(66) शारीरिकोपनिषद

शारीरिकोपनिषद--- शारीरकोपनिषद कृष्ण यजुर्वेद का छोटा पर बहुत महत्वपूर्ण उपनिषद है। इसे शरीर-विज्ञान का उपनिषद कहते हैं - इसमें शरीर, इंद्रियाँ, गुण और अवस्थाओं का वर्णन है।
ये इसका पूरा मूल पाठ है:
मंगलाचरण
तत्त्वग्रामोपायसिद्धं परतत्त्वस्वरूपकम्।
शारीरोपनिषद्वेद्यं श्रीरामब्रह्म मे गतिः॥
ॐ सह नाववतु। सह नौ भुनक्तु। सह वीर्यं करवावहै।
तेजस्वि नावधीतमस्तु मा विद्विषावहै। ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥
अर्थ: जो तत्त्व-समूह के उपाय से सिद्ध होने वाला परम-तत्त्व स्वरूप है, जो शारीर उपनिषद से जानने योग्य है, वही श्रीराम रूपी ब्रह्म मेरी गति है।
मूल पाठ
1. शरीर की उत्पत्ति
ॐ अथातः पृथिव्यादिमहाभूतानां समवायं शरीरम्। यत्कठिनं सा पृथिवी यद्द्रवं तदापो यदुष्णं तत्तेजो यत्संचरति स वायुर्यत्सुषिरं तदाकाशम्॥
अर्थ: शरीर पृथ्वी आदि पाँच महाभूतों का समवाय (मिलाप) है। शरीर में जो कठिन है वह पृथ्वी है, जो द्रव है वह जल है, जो उष्ण है वह तेज है, जो संचार करता है वह वायु है, जो छिद्र/खाली जगह है वह आकाश है। 
2. ज्ञानेन्द्रियाँ
श्रोत्रादीनि ज्ञानेन्द्रियाणि। श्रोत्रमाकाशे वायौ त्वगग्नौ चक्षुरप्सु जिह्वा पृथिव्यां घ्राणमिति। एवमिन्द्रियाणां यथाक्रमेण शब्दस्पर्शरूपरसगन्धाश्चैते विषयाः॥
अर्थ: श्रोत्र आदि ज्ञानेन्द्रियाँ हैं। श्रोत्र आकाश में, त्वचा वायु में, चक्षु अग्नि में, जिह्वा जल में, घ्राण पृथ्वी में स्थित है। क्रमशः इनके विषय शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध हैं।
3. कर्मेन्द्रियाँ
वाक्पाणिपादपायूपस्थाख्यानि कर्मेन्द्रियाणि। तेषां क्रमेण वचनादानगमनविसर्गानन्दश्चैते विषयाः॥
अर्थ: वाणी, हाथ, पैर, गुदा, उपस्थ ये पाँच कर्मेन्द्रियाँ हैं। इनके विषय क्रमशः बोलना, पकड़ना, चलना, मल-त्याग और आनंद हैं।
4. अन्तःकरण
मनोबुद्धिरहङ्कारश्चित्तमित्यन्तःकरणचतुष्टयम्। तेषां क्रमेण सङ्कल्पविकल्पाध्यवसायाभिमानावधारणास्वरूपश्चैते विषयाः। मनःस्थानं गलान्तं बुद्धेर्वदनमहङ्कारस्य हृदयं चित्तस्य नाभिरिति॥
अर्थ: मन, बुद्धि, अहंकार और चित्त ये चार अन्तःकरण हैं। इनके विषय क्रमशः संकल्प-विकल्प, निश्चय, अभिमान और धारणा हैं। मन का स्थान गले का अंत, बुद्धि का मुख, अहंकार का हृदय और चित्त का नाभि है। 
5. पंचभूतों का शरीर में विभाग
अस्थिचर्मनाडीरोममांसाश्चेति पृथिव्यंशाः। मूत्रश्लेष्मरक्तशुक्रस्वेदा अबंशाः। क्षुत्तृष्णालस्यमोहमैथुनान्यग्नेः। प्रचारणविलेखनस्थूलाक्ष्युन्मेषनिमेषादि वायोः। कामक्रोधलोभमोहभयान्याकाशस्य॥
अर्थ: अस्थि, चर्म, नाड़ी, रोम, मांस - ये पृथ्वी के अंश हैं। मूत्र, कफ, रक्त, वीर्य, पसीना - जल के अंश। भूख, प्यास, आलस्य, मोह, मैथुन - अग्नि के। चलना, खुजलाना, आँख खोलना-बंद करना - वायु के। काम, क्रोध, लोभ, मोह, भय - आकाश के।
6. गुण-विभाग
अहिंसा सत्यमस्तेयब्रह्मचर्यापरिग्रहाः। अक्रोधो गुरुशुश्रूषा शौचं सन्तोष आर्जवम्॥१॥
अमानित्वमदम्भित्वमास्तिकत्वमहिंस्रता। एते सर्वे गुणा ज्ञेयाः सात्त्विकस्य विशेषतः॥२॥
अहं कर्ताऽस्म्यहं भोक्ताऽस्म्यहं वक्ताऽभिमानवान्। एते गुणा राजसस्य प्रोच्यन्ते ब्रह्मवित्तमैः॥३॥
निद्रालस्ये मोहरागौ मैथुनं चौर्यमेव च। एते गुणास्तामसस्य प्रोच्यन्ते ब्रह्मवादिभिः॥४॥
अर्थ: अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह, अक्रोध, गुरु-सेवा, शौच, संतोष, सरलता, निरभिमानता, आडंबरहीनता, आस्तिकता - ये सात्विक गुण हैं। मैं कर्ता हूँ, मैं भोक्ता हूँ, मैं वक्ता हूँ - यह अभिमान राजस है। निद्रा, आलस्य, मोह, राग, मैथुन, चोरी - ये तामस गुण हैं। 
7. चार अवस्थाएँ
जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तितुरीयमिति चतुर्विधा अवस्थाः। ज्ञानेन्द्रियकर्मेन्द्रियान्तःकरणचतुष्टयं चतुर्दशकरणयुक्तं जाग्रत्। अन्तःकरणचतुष्टयैरेव संयुक्तः स्वप्नः। चित्तैककरणा सुषुप्तिः। केवलजीवयुक्तमेव तुरीयमिति॥
अर्थ: जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति, तुरीय - चार अवस्थाएँ हैं। 10 इंद्रियों + 4 अन्तःकरण = 14 करणों से युक्त जाग्रत है। केवल 4 अन्तःकरण से स्वप्न है। केवल चित्त वाली सुषुप्ति है और केवल जीव से युक्त तुरीय है।
आगे उपनिषद में 96 तत्वों का सूक्ष्म शरीर, 4 पीठ (जाग्रत में ब्रह्मा, स्वप्न में विष्णु, सुषुप्ति में रुद्र, तुरीय में परमात्मा) और जीवात्मा को नाविक के रूप में वर्णन कर अंत में कहता है - जीव ही ब्रह्म है, इसे जानकर मुक्त हो जाता है।
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