(65) महा उपनिषद
महा उपनिषद --
महा / महत् उपनिषद बहुत बड़ा है - 6 अध्याय, 549 श्लोकहै। इसका सार =-
1. शांति पाठ - शुरुआत
ॐ आप्यायन्तु मामङ्गानि वाक्प्राणश्चक्षुः श्रोत्रमथो बलमिन्द्रियाणि च।
सर्वाणि सर्वं ब्रह्मोपनिषदं माहं ब्रह्म निराकुर्यां मा मा ब्रह्म निराकरोदनिराकरणमस्त्वनिराकरणं मेस्तु।
तदात्मनि निरते य उपनिषत्सु धर्मास्ते मयि सन्तु ते मयि सन्तु॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥
अर्थ: मेरे अंग, वाणी, प्राण, आँख, कान और सभी इंद्रियाँ पुष्ट हों। सब कुछ ब्रह्ममय है, उपनिषदों में बताया गया ब्रह्म। मैं ब्रह्म का त्याग न करूँ, ब्रह्म मेरा त्याग न करे। जो धर्म उपनिषदों में हैं, वे मुझमें स्थित हों।
2. सृष्टि का आरंभ - प्रथम अध्याय
तदाहुरेको ह वै नारायण आसीन्न ब्रह्मा नेशानो नापो नाग्नीषोमौ नेमे द्यावापृथिवी न नक्षत्राणि न सूर्यो न चन्द्रमाः। स एकाकी न रमते।
अर्थ: कहते हैं, प्रारंभ में केवल नारायण ही थे। न ब्रह्मा थे, न शिव, न जल, न अग्नि-सोम, न आकाश-पृथ्वी, न नक्षत्र, न सूर्य, न चंद्रमा। वे अकेले रमण नहीं कर पाए।
उनके ध्यान से 14 पुरुष (ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र आदि), एक कन्या (मूल प्रकृति), 10 इंद्रियाँ, मन, तेज, अहंकार, प्राण, आत्मा, बुद्धि और पंचमहाभूत उत्पन्न हुए। फिर उनके ललाट से त्र्यक्ष शूलपाणी शिव और फिर हिरण्यमय अंड से चतुर्मुख ब्रह्मा की उत्पत्ति हुई।
हृदयं चाप्यधोमुखं... तस्याः शिखाया मध्ये परमात्मा व्यवस्थिता। स ब्रह्मा स ईशानः सेन्द्रः सोऽक्षरः परमः स्वराडिति। अर्थ: हृदय कमल की कली के समान नीचे मुख किए लटका है। उसके बीच में अग्नि-शिखा है, उसी शिखा के मध्य में परमात्मा स्थित है। वही ब्रह्मा है, वही ईशान (शिव) है, वही इंद्र है, वही अक्षर, परम और स्वराट् है।
3. जीवन्मुक्त का लक्षण - द्वितीय अध्याय (शुक-जनक संवाद)
पदार्थभावनादार्ढ्यं बन्ध इत्यभिधीयते। वासनातानवं ब्रह्मन्मोक्ष इत्यभिधीयते॥
अर्थ: पदार्थों (संसार) में दृढ़ भावना ही बंधन है। वासना का क्षीण हो जाना ही, हे ब्रह्मन्, मोक्ष कहलाता है।
तपः प्रभृतिना यस्मै हेतुनैव विना पुनः। भोगा इह न रोचन्ते स जीवन्मुक्त उच्यते॥
अर्थ: जिसे बिना किसी बाहरी कारण के, तप आदि के प्रभाव से इस संसार के भोग नहीं रुचते, वही जीवन्मुक्त कहलाता है।
जीवन्मुक्त वह है जो सुख-दुख आने पर हर्ष-शोक नहीं करता, अहंकार-लीला छोड़ देता है, भीतर से पूर्ण और बाहर से सुषुप्त जैसा आचरण करता है।
4. वैराग्य का मूल - तृतीय अध्याय (निदाघ-ऋभु संवाद)
चित्तं कारणमर्थानां तस्मिन्सति जगत्त्रयम्। तस्मिन्क्षीणे जगत्क्षीणं तच्चिकित्स्यं प्रयत्नतः॥
अर्थ: चित्त ही सभी पदार्थों का कारण है। चित्त के होने पर तीनों जगत हैं, चित्त के क्षीण होने पर जगत क्षीण हो जाता है, इसलिए प्रयत्नपूर्वक चित्त की ही चिकित्सा करनी चाहिए।
5. सबसे प्रसिद्ध श्लोक - षष्ठ अध्याय
अयं बन्धुरयं नेति गणना लघुचेतसाम्।
उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्॥ ६-७१॥
अर्थ: यह मेरा बंधु है और यह नहीं है - ऐसी गणना छोटे दिल वाले लोग करते हैं। उदार चरित्र वालों के लिए तो पूरी पृथ्वी ही परिवार है।
यह वाक्य भारत के संसद भवन और G20 में भी लिखा गया है।
6. अंतिम उपदेश
स्वसंकल्पवशाद्बद्धो निःसंकल्पाद्विमुच्यते।
अर्थ: मनुष्य अपने ही संकल्प (कल्पना) से बंधा है, और संकल्प-रहित होने से मुक्त हो जाता है।
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