(64) भिक्षुकोपनिषद
भिक्षुकोपनिषद - नाम से ही अर्थ है, भिक्षु यानी भिक्षा पर जीने वाला संन्यासी।
यह एक लघु उपनिषद है, शुक्ल यजुर्वेद से जुड़ा हुआ है। इसे संन्यास उपनिषदों में गिना जाता है और मुक्तिका की 108 उपनिषदों की सूची में इसका क्रम 60वां है। इसमें कुल 1 अध्याय और 5 श्लोक हैं।
इसका मुख्य विषय है - मोक्ष चाहने वाले भिक्षुओं के प्रकार, उनका आहार और जीवन-शैली। दर्शन वेदान्त है और मुक्ति का मार्ग योग बताया गया है।
चार प्रकार के भिक्षु
उपनिषद कहता है - मोक्ष की इच्छा वाले भिक्षु चार प्रकार के होते हैं : कुटीचक, बहूदक, हंस और परमहंस।
इतिहास में जड़
विद्वानों के अनुसार इसका रचनाकाल देर से मध्यकालीन, लगभग 14-15वीं सदी माना जाता है, पर इसकी विषयवस्तु आश्रम उपनिषद (लगभग शताब्दी) के चौथे अध्याय से मिलती-जुलती है। महाभारत अनुशासन पर्व 13.129 में भी इन चार भिक्षुओं का यही वर्गीकरण मिलता है।
श्लोक 1
संस्कृत: अथ भिक्षूणां मोक्षार्थिनां कुटीचकबहूदकहंसपरमहंसाश्चेति चत्वारः।
अर्थ: अब मोक्ष की इच्छा रखने वाले भिक्षुओं के चार प्रकार कहे जाते हैं - कुटीचक, बहूदक, हंस और परमहंस।
श्लोक 2 - कुटीचक
संस्कृत: कुटीचका नाम गौतमभरद्वाजयाज्ञवल्क्यवसिष्ठप्रभृतयोऽष्टौ ग्रासांश्चरन्तो योगमार्गे मोक्षमेव प्रार्थयन्ते।
अर्थ: कुटीचक वे हैं जो कुटिया में रहते हैं, जैसे प्राचीन ऋषि गौतम, भरद्वाज, याज्ञवल्क्य, वसिष्ठ आदि। ये दिन में 8 ग्रास भोजन पर जीते हैं और योग मार्ग से ही मोक्ष की प्रार्थना करते हैं।
श्लोक 3 - बहूदक
संस्कृत: अथ बहूदका नाम त्रिदण्डकमण्डलुशिखायज्ञोपवीतकाषायवस्त्रधारिणो ब्रह्मर्षिगृहे मधुमांसं वर्जयित्वा अष्टौ ग्रासान् भैक्षाचरणं कृत्वा योगमार्गे मोक्षमेव प्रार्थयन्ते।
अर्थ: फिर बहूदक भिक्षु - जो त्रिदण्ड, कमंडलु, चोटी, यज्ञोपवीत और गेरुए वस्त्र धारण करते हैं। ब्राह्मण ऋषियों के घर से मधु और मांस को छोड़कर 8 ग्रास भिक्षा लेकर योग मार्ग से मोक्ष चाहते हैं।
श्लोक 4 - हंस
संस्कृत: अथ हंसा नाम ग्रामे एकरात्रं नगरे पञ्चरात्रं क्षेत्रे सप्तरात्रं तदुपरि न वसेयुः। गोमूत्रगोमयाहारिणो नित्यं चान्द्रायणपरायणा योगमार्गे मोक्षमेव प्रार्थयन्ते।
अर्थ: फिर हंस नामक भिक्षु - जो गाँव में एक रात, नगर में पाँच रात और तीर्थ क्षेत्र में सात रात से अधिक नहीं ठहरते। गाय के मूत्र-गोबर को आहार के रूप में लेते हैं, सदा चान्द्रायण व्रत परायण रहते हैं और योग से ही मोक्ष चाहते हैं।
चान्द्रायण = चाँद के घटने-बढ़ने के साथ 1 से 15 ग्रास तक भोजन का नियम।
### श्लोक 5 - परमहंस - सबसे विस्तृत
संस्कृत:
अथ परमहंसा नाम संवर्तकारुणिश्वेतकेतुजडभरतदत्तात्रेयशुकवामदेवहारीतकप्रभृतयोऽष्टौ ग्रासांश्चरन्तो योगमार्गे मोक्षमेव प्रार्थयन्ते।
वृक्षमूले शून्यगृहे श्मशानवासिनो वा साम्बरा वा दिगम्बरा वा।
न तेषां धर्माधर्मौ लाभालाभौ शुद्धाशुद्धौ द्वैतवर्जिता समलोष्टाश्मकाञ्चनाः सर्ववर्णेषु भैक्षाचरणं कृत्वा सर्वत्रात्मैवेति पश्यन्ति।
अथ जातरूपधरा निर्द्वन्द्वा निष्परिग्रहाः शुक्लध्यानपरायणा आत्मनिष्ठाः प्राणसंधारणार्थे यथोक्तकाले भैक्षमाचरन्तः शून्यागारदेवगृहतृणकूटवल्मीकवृक्षमूलकुलालशालाग्निहोत्रशालानदीपुलिनगिरिकन्दरकुहरकोटरनिर्झरस्थण्डिले तत्र ब्रह्ममार्गे सम्यक् सम्पन्नाः शुद्धमानसाः परमहंसाचरणेन संन्यासेन देहत्यागं कुर्वन्ति ते परमहंसा नामेत्युपनिषत्।
अर्थ:
परमहंस वे हैं जैसे संवर्तक, आरुणि, श्वेतकेतु, जड़भरत, दत्तात्रेय, शुक, वामदेव, हारीतक आदि। वे भी 8 ग्रास खाते हैं, पेड़ के नीचे, सूने घर में या श्मशान में रहते हैं, कभी वस्त्र सहित, कभी दिगम्बर।
उनके लिए धर्म-अधर्म, लाभ-हानि, शुद्ध-अशुद्ध का भेद नहीं रहता। वे मिट्टी के ढेले, पत्थर और सोने को समान देखते हैं, सब वर्णों में भिक्षा करते हैं और सर्वत्र आत्मा को ही देखते हैं। वे बालक जैसे, द्वंद्व-रहित, अपरिग्रही, शुक्ल ध्यान में लीन, आत्मनिष्ठ होते हैं, केवल प्राण धारण के लिए नियत समय पर भिक्षा करते हैं।
सूने घर, देव-मंदिर, घास की झोपड़ी, बांबी, पेड़ की जड़, कुम्हार के घर, अग्निहोत्रशाला, नदी किनारा, पहाड़ी गुफा, पेड़ का कोटर, झरने के पास या पवित्र समतल भूमि पर रहते हुए, ब्रह्म मार्ग में पूर्ण, शुद्ध मन वाले, परमहंस वृत्ति से संन्यास लेकर देह त्यागते हैं - वे ही वास्तव में परमहंस हैं - ऐसा यह उपनिषद कहता है।
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