अवश्य। अब हम भाग–१ : प्रथम १० अमृतवाणियाँ प्रस्तुत करते हैं।
विशेष सूचना: नीचे दिए गए संदर्भ गरुड़ पुराण सारोद्धार की उपलब्ध पाठ-परंपरा के अनुसार हैं। यह संकलन-ग्रंथ मूल महापुराण का साररूप है; अतः इसे सीधे गीता प्रेस के पूर्ण संस्करण की अध्याय-संख्या मानना उचित नहीं होगा। उपलब्ध संस्कृत डिजिटल पाठों में संस्करणानुसार क्रमभेद भी मिलता है। �
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गरुड़ पुराण की ५० अमृतवाणियाँ
भाग–१ : प्रथम १० अमृतवाणियाँ
१. शरीर और धन की नश्वरता
श्लोक
अनित्यानि शरीराणि विभवो नैव शाश्वताः।
नित्यं सन्निहितो मृत्युः कर्तव्यो धर्मसंग्रहः॥
संदर्भ: गरुड़ पुराण-सारोद्धार, अध्याय २, श्लोक ४७.२४
शब्दार्थ
अनित्यानि — नश्वर
शरीराणि — शरीर
विभवः — धन-वैभव
नित्यं — सदा
सन्निहितः — समीप स्थित
धर्मसंग्रहः — धर्म का संचय
सरल अर्थ
शरीर नश्वर हैं और धन-वैभव भी सदा रहने वाला नहीं है। मृत्यु सदा समीप है; इसलिए मनुष्य को धर्म और पुण्य का संचय करना चाहिए।
भावार्थ
मनुष्य को जीवन की अस्थिरता समझनी चाहिए। धन, शरीर और सांसारिक वैभव नष्ट हो सकते हैं, परंतु अच्छे कर्म जीवन को सार्थक बनाते हैं। �
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२. धर्म की विजय
श्लोक
धर्मो जयति नाधर्मः सत्यं जयति नानृतम्।
क्षमा जयति न क्रोधो विष्णुर्जयति नासुराः॥
संदर्भ: गरुड़ पुराण-सारोद्धार, २.४७.४६
सरल अर्थ
धर्म की विजय होती है, अधर्म की नहीं। सत्य की विजय होती है, असत्य की नहीं। क्षमा विजयी होती है, क्रोध नहीं; भगवान् विष्णु की दिव्य शक्ति विजयी होती है, आसुरी प्रवृत्तियाँ नहीं।
भावार्थ
यह श्लोक जीवन के चार महान आदर्श प्रस्तुत करता है—
धर्म — सत्य — क्षमा — दैवी प्रवृत्ति।
मनुष्य को क्रोध, असत्य और अधर्म के स्थान पर इन गुणों को अपनाना चाहिए। �
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३. भगवान् विष्णु ही परम आश्रय
श्लोक
विष्णुर्माता पिता विष्णुर्विष्णुः स्वजनबान्धवाः।
येषामेव स्थिरा बुद्धिर्न तेषां दुर्गतिः भवेत्॥
संदर्भ: गरुड़ पुराण-सारोद्धार, २.४७.४७
सरल अर्थ
विष्णु ही माता हैं, विष्णु ही पिता हैं और विष्णु ही अपने तथा बन्धु हैं। जिनकी बुद्धि भगवान् विष्णु में स्थिर रहती है, उनकी दुर्गति नहीं होती।
भावार्थ
यहाँ भगवान् को मनुष्य का सर्वोच्च आश्रय बताया गया है। सांसारिक संबंध परिवर्तनशील हो सकते हैं, किंतु ईश्वर के प्रति श्रद्धा मनुष्य को आध्यात्मिक आधार प्रदान करती है। �
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४. श्रेष्ठ मनुष्य का लक्षण
श्लोक
यो धर्मशीलो जितमानरोषो
विद्याविनीतो न परोपतापी।
स्वदारतुष्टः परदारदूरः
स वै नरः पूज्यतरो हि लोके॥
संदर्भ: गरुड़ पुराण-सारोद्धार, २.४८.४०
नोट: उपलब्ध डिजिटल पाठों में अंतिम चरण के पाठ में कुछ पाठभेद मिलते हैं।
सरल अर्थ
जो धर्मशील है, जिसने अहंकार और क्रोध को जीत लिया है, जो विद्या पाकर विनम्र बना है, जो दूसरों को कष्ट नहीं देता, अपनी पत्नी में संतुष्ट रहता है और परस्त्री से दूर रहता है—वह संसार में अत्यन्त सम्माननीय मनुष्य है।
भावार्थ
सच्ची महानता धन या पद से नहीं, बल्कि—
धर्मशीलता,
विनम्रता,
क्रोध पर नियंत्रण,
दूसरों को कष्ट न देना,
संयम और
चरित्र
से होती है। �
SriMatham
५. विद्या का सच्चा फल विनम्रता है
मूल पद
विद्याविनीतः
संदर्भ: उपर्युक्त श्लोक, २.४८.४०
अर्थ
जो विद्या के द्वारा विनम्र हो गया है।
भावार्थ
यदि शिक्षा से अहंकार बढ़े तो वह अधूरी है। सच्ची विद्या मनुष्य को विनम्र, विवेकी और दूसरों के प्रति सम्मानशील बनाती है। �
SriMatham
६. दूसरों को कष्ट न देना
मूल पद
न परोपतापी
संदर्भ: २.४८.४०
अर्थ
जो दूसरों को कष्ट देने वाला नहीं है।
भावार्थ
श्रेष्ठ मनुष्य अपने लाभ के लिए दूसरों को पीड़ा नहीं देता। करुणा, दया और अहिंसा धर्ममय जीवन के प्रमुख आधार हैं। �
SriMatham
७. क्रोध पर क्षमा की विजय
मूल वचन
क्षमा जयति न क्रोधः।
संदर्भ: २.४७.४६ का अंश
अर्थ
क्षमा की विजय होती है, क्रोध की नहीं।
भावार्थ
क्रोध तत्काल शक्ति जैसा प्रतीत हो सकता है, लेकिन वह विवेक को नष्ट कर सकता है। क्षमा आत्मबल, धैर्य और महानता का परिचायक है। �
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८. सत्य की विजय
मूल वचन
सत्यं जयति नानृतम्।
संदर्भ: २.४७.४६ का अंश
अर्थ
सत्य की विजय होती है, असत्य की नहीं।
भावार्थ
असत्य से कभी-कभी अस्थायी लाभ मिल सकता है, लेकिन जीवन की स्थायी प्रतिष्ठा सत्य और ईमानदारी से ही प्राप्त होती है। �
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९. अहंकार और क्रोध पर विजय
मूल पद
जितमानरोषः
संदर्भ: २.४८.४०
अर्थ
जिसने मान अर्थात् अहंकार तथा रोष अर्थात् क्रोध को जीत लिया है।
भावार्थ
बाहरी संसार पर विजय से पहले मनुष्य को अपने भीतर के दोषों पर विजय प्राप्त करनी चाहिए। अहंकार और क्रोध मनुष्य के पतन के प्रमुख कारण बन सकते हैं। �
SriMatham
१०. मृत्यु का स्मरण और धर्माचरण
मूल वचन
नित्यं सन्निहितो मृत्युः
कर्तव्यो धर्मसंग्रहः॥
संदर्भ: २.४७.२४ का अंश
सरल अर्थ
मृत्यु सदा समीप है; इसलिए धर्म और पुण्य का संचय करना चाहिए।
भावार्थ
इस शिक्षा का उद्देश्य मनुष्य को भयभीत करना नहीं है। इसका उद्देश्य यह समझाना है कि जीवन अमूल्य और अनिश्चित है। अतः—
सत्कर्म को कल पर मत टालो।
आज ही सत्य, सेवा, दया और धर्म का कार्य करो।
�
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प्रथम १० अमृतवाणियों का सार
क्रम
अमृतवाणी
मुख्य शिक्षा
१
शरीर नश्वर है
धर्म का संचय करो
२
धर्मो जयति
धर्म अपनाओ
३
विष्णुर्माता पिता
ईश्वर को अपना आश्रय मानो
४
यो धर्मशीलः
चरित्रवान बनो
५
विद्याविनीतः
विद्या से विनम्र बनो
६
न परोपतापी
किसी को कष्ट मत दो
७
क्षमा जयति
क्रोध पर नियंत्रण रखो
८
सत्यं जयति
सदैव सत्य का साथ दो
९
जितमानरोषः
अहंकार और क्रोध को जीतो
१०
नित्यं सन्निहितो मृत्युः
सत्कर्म को मत टालो
प्रकाशन के लिए विशेष टिप्पणी
इन १० अमृतवाणियों में कुछ पूर्ण श्लोक हैं और कुछ उन्हीं प्रमाणित श्लोकों के चयनित पद या चरण हैं। पुस्तक में ५० स्वतंत्र अमृतवाणियाँ बनाते समय इसे स्पष्ट रखना आवश्यक है, ताकि एक ही श्लोक के अंश को भूलवश अलग स्वतंत्र श्लोक न माना जाए।
**�⁠अगले भाग में मैं ११ से २० तक की अमृतवाणियाँ दूँगा और �⁠प्रत्येक के मूल पाठ तथा संदर्भ को इसी प्रकार सावधानी से प्रस्तुत करूँगा।**


गरुड़ पुराण की ५० अमृतवाणियाँ
भाग–२ : अमृतवाणियाँ ११ से २०
महत्त्वपूर्ण सूचना: अब आगे के संकलन में मैं श्लोकों को उपलब्ध डिजिटल संस्कृत पाठ से मिलान करके प्रस्तुत कर रहा हूँ। फिर भी पुस्तक में अंतिम प्रकाशन से पहले एक ही मुद्रित संस्करण के साथ पूरा पाठ मिलाना उचित रहेगा, क्योंकि संस्करणों में क्रमभेद मिलता है। �
Vedapath +1
११. शुद्धि का महान साधन
श्लोक
अपवित्रः पवित्रो वा
सर्वावस्थां गतोऽपि वा।
यः स्मरेत्पुण्डरीकाक्षं
स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः॥
संदर्भ: गरुड़ पुराण, प्रेतकल्प, २.४७.५२। �
veda.harekrsna.cz
सरल अर्थ
मनुष्य अपवित्र हो या पवित्र, किसी भी अवस्था में हो, यदि वह कमलनयन भगवान् विष्णु का स्मरण करता है, तो वह बाहरी और आन्तरिक रूप से शुद्ध होता है।
भावार्थ
शुद्धि केवल बाहरी नहीं, बल्कि मन की भी होनी चाहिए। ईश्वर-स्मरण मनुष्य को अपने विचार और आचरण शुद्ध करने की प्रेरणा देता है।
१२. मृत्यु के मार्ग पर सांसारिक अभिमान व्यर्थ है
श्लोक
गच्छन्ति मार्गेण सुदुस्तरेण
विधातृनिष्पादितवर्त्मनि स्थिताः।
केनैव पुण्येन मुदं प्रयान्ति
तिष्ठन्ति केनैव कुलं बलं वयः॥
संदर्भ: गरुड़ पुराण, प्रेतकल्प, २.४८.२। �
Vedapath
सरल अर्थ
जीव अत्यन्त कठिन मार्ग से उस पथ पर जाते हैं जो विधाता द्वारा निर्धारित है। वहाँ कौन-सा पुण्य सुख प्रदान करता है? कुल, बल और आयु का वास्तविक महत्त्व क्या है?
भावार्थ
सांसारिक प्रतिष्ठा, कुल और शारीरिक बल से अधिक महत्त्व मनुष्य के पुण्य और सद्कर्मों का है।
१३. समय निरन्तर बीत रहा है
मूल शिक्षा
गरुड़ पुराण मनुष्य को चेतावनी देता है कि संसार के कार्यों में उलझा हुआ मनुष्य समय के बीतने का ध्यान नहीं रखता।
संदर्भ: प्रेतकल्प, २.४९.२७। �
veda.harekrsna.cz
भावार्थ
मनुष्य जीवन केवल व्यस्त रहने के लिए नहीं मिला है। हमें समय निकालकर यह भी विचार करना चाहिए कि—
मैं क्या कर रहा हूँ?
क्या यह मेरे और दूसरों के लिए कल्याणकारी है?
१४. दुःख और मृत्यु देखकर भी मनुष्य नहीं चेतता
मूल शिक्षा
मनुष्य दुःखी, मृत और पतित लोगों को देखकर भी मोह के कारण अपने जीवन की वास्तविकता नहीं समझता।
संदर्भ: प्रेतकल्प, २.४९.२८। �
veda.harekrsna.cz
भावार्थ
दूसरों की मृत्यु और दुःख हमें जीवन की अस्थिरता का स्मरण कराते हैं। विवेकशील व्यक्ति उनसे निराश नहीं होता, बल्कि अपने जीवन को अधिक सार्थक बनाता है।
१५. विवेक का अभाव
मूल शिक्षा
जो मनुष्य वास्तविक तत्त्व को नहीं जानता, वह—
निरर्थक को सार्थक,
अस्थायी को स्थायी,
और अहितकारी को हितकारी
समझ बैठता है।
संदर्भ: प्रेतकल्प, २.४९.३३। �
veda.harekrsna.cz
भावार्थ
विवेक का अर्थ है—सही और गलत, स्थायी और अस्थायी तथा हित और अहित में अंतर समझना।
१६. सत्कर्म को कल पर मत टालो
श्लोक का भाव
श्वः कार्यमद्य कुर्वीत पूर्वाह्णे चापराह्णिकम्।
संदर्भ: गरुड़ पुराण, प्रेतकल्प, २.४९.४१। �
veda.harekrsna.cz
सरल अर्थ
जो कार्य कल करना है, उसे आज ही कर लेना चाहिए और जो कार्य दोपहर में करना है, उसे पहले ही कर लेना चाहिए।
भावार्थ
मृत्यु किसी के कार्य पूर्ण होने की प्रतीक्षा नहीं करती। इसलिए धर्म, दान, सेवा और अच्छे कार्यों को टालना उचित नहीं।
आज का श्रेष्ठ कार्य कल पर मत छोड़ो।
१७. मृत्यु प्रतीक्षा नहीं करती
मूल शिक्षा
मनुष्य ने अपना कार्य पूरा किया हो या अधूरा छोड़ा हो, मृत्यु उसकी प्रतीक्षा नहीं करती।
संदर्भ: प्रेतकल्प, २.४९.४१। �
veda.harekrsna.cz
भावार्थ
यह शिक्षा हमें भयभीत करने के लिए नहीं है। इसका उद्देश्य है कि हम जीवन के मूल्यवान समय का सदुपयोग करें।
१८. लोभ, क्रोध और द्वेष का विनाशकारी परिणाम
मूल शिक्षा
गरुड़ पुराण में लोभ, कामना, क्रोध और ईर्ष्या को मनुष्य के विनाशकारी आन्तरिक दोषों के रूप में चित्रित किया गया है।
संदर्भ: प्रेतकल्प, २.४९.४३। �
veda.harekrsna.cz
भावार्थ
मनुष्य का सबसे बड़ा संघर्ष कई बार बाहर के शत्रुओं से नहीं, बल्कि अपने भीतर के—
लोभ,
क्रोध,
ईर्ष्या,
मोह
से होता है।
इन पर विजय ही आत्मसंयम है।
१९. अत्यधिक आसक्ति दुःख का कारण
मूल शिक्षा
जिस वस्तु के प्रति मनुष्य अत्यधिक आसक्त होता है, उसी के कारण उसे दुःख भी प्राप्त होता है; त्याग और अनासक्ति से शान्ति का मार्ग खुलता है।
संदर्भ: प्रेतकल्प, २.४९.४६। �
veda.harekrsna.cz
भावार्थ
इसका अर्थ संसार और परिवार को छोड़ देना नहीं है। इसका तात्पर्य है—
प्रेम करो, अपना कर्तव्य निभाओ, परन्तु अत्यधिक मोह और स्वामित्व के अहंकार से मुक्त रहो।
२०. सांसारिक बन्धन से मुक्ति कठिन है
मूल शिक्षा
गरुड़ पुराण में कहा गया है कि मनुष्य लोहे और लकड़ी के बन्धनों से मुक्त हो सकता है, परन्तु अत्यधिक सांसारिक आसक्ति के बन्धन से मुक्त होना बहुत कठिन है।
संदर्भ: प्रेतकल्प, २.४९.४८। �
veda.harekrsna.cz
भावार्थ
बाहरी बन्धन दिखाई देते हैं, परन्तु—
मोह,
लोभ,
अहंकार,
स्वार्थ
मनुष्य के भीतर के अदृश्य बन्धन हैं।
इनसे मुक्त होने के लिए विवेक, आत्मसंयम और आध्यात्मिक साधना आवश्यक है।
अमृतवाणी ११ से २० का संक्षिप्त सार
क्रम
शिक्षा
मुख्य संदेश
११
ईश्वर-स्मरण
बाह्य और आन्तरिक शुद्धि
१२
पुण्य
कर्म की वास्तविक महत्ता
१३
समय
जीवन व्यर्थ न गँवाओ
१४
मृत्यु-दर्शन
जीवन की वास्तविकता समझो
१५
विवेक
स्थायी-अस्थायी का भेद जानो
१६
सत्कर्म
कार्य को मत टालो
१७
मृत्यु
समय की प्रतीक्षा नहीं करती
१८
आत्मसंयम
लोभ और क्रोध से बचो
१९
अनासक्ति
अत्यधिक मोह दुःख देता है
२०
बन्धन
आन्तरिक आसक्ति से मुक्त हो
⚠️ प्रकाशन-सम्बन्धी सुधार
अमृतवाणी १३, १४, १५, १७, १८, १९ और २० में मैंने जानबूझकर केवल भावानुवाद दिया है, क्योंकि यहाँ पूर्ण संस्कृत मूल पाठ की पंक्तियों को बिना प्रत्यक्ष पाठ-सत्यापन के पुनर्निर्मित करना उचित नहीं होगा।
अगले भाग–३ (२१ से ३०) में मैं अधिकाधिक स्थानों पर पूर्ण संस्कृत श्लोक + स्पष्ट संदर्भ के साथ संकलन जारी रखूँगा।


गरुड़ पुराण की ५० अमृतवाणियाँ
भाग–३ : अमृतवाणियाँ २१ से ३०
इस भाग में श्लोक गरुड़ पुराण, प्रेतकल्प, अध्याय ४९ की क्रमशः उपलब्ध पाठ-परंपरा से लिए गए हैं। �
Vedapath +1
२१. जीवन अत्यन्त क्षणभंगुर है
श्लोक
सम्पदः स्वप्नसंकाशा
यौवनं कुसुमोपमम्।
तडिच्चपलमायुष्यं
कस्य स्याज्जानतो धृतिः॥
संदर्भ: गरुड़ पुराण, प्रेतकल्प, अध्याय ४९, श्लोक २९। �
Vedapath
अर्थ
धन-सम्पत्ति स्वप्न के समान है, यौवन फूल के समान क्षणभंगुर है और जीवन बिजली की चमक के समान चंचल है। यह जानकर कौन व्यक्ति निश्चिन्त रह सकता है?
भावार्थ
धन, यौवन और जीवन पर अभिमान नहीं करना चाहिए। जीवन का उपयोग धर्म और सद्कर्म में करना चाहिए।
२२. जीवन का समय सीमित है
श्लोक
शतं जीवितमत्यल्पं
निद्रालस्यैस्तदर्धकम्।
बाल्यरोगजरादुःखैरल्पं
तदपि निष्फलम्॥
संदर्भ: गरुड़ पुराण, प्रेतकल्प, अध्याय ४९, श्लोक ३०। �
Vedapath
अर्थ
सौ वर्ष का जीवन भी बहुत कम है। उसका आधा भाग निद्रा और आलस्य में चला जाता है। शेष में बाल्यावस्था, रोग, वृद्धावस्था और दुःख के कारण बहुत कम समय बचता है।
भावार्थ
मनुष्य को अपने बहुमूल्य समय का सदुपयोग करना चाहिए।
२३. उचित समय पर जागरूकता
श्लोक
प्रारब्धव्ये निरुद्योगी
जागर्तव्ये प्रसुप्तकः।
विश्वस्तश्च भयस्थाने
हा नरः को न हन्यते॥
संदर्भ: गरुड़ पुराण, प्रेतकल्प, अध्याय ४९, श्लोक ३१। �
Vedapath
अर्थ
जो कार्य करने के समय आलसी हो, जागते रहने के समय सोता हो और भय के स्थान में निश्चिन्त रहता हो—ऐसा मनुष्य विनाश से कैसे बच सकता है?
भावार्थ
जीवन में समयानुकूल कर्म, सतर्कता और विवेक आवश्यक हैं।
२४. संसार दुःख का कारण है
श्लोक
दुःखमूलं हि संसारः
स यस्यास्ति स दुःखितः।
तस्य त्यागः कृतो येन
स सुखी नापरः क्वचित्॥
संदर्भ: गरुड़ पुराण, प्रेतकल्प, अध्याय ४९, श्लोक ४६। �
Vedapath
अर्थ
संसार दुःख का मूल है। जो उसमें आसक्त है, वह दुःखी रहता है। जिसने उसकी आसक्ति का त्याग कर दिया, वही वास्तव में सुखी है।
भावार्थ
यह शिक्षा परिवार या कर्तव्य छोड़ने की नहीं, बल्कि अत्यधिक मोह और आसक्ति से मुक्त होने की प्रेरणा देती है।
२५. संसार की आसक्ति से सावधान
श्लोक
प्रभवं सर्वदुःखानामालयं सकलापदाम्।
आश्रयं सर्वपापानां संसारं वर्जयेत्क्षणात्॥
संदर्भ: गरुड़ पुराण, प्रेतकल्प, अध्याय ४९, श्लोक ४७। �
Vedapath
अर्थ
संसार को सभी दुःखों का मूल, समस्त विपत्तियों का घर और पापों का आश्रय समझकर उसकी मोहपूर्ण आसक्ति का त्याग करना चाहिए।
भावार्थ
मनुष्य संसार में रहते हुए भी विवेक और वैराग्य के साथ जीवन जी सकता है।
२६. मोह का बन्धन
श्लोक
लोहदारुमयैः पाशैः
पुमान्बद्धो विमुच्यते।
पुत्रदारमयैः पाशैः
मुच्यते न कदाचन॥
संदर्भ: गरुड़ पुराण, प्रेतकल्प, अध्याय ४९, श्लोक ४८। �
Vedapath
अर्थ
लोहे और लकड़ी के बन्धनों में बँधा मनुष्य मुक्त हो सकता है, परन्तु पुत्र और पत्नी आदि के प्रति अत्यधिक मोह के बन्धन से मुक्त होना अत्यन्त कठिन है।
भावार्थ
यहाँ परिवार का त्याग नहीं, बल्कि अन्धे मोह से बचने की शिक्षा दी गई है।
२७. जितने सम्बन्ध, उतनी शोक की सम्भावना
श्लोक
यावतः कुरुते जन्तुः
सम्बन्धान्मनसः प्रियान्।
तावन्तोऽस्य निखन्यन्ते
हृदये शोकशङ्कवः॥
संदर्भ: गरुड़ पुराण, प्रेतकल्प, अध्याय ४९, श्लोक ४९। �
Vedapath
अर्थ
जीव जितने लोगों और वस्तुओं के साथ मन में अत्यधिक प्रिय सम्बन्ध बनाता है, उतने ही शोक के शूल उसके हृदय में गड़ते जाते हैं।
भावार्थ
प्रेम आवश्यक है, लेकिन अत्यधिक स्वामित्व-बोध और मोह दुःख का कारण बन सकता है।
२८. इन्द्रियों के चोर
श्लोक
वञ्चिताशेषवित्तैस्तैर्नित्यं लोको विनाशितः।
हा हन्त विषयाहारैर्देहस्थेन्द्रियतस्करैः॥
संदर्भ: गरुड़ पुराण, प्रेतकल्प, अध्याय ४९, श्लोक ५०। �
Vedapath
अर्थ
शरीर में रहने वाली इन्द्रियरूपी चोर, विषय-भोगों में लगाकर मनुष्य को धोखा देती हैं और उसका सर्वस्व नष्ट कर देती हैं।
भावार्थ
यदि इन्द्रियों पर नियंत्रण न हो तो मनुष्य अपनी शक्ति, समय और विवेक नष्ट कर सकता है।
२९. भोग का लोभ और संकट
श्लोक
मांसलुब्धो यथा मत्स्यो
लोहशङ्कुं न पश्यति।
सुखलुब्धस्तथा देही
यमवाधां न पश्यति॥
संदर्भ: गरुड़ पुराण, प्रेतकल्प, अध्याय ४९, श्लोक ५१। �
Vedapath
अर्थ
जैसे मांस के लोभ में मछली लोहे के काँटे को नहीं देखती, वैसे ही सुख के लोभ में पड़ा जीव उसके आगे आने वाले दुःख को नहीं देखता।
भावार्थ
क्षणिक सुख के लोभ में मनुष्य को दीर्घकालीन हानि को नहीं भूलना चाहिए।
३०. हित और अहित का विवेक
श्लोक
हिताहितं न जानन्तो
नित्यमुन्मार्गगामिनः।
कुक्षिपूरणनिष्ठा ये
ते नरा नारकाः खग॥
संदर्भ: गरुड़ पुराण, प्रेतकल्प, अध्याय ४९, श्लोक ५२। �
Vedapath
अर्थ
हे खगश्रेष्ठ! जो हित और अहित को नहीं जानते, सदा कुमार्ग पर चलते हैं और केवल पेट भरने में ही लगे रहते हैं, वे अधोगति को प्राप्त होते हैं।
भावार्थ
मनुष्य का जीवन केवल भोजन और भौतिक आवश्यकताओं तक सीमित नहीं होना चाहिए। उसे विवेक, धर्म और आत्मोन्नति की ओर भी बढ़ना चाहिए।
अमृतवाणी २१ से ३० का सार
क्रम
अमृतवाणी
मुख्य शिक्षा
२१
सम्पदः स्वप्नसंकाशाः
जीवन और वैभव क्षणभंगुर हैं
२२
शतं जीवितमत्यल्पम्
समय का सदुपयोग करो
२३
प्रारब्धव्ये निरुद्योगी
समय पर कर्म और सतर्कता
२४
दुःखमूलं हि संसारः
मोह से दुःख उत्पन्न होता है
२५
प्रभवं सर्वदुःखानाम्
वैराग्य और विवेक अपनाओ
२६
लोहदारुमयैः पाशैः
मोह का बन्धन कठिन है
२७
यावतः कुरुते जन्तुः
आसक्ति शोक का कारण बनती है
२८
देहस्थेन्द्रियतस्करैः
इन्द्रियों पर संयम रखो
२९
मांसलुब्धो यथा मत्स्यः
क्षणिक सुख के लोभ से बचो
३०
हिताहितं न जानन्तः
विवेकपूर्ण जीवन जीओ
**�⁠अगला भाग — अमृतवाणियाँ ३१ से ४० — इसी क्रम में मूल संस्कृत श्लोक, अध्याय-श्लोक संख्या और हिंदी अर्थ सहित प्रस्तुत किया जा सकता है।**

गरुड़ पुराण की ५० अमृतवाणियाँ
भाग–४ : अमृतवाणियाँ ३१ से ४०
नीचे के श्लोक गरुड़ पुराण, प्रेतकल्प, अध्याय ४९ की उपलब्ध पाठ-परंपरा के अनुसार दिए जा रहे हैं। �
Vedic People +2
३१. शरीर की प्राकृतिक बाधाएँ
श्लोक
प्रभाते मलमूत्राभ्यां
क्षुत्तृड्भ्यां मध्यगे रवौ।
रात्रौ मदननिद्राभ्यां
बाध्यन्ते मूढमानवाः॥
संदर्भ: गरुड़ पुराण, प्रेतकल्प, अध्याय ४९, श्लोक ५४। �
Vedapath
अर्थ
मूर्ख मनुष्य प्रातःकाल मल-मूत्र की आवश्यकता से, दोपहर में भूख-प्यास से और रात्रि में काम तथा निद्रा से बाधित रहते हैं।
भावार्थ
शरीर अनेक प्राकृतिक आवश्यकताओं से बँधा हुआ है। इसलिए मनुष्य को केवल शारीरिक सुखों में ही जीवन व्यतीत नहीं करना चाहिए, बल्कि विवेक और आत्मिक उन्नति का भी प्रयत्न करना चाहिए।
३२. अज्ञान के मोह में जीवन
श्लोक
स्वदेहधनदारादिनिरताः सर्वजन्तवः।
जायन्ते च म्रियन्ते च
हा हन्ताज्ञानमोहिताः॥
संदर्भ: गरुड़ पुराण, प्रेतकल्प, अध्याय ४९, श्लोक ५५। �
Vedapath
अर्थ
सभी जीव अपने शरीर, धन, पत्नी आदि में लगे रहते हैं; अज्ञान से मोहित होकर वे जन्म लेते और मृत्यु को प्राप्त होते रहते हैं।
भावार्थ
शरीर, धन और परिवार का महत्त्व है, परंतु उनके प्रति अन्धा मोह मनुष्य को जीवन के उच्च उद्देश्य से दूर कर सकता है।
३३. सत्संग का महत्त्व
श्लोक
तस्मात्सङ्गः सदा त्याज्यः
सचेत्त्यक्तुं न शक्यते।
महद्भिः सह कर्तव्यः
सन्तः सङ्गस्य भेषजम्॥
संदर्भ: गरुड़ पुराण, प्रेतकल्प, अध्याय ४९, श्लोक ५६। �
Vedapath
अर्थ
इसलिए अनुचित संगति का सदा त्याग करना चाहिए। यदि संग का पूर्ण त्याग संभव न हो, तो महापुरुषों और सज्जनों का संग करना चाहिए, क्योंकि संतों का संग सांसारिक आसक्ति का औषध है।
भावार्थ
मनुष्य जैसा संग करता है, उसका वैसा ही प्रभाव उसके विचार और आचरण पर पड़ता है।
३४. सत्संग और विवेक—दो निर्मल नेत्र
श्लोक
सत्सङ्गश्च विवेकश्च
निर्मलं नयनद्वयम्।
यस्य नास्ति नरः सोऽन्धः
कथं न स्यादमार्गगः॥
संदर्भ: गरुड़ पुराण, प्रेतकल्प, अध्याय ४९, श्लोक ५७। �
Vedapath
अर्थ
सत्संग और विवेक मनुष्य के दो निर्मल नेत्र हैं। जिसके पास ये नहीं हैं, वह अन्धे के समान है; फिर वह गलत मार्ग पर क्यों नहीं जाएगा?
भावार्थ
सज्जनों की संगति और सही-गलत का विवेक जीवन को उचित दिशा प्रदान करते हैं।
३५. बाहरी आचरण ही परम धर्म नहीं
श्लोक
स्वस्ववर्णाश्रमाचारनिरताः सर्वमानवाः।
न जानन्ति परं धर्मं
वृथा नश्यन्ति दाम्भिकाः॥
संदर्भ: गरुड़ पुराण, प्रेतकल्प, अध्याय ४९, श्लोक ५८। �
Vedapath
अर्थ
अपने-अपने वर्ण और आश्रम के बाहरी आचरणों में लगे हुए बहुत से लोग परम धर्म को नहीं जानते; दम्भी लोग व्यर्थ ही नष्ट होते हैं।
भावार्थ
धर्म केवल बाहरी रूप और प्रदर्शन का नाम नहीं है। उसके मूल में सत्य, ज्ञान और आत्मशुद्धि होनी चाहिए।
३६. अज्ञान में किया गया प्रदर्शन
श्लोक
किमायासपराः केचिद्
व्रतचर्यादिसंयुताः।
अज्ञानसंवृतात्मानः
सञ्चरन्ति प्रचारकाः॥
संदर्भ: गरुड़ पुराण, प्रेतकल्प, अध्याय ४९, श्लोक ५९। �
Vedapath
अर्थ
कुछ लोग अत्यधिक परिश्रम करते हुए व्रत और आचार आदि में लगे रहते हैं, किंतु उनका अंतःकरण अज्ञान से ढका रहता है और वे उपदेशक बनकर घूमते हैं।
भावार्थ
केवल बाहरी धार्मिक कर्म पर्याप्त नहीं हैं; वास्तविक धर्म के लिए ज्ञान, विनम्रता और आत्मशुद्धि आवश्यक है।
३७. केवल कर्मकाण्ड में उलझना
श्लोक
नाममात्रेण सन्तुष्टाः
कर्मकाण्डरता नराः।
मन्त्रोच्चारणहोमाद्यैः
भ्रामिताः क्रतुविस्तरैः॥
संदर्भ: गरुड़ पुराण, प्रेतकल्प, अध्याय ४९, श्लोक ६०। �
Vedapath
अर्थ
केवल नाम और बाहरी रूप से संतुष्ट रहने वाले कर्मकाण्ड में आसक्त लोग मंत्रोच्चार, होम आदि यज्ञों के विस्तार में भ्रमित हो जाते हैं।
भावार्थ
श्लोक का आशय यह है कि धार्मिक कर्मों के साथ उनके वास्तविक उद्देश्य—ज्ञान और आत्मिक उन्नति—को भी समझना चाहिए।
३८. केवल शरीर को कष्ट देना मुक्ति नहीं
श्लोक
एकभुक्तोपवासाद्यैः
नियमैः कायशोषणैः।
मूढाः परोक्षमिच्छन्ति
मम मायाविमोहिताः॥
संदर्भ: गरुड़ पुराण, प्रेतकल्प, अध्याय ४९, श्लोक ६१। �
Vedapath
अर्थ
मेरी माया से मोहित मूर्ख लोग एक समय भोजन करने, उपवास और शरीर को सुखाने वाले नियमों के द्वारा परम सत्य की प्राप्ति चाहते हैं।
भावार्थ
आत्मसंयम महत्त्वपूर्ण है, लेकिन केवल शरीर को कष्ट देना ही आध्यात्मिक ज्ञान का पर्याप्त साधन नहीं है।
३९. विवेक के बिना शरीर-दण्ड व्यर्थ
श्लोक
देहदण्डनमात्रेण
का मुक्तिरविवेकिनाम्।
वल्मीकताडनादेव
मृतः किन्नु महोरगः॥
संदर्भ: गरुड़ पुराण, प्रेतकल्प, अध्याय ४९, श्लोक ६२। �
Vedapath
अर्थ
केवल शरीर को कष्ट देने से विवेकहीन लोगों को कैसी मुक्ति मिल सकती है? क्या केवल बाँबी को पीटने से उसमें रहने वाला बड़ा सर्प मर जाएगा?
भावार्थ
बाहरी साधना के साथ ज्ञान और विवेक भी आवश्यक हैं। केवल बाहरी कष्ट सहना आत्मज्ञान की गारंटी नहीं है।
४०. बाहरी वेश से सच्चा ज्ञान नहीं
श्लोक
जटाभाराजिनैर्युक्ता
दाम्भिका वेषधारिणः।
भ्रमन्ति ज्ञानिवल्लोके
भ्रामयन्ति जनानपि॥
संदर्भ: गरुड़ पुराण, प्रेतकल्प, अध्याय ४९, श्लोक ६३। �
Vedapath
अर्थ
जटाओं और मृगचर्म आदि का बाहरी वेश धारण करने वाले दम्भी लोग संसार में ज्ञानी के समान घूमते हैं और लोगों को भी भ्रमित करते हैं।
भावार्थ
सच्चे ज्ञान की पहचान केवल वेशभूषा से नहीं होती। चरित्र, ज्ञान, सत्य और आचरण अधिक महत्त्वपूर्ण हैं।
अमृतवाणी ३१ से ४० का सार
क्रम
मुख्य शिक्षा
३१
शरीर की सीमाओं को समझो
३२
अज्ञानपूर्ण मोह से बचो
३३
सज्जनों का संग करो
३४
सत्संग और विवेक जीवन के नेत्र हैं
३५
दम्भपूर्ण धर्माचार से बचो
३६
बाहरी आचार के साथ ज्ञान आवश्यक है
३७
कर्मकाण्ड का वास्तविक उद्देश्य समझो
३८
केवल शरीर को कष्ट देना पर्याप्त नहीं
३९
मुक्ति के लिए विवेक आवश्यक है
४०
बाहरी वेश से ज्ञान सिद्ध नहीं होता
इस प्रकार ४० अमृतवाणियाँ पूर्ण हुईं। �
Vedapath +1
**�⁠अगला और अंतिम भाग — ४१ से ५० — भी इसी क्रम में मूल संस्कृत श्लोक, अध्याय-श्लोक संख्या और हिंदी अर्थ सहित प्रस्तुत किया जा सकता है।**

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