(88) अवधूतोपनिषद
अवधूतोपनिषद--
अवधूतोपनिषद् का मूल संस्कृत पाठ अपेक्षाकृत संक्षिप्त है और इसमें भगवान् दत्तात्रेय तथा सांकृति का संवाद है। उपलब्ध संस्कृत पाठ में ३२ क्रमांकित श्लोकों के साथ आरम्भ और समापन के शान्तिमन्त्र हैं।
नीचे मैं मूल संस्कृत + सरल हिन्दी अर्थ दे रहा हूँ। जहाँ पाठ बहुत विस्तृत है, अर्थ को भावानुवाद के रूप में रखा गया है।
अवधूतोपनिषद्
मङ्गलाचरण
गौणमुख्यावधूतालिहृदयाम्बुजवर्ति यत् ।
तत्त्रैपदं ब्रह्मतत्त्वं स्वमात्रमवशिष्यते ॥
अर्थ: जो ब्रह्मतत्त्व अवधूत के हृदय-कमल में स्थित है, वह तीन पदों वाले परम ब्रह्म का स्वरूप है; अन्ततः केवल वही अपने शुद्ध स्वरूप में शेष रहता है।
ॐ सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु
सह वीर्यं करवावहै ।
तेजस्विनावधीतमस्तु मा विद्विषावहै ।
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
अर्थ: परमात्मा हम दोनों की रक्षा करे, हमारा पालन करे, हम दोनों मिलकर सामर्थ्यपूर्वक ज्ञान का अध्ययन करें। हमारा अध्ययन तेजस्वी हो और हम परस्पर द्वेष न करें। शान्ति हो, शान्ति हो, शान्ति हो।
सांकृति का प्रश्न
हरिः ॐ अथ ह सांकृतिर्भगवन्तमवधूतं दत्तात्रेयं
परिसमेत्य पप्रच्छ—
भगवन्! कोऽवधूतस्य का स्थितिः किं लक्ष्म किं संसरणमिति ।
तं होवाच भगवो दत्तात्रेयः परमकारुणिकः ॥
अर्थ: सांकृति भगवान् अवधूत दत्तात्रेय के पास जाकर पूछते हैं—“भगवन्! अवधूत कौन है? उसकी स्थिति क्या है? उसका लक्षण क्या है और उसका आचरण अथवा संसार में व्यवहार कैसा है?” परम करुणामय भगवान् दत्तात्रेय ने उत्तर दिया।
१. अवधूत किसे कहते हैं?
अक्षरत्वाद्वरेण्यत्वाद्धृतसंसारबन्धनात् ।
तत्त्वमस्यादिलक्ष्यत्वादवधूत इतीर्यते ॥ १॥
अर्थ: जो अक्षर अर्थात् अविनाशी है, श्रेष्ठ है, जिसने संसार के बन्धनों को झाड़ दिया है और जो “तत्त्वमसि” आदि महावाक्यों का लक्ष्य है, उसे अवधूत कहा जाता है।
२. अवधूत की स्थिति
यो विलङ्घ्याश्रमान्वर्णानात्मन्येव स्थितः सदा ।
अतिवर्णाश्रमी योगी अवधूतः स कथ्यते ॥ २॥
अर्थ: जो वर्ण और आश्रम की बाहरी सीमाओं से ऊपर उठकर सदा अपने आत्मस्वरूप में स्थित रहता है, वह योगी अवधूत कहलाता है।
३–४. आनन्द का स्वरूप
तस्य प्रियं शिरः कृत्वा मोदो दक्षिणपक्षकः ।
प्रमोद उत्तरः पक्ष आनन्दो गोष्पदायते ॥ ३॥
अर्थ: उसके स्वरूप में ‘प्रिय’ को सिर, ‘मोद’ को दायाँ पक्ष, ‘प्रमोद’ को बायाँ पक्ष और ‘आनन्द’ को आधाररूप माना गया है।
गोपालसदृशां शीर्षे नापि मध्ये न चाप्यधः ।
ब्रह्मपुच्छं प्रतिष्ठेति पुच्छाकारेण कारयेत् ॥ ४॥
अर्थ: ब्रह्म को न केवल सिर, न मध्य और न नीचे के किसी भाग तक सीमित करना चाहिए; ब्रह्म ही उस सम्पूर्ण सत्ता का आधार है।
५. अमृतत्व का मार्ग
एवं चतुष्पथं कृत्वा ते यान्ति परमां गतिम् ।
न कर्मणा न प्रजया धनेन त्यागेनैके अमृतत्वमानशुः ॥ ५॥
अर्थ: इस प्रकार इस चतुष्टय का विचार करने वाले परम गति को प्राप्त होते हैं। केवल कर्म, संतान अथवा धन से अमृतत्व प्राप्त नहीं होता; त्याग द्वारा ही कुछ महापुरुष अमृतत्व को प्राप्त हुए हैं।
६. अवधूत का निर्लेप जीवन
स्वैरं स्वैरविहरणं तत्संसरणम् । सांबरा वा दिगंबरा वा ।
न तेषां धर्माधर्मौ न मेध्यामेधौ ।
सदा सांग्रहण्येष्ट्याश्वमेधमन्तयागं यजते ।
स महामखो महायोगः । कृत्स्नमेतच्चित्रं कर्म ।
स्वैरं न विगायेत्तन्महाव्रतम् ।
यथा रविः सर्वरसान्प्रभुङ्क्ते
हुताशनश्चापि हि सर्वभक्षः ।
तथैव योगी विषयान्प्रभुङ्क्ते
न लिप्यते पुण्यपापैश्च शुद्धः ॥ ६॥
अर्थ: अवधूत अपने स्वभावानुसार स्वतंत्र विचरण करता है। वह वस्त्रधारी हो अथवा दिगम्बर—उसकी वास्तविक पहचान बाहरी वेश नहीं है। वह बाहरी धर्म-अधर्म के बन्धन से परे आत्मज्ञान में स्थित रहता है।
जैसे सूर्य सब रसों को ग्रहण करके भी उनसे लिप्त नहीं होता और अग्नि सब कुछ जलाकर भी अपने स्वरूप में रहती है, वैसे ही ज्ञानी योगी विषयों के बीच रहते हुए भी पुण्य-पाप से लिप्त नहीं होता, क्योंकि उसका आत्मस्वरूप शुद्ध है।
७. कामनाओं से परे शान्ति
आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं
समुद्रमापः प्रविशन्ति यद्वत् ।
तद्वत्कामा यं प्रविशन्ति सर्वे
स शान्तिमाप्नोति न कामकामी ॥ ७॥
अर्थ: जैसे नदियों का जल निरन्तर समुद्र में प्रवेश करता है, फिर भी समुद्र अपनी मर्यादा में स्थिर रहता है, वैसे ही जिस ज्ञानी के भीतर अनेक कामनाएँ आती हुई भी उसे विचलित नहीं करतीं, वही शान्ति प्राप्त करता है। कामनाओं के पीछे भागने वाला शान्ति नहीं पाता।
८. परमार्थ की दृष्टि
न निरोधो न चोत्पत्तिर्न बद्धो न च साधकः ।
न मुमुक्षुर्न वै मुक्त इत्येषा परमार्थता ॥ ८॥
अर्थ: परम सत्य की दृष्टि से न किसी वस्तु का वास्तविक निरोध है, न उत्पत्ति; न कोई वास्तव में बन्धा हुआ है, न साधक; न कोई अलग से मुक्ति की इच्छा रखने वाला है और न कोई अलग से मुक्त है। यही परमार्थ-दृष्टि है।
९–१०. कृतकृत्यता
ऐहिकामुष्मिकव्रातसिद्धै मुक्तेश्च सिद्धये ।
बहुकृत्यं पुरा स्यान्मे तत्सर्वमधुना कृतम् ॥ ९॥
अर्थ: इस लोक और परलोक की सिद्धि तथा मुक्ति के लिए पहले जो अनेक कर्तव्य करने शेष समझे जाते थे, वे आत्मज्ञान के द्वारा अब पूर्ण हो गए हैं।
तदेव कृतकृत्यत्वं प्रतियोगिपुरःसरम् ।
अनुसन्दधदेवायमेवं तृप्यति नित्यशः ॥ १०॥
अर्थ: इस प्रकार ज्ञानी निरन्तर अपने कृतकृत्य स्वरूप का चिन्तन करते हुए सदा तृप्त रहता है।
११–१२. आत्मतृप्ति
दुःखिनोऽज्ञाः संसरन्तु कामं पुत्राद्यपेक्षया ।
परमानन्दपूर्णोऽहं संसरामि किमिच्छया ॥ ११॥
अर्थ: अज्ञानी लोग पुत्र आदि की इच्छाओं के कारण संसार में भटकते रहें; मैं तो परम आनन्द से पूर्ण हूँ—मुझे किस वस्तु की इच्छा के कारण संसार में भटकना है?
अनुतिष्ठन्तु कर्माणि परलोकयियासवः ।
सर्वलोकात्मकः कस्मादनुतिष्ठामि किं कथम् ॥ १२॥
अर्थ: जो परलोक की इच्छा रखते हैं वे कर्म करें। मैं तो समस्त लोकों के आत्मस्वरूप में स्थित हूँ; फिर मैं किस उद्देश्य से और कौन-सा कर्म करूँ?
१३–१८. आत्मज्ञानी की अवस्था
इन श्लोकों में अवधूत कहता है कि दूसरे लोग शास्त्रों का अध्ययन-अध्यापन करें, किन्तु आत्मज्ञान प्राप्त व्यक्ति के लिए बाहरी कर्तव्य ही उसकी मुक्ति का साधन नहीं रह जाते। वह अपने आत्मस्वरूप में स्थित है।
निद्राभिक्षे स्नानशौचे नेच्छामि न करोमि च ।
द्रष्टारश्चेत्कल्पयन्तु किं मे स्यादन्यकल्पनात् ॥ १४॥
अर्थ: निद्रा, भिक्षा, स्नान और शौच आदि के विषय में मैं अलग से इच्छाएँ नहीं करता। शरीर के स्वाभाविक व्यवहार को देखने वाले लोग जैसा समझें, समझें; मैं अपने वास्तविक स्वरूप के विषय में दूसरी कल्पना क्यों करूँ?
शृण्वन्त्वज्ञाततत्त्वास्ते जानन् कस्माञ्छृणोम्यहम् ।
मन्यन्तां संशयापन्ना न मन्येऽहमसंशयः ॥ १६॥
अर्थ: जिन लोगों ने तत्त्व को नहीं जाना, वे सुनें; जिसने तत्त्व जान लिया, वह फिर किसलिए सुने? जिन्हें संशय है वे संशय करें; मुझे अपने आत्मस्वरूप के विषय में संशय नहीं है।
विपर्यस्तो निदिध्यासे किं ध्यानमविपर्यये ।
देहात्मत्वविपर्यासं न कदाचिद्भजाम्यहम् ॥ १७॥
अर्थ: जब आत्मा के विषय में विपरीत धारणा ही नहीं है, तो फिर किस बात का ध्यान करूँ? मैं कभी आत्मा को शरीर मानने के भ्रम को स्वीकार नहीं करता।
१९–२२. व्यवहार और आत्मज्ञान
आरब्धकर्मणि क्षीणे व्यवहारो निवर्तते ।
कर्मक्षये त्वसौ नैव शामेद्ध्यानसहस्रतः ॥ १९॥
अर्थ: प्रारब्ध कर्म समाप्त होने पर व्यवहार भी समाप्त हो जाता है। केवल हजारों बार ध्यान करने से उस ज्ञान की आवश्यकता नहीं पड़ती जो पहले ही आत्मसाक्षात्कार से प्राप्त हो चुका है।
विक्षेपो नास्ति यस्मान्मे न समाधिस्ततो मम ।
विक्षेपो वा समाधिर्वा मनसः स्याद्विकारिणः ॥ २१॥
अर्थ: मेरे लिए चित्त-विक्षेप नहीं है, इसलिए मेरे लिए समाधि भी किसी अलग उपलब्धि के रूप में आवश्यक नहीं। विक्षेप और समाधि दोनों मन के विकार हैं; आत्मा तो नित्य अनुभवरूप है।
कृतं कृत्यं प्रापणीयं प्राप्तमित्येव नित्यशः ।
व्यवहारो लौकिको वा शास्त्रीयो वान्यथापि वा ।
ममाकर्तुरलेपस्य यथारब्धं प्रवर्तताम् ॥ २२॥
अर्थ: मेरे लिए करने योग्य सब कुछ हो चुका और प्राप्त करने योग्य सब प्राप्त हो चुका। अब लौकिक हो या शास्त्रीय—जो व्यवहार प्रारब्ध के अनुसार होना है, वह होता रहे। मैं कर्ता नहीं हूँ और कर्मों से अलिप्त हूँ।
२३–२५. लोकसंग्रह
अथवा कृतकृत्येऽपि लोकानुग्रहकाम्यया ।
शास्त्रीयेणैव मार्गेन वर्तेऽहं मम का क्षतिः ॥ २३॥
अर्थ: यदि सब कुछ प्राप्त हो जाने के बाद भी लोककल्याण के लिए मैं शास्त्रीय मार्ग से आचरण करूँ, तो इसमें मेरा क्या नुकसान है?
देवार्चनस्नानशौचभिक्षादौ वर्ततां वपुः ।
तारं जपतु वाक्तद्वत्पठत्वाम्नायमस्तकम् ॥ २४॥
अर्थ: शरीर देवपूजा, स्नान, शौच, भिक्षा आदि कार्य करता रहे; वाणी प्रणव अर्थात् ॐ का जप करे और वेद-वेदान्त का पाठ करे।
विष्णुं ध्यायतु धीर्यद्वा ब्रह्मानन्दे विलीयताम् ।
साक्ष्यहं किंचिदप्यत्र न कुर्वे नापि कारये ॥ २५॥
अर्थ: बुद्धि विष्णु का ध्यान करे अथवा ब्रह्मानन्द में लीन हो जाए; मैं तो केवल साक्षी हूँ—न स्वयं कुछ करता हूँ, न किसी से करवाता हूँ।
२६–३०. आत्मज्ञान की आनन्दमयी घोषणा
कृतकृत्यतया तृप्तः प्राप्तप्राप्यतया पुनः ।
तृप्यन्नेवं स्वमनसा मन्यतेऽसौ निरन्तरम् ॥ २६॥
अर्थ: ज्ञानी इस अनुभव से तृप्त है कि उसका कर्तव्य पूर्ण हो चुका है और प्राप्त करने योग्य सब कुछ प्राप्त हो चुका है।
धन्योऽहं धन्योऽहं नित्यं स्वात्मानमञ्जसा वेद्मि ।
धन्योऽहं धन्योऽहं ब्रह्मानन्दो विभाति मे स्पष्टम् ॥ २७॥
अर्थ: मैं धन्य हूँ, धन्य हूँ, क्योंकि मैं निरन्तर अपने आत्मस्वरूप को स्पष्ट रूप से जानता हूँ। मैं धन्य हूँ क्योंकि मेरे भीतर ब्रह्मानन्द स्पष्ट रूप से प्रकाशित है।
धन्योऽहं धन्योऽहं दुःखं सांसारिकं न वीक्षेऽद्य ।
धन्योऽहं धन्योऽहं स्वस्याज्ञानं पलायितं क्वापि ॥ २८॥
अर्थ: मैं धन्य हूँ, क्योंकि अब संसार का दुःख मुझे अपने वास्तविक स्वरूप के रूप में दिखाई नहीं देता। मैं धन्य हूँ, क्योंकि मेरा अज्ञान कहीं दूर चला गया है।
धन्योऽहं धन्योऽहं कर्तव्यं मे न विद्यते किंचित् ।
धन्योऽहं धन्योऽहं प्राप्तव्यं सर्वमत्र सम्पन्नम् ॥ २९॥
अर्थ: मैं धन्य हूँ; मेरे लिए अब कोई अनिवार्य कर्तव्य शेष नहीं है। मैं धन्य हूँ; प्राप्त करने योग्य सब कुछ प्राप्त हो चुका है।
धन्योऽहं धन्योऽहं तृप्तेर्मे कोपमा भवेल्लोके ।
धन्योऽहं धन्योऽहं धन्यो धन्यः पुनः पुनर्धन्यः ॥ ३०॥
अर्थ: मैं इतना तृप्त हूँ कि संसार में मेरी इस तृप्ति की तुलना किससे की जा सकती है? मैं बार-बार धन्य हूँ।
३१–३२. ज्ञान और गुरु की महिमा
अहो पुण्यमहो पुण्यं फलितं फलितं दृढम् ।
अस्य पुण्यस्य सम्पत्तेरहो वयमहो वयम् ॥ ३१॥
अर्थ: अहो! यह महान् पुण्य है, जिसका फल दृढ़ रूप से प्राप्त हो गया है। इस आध्यात्मिक सम्पत्ति को पाकर हम धन्य हैं।
अहो ज्ञानमहो ज्ञानमहो सुखमहो सुखम् ।
अहो शास्त्रमहो शास्त्रमहो गुरुरहो गुरुः ॥ ३२॥
अर्थ: अहो! कैसा महान् ज्ञान है! कैसा महान् सुख है! अहो, शास्त्र महान् है और गुरु महान् है!
फलश्रुति
इति य इदमधीते सोऽपि कृतकृत्यो भवति ।
सुरापानात्पूतो भवति । स्वर्णस्तेयात्पूतो भवति ।
ब्रह्महत्यात्पूतो भवति । कृत्याकृत्यात्पूतो भवति ।
एवं विदित्वा स्वेच्छाचारपरो भूयादोंसत्यमित्युपनिषत् ॥
अर्थ: जो इस उपनिषद् का अध्ययन करता है, वह कृतकृत्य होता है। उसके भीतर का ज्ञान पाप-बन्धनों से उसे मुक्त करता है। इस तत्त्व को जानकर वह आत्मज्ञान में स्थित होकर स्वतंत्र भाव से जीवन व्यतीत करे—यही उपनिषद् का निष्कर्ष है।
समापन शान्तिमन्त्र
ॐ सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु सह वीर्यं करवावहै ।
तेजस्विनावधीतमस्तु मा विद्विषावहै ।
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
इत्यवधूतोपनिषत्समाप्ता।
यह पाठ उपलब्ध संस्कृत संस्करण से मिलान करके दिया गया है। एक महत्वपूर्ण बात: अवधूतोपनिषद् और अवधूतगीता अलग ग्रन्थ हैं—अवधूतोपनिषद् का संवाद सांकृति और दत्तात्रेय के बीच है, जबकि अवधूतगीता एक स्वतंत्र अद्वैत ग्रन्थ है।
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