भटकते रहते हैं, जैसे अन्धे के पीछे चलने वाले अन्धे लोग मार्ग से भटकते हैं।
॥ २२ ॥
अविद्यायां बहुधा वर्तमाना वयं कृतार्था इत्यभिमन्यन्ति बालाः।
यत्कर्मिणो न प्रवेदयन्ति रागात् तेनातुराः क्षीणलोकाश्च्यवन्ते॥ २२॥
अर्थ:
अज्ञान में अनेक प्रकार से उलझे हुए अज्ञानी लोग यह मान लेते हैं कि उन्होंने जीवन का उद्देश्य प्राप्त कर लिया है। कर्मों और सांसारिक आसक्ति में फँसे हुए वे आत्मतत्त्व को नहीं जान पाते और अपने कर्मों के फल समाप्त होने पर उन लोकों से भी पतित हो जाते हैं।
॥ २३ ॥
इष्टापूर्तं मन्यमाना वरिष्ठं नान्यच्छ्रेयो वेदयन्ते प्रमूढाः।
नाकस्य पृष्ठे ते सुकृतेऽनुभूत्वेमं लोकं हीनतरं वा विशन्ति॥ २३॥
अर्थ:
अज्ञानी लोग यज्ञ, दान, पुण्यकर्म आदि को ही जीवन का सर्वोच्च कल्याण समझते हैं और इससे श्रेष्ठ आत्मज्ञान को नहीं जानते। वे अपने पुण्य के फलस्वरूप स्वर्गादि लोकों का अनुभव करके पुण्य क्षीण होने पर फिर इस संसार में लौट आते हैं।
॥ २४ ॥
तपःश्रद्धे ये ह्युपवसन्त्यरण्ये शान्ता विद्वांसो भैक्षचर्यां चरन्तः।
सूर्यद्वारेण ते विरजाः प्रयान्ति यत्रामृतः स पुरुषो ह्यव्ययात्मा॥ २४॥
अर्थ:
जो ज्ञानी तप और श्रद्धा के साथ वन में रहते हैं, मन को शान्त रखते हैं और भिक्षावृत्ति से जीवन निर्वाह करते हैं, वे पवित्र होकर सूर्य के मार्ग से उस परम धाम को प्राप्त होते हैं, जहाँ अमृतस्वरूप, अविनाशी पुरुष स्थित है।
॥ २५ ॥
तस्मादात्मज्ञानमेवाभ्यसेत्।
आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यः।
आत्मनो वा अरे दर्शनेन श्रवणेन मत्या विज्ञानेनेदं सर्वं विदितम्॥ २५॥
अर्थ:
इसलिए मनुष्य को आत्मज्ञान का ही निरन्तर अभ्यास करना चाहिए। आत्मा को देखना, सुनना, उस पर मनन करना और उसका निदिध्यासन करना चाहिए। आत्मा का साक्षात्कार, श्रवण, मनन और अनुभव हो जाने पर इस सम्पूर्ण जगत का वास्तविक स्वरूप जाना जा सकता है।
॥ २६ ॥
आत्मा वा इदमेक एवाग्र आसीन्नान्यत्किञ्चन मिषत्।
स ईक्षत लोकान्नु सृजा इति।
स इमान्लोकानसृजत॥ २६॥
अर्थ:
सृष्टि के आरम्भ में केवल एक आत्मा ही था; उसके अतिरिक्त कुछ भी नहीं था। उस आत्मा ने संकल्प किया—“मैं लोकों की रचना करूँ।” तब उसी ने इन लोकों की सृष्टि की।
॥ २७ ॥
आत्मनः प्राणो जायते मनः सर्वेन्द्रियाणि च।
खं वायुर्ज्योतिरापः पृथिवी विश्वस्य धारिणी॥ २७॥
अर्थ:
आत्मा से प्राण उत्पन्न होता है; मन और सभी इन्द्रियाँ भी उसी से प्रकट होती हैं। आकाश, वायु, अग्नि, जल और सम्पूर्ण विश्व को धारण करने वाली पृथ्वी भी उसी परम आत्मतत्त्व से प्रकट होती है।
॥ २८ ॥
येन रूपं रसं गन्धं शब्दान् स्पर्शांश्च मैथुनान्।
एतेनैव विजानाति किमत्र परिशिष्यते।
एतद्वै तत्॥ २८॥
अर्थ:
जिस आत्मचैतन्य के कारण मनुष्य रूप, रस, गन्ध, शब्द और स्पर्श आदि विषयों को जानता है, उसके अतिरिक्त यहाँ जानने के लिए और क्या शेष रह जाता है? वही आत्मा परम सत्य है।
॥ २९ ॥
यद्वाचानभ्युदितं येन वागभ्युद्यते।
तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते॥ २९॥
अर्थ:
जिसे वाणी स्वयं व्यक्त नहीं कर सकती, लेकिन जिसके कारण वाणी बोलने में समर्थ होती है—उसी को ब्रह्म जानो। जिसे लोग बाहरी वस्तु समझकर उपासना करते हैं, वह ब्रह्म का पूर्ण स्वरूप नहीं है।
॥ ३० ॥
यन्मनसा न मनुते येनाहुर्मनो मतम्।
तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते॥ ३०॥
अर्थ:
जिसे मन अपने विचारों से नहीं जान सकता, परन्तु जिसके कारण मन विचार करने में समर्थ होता है—उसी को ब्रह्म जानो। मन जिस वस्तु को अपना विषय बनाकर उपासना करता है, वह परम ब्रह्म का वास्तविक स्वरूप नहीं है।
॥ ३१ ॥
आलम्बनतया भाति योऽस्मत्प्रत्ययशब्दयोः।
अन्तःकरणसंभिन्नबोधः स त्वंपदाभिधः॥ ३१॥
अर्थ:
‘मैं’ की अनुभूति और ‘मैं’ शब्द का जो आधार है तथा अन्तःकरण से सम्बद्ध होकर जो चेतना प्रकाशित होती है, वही ‘त्वम्’ पद से अभिहित जीवात्मा है।
॥ ३२ ॥
मायाविद्ये विहायैव उपाधी परजीवयोः।
अखण्डं सच्चिदानन्दं परं ब्रह्म विलक्ष्यते॥ ३२॥
अर्थ:
परमात्मा और जीव की माया तथा अविद्या रूपी उपाधियों को छोड़ देने पर जो अखण्ड सत्-चित्-आनन्द स्वरूप परम ब्रह्म शेष रहता है, उसी का साक्षात्कार होता है।
॥ ३३ ॥
इत्थं वाक्यैस्तथार्थानुसन्धानं श्रवणं भवेत्।
युक्त्या संभावितत्वानुसन्धानं मननं तु तत्॥ ३३॥
अर्थ:
महावाक्यों के वास्तविक अर्थ का अनुसंधान करना श्रवण है। युक्ति द्वारा उस सत्य पर बार-बार विचार करके उसके सम्भावित सत्यत्व को दृढ़ करना मनन है।
॥ ३४ ॥
ताभ्यं निर्विचिकित्सेऽर्थे चेतसः स्थापितस्य यत्।
एकतानत्वमेतद्धि निदिध्यासनमुच्यते॥ ३४॥
अर्थ:
श्रवण और मनन द्वारा जिस सत्य के विषय में संशय समाप्त हो जाए, उस सत्य में चित्त को निरन्तर एकाग्र एवं स्थिर रखना निदिध्यासन कहलाता है।
॥ ३५ ॥
ध्यातृध्याने परित्यज्य क्रमाद्ध्येयैकगोचरम्।
निवातदीपवच्चित्तं समाधिरभिधीयते॥ ३५॥
अर्थ:
धीरे-धीरे ध्याता और ध्यान की भावना को छोड़कर जब चित्त केवल ध्येय में स्थित हो जाता है और वायुरहित स्थान में दीपक की लौ के समान अचल हो जाता है, उसे समाधि कहते हैं।
॥ ३६ ॥
वृत्तयस्तु तदानीमप्यज्ञाता आत्मगोचराः।
स्मरणादनुमीयन्ते व्युत्थितस्य समुत्थिताः॥ ३६॥
अर्थ:
समाधि की अवस्था में आत्मा से सम्बन्धित मानसिक वृत्तियाँ उस समय प्रत्यक्ष ज्ञात नहीं होतीं। समाधि से बाहर आने पर उनके स्मरण से यह अनुमान होता है कि वे उस अवस्था में भी विद्यमान थीं।
॥ ३७ ॥
अनादाविह संसारे संचिताः कर्मकोटयः।
अनेन विलयं यान्ति शुद्धो धर्मो विवर्धते॥ ३७॥
अर्थ:
इस अनादि संसार में संचित करोड़ों कर्म इस साधना और समाधि के प्रभाव से नष्ट होने लगते हैं तथा शुद्ध एवं सात्त्विक धर्म की वृद्धि होती है।
॥ ३८ ॥
धर्ममेघमिमं प्राहुः समाधिं योगवित्तमाः।
वर्षत्येष यथा धर्मामृतधाराः सहस्रशः॥ ३८॥
अर्थ:
योग के श्रेष्ठ ज्ञानी इस समाधि को धर्ममेघ समाधि कहते हैं। जैसे बादल हजारों धाराओं के रूप में वर्षा करता है, वैसे ही यह समाधि धर्मरूपी अमृत की असंख्य धाराएँ बरसाती है।
॥ ३९ ॥
अमुना वासनाजाले निःशेषं प्रविलापिते।
समूलोन्मूलिते पुण्यपापाख्ये कर्मसंचये॥ ३९॥
अर्थ:
जब इस साधना द्वारा वासनाओं का पूरा जाल नष्ट हो जाता है और पुण्य तथा पाप नामक कर्मों का संचय जड़ सहित उखाड़ दिया जाता है, तब आत्मज्ञान की पूर्णता होती है।
॥ ४० ॥
वाक्यमप्रतिबद्धं सत्प्राक्परोक्षावभासिते।
करामलकमवद्बोधपरोक्षं प्रसूयते॥ ४०॥
अर्थ:
जब महावाक्य का अर्थ किसी प्रकार के विरोध या बाधा के बिना स्पष्ट हो जाता है, तब ब्रह्म का ज्ञान हाथ में रखे हुए आँवले के समान प्रत्यक्ष और स्पष्ट हो जाता है।
॥ ४१ ॥
वासनानुदयो भोग्ये वैराग्यस्य तदावधिः।
अहंभावोदयाभावो बोधस्य परमावधिः॥ ४१॥
अर्थ:
भोग की वस्तुओं के प्रति वासना का पुनः उत्पन्न न होना वैराग्य की चरम सीमा है। और ‘मैं शरीर हूँ’ अथवा अहंभाव का पुनः उत्पन्न न होना ज्ञान की चरम सीमा है।
॥ ४२ ॥
लीनवृत्तेरनुत्पत्तिर्मर्यादोपरतेस्तु सा।
स्थितप्रज्ञो यतिरयं यः सदानन्दमश्नुते॥ ४२॥
अर्थ:
जो मानसिक वृत्ति आत्मज्ञान में लीन होकर पुनः उत्पन्न नहीं होती, वही उपरति की सर्वोच्च अवस्था है। ऐसा संन्यासी स्थितप्रज्ञ कहलाता है और वह सदा आत्मानन्द का अनुभव करता है।
॥ ४३ ॥
ब्रह्मण्येव विलीनात्मा निर्विकारो विनिष्क्रियः।
ब्रह्मात्मनोः शोधितयोरेकभावावगाहिनि॥ ४३॥
अर्थ:
जिसकी आत्मा ब्रह्म में ही लीन है, जो विकाररहित और निष्क्रिय है तथा शुद्ध किए हुए ब्रह्म और आत्मा की एकता में स्थित है, वही ब्रह्मज्ञानी है।
॥ ४४ ॥
निर्विकल्पा च चिन्मात्रा वृत्तिः प्रज्ञेति कथ्यते।
सा सर्वदा भवेद्यस्य स जीवन्मुक्त इष्यते॥ ४४॥
अर्थ:
निर्विकल्प, केवल चैतन्यस्वरूप आत्मज्ञान की वृत्ति को प्रज्ञा कहा जाता है। जिसके भीतर यह प्रज्ञा सदा विद्यमान रहती है, उसे जीवन्मुक्त कहा जाता है।
॥ ४५ ॥
देहेन्द्रियेष्वहंभाव इदंभावस्तदन्यके।
यस्य नो भवतः क्वापि स जीवन्मुक्त इष्यते॥ ४५॥
अर्थ:
जिसके भीतर शरीर और इन्द्रियों के प्रति ‘मैं’ का भाव तथा उनसे अलग वस्तुओं के प्रति ‘यह मेरा/यह मैं नहीं’ का भेदभाव कहीं भी नहीं रहता, वह जीवन्मुक्त कहलाता है।
॥ ४६ ॥
न प्रत्यग्ब्रह्मणोर्भेदं कदापि ब्रह्मसर्गयोः।
प्रज्ञया यो विजानाति स जीवन्मुक्त इष्यते॥ ४६॥
अर्थ:
जो अपनी अन्तरात्मा और ब्रह्म में तथा ब्रह्म और सम्पूर्ण सृष्टि के मूल में कभी कोई वास्तविक भेद नहीं देखता और इस सत्य को प्रज्ञा द्वारा जानता है, वह जीवन्मुक्त है।
॥ ४७ ॥
साधुभिः पूज्यमानेऽस्मिन्पीड्यमानेऽपि दुर्जनैः।
समभावो भवेद्यस्य स जीवन्मुक्त इष्यते॥ ४७॥
अर्थ:
जिस व्यक्ति को सज्जन सम्मान दें अथवा दुष्ट लोग कष्ट पहुँचाएँ, फिर भी जिसके मन में दोनों परिस्थितियों में समान भाव बना रहे, वह जीवन्मुक्त कहलाता है।
॥ ४८ ॥
विज्ञातब्रह्मतत्त्वस्य यथापूर्वं न संसृतिः।
अस्ति चेन्न स विज्ञातब्रह्मभावो बहिर्मुखः॥ ४८॥
अर्थ:
जिसने ब्रह्मतत्त्व को वास्तव में जान लिया है, उसके लिए पहले जैसा संसार-बन्धन नहीं रहता। यदि फिर भी वही संसार-बन्धन बना हुआ दिखाई दे, तो समझना चाहिए कि उसका ब्रह्मज्ञान अभी पूर्ण नहीं हुआ और उसका मन बाह्य विषयों की ओर है।
॥ ४९ ॥
सुखाद्यनुभवो यावत्तावत्प्रारब्धमिष्यते।
फलोदयः क्रियापूर्वो निष्क्रियो नहि कुत्रचित्॥ ४९॥
अर्थ:
जब तक सुख-दुःख आदि अनुभव होते हैं, तब तक प्रारब्ध कर्म माना जाता है। क्योंकि कर्म का फल तभी उत्पन्न होता है जब उसके पीछे कोई पूर्व कर्म हो; बिना कर्म के फल की उत्पत्ति कहीं नहीं होती।
॥ ५० ॥
अहं ब्रह्मेति विज्ञानात्कल्पकोटिशतार्जितम्।
संचितं विलयं याति प्रबोधात्स्वप्नकर्मवत्॥ ५०॥
अर्थ:
“मैं ब्रह्म हूँ” इस ज्ञान से करोड़ों कल्पों में संचित कर्म उसी प्रकार नष्ट हो जाते हैं जैसे जागने पर स्वप्न में किए हुए कर्म समाप्त हो जाते हैं।
॥ ५१ ॥
स्वमसङ्गमुदासीनं परिज्ञाय नभो यथा।
न श्लिष्यते यतिः किंचित्कदाचिद्भाविकर्मभिः॥ ५१॥
अर्थ:
जिस प्रकार आकाश असंग और उदासीन है, उसी प्रकार अपने आत्मस्वरूप को असंग जान लेने वाला संन्यासी भविष्य में होने वाले कर्मों से कभी लिप्त नहीं होता।
॥ ५२ ॥
न नभो घटयोगेन सुरागन्धेन लिप्यते।
तथात्मोपाधियोगेन तद्धर्मे नैव लिप्यते॥ ५२॥
अर्थ:
जिस प्रकार घट के सम्पर्क में आने पर आकाश घट के गुणों से लिप्त नहीं होता और मदिरा के पात्र के पास रहने से उसमें मदिरा की गन्ध वास्तविक रूप से नहीं लगती, उसी प्रकार आत्मा शरीर आदि उपाधियों के सम्पर्क में रहने पर भी उनके गुणों से लिप्त नहीं होती।
॥ ५३ ॥
ज्ञानोदयात्पुरारब्धं कर्म ज्ञानान्न नश्यति।
अदत्त्वा स्वफलं लक्ष्यमुद्दिश्योत्सृष्टबाणवत्॥ ५३॥
अर्थ:
ज्ञान उत्पन्न होने से पहले जो प्रारब्ध कर्म आरम्भ हो चुका है, वह अपना फल दिए बिना नष्ट नहीं होता—जैसे लक्ष्य की ओर छोड़ा हुआ बाण लक्ष्य तक पहुँचे बिना रुकता नहीं।
॥ ५४ ॥
व्याघ्रबुद्ध्या विनिर्मुक्तो बाणः पश्चात्तु गोमतौ।
न तिष्ठति भिनत्त्येव लक्ष्यं वेगेन निर्भरम्॥ ५४॥
अर्थ:
यदि किसी ने बाघ समझकर बाण चला दिया, पर बाद में पता चला कि वह गाय थी, तब भी छोड़ा हुआ बाण रुकता नहीं; वह अपनी गति से लक्ष्य को भेदता ही है। इसी प्रकार ज्ञान हो जाने पर भी पहले से आरम्भ प्रारब्ध अपना फल देता है।
॥ ५५ ॥
अजरोऽस्म्यमरोऽस्मीति य आत्मानं प्रपद्यते।
तदात्मना तिष्ठतोऽस्य कुतः प्रारब्धकल्पना॥ ५५॥
अर्थ:
जो साधक जानता है—“मैं अजर हूँ, मैं अमर हूँ”—और उसी आत्मस्वरूप में स्थित रहता है, उसके लिए प्रारब्ध की कल्पना कहाँ रह जाती है?
॥ ५६ ॥
प्रारब्धं सिद्ध्यति तदा यदा देहात्मना स्थितिः।
देहात्मभावो नैवेष्टः प्रारब्धं त्यज्यतामतः॥ ५६॥
अर्थ:
प्रारब्ध तभी सार्थक माना जाता है जब मनुष्य स्वयं को शरीर मानकर स्थित हो। जब देहात्मबुद्धि ही स्वीकार नहीं की जाती, तब प्रारब्ध का भी त्याग कर देना चाहिए।
॥ ५७ ॥
प्रारब्धकल्पनाप्यस्य देहस्य भ्रान्तिरेव हि॥ ५७॥
अर्थ:
इस देह के लिए प्रारब्ध की कल्पना भी वास्तव में देह के विषय में उत्पन्न हुई भ्रान्ति पर ही आधारित है।
॥ ५८ ॥
अध्यस्तस्य कुतस्तत्त्वमसत्यस्य कुतो जनिः।
अजातस्य कुतो नाशः प्रारब्धमसतः कुतः॥ ५८॥
अर्थ:
जो वस्तु केवल अध्यारोपित है, उसका वास्तविक तत्त्व कहाँ से होगा? जो असत्य है, उसकी उत्पत्ति कैसी? जो कभी उत्पन्न ही नहीं हुआ, उसका नाश कैसा? और जो असत् है, उसका प्रारब्ध कहाँ से होगा?
॥ ५९ ॥
ज्ञानेनाज्ञानकार्यस्य समूलस्य लयो यदि।
तिष्ठत्ययं कथं देह इति शङ्कावतो जडान्।
समाधातुं बाह्यदृष्ट्या प्रारब्धं वदति श्रुतिः॥ ५९॥
अर्थ:
यदि ज्ञान से अज्ञान और उसके सम्पूर्ण कार्य का मूल सहित नाश हो जाता है, तो फिर यह शरीर कैसे दिखाई देता है—ऐसा प्रश्न करने वाले अज्ञानी लोगों की शंका का समाधान करने के लिए श्रुति बाहरी दृष्टि से प्रारब्ध की बात कहती है।
॥ ६० ॥
न तु देहादिसत्यत्वबोधनाय विपश्चिताम्।
परिपूर्णमनाद्यन्तमप्रमेयमविक्रियम्॥ ६०॥
अर्थ:
लेकिन ज्ञानी पुरुषों को शरीर आदि को वास्तविक सिद्ध करने के लिए प्रारब्ध नहीं कहा गया है। आत्मा तो आदि-अन्त से रहित, पूर्ण, अप्रमेय और निर्विकार है।
॥ ६१ ॥
सद्घनं चिद्घनं नित्यमानन्दघनमव्ययम्।
प्रत्यगेकरसं पूर्णमनन्तं सर्वतोमुखम्॥ ६१॥
अर्थ:
वह आत्मा सत्स्वरूप का घन, चैतन्य का घन और नित्य आनन्द का घन है। वह अविनाशी, भीतर एकरस, पूर्ण, अनन्त और सर्वव्यापक है।
॥ ६२ ॥
अहेयमनुपादेयमनाधेयमनाश्रयम्
निर्गुणं निष्क्रियं सूक्ष्मं निर्विकल्पं निरञ्जनम्॥ ६२॥
अर्थ:
आत्मा न त्यागने योग्य है, न ग्रहण करने योग्य; उसे किसी आधार पर रखा नहीं जा सकता और न वह किसी दूसरे के आश्रित है। वह निर्गुण, निष्क्रिय, सूक्ष्म, निर्विकल्प और निर्मल है।
॥ ६३ ॥
अनिरूप्यस्वरूपं यन्मनोवाचामगोचरम्।
सत्समृद्धं स्वतःसिद्धं शुद्धं बुद्धमनोदृशम्॥ ६३॥
अर्थ:
जिसका वास्तविक स्वरूप शब्दों और मन से परे है, वही आत्मा सत्य से पूर्ण, स्वयं सिद्ध, शुद्ध और बुद्धि से भी सूक्ष्म रूप में प्रकाशित होने वाला है।
॥ ६४ ॥
स्वानुभूत्या स्वयं ज्ञात्वा स्वमात्मानमखण्डितम्।
स सिद्धः सुसुखं तिष्ठ निर्विकल्पात्मनात्मनि॥ ६४॥
अर्थ:
अपने अखण्ड आत्मस्वरूप को स्वयं के अनुभव से जानकर साधक सिद्ध हो जाता है। फिर वह निर्विकल्प आत्मस्वरूप में परम सुखपूर्वक स्थित रहता है।
॥ ६५ ॥
क्व गतं केन वा नीतं कुत्र लीनमिदं जगत्।
अधुनैव मया दृष्टं नास्ति किं महदद्भुतम्॥ ६५॥
अर्थ:
यह जगत कहाँ चला गया? किसके द्वारा ले जाया गया? कहाँ विलीन हो गया? अभी तो मैंने इसे देखा था!—ज्ञान प्राप्त होने पर ऐसा आश्चर्य होता है कि जो संसार पहले इतना वास्तविक दिखाई देता था, उसका स्वतंत्र अस्तित्व ही नहीं मिलता।
॥ ६६ ॥
किं हेयं किमुपादेयं किमन्यत्किं विलक्षणम्।
अखण्डानन्दपीयूषपूर्णब्रह्ममहार्णवे॥ ६६॥
अर्थ:
अखण्ड आनन्द के अमृत से परिपूर्ण ब्रह्मरूपी महासागर में फिर क्या त्यागने योग्य है? क्या ग्रहण करने योग्य है? क्या कोई दूसरी वस्तु है? और क्या उससे भिन्न कुछ है?
॥ ६७ ॥
न किंचिदत्र पश्यामि न शृणोमि न वेद्म्यहम्।
स्वात्मनैव सदानन्दरूपेणास्मि स्वलक्षणः॥ ६७॥
अर्थ:
मैं यहाँ कुछ भी अलग नहीं देखता, कुछ अलग नहीं सुनता और कुछ अलग नहीं जानता। मैं अपने आत्मस्वरूप में ही स्थित हूँ और मेरा अपना स्वरूप सदा आनन्दमय है।
॥ ६८ ॥
असङ्गोऽहमनङ्गोऽहमलिङ्गोऽहं हरिः।
प्रशान्तोऽहमनन्तोऽहं परिपूर्णश्चिरन्तनः॥ ६८॥
अर्थ:
मैं असंग हूँ, शरीररहित हूँ, किसी चिह्न या लक्षण से बँधा हुआ नहीं हूँ; मैं हरि हूँ। मैं पूर्णतः शान्त, अनन्त, परिपूर्ण और सनातन हूँ।
॥ ६९ ॥
अकर्ताहमभोक्ताहमविकारोऽहमव्ययः।
शुद्ध बोधस्वरूपोऽहं केवलोऽहं सदाशिवः॥ ६९॥
अर्थ:
मैं कर्ता नहीं हूँ, भोक्ता नहीं हूँ। मैं विकाररहित और अविनाशी हूँ। मैं शुद्ध ज्ञानस्वरूप हूँ। मैं एकमात्र, अद्वितीय सदाशिव हूँ।
॥ उपसंहार ॥
एतां विद्यामपान्तरतमाय ददौ।
अपान्तरतमो ब्रह्मणे ददौ।
ब्रह्मा घोराङ्गिरसे ददौ।
घोराङ्गिरा रैक्वाय ददौ।
रैक्वो रामाय ददौ।
रामः सर्वेभ्यो भूतेभ्यो ददावित्येतन्निर्वाणानुशासनं
वेदानुशासनं वेदानुशासनमित्युपनिषत्॥
अर्थ:
इस ब्रह्मविद्या को अपान्तरतमा ने प्राप्त किया और ब्रह्मा को प्रदान किया। ब्रह्मा ने घोराङ्गिरस को, घोराङ्गिरस ने रैक्व को, रैक्व ने राम को और राम ने इसे समस्त प्राणियों के कल्याण के लिए प्रदान किया। यही निर्वाण का अनुशासन और वेदों का उपदेश है—ऐसा उपनिषद् कहता है।
॥ शान्तिपाठ ॥
ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः।
हरिः ॐ तत्सत्॥
इति अध्यात्मोपनिषत्समाप्ता॥
----×--------×-------×---------
Comments
Post a Comment