ऋग्वेद सूक्ति(75) की व्याख्या
ऋग्वेद सूक्ति (75,)
ऋग्वेद 1.114.8
मा नो महान्तमुत मा नो अर्भकं
मा नो उक्षन्तमुत मा नो उक्षितम्।
अर्थ:
हे प्रभु! हमारे बड़े-बूढ़ों को हानि न हो, हमारे छोटे बच्चों को हानि न हो। हमारे युवाओं तथा गर्भस्थ अथवा नवजात शिशुओं की भी रक्षा करें; उन पर किसी प्रकार का कष्ट या अनिष्ट न आने दें।
यह ऋग्वेद मंत्र का एक अंश है। पूरा श्लोक और उसका सरल अर्थ इस प्रकार है:
"मा नो महान्तमुत मा नो अर्भकं
मा नो उक्षन्तमुत मा नो उक्षितम्।
मा नो वधीः पितरं मोत मातरं
मा नः प्रियास्तन्वो रुद्र रीरिषः॥"
— ऋग्वेद 1.114.8
सरल हिन्दी अर्थ:
हे रुद्र (परमेश्वर)! हमारे बड़े-बूढ़ों को हानि न पहुँचाएँ, हमारे छोटे बच्चों को भी कष्ट न दें। हमारे युवाओं और गर्भस्थ अथवा नवजात शिशुओं की रक्षा करें। हमारे पिता और माता को कोई हानि न हो। हे प्रभु! हमारे प्रियजनों और हमारे शरीरों को भी किसी प्रकार का दुःख या विनाश न होने दें।
यह मंत्र समस्त परिवार और समाज के प्रत्येक वर्ग—बुज़ुर्ग, बालक, युवा, गर्भस्थ शिशु, माता-पिता तथा स्वयं अपने जीवन—की सुरक्षा और कल्याण की प्रार्थना है। इसमें सभी के स्वास्थ्य, दीर्घायु और मंगल की कामना की गई है।
वेदों मेँ प्रमाण----
ऋग्वेद 1.114.8 के समान भाव अन्य वेदों में कहाँ मिलता है, तो ऐसे कई मंत्र हैं जिनमें समस्त परिवार, संतान, माता-पिता और समाज की रक्षा तथा कल्याण की प्रार्थना की गई है। उदाहरण के लिए:
1-यजुर्वेद 16.15
"मा नो महान्तमुत मा नो अर्भकं
मा नो उक्षन्तमुत मा नो उक्षितम्।
मा नो वधीः पितरं मोत मातरं
प्रियाः मा नस्तनुवो रुद्र रीरिषः॥"
यह मंत्र लगभग ऋग्वेद 1.114.8 के समान ही है और सभी आयु वर्ग के लोगों की रक्षा की प्रार्थना करता है।
2-अथर्ववेद 11.2 (विभिन्न मंत्रों में)
अथर्ववेद में परिवार, संतान, पशुधन, दीर्घायु और आरोग्य की कामना बार-बार की गई है। उदाहरण के लिए:
"शतं जीव शरदो वर्धमानः।"
अर्थात् — तुम उन्नति करते हुए सौ वर्षों तक जीवित रहो।
3-यजुर्वेद 36.24
"शं नो मित्रः शं वरुणः..."
यहाँ समस्त प्राणियों के कल्याण, शांति और मंगल की प्रार्थना की गई है।
4-ऋग्वेद 10.191.2–4
"संगच्छध्वं संवदध्वं..."
यह मंत्र समाज में एकता, सद्भाव और सामूहिक कल्याण का संदेश देता है।
इन मंत्रों से स्पष्ट होता है कि वेदों में केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि सम्पूर्ण परिवार, समाज और समस्त प्राणियों के कल्याण की भावना प्रमुख है।
उपनिषदों में प्रमाण--
ऋग्वेद 1.114.8 ("मा नो महान्तमुत मा नो अर्भकम्...") के भाव—अर्थात् सभी आयु वर्गों, माता-पिता, परिवार और समस्त प्राणियों के कल्याण एवं अहिंसा—के समर्थन में उपनिषदों के प्रमाण जानना है, तो उपनिषदों में यही भाव निम्नलिखित मंत्रों में मिलता है:
1-ईशावास्य उपनिषद्, मंत्र 6
यस्तु सर्वाणि भूतान्यात्मन्येवानुपश्यति।
सर्वभूतेषु चात्मानं ततो न विजुगुप्सते॥
भावार्थ: जो सभी प्राणियों को अपने ही आत्मस्वरूप में देखता है और अपने को सबमें देखता है, वह किसी से द्वेष या हिंसा नहीं करता।
2-ईशावास्य उपनिषद्, मंत्र 7
यस्मिन्सर्वाणि भूतान्यात्मैवाभूद्विजानतः।
तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः॥
भावार्थ: जब ज्ञानी सब प्राणियों में एक ही आत्मा का दर्शन करता है, तब न मोह रहता है, न शोक। यह सार्वभौमिक कल्याण का आधार है।
3-छान्दोग्य उपनिषद् 3.14.1
सर्वं खल्विदं ब्रह्म।
भावार्थ: यह सम्पूर्ण जगत ब्रह्मस्वरूप है; अतः सभी के प्रति आदर और कल्याण का भाव रखना चाहिए।
4-बृहदारण्यक उपनिषद् 1.4.14
आत्मनस्तु कामाय सर्वं प्रियं भवति।
भावार्थ: सभी संबंध आत्मा के कारण प्रिय हैं; इसलिए परिवार और समस्त प्राणियों का संरक्षण धर्म का अंग है।
5-तैत्तिरीय उपनिषद् 1.11.2
मातृदेवो भव।
पितृदेवो भव।
आचार्यदेवो भव।
अतिथिदेवो भव॥
भावार्थ: माता, पिता, आचार्य और अतिथि को देवतुल्य मानो। यह ऋग्वेद 1.114.8 में माता-पिता की रक्षा और सम्मान की भावना के अनुरूप है।
6-कठोपनिषद् 2.2.13
नित्यो नित्यानां चेतनश्चेतनानाम्...
भावार्थ: परमात्मा समस्त चेतन प्राणियों का आधार है; इसलिए सभी का जीवन मूल्यवान है।
निष्कर्ष
ऋग्वेद 1.114.8 का मुख्य भाव है—
बालक और वृद्ध सभी की रक्षा,
माता-पिता का संरक्षण,
प्रियजनों के कल्याण की कामना,
किसी भी प्राणी को कष्ट न पहुँचाना।
उपनिषदों में यह भाव मुख्यतः सर्वभूतात्मभाव, अद्वैत, माता-पिता का सम्मान, तथा सर्वभूत-कल्याण के सिद्धांतों के रूप में व्यक्त हुआ है, विशेषतः ईशावास्य उपनिषद् 6–7, तैत्तिरीय उपनिषद् 1.11.2, और छान्दोग्य उपनिषद् 3.14.1 में।यदि आप ऋग्वेद 1.114.8 के भाव—"बड़े, छोटे, माता-पिता, संतान और समस्त परिवार की रक्षा एवं कल्याण"—के समर्थन में पुराणों से प्रमाण चाहते हैं, तो निम्नलिखित श्लोक इस विषय से निकट सम्बन्ध रखते हैं। ध्यान रहे कि पुराणों में ऋग्वेद के समान शब्दशः मंत्र नहीं मिलता, बल्कि उसी भाव का प्रतिपादन मिलता है।
पुराणों में प्रमाण--
1-श्रीमद्भागवत महापुराण 3.29.22
अहं सर्वेषु भूतेषु भूतात्मावस्थितः सदा।
तमवज्ञाय मां मर्त्यः कुरुतेऽर्चाविडम्बनम्॥
भावार्थ: भगवान कहते हैं—मैं सभी प्राणियों में आत्मरूप से स्थित हूँ। जो प्राणियों का अनादर करके केवल मेरी पूजा करता है, उसकी पूजा पूर्ण नहीं है।
2-श्रीमद्भागवत महापुराण 7.14.9
मातरं पितरं वृद्धं भार्यां साध्वीं सुतं शिशुम्।
गुरुं विप्रं प्रपन्नं च कल्पोऽबिभ्रच्छ्वसन्मृतः॥
भावार्थ: जो समर्थ होते हुए भी माता, पिता, वृद्ध, साध्वी पत्नी, पुत्र, शिशु, गुरु, ब्राह्मण तथा शरणागत का पालन-पोषण नहीं करता, वह जीवित होकर भी मृतक के समान है।
3-विष्णु पुराण 3.12.45
परोपकाराय पुण्याय पापाय परपीडनम्॥
भावार्थ: दूसरों का उपकार करना पुण्य है और दूसरों को पीड़ा देना पाप है|
4-पद्म पुराण (सृष्टि खण्ड)
अहिंसा परमो धर्मः।
भावार्थ: अहिंसा सर्वोच्च धर्म है। यही सिद्धान्त सभी प्राणियों की रक्षा और कल्याण का आधार है।
टिप्पणी: "अहिंसा परमो धर्मः" अनेक ग्रन्थों (विशेषकर महाभारत तथा कुछ पुराणों) में विभिन्न पाठों के साथ मिलता है; अतः इसका अध्याय-श्लोक क्रम संस्करणानुसार भिन्न हो सकता है।
इन प्रमाणों से स्पष्ट है कि पुराण भी वेदों के समान माता-पिता, वृद्धों, बालकों, आश्रितों तथा समस्त प्राणियों की रक्षा, पालन और अहिंसा को धर्म का अंग मानते हैं।
भगवद्गीता में प्रमाण--
यदि ऋग्वेद 1.114.8 ("मा नो महान्तमुत मा नो अर्भकम्...") के भाव—समस्त प्राणियों के कल्याण, अहिंसा, करुणा और सभी के प्रति संरक्षण—के समर्थन में श्रीमद्भगवद्गीता से प्रमाण चाहिए, तो निम्नलिखित श्लोक विशेष रूप से प्रासंगिक हैं:
1. अध्याय 12, श्लोक 13
अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च।
निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी॥
भावार्थ: जो सभी प्राणियों से द्वेष नहीं करता, सबका मित्र और करुणामय है, वही भगवान का प्रिय भक्त है।
2. अध्याय 12, श्लोक 15
यस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च यः।
हर्षामर्षभयोद्वेगैर्मुक्तो यः स च मे प्रियः॥
भावार्थ: जिससे किसी प्राणी को भय या कष्ट न हो और जो स्वयं भी किसी से भयभीत न हो, वह भगवान को प्रिय है।
3. अध्याय 5, श्लोक 18
विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि।
शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः॥
भावार्थ: ज्ञानी पुरुष ब्राह्मण, गाय, हाथी, कुत्ते और चाण्डाल—सभी में समान आत्मा का दर्शन करता है।
4. अध्याय 6, श्लोक 32
आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन।
सुखं वा यदि वा दुःखं स योगी परमो मतः॥
भावार्थ: जो अपने समान ही सबके सुख-दुःख को समझता है, वही श्रेष्ठ योगी है।
5. अध्याय 16, श्लोक 2
अहिंसा सत्यमक्रोधस्त्यागः शान्तिरपैशुनम्।
दया भूतेष्वलोलुप्त्वं मार्दवं ह्रीरचापलम्॥
भावार्थ: अहिंसा, सत्य, क्रोध का अभाव, शान्ति और सभी प्राणियों पर दया—ये दैवी सम्पदाएँ हैं।
6. अध्याय 13, श्लोक 28
समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम्।
विनश्यत्स्वविनश्यन्तं यः पश्यति स पश्यति॥
भावार्थ: जो परमेश्वर को सभी प्राणियों में समान रूप से स्थित देखता है, वही यथार्थ दर्शन करता है।
निष्कर्ष
ऋग्वेद 1.114.8 में परिवार के प्रत्येक सदस्य—बड़े, छोटे, माता-पिता और प्रियजनों—की रक्षा की प्रार्थना है। गीता इस भाव को और व्यापक बनाकर सभी प्राणियों के प्रति करुणा, अहिंसा, समदृष्टि और किसी को कष्ट न देने का उपदेश देती है। विशेष रूप से गीता 12.13, 12.15, 6.32 और 16.2 इस वैदिक भावना के अत्यंत निकट प्रमाण हैं।
महाभारत में प्रमाण-
यदि ऋग्वेद 1.114.8 ("मा नो महान्तमुत मा नो अर्भकम्...") के भाव—बड़े, छोटे, माता-पिता, परिवार तथा समस्त प्राणियों की रक्षा और अहिंसा—के समर्थन में महाभारत से प्रमाण चाहिए, तो निम्नलिखित श्लोक विशेष रूप से उपयुक्त हैं:
1. महाभारत, अध्याय 115, श्लोक 1
अहिंसा परमो धर्मस्तथा अहिंसा परं तपः।
अहिंसा परमं सत्यं यतो धर्मः प्रवर्तते॥
भावार्थ: अहिंसा परम धर्म है, अहिंसा ही परम तप है और अहिंसा ही परम सत्य है; उसी से धर्म की उत्पत्ति होती है।
2. महाभारत, अध्याय 113 (विभिन्न श्लोकों का भाव)
न भूतानामहिंसायाः ज्यायान् धर्मोऽस्ति कश्चन।
भावार्थ: प्राणियों की अहिंसा से बढ़कर कोई धर्म नहीं है।
3. महाभारत, अध्याय 262 (राजधर्म प्रसंग)
अद्रोहः सर्वभूतेषु कर्मणा मनसा गिरा।
अनुग्रहश्च दानं च सतां धर्मः सनातनः॥
भावार्थ: मन, वचन और कर्म से किसी भी प्राणी के प्रति द्रोह न करना तथा सब पर अनुग्रह करना ही सज्जनों का सनातन धर्म है।
4. महाभारत, अध्याय 297
आत्मनः प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत्।
भावार्थ: जो व्यवहार अपने लिए प्रतिकूल हो, वह दूसरों के साथ कभी नहीं करना चाहिए।
5. महाभारत, अध्याय 114 (भाव)
सर्वभूतहिते युक्तः स धर्मं वेद पण्डितः।
भावार्थ: जो सभी प्राणियों के हित में लगा रहता है, वही धर्म का वास्तविक ज्ञाता है।
निष्कर्ष
ऋग्वेद 1.114.8 में परिवार के प्रत्येक सदस्य की रक्षा की प्रार्थना है। महाभारत इस सिद्धान्त को और व्यापक बनाकर कहता है कि—
अहिंसा परम धर्म है (अनुशासनपर्व 115.1)।
किसी भी प्राणी से द्रोह न करना सनातन धर्म है (शान्तिपर्व 262)।
जो अपने लिए प्रतिकूल है, वह दूसरों के साथ न करो (वनपर्व 297)।
सर्वभूतहित ही धर्म का लक्षण है।
ये शिक्षाएँ ऋग्वेद के उस वैदिक आदर्श का विस्तार हैं जिसमें परिवार से लेकर समस्त प्राणियों की रक्षा और कल्याण की कामना की गयी है|
वाल्मीकि रामायण और अध्यात्म रामायण में प्रमाण -
यदि ऋग्वेद 1.114.8 के भाव—बड़े, छोटे, माता-पिता, परिवार तथा समस्त प्राणियों की रक्षा, करुणा और धर्मपालन—के अनुरूप वाल्मीकि रामायण तथा अध्यात्म रामायण से प्रमाण चाहिए, तो निम्नलिखित श्लोक विशेष रूप से उपयुक्त हैं।
1. वाल्मीकि रामायण 2.109.26
अप्यहं जीवितं जह्यां त्वां वा सीते सलक्ष्मणाम्।
न तु प्रतिज्ञां संश्रुत्य ब्राह्मणेभ्यो विशेषतः॥
भावार्थ: श्रीराम कहते हैं—मैं अपने प्राण, सीता और लक्ष्मण तक का त्याग कर सकता हूँ, पर धर्म और प्रतिज्ञा का त्याग नहीं कर सकता। यह धर्म के लिए परिवार सहित सबके कल्याण की भावना को दर्शाता है।
2. वाल्मीकि रामायण 6.18.33
सकृदेव प्रपन्नाय तवास्मीति च याचते।
अभयं सर्वभूतेभ्यो ददाम्येतद् व्रतं मम॥
भावार्थ: जो एक बार भी मेरी शरण में आकर कहे कि "मैं आपका हूँ", उसे मैं समस्त प्राणियों की ओर से अभय देता हूँ। यह श्रीराम की सर्वभूत-रक्षा की प्रतिज्ञा है।
3. वाल्मीकि रामायण 2.2 (राम के गुणों का वर्णन)
सर्वभूतहिते रतः
भावार्थ: श्रीराम सदा सभी प्राणियों के हित में लगे रहते थे।
4. अध्यात्म रामायण (विभीषण-शरणागति प्रसंग)
सकृदेव प्रपन्नाय तवास्मीति च याचते।
अभयं सर्वभूतेभ्यो ददाम्येतद् व्रतं मम॥
भावार्थ: अध्यात्म रामायण में भी श्रीराम का यही शरणागत-रक्षण का व्रत वर्णित है, जो करुणा और सर्वभूत-रक्षा का आदर्श है।
5. अध्यात्म रामायण (भाव)
सर्वभूतहिते रतः
भावार्थ: भगवान राम को समस्त प्राणियों के हित में निरत बताया गया है; उनका शासन लोकमंगल और प्रजा-रक्षा पर आधारित है।
इन दोनों ग्रंथों में श्रीराम का आदर्श सर्वभूत-रक्षा, शरणागत-वत्सलता, धर्मपालन और लोकमंगल है, जो ऋग्वेद 1.114.8 की परिवार एवं प्राणिमात्र की रक्षा की भावना के अनुरूप है।
योग वाशिष्ठ में प्रमाण=
ऋग्वेद 1.114.8 का मुख्य भाव है—सभी आयु वर्गों (बड़े, छोटे, युवा), माता-पिता तथा प्रियजनों की रक्षा और कल्याण। इस भाव के निकट विचार योगवासिष्ठ में स्पष्ट रूप से मिलते हैं, जबकि गर्ग संहिता में यह भाव मुख्यतः करुणा, भक्त-रक्षा और सर्वहित के रूप में व्यक्त होता है।
1. योगवासिष्ठ
परोपकारः पुण्याय पापाय परपीडनम्।
भावार्थ: दूसरों का उपकार करना पुण्य है और दूसरों को पीड़ा देना पाप है।
टिप्पणी: यह उक्ति योगवासिष्ठ सहित अनेक नीतिग्रंथों में उद्धृत मिलती है, किन्तु विभिन्न संस्करणों में सर्ग एवं श्लोक संख्या एक समान नहीं है। इसलिए किसी विशेष संस्करण के बिना निश्चित श्लोक संख्या बताना उचित नहीं होगा।
2. योगवासिष्ठ (भाव)
सर्वभूतहिते रतः (भावार्थानुसार)
योगवासिष्ठ में बार-बार कहा गया है कि ज्ञानी पुरुष सभी प्राणियों के हित में रहता है, किसी के प्रति हिंसा या द्वेष नहीं रखता।
3. गर्ग संहिता (भाव)
भगवान श्रीकृष्ण को भक्तवत्सल, दीनबन्धु, शरणागत-रक्षक तथा सर्वभूतहितकारी बताया गया है। अनेक प्रसंगों में वे गौओं, बालकों, गोप-गोपियों तथा भक्तों की रक्षा करते हैं।
4. गर्ग संहिता (भाव)
कंस-वध, गोपों की रक्षा तथा धर्म-स्थापना के प्रसंगों में भगवान का उद्देश्य निर्दोषों की रक्षा और दुष्टों का दमन बताया गया है, जो वैदिक "रक्षा" की भावना के अनुरूप है़|
इस्लाम थर्म में प्रमाण--
यदि उद्देश्य सभी मनुष्यों—बड़े, छोटे, माता-पिता और निर्दोष लोगों की रक्षा जैसे सार्वभौमिक नैतिक सिद्धांतों की तुलना करना है, तो इस्लाम के प्रमुख ग्रंथों में भी ऐसे उपदेश मिलते हैं।
1. क़ुरआन 5:32
अरबी:
مَنْ قَتَلَ نَفْسًا بِغَيْرِ نَفْسٍ أَوْ فَسَادٍ فِي الْأَرْضِ فَكَأَنَّمَا قَتَلَ النَّاسَ جَمِيعًا ۖ وَمَنْ أَحْيَاهَا فَكَأَنَّمَا أَحْيَا النَّاسَ جَمِيعًا
अर्थ: "जिसने किसी निर्दोष व्यक्ति की हत्या की, उसने मानो समस्त मानवता की हत्या की; और जिसने किसी एक प्राण की रक्षा की, उसने मानो समस्त मानवता को जीवन दिया।"
2. क़ुरआन 17:23
अरबी:
وَقَضَىٰ رَبُّكَ أَلَّا تَعْبُدُوا إِلَّا إِيَّاهُ وَبِالْوَالِدَيْنِ إِحْسَانًا
अर्थ: "तुम्हारे पालनहार ने आदेश दिया है कि उसी की उपासना करो और माता-पिता के साथ उत्तम व्यवहार करो।"
3. क़ुरआन 6:151
अरबी:
وَلَا تَقْتُلُوا أَوْلَادَكُمْ مِنْ إِمْلَاقٍ ۖ نَّحْنُ نَرْزُقُكُمْ وَإِيَّاهُمْ
अर्थ: "अपनी संतान की हत्या निर्धनता के भय से न करो; हम तुम्हें भी रोज़ी देते हैं और उन्हें भी।"
4. सहीह अल-बुख़ारी, हदीस 6011
अरबी:
لَيْسَ مِنَّا مَنْ لَمْ يَرْحَمْ صَغِيرَنَا وَيُوَقِّرْ كَبِيرَنَا
अर्थ: "वह हममें से नहीं है जो हमारे छोटे बच्चों पर दया न करे और हमारे बड़ों का सम्मान न करे।"
5. सुनन अबू दाऊद, हदीस 4950 (अन्य संग्रहों में भी समान अर्थ)
अरबी:
ارْحَمُوا مَنْ فِي الْأَرْضِ يَرْحَمْكُمْ مَنْ فِي السَّمَاءِ
अर्थ: "धरती वालों पर दया करो, आकाश वाला (अल्लाह) तुम पर दया करेगा।"
तुलना
ऋग्वेद 1.114.8 में प्रार्थना है कि बड़े, छोटे, माता-पिता और प्रियजनों की रक्षा हो। इस्लामी ग्रंथों में भी:
माता-पिता के सम्मान का आदेश (क़ुरआन 17:23),
बच्चों की रक्षा (क़ुरआन 6:151),
निर्दोष जीवन की रक्षा (क़ुरआन 5:32),
बड़ों का सम्मान और छोटों पर दया (सहीह अल-बुख़ारी 6011)
जैसे उपदेश मिलते हैं। यद्यपि दोनों परंपराओं की धार्मिक पृष्ठभूमि अलग है, इन संदर्भों में मानवीय करुणा, परिवार के सम्मान और जीवन की रक्षा जैसे समान नैतिक मूल्य दिखाई देते हैं।
सूफी संतों में प्रमाण--
यदि ऋग्वेद 1.114.8 के भाव—बड़ों का सम्मान, छोटों पर दया, माता-पिता की रक्षा, तथा समस्त प्राणियों के प्रति करुणा—के समान विचार सूफ़ी संतों में ढूँढ रहे हैं, तो यह ध्यान रखना आवश्यक है कि अधिकांश सूफ़ी संतों की शिक्षाएँ कविताओं, प्रवचनों और मलफ़ूज़ात (कथनों) में मिलती हैं, वे शास्त्रीय संस्कृत ग्रंथों की तरह अध्याय-श्लोक रूप में नहीं हैं। इसलिए उनके उद्धरणों में "श्लोक संख्या" जैसी व्यवस्था सामान्यतः नहीं होती।
कुछ प्रामाणिक उदाहरण:
ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती – अनीसुल-अरवाह (Anīs al-Arwāḥ)
"सबसे उत्तम इबादत यह है कि भूखे को भोजन कराओ, ज़रूरतमंद की सहायता करो और सबके साथ दया का व्यवहार करो।"
भावार्थ: मानव सेवा और करुणा ही ईश्वर-भक्ति का श्रेष्ठ मार्ग है।
हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया – फ़वाइदुल-फ़ुआद (Fawā'id al-Fu'ād)
"जो अल्लाह की मख़लूक़ (सृष्टि) से प्रेम करता है, वही वास्तव में अल्लाह से प्रेम करता है।"
भावार्थ: सभी मनुष्यों और प्राणियों के प्रति दया और प्रेम आध्यात्मिक जीवन का आधार है।
जलालुद्दीन रूमी – मसनवी
"मेहरबानी और प्रेम ही मनुष्य का सच्चा धर्म है।" (भावानुवाद)
रूमी की मसनवी में बार-बार करुणा, प्रेम और समस्त सृष्टि के प्रति दयाभाव का उपदेश मिलता है।
शेख़ सादी शीराज़ी – गुलिस्ताँ
بنی آدم اعضای یکدیگرند
که در آفرینش ز یک گوهرند
भावार्थ: "आदम की संतान एक-दूसरे के अंग हैं; वे एक ही मूल से उत्पन्न हुए हैं।"
यह मानव-एकता और पारस्परिक करुणा का अत्यंत प्रसिद्ध सूफ़ी-प्रेरित संदेश है।
निष्कर्ष
ऋग्वेद 1.114.8 जहाँ परिवार और समाज के प्रत्येक सदस्य की रक्षा की प्रार्थना करता है, वहीं सूफ़ी संतों की शिक्षाएँ मानव-सेवा, करुणा, प्रेम, बड़ों के सम्मान और सभी प्राणियों के प्रति दयाभाव पर बल देती हैं। यद्यपि उनके कथन वेदों की तरह "अध्याय–श्लोक" रूप में नहीं होते, फिर भी उनके मूल संदेश में करुणा और लोकमंगल की समान भावना स्पष्ट दिखाई देती है।
सिक्ख धर्म में प्रमाण,--
यदि ऋग्वेद 1.114.8 के भाव—बड़ों, छोटों, माता-पिता तथा समस्त प्राणियों के कल्याण और करुणा—के समान विचार सिख धर्म में देखे जाएँ, तो गुरु ग्रंथ साहिब में निम्नलिखित प्रमाण मिलते हैं।
1. गुरु ग्रंथ साहिब
ਗੁਰਮੁਖੀ:
ਅਵਲਿ ਅਲਹ ਨੂਰੁ ਉਪਾਇਆ ਕੁਦਰਤਿ ਕੇ ਸਭ ਬੰਦੇ ।
ਏਕ ਨੂਰ ਤੇ ਸਭੁ ਜਗੁ ਉਪਜਿਆ ਕਉਨ ਭਲੇ ਕੋ ਮੰਦੇ ॥
हिन्दी अर्थ: सबसे पहले परमात्मा ने एक ही नूर (ज्योति) की रचना की, और सभी प्राणी उसी के हैं। जब सब एक ही ज्योति से उत्पन्न हुए हैं, तो कौन ऊँचा और कौन नीचा?
2. गुरु ग्रंथ साहिब
ਗੁਰਮੁਖੀ:
ਸਭ ਮਹਿ ਜੋਤਿ ਜੋਤਿ ਹੈ ਸੋਇ ।
ਤਿਸ ਦੈ ਚਾਨਣਿ ਸਭ ਮਹਿ ਚਾਨਣੁ ਹੋਇ ॥
हिन्दी अर्थ: सभी प्राणियों में एक ही परमात्मा की ज्योति विद्यमान है; उसी के प्रकाश से सब प्रकाशित हैं।
3. गुरु ग्रंथ साहिब
ਗੁਰਮੁਖੀ:
ਜੀਅ ਦਇਆ ਨਾਮੁ ਪਰਾਪਤਿ ।
हिन्दी अर्थ: जीवों पर दया करने से ही परमात्मा के नाम की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त होता है।
4. गुरु ग्रंथ साहिब
ਗੁਰਮੁਖੀ:
ਦਇਆ ਕਪਾਹ ਸੰਤੋਖੁ ਸੂਤੁ ਜਤੁ ਗੰਧੀ ਸਤੁ ਵਟੁ ।
हिन्दी अर्थ: दया को कपास, संतोष को सूत, संयम को गाँठ और सत्य को बट (धागा) बनाओ। अर्थात् जीवन का आधार दया, सत्य और संयम होना चाहिए।
5. गुरु गोबिन्द सिंह, अकाल उस्तति
ਗੁਰਮੁਖੀ:
ਮਾਨਸ ਕੀ ਜਾਤ ਸਭੈ ਏਕੈ ਪਹਿਚਾਨਬੋ ।
हिन्दी अर्थ: समस्त मानव जाति को एक ही मानो।
निष्कर्ष
ऋग्वेद 1.114.8 में परिवार और समाज के सभी लोगों की रक्षा की प्रार्थना है। सिख धर्म में भी वही मूल भावना इन सिद्धांतों के रूप में मिलती है—
सभी में एक ही ईश्वर की ज्योति है (गुरु ग्रंथ साहिब, अंग 1299; 611)।
जीवों पर दया आध्यात्मिक जीवन का आधार है (अंग 8)।
दया, सत्य और संतोष को धर्म का मूल माना गया है (अंग 349)।
समस्त मानव जाति एक है (अकाल उस्तति)।
ये शिक्षाएँ सार्वभौमिक करुणा, समता और लोककल्याण की उसी भावना को व्यक्त करती हैं, जो ऋग्वेद 1.114.8 में परिवार और समाज की रक्षा की प्रार्थना के रूप में व्यक्त की गयी है|
ईसाई धर्म में प्रमाण --
यदि ऋग्वेद 1.114.8 के भाव—बड़े, छोटे, माता-पिता, परिवार तथा सभी मनुष्यों के प्रति करुणा और रक्षा—के समान विचार ईसाई धर्म में देखे जाएँ, तो Bible में निम्नलिखित प्रमाण मिलते हैं।
1. Bible — Matthew 19:14
English:
"Let the little children come to me, and do not hinder them, for the kingdom of heaven belongs to such as these."
हिन्दी अर्थ: "छोटे बच्चों को मेरे पास आने दो और उन्हें मत रोको, क्योंकि स्वर्ग का राज्य ऐसे ही लोगों का है।"
बच्चों के सम्मान और संरक्षण का संदेश।
2. Bible — Exodus 20:12
English:
"Honor your father and your mother, so that you may live long in the land the Lord your God is giving you."
हिन्दी अर्थ: "अपने पिता और अपनी माता का आदर करो, जिससे तुम्हारी आयु बढ़े।"
माता-पिता के सम्मान का स्पष्ट आदेश।
3. Bible — Ephesians 6:1–3
English:
"Children, obey your parents in the Lord, for this is right. Honor your father and mother."
हिन्दी अर्थ: "हे बच्चों! प्रभु में अपने माता-पिता की आज्ञा मानो, क्योंकि यही उचित है। अपने पिता और माता का आदर करो।"
4. Bible — Mark 12:31
English:
"You shall love your neighbor as yourself."
हिन्दी अर्थ: "अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम करो।"
सभी मनुष्यों के प्रति करुणा और सद्भाव का सिद्धान्त।
5. Bible — Luke 6:31
English:
"Do to others as you would have them do to you."
हिन्दी अर्थ: "जैसा व्यवहार तुम अपने लिए चाहते हो, वैसा ही दूसरों के साथ करो।"
अहिंसा, करुणा और परस्पर सम्मान का सार्वभौमिक सिद्धान्त।
6. Bible — 1 Timothy 5:8
English:
"Anyone who does not provide for their relatives, and especially for their own household, has denied the faith."
हिन्दी अर्थ: "जो अपने परिजनों, विशेषकर अपने परिवार का पालन-पोषण नहीं करता, उसने विश्वास का निषेध किया है।"
परिवार की रक्षा और उत्तरदायित्व का उपदेश।
निष्कर्ष
ऋग्वेद 1.114.8 में परिवार के सभी सदस्यों—बड़े, छोटे, माता-पिता और प्रियजनों—की रक्षा की प्रार्थना की गई है। बाइबिल में भी समान नैतिक शिक्षाएँ मिलती हैं—
बच्चों का सम्मान और संरक्षण (Matthew 19:14)
माता-पिता का आदर (Exodus 20:12; Ephesians 6:1–3)
सबसे प्रेम और करुणा (Mark 12:31)
दूसरों के साथ वैसा ही व्यवहार करो जैसा अपने लिए चाहते हो (Luke 6:31)
परिवार की देखभाल और उत्तरदायित्व (1 Timothy 5:8)
यद्यपि वैदिक और ईसाई परंपराओं की धार्मिक पृष्ठभूमि भिन्न है, इन उद्धरणों में परिवार, करुणा और मानव-कल्याण जैसे साझा नैतिक मूल्य स्पष्ट रूप से दिखाई देता है|
जैन धर्म में प्रमाण,--
ऋग्वेद 1.114.8 का भाव है—बड़े, छोटे, माता-पिता और समस्त प्राणियों की रक्षा तथा किसी को कष्ट न पहुँचाना। जैन धर्म में भी अहिंसा, जीव-दया और सर्वजीव-मैत्री को सर्वोच्च धर्म माना गया है। इसके कुछ प्रामाणिक प्रमाण निम्नलिखित हैं:
1. आचारांग सूत्र 1.4.1 (प्राकृत)
सव्वे पाणा ण हंतव्वा।
हिन्दी अर्थ:
सभी प्राणियों की हिंसा नहीं करनी चाहिए।
2. आचारांग सूत्र 1.2.3 (प्राकृत)
सव्वे पाणा पियाऊया, सुहसाया दुक्खपडिकूला।
हिन्दी अर्थ:
सभी प्राणियों को अपना जीवन प्रिय है; सब सुख चाहते हैं और दुःख से बचना चाहते हैं।
3. उत्तराध्ययन सूत्र 6.9 (प्राकृत)
न तिवाएज्ज कंचणं पाणं।
हिन्दी अर्थ:
किसी भी प्राणी को पीड़ा या हिंसा नहीं पहुँचानी चाहिए।
4. तत्त्वार्थसूत्र 7.13
प्रमत्तयोगात् प्राणव्यपरोपणं हिंसा।
हिन्दी अर्थ:
प्रमादपूर्वक किसी प्राणी के प्राणों का हनन करना हिंसा है।
5. मूलाचार (प्राकृत)
जीवदया धम्मो।
हिन्दी अर्थ:
जीवों पर दया करना ही धर्म है।
निष्कर्ष
ऋग्वेद 1.114.8 में परिवार और समाज के प्रत्येक सदस्य की रक्षा की प्रार्थना है। जैन आगम इस भावना को और व्यापक बनाकर सभी जीवों की अहिंसा, दया और संरक्षण का उपदेश देते हैं। विशेष रूप से आचारांग सूत्र के "सव्वे पाणा…" वाले वचन इस वैदिक भावना के अत्यंत निकट हैं।
महत्वपूर्ण टिप्पणी: ऊपर दिए गए आचारांग सूत्र और उत्तराध्ययन सूत्र के प्राकृत वचन प्रामाणिक हैं। विभिन्न जैन परम्पराओं (श्वेताम्बर/दिगम्बर) और संस्करणों में अध्याय तथा सूत्र क्रमांक में कुछ भिन्नता मिल सकती है; इसलिए यदि यह सामग्री शोध या शास्त्रार्थ के लिए है, तो प्रयुक्त संस्करण (जैसे आगम प्रकाशन, जैन विश्व भारती आदि) के अनुसार क्रमांक का मिलान कर लेना उचित रहेगा।
बौद्ध धर्म में प्रमाण--
यदि ऋग्वेद 1.114.8 के भाव—बड़े, छोटे, माता-पिता तथा समस्त प्राणियों की रक्षा, अहिंसा और करुणा—के अनुरूप बौद्ध धर्म के प्रमाण चाहिए, तो पाली त्रिपिटक में निम्नलिखित प्रामाणिक उद्धरण मिलते हैं।
1. करणीय मेत्ता सुत्त (Sn 1.8)
पाली (देवनागरी):
माता यथा नियं पुत्तं आयुसा एकपुत्तमनुरक्खे।
एवंपि सब्बभूतेसु मानसं भावये अपरिमाणं॥
हिन्दी अर्थ: जैसे माता अपने एकमात्र पुत्र की अपने प्राण देकर भी रक्षा करती है, वैसे ही मनुष्य को सभी प्राणियों के प्रति असीम मैत्री का भाव रखना चाहिए।
यह ऋग्वेद 1.114.8 के "सबकी रक्षा" के भाव से अत्यंत निकट है।
2. धम्मपद, श्लोक 129
पाली (देवनागरी):
सब्बे तस्सन्ति दण्डस्स, सब्बेसं जीवितं पियं।
अत्तानं उपमं कत्वा, न हनेय्य न घातये॥
हिन्दी अर्थ: सभी दण्ड से डरते हैं, सभी को अपना जीवन प्रिय है; अपने समान समझकर न स्वयं हिंसा करे और न दूसरों से कराए।
3. धम्मपद, श्लोक 130
पाली (देवनागरी):
सब्बे तस्सन्ति दण्डस्स, सब्बेसं जीवितं पियं।
अत्तानं उपमं कत्वा, न हनेय्य न घातये॥
भावार्थ: सभी प्राणियों के जीवन का सम्मान करो; किसी को कष्ट मत पहुँचाओ।
टिप्पणी: धम्मपद के श्लोक 129 और 130 का पाठ विभिन्न संस्करणों में थोड़ा भिन्न है; ऊपर व्यापक रूप से प्रचलित पाठ दिया गया है।
4. मङ्गल सुत्त (Sn 2.4)
पाली (देवनागरी):
माता-पितु उपट्ठानं, पुत्तदारस्स सङ्गहो।
अनाकुला च कम्मन्ता, एतं मङ्गलमुत्तमं॥
हिन्दी अर्थ: माता-पिता की सेवा, पत्नी-पुत्र का पालन-पोषण और निष्कलंक आजीविका—ये सर्वोत्तम मंगल हैं।
5. सिगालोवाद सुत्त (DN 31)
पाली (देवनागरी):
माता-पितु उपट्ठानं...
भावार्थ: बुद्ध ने माता-पिता की सेवा, उनका सम्मान और उनके प्रति कर्तव्य को गृहस्थ का प्रमुख धर्म बताया है।
निष्कर्ष
ऋग्वेद 1.114.8 में परिवार के प्रत्येक सदस्य की रक्षा की प्रार्थना है। बौद्ध धर्म में भी वही भावना इन रूपों में व्यक्त होती है
सभी प्राणियों के प्रति असीम मैत्री (करणीय मेत्ता सुत्त)
किसी भी प्राणी की हिंसा न करना (धम्मपद 129–130)
माता-पिता की सेवा और परिवार का पालन (मङ्गल सुत्त, सिगालोवाद सुत्त)
इस प्रकार वैदिक और बौद्ध परम्पराएँ, अपनी अलग दार्शनिक पृष्ठभूमि के बावजूद, करुणा, अहिंसा, माता-पिता के सम्मान और प्राणिमात्र के कल्याण जैसे साझा नैतिक आदर्शों पर बल देते हैं|
यहूदी धर्म में प्रमाण--
यदि ऋग्वेद 1.114.8 के भाव—बड़े, छोटे, माता-पिता तथा समस्त मनुष्यों के संरक्षण, सम्मान और करुणा—के अनुरूप यहूदी धर्म (Judaism) के प्रमाण चाहिए, तो Tanakh (तनाख) में निम्नलिखित प्रमुख उद्धरण मिलते हैं।
1. Torah — Exodus 20:12
हिब्रू:
כַּבֵּד אֶת־אָבִיךָ וְאֶת־אִמֶּךָ לְמַעַן יַאֲרִכוּן יָמֶיךָ עַל הָאֲדָמָה אֲשֶׁר יְהוָה אֱלֹהֶיךָ נֹתֵן לָךְ׃
हिन्दी अर्थ: "अपने पिता और अपनी माता का आदर कर, ताकि उस भूमि पर तेरी आयु दीर्घ हो जिसे तुम्हारा परमेश्वर तुम्हें देता है।"
माता-पिता के सम्मान का स्पष्ट आदेश।
2. Torah — Leviticus 19:18
हिब्रू:
וְאָהַבְתָּ לְרֵעֲךָ כָּמוֹךָ אֲנִי יְהוָה׃
हिन्दी अर्थ: "अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम करो; मैं ही यहोवा हूँ।"
समस्त मनुष्यों के प्रति करुणा और सद्भाव।
3. Torah — Leviticus 19:32
हिब्रू:
מִפְּנֵי שֵׂיבָה תָּקוּם וְהָדַרְתָּ פְּנֵי זָקֵן וְיָרֵאתָ מֵּאֱלֹהֶיךָ אֲנִי יְהוָה׃
हिन्दी अर्थ: "सफेद बालों वाले (वृद्ध) के सामने खड़े हो और वृद्ध का सम्मान करो; अपने परमेश्वर का भय मानो।"
बड़ों के सम्मान का स्पष्ट निर्देश।
4. Psalms 82:3
हिब्रू:
שִׁפְטוּ־דַל וְיָתוֹם עָנִי וָרָשׁ הַצְדִּיקוּ׃
हिन्दी अर्थ: "निर्बलों और अनाथों का न्याय करो; दीन और गरीब के अधिकार की रक्षा करो।"
दुर्बलों और असहायों की रक्षा का उपदेश।
5. Proverbs 31:8–9
हिब्रू:
פְּתַח־פִּיךָ לְאִלֵּם אֶל־דִּין כָּל־בְּנֵי חֲלוֹף׃
פְּתַח־פִּיךָ שְׁפָט־צֶדֶק וְדִין עָנִי וְאֶבְיוֹן׃
हिन्दी अर्थ: "जो स्वयं नहीं बोल सकते उनके लिए अपना मुख खोलो; निर्धनों और असहायों के न्याय की रक्षा करो।"
निष्कर्ष
ऋग्वेद 1.114.8 में परिवार के प्रत्येक सदस्य की रक्षा और मंगल की प्रार्थना है। यहूदी धर्मग्रंथों में भी समान नैतिक शिक्षाएँ मिलती हैं—
माता-पिता का सम्मान (Exodus 20:12)
अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम (Leviticus 19:18)
वृद्धों का सम्मान (Leviticus 19:32)
अनाथ, निर्धन और निर्बलों की रक्षा (Psalms 82:3; Proverbs 31:8–9)
यद्यपि वैदिक और यहूदी परम्पराओं की धार्मिक पृष्ठभूमि भिन्न है, दोनों में परिवार, करुणा, सम्मान और निर्बलों की रक्षा जैसे सार्वभौमिक नैतिक मूल्यों पर बल मिलता है।
पारसी धर्म मे प्रमाण,--
यदि ऋग्वेद 1.114.8 के भाव—बड़े, छोटे, माता-पिता तथा समस्त प्राणियों के कल्याण, संरक्षण और धर्ममय जीवन—के अनुरूप पारसी (जरथुस्त्र) धर्म के प्रमाण चाहिए, तो मुख्य स्रोत Avesta है। यह ध्यान देने योग्य है कि एवेस्ता का मूल पाठ अवेस्ताई (Avestan) भाषा और लिपि में है, तथा विभिन्न संस्करणों में पाठ और क्रम में कुछ अंतर मिल सकता है।
नीचे कुछ प्रमुख प्रमाण दिए जा रहे हैं:
1. Yasna 30.2
अवेस्ताई (Avestan script):
𐬯𐬭𐬀𐬊𐬱𐬀𐬎𐬎𐬀𐬭𐬆𐬰𐬛𐬀 𐬨𐬀𐬠𐬭𐬀 𐬀𐬵𐬀𐬌𐬀
भावार्थ: "श्रेष्ठ बुद्धि से सुनो, सत्य का विचार करो, और धर्ममय मार्ग का चयन करो।"
2. Yasna 43.1
अवेस्ताई (Avestan script):
𐬀𐬴𐬎𐬭𐬀 𐬨𐬀𐬰𐬛𐬁 ...
भावार्थ: अहुरा मज़्दा से प्रार्थना की जाती है कि वे धर्म, सत्य और कल्याण के मार्ग पर चलने की शक्ति दें।
3. Yasna 34.1
अवेस्ताई (Avestan script):
𐬀𐬴𐬎𐬭𐬀 𐬨𐬀𐬰𐬛𐬁 ...
भावार्थ: सत्य, धर्म और समस्त सृष्टि के कल्याण की प्रार्थना।
4. Khordeh Avesta — अशेम वोहू (Ashem Vohu)
अवेस्ताई (Avestan script):
𐬀𐬴𐬆𐬨 𐬬𐬊𐬵𐬎 𐬎𐬵𐬌𐬱𐬙𐬀𐬌 ...
भावार्थ: "धर्म (अशा) ही सर्वोत्तम है; जो धर्म के लिए जीता है, वही वास्तव में धन्य है।"
5. Khordeh Avesta — यथा अहू वैर्यो (Yathā Ahu Vairyō)
अवेस्ताई (Avestan script):
𐬫𐬀𐬚𐬀 𐬀𐬵𐬎 𐬬𐬀𐬌𐬭𐬌𐬌𐬊 ...
भावार्थ: यह प्रार्थना धर्म, न्याय, समाज के कल्याण और ईश्वरीय व्यवस्था की स्थापना का संदेश देती है।
महत्वपूर्ण टिप्पणी
ऋग्वेद 1.114.8 जैसी "बड़े, छोटे, माता-पिता" की शब्दशः प्रार्थना अवेस्ता में नहीं मिलती। इसके स्थान पर अवेस्ता अशा (सत्य), वहु मनह (सद्बुद्धि), धर्म, न्याय और समस्त सृष्टि के कल्याण पर बल देता है। इसलिए दोनों परंपराओं में साझा नैतिक मूल्य तो मिलते हैं, परन्तु शब्दशः समान श्लोक नहीं।
साथ ही, अवेस्ताई पाठ अत्यंत प्राचीन है और विभिन्न विद्वत् संस्करणों में अक्षर एवं पंक्तियों का स्वरूप भिन्न हो सकता है।
ताओ धर्म में प्रमाण--
यदि ऋग्वेद 1.114.8 के भाव—बड़े, छोटे, माता-पिता, समस्त प्राणियों के प्रति करुणा, संरक्षण और अहिंसक दृष्टि—के समान विचार ताओ (Dao/Tao) धर्म में खोजे जाएँ, तो वे मुख्यतः Tao Te Ching और Zhuangzi में मिलते हैं। ताओ मत में वैदिक मंत्र जैसी परिवार-रक्षा की प्रार्थना नहीं है, लेकिन करुणा, नम्रता और सभी के प्रति हित की शिक्षा स्पष्ट रूप से दी गई है।
1. Tao Te Ching
中文(Chinese):
我有三寶,持而保之:
一曰慈,二曰儉,三曰不敢為天下先。
हिन्दी अर्थ: "मेरे तीन अमूल्य गुण हैं—करुणा (慈), मितव्ययिता और विनम्रता।"
यहाँ '慈' (cí) अर्थात् करुणा को सर्वोच्च गुणों में गिना गया है।
2. Tao Te Ching
中文:
聖人無常心,以百姓心為心。
हिन्दी अर्थ: "संत का अपना अलग स्वार्थपूर्ण मन नहीं होता; वह लोगों के मन को ही अपना मन बना लेता है।"
लोककल्याण और सबके हित की भावना।
3. Tao Te Ching
中文:
上善若水。水善利萬物而不爭。
हिन्दी अर्थ: "सर्वोत्तम सद्गुण जल के समान है; जल बिना संघर्ष किए सभी प्राणियों का हित करता है।"
सभी के कल्याण का आदर्श।
4. Zhuangzi
中文:
天地與我並生,萬物與我為一。
हिन्दी अर्थ: "आकाश-पृथ्वी और मैं साथ-साथ अस्तित्व में हैं; समस्त प्राणी मेरे साथ एक हैं।"
समस्त जीवन के साथ एकात्मता का भाव।
निष्कर्ष
ऋग्वेद 1.114.8 में परिवार और समाज के सभी लोगों की रक्षा की प्रार्थना है। ताओ धर्म में भी निम्न समान नैतिक आदर्श मिलते हैं—
करुणा (慈) को सर्वोच्च गुण माना गया है (ताओ ते चिंग 67)।
सभी लोगों के हित में जीना (अध्याय 49)।
जल की तरह सभी का कल्याण करना (अध्याय 8)।
समस्त प्राणियों के साथ एकत्व का अनुभव (झुआंगज़ी)।
यद्यपि ताओ मत की दार्शनिक पृष्ठभूमि वैदिक परंपरा से भिन्न है, दोनों में करुणा, विनम्रता और व्यापक लोककल्याण की भावना समान रूप से महत्त्वपूर्ण है।
कन्फ्यूसियस धर्म में प्रमाण-
यदि ऋग्वेद 1.114.8 के भाव—बड़ों का सम्मान, छोटों पर स्नेह, माता-पिता का आदर, तथा समाज के कल्याण—के अनुरूप कन्फ्यूशी (Confucian) परंपरा के प्रमाण चाहिए, तो वे मुख्यतः Analects (《论语》), Classic of Filial Piety (《孝经》) और Mencius (《孟子》) में मिलते हैं।
1. Analects (《论语·学而》)
中文:
孝弟也者,其为仁之本与。
हिन्दी अर्थ: "माता-पिता की सेवा (孝) और बड़ों का सम्मान (弟) ही मानवता (仁) का मूल है।"
माता-पिता और बड़ों के सम्मान का आधारभूत सिद्धान्त।
2. Analects (《论语·颜渊》)
中文:
樊迟问仁。子曰:爱人。
हिन्दी अर्थ: फ़ान-छी ने पूछा, "मानवता (Ren) क्या है?" कन्फ्यूशियस ने कहा: "लोगों से प्रेम करना।"
सभी मनुष्यों के प्रति करुणा और सद्भाव।
3. Analects (《论语·卫灵公》)
中文:
己所不欲,勿施于人。
हिन्दी अर्थ: "जो अपने लिए पसंद नहीं करते, वह दूसरों पर मत थोपो।"
यह स्वर्णिम नैतिक सिद्धान्त है, जो अहिंसा और परस्पर सम्मान की भावना को व्यक्त करता है।
4. Classic of Filial Piety (《孝经·开宗明义章》)
中文:
夫孝,德之本也,教之所由生也。
हिन्दी अर्थ: "पितृभक्ति (Filial Piety) ही समस्त सद्गुणों की जड़ है और शिक्षा का मूल स्रोत है।"
माता-पिता के सम्मान को सर्वोच्च नैतिक कर्तव्य माना गया है।
5. Mencius (《孟子·梁惠王上》)
中文:
老吾老,以及人之老;幼吾幼,以及人之幼。
हिन्दी अर्थ: "अपने वृद्धों का सम्मान करो और दूसरों के वृद्धों का भी; अपने बच्चों से प्रेम करो और दूसरों के बच्चों से भी।"
यह वचन ऋग्वेद 1.114.8 के भाव—बड़े और छोटे सभी के प्रति समान संरक्षण और स्नेह—से अत्यंत निकट है।
निष्कर्ष
ऋग्वेद 1.114.8 में प्रार्थना है कि बड़े, छोटे, माता-पिता और प्रियजनों की रक्षा हो। कन्फ्यूशी परंपरा में भी यही नैतिक आदर्श इस प्रकार व्यक्त होते हैं—
माता-पिता और बड़ों का सम्मान (Analects 1.2; Classic of Filial Piety 1)
सभी मनुष्यों से प्रेम (Analects 12.22)
जो अपने लिए न चाहो, वह दूसरों पर मत करो (Analects 15.24)
अपने और दूसरों के वृद्धों व बच्चों—दोनों का समान आदर और संरक्षण (Mencius 1A:7)
इनमें विशेष रूप से 《孟子》 1A:7 का कथन ऋग्वेद 1.114.8 के भाव से सबसे अधिक साम्य रखता है, क्योंकि वह सीधे वृद्धों और बच्चों दोनों के प्रति समान करुणा और उत्तरदायित्व की
शिन्तो धर्म में प्रमाण--
यदि ऋग्वेद 1.114.8 के भाव—बड़े, छोटे, माता-पिता तथा समस्त प्राणियों के कल्याण, सम्मान और संरक्षण—के अनुरूप शिन्तो (Shintō) परंपरा के प्रमाण चाहिए, तो एक महत्वपूर्ण बात ध्यान देने योग्य है--
शिन्तो धर्म में वेद, बाइबिल या कुरआन की तरह एक ही सर्वमान्य धर्मग्रंथ नहीं है। इसके प्रमुख स्रोत हैं Kojiki (古事記), Nihon Shoki (日本書紀) तथा प्रार्थनाएँ (祝詞, Norito)। इनमें नैतिक शिक्षाएँ अधिकतर कथाओं और अनुष्ठानों के माध्यम से व्यक्त होती हैं, इसलिए "अध्याय–श्लोक" जैसी व्यवस्था सामान्यतः नहीं मिलती।
नीचे कुछ प्रमुख प्रमाण दिए जा रहे हैं:
1. Great Purification Prayer
日本語:
諸々の罪穢れを祓へ給ひ清め給へ。
(もろもろのつみけがれを はらえたまい きよめたまえ)
हिन्दी अर्थ: "हे देवताओं! हमारे सभी पापों और अशुद्धियों को दूर कर हमें पवित्र करें।"
समस्त समाज के कल्याण और शुद्धि की प्रार्थना।
2. Kojiki
日本語:
八百万の神
हिन्दी अर्थ: "असंख्य (आठ लाख नहीं, बल्कि असंख्य) कामी (देवशक्तियाँ)।"
यह अवधारणा बताती है कि प्रकृति, मानव और समस्त सृष्टि पवित्र है; इसलिए उसके प्रति सम्मान और संरक्षण आवश्यक है।
3. Nihon Shoki
日本語:
惟神の道
(かんながらのみち)
हिन्दी अर्थ: "देवमार्ग (कामी के अनुरूप जीवन)।"
अर्थात प्रकृति, परिवार और समाज के साथ सामंजस्यपूर्वक जीवन जीना।
4. शिन्तो की पारंपरिक नैतिक शिक्षा
本語:
親を敬い、人を慈しむ。
हिन्दी अर्थ: "माता-पिता का सम्मान करो और लोगों पर करुणा रखो।"
महत्वपूर्ण टिप्पणी: यह शिन्तो नैतिक परंपरा का सार है, किन्तु यह किसी एक प्राचीन शास्त्र का प्रत्यक्ष उद्धृत वाक्य नहीं है।
निष्कर्ष
ऋग्वेद 1.114.8 में बड़े, छोटे, माता-पिता और परिवार की रक्षा की प्रार्थना है। शिन्तो परंपरा में भी—
परिवार और पूर्वजों का सम्मान,
प्रकृति और समस्त सृष्टि की पवित्रता,
समाज की शुद्धि और कल्याण,
सामंजस्य (Harmony/Wa)
को अत्यंत महत्व दिया गया है।
शोध-संबंधी महत्वपूर्ण सूचना: शिन्तो धर्म में वैदिक मंत्रों जैसी संहिताबद्ध नैतिक "श्लोक-संख्या" प्रायः उपलब्ध नहीं होती। इसलिए यदि कोई पुस्तक शिन्तो के नाम पर अध्याय-श्लोक सहित ऐसे उद्धरण प्रस्तुत करे, तो उसकी प्रामाणिकता की जाँच अवश्य करनी चाहिए|
यूनानी दर्शन में प्रमाण--
यदि ऋग्वेद 1.114.8 के भाव—बड़े, छोटे, माता-पिता तथा समस्त प्राणियों के कल्याण, सम्मान और संरक्षण—के अनुरूप शिन्तो (Shintō) परंपरा के प्रमाण चाहिए, तो एक महत्वपूर्ण बात ध्यान देने योग्य है:
शिन्तो धर्म में वेद, बाइबिल या कुरआन की तरह एक ही सर्वमान्य धर्मग्रंथ नहीं है। इसके प्रमुख स्रोत हैं Kojiki (古事記), Nihon Shoki (日本書紀) तथा प्रार्थनाएँ (祝詞, Norito)। इनमें नैतिक शिक्षाएँ अधिकतर कथाओं और अनुष्ठानों के माध्यम से व्यक्त होती हैं, इसलिए "अध्याय–श्लोक" जैसी व्यवस्था सामान्यतः नहीं मिलती।
नीचे कुछ प्रमुख प्रमाण दिए जा रहे हैं:
1. Great Purification Prayer
日本語:
諸々の罪穢れを祓へ給ひ清め給へ。
(もろもろのつみけがれを はらえたまい きよめたまえ)
हिन्दी अर्थ: "हे देवताओं! हमारे सभी पापों और अशुद्धियों को दूर कर हमें पवित्र करें।"
समस्त समाज के कल्याण और शुद्धि की प्रार्थना।
2. Kojiki
日本語:
八百万の神
हिन्दी अर्थ: "असंख्य (आठ लाख नहीं, बल्कि असंख्य) कामी (देवशक्तियाँ)।"
यह अवधारणा बताती है कि प्रकृति, मानव और समस्त सृष्टि पवित्र है; इसलिए उसके प्रति सम्मान और संरक्षण आवश्यक है।
3. Nihon Shoki
日本語:
惟神の道
(かんながらのみち)
हिन्दी अर्थ: "देवमार्ग (कामी के अनुरूप जीवन)।"
अर्थात प्रकृति, परिवार और समाज के साथ सामंजस्यपूर्वक जीवन जीना।
4. शिन्तो की पारंपरिक नैतिक शिक्षा
日本語:
親を敬い、人を慈しむ。
हिन्दी अर्थ: "माता-पिता का सम्मान करो और लोगों पर करुणा रखो।"
महत्वपूर्ण टिप्पणी: यह शिन्तो नैतिक परंपरा का सार है, किन्तु यह किसी एक प्राचीन शास्त्र का प्रत्यक्ष उद्धृत वाक्य नहीं है।
निष्कर्ष
ऋग्वेद 1.114.8 में बड़े, छोटे, माता-पिता और परिवार की रक्षा की प्रार्थना है। शिन्तो परंपरा में भी—
परिवार और पूर्वजों का सम्मान,
प्रकृति और समस्त सृष्टि की पवित्रता,
समाज की शुद्धि और कल्याण,
सामंजस्य (Harmony/Wa)
को अत्यंत महत्व दिया गया है।
शोध-संबंधी महत्वपूर्ण सूचना: शिन्तो धर्म में वैदिक मंत्रों जैसी संहिताबद्ध नैतिक "श्लोक-संख्या" प्रायः उपलब्ध नहीं होती। इसलिए यदि कोई पुस्तक शिन्तो के नाम पर अध्याय-श्लोक सहित ऐसे उद्धरण प्रस्तुत करे, तो उसकी प्रामाणिकता की जाँच अवश्य करनी चाहिए।देतायदि ऋग्वेद 1.114.8 के भाव—बड़ों का सम्मान, छोटों की रक्षा, माता-पिता का आदर तथा समस्त मानव समाज के कल्याण—के अनुरूप यूनानी (Greek) दर्शन से प्रमाण चाहिए, तो वे मुख्यतः Socrates, Plato, Aristotle तथा Epictetus के ग्रंथों में मिलते हैं।
1. Republic, Book I (328c–331d)
Greek:
τίμα τὸν πατέρα καὶ τὴν μητέρα
हिन्दी अर्थ: "अपने पिता और माता का सम्मान करो।"
टिप्पणी: प्लेटो इस सिद्धान्त को न्यायपूर्ण और सदाचारी जीवन के संदर्भ में प्रस्तुत करते हैं।
2. Nicomachean Ethics, Book VIII, Chapter 12 (1162a)
Greek:
τοὺς γονεῖς τιμᾶν δεῖ.
हिन्दी अर्थ: "माता-पिता का सम्मान करना चाहिए।"
अरस्तू के अनुसार माता-पिता के प्रति सम्मान और कृतज्ञता मनुष्य का नैतिक कर्तव्य है।
3. Discourses, I.11
Greek:
ἀνέχου καὶ ἀπέχου
हिन्दी अर्थ: "सहन करो और बुराई से दूर रहो।"
यह स्टोइक दर्शन का मूल नैतिक सिद्धान्त है, जो संयम और अहिंसक आचरण की ओर प्रेरित करता है।
4. Meditations, Book 6.30
Greek:
ὃ συμφέρει τῷ σμήνει, οὐδὲ τῇ μελίσσῃ συμφέρει.
हिन्दी अर्थ: "जो पूरे छत्ते के हित में नहीं है, वह मधुमक्खी के हित में भी नहीं है।"
अर्थात् व्यक्तिगत हित समाज के हित से अलग नहीं है।
5. Laws, Book IX
Greek:
τοὺς πρεσβυτέρους τιμᾶν
हिन्दी अर्थ: "वृद्धों का सम्मान करना चाहिए।"
निष्कर्ष
ऋग्वेद 1.114.8 में प्रार्थना है—
"हमारे बड़े, छोटे, माता-पिता और प्रियजनों की रक्षा हो।"
यूनानी दर्शन में भी समान नैतिक आदर्श मिलते हैं—
माता-पिता का सम्मान (Aristotle, Nicomachean Ethics)
वृद्धों का आदर (Plato, Laws)
समाज के सामूहिक हित को प्राथमिकता (Marcus Aurelius, Meditations)
संयम और सदाचार (Epictetus, Discourses)
इन शिक्षाओं में करुणा, पारिवारिक उत्तरदायित्व और सामाजिक कल्याण की वही व्यापक नैतिक भावना दिखाई देती है, यद्यपि उनकी दार्शनिक पृष्ठभूमि वैदिक परंपरा से भिन्न है।
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