(101) महावाक्योपनिषद्

 
(101) महावाक्योषनिषद-- यह उपनिषद के क्रम में 101 वें स्थान पर आता है।
महावाक्योपनिषद् अथर्ववेद से सम्बद्ध योगोपनिषद् मानी जाती है। उपलब्ध पाठ में इसे 108 उपनिषदों की परम्परा में 92वीं के रूप में भी सूचीबद्ध किया जाता है। इसका मुख्य प्रतिपाद्य आत्मा और ब्रह्म की एकता तथा आत्मज्ञान है।
॥ श्रीमहावाक्योपनिषत् ॥
मंगलाचरण
यन्महावाक्यसिद्धान्तमहाविद्याकलेवरम् ।
विकलेवरकैवल्यं रामचन्द्रपदं भजे ॥
अर्थ:
जो महावाक्यों के सिद्धान्तस्वरूप परम ज्ञान हैं, जो देहाभिमान से रहित कैवल्य अर्थात् मोक्ष का स्वरूप हैं, उन श्रीरामचन्द्र के परम पद का मैं भजन करता हूँ।
शान्तिपाठ
ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवाः ।
भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः ।
स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवांसस्तनूभिः ।
व्यशेम देवहितं यदायुः ॥
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
अर्थ: हे ईश्वर ! हम अपने कानों से कल्याणकारी वचन सुनें। हे पूजनीय देवो! हम अपनी आँखों से मंगलमय वस्तुएँ देखें। स्वस्थ और दृढ़ अंगों वाले होकर, शरीर से आपकी स्तुति करते हुए, ईश्वर द्वारा निर्धारित अपनी आयु को कल्याणपूर्वक व्यतीत करें।
उपनिषद् का मुख्य पाठ
हरिः ॐ ।
अथ होवाच भगवान् ब्रह्मापरोक्षानुभवपरोपनिषदं व्याख्यास्यामः ।
गुह्याद्गुह्यपरमेषा न प्राकृतायोपदेष्टव्या ।
सात्त्विकायान्तर्मुखाय परिशुश्रूषवे 
अर्थ: भगवान् ब्रह्मा ने कहा—अब हम उस उपनिषद् का वर्णन करेंगे जिसका उद्देश्य ब्रह्म का प्रत्यक्ष अनुभव कराना है। यह अत्यन्त गुप्त ज्ञान है। इसे ऐसे सामान्य व्यक्ति को नहीं बताना चाहिए जो इसके योग्य न हो; बल्कि सात्त्विक, अन्तर्मुखी और ज्ञान को श्रद्धापूर्वक सुनने की इच्छा रखने वाले साधक को इसका उपदेश करना चाहिए।
अविद्या और विद्या--
अथ संसृतिबन्धमोक्षयोर्विद्याविद्ये चक्षुषी उपसंहृत्य
विज्ञायाविद्यालोकाण्डस्तमोदृक् ।
अर्थ: संसार के बन्धन और मोक्ष के लिए विद्या और अविद्या दो नेत्रों के समान हैं। अविद्या को समझने पर ज्ञात होता है कि वह अज्ञान के अन्धकार के समान है।
तमो हि शारीरप्रपञ्चमाब्रह्मस्थावरान्तमनन्ताखिलाजाण्डभूतम् ।
निखिलनिगमोदितसकामकर्मव्यवहारो लोकः ।
अर्थ: यह सम्पूर्ण देहात्मक संसार—ब्रह्मा से लेकर स्थावर अर्थात् अचल प्राणियों तक—अज्ञान के कारण दिखाई देने वाला व्यापक संसार है। वेदों में बताए गए सकाम कर्मों और उनके व्यवहार में लगा हुआ संसार भी इसी अज्ञान के क्षेत्र में आता है।
आत्मा ही प्रकाश है।
नैषोऽन्धकारोऽयमात्मा ।
विद्या हि काण्डान्तरादित्यो ज्योतिर्मण्डलं ग्राह्यं नापरम् ।
अर्थ: लेकिन आत्मा अन्धकार नहीं है। आत्मा स्वयं प्रकाश स्वरूप है। विद्या उस सूर्य के समान है जो अज्ञान के अन्धकार को दूर करती है। अतः साधक को बाहरी वस्तुओं के बजाय उस आत्म-ज्योति को जानना चाहिए।
सोऽहम्--
असावादित्यो ब्रह्मेत्यजपयोपहितं हंसः सोऽहम् ।
अर्थ: यह सूर्य ब्रह्म का प्रतीक है। प्राण के स्वाभाविक आवागमन के साथ “हंसः—सोऽहम्” का अजपा-जप होता है। इसका भाव है—“वह परम तत्त्व ही मैं हूँ।”
प्राण और आत्मचिन्तन
प्राणापानाभ्यां प्रतिलोमानुलोमाभ्यां समुपलभ्यैवं सा चिरं लब्ध्वा
त्रिवृदात्मनि ब्रह्मण्यभिध्यायमाने सच्चिदानन्दः परमात्माविर्भवति ।
अर्थ: प्राण और अपान के स्वाभाविक आवागमन को समझते हुए, दीर्घकाल तक साधना और आत्मचिन्तन करने पर साधक अपने भीतर स्थित ब्रह्म का अनुभव करता है। तब सत्-चित्-आनन्दस्वरूप परमात्मा का प्रकाश प्रकट होता है।
ब्रह्मैक्य--
सहस्रभानुमच्छुरितापूरितत्वादलिप्या पारावारपूर इव ।
नैषा समाधिः । नैषा योगसिद्धिः । नैषा मनोलयः ।
ब्रह्मैक्यं तत् ।
अर्थ: वह आत्मानुभूति सहस्र सूर्यों के प्रकाश के समान पूर्ण और अखण्ड है, जैसे समुद्र जल से पूर्ण हो। यह केवल समाधि नहीं है, केवल योग की कोई सिद्धि नहीं है और केवल मन का लय भी नहीं है—वह तो जीव और ब्रह्म की एकता का ज्ञान है।
ब्रह्म का स्वरूप आदित्यवर्णं तमसस्तु पारे ।
सर्वाणि रूपाणि विचित्य धीरः ।
नामानि कृत्वाऽभिवदन्यदास्ते ॥
अर्थ: वह परमात्मा सूर्य के समान प्रकाशमान और अज्ञान के अन्धकार से परे है। ज्ञानी पुरुष यह समझता है कि संसार में दिखाई देने वाले सभी नाम और रूप उसी परम तत्त्व पर आधारित हैं।
अमृतत्व का मार्ग--
धाता पुरस्ताद्यमुदाजहार ।
शक्रः प्रविद्वान्प्रदिशश्चतस्रः ।
तमेव विद्वानमृत इह भवति ।
नान्यः पन्था अयनाय विद्यते ॥
अर्थ: जिस परम तत्त्व का ज्ञान प्राचीन ऋषियों और देवज्ञों ने किया, उसी को जानकर मनुष्य इस जीवन में अमृतत्व अर्थात् मोक्ष को प्राप्त करता है। उस परम सत्य के ज्ञान के अतिरिक्त मोक्ष की कोई दूसरी वास्तविक राह नहीं है।
यज्ञ और धर्म--
यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवाः ।
तानि धर्माणि प्रथमान्यासन् ।
ते ह नाकं महिमानः सचन्ते ।
यत्र पूर्वे साध्याः सन्ति देवाः ॥
अर्थ:
देवों ने यज्ञ के द्वारा यज्ञस्वरूप परम तत्त्व की उपासना की। वे ही आद्य धर्म माने गए। उन धर्मों का आचरण करने वाले महान पुरुष उस परम लोक को प्राप्त होते हैं जहाँ पूर्वकाल के साध्य देव स्थित हैं। अत्यन्त प्रसिद्ध महावाक्यात्मक मन्त्र--
सोऽहमर्कः परं ज्योतिरर्कज्योतिरहं शिवः ।
आत्मज्योतिरहं शुक्रः सर्वज्योतिरसावदोम् ॥
सरल अर्थ:“मैं वही हूँ; मैं परम ज्योति हूँ। मैं उस सूर्य-ज्योति का भी प्रकाश हूँ। मैं शिवस्वरूप हूँ। मैं आत्म-ज्योति हूँ, निर्मल प्रकाश हूँ; मैं सर्व-ज्योति स्वरूप उस परम तत्त्व को प्रणाम करता हूँ।”
यहाँ “सोऽहम्” का तात्पर्य देह या अहंकार को ब्रह्म कहना नहीं है, बल्कि अपने वास्तविक आत्मस्वरूप को परम ब्रह्म से अभिन्न जानना है। इस उपनिषद् का मूल दार्शनिक केन्द्र यही आत्म-ब्रह्म ऐक्य है। 
फलश्रुति--
य एतदथर्वशिरोऽधीते ।
प्रातरधीयानो रात्रिकृतं पापं नाशयति ।
सायमधीयानो दिवसकृतं पापं नाशयति ।
अर्थ: जो इस अथर्वशीर्षरूप उपदेश का अध्ययन करता है, वह प्रातः इसका पाठ करने से रात्रि में किए गए पापों से मुक्त होता है और सायंकाल पाठ करने से दिन में किए गए पापों से मुक्त होता है।
तत्सायं प्रातः प्रयुञ्जानः पापोऽपापो भवति ।
मध्यन्दिनमादित्याभिमुखोऽधीयानः
पञ्चमहापातकोपपातकात्प्रमुच्यते ।
अर्थ: जो प्रातः और सायं इसका अभ्यास करता है, वह पापरहित होता है। दोपहर में सूर्य की ओर मुख करके इसका अध्ययन करने वाला पाँच महापातकों और उनके उपपातकों से मुक्त होता है—ऐसी फलश्रुति कही गई है।
सर्ववेदपारायणपुण्यं लभते ।
श्रीमहाविष्णुसायुज्यमवाप्नोतीत्युपनिषत् ॥
अर्थ: वह सम्पूर्ण वेदों के पारायण के समान पुण्य प्राप्त करता है और श्रीमहाविष्णु के सायुज्य को प्राप्त करता है—ऐसा उपनिषद् का कथन है। 
समापन शान्तिपाठ--
ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवाः ।
भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः ।
स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवांसस्तनूभिः ।
व्यशेम देवहितं यदायुः ॥
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ।
हरिः ॐ तत्सत् ॥
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