(61) वासुदेवोपनिषद

वासुदेवोपनषद--
ये रहा वासुदेवोपनिषद् का मूल पाठ अर्थ सहित - सामवेदीय वैष्णव उपनिषद्। ये नारद और भगवान वासुदेव के संवाद रूप में है।
1. मंगलाचरण
यत्सर्वहृदयागारं यत्र सर्वं प्रतिष्ठितम्।
वस्तुतो यन्निराधारं वासुदेवपदं भजे॥  
अर्थ: जो सबके हृदय रूपी घर में रहने वाला है, जिसमें सब कुछ प्रतिष्ठित है, पर वास्तव में जो स्वयं निराधार है, उस वासुदेव पद का मैं भजन करता हूँ।
2. शान्तिपाठ
ॐ आप्यायन्तु ममाङ्गानि वाक्प्राणश्चक्षुः श्रोत्रमथो बलमिन्द्रियाणि च।
सर्वाणि सर्वं ब्रह्मोपनिषदं माहं ब्रह्म निराकुर्यां मा मा ब्रह्म निराकरोत्।
अनिराकरणमस्त्वनिराकरणं मे अस्तु तदात्मनि निरते य उपनिषत्सु धर्मास्ते मयि सन्तु ते मयि सन्तु॥
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥  
अर्थ: हे ब्रह्म! मेरे अंग, वाणी, प्राण, नेत्र, कान, सभी इन्द्रियाँ और बल पुष्ट हों। उपनिषदों में कहा गया सर्व-स्वरूप ब्रह्म का मैं त्याग न करूँ, ब्रह्म मेरा त्याग न करे। हमारा संबंध अटूट रहे। उपनिषदों में जो धर्म परमात्मा में निरत रहने वाले के लिये कहे हैं, वे मुझमें रहें।
3. प्रश्न - नारद जी द्वारा ऊर्ध्वपुण्ड्र विधि की जिज्ञासा
ॐ नमस्कृत्य भगवान्नारदः सर्वेश्वरं वासुदेवं पप्रच्छ - अधीहि भगवन् ऊर्ध्वपुण्ड्रविधिं द्रव्यमन्त्रस्थानादिसहितं मे ब्रूहीति।  
अर्थ: भगवान नारद ने सर्वेश्वर वासुदेव को नमस्कार करके पूछा - हे भगवन्! द्रव्य, मंत्र, स्थान आदि सहित ऊर्ध्वपुण्ड्र धारण करने की विधि मुझे बताइये।
4. उत्तर - गोपीचंदन का महात्म्य
तं होवाच भगवान् वासुदेवो वैकुण्ठस्थानादुत्पन्नं मम प्रीतिकरं... विष्णुचन्दनं ममाङ्गे प्रतिदिनमालिप्तं गोपीभिः प्रक्षालनाद् गोपीचन्दनमाख्यातं... चक्रतीर्थान्तःस्थितं चक्रसमायुक्तं पीतवर्णं मुक्तिसाधनं भवति।  
अर्थ: भगवान वासुदेव बोले - वैकुण्ठ में उत्पन्न, मुझे प्रिय, ब्रह्मादि भक्तों द्वारा धारित, मेरे अंग पर गोपियों द्वारा रोज लगाया जाने वाला विष्णु-चन्दन, गोपियों द्वारा धोने से गोपीचंदन कहलाया। मेरे अंग का यह पवित्र लेप चक्रतीर्थ में स्थित, चक्र से अंकित, पीत वर्ण का है और मुक्ति का साधन है।
5. धारण मंत्र
गोपीचंदन को हाथ में लेकर:
गोपीचन्दन पापघ्न विष्णुदेहसमुद्भव।
चक्राङ्कित नमस्तुभ्यं धारणान्मुक्तिदो भव॥  
अर्थ: हे विष्णु देह से उत्पन्न, पापों को नष्ट करने वाले, चक्र से अंकित गोपीचंदन! तुम्हें नमस्कार है, धारण करने से मुक्ति देने वाले बनो।
फिर इमं मे गंगे (ऋग्वेद 10.75.5) मंत्र से जल लेकर विष्णोर्नुकं (ऋग्वेद 1.154.1) से घिसे, और इन मंत्रों से अभिमंत्रित करे:
अतो देवा अवन्तु नो यतो विष्णुर्विचक्रमे... तद्विष्णोः परमं पदं सदा पश्यन्ति सूरयः...  
साथ में वैष्णव गायत्री - नारायणाय विद्महे वासुदेवाय धीमहि तन्नो विष्णुः प्रचोदयात् या केशव आदि 12 नामों से।
6. कहाँ और कैसे लगायें ?
ब्रह्मचारी वानप्रस्थो वा ललाटहृदयकण्ठबाहुमूलेषु... शङ्खचक्रगदापाणे द्वारकानिलयाच्युत। गोविन्द पुण्डरीकाक्ष रक्ष मां शरणागतम्।  ब्रह्मचारी गृहस्थो वा ललाटादिद्वादशस्थलेषु अनामिकाङ्गुल्या... यतिस्तर्जन्या शिरोललाटहृदयेषु प्रणवेनैव धारयेत्।  
अर्थ:
ब्रह्मचारी/वानप्रस्थ: ललाट, हृदय, कंठ, बाहुमूल पर। • गृहस्थ: 12 स्थानों पर - ललाट, उदर, हृदय, कंठ, दोनों भुजाएँ, दोनों पार्श्व, दोनों कान, पीठ, गर्दन के पीछे, मस्तक - अनामिका उंगली से। • संन्यासी/यति: सिर, ललाट, हृदय पर तर्जनी से ॐ कार के साथ। 
ध्यान श्लोक का अर्थ - हे शंख-चक्र-गदा धारी, द्वारका निवासी, अच्युत, कमलनयन गोविन्द! शरण में आये हुए मेरी रक्षा करो।
7. ऊर्ध्वपुण्ड्र का तत्व-रहस्य
ब्रह्मादयस्त्रयो मूर्तयस्तिस्रो व्याहृतयस्त्रीणि छन्दांसि त्रयोऽग्नयः... तिस्रोऽवस्थास्त्रय आत्मानः पुण्ड्रत्रय ऊर्ध्वा अकार उकारो मकार एते प्रणवमय ऊर्ध्वपुण्ड्रास्तदात्मा...  
अर्थ: तीन रेखाएँ - त्रिमूर्ति (ब्रह्मा-विष्णु-शिव), तीन व्याहृति (भूः भुवः स्वः), तीन छन्द, तीन वेद, तीन अग्नि, तीन काल, तीन अवस्था (जागृत-स्वप्न-सुषुप्ति), तीन आत्मा, और ॐ के तीन अक्षर अ-उ-म - ये सब प्रणवमय ऊर्ध्वपुण्ड्र में समाये हैं।
8. योग और ध्यान
ऊर्ध्वदण्डोर्ध्वरेताश्च ऊर्ध्वपुण्ड्रोर्ध्वयोगवान्। ऊर्ध्वं पदमवाप्नोति यतिरूर्ध्वचतुष्कवान्।  
​ब्रह्मरन्ध्रे भ्रुवोर्मध्ये हृदये चिद्रविं हरिम्। गोपीचन्दनमालिप्य तत्र ध्यात्वाप्नुयात्परम्।  
अर्थ: ऊर्ध्वदण्ड, ऊर्ध्वरेता, ऊर्ध्वपुण्ड्र, ऊर्ध्वयोग - इन चार ऊर्ध्व गुणों वाला यति मोक्ष पाता है। ब्रह्मरन्ध्र, भौंहों के मध्य और हृदय में चेतना-रूपी सूर्य समान हरि का गोपीचंदन लगाकर ध्यान करने से परम तत्व मिलता है।
आगे कहा -
तैलं तिलेषु काष्ठेषु वह्निः क्षीरे घृतं यथा। गन्धः पुष्पेषु भूतेषु तथात्मावस्थितो ह्यहम्।  
जैसे तिल में तेल, लकड़ी में अग्नि, दूध में घी, फूल में सुगंध है, वैसे ही मैं सब भूतों में आत्मा रूप से स्थित हूँ।
9. फलश्रुति
यस्त्वधीते वा स सर्वपातकेभ्यः पूतो भवति... स सर्वेषु तीर्थेषु स्नातो भवति... न च पुनरावर्तते न च पुनरावर्तते इत्याह भगवान् वासुदेवः।  
अर्थ: जो इसका अध्ययन करता है वह सब पापों से पवित्र होता है, उसे पाप-बुद्धि नहीं आती, सभी तीर्थों में स्नान, सभी यज्ञों का फल, सभी देवों द्वारा पूज्य होता है, उसे श्री नारायण में अचल भक्ति और विष्णु-सायुज्य प्राप्त होता है और उसका पुनर्जन्म नहीं होता - ऐसा भगवान वासुदेव ने कहा।
यस्त्वेतदधीते सोऽप्येवमेव भवतीत्योँ सत्यमित्युपनिषत्॥  
यह सत्य है - यह उपनिषद है।
------×------×------×-------×---

Comments

Popular posts from this blog

डा० सूर्य पाल सिंह का उत्कृष्ट व्यक्तित्व

---प्राणायाम से दिव्य शक्ति की प्राप्ति---

ऋगुवेद सूक्ति--(53) की व्याख्या