(91) त्रिपुरोपनिषद

      त्रिपुरोपनिषद---
त्रिपुरोपनिषद् का उपलब्ध पाठ १६ मुख्य मन्त्रों में है। यह ऋग्वेद से सम्बद्ध शाक्त उपनिषद् के रूप में परम्परागत रूप से सूचीबद्ध है।
 ॥ श्रीत्रिपुरोपनिषत् ॥
मंगलाचरण
त्रिपुरोपनिषद्वेद्यपारमैश्वर्यवैभवम् 
अखण्डानन्दसाम्राज्यं रामचन्द्रपदं भजे ॥
अर्थ:
मैं उस श्रीरामचन्द्र के चरणों का ध्यान करता हूँ, जिनका परम ऐश्वर्य और महिमा त्रिपुरोपनिषद् द्वारा जानने योग्य है और जो अखण्ड आनन्द के साम्राज्यस्वरूप है।
शान्तिपाठ
ॐ वाङ्मे मनसि प्रतिष्ठिता ।
मनो मे वाचि प्रतिष्ठितम् ।
आविरावीर्म एधि ।
वेदस्य म आणीस्थः ।
श्रुतं मे मा प्रहासीः ।
अनेनाधीतेनाहोरात्रान् संदधामि ।
ऋतं वदिष्यामि । सत्यं वदिष्यामि 
तन्मामवतु । तद्वक्तारमवतु ।
अवतु माम् । अवतु वक्तारम् । अवतु वक्तारम् ।
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
अर्थ:
हे परमात्मन्! मेरी वाणी मन में प्रतिष्ठित हो और मेरा मन वाणी में प्रतिष्ठित हो। आप मेरे भीतर प्रकट हों। मेरे द्वारा अध्ययन किए गए वेदज्ञान को स्थिर रखें और मेरी सुनी हुई विद्या मुझसे दूर न हो। मैं दिन-रात इस अध्ययन को निरन्तर बनाए रखूँ। मैं ऋत बोलूँगा, सत्य बोलूँगा। वह परम सत्य मेरी रक्षा करे और मेरे आचार्य तथा मेरी भी रक्षा करे। शान्ति, शान्ति, शान्ति।
मन्त्र १
ॐ तिस्रः पुरास्त्रिपथा विश्वचर्षणा
अत्राकथा अक्षराः सन्निविष्टाः ।
अधिष्ठाना अजरा पुराणी
महत्तरा महिमा देवतानाम् ॥ १॥
अर्थ:
तीन पुरियाँ अथवा तीन अवस्थाएँ—जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति—इस त्रिपुरा शक्ति के क्षेत्र हैं। उनमें अक्षर, अविनाशी तत्त्व प्रतिष्ठित है। वह प्राचीन, अजर और महान् शक्ति देवताओं की भी महिमा का आधार है।
भाव:
यहाँ ‘त्रिपुरा’ को केवल किसी बाहरी देवी के रूप में नहीं, बल्कि चेतना के तीन स्तरों में व्याप्त परमशक्ति के रूप में समझाया गया है। 
मन्त्र २
नवयोनीर्नवचक्राणि दधिरे
नवैव योगा नव योगिन्यश्च ।
नवानां चक्रा अधिनाथाः स्योना
नव मुद्रा नव भद्रा महीनाम् ॥ २॥
अर्थ:
उस त्रिपुरा शक्ति में नौ योनियाँ, नौ चक्र, नौ प्रकार के योग और नौ योगिनियाँ स्थित हैं। नौ चक्रों के अधिपति हैं तथा नौ मुद्राएँ और पृथ्वी को कल्याण देने वाली नौ शक्तियाँ भी उसमें प्रतिष्ठित हैं।
भाव:
यह मन्त्र श्रीविद्या की गूढ़ प्रतीक-परम्परा की ओर संकेत करता है, जहाँ संख्या नौ अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है।
मन्त्र ३
एका स आसीत्प्रथमा सा नवासीदासोनविंशादासोनत्रिंशात् 
चत्वारिंशादथ तिस्रः समिधा
उशतीरिव मातरो मा विशन्तु ॥ ३॥
अर्थ:
वह शक्ति मूलतः एक ही थी। उसी एक से अनेक रूपों का विस्तार हुआ। वह विभिन्न संख्यात्मक एवं तात्त्विक रूपों में प्रकट होती है। वे तीन मातृशक्तियाँ प्रकाशमान अग्नि की समिधाओं के समान हमारे भीतर प्रवेश करें।
भाव:
एक से अनेक और अनेक से पुनः एक—यह त्रिपुरा-तत्त्व की एक महत्त्वपूर्ण दार्शनिक दिशा है। 
मन्त्र ४
ऊर्ध्वज्वलज्ज्वलनं ज्योतिरग्रे
तमो वै तिरश्चीनमजरं तद्रजोऽभूत् 
आनन्दनं मोदनं ज्योतिरिन्दोरेता
उ वै मण्डला मण्डयन्ति ॥ ४॥
अर्थ:
ऊर्ध्व में प्रज्वलित अग्नि के समान ज्योति है। उसके सामने अन्धकार भी दिखाई देता है। वह अविनाशी तत्त्व रजोगुण के रूप में व्यक्त होता है। आनन्द और प्रसन्नता देने वाली चन्द्र-ज्योति के मण्डल भी उसी शक्ति से सुशोभित होते हैं।
भाव:
प्रकाश, अन्धकार, गुण और आनन्द—इन सभी में उसी एक शक्ति की विभिन्न अभिव्यक्तियाँ देखी गई हैं।
मन्त्र ५
यास्तिस्रो रेखाः सदनानि भूस्त्रीस्त्रिविष्टपास्त्रिगुणास्त्रिप्रकाराः ।
एतत्त्रयं पूरकं पूरकाणां
मन्त्री प्रथते मदनो मदन्या ॥ ५॥
अर्थ:
तीन रेखाएँ, तीन निवास-स्थान, तीन लोक, तीन गुण और तीन प्रकार—ये सब उसी त्रिविध शक्ति के रूप हैं। इन तीनों का पूर्ण करने वाला मन्त्र है; वह साधक के भीतर कामशक्ति और चेतना के विस्तार को प्रकाशित करता है।
मन्त्र ६
मदन्तिका मानिनी मङ्गला च
सुभागा च सा सुन्दरी सिद्धिमत्ता 
लज्जा मतिस्तुष्टिरष्टा च पुष्टा
लक्ष्मीरुमा ललिता लालपन्ती ॥ ६॥
अर्थ:
वह देवी अनेक नाम और शक्तिरूप धारण करती है—मदन्तिका, मानिनी, मङ्गला, सुभागा, सुन्दरी, सिद्धिमती, लज्जा, मति, तुष्टि, पुष्टि, लक्ष्मी, उमा और ललिता आदि।
भाव:
देवी के अनेक नाम उसके अनेक शक्ति-स्वरूपों का संकेत हैं—बुद्धि, तुष्टि, पुष्टि, लक्ष्मी, लज्जा, सौन्दर्य और सिद्धि आदि।
मन्त्र ७
इमां विज्ञाय सुधिया मदन्ती
परिस्रुता तर्पयन्तः स्वपीठम् ।
नाकस्य पृष्ठे महतो वसन्ति
परं धाम त्रैपुरं चाविशन्ति ॥ ७॥
अर्थ:
जो विवेकी साधक इस त्रिपुरा शक्ति को जानकर अपने अन्तःकरण को उससे परिपूर्ण करता है और अपने आध्यात्मिक आधार को तृप्त करता है, वह महान् दिव्य धाम को प्राप्त होता है और त्रिपुरा के परम धाम में प्रवेश करता है।
भाव:
यहाँ त्रिपुरा-उपासना का लक्ष्य बाहरी उपलब्धि मात्र नहीं, बल्कि परम आध्यात्मिक धाम की प्राप्ति है।
मन्त्र ८
कामो योनिः कामकला वज्रपाणिर्गुहाहसा
मातरिश्वाभ्रमिन्द्रः ।
पुनर्गुहा सकला मायया च
पुरूच्येषा विश्वमातादिविद्या ॥ ८॥
अर्थ:
काम, योनि, कामकला, वज्रपाणि, गुहा, मातरिश्वा, अभ्र, इन्द्र आदि नामों और तत्त्वों में वही शक्ति अभिव्यक्त होती है। पुनः वही गुप्त रूप से सम्पूर्ण जगत् में माया के माध्यम से व्याप्त रहती है। वही विश्वमाता और आदि विद्या है।
भाव:
यह मन्त्र त्रिपुरा को विश्वमाता और आदिविद्या के रूप में प्रस्तुत करता है।
मन्त्र ९
षष्ठं सप्तममथ वह्निसारथिमस्या
मूलत्रिकमादेशयन्तः ।
कथ्यं कविं कल्पकं काममीशं
तुष्टुवांसो अमृतत्वं भजन्ते ॥ ९॥
अर्थ:
जो साधक इस शक्ति के मूल त्रिक का उपदेश और ज्ञान प्राप्त करके उसके भीतर स्थित दिव्य तत्त्व की स्तुति करते हैं—उस सर्वज्ञ, सृजनशील और कामेश्वर तत्त्व की—वे अमृतत्व को प्राप्त होते हैं।
भाव:
यहाँ मूलत्रिक और कामेश्वर-तत्त्व श्रीविद्या के गूढ़ दर्शन से जुड़े हैं।
मन्त्र १०
पुरं हन्त्री मुखं विश्वमातू
रवे रेखा स्वरमध्यं तदेषा ।
बृहत्तिथिर्दश पञ्च च नित्या
सषोडशीकं पुरमध्यं बिभर्ति ॥ १०॥
अर्थ:
विश्वमाता का मुख ही त्रिपुर का द्वार है। उसकी रेखाएँ सूर्य और स्वर के मध्य स्थित तत्त्वों का संकेत करती हैं। पन्द्रह नित्याएँ तथा उनके साथ षोडशी शक्ति उस त्रिपुर के मध्य में प्रतिष्ठित हैं।
भाव:
यह मन्त्र पन्द्रह नित्याओं और षोडशी की श्रीविद्या-परम्परा की ओर संकेत करता है। 
मन्त्र ११
यद्वा मण्डलाद्वा स्तनबिम्बमेकं
मुखं चाधस्त्रीणि गुहासदनानि ।
कामी कलां कामरूपां चिकित्वा
नरो जायते कामरूपश्च कामः ॥ ११॥
अर्थ:
चाहे इसे मण्डल के रूप में समझें, अथवा एक स्तनबिम्ब और एक मुख तथा नीचे स्थित तीन गुप्त स्थानों के रूप में—जो पुरुष कामकला और उसके वास्तविक स्वरूप को जान लेता है, वह अपनी इच्छाओं के वास्तविक तत्त्व को जानने वाला हो जाता है।
भाव:
यहाँ प्रतीकात्मक भाषा के माध्यम से सृष्टिशक्ति और चेतना की मूल कामकला का विवेचन किया गया है।
मन्त्र १२
परिस्रुतं झषमाजं फलं च
भक्तानि योनीः सुपरिष्कृताश्च ।
निवेदयन्देवतायै महत्यै
स्वात्मीकृते सुकृते सिद्धिमेति ॥ १२॥
अर्थ:
जो साधक विविध अर्पणों, फलों और श्रद्धापूर्वक शुद्ध किए हुए उपहारों को उस महान् देवी को समर्पित करता है और अपने सम्पूर्ण कर्म को देवी को समर्पित भाव से करता है, वह सिद्धि को प्राप्त होता है।
भाव:
बाहरी पूजा का मूल उद्देश्य आत्मसमर्पण और अपने कर्मों को दिव्य चेतना को अर्पित करना है।
मन्त्र १३
सृण्येव सितया विश्वचर्षणिः
पाशेनैव प्रतिबध्नात्यभीकाम् ।
इषुभिः पञ्चभिर्धनुषा च विध्यत्यादिशक्तिररुणा
विश्वजन्या ॥ १३॥
अर्थ:
विश्व में विचरण करने वाली आदि शक्ति श्वेत अंकुश के समान नियन्त्रण करती है, पाश के द्वारा आसक्ति को बाँधती है और पाँच बाणों तथा धनुष द्वारा जीव के अनुभव-जगत् को प्रभावित करती है। वही अरुणवर्णा आदि शक्ति सम्पूर्ण जगत् की जननी है।
भाव:
यहाँ देवी के अंकुश, पाश, धनुष और पाँच बाणों का प्रसिद्ध श्रीविद्यात्मक प्रतीक मिलता है। 
मन्त्र १४
भगः शक्तिर्भगवान्काम ईश
उभा दाताराविह सौभगानाम् ।
समप्रधानौ समसत्त्वौ समोजौ
तयोः शक्तिरजरा विश्वयोनिः ॥ १४॥
अर्थ:
भग और शक्ति, भगवान् और कामेश्वर—ये दोनों सौभाग्य प्रदान करने वाले हैं। दोनों समान प्रधान, समान तत्त्व और समान शक्ति वाले हैं। उन दोनों की शक्ति अजर है और वही सम्पूर्ण विश्व की योनि अर्थात् सृष्टि का मूल कारण है।
भाव:
यहाँ शिव और शक्ति के अभिन्न सम्बन्ध का दार्शनिक निरूपण मिलता है।
मन्त्र १५
परिस्रुता हविषा भावितेन
प्रसङ्कोचे गलिते वैमनस्कः ।
शर्वः सर्वस्य जगतो विधाता
धर्ता हर्ता विश्वरूपत्वमेति ॥ १५॥
अर्थ:
जब साधक का चित्त दिव्य अर्पण और उपासना से परिपक्व होकर संकुचन से मुक्त हो जाता है और मन की चंचलता समाप्त होती है, तब वह शर्व को—समस्त जगत् के विधाता, धारणकर्ता और संहारकर्ता को—विश्वस्वरूप के रूप में अनुभव करता है।
भाव:
अन्ततः साधना का लक्ष्य है—सीमित मन से ऊपर उठकर सम्पूर्ण विश्व में एक ही परम तत्त्व का दर्शन।
मन्त्र १६
इयं महोपनिषत्त्रैपुर्या
यामक्षयं परमो गीर्भिरीट्टे ।
एषर्ग्यजुः परमेतच्च साम
अयमथर्वेयमन्या च विद्या ॥ १६॥
अर्थ:
यह महान् त्रिपुरा उपनिषद् है। जिस अक्षर परम तत्त्व की श्रेष्ठ वाणी द्वारा स्तुति की जाती है, वही इसका लक्ष्य है। यही ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद में परम तत्त्व के रूप में प्रतिष्ठित है; अन्य समस्त विद्याएँ भी उसी परम विद्या की ओर संकेत करती हैं। 
उपसंहार-मन्त्र
ॐ ह्रीं ॐ ह्रीमित्युपनिषत् ॥
अर्थ:
ॐ ह्रीं—यह त्रिपुरा की विद्या का अत्यन्त गूढ़ बीज-मन्त्र है। इसी में उपनिषद् का रहस्य संक्षेप रूप में निहित माना गया है।
शान्तिपाठ
ॐ वाङ्मे मनसि प्रतिष्ठिता ।
मनो मे वाचि प्रतिष्ठितम् ।
आविरावीर्म एधि ।
वेदस्य म आणीस्थः ।
श्रुतं मे मा प्रहासीः ।
अनेनाधीतेनाहोरात्रान् संदधामि ।
ऋतं वदिष्यामि । सत्यं वदिष्यामि 
तन्मामवतु । तद्वक्तारमवतु ।
अवतु माम् । अवतु वक्तारम् । अवतु वक्तारम् ।
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
अर्थ:
हे परमात्मन्! मेरी वाणी और मन में सामंजस्य रहे। मैंने जो वेदविद्या सुनी और पढ़ी है वह मुझसे कभी दूर न हो। मैं ऋत और सत्य का आचरण करूँ। परमात्मा मेरी और मेरे आचार्य की रक्षा करें। तीनों प्रकार की शान्ति स्थापित हो।
॥ इति श्रीत्रिपुरोपनिषत् ॥
---///×----//×//////---×--===

Comments

Popular posts from this blog

डा० सूर्य पाल सिंह का उत्कृष्ट व्यक्तित्व

---प्राणायाम से दिव्य शक्ति की प्राप्ति---

ऋगुवेद सूक्ति--(53) की व्याख्या