(62) मुद्गल उपनिषद
मुद्गल उपनिषद-=
इसका पहला अध्याय पूरा का पूरा पुरुष-सूक्त के अर्थ का निर्णय है। मूल में इसे ऐसा कहा गया है:
ॐ अथ पुरुषसूक्तार्थनिर्णयं व्याख्यास्यामः।
यानी अब हम पुरुष-सूक्त के अर्थ का निर्णय करके व्याख्या करेंगे।
उपनिषद में पहले 9 मंत्र ही मूल माने गए हैं, बाकी 7 को बाद का जोड़ा माना गया है। वही 9 मंत्र ही प्रथम अध्याय का मूल पाठ हैं।
प्रथम अध्याय - मूल पाठ और हिंदी अर्थ
श्लोक 1
सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात्।
स भूमिं विश्वतो वृत्वा अत्यतिष्ठद्दशाङ्गुलम्।
अर्थ: वह परम पुरुष हजारों सिरों वाला, हजारों आँखों वाला, हजारों पैरों वाला है। 'सहस्र' का अर्थ यहाँ अनंत है। वह पूरी पृथ्वी को चारों ओर से घेर कर भी उससे दस अंगुल ऊपर स्थित है, और 'दशांगुल' का अर्थ भी अनंत दूरी है। इस मंत्र से विष्णु की देश-व्याप्ति - अर्थात वह हर स्थान में व्याप्त है, यह बताया गया है।
श्लोक 2
पुरुष एवेदं सर्वं यद्भूतं यच्च भव्यम्।
उतामृतत्वस्येशानो यदन्नेनातिरोहति।
अर्थ: जो कुछ हो चुका है और जो आगे होने वाला है, वह सब यही पुरुष ही है। और जो अन्न से - अर्थात कर्म और भोग से - बढ़ता है, उस अमरत्व का भी स्वामी यही है। इस मंत्र से उसकी काल-व्याप्ति बताई गई है - वह भूत, वर्तमान, भविष्य तीनों है।
श्लोक 3
एतावानस्य महिमातो ज्यायाँश्च पूरुषः।
पादोऽस्य विश्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि।
अर्थ: इतनी बड़ी है इस पुरुष की महिमा, पर पुरुष इससे भी बड़ा है। सारे प्राणी इस पुरुष का एक पाद - एक चौथाई हैं, और इसके तीन पाद अमर होकर स्वर्ग में स्थित हैं। यह मंत्र विष्णु की मोक्ष देने की शक्ति और उसकी चार-रूपता को बताता है।
श्लोक 4
त्रिपादूर्ध्व उदैत्पुरुषः पादोऽस्येहाभवत्पुनः।
ततो विष्वङ् व्यक्रामत् साशनानशने अभि।
अर्थ: तीन पादों वाला पुरुष ऊपर उठा हुआ है, उसका एक पाद ही बार-बार इस जगत में उत्पन्न होता है। फिर वह खाने वाले और न खाने वाले - चेतन और जड़ - दोनों में व्याप्त हो गया। यह अनिरुद्ध नामक नारायण की महिमा है, जो इस जगत में आता है।
श्लोक 5
तस्माद्विराडजायत विराजो अधि पूरुषः।
स जातो अत्यरिच्यत पश्चाद्भूमिमथो पुरः।
अर्थ: उसी से विराट पैदा हुआ, और विराट से वह पुरुष पैदा हुआ। वह जन्म लेकर भूमि के पीछे और आगे - सब जगह फैल गया। मुद्गल उपनिषद कहता है इससे हरि के चौथाई अंश से प्रकृति और पुरुष (विराट और ब्रह्मा) की उत्पत्ति दिखाई गई है।
श्लोक 6
यत्पुरुषेण हविषा देवा यज्ञमतन्वत।
वसन्तो अस्यासीदाज्यं ग्रीष्म इध्मः शरद्धविः।
अर्थ: जब देवताओं ने पुरुष को ही हवि बनाकर यज्ञ किया, तब वसंत ऋतु घी बना, ग्रीष्म ईंधन बना, शरद हवि बना। इस मंत्र से सृष्टि-यज्ञ और मोक्ष का उपाय बताया गया है।
श्लोक 7
तं यज्ञं बर्हिषि प्रौक्षन्पुरुषं जातमग्रतः।
तेन देवा अयजन्त साध्या ऋषयश्च ये।
अर्थ: उस यज्ञ में जो सबसे पहले उत्पन्न पुरुष था, उसको ही कुश पर छिड़क कर पवित्र किया। उसी से देवताओं, साध्यों और ऋषियों ने यजन किया।
श्लोक 8
तस्माद्यज्ञात्सर्वहुतः सम्भृतं पृषदाज्यम्।
पशूँस्ताँश्चक्रे वायव्यानारण्या ग्राम्याश्च ये।
अर्थ: उस सर्व-हुत यज्ञ से दही मिला घी उत्पन्न हुआ, और उसी से वायव्य, आरण्य और ग्राम्य पशुओं की रचना हुई। इससे जगत की रचना बताई गई है।
श्लोक 9
वेदाहमेतं पुरुषं महान्तमादित्यवर्णं तमसः परस्तात्।
तमेव विदित्वाति मृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय।
अर्थ: मैं उस महान पुरुष को जानता हूँ जो सूर्य के समान प्रकाशमान है और अंधकार से परे है। उसी को जानकर मनुष्य मृत्यु को पार कर जाता है, मोक्ष के लिए इसके अलावा और कोई मार्ग नहीं है। इससे हरि की महिमा और अंतिम मुक्ति कही गई है।
सार: इसीलिए उपनिषद अंत में कहता है - जो इस सृष्टि और मुक्ति के रहस्य को जान लेता है, वह पूर्ण जीवन जीता है और मुक्त हो जाता है।
अध्याय-2 गद्य में है और यह वासुदेव और इंद्र का संवाद है।
अध्याय 2 - मूल पाठ का सार
मूल संस्कृत इस प्रकार शुरू होता है:
अथ वासुदेवः इन्द्राय भगवज्ज्ञानं उपदिष्टवान्...
अर्थात अब वासुदेव ने इंद्र को भगवान के ज्ञान का उपदेश दिया।
पूरा अर्थ हिंदी में
1. पुरुष का अवतार क्यों हुआ?
मुद्गल उपनिषद में पुरुष सूक्त की महिमा विस्तार से कही गई है। ऊपर वर्णित वह पुरुष, जो नाम-रूप से परे है, जिसे संसारी लोग समझ नहीं सकते, उसने दुखी देवताओं और जीवों के उद्धार के लिए अपने उस अरूप स्वरूप को छोड़कर, हजार भागों वाला, दर्शन मात्र से मोक्ष देने वाला एक रूप धारण किया।
उस रूप में वह पूरी दुनिया में व्याप्त होकर भी उससे अनंत दूरी तक परे है। वही नारायण भूत, भविष्य और वर्तमान है। वही सबको मोक्ष देने वाला है। वह सबसे बड़े से भी बड़ा है, उससे बड़ा कोई नहीं।
2. सृष्टि कैसे बनी?
उसने अपने आप को चार भागों में बाँट लिया। तीन भागों से वह स्वर्ग में रहता है। और चौथे भाग से, जो अनिरुद्ध नारायण है, सारे लोक बने हैं।
इस अनिरुद्ध नारायण ने ही लोकों को बनाने के लिए प्रकृति को बनाया। यहाँ प्रकृति का अर्थ है चार मुख वाले ब्रह्मा। ब्रह्मा अपने पूरे रूप में सृष्टि का कार्य नहीं जानते थे, तब इस अनिरुद्ध नारायण ने ही उन्हें सृष्टि का ज्ञान दिया।
3. सृष्टि-यज्ञ की विधि - जो इस उपनिषद की सबसे गुप्त बात है
ब्रह्मा जी से कहा गया:
हे ब्रह्मन्! अपने इंद्रियों को यज्ञ मानकर ध्यान करो।
अपने इस पंचकोश वाले दृढ़ शरीर को आहुति मानो।
मुझे - अर्थात वासुदेव को - अग्नि मानो।
वसंत ऋतु को घी, ग्रीष्म को समिधा, शरद को छह रसों वाला भोजन मानकर, अग्नि में आहुति दो और शरीर का स्पर्श करो। इससे तुम्हारा शरीर वज्र के समान दृढ़ हो जाएगा।
तब उससे पशु आदि उत्पन्न होंगे, और उससे चर-अचर जगत वाला संसार पैदा होगा।
यह समझना चाहिए कि जीवात्मा और परमात्मा के मिलन का ही नाम मुक्ति है।
और अंत में कहा गया:
यः एवं सृष्टिं च मोक्षं च जानाति स दीर्घायुः भवति।
जो इस सृष्टि और मोक्ष के रहस्य को इस प्रकार जान लेता है, वह पूर्ण आयु जीता है।
अध्याय-2 का सार एक पंक्ति में: नारायण ही अपने चौथे हिस्से से जगत बन गया है और वही हर जीव के अंदर जीवात्मा बन कर बैठा है, दोनों को एक जान लेना ही मोक्ष है।
अब अध्याय-3 में बताया गया है कि लोग उसे अलग-अलग रूप में पूजते हैं - कोई अग्नि के रूप में, कोई विष के रूप में, कोई धन के रूप में - और वह उन्हें वही बन कर मिल जाता है।
मुद्गल उपनिषद - अध्याय 3
यह अध्याय बहुत सुंदर है। इसका मूल संस्कृत सूत्र है:
एको देवः बहुधा जातः, अजायमानो बहुधा जायते।
एक ही देवता बहुत रूपों में पैदा हुआ है, वह अजन्मा होकर भी बहुत रूपों में जन्म लेता है।
पूरा अर्थ:
1. सब उसी की पूजा है:
अध्वर्यु लोग उसे अग्नि के रूप में पूजते हैं, क्योंकि यजुर्वेद सबको जोड़ता है।
सामवेदी उसे सामगान के रूप में पूजते हैं, क्योंकि सब कुछ उसी में स्थित है।
2. हर साधक को वह वैसा ही मिलता है जैसी उसकी दृष्टि है:
सर्प वाले उसे विष के रूप में ध्यान करते हैं, सर्प-विद्या जानने वाले उसे सर्प के रूप में, देवता उसे शक्ति (ऊर्जा) के रूप में, मनुष्य उसे धन के रूप में,
असुर उसे जादू-माया के रूप में,
पितर उसे अन्न-भोजन के रूप में,
अतिमानव उसे अतिमानवीय शक्ति के रूप में, गंधर्व उसे सौंदर्य के रूप में,
अप्सराएँ उसे सुगंध के रूप में पूजती हैं।
3. इस अध्याय का सबसे बड़ा मंत्र:
स यथा यथोपासते तदेव भवति।
तस्मात् अहम् इति परमं ब्रह्म इति ध्यायेत्।
स भवति य एवं वेद।
अर्थ: वह जैसा-जैसा पूजा जाता है, वह वैसा ही बन जाता है। इसलिए साधक को यह ध्यान करना चाहिए कि **"मैं ही वह परम ब्रह्म हूँ"**। जो ऐसा जान लेता है, वह वही बन जाता है।
अध्याय-3 का सार:
ईश्वर एक है, पर हर व्यक्ति अपनी वासना और भावना के अनुसार उसे अलग-अलग देखता है। अगर तुम उसे धन समझोगे तो वह धन बन कर मिलेगा, सौंदर्य समझोगे तो सौंदर्य बन कर। इसलिए सबसे ऊँची पूजा है - अपने आप को ही वह ब्रह्म मान लेना।
अगला अध्याय-4 अंतिम और सबसे व्यावहारिक अध्याय है, जिसमें 6 शत्रु, 6 तरंगें, 6 भ्रम बताए गए हैं।
अगला अध्याय-4 अंतिम और सबसे व्यावहारिक अध्याय है, जिसमें 6 शत्रु, 6 तरंगें, 6 भ्रम बताए गए हैं। दूँ?
मुद्गल उपनिषद - अध्याय 4 - अंतिम अध्याय
यह अध्याय आत्म-ज्ञान में बाधा क्या है और जीव ब्रह्म कैसे बनता है इस पर है।
मूल संस्कृत सूत्र:
त्रिविधदुःखातीतं, षडूर्मिरहितं, पंचकोशातीतं, षड्भावविकाररहितं ब्रह्म।
तीन दुखों से परे, छह तरंगों से रहित, पांच कोशों से परे, छह विकारों से रहित ही ब्रह्म है।
1. तीन प्रकार के दुःख - तापत्रय
जिनसे ब्रह्म परे है:
• आध्यात्मिक: शरीर के रोग, मन के रोग • आधिभौतिक: चोर, जंगली जानवर, दूसरे लोगों से मिलने वाला दुःख • आधिदैविक: बाढ़, वर्षा, तूफान, ग्रह-दोष से मिलने वाला दुःख
ये तीनों ही कर्ता-कर्म-क्रिया, ज्ञाता-ज्ञान-ज्ञेय, और भोक्ता-भोग-भोग्य में बंधे हैं।
2. छह परतें और छह शत्रु
• छह परतें (त्वक्): त्वचा, मांस, रक्त, हड्डी, नस, मज्जा - यह शरीर की बनावट है। • छह शत्रु: काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर्य (ईर्ष्या) • पांच कोश: अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय, आनंदमय • छह विकार: होना, जन्म लेना, बढ़ना, बदलना, घटना, नष्ट होना
3. छह तरंगें और छह भ्रम
• छह तरंगें (षडूर्मि): भूख, प्यास, शोक, मोह, बुढ़ापा, मृत्यु • छह भ्रम: कुल का घमंड, वंश का घमंड, वर्ण का घमंड, आश्रम का घमंड, रूप का घमंड और अच्छी परिस्थिति का घमंड
इन सबके संपर्क से परमात्मा ही जीव बन जाता है।
परमात्मा के संपर्क से जीव बनता है, वह जीव दूसरा कोई नहीं है, वही ब्रह्म है। 4. इस उपनिषद को पढ़ने का फल और नियम---
जो इसका अध्ययन करता है वह अग्नि, वायु और सूर्य में पवित्र होता है। उसे स्वास्थ्य, धन, पुत्र-पौत्र, विद्वत्ता मिलती है। वह बड़े-बड़े पापों से - शराब पीना, माता-बहन-पुत्रवधू से अनुचित संबंध, सोना चुराना, वेद भूल जाना, बड़ों की सेवा न करना, अपात्र को यज्ञ कराना, अभक्ष्य खाना, गलत दान लेना, पराई स्त्री से संबंध, काम-क्रोध आदि से मुक्त हो जाता है और इसी जन्म में शुद्ध ब्रह्म बन जाता है।
इसलिए इसे गुप्त रखा जाए।
इसे बिना दीक्षा वाले को, वेद न जानने वाले को, यज्ञ न करने वाले को, वैष्णव न होने वाले को, योगी न होने वाले को, बहुत बोलने वाले को, कठोर बोलने वाले को, एक साल से ज्यादा समय तक सीखने वाले आलसी को, और असंतुष्ट को नहीं देना चाहिए।
गुरु को चाहिए पवित्र स्थान में, पवित्र नक्षत्र में, प्राणों को वश में करके, विनम्र शिष्य के दाहिने कान में इसका उपदेश दे। बार-बार नहीं देना चाहिए, नहीं तो यह बासी हो जाएगा, पर जितनी जरूरत हो उतनी बार कान में ही देना चाहिए।
इस प्रकार गुरु और शिष्य दोनों इसी जन्म में पुरुष - अर्थात विष्णु रूप - बन जाते हैं।
इति मुद्गलोपनिषत् समाप्ता।
ॐ वाङ् मे मनसि प्रतिष्ठिता... शान्तिः शान्तिः शान्तिः।
चारों अध्यायों का सार:
अध्याय 1 ने बताया पुरुष ही विष्णु है,
अध्याय 2 ने बताया वही जगत बना,
अध्याय 3 ने बताया वह जैसा पूजोगे वैसा मिलेगा,
अध्याय 4 ने बताया उन बाधाओं को हटाकर तुम ही वही ब्रह्म हो।
------×-------×------×------×---
Comments
Post a Comment