(84) आत्मोपनिषद


आत्मोपनिषद--
आत्मोपनिषद् का सम्बन्ध 
अथर्ववेद से माना जाता है।
आत्मोपनिषद का मुख्य विषय: आत्मा का स्वरूप, आत्मज्ञान, ब्रह्मज्ञान और मुक्ति
मुख्य शिक्षा: मनुष्य का वास्तविक स्वरूप शरीर नहीं, बल्कि आत्मा है; आत्मा और ब्रह्म की एकता का ज्ञान ही परम ज्ञान है। इसमें 31 मंत्र हैं।
मन्त्र १
आत्मसंज्ञः शिवः शुद्ध एक एवाद्वयः सदा ।
ब्रह्मरूपतया ब्रह्म केवलं प्रतिभासते ॥ १॥
हिन्दी अर्थ—
आत्मा नाम से प्रसिद्ध वह शिवस्वरूप, परम कल्याणकारी और पूर्णतः शुद्ध है। वह सदा एक और अद्वैत है, अर्थात् उसके अतिरिक्त कोई दूसरा परम सत्य नहीं है। अपने वास्तविक ब्रह्मस्वरूप में वह केवल ब्रह्म ही ब्रह्म के रूप में प्रकाशित होता है।
सरल भावार्थ—
मनुष्य का वास्तविक स्वरूप शरीर, मन या बुद्धि नहीं, बल्कि शुद्ध आत्मा है। आत्मा और ब्रह्म में अन्ततः कोई भेद नहीं है।
मन्त्र २
जगद्रूपतयाप्येतद्ब्रह्मैव प्रतिभासते ।
विद्याविद्यादिभेदेन भावाभावादिभेदतः ॥२॥
हिन्दी अर्थ-सार:
यह सम्पूर्ण जगत् भी वास्तव में ब्रह्म का ही प्रकाश है। विद्या-अविद्या, भाव-अभाव आदि के जो भेद दिखाई देते हैं, वे उसी एक ब्रह्म के ऊपर दिखाई देने वाले भेद हैं।
मन्त्र ३
गुरुशिष्यादिभेदेन ब्रह्मैव प्रतिभासते ।
ब्रह्मैव केवलं शुद्धं विद्यते तत्त्वदर्शने ॥३॥
अर्थ-सार:
गुरु और शिष्य का भेद भी व्यवहार में दिखाई देता है, पर तत्त्वज्ञान की दृष्टि से केवल शुद्ध ब्रह्म ही विद्यमान है।
मन्त्र ४
न च विद्या न चाविद्या न जगच्च न चापरम् ।
सत्यत्वेन जगद्भानं संसारस्य प्रवर्तकम् ॥४॥
अर्थ-सार:
परम सत्य की दृष्टि से न विद्या है, न अविद्या, न जगत् और न उससे अलग कुछ। जगत् को परम सत्य मान लेना ही संसार-बन्धन का कारण है। 
मन्त्र ५
असत्यत्वेन भानं तु संसारस्य निवर्तकम् ।
घटोऽयमिति विज्ञातुं नियमः कोऽन्वपेक्षते ॥५॥
अर्थ-सार:
जब जगत् की वस्तुओं को उनकी वास्तविक, नश्वर और आश्रित प्रकृति में देखा जाता है, तब संसार-बन्धन का निवारण होता है। जैसे “यह घट है” यह जानने के लिए किसी विशेष बाहरी नियम की आवश्यकता नहीं होती, वैसे ही आत्मा का सत्य स्वरूप स्वयं प्रकाशित है। 
मन्त्र ६
विना प्रमाणसुष्ठुत्वं यस्मिन् सति पदार्थधीः ।
अयमात्मा नित्यसिद्धः प्रमाणे सति भासते ॥६॥
अर्थ-सार:
आत्मा कोई नई वस्तु नहीं है जिसे बनाया या उत्पन्न किया जाए। आत्मा नित्य-सिद्ध है। उचित ज्ञान के माध्यम से उसका बोध स्पष्ट होता है।
मन्त्र ७
न देशं नापि कालं वा न शुद्धिं वाप्यपेक्षते ।
देवदत्तोऽहमित्येतद्विज्ञानं निरपेक्षकम् ॥७॥
अर्थ-सार:
आत्मज्ञान के लिए देश, काल अथवा बाहरी शुद्धि जैसी कोई विशेष शर्त आवश्यक नहीं। जैसे मनुष्य सहज रूप से जानता है—“मैं देवदत्त हूँ”, वैसे ही आत्मा का ज्ञान भी अपने स्वरूप से प्रत्यक्ष है। 
मन्त्र ८
तद्वद्ब्रह्मविदोऽप्यस्य ब्रह्माहमिति वेदनम् ।
भानुनेव जगत्सर्वं भास्यते यस्य तेजसा ॥८॥
अर्थ-सार:
ब्रह्मज्ञानी के लिए ज्ञान यह है—“मैं ब्रह्म हूँ।” जिस प्रकार सूर्य के प्रकाश से संसार की वस्तुएँ दिखाई देती हैं, उसी प्रकार आत्मचैतन्य के प्रकाश से सम्पूर्ण जगत् प्रकाशित होता है।
मन्त्र ९
तस्मादात्मैव विज्ञेयः सर्वात्मना विपश्चिता।
आत्मनोऽन्यत् किमस्ति हि यद्विज्ञातव्यं भवेत्॥९॥
हिन्दी अर्थ:
इसलिए विवेकी मनुष्य को सम्पूर्ण भाव से आत्मा को ही जानने का प्रयत्न करना चाहिए। आत्मा को जान लेने के बाद ऐसा और क्या शेष रह जाता है जिसे जानना आवश्यक हो?
भावार्थ:
संसार के अनेक ज्ञानों में सबसे श्रेष्ठ ज्ञान आत्मज्ञान है, क्योंकि आत्मा को जान लेने पर अपने वास्तविक स्वरूप का ज्ञान हो जाता है।
मन्त्र १०
आत्मानं चेद्विजानीयादयमस्मीति पूरुषः।
किमिच्छन् कस्य कामाय शरीरमनुसंज्वरेत्॥१०॥
हिन्दी अर्थ:
यदि मनुष्य अपने वास्तविक आत्मस्वरूप को यह जान ले कि “मैं वही आत्मा हूँ”, तो फिर वह किस वस्तु की इच्छा करेगा? किसके लिए और किस कामना से वह शरीर को दुःख और क्लेश में डालेगा?
भावार्थ:
आत्मज्ञान होने पर बाहरी वस्तुओं के प्रति असीम तृष्णा समाप्त होने लगती है। मनुष्य समझता है कि उसका वास्तविक सुख आत्मा में ही स्थित है, इसलिए वह व्यर्थ की इच्छाओं और आसक्तियों से मुक्त होता है। मन्त्र ११
तथैव विद्वान्रमते निर्ममो निरहं सुखी ।
कामान्निष्कामरूपी संचरत्येकचरो मुनिः ॥११॥
हिन्दी अर्थ-सार:
जिस प्रकार बालक सहज भाव से खेलता है, उसी प्रकार आत्मज्ञानी व्यक्ति ममता और अहंकार से रहित होकर आत्मा में आनन्द करता है। उसकी सांसारिक इच्छाएँ समाप्त हो जाती हैं और वह मुनि की तरह स्वतंत्र भाव से रहता है।
मन्त्र १२
स्वात्मनैव सदा तुष्टः स्वयं सर्वात्मना स्थितः ।
निर्धनोऽपि सदा तुष्टोऽप्यसहायो महाबलः ॥१२॥
हिन्दी अर्थ-सार:
आत्मज्ञानी अपने आत्मस्वरूप में ही सदा संतुष्ट रहता है। बाहरी धन न होने पर भी वह संतुष्ट है और किसी बाहरी सहारे के बिना भी भीतर से अत्यन्त शक्तिशाली है।
मन्त्र १३
नित्यतृप्तोऽप्यभुञ्जानोऽप्यसमः समदर्शनः ।
कुर्वन्नपि न कुर्वाणश्चाभोक्ता फलभोग्यपि ॥१३॥
हिन्दी अर्थ-सार:
वह सदा तृप्त रहता है, चाहे भोजन करे या न करे। सबके प्रति समदृष्टि रखता है। कर्म करता हुआ भी अपने को कर्ता नहीं मानता और कर्मों के फल का भोक्ता होते हुए भी भीतर से उससे निर्लिप्त रहता है।
मन्त्र १४
शरीरीरप्यशरीरीष परिच्छिन्नोऽपि सर्वगः ।
अशरीरं सदा सन्तमिदं ब्रह्मविदं क्वचित् ॥१४॥
हिन्दी अर्थ-सार:
ब्रह्मज्ञानी शरीर में दिखाई देता हुआ भी वास्तव में शरीर से परे आत्मस्वरूप है। शरीर सीमित है, लेकिन आत्मा सर्वव्यापक है। इसलिए ज्ञानी अपने वास्तविक स्वरूप को शरीर तक सीमित नहीं मानता।
मन्त्र १५
प्रियाप्रिये न स्पृशतस्तथैव च शुभाशुभे ।
तमसा ग्रस्तवद्भानादग्रस्तोऽपि रविर्यथा ॥१५॥
हिन्दी अर्थ-सार:
ज्ञानी व्यक्ति सुख-दुःख, प्रिय-अप्रिय तथा शुभ-अशुभ से भीतर से प्रभावित नहीं होता। जैसे सूर्य ग्रहण के समय लोगों को ढका हुआ दिखाई देता है, जबकि वास्तव में सूर्य स्वयं ग्रहण से नष्ट या कलुषित नहीं होता।
मन्त्र १६
ग्रस्त इत्युच्यते भ्रान्त्या ह्यज्ञात्वा वस्तुलक्षणम् ।
तद्वद्देहादिबन्धेभ्यो विमुक्तं ब्रह्मवित्तमम् ॥१६॥
हिन्दी अर्थ-सार:
वस्तु का वास्तविक स्वरूप न जानने के कारण भ्रम उत्पन्न होता है। उसी प्रकार अज्ञानी लोग देह आदि के बन्धनों से मुक्त ब्रह्मज्ञानी को भी शरीरधारी सामान्य मनुष्य के समान समझते हैं।
मन्त्र १७
पश्यन्ति देहिवन्मूढाः शरीराभासदर्शनात् ।
अहिर्निर्ल्वयनीवायं मुक्तदेहस्तु तिष्ठति ॥१७॥
हिन्दी अर्थ-सार:
मूर्ख लोग केवल शरीर दिखाई देने के कारण ज्ञानी को भी देहधारी मानते हैं। परन्तु ज्ञानी की स्थिति ऐसे साँप के समान है जो अपनी केंचुली छोड़ चुका हो—शरीर दिखाई देता है, पर उसका आत्मस्वरूप उससे मुक्त है।
मन्त्र १८
इतस्ततश्चाल्यमानो यत्किञ्चित्प्राणवायुना ।
स्रोतसा नीयते दारु यथा निम्नोन्नतस्थलम् ॥१८॥
हिन्दी अर्थ-सार:
जैसे नदी की धारा में पड़ा हुआ लकड़ी का टुकड़ा जल के प्रवाह के अनुसार इधर-उधर चला जाता है, उसी प्रकार ज्ञानी का शरीर भी प्रारब्ध कर्म और प्राणवायु के अनुसार अपनी गति करता रहता है।
मन्त्र १९
दैवेन नीयते देहो यथा कालोपभुक्तिषु ।
लक्ष्यालक्ष्यगतिं त्यक्त्वा यस्तिष्ठेत्केवलात्मना ॥१९॥
हिन्दी अर्थ-सार:
शरीर अपने कर्मानुसार समय के प्रवाह में चलता रहता है। परन्तु जो व्यक्ति शरीर और बाहरी उपलब्धियों की चिंता छोड़कर केवल आत्मस्वरूप में स्थित रहता है, वही वास्तविक आत्मज्ञानी है।
मन्त्र २०
शिव एव स्वयं साक्षादयं ब्रह्मविदुत्तमः ।
जीवन्नेव सदा मुक्तः कृतार्थो ब्रह्मवित्तमः ॥२०॥
हिन्दी अर्थ-सार:
ऐसा श्रेष्ठ ब्रह्मज्ञानी स्वयं शिवस्वरूप है। वह जीवित रहते हुए ही मुक्त है—इसे जीवन्मुक्ति कहते हैं। उसके लिए जीवन का परम उद्देश्य सिद्ध हो चुका है। 
मन्त्र २१
उपाधिनाशाद्ब्रह्मैव सद्ब्रह्माप्येति निर्द्वयम् ।
शैलूषो वेषसद्भावाभावयोश्च यथा पुमान् ॥२१॥
हिन्दी अर्थ-सार:
जब देह, मन, अहंकार आदि उपाधियों का अज्ञानजनित आरोप समाप्त हो जाता है, तब केवल अद्वैत ब्रह्म ही शेष रहता है। जैसे अभिनेता अलग-अलग वेश धारण करता है और वेश के रहने या हट जाने से उसका वास्तविक व्यक्ति-स्वरूप नहीं बदलता, वैसे ही आत्मा भी शरीर और उपाधियों से वास्तव में बंधा नहीं है। 
 मन्त्र २२
यथा नटस्तथा विद्वान् यथा नटस्तथा विद्वान्।
इस मन्त्र का भाव यह है कि जैसे अभिनेता वेश बदलता है, पर उसका वास्तविक स्वरूप नहीं बदलता, वैसे ही ज्ञानी मनुष्य भी शरीर और बाहरी भूमिकाओं के रहते हुए अपने वास्तविक आत्मस्वरूप से विचलित नहीं होता।
मन्त्र २३
एवं देहाद्युपाधीनां नाशेऽपि ज्ञानिनः पुमान्।
अर्थ-सार:
देह आदि उपाधियों के नष्ट होने पर भी ज्ञानी का वास्तविक स्वरूप नष्ट नहीं होता, क्योंकि उसका सत्य स्वरूप आत्मा/ब्रह्म है।
मन्त्र २४
ब्रह्मैव केवलं सर्वं नान्यत्किञ्चन विद्यते।
अर्थ-सार:
परम सत्य की दृष्टि से सर्वत्र एक ही ब्रह्म है। ब्रह्म से अलग कोई स्वतंत्र परम सत्ता नहीं है।
मन्त्र २५
ब्रह्माहमिति विज्ञाय ब्रह्मैव भवति द्विजः।
अर्थ-सार:
जो मनुष्य सच्चे ज्ञान से जान लेता है कि “मैं ब्रह्म हूँ”, वह ब्रह्मस्वरूप का बोध प्राप्त कर लेता है।
मन्त्र २६
यथा मृद्घटादीनां मृदेव परमार्थतः।
अर्थ-सार:
जैसे घड़ा आदि वस्तुओं का वास्तविक आधार मिट्टी ही है, उसी प्रकार नाम और रूप अलग दिखाई देने पर भी उनका परम आधार एक ही ब्रह्म है।
मन्त्र २७
तथा देहादिनामरूपं ब्रह्मैव परमार्थतः।
अर्थ-सार:
शरीर और संसार के असंख्य नाम-रूप दिखाई देते हैं, लेकिन परम सत्य की दृष्टि से उनका आधार ब्रह्म ही है।
मन्त्र २८
अज्ञानकल्पितं सर्वं ज्ञानाद्ब्रह्मैव केवलम्।
अर्थ-सार:
अज्ञान के कारण अनेकता और भेद दिखाई देते हैं। आत्मज्ञान होने पर केवल ब्रह्म की एकता का बोध होता है।
मन्त्र २९
आत्मैवेदं जगत्सर्वमात्मनोऽन्यन्न विद्यते।
अर्थ-सार:
यह सम्पूर्ण जगत् आत्मचैतन्य से ही प्रकाशित है। आत्मा से अलग कोई स्वतंत्र परम सत्य नहीं है।
मन्त्र ३०
आत्मज्ञानं परं ज्ञानं आत्मज्ञानाद्विमुच्यते।
अर्थ-सार:
सब ज्ञानों में आत्मज्ञान को परम ज्ञान कहा गया है। आत्मा के वास्तविक स्वरूप को जान लेने पर मनुष्य अज्ञान और बन्धन से मुक्त होता है।
मन्त्र ३१
ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥
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