(105) जाबालोपनिषद
(105) जााबालोपनिषद
यह उपनिषद के क्रम मेें 105 वे स्थान पर आता है।
हाँ। एक आवश्यक सुधार पहले: जाबालोपनिषद् के उपलब्ध पाठ में ६ खण्ड हैं और इसका मुख्य संवाद बृहस्पति–याज्ञवल्क्य, अत्रि–याज्ञवल्क्य तथा जनक–याज्ञवल्क्य के माध्यम से है। पहले मैंने इसे कुछ संक्षेप में प्रस्तुत किया था। नीचे प्रमाणित पाठ के आधार पर सभी ६ खण्डों का मूल संस्कृत पाठ और सरल हिन्दी अर्थ दे रहा हूँ।
॥ जाबालोपनिषद् ॥
शान्तिपाठ
ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥
अर्थ:
वह परमात्मा पूर्ण है और यह जगत भी पूर्ण है। पूर्ण परमात्मा से ही यह पूर्ण जगत प्रकट हुआ है। पूर्ण में से पूर्ण को निकाल लेने पर भी पूर्ण ही शेष रहता है।
प्रथम खण्ड
ॐ बृहस्पतिरुवाच याज्ञवल्क्यं यदनु कुरुक्षेत्रं देवानां देवयजनं सर्वेषां भूतानां ब्रह्मसदनम्।
अविमुक्तं वै कुरुक्षेत्रं देवानां देवयजनं सर्वेषां भूतानां ब्रह्मसदनम्।
तस्माद्यत्र क्वचन गच्छति तदेव मन्येत तदविमुक्तमेव।
इदं वै कुरुक्षेत्रं देवानां देवयजनं सर्वेषां भूतानां ब्रह्मसदनम्॥
अर्थ:
बृहस्पति ने याज्ञवल्क्य से पूछा— कुरुक्षेत्र क्या देवताओं की यज्ञभूमि और सभी प्राणियों का ब्रह्मसदन है?
उत्तर में कहा गया कि अविमुक्त ही कुरुक्षेत्र है, देवताओं की देवयज्ञ-भूमि और सभी प्राणियों का ब्रह्मसदन है। इसलिए मनुष्य जहाँ कहीं भी जाए, उसे उस स्थान को अविमुक्त ही समझना चाहिए।
अत्र हि जन्तोः प्राणेषूत्क्रममाणेषु रुद्रस्तारकं ब्रह्म व्याचष्टे येनासावमृती भूत्वा मोक्षी भवति।
तस्मादविमुक्तमेव निषेवेत अविमुक्तं न विमुञ्चेत्।
एवमेवैतद्याज्ञवल्क्यः॥ १॥
अर्थ:
यहाँ जब प्राणी के प्राण शरीर से निकल रहे होते हैं, तब रुद्र उसे तारक ब्रह्म का उपदेश देते हैं। उस ज्ञान के द्वारा वह मृत्यु से मुक्त होकर मोक्ष प्राप्त करता है। इसलिए साधक को अविमुक्त का आश्रय नहीं छोड़ना चाहिए।
द्वितीय खण्ड
अथ हैनमत्रिः पप्रच्छ याज्ञवल्क्यं य एषोऽनन्तोऽव्यक्त आत्मा तं कथमहं विजानीयामिति॥
अर्थ:
इसके बाद अत्रि ने याज्ञवल्क्य से पूछा—
“यह जो अनन्त और अव्यक्त आत्मा है, उसे मैं किस प्रकार जान सकता हूँ?”
स होवाच याज्ञवल्क्यः सोऽविमुक्त उपास्यो य एषोऽनन्तोऽव्यक्त आत्मा सोऽविमुक्ते प्रतिष्ठित इति॥
अर्थ:
याज्ञवल्क्य ने कहा— उस अविमुक्त की उपासना करनी चाहिए, क्योंकि यह अनन्त और अव्यक्त आत्मा उसी अविमुक्त में प्रतिष्ठित है।
सोऽविमुक्तः कस्मिन्प्रतिष्ठित इति।
वरणायां नाश्यां च मध्ये प्रतिष्ठित इति॥
अर्थ:
अत्रि ने पूछा— अविमुक्त किसमें स्थित है?
उत्तर दिया गया— वरणा और नाशी के मध्य स्थित है।
का वै वरणा का च नाशीति।
सर्वानिन्द्रियकृतान्दोषान्वारयतीति तेन वरणा भवति।
सर्वानिन्द्रियकृतान्पापान्नाशयतीति तेन नाशी भवतीति॥
अर्थ:
जो इन्द्रियों द्वारा उत्पन्न सभी दोषों को रोकता है, इसलिए उसे वरणा कहा जाता है। और जो इन्द्रियों द्वारा उत्पन्न सभी पापों को नष्ट करता है, इसलिए उसे नाशी कहा जाता है।
कतमं चास्य स्थानं भवतीति।
भ्रुवोर्घ्राणस्य च यः सन्धिः स एष द्यौर्लोकस्य परस्य च सन्धिर्भवतीति।
एतद्वै सन्धिं सन्ध्यां ब्रह्मविद उपासत इति।
सोऽविमुक्त उपास्य इति।
सोऽविमुक्तं ज्ञानमाचष्टे। यो वैतदेवं वेदेति॥ २॥
अर्थ:
अविमुक्त का स्थान भौंहों और नासिका के मध्य का जो सन्धि-स्थान है, वही माना गया है। यह ऊपर के लोक और उससे परे के लोक के मध्य का सन्धि-स्थान है। ब्रह्मज्ञानी इस सन्धि-स्थान की उपासना करते हैं। जो इस रहस्य को इस प्रकार जानता है, वह अविमुक्त के ज्ञान को जानता है।
तृतीय खण्ड
अथ हैनं ब्रह्मचारिण ऊचुः—
किं जप्येनामृतत्वं ब्रूहीति॥
अर्थ:
ब्रह्मचारियों ने याज्ञवल्क्य से पूछा
“हमें बताइए कि किस जप के द्वारा अमृतत्व प्राप्त किया जा सकता है?”
स होवाच याज्ञवल्क्यः—
शतरुद्रियेणेत्येतान्येव ह वा अमृतस्य नामानि।
एतैर्ह वा अमृतो भवतीति।
एवमेवैतद्याज्ञवल्क्यः॥ ३॥
अर्थ:
याज्ञवल्क्य ने कहा— शतरुद्रीय के द्वारा। ये सभी वास्तव में अमृत के नाम हैं। इनके जप से साधक अमृतत्व को प्राप्त होता है।
चतुर्थ खण्ड — संन्यास का विधान
अथ हैनं जनको वैदेहो याज्ञवल्क्यमुपसमेत्योवाच—
भगवन् संन्यासं ब्रूहीति।
स होवाच याज्ञवल्क्यः—
ब्रह्मचर्यं परिसमाप्य गृही भवेत्।
गृही भूत्वा वनी भवेत्।
वनी भूत्वा प्रव्रजेत्।
यदि वेतरथा ब्रह्मचर्यादेव प्रव्रजेद्गृहाद्वा वनाद्वा॥
अर्थ:
विदेहराज जनक ने याज्ञवल्क्य से कहा—
“हे भगवन्! मुझे संन्यास का उपदेश दीजिए।”
याज्ञवल्क्य ने कहा— ब्रह्मचर्य पूरा करके गृहस्थ बने, गृहस्थ के बाद वानप्रस्थ बने और वानप्रस्थ के बाद संन्यास ग्रहण करे। लेकिन यदि वैराग्य उत्पन्न हो जाए तो ब्रह्मचर्य से ही, अथवा गृहस्थ या वानप्रस्थ से भी संन्यास लिया जा सकता है।
अथ पुनरव्रती वा व्रती वा स्नातको वाऽस्नातको वा उत्सन्नाग्निको वा यदहरेव विरजेत्तदहरेव प्रव्रजेत्।
अर्थ:
चाहे वह व्रतहीन हो या व्रती, स्नातक हो या स्नातक न हुआ हो, अग्निहीन हो— जिस दिन वास्तविक वैराग्य उत्पन्न हो, उसी दिन संन्यास ग्रहण कर लेना चाहिए।
यह जाबालोपनिषद् का अत्यन्त प्रसिद्ध वचन है:
यदहरेव विरजेत्तदहरेव प्रव्रजेत्।
अर्थ:
“जिस दिन वैराग्य उत्पन्न हो, उसी दिन प्रव्रजित हो जाए।”
इसके आगे संन्यास ग्रहण करने की अग्नि-संबंधी विधि बताई गई है और कहा गया है कि अग्नि वास्तव में प्राण का प्रतीक है।
पंचम खण्ड — परिव्राजक का स्वरूप
अथ हैनमत्रिः पप्रच्छ याज्ञवल्क्यं
पृच्छामि त्वा याज्ञवल्क्य अयज्ञोपवीति कथं ब्राह्मण इति।
अर्थ:
अत्रि ने याज्ञवल्क्य से पूछा—
“हे याज्ञवल्क्य! मैं आपसे पूछता हूँ— जो यज्ञोपवीत धारण नहीं करता, वह ब्राह्मण कैसे कहा जा सकता है?”
स होवाच याज्ञवल्क्यः—
इदमेवास्य तद्यज्ञोपवीतं य आत्मापः प्राश्याचम्यायं विधिः परिव्राजकानाम्।
अर्थ:
याज्ञवल्क्य ने कहा— उसके लिए आत्मा ही यज्ञोपवीत है। जल ग्रहण करके आचमन आदि करने की यह विधि परिव्राजकों के लिए है।
आगे विभिन्न परिस्थितियों में शरीर का त्याग करने की बातें आती हैं और फिर संन्यासी का स्वरूप बताया जाता है—
अथ परिव्राड्विवर्णवासा मुण्डोऽपरिग्रहः शुचिरद्रोही भैक्षणो ब्रह्मभूयाय भवतीति।
अर्थ:
परिव्राजक साधारणतः रंगहीन/सादा वस्त्र धारण करने वाला, मुण्डित, अपरिग्रही, पवित्र, किसी से द्वेष न करने वाला और भिक्षा से जीवन चलाने वाला होता है तथा ब्रह्मभाव की प्राप्ति के लिए जीवन बिताता है।
यद्यातुरः स्यान्मनसा वाचा संन्यसेत्।
एष पन्था ब्रह्मणा हानुवित्तस्तेनैति संन्यासी ब्रह्मविदिति॥ ५॥
अर्थ:
यदि वह अत्यन्त अस्वस्थ हो जाए और विधिपूर्वक बाहरी कर्म करने में समर्थ न हो, तो मन और वाणी से ही संन्यास ग्रहण कर सकता है। यही ब्रह्म द्वारा बताए हुए मार्ग का अनुसरण है। इस मार्ग से चलने वाला संन्यासी ब्रह्मविद् अर्थात् ब्रह्म को जानने वाला बनता है।
षष्ठ खण्ड — परमहंस संन्यासी
तत्र परमहंसानामसंवर्तकारुणिश्वेतकेतुदुर्वासऋभुनिदाघजडभरतदत्तात्रेयरैवतकप्रभृतयोऽव्यक्तलिङ्गा अव्यक्ताचारा अनुन्मत्ता निहोत्रगृहनदीपुलिनगिरिकुहरकन्दरकोटरनिर्झरस्थण्डिलेषु तेष्वनिकेतवास्य प्रयत्नो निर्ममः शुक्लध्यानपरायणोऽध्यात्मनिष्ठोऽशुभकर्मनिर्मूलनपरः संन्यासेन देहत्यागं करोति स परमहंसो नाम परमहंसो नामेति॥ ६॥
सरल अर्थ:
परमहंस संन्यासियों के उदाहरण के रूप में संवर्त, आरुणि, श्वेतकेतु, दुर्वासा, ऋभु, निदाघ, जड़भरत, दत्तात्रेय, रैवतक आदि का उल्लेख किया गया है।
वे बाहरी आडम्बर से दूर, अव्यक्त चिह्न वाले, सरल आचरण वाले, ममता से रहित और किसी एक स्थान को अपना स्थायी घर न मानने वाले होते हैं। वे एकान्त स्थानों—नदी के किनारे, पर्वत की गुफाओं, कन्दराओं आदि में भी रह सकते हैं।
वे शुद्ध ध्यान में स्थित, अध्यात्म में दृढ़ और अशुभ कर्मों का मूल नष्ट करने में लगे रहते हैं। इस प्रकार संन्यास के द्वारा देह का त्याग करने वाला साधक “परमहंस” कहलाता है।
स परमहंसो नाम परमहंसो नामेति॥ ६॥
अर्थ:
“वही परमहंस है, वही परमहंस कहलाता है।”
समापन
ॐ पूर्णमद इति शान्तिः।
अर्थ:
पूर्ण ब्रह्म की भावना के साथ उपनिषद् का समापन होता है।
टिप्पणी: उपलब्ध पाठ इसे शुक्ल यजुर्वेदीय जाबालोपनिषद् के रूप में सूचीबद्ध करता है और इसे संन्यास-सम्बन्धी उपनिषद् माना जाता है।
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