×(99)दर्शनोपनिषद
दर्शनोपनिषद् — द्वितीय खण्ड
दशविध नियम — मूल संस्कृत एवं हिन्दी अर्थ
दर्शनोपनिषद् के द्वितीय खण्ड में दस नियमों का वर्णन है—तप, संतोष, आस्तिक्य, दान, ईश्वरपूजन, सिद्धान्तश्रवण, ह्री, मति, जप और व्रत। उपलब्ध मूल पाठ में यह खण्ड १६ मंत्रों में पूर्ण होता है। �
TransLiteral +1
मन्त्र १–२ : दस नियम
तपः सन्तोषमास्तिक्यं दानमीश्वरपूजनम् ।
सिद्धान्तश्रवणं चैव ह्रीर्मतिश्च जपो व्रतम् ॥ १ ॥
एते च नियमाः प्रोक्तास्तान्वक्ष्यामि क्रमाच्छृणु ॥ २ ॥
हिन्दी अर्थ:
तप, संतोष, आस्तिक्य, दान, ईश्वर-पूजन, सिद्धान्त-श्रवण, ह्री अर्थात् लज्जा, मति, जप और व्रत—ये दस नियम बताए गए हैं। अब मैं इनका क्रमशः वर्णन करता हूँ, ध्यानपूर्वक सुनो। �
TransLiteral
१. तप
वेदोक्तेन प्रकारेण कृच्छ्रचान्द्रायणादिभिः ।
शरीरशोषणं यत्तत्तप इत्युच्यते बुधैः ॥ ३ ॥
अर्थ:
वेदों में बताए हुए विधान के अनुसार कृच्छ्र, चान्द्रायण आदि व्रतों द्वारा शरीर को संयमित एवं तप्त करना तप कहलाता है।
लेकिन उपनिषद् तप का एक आन्तरिक स्वरूप भी बताती है—
को वा मोक्षः कथं तेन संसारं प्रतिपन्नवान् ।
इत्यालोकनमर्थज्ञास्तपः शंसन्ति पण्डिताः ॥ ४ ॥
अर्थ:
“मोक्ष क्या है? वह किस प्रकार प्राप्त होता है? जीव संसार में किस प्रकार आया?”—इस प्रकार आत्म-मोक्ष और संसार के स्वरूप का गम्भीर विचार करना भी विद्वान् पुरुषों ने तप कहा है। �
TransLiteral
२. संतोष
यदृच्छालाभतो नित्यं प्रीतिर्या जायते नृणाम् ।
तत्सन्तोषं विदुः प्राज्ञाः परिज्ञानैकतत्पराः ॥ ५ ॥
अर्थ:
बिना अत्यधिक इच्छा किए, जो कुछ स्वाभाविक रूप से प्राप्त हो जाए, उसमें निरन्तर प्रसन्न रहना संतोष है। ज्ञान में तत्पर विद्वान् पुरुष इसे संतोष कहते हैं।
संतोष का उच्चतर स्वरूप भी बताया गया है—
ब्रह्मादिलोकपर्यन्ताद्विरक्त्या यल्लभेत् प्रियम् ।
सर्वत्र विगतस्नेहः संतोषं परमं विदुः ॥
अर्थ:
ब्रह्मलोक तक के सभी सांसारिक सुखों में आसक्ति छोड़कर, हर परिस्थिति में जो प्रसन्नता और समभाव बना रहे, उसे ज्ञानीजन परम संतोष कहते हैं। �
TransLiteral
३. आस्तिक्य
श्रौते स्मार्ते च विश्वासो यत्तदास्तिक्यमुच्यते ॥ ६ ॥
अर्थ:
श्रुति अर्थात् वेद तथा स्मृति-ग्रन्थों में प्रतिपादित धर्म और सिद्धान्तों में श्रद्धापूर्वक विश्वास रखना आस्तिक्य कहलाता है। �
TransLiteral
४. दान
न्यायार्जितधनं श्रान्ते श्रद्धया वैदिके जने ।
अन्यद्वा यत्प्रदीयन्ते तद्दानं प्रोच्यते मया ॥ ७ ॥
अर्थ:
न्यायपूर्वक अर्जित धन अथवा अन्य वस्तुओं को श्रद्धापूर्वक योग्य व्यक्ति को प्रदान करना दान कहलाता है। इसमें धन के साथ-साथ अन्य उपयोगी वस्तुओं का श्रद्धापूर्वक दिया जाना भी सम्मिलित है। �
TransLiteral
५. ईश्वरपूजन
रागाद्यपेतं हृदयं वागदुष्टानृतादिना ।
हिंसादिरहितं कर्म यत्तदीश्वरपूजनम् ॥ ८ ॥
अर्थ:
जिसका हृदय राग-द्वेष आदि से रहित हो, जिसकी वाणी असत्य आदि दोषों से मुक्त हो और जिसके कर्म हिंसा आदि से रहित हों—ऐसा शुद्ध आचरण ही ईश्वर-पूजन कहा गया है।
अर्थात् केवल बाहरी पूजा ही नहीं, बल्कि शुद्ध हृदय, सत्य वाणी और अहिंसक कर्म भी ईश्वर की पूजा हैं। �
TransLiteral
६. सिद्धान्तश्रवण
सत्यं ज्ञानमनन्तं च परानन्दं परं ध्रुवम् ।
प्रत्यगित्यवगन्तव्यं वेदान्तश्रवणं बुधैः ॥ ९ ॥
अर्थ:
“परम सत्य, ज्ञानस्वरूप, अनन्त, परम आनन्दमय और नित्य आत्मस्वरूप है”—इस तत्त्व को जानने के लिए वेदान्त के सिद्धान्तों को गुरु एवं शास्त्र से सुनना सिद्धान्तश्रवण है। �
TransLiteral
७. ह्री — लज्जा
वेदलौकिकमार्गेषु कुत्सितं कर्म यद्भवेत् ।
तस्मिन् भवति या लज्जा ह्रीः सैवेति प्रकीर्तिता ॥ १० ॥
अर्थ:
वेदसम्मत तथा श्रेष्ठ लौकिक आचरण के विरुद्ध कोई निन्दनीय कर्म हो जाए और उस कर्म के प्रति भीतर से लज्जा उत्पन्न हो, तो उस सद्भाव को ह्री कहा गया है।
अर्थात् गलत कर्म करने पर मन में नैतिक लज्जा उत्पन्न होना भी योग का एक नियम है। �
TransLiteral
८. मति
वैदिकेषु च सर्वेषु श्रद्धा या सा मतिर्भवेत् ।
गुरुणा चोपदिष्टोऽपि तत्र संबन्धवर्जितः ॥ ११ ॥
अर्थ:
वेदविहित सभी श्रेष्ठ कर्मों और सिद्धान्तों में जो श्रद्धा एवं सद्बुद्धि हो, उसे मति कहा गया है।
अर्थात् विवेकपूर्वक धर्ममार्ग को स्वीकार करना और उसके प्रति दृढ़ श्रद्धा रखना मति है। �
TransLiteral
९. जप
वेदोक्तेनैव मार्गेण मन्त्राभ्यासो जपः स्मृतः ।
कल्पसूत्रे तथा वेदे धर्मशास्त्रे पुराणके ।
इतिहासे च वृत्तिर्या स जपः प्रोच्यते मया ॥ १२ ॥
अर्थ:
वेदसम्मत विधि से मन्त्र का बार-बार अभ्यास करना जप कहलाता है। कल्पसूत्र, वेद, धर्मशास्त्र, पुराण और इतिहास आदि में बताए गए मन्त्रों का विधिपूर्वक अभ्यास भी जप है। �
TransLiteral
जप के प्रकार
जपस्तु द्विविधः प्रोक्तो वाचिको मानसस्तथा ॥ १३ ॥
अर्थ:
जप दो प्रकार का कहा गया है—
१. वाचिक जप और २. मानसिक जप।
वाचिकोपांशुरुच्चैश्च द्विविधः परिकीर्तितः ।
मानसो मननध्यानभेदाद्द्वैविध्यमाश्रितः ॥ १४ ॥
अर्थ:
वाचिक जप के दो भेद हैं—उच्च स्वर में और उपांशु (बहुत धीमे स्वर में)। मानसिक जप के भी मनन और ध्यान के भेद से दो रूप माने गए हैं।
जप की श्रेष्ठता
उच्चैर्जपादुपांशुश्च सहस्रगुणमुच्यते ।
मानसश्च तथोपांशोः सहस्रगुणमुच्यते ॥ १५ ॥
अर्थ:
उच्च स्वर में किए जाने वाले जप की अपेक्षा उपांशु जप को हजार गुना अधिक फलदायक कहा गया है और उपांशु जप की अपेक्षा मानसिक जप को भी हजार गुना अधिक फलदायक माना गया है। �
TransLiteral
उच्चैर्जपश्च सर्वेषां यथोक्तफलदो भवेत् ।
नीचैः श्रोत्रेण चेन्मन्त्रः श्रुतश्चेन्निष्फलं भवेत् ॥ १६ ॥
अर्थ:
उच्च स्वर में किया गया जप भी शास्त्र में बताए हुए फल को प्रदान करता है। परन्तु यदि मन्त्र का उच्चारण इतना अस्पष्ट या गलत हो कि वह ठीक प्रकार सुनाई ही न दे, तो ऐसा जप निष्फल हो जाता है।
इति द्वितीयः खण्डः।
यहाँ दर्शनोपनिषद् का द्वितीय खण्ड समाप्त होता है। �
TransLiteral
संक्षेप में द्वितीय खण्ड का संदेश
तप → आत्मचिन्तन
संतोष → प्राप्त वस्तु में प्रसन्नता
आस्तिक्य → वेद-विहित धर्म में श्रद्धा
दान → न्यायपूर्वक अर्जित वस्तु का श्रद्धापूर्वक देना
ईश्वरपूजन → शुद्ध हृदय, वाणी और कर्म
सिद्धान्तश्रवण → ब्रह्मविद्या का श्रवण
ह्री → अधर्म में लज्जा
मति → धर्म में श्रद्धायुक्त बुद्धि
जप → मन्त्र का नियमित अभ्यास
व्रत → संकल्पपूर्वक नियम का पालन
मूल पाठ के अनुसार तृतीय खण्ड में नौ आसनों—स्वस्तिक, गोमुख, पद्म, वीर, सिंह, भद्र, मुक्त, मयूर और सुखासन—का वर्णन आता है। �
Sanskrit Documents
Comments
Post a Comment