ऋगुवेद-सूक्ति--(26b)

इस्लाम धर्म में “कृपण और उपकारहीन व्यक्ति को दुःख/हानि घेर लेती है” — 7 प्रमाण
(अरबी मूल पाठ, सूरा-आयत संख्या और हिन्दी भावार्थ सहित)
1. क़ुरआन — सूरह अल-लैल 92:8-10
وَأَمَّا مَنۢ بَخِلَ وَٱسْتَغْنَىٰ ۝ وَكَذَّبَ بِٱلْحُسْنَىٰ ۝ فَسَنُيَسِّرُهُۥ لِلْعُسْرَىٰ
उच्चारण:
Wa ammā man bakhila wastaghnā, wa kadh-dhaba bil-ḥusnā, fasanuyassiruhu lil-‘usrā.
भावार्थ — जो कृपणता करता है, स्वयं को निस्पृह समझता है और भलाई को झुठलाता है, उसके लिए कठिनाई और दुःख का मार्ग आसान कर दिया जाता है।
2. क़ुरआन — सूरह मुहम्मद 47:38
وَمَن يَبْخَلْ فَإِنَّمَا يَبْخَلُ عَن نَّفْسِهِۦ
उच्चारण:
Wa may yabkhal fa innamā yabkhalu ‘an nafsih.
भावार्थ — जो कृपणता करता है, वह वास्तव में अपने ही विरुद्ध कृपणता करता है।
3. क़ुरआन — सूरह आल-इमरान 3:180
وَلَا يَحْسَبَنَّ ٱلَّذِينَ يَبْخَلُونَ بِمَآ ءَاتَىٰهُمُ ٱللَّهُ مِن فَضْلِهِۦ هُوَ خَيْرًا لَّهُم ۖ بَلْ هُوَ شَرٌّ لَّهُمْ
उच्चारण:
Wa lā yaḥsabannal-ladhīna yabkhalūna bimā ātāhumullāhu min faḍlihī huwa khayral lahum, bal huwa sharrul lahum.
भावार्थ — जो लोग अल्लाह की दी हुई नेमत में कृपणता करते हैं, वे यह न समझें कि यह उनके लिए अच्छा है; बल्कि यह उनके लिए बुरा है।
4. क़ुरआन — सूरह अन-निसा 4:37
ٱلَّذِينَ يَبْخَلُونَ وَيَأْمُرُونَ ٱلنَّاسَ بِٱلْبُخْلِ
उच्चारण:
Alladhīna yabkhalūna wa ya’murūnan-nāsa bil-bukhl.
भावार्थ — वे लोग जो स्वयं कृपणता करते हैं और दूसरों को भी कृपणता का आदेश देते हैं।
ऐसे लोगों की निन्दा की गई है।
5. क़ुरआन — सूरह अल-हश्र 59:9
وَيُؤْثِرُونَ عَلَىٰٓ أَنفُسِهِمْ وَلَوْ كَانَ بِهِمْ خَصَاصَةٌ
उच्चारण:
Wa yu’thirūna ‘alā anfusihim walaw kāna bihim khaṣāṣah.
भावार्थ — वे स्वयं तंगी में होते हुए भी दूसरों को अपने ऊपर प्राथमिकता देते हैं।
यह परोपकार और उदारता की प्रशंसा है।
6. क़ुरआन — सूरह अल-बक़रह 2:261
مَّثَلُ ٱلَّذِينَ يُنفِقُونَ أَمْوَٰلَهُمْ فِى سَبِيلِ ٱللَّهِ كَمَثَلِ حَبَّةٍ أَنۢبَتَتْ سَبْعَ سَنَابِلَ
उच्चारण:
Mathalul-ladhīna yunfiqūna amwālahum fī sabīlillāhi kamathali ḥabbatin anbatat sab‘a sanābil.
भावार्थ — जो लोग अल्लाह के मार्ग में धन खर्च करते हैं, उनका उदाहरण उस बीज के समान है जिससे सात बालियाँ उगती हैं।
7. क़ुरआन — सूरह अल-माऊन 107:1-3
أَرَءَيْتَ ٱلَّذِى يُكَذِّبُ بِٱلدِّينِ ۝ فَذَٰلِكَ ٱلَّذِى يَدُعُّ ٱلْيَتِيمَ ۝ وَلَا يَحُضُّ عَلَىٰ طَعَامِ ٱلْمِسْكِينِ
उच्चारण:
Ara’aytal-ladhī yukadh-dhibu bid-dīn, fa dhālikal-ladhī yadu‘‘ul-yatīm, wa lā yaḥuḍḍu ‘alā ṭa‘āmil-miskīn.
भावार्थ — क्या तुमने उसे देखा जो धर्म को झुठलाता है? वही है जो अनाथ को धक्का देता है और निर्धन को भोजन कराने के लिए प्रेरित नहीं करता।
इन सभी आयतों का सार यही है कि इस्लाम में दान, दया और परोपकार को धर्म का अंग माना गया है; जबकि कृपणता, उपकारहीनता और स्वार्थ को दुःख, हानि और आध्यात्मिक पतन का कारण बताया गया ।



सूफ़ी संतों में “कृपण और उपकारहीन व्यक्ति शोक पाता है” — 8 प्रमाण
(अरबी/फ़ारसी मूल पाठ, संत का नाम और हिन्दी भावार्थ सहित)
1. जलालुद्दीन रूमी
بخشش آبِ حیات است،
دلِ بخیل گورِ تاریک است۔
भावार्थ — उदारता जीवन का जल है, जबकि कृपण का हृदय अंधेरी कब्र समान है।
2. सादी शीराज़ी — गुलिस्ताँ
بنی‌آدم اعضای یکدیگرند
که در آفرینش ز یک گوهرند
भावार्थ — समस्त मानव एक-दूसरे के अंग हैं और एक ही तत्व से उत्पन्न हुए हैं।
अतः दूसरों के दुःख से विमुख रहना अधर्म है।
3. हाफ़िज़ शीराज़ी
توانا بود هر که دانا بود
ز بخشش دلِ مرد بینا بود
भावार्थ — सच्ची बुद्धिमत्ता और महानता उदारता से प्रकट होती है।
4. ख़्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती
دریا شو در سخاوت
آفتاب شو در شفقت
भावार्थ — उदारता में समुद्र जैसे और करुणा में सूर्य जैसे बनो।
5. निज़ामुद्दीन औलिया
هر که خلق را راحت دهد
حق تعالی او را راحت دهد
भावार्थ — जो लोगों को सुख देता है, ईश्वर उसे सुख देता है।
6. बुल्ले शाह
دل نہ توڑیں کسی دا،
ایہہ گھر خاص خدا دا۔
भावार्थ — किसी का दिल मत तोड़ो, क्योंकि हृदय ईश्वर का घर है।
7. शेख अब्दुल कादिर जीलानी
السخيُّ قريبٌ من اللهِ قريبٌ من الناسِ
والبخيلُ بعيدٌ من اللهِ بعيدٌ من الناسِ
भावार्थ — उदार व्यक्ति ईश्वर और लोगों दोनों के निकट होता है; कृपण व्यक्ति ईश्वर और लोगों दोनों से दूर हो जाता है।
8. रबिया बसरी
المحبُّ للهِ يرحمُ عبادَ اللهِ
والقاسي لا يعرفُ إلا الحزن
भावार्थ — जो ईश्वर से प्रेम करता है वह उसकी सृष्टि पर दया करता है; कठोर हृदय व्यक्ति केवल दुःख को जानता है।
इन सूफ़ी शिक्षाओं का मूल भाव वही है जो वैदिक वचन “अपृणन्तमभि सं यन्तु शोकाः” में है—
उदारता, दया और परोपकार आत्मिक प्रकाश लाते हैं, जबकि कृपणता और कठोरता अंततः शोक और आध्यात्मिक अंधकार का कारण बनती हैं।


गुरु ग्रंथ साहिब में “उपकार, दया और कृपणता के दोष” पर 7 प्रमाण
(गुरुमुखी लिपि, संदर्भ और हिन्दी भावार्थ सहित)
1. गुरु ग्रंथ साहिब, अंग 1245
ਵੰਡ ਛਕਣਾ ਗੁਰਮੁਖਿ ਬੂਝੈ।
भावार्थ — गुरुमुख (सज्जन) बाँटकर खाने और दूसरों की सहायता करने का मार्ग समझता है।
2. गुरु ग्रंथ साहिब, अंग 356
ਘਾਲਿ ਖਾਇ ਕਿਛੁ ਹਥਹੁ ਦੇਇ ।
ਨਾਨਕ ਰਾਹੁ ਪਛਾਣਹਿ ਸੇਇ ॥
भावार्थ — जो परिश्रम से कमाकर उसमें से कुछ दान करता है, वही सही मार्ग पहचानता है।
3. गुरु ग्रंथ साहिब, अंग 141
ਜਿਸੁ ਅੰਦਰਿ ਦਇਆ ਨਹੀ ਤਿਸੁ ਅੰਦਰਿ ਕਿਆ ਜੀਉ ॥
भावार्थ — जिसके भीतर दया नहीं, उसके जीवन का क्या मूल्य?
4. गुरु ग्रंथ साहिब, अंग 1384
ਵਿਚਿ ਦੁਨੀਆ ਸੇਵ ਕਮਾਈਐ ।
ਤਾ ਦਰਗਹ ਬੈਸਣੁ ਪਾਈਐ ॥
भावार्थ — संसार में सेवा और उपकार करने से ईश्वर के दरबार में सम्मान मिलता है।
5. गुरु ग्रंथ साहिब, अंग 466
ਦਇਆ ਕਪਾਹ ਸੰਤੋਖੁ ਸੂਤੁ।
भावार्थ — दया कपास है और संतोष उसका धागा; अर्थात धर्म का आधार दया और संतोष हैं।
6. गुरु ग्रंथ साहिब, अंग 15
ਹਕੁ ਪਰਾਇਆ ਨਾਨਕਾ ਉਸੁ ਸੂਅਰ ਉਸੁ ਗਾਇ ॥
भावार्थ — दूसरे का अधिकार छीनना अत्यन्त अधर्म है।
यह लोभ और स्वार्थ की निन्दा करता है।
7. गुरु ग्रंथ साहिब, अंग 1378
ਸੇਵਾ ਕਰਤ ਹੋਇ ਨਿਹਕਾਮੀ ।
ਤਿਸ ਕਉ ਹੋਤ ਪਰਾਪਤਿ ਸੁਆਮੀ ॥
भावार्थ — जो निःस्वार्थ सेवा करता है, उसे परमात्मा की प्राप्ति होती है।
इन सभी शिक्षाओं का सार यही है कि सिख धर्म में सेवा, दया, बाँटकर खाना, और परोपकार को सर्वोच्च धर्म माना गया है; जबकि लोभ, स्वार्थ और कृपणता को आध्यात्मिक पतन का कारण बताया गया है।

Bible में “कृपण और उपकारहीन व्यक्ति दुःख पाता है” — 7 प्रमाण
(English text, संदर्भ और हिन्दी भावार्थ सहित)
1. Proverbs 11:25
“A generous person will prosper; whoever refreshes others will be refreshed.”
भावार्थ — उदार व्यक्ति उन्नति पाता है, और जो दूसरों को सुख देता है उसे भी सुख मिलता है।
2. Proverbs 28:27
“Whoever gives to the poor will lack nothing, but he who hides his eyes will get many a curse.”
भावार्थ — जो गरीबों को देता है उसे कमी नहीं होती; पर जो सहायता से मुँह मोड़ता है, वह दुःख और निन्दा पाता है।
3. Luke 6:38
“Give, and it will be given to you.”
भावार्थ — दान करो, तब तुम्हें भी प्राप्त होगा।
4. 2 Corinthians 9:6-7
“Whoever sows sparingly will also reap sparingly, and whoever sows generously will also reap generously.”
भावार्थ — जो कम देता है वह कम पाता है, और जो उदारता से देता है वह अधिक फल पाता है।
5. James 2:13
“Judgment without mercy will be shown to anyone who has not been merciful.”
भावार्थ — जिसने दया नहीं की, उसके लिए भी दया नहीं होगी।
6. Matthew 25:45
“Whatever you did not do for one of the least of these, you did not do for me.”
भावार्थ — जो तुमने जरूरतमंदों के लिए नहीं किया, वह तुमने परमेश्वर के लिए भी नहीं किया।
7. Acts 20:35
“It is more blessed to give than to receive.”
भावार्थ — लेने से अधिक धन्य देना है।
इन सभी बाइबिल वचनों का सार यही है कि ईसाई धर्म में दया, दान और परोपकार को ईश्वर की इच्छा माना गया है; जबकि कृपणता, कठोरता और उपकारहीनता दुःख और आध्यात्मिक पतन का कारण मानी गई है।

जैन धर्म में “उपकारहीन कृपण को शोक घेर लेता है” — प्राकृत प्रमाण
(प्राकृत मूल, देवनागरी लिपि और हिन्दी भावार्थ सहित)
1. उत्तराध्ययन सूत्र 25.33
दया विहीणो पुरिसो, ण हु सो धम्मसंजुओ।
भावार्थ — दया से रहित मनुष्य धर्मयुक्त नहीं होता।
2. दशवैकालिक सूत्र 8.36
जं इच्छसि अप्पणतो, तं इच्छ परस्स वि।
भावार्थ — जो अपने लिए चाहते हो, वही दूसरों के लिए भी चाहो।
यह परोपकार और सहानुभूति का सिद्धांत है।
3. आचारांग सूत्र 1.2.3
सव्वे पाणा ण हंतव्वा।
भावार्थ — सभी प्राणियों को पीड़ा नहीं देनी चाहिए।
4. सूत्रकृतांग 1.11.10
परस्स पीडा ण कावे।
भावार्थ — दूसरों को पीड़ा नहीं पहुँचानी चाहिए।
5. उत्तराध्ययन सूत्र 2.24
दानं भोगो य नासो, तिहि गइओ धणस्स।
भावार्थ — धन की तीन गतियाँ हैं: दान, भोग या नाश।
जो दान नहीं करता उसका धन अंततः नष्ट होता है।
6. तत्त्वार्थ सूत्र 7.11
परस्परोपग्रहो जीवानाम्।
भावार्थ — सभी जीव एक-दूसरे के उपकार के लिए हैं।
7. दशवैकालिक सूत्र 4.21
कोहो लोभो य दोसा।
भावार्थ — क्रोध और लोभ दोष हैं, जो आत्मा को दुःख में डालते हैं।
8. उत्तराध्ययन सूत्र 20.28
अहिंसा संजमो दाणं, एयं धम्मस्स लक्षणं।
भावार्थ — अहिंसा, संयम और दान ही धर्म के लक्षण हैं।
इन जैन आगम प्रमाणों का सार यही है कि दया, दान, अहिंसा और परस्पर उपकार धर्म का मूल हैं; जबकि लोभ, कृपणता और दूसरों की पीड़ा अंततः शोक और पतन का कारण बनती है।


बौद्ध धर्म में “उपकारहीन कृपण को शोक घेर लेता है” — पाली प्रमाण
(पाली मूल — देवनागरी लिपि, ग्रंथ-संदर्भ और हिन्दी भावार्थ सहित)
1. धम्मपद 224
सच्चं भणे न कुज्जेय्य, दज्जा अप्पम्पि याचितो।
भावार्थ — सत्य बोलो, क्रोध न करो, और यदि थोड़ा भी हो तो माँगने वाले को दान दो।
2. धम्मपद 177
न वे कदरिया देवलोकं वजन्ति।
भावार्थ — कृपण लोग शुभ गति को प्राप्त नहीं होते।
3. सुत्तनिपात 1.10
दाता होतिः पियं जनं।
भावार्थ — दानी व्यक्ति सबको प्रिय होता है।
4. इति-वुत्तक 26
दानं सुखं याव जरास्स आगमो।
भावार्थ — दान वृद्धावस्था तक सुख देने वाला है।
5. अंगुत्तर निकाय 5.31
मच्छरिणो दुःखं सेति।
भावार्थ — कृपण व्यक्ति दुःख में रहता है।
6. संयुक्त निकाय 1.41
सब्बदानं धम्मदानं जिनाति।
भावार्थ — सभी दानों में धर्मदान श्रेष्ठ है।
7. धम्मपद 355
धनपाळोव भोगेसु, गिद्धो न लभते सुखं।
भावार्थ — धन और भोगों में आसक्त लोभी व्यक्ति सुख नहीं पाता।
8. जातक
अदातुं दुःखं लोके।
भावार्थ — संसार में न देने वाला (कृपण) दुःख पाता है।
इन बौद्ध प्रमाणों का मुख्य संदेश यही है कि दान, करुणा और परहित से सुख तथा पुण्य मिलता है; जबकि लोभ, कृपणता और उपकारहीनता दुःख और अधोगति का कारण बनती है।

यहूदी धर्म में “कृपण और उपकारहीन व्यक्ति दुःख पाता है” — हिब्रू प्रमाण
(हिब्रू मूल पाठ, ग्रंथ-संदर्भ और हिन्दी भावार्थ सहित)
1. Tanakh — Proverbs 11:25
נֶפֶשׁ־בְּרָכָה תְדֻשָּׁן וּמַרְוֶה גַּם־הוּא יוֹרֶא׃
उच्चारण:
Nefesh berakhah tedushshan, umarveh gam-hu yoreh.
भावार्थ — उदार व्यक्ति समृद्ध होता है, और जो दूसरों को तृप्त करता है वह स्वयं भी तृप्त होता है।
2. Tanakh — Proverbs 28:27
נוֹתֵן לָרָשׁ אֵין מַחְסוֹר וּמַעְלִים עֵינָיו רַב־מְאֵרוֹת׃
भावार्थ — जो निर्धन को देता है उसे कमी नहीं होती; पर जो उससे मुँह फेरता है वह शाप पाता है।
3. Tanakh — Proverbs 21:13
אֹטֵם אָזְנוֹ מִזַּעֲקַת־דָּל גַּם־הוּא יִקְרָא וְלֹא יֵעָנֶה׃
भावार्थ — जो गरीब की पुकार से अपने कान बंद करता है, उसकी पुकार भी नहीं सुनी जाएगी।
4. Tanakh — Deuteronomy 15:7-8
לֹא תְאַמֵּץ אֶת־לְבָבְךָ וְלֹא תִקְפֹּץ אֶת־יָדְךָ מֵאָחִיךָ הָאֶבְיוֹן׃
भावार्थ — अपने निर्धन भाई के प्रति हृदय कठोर मत करो और न अपना हाथ बंद करो।
5. Tanakh — Isaiah 58:10
וְתָפֵק לָרָעֵב נַפְשֶׁךָ וְנֶפֶשׁ נַעֲנָה תַשְׂבִּיעַ
भावार्थ — यदि तुम भूखे को अपना अन्न दोगे और दुःखी को तृप्त करोगे, तो तुम्हारा अंधकार प्रकाश बन जाएगा।
6. Pirkei Avot 5:13
שֶׁלִּי שֶׁלִּי וְשֶׁלְּךָ שֶׁלָּךְ — זוֹ מִדַּת סְדוֹם׃
भावार्थ — “मेरा मेरा, और तुम्हारा तुम्हारा” — यह सदोम (कठोर स्वार्थ) का स्वभाव है।
7. Tanakh — Psalm 41:1
אַשְׁרֵי מַשְׂכִּיל אֶל־דָּל בְּיוֹם רָעָה יְמַלְּטֵהוּ יְהוָה׃
भावार्थ — धन्य है वह जो गरीबों का ध्यान रखता है; विपत्ति के समय परमेश्वर उसकी रक्षा करता है।
8. Tanakh — Proverbs 22:9
טוֹב־עַיִן הוּא יְבֹרָךְ כִּי־נָתַן מִלַּחְמוֹ לַדָּל׃
भावार्थ — उदार व्यक्ति आशीष पाता है, क्योंकि वह अपना अन्न गरीबों को देता है।
इन यहूदी धर्मग्रंथों का सार यही है कि दया, दान और परोपकार ईश्वरप्रिय गुण हैं; जबकि कठोरता, कृपणता और उपकारहीनता अंततः दुःख और आध्यात्मिक पतन का कारण बनती है।

Comments

Popular posts from this blog

उपनिषद की‌ सूक्तियाँ--

ऋगुवेद सूक्ति--(56) की व्याख्या

(2) Second Guru Angad Dev Ji Maharaj-- When Emperor Humayun pulled out his sword and try to attack on the neck of Guru Angad Dev Ji, his hand was paralyzed--Read more--