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उपनिषद की‌ सूक्तियाँ--

(१) ईशोपनिषद की सूक्तियाँ--
(१) ईशावास्य मिदं सर्वं।
            ईशोपनिषद--१
भाव--
(२) मा गृधःकस्यस्विद्धधनम्।
      ‌     ईशोपनिषद--१
भाव-- किसी के धन की इच्छा मत‌ कर।
(३) कुरर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतम् समाः। 
        ईशोपनिषद--२
भाव--इस लोक में कर्म करते हुए ही सौ वर्ष जीने की इच्छा करे।
(४) तदन्तरस्य सर्वस्य।
              ईशोपनिषद--४
भाव--वह (ईश्वर) सबके अन्दर है।
(५) तदेजति तन्नेजति।
               ईशोपनिषद--५
भाव-- वह (ईश्वर) चलता है और नहीं भी चलता है।
(६) तद्दूरे तद्वन्तिके।
         ईशोपनिषद--५
भाव-- वह (ईश्वर) दूर है और समीप भी है।
(७) को मोहः का शोकः एकत्वमनुपश्यतः। 
ईशोपनिषद--७
भाव--एकत्व देखने वाले मनुष्य के लिए क्या मोह और क्या शोक ?
(८) अन्धं तमः प्रविशन्ति ये अविद्यामुपासते।
    ईशोपनिषद--९
भाव-- जो अविद्या (कर्म) की उपासना करते हैं, वे घोर अन्धकार में प्रवेश करते हैं।
(९) सोअहंस्मि।
       ईशोपनिषद--१६
भाव-- वह (ईश्वर) मैं हूँ।
(१०) क्रतो स्मर कृतं स्मर, क्रतो स्मर कृतं स्मर।
       ईशोपनिषद--१७
भाव-- तू स्मरण कर, अपने किए हुए हुए को  स्मरण कर। तु स्मरण कर, अपने किए हुए को स्मरण कर।
(२) केनोपनिषद की सूक्तियाँ--
१) न तत्र चक्षुर्गच्छति नवाग्गच्छति नो मनः। 
        केन उपनिषद--१/३
भाव-- उस ईश्वर तक न आँख पहुँचती है, न वाणी पहुँचती है, न मन।
(२) यच्चक्षुषा न पश्यति येन चक्षूँसि पश्यति। 
       केन उपनिषद--१/६
भाव-- जिसे आँखों से नहीं देखा जा सकता, किन्तु‌ जिसकी शक्ति से आँखें देखती हैं, वह ब्रह्म है।
(३) यच्छोत्रेण न श्रणोति येन श्रोत्रमिदं श्रुतम्।
      केनोपनिषद--१/७
भाव--जो कानों से सुनायी नहीं देता किन्तु जिसकी शक्ति से कान सुनते हैं, वह ब्रह्म है।
(४) यत्प्राणेन न प्राणिति, येन प्राणः प्रणीयते।
          केनोपनिषद--१/८
भाव-- जो श्वास लेकर नहीं जीता है, बल्कि जिस शक्ति से श्वास आता जाता है, वह ब्रह्म है।
(५) यस्यामतं तस्य मतं मतं यस्य न वेद सः।
      केनोपनिषद--२/३
भाव--जो मनुष्य समझता है कि मैं ब्रह्म को नहीं जानता हूँ, वह उसको जानता है।
जो मनुष्य यह समझता है कि मैं ब्रह्म को जानता हूँ, वह उसे नहीं जानता।
(६) प्रतिबोध विदितं मतममृतत्वं हि विन्दते।
     केनोपनिषद--२/४
भाव--बार-बार मनन करने से वह ब्रह्म जाना जाता है।
(७) आत्मना विन्दते वीर्यँ।
   ‌     केनोपनिषद--२/४
भाव-- मनुष्य अपने आत्मबल‌ से ब्रह्म को प्राप्त करता है।
(8) इह‌ चेद वेदीदथ सत्यमस्ति।
       केनोपनिषद--२/५
भाव-यदि मनुष्य ने इस जीवन‌ में  ब्रह्म को प्राप्त कर लिया,  तो जीवन सार्थक है।
(९) न चेदिहा वेदीनमहती विनष्टि।
       केनोपनिषद--२/५
भाव--यदि इस जन्म में ब्रह्म को नहीं जाना, तो बहुत भारी नुकसान होगा।
( फिर जाने कब मनुष्य का तन मिले।)
(१०) सर्वं दहेयं यदिदं पृथ्वीव्यामिति।
       केनोपनिषद--३/५
भाव--अग्नि ने कहा, मैं पृथ्वी की सम्पूर्ण चीज़ों को जला सकता हूँ।
(११)‍ सर्वमाददीय यदिदं पृथ्वीव्यामिति।
        केनोपनिषद--३/९
भाव-- वायुदेव ने कहा, मैं पृथ्वी पर जो कुछ है, उस सब को उड़ा सकता हूँ।
(११) तद्ध तद्वनं नाम।
   केनोपनिषद--४/६
भाव-- वह (ब्रह्म) भजनीय है।
(३) कठोपनिषद की सूक्तियाँ--
(१) न वित्तेन तर्पणीयोमनुष्यो।
      कठोपनिषद--१/१/२७
भा्व--नचिकेता ने यमराज से कहा, मनुष्य धन से तृप्त नहीं हो सकता।
(२) नायनात्मा प्रवचनेन लभ्योः।
        कठेपनिषद--१/२/२३
भाव--परमात्मा उपदेश देने से नहीं मिल सकता ।
(३) न जायते म्रियते वा।
    कठोपनिषद--१/२/१८
यह आत्मा न उत्पन्न होता हैदर न मरता है।
(३ ) न हन्यते हन्यमाने शरीरे।
        कठोपनिषद--१/२/१८
भाव-- शरीर के नाश होने पर आत्मा का नाश नहीं होता।
(४) नायं हन्ति न हन्यते।
        कठोपनिषद--१/२/१९
           गीता--२/१९
भाव-- आत्मा न मारता है , और न मारा है।
(५) अणोरणीयान् महतो महीयान्।
           कठोपनिषद--१/२/२०
भाव-- परमात्मा छोटे से छोटा (अणु) है, और बड़े से बड़ा है।
(६) जन्तोर्निहितो गुह्ययाम्।
       कठोपनिषद--१/२/२०
भाव-- परमात्मा मनुष्य के हृदय में स्थित है।
(७) पुरुषान्न परं किंचित्सा।
         ‌‌ कठोपनिषद-- १/३/११
भाव---परमात्मा से परे कुछ भी नहीं।
(८) धीरो न शोचति।
                 कठोपनिषद-- २/१/४
भाव--धीर पुरुष कभी शोक नहीं करते।
(९) मनसैवेदमाप्तव्यम्।
          कठोपनिषद--२/१/११
भाव-- परमात्मा को मन (सूक्ष्म बुद्धि) से जाना जा सकता है।
(११) पुरमेकादशद्वारमजस्यावक्रचेतसः।
      ‌  ‌‌ ‌‌‌‌कठोपनिषद--२/२/१
भाव--अंतःकरणवाले अजन्मा आत्मा का यह शरीर ग्यारह द्वारों वाला है।
दो आँख, दो कान, दो नाक, एक मुख, एक गुदा, एक मुत्रेन्द्रिय, दो अन्तःकरण वाले द्वार--पहला--ब्रह्म रन्ध्र अथवा सहस्रार चक्र(प्राण यहीं से निकलता है) , दूसरा-मन(विचारों के आने -जाने का मार्ग)
(१२) योनिमन्ये प्रपद्यन्ते शरीरत्वाय देहिनः।
       कठेपनिषद--२/२/७
भाव--कुछ मनुष्य शरीर धारण करने के लिए विभिन्न योनियों में जाते हैं।
(१३) न लिप्यते लोक दुखेन वाह्यः।
        ‌कठोपनिषद--२/२/११
भाव--वह बाहर सब जगह व्याप्य है फिर भी संसार के दोषों में भी लिप्त नहीं होता।
(१४) तस्य भासा सर्वमिदं विभाति।
         कठोपनिषद--२/२/१५
भाव--जो कुछ भी संसार में भासित है , सब उसी‌ की (परमात्मा की) आभा से भासित है।
(१५) ततः सर्गेषु लोकेषु शरीरत्वाय कल्पते। 
       कठोपनिषद--२/३/४
भाव--मुक्त न होने पर कल्प कल्पान्तरों तक इस जन्म-मरणशील संसार में विभिन्न योनियों में जन्म लेना पड़ता है।
(४) प्रश्नोपनिषद की सूक्तियाँ--
(१) स्वस्ति नः इन्द्रो वृद्धश्रवः।
      प्रश्नोपनिषद---स्वस्ति वाचन
भाव--जिनका सुयश चारो ओर फैला हुआ है, वह इन्द्र देव हमारा कल्याण करें।
(२) स्वस्ति नः पूषा विश्व वेदाः।
      प्रश्नोपनिषद--स्वस्ति वाचन
भाव--सम्पूर्ण विश्व का ज्ञान रखने वाले पूषा देव हमारा कल्याण करें।
(३) स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः।
     प्रश्नोपनिषद--स्वस्ति वाचन
भाव--अरिष्टों को मिटाने वाले चक्र सदृश
शक्तिशाली  गरुड़ देव हमारा कल्याण करें।
(४) स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु।
      प्रश्नोपनिषद--स्वस्ति वाचन
भाव--बुद्धि के स्वामी बृहस्पति देव हमारा कल्याण करें।
(५) आदित्यो ह वै प्राणो।
      प्रश्नोपनिषद-१/५
भाव-- सूर्य ही प्राण है।
(६) रयिरेव चन्द्रमा ।
       प्रश्नोपनिषद--१/५
भाव-- चन्द्रमा ही रयि ( समस्त स्थूल और सूक्ष्म वस्तुएँ, पंच तत्व) है।
नोट--समस्त प्राणियों के स्थूल शरीरों का पोषण  चन्द्रमा की शक्ति पाकर ही होता है।
(७) अन्नं वै प्रजापति।
  प्रश्नोपनिषद--१/१४
भाव-- अन्न ही प्रजापति है।
(८) आत्मन एष प्राणो जायते।
     प्रश्नोपनिषद--३/३
भाव--वह प्राण परमात्मा से उत्पन्न होता है।
(९) हृदि ह्येष आत्मा ।
प्रश्नोपनिषद--३/६
भाव-- आत्मा हृदय में स्थित है।
(१०) आदित्यो ह वै बाह्य प्राण ।
प्रश्नोपनिषद--३/८
भाव--निश्चय ही सूर्य बाह्य प्राण है।
नोट--सूर्य के प्रकाश से ही नेत्रों से बाह्य जगत दिखता है।
(११) संकल्पितं लोकं नयति।
प्रश्नोपनिषद--३/१०
भाव--संकल्प के अनुसार योनियाँ मिलती हैं।
(१२) प्राणाग्नय एवैतस्मिन पुरे जाग्रति ।
प्रश्नोपनिषद--४/३
भाव--(सोते समय) इस शरीर रूप नगर में पाँच प्राण अग्ननियाँ जागती रहती हैं।
(१३) स सर्वज्ञः सर्वो भवति।
प्रश्नोपनिषद--४/१०
भाव--वह(ईश्वर को प्राप्त करने वाला)
सर्वज्ञ और सर्वरूप होता है।
(१४) तदक्षरं वेदयते यस्तु सोम्य स सर्वज्ञः
सर्वमेवाविवेशेति।
प्रश्नोपनिषद--४/११
भाव--इस अविनाशी परमात्मा को जो कोई जान लेता है वह सर्वज्ञ है। वह सर्व स्वरूप परमेश्वर में प्रविष्ट हो जाता है।
(१५) परं चापरं च ब्रह्म यद ओंकारः।
प्रश्नोपनिषद--५/२
भाव--निश्चय ही यह जो ओंकार है , वही परब्रह्म और अपरब्रह्म 
(५) मुणडकोपनिषद की सूक्तियाँ--
(१)  परायया तदक्षरमधिगम्यते।

मुण्डकोपनिषद--१/१/५

भाव--जिससे वह अविनाशी परब्रह्म जाना जाता है, वह पराविद्या है।

(२) तथा अक्षरात सम्भवतीह विश्वम्।

  मुण्डकोपनिषद--१/१/७

भाव--अविनाशी परब्रह्म से यहाँ इस सृष्टि में सब कुछ उत्पन्न होता है।

(३) कर्मसु चामृतम्।

मुण्डकोपनिषद--१/१/८

भाव-- कर्म से कर्म के फल सुख-दुख मिलते हैं।

(४) अन्धेनैव नीयमाना यथान्धाः।

मुण्डकोपनिषद--१/२/८

भाव-- अन्धों का समूह किसी अन्य अन्धे के नेतृत्व में चलता है। (और भटकता रहता है।)

(५) आविःसंनिहितं गुहाचरं नाम।

मुण्डकोपनिषद--२/२/१

भाव--वह प्रकाशमान ब्रह्म (हृदयमें) अत्यन्त समीप होने के कारण गुहाचर

नाम से जाना जाता है ।

(६) प्रणवो धनुः शारो ह्यात्मा ब्रह्म 

तल्लक्ष्य मुच्यते।

मुण्डकोपनिषद-२/२/४

भाव--यहाँ ओमकार ही धनुष है। आत्मा ही बाण है और परब्रह्म परमेश्वर ही वह लक्ष्य कहा जाता‌ है।

(७) हिरण्मये परे कोशे विरजं ब्रह्म निष्कलम्।

मुण्डकोपनिषद--२/२/९

भाव--वह परम हिरण्मय कोश में निष्कलंक, निरवयव ब्रह्म निवास करता है।

(८) न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं।

मुण्डकोपनिषदि--२/२/१०

भाव-- वहाँ न तो सूर्य प्रकाशित  होता है, न चन्द्र तारे।

(९) तस्यभासा सर्वमिदं विभाति।

मुण्डकोपनिषद--२/२/१०

भाव--उसी के प्रकाश से सब प्रकाशित है।

(१०) ब्रह्मैवेदं विश्वमिदं वरिष्ठम्।

मुण्डकोपनिषद--२/२/११

भाव--यह जो सम्पूर्ण जगत है, यह सर्वश्रेष्ठ ब्रह्म ही है।

(११) द्वा सुपर्णा सयुजा सखायासमानं 

वृक्षं परिषस्वजाते।

मुण्डकोपनिषद--३/१/१

भाव--दो सुन्दर पर वाले एक साथ सखा भाव से रहने वाले  एक ही वृक्ष पर आश्रय लेकर रहते हैं।(जीवात्मा और परमात्मा एक ही शरीर में)

(१२) अन्तः शरीरे ज्योतिर्मयो हि शुभ्रो यं

पश्यन्ति यतयः क्षीणदोषाः।

मुण्डकोपनिषद--३/१/५

भाव-- शरीर के अन्दर प्रकाशस्वरूप विशुद्ध परमात्मा  को सभी प्रकार के दोषों से रहित साधक ही देख‌ पाता है।

(१३) सत्यमेव जयते नानृतम्।

मुण्डकोपनिषद--३/१/६

भाव-- सत्य ही विजयी होता है झूठ नहीं।

(१४) सत्येन पन्था विततो देवयानः।

मुण्डकोपनिषद--३/१/६

भाव--देवयान नामक मार्ग सत्य से युक्त है।

(१५) पश्यन्त्विहैव निहितं गुहायाम्‌।

मुण्डकोपनिषद--३/१/७

भाव--बाहर देखने वाले के हृदय में वह स्थित है।

(१६) न चक्षुसा गृह्यते नापि वाचा।

मुण्कोपनिषद--३/१/८

भाव-न वह आँख से देखा जा सकता है और‌ न वाणी से बताया जा‌ सकता है।

(१७) नायनात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुधा श्रुतेन।

मुण्डकोपनिषद--३/२/३

भाव--यह ब्रह्म न प्रवचन से, न बुद्धि से और न बहुत‌ सुनने से प्राप्त होता है।

(१८) नायमात्मा बलहीनेन लभ्यो।

मुण्डकोपनिषद--३/२/४

भाव--यह ब्रह्म बलहीन द्वारा नहीं प्राप्त किया जा‌ सकता है।

(६) माण्डूक्योपनिषद की प्रमुख सूक्तियाँ--

(१) ॐ इत्येतदक्षरमिदं सर्वं।

माण्डूक्योपनिषद--१

भाव--ॐ- यह अक्षर ही सर्व है।

(२) भूतं भवद् भविष्यदिति सर्वं ॐकार एव।

माण्डूक्योपनिषद--१

भाव--भूत, भविष्य, वर्तमान सब ओंकार ही है।

(३) सोअयमात्मा चतुष्पात्।

माण्डूक्योपनिषद--२

भाव--ऐसा यह आत्मा(ब्रह्म) चार पादों वाला है।

(४) स्थूलभुग्वैश्ववानरः प्रथमः पादः।

माण्डूक्योपनिषद--३

भाव--स्थूल विषय का भोक्ता वैश्वानर ही

प्रथम पाद है।

(५) प्रविविक्त भुक्तैजसो द्वितीयः पादः।

माण्डुक्योपनिषद--४

भाव--सूक्ष्म विषय का भोक्ता तैजस‌ ही

दूसरा पाद है।

(६) ह्यानन्दभुक् प्राज्ञस्यतृतीयः पादः।

माण्डूक्योपनिषद--५

भाव--आनन्द का भोक्ता प्राज्ञ ही तीसरा पाद है।

(७) प्रपञ्चोपशमं शान्तं शिवं अद्वैतं चतुर्थं

मन्यन्ते स आत्मा स विज्ञेयः।

मण्डूक्योपनिषद--६

भाव--प्रमञ्च से रहित, शान्त, शिव अद्वैत ही चौथा पाद कहा जाता है। वही आत्मा है,वही जानने योग्य है।

(८) सोअयमात्माध्यक्षरंॐकारो अधिमात्रम्।

माण्डूक्योपनिषद--८

भाव--ऐसा वह आत्मा अक्षर दृष्टि से 

मात्राओं का आश्रयरूप ॐकार ही है।

(९) पादामात्रा मात्राश्च पादा अकार उकारो मकार इति।

माण्डूक्योपनिषद--८

भाव--पाद ही मात्रा है और मात्रा ही पाद‌ है है, जो कि अकार, उकार और मकार है।

(१०) जागरित स्थानो वैश्वानरो अकारः।

माण्डूक्योपनिषद--९

भाव--जाग्रत स्थान वाला वैश्वानर ही अकार है।

(१०) स्वप्नस्थानस्तैजस उकारो।

माण्डूक्योपनिषद--१०

भाव-- स्वप्न स्थानवाला तैजस ही उकार है।

(११) सुषुप्त स्थानः प्राज्ञो मकारः।

माण्डुक्योपनिषद --११

भाव--सुषुप्ति स्थान वाला प्राज्ञ ही मकार है।

 तैत्तिरीय उपनिषद की सूक्तियाँ--
(१) सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म।
तैत्तिरीय उपनिषद--२/१
भाव--ब्रह्म वह है जो सत्य है, ज्ञान स्वरूप है और अनन्त है।
(२) तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाशः सम्भूतः। 
तैत्तिरीय उपनिषद--२/१
भाव--इस आत्मा (ब्रह्म) से ही  आकाश 
की उत्पत्ति हुयी।
(३) आकाशाद् वायुः। 
तैत्तिरीय उपनिषद--२/१
भाव--आकाश से वायु की उत्पत्ति हुयी।
(४) वायोः अग्निः। 
तैत्तिरीय उपनिषद--२/१
भाव--वायु से अग्नि की उत्पत्ति हुयी।
(५) अग्नेः आपः। 
तैत्तिरीय उपनिषद--२/१
भाव- अग्नि से जल की उत्पत्ति हुयी।
(६) अदभ्यः पृथ्वी।
तैत्तिरीय उपनिषद--२/१
भाव--जल से पृथ्वी की उत्पत्ति हुयी।
(७) पृथिव्या औषधयः। 
तैत्तिरीय उपनिंषद--२/१
भाव--पृथ्वी से औषधियों की उत्पत्ति हुयी।
(८) औषधीभ्योऽन्नम्।
तैत्तिरीय उपनिषद--२/१
भाव-औषधियों से अन्न की उत्पत्ति हुयी।
(९) ब्रह्म विदाप्नोति परम्।
तैत्तिरीय उपनिषद-
भाव-- ब्रह्म को जानने वाला परम को प्राप्त कर लेता है।
(१०) आनन्दो ब्रह्मेति व्यजानात।
तैत्तिरीय उपनिषद--३/६
भाव--उसने(भृगु) ने जाना कि आनन्द ही ब्रह्म है।
(११) आनन्दाद्धयेव खल्विमानि भूतानि जायन्ते।
तैत्तिरीय उपनिषद-३/६
भाव--आनन्द से ही समस्त प्राणी उतंपन्न होते हैं।
(१२) आनन्देन जातानि ‌जीवन्ति।
तैत्तिरीय उपनिषद--३/६
भाव--आनन्द के द्वारा ही समस्त प्राणी जीवित रहते हैं।
(१३) आनन्दं प्रयन्त्यभिसंविशंतीति।-
तैत्तिरीय उपनिषद-३/६
भाव--आनन्द में ही ये (समस्त प्राणी)
पुनः लौटकर समाविष्ट हो जाते हैं।
(१४) सत्यं वद्। 
तैत्तिरीय उपनिषद--१/११
भाव- सत्य बोलो।
(१५) धर्मं चर।
तैत्तिरीय उपनिषद--१/११
भाव--धर्म करो।
(१६) स्वाध्यायान्मा प्रमदः। 
तैत्तिरीय उपनिषद--१/११
भाव-- स्वाध्याय में प्रमाद पत करो।
(१७) सत्यान्न प्रमदितव्यम्। 
तैत्तिरीय उपनिषद,--१/११
भाव--सत्य से कभी मत डिगना।
(१८) धर्मान्न प्रमदितव्यम्।
 तैत्तिरीय उपनिषद--१/११
भाव--धर्म से कभी मत डिगना।
(१९) कुशलान्न प्रमदितव्यम्। 
तैत्तिरीय उपनि‌षद--१/११
भाव-कल्याणकारी कार्यों से कभी मत डिगना।
(२०) भूत्यै न प्रमदितव्यम्। 
तैत्तिरीय उपनिषद--१/११
भाव-सेवकों के प्रति पंरमाद मत करना।
(२१) स्वाध्याय प्रवचनाभ्यां न  प्रमदितव्यम्।
तैत्रीय उपनिषद--१/११
भाव--स्वाध्याय और प्रवचन के प्रति प्रमाद मत करना।
(२२) देव पितृकार्याभ्यां न प्रमदितव्यम्। तैत्तिरीय उपनिषद--१/११
भाव--ज्ञानियों और परिवार के वृद्धों की सेवा से न डिगना।
(२३) मातृ देवो भव। 
तैत्तिरीय उपनिषद--२/११
भाव--माता को देव तुल्य मानो।
(२४) पितृ देवो भव।
तैत्तिरीय उपनिषद--२/११
भाव--पिता को देव तुल्य माव़नो।
(२५) आचार्य देवो भव।
तैत्तिरीय उपनिषद--२/११
भाव--आचार्य (गुरू) को देव तुल्य मानो।
(२६) अतिथि देवो भव। ----२/११ 
भाव--अतिथि को देव तुल्य मानो।      ‌              
(२७) श्रद्धया देयम्। 
तैत्तिरीय उपनिषद--२/११
भाव--दान श्रद्धा से देना।
(२८) अश्रद्धया देयम्। 
तैत्तिरीय उपनिषद--२/११
भाव-श्रद्धा न रखने वाले को भी दान देन्।
(२९) श्रिया देयम्। 
तैत्तिरीय उपनिषद--२/११
भाव--दान अपनी स्थिति के अनुसार देना।
(३०) ह्रिया‌ देयम्। 
तैत्तिरीय उपनिषद--२/११
भाव+-दान अहंकार रहित होकर देना।
(३१)संविदा देयम्। 
  तैत्तिरीय  उपनिषद -२/११. 
भाव--दान सद्पात्र के देना।
(३२)अद्यतेअत्ति च भूतानि। तस्मादन्नं तदुच्चयते।      
तैत्तिरीय उपनिषद--२/३
भाव--खाया जाता है और खाता है प्राणियों ‌को, इसलिए इसे अन्न कहा जाता‌है।
(३३) अन्नं न निन्द्यात्। तद्‌व्रतम्।
तैत्तरीय उपनिषद---३/७
भाव--अन्न की निंदा मत करना। यह तुम्हारा व्रत हो।
(३४) सत्यं ज्ञानंन्तम् ब्रह्म।-
तैत्तिरीय उपनिषद------२/१
भाव--ब्रह्म सत्य स्वरूप, ज्ञान स्वरूप और अनंत है।
(३५) सर्वा वित्त सम‌ पूर्णा स्यात। स एको मानुष आनन्दः।
 तैत्तिरीय उपनिषद  -२/८
भाव- सर्व सांसारिक सुख सम्पन्न हो तो वह मानव लोक का सबसे सुखी व्यक्ति है।
(३६) ते ये शतं मानुषा आनन्दः। स एको म गन्धर्वाणामानन्दः। 
तैत्तिरीय उपनिषद--२/८
भाव--ऐसे सैकड़ों मनुष्यों (राजाओं) का सुख मिलकर एक मानव गन्धर्व के सुख के बराबर होता है।
(३७) ते ये शतं मनुष्य गन्धर्वाणामानन्दः। स एको देव गन्थर्वाणामानन्दः।
तैत्तिरीय उपनििषद--२/८
भाव--ऐसे सैकड़ों मानव गन्धर्व के
सुख मिलकर एक देव गन्धर्व के सुख के बराबर होता है। 
(३८) ते ये शतं देवगन्धर्वाणामानन्दः। स एकः पितृणां चिरलोकलोकानामानन्दः।-
तैत्तिरीय उपनिषद-२/८
भावार्थ:--ऐसे सैकड़ों देव गन्धर्व के सुख मिलकर एक पितृ लोक के सुख के बराबर होता है।
(३९) ते ये शतं पितृणां चिरलोक लोकानामानन्दः। स एक  आजानजानां देवानामानन्दः।
तैत्तिरीय उपनिषद----२/८
भावार्थ:--ऐसे सैकड़ों पितृ लोक के  सुख मिलकर एक आजानज देव के  सुख के बराबर होता है।
(४०) ते ये शतं आजानजानां देवानामानन्दः। स एकः कर्मदेवानां देवानामानन्दः।-२/८
भावार्थ:---ऐसे सैकड़ों आजानज देव के सुख मिलकर एक कर्म देव के सुख के बराबर होता है।
(४१) ते ये शतं कर्मदेवानां देवानामानन्दः। स एको देवानामानन्दः।---२/८
भावार्थ:--ऐसे सैकड़ों कर्म देव के सुख मिलकर एक देव के आनन्द के सुख के बराबर होता है।
(४२) ते ये शतं देवानामानन्दः। स एक इन्द्रस्यानन्दः। 
तैत्तिरीय उपनिषद----२/८
भावार्थ:-- ऐसे सैकड़ों देव के सुख मिलकर एक इंद्र के सुख के बराबर होता है।
(४३) ते ये शतं इन्द्रस्यानन्दः। स एको बृहस्पतेःआनन्दः।  -
तैतिरीय उपनिषद---२/८
भावार्थ:--ऐसे सैकड़ों इंद्र के सुख मिलकर एक बृहस्पति के सुख के बराबर होता है।
(४४) ते ये शतं बृहस्पतेः आनन्दः। स एकः प्रजापतेः आनन्दः। 
तैत्तिरीय उपनिषद ---२/८ 
भावार्थ:--ऐसे सैकड़ों बृहस्पति के सुख मिलकर एक प्रजापति के सुख के बराबर होता है।
(४५) ते ये शतं प्रजापतेः आनन्द। स एको ब्रह्मण आनन्दः। 
तैत्तिरीय उपनिषद--२/८ 
भावार्थ:--ऐसे सैकड़ों प्रजापति के सुख मिलकर एक ब्रह्मा के सुख के बराबर होता है।
(४६) यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सही आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान न बिभेति कुतश्चनेति।   
तैत्तिरीय उपनिषद-२/९
भावार्थ:- ब्रह्म का वह आनन्द जहाँ से ‌कुछ भी प्राप्त किए बिना वाणी लौट आती है तथा मन भी जहाँ पहुँच कर जब वापस‌ लौट आता है उस आनन्द को भला कौन जानता है ?
हंस उपनिषद के प्रमुख सुक्तियाँ-

(१) सर्वेषु देहेषु व्याप्तो वर्तते। 

हंस उपनिषद--५

भाव--समस्त शरीरों में जीव‌ व्यापत रहता है।

(२) अहोरात्रयोरेकविंशति सहस्राणि

षटशतान्यधिकानि भवन्ति।

हंसोपनिषद--११

भाव--एक अहोरात्र(२४ घण्टे) में इक्कीस हज़ार छः सौ श्वास लिए जाते हैं।

(३) अस्यैव जपकोट्यां नादमनुभवति एवं

सर्वं हंसवशान्नादो दशविधौ जायते‌।

हंस उपनिषद--१६

भाव--सोऽहं मन्त्र का दस कोटि का जाप कर लेने पर साधक को‌ नाद का अनुभव होता है।

(४) चिणीति प्रथम।

हंस उपननिषद--१६

भाव-पहले शरीर में चुनचुनाहट‌ होती है।

(५) चिञ्चिणीति द्वितीयः।

हंस उपनिषद--१६

भाव--दूसरे में बढ़ी हुयी चुनचनाहट होती है।

(६) घण्टानादस्तृतीयः।

हंस उपनिषद--१६

भाव--तीसरे में घण्टा बजने की आवाज़ आती है।

(७) शंखनादश्चतुर्थम्।

हंस उपनिषद--१६

भाव--चौथे मे शंख बजने की आवाज़ आती है।

(८) पञ्चमस्तन्वीनादः। 

हंस उपनिषद--१६

भाव-- पाँचवे में तन्त्री बजने की आवाज़ आती है।

(९) षष्ठस्ताल नादः।

हंस उपनंषद--१६

भाव--छठे में ताल बजने की आवाज़ आती है।

(१०) सप्तमो वेणुनादः। 

हंस उपनिषद--१६

भाव--सातवें में बाँसुरी की आवाज़ आती है।

(११) अष्टमो मृदंगनादः।

हंस उपनिषद--१६

भाव--आठवें में मृदंग बजने की आवाज़ आती है।

(१२)) नवमो भेरीनादः।

हंस उपनिषद--१६

भाव-- नवें में भेरी बजने की आवाज़ आती है।

(१३) दशमो मेघनादः।

हंसोपनिषद--१६

भाव-दसवें‌ मे मेघ गर्जना होती है

(१४) नवमं परित्यज्य दसमेवाभ्यसेत्।

हंसोपनिषद--१७

भाव--  नवें को छोड़कर  दसवें का आभ्यास करना चाहिए।

इसमें से नवम् का परित्याग करके दसवें नाद का अभ्यास करना चाहिए।

(१५) प्रथमे चिञ्चिणी गात्रं

हंस उपनिषद--१९

भाव--पहले शरीर में चिनचिनी होती है।

(१६) द्वितीये गात्र भञ्जनम्।

हंस उपवनिषद--१९ 

भाव--दूसरे शरीर अकड़न होती है।में

(१७)तृतीये खेदनं याति।

हंस उपनिषद--१९

भाव--तीसरा शरीर में पसीना होता है।

(१८) चतुर्थे कम्पते शिरः।

हंस उपनिषद--१९

भाव--चौथे सिर में कम्पन होती है।

(१९) पञ्चमे स्त्रवते तालु।

हंस‌ उपनिषद--१९

भाव--पाँचवे तालू में सन्नाव उत्पन्न होता है।

(२०) षष्ठेऽमृतनिषेवणम्।

हंस उपनिषद--१९

भाव--छठे से अमृतवर्षा हेती है।

(२१) सप्तमे गूढ़विज्ञानं।

हंस उरनिषद--१९

भाव--सातवें से गूढ ज्ञान-विज्ञान का लाभ होता है।

(२२) परावाचा तथाऽष्टमे।।

हंसोपनिषद--१९

भाव--आठवें से परावाणी प्राप्त होती है। (२३) अदृश्यं नवमे देहं दिव्यं चक्षुस्तथाऽमलम्।

हंस उपनिषद--

भाव--नौवें से शरीर दिव्य‌‌ होता है। इससे शरीर‌ को अदृश्य करने(अन्तर्धान होने) की 

तथा निर्मल दिव्यदृष्टि‌ की विद्या प्राप्त‌ होती है।

२४) दशमं परमं ब्रह्म भवेद्ब्रह्मात्मसंनिधौ।

हंसोपनिषद--२०

भाव-दसवें में साधक पारब्रह्म का ज्ञान प्राप्त करके ब्रह्म का साक्षात्कार करता है।

कालाग्निरुद्रोपनिषद की प्रमुख सूक्तियाँ--

(१) यद्द्रव्यं तदाग्नेयं भस्म।

कालाग्निरुद्रोपनिषद--३

भाव-यह (त्रिपुण्ड) सामग्री अग्नि की राख होनी चाहिए।

(२) सद्योजातादि‌ पञ्चब्रह्ममन्त्रैः।

कालाग्निरुद्रोपनिषद--३

भाव--इस भस्म को पञ्चब्राह्मण के 

सत्योजात भजन का पाठ करते हुए धारण करना‌ चाहिए।

(३) परिगृह्याग्निरिति भस्म वायुरिति भस्म जलमिति भस्म स्थलमिति भस्म व्योमेति भस्मेत्यनेनाभिमन्त्र्य।कालाग्निरुद्रोपनिषद--३

भाव-- अग्निरिति भस्म, वायुरिति भस्म, जलमिति भस्म, स्थलमिति भस्म, व्योमिमिति भस्म, पञ्चभूतादि मन्त्रों से अभिमन्त्रित करें।

(४) मानस्तोक‌ इति समुदधृत्यमा नो महान्तमिति जलेन संसृज्य।कालाग्निरुद्रोपनिषद--४ 

भाव--ऋगुवेद के मानस्तोके भजन का पाठ करते हुए पवित्र राख को पानी में मिलाया जाना चाहिए।

(५) प्रातः सवनं महेश्वरो देवतेति।

कालाग्निरुद्रोपनिषद--७

भाव--सोम का प्रातःकालीन निष्कर्षण

महेश्वर के तुल्य माना गया है।

(६) माध्यंदिनं सवनं सदाशिवो देवतेति।

कालाग्निरुद्रोपनिषद--८

भाव--मध्याह्न सोम निष्कर्षण‌ सदाशिव के तुल्य होता है।

(७) तृतीय सवनं महादेवो देवतेति।

कालाग्निरुद्रोपनिषद--९

भाव--सन्ध्या‌ के समय सोम निष्कर्षण

महादेव के तुल्य होता है।

(८) स महापातकोपापातकेभ्यः पूतो भवति

कालाग्निरुद्रोपनिषद--१०

भाव,--त्रिपुण्ड सभी पापों से मुक्ति दिलाता‌ है।

(९) स सर्वेषु तीर्थेषु स्नातो भवति।

कालाग्निरुद्रोपनिषद--१०

भाव--त्रिपुण्ड सभी तीर्थों के स्नान का पुण्य दिलाता है।

 (१०) स सर्वान्वेदानधीतो भवति।

कालाग्निरुदिरेपनिषद--१०

 भाव--त्रिपुण्ड सभी धर्मशास्त्रों के स्वाध्याय का पुण्य दिलाता है।

(११) स सर्वान्देवाञ्ज्ञातो भवपर ।

कालाग्निरुद्रोपनिषद--१०

भाव--त्रिपुण्ड सभी देवों के स्मरण का पुण्य दिलाता है।

(१२) स सततं सकलरुद्रमन्त्रजापी भवति।

कालाग्निरनदंरोपनिषद--१०

भाव,--त्रिपुण्ड सभी रुद्रों के जाप का पुण्य दिलाता है।

(१३) सकलभोगान्भुंक्ते देहं त्यक्त्वा 

शिवसायुज्यमेति।

कालाग्निरुद्रोपनिषद--१०

भाव-- त्रिपुण्ड सभी सुखों के भोगने के बाद शरीर छोड़ने पर मनुष्य को शिव बना देता है।

(१४) न स‌पुनरावर्तत इत्याह भगवान कालाग्निरुद्रः।

कालाग्निरुद्रोपनिषद--१०

भाव--भगवान कालाग्निरुद्र कहते हैं कि त्रिपुण्ड धारण करने वाला का पुनर्जन्म नहीं होता 

है ।

गर्भ उपनिषद‌ की प्रमुख सूक्तियाँ--

(१) सप्तधातुमिति कस्मात् ?

गर्भ उपनिषद--२

भाव--यह शरीर सप्त धातुओं से निर्मित‌ कैसे है ?

 (२) परस्परं सौम्यगुणत्वात् षटविधो रसो रसाच्छोणितं शोणितान्मांसं मांसान्मेदो मेदसः स्रावा स्राव्नोऽस्थीन्यस्थिभ्यो मज्जा‌मज्ज्ञशुक्रं वर्तते।

गर्भ उपनिषद--२

भाव --परस्पर अनुकूल‌ होने के कारण 

षट पदार्थ बनते हैं। इनसे‌‌ रस‌‌ बनता‌ है।

रस से रुधिर, रुधिर‌ से मांस, मांस से मेद, मेद से स्रायु, स्रायु से अस्थि, अस्थि‌ से मज्जा और मज्जा से शुक्र बनता है। ये सात धातुएँ उत्पन्न‌ होती हैं।

(३) शुक्रशोणितसंयोगादावर्तते गर्भो।

गर्भ उपनिषद--२

भाव--पुरुष के‌ शुक्राणु से और स्त्री‌ के रुॉधिर (रज) से गर्भ धारण होता है।

(४) ऋतुकाले सम्प्रयोगादेकरात्रोषितं कलिलं भवति।

गर्भ उपनिषद--३

भाव--ऋतु काल में सम्यक प्रकार से गर्भाधान होने पर एक रात्रि में कलल बनता है।

(५) सप्तरात्रोषितं बुदबुदं भवति। 

गर्भ उपनिषद--३

भाव--सात रात में बुदबुद बनता है।

(६) अर्धमासाभ्यन्तरेण पिण्डो भवति।‌

गर्भ उपनिषद--३

भाव--पन्द्रह दिन में पिण्ड बनता है।

 (७) मासाभ्यन्तरेण कठिनो भवति।

गर्भ उपनिषद--३

भाव-- एक मास में पिण्ड कठोर बनता है।

(८) मासद्वयेन शिरः सम्पद्यते।

गर्भ उपनिषद--३

भाव--दो मास में सिर बनता है।

(९) मासत्रयेण पाद प्रवेशो भवति।

गर्भ उपनिषद-३

भाव--तीन मास में पैर बनता है।

(१०) चतुर्थे मासे जठर कटि प्रदेशो भवति।

गर्भ उपनिषद--३

भाव--चौथे महीने में पैर की गुट्ठियाँ बनती हैं। पेट‌ तथा कटि प्रदेश तैयार होते हैं।

(११) पंचमे मासे पृष्ठवंशो भवति।

गर्भ उपनिषद--३

भाव--पाँचवे महीने में पीठ की रीढ़ तैयार होती है।

(१२) षष्ठे मासे मुख नासिकाक्षिश्रोत्राणि

भवन्ति। 

गर्भ उपनिषद--३

भाव--छठे मास में मुख,नाक आँख‌ और कान बनता है।

(१३) सप्तमेमासे जीवेन संयुक्तो भवति।

गर्भ उपनिषद --३

भाव--सातवें महीने में जीव से युक्त‌ होता है।

(१४) अष्टमे मासे सर्वसम्पूर्णो भवति।

गर्भ उपनिषद--३

भाव--आठ महीने में सब लक्षणों से पूर्ण हो जाता है।

(१५) पितूरेतोअतिरिक्तात पुरुषो भवति।

गर्भ उपनिषद--३

भाव--पिता के शुक्र की अधिकता‌से पुत्र

होता है।

(१६) मातुःरेतोअतिरिक्तात्स्त्रियोभवन्त्य।

गर्भ उपनिषद--३

भाव--माता के रज की अधिकता से पुत्री होती है।

(१७) उभयोर्बीजतुल्यत्वान्नपुंसको भवति।

गरंभ उपनिषद--३

भाव--शुक्र और रज के समान अनुपात में होने से नपुंसक सन्तान होती है।

(१८) व्याकुलितमनसो अन्धःखन्जाः कुब्जा वामना भवन्ति।

गर्भ उपनिषद--३

भाव--व्याकुल चित्त‌‌ से समागम होने पर

उत्पन्न संतान अन्धी, लँगड़ी, कुबड़ी अथवा बौनी होती है। 

(१९) अन्योन्यवायुपरिपीडित शुक्रद्वैध्याइविधा तनुः स्वायत्ततो युग्माः प्रजायन्ते।

गर्भ उपनिषद--३

भाव--परस्पर वायु के संघर्ष से जब शुक्र टूटकर दो भागों में बँट‌ जाता है तो संतान  जुड़वा होती है।

(२०)

नवमे मासि सर्वलक्षणसम्पूर्णो भवति।

गर्भ उपनिषद--३

भाव--नवे महीने वह‌ संतान सभी ज्ञानेन्द्रियों से युक्त‌ जन्म लेती‌ है।

(२१) नानायोनिसहस्राणि दृष्ट्वा।

गर्भ उपनिषद--४

भाव-जीव गर्भ में सोचता है कि मैने सहस्रों पूर्व जन्मों को देखा।

(२२) आहारा विविधाभुक्ताः पीताश्च

विविधाः स्तनाः।

गर्भ उपनिषद--४

भाव--उनमें नाना प्रकार के भोजन किया और नाना योनियों में स्तन पान किया।

(२३) जातस्यैव मृतस्यैव जन्मचैव पुनः पुनः।

गर्भ उपनिषद--४

भाव--मैने बार-बार जन्म लिया और बार-बार मृत्यु को प्राप्त हुआ।

(२४) अहो दुःखोदधौ मग्नः न पश्यामि

प्रतिक्रियाम्।

गर्भ उपनिषद--४

भाव--अरे ! मैं दुख में जल रहा हूँ। कोई मार्ग नहीं दिखायी देता है।

(२५) यन्मया परिजनस्यार्थे कृतं कर्म शुभाशुभम्। एकाकी तेन दह्यामि गतास्ते फलभोगिनः।।

गर्भ उपनिषद--

भाव--अपने परिवार के लिए जो मैने शुभ अशुभ कर्म किए। उसके फल भोगने में मैं अकेला जल रहा हूँ।

(२५) यदि योन्यां प्रमुञ्चामि सांख्यं योगं

समाश्रये। अशुभक्षयकर्तारं फल मुक्ति

प्रदायकम्।।

गर्भ उपनिषद--४

भाव--यदि मैं इस योनि से बाहर आ गया तो अशुभ कर्मफल का नाश करने वाले और मुक्ति प्रदान करने वाले सांख्य योग 

का अभ्यास करूँगा।

(२६) यदि योन्यां प्रमुञ्चीमि तं प्रपद्ये

महेश्वरम्।

गर्भ उपनिषद--४

भाव-- यदि मै योनि से बाहर आ गया तो मैं महेश्वर की शरण में जाऊँगा।

(२७) यदि‌ योन्यां प्रमुञ्चामि तं प्रपद्ये

भगवन्तं नारायणं देवम्। 

गर्भ उपनिषद--४

भाव--यदि मैं योनि से बाहर आ गया‌ तो भगवान नारायण के शरण में जाऊँगा।

(२८) यदि योन्यां प्रमुञ्चामि ध्याये ब्रह्म सनातनम्।।

गर्भ उपनिषद--४

भाव--यदि मैं योनि से बाहर आ गया तो सनातन ब्रह्म का धंयान करूँगा।

(२९) वैष्णवेन वायुना‌ संस्प्रश्यते तदा न‌ स्मरति जन्ममरणं न च‌ कर्म शुभाशुभम्।

गर्भ उपनिषद --4

भावार्थ--बाहर आने पर वैष्णवी वायु

(माया) के सम्पर्क में आने से न वह जन्म मरण और न शुभ-अशुभ कर्म याद रहा।

(३०) कोष्ठाग्निर्नामाशित

पीतलेह्यचोष्यं  पचतीति।

गर्भ उपनिषद--५

भाव--जठराग्नि वह है जो खाए, पिए, चाटे और चूसे पदार्थों को पचाता‌ है।

 (३१) दर्शनाग्नी रूपादीनां दर्शनं करोति।

गर्भ उपनिषद--५

भाव--दर्शनाग्नि वह‌ हैं‌ जो रूपों को दिखलाता‌ है।

 (३२) ज्ञानाग्निः शुभाशुभं च कर्म विन्दति।

गर्भ उपनिषद--५ 

भाव--ज्ञानाग्नि वह है जो शुभ अशुभ कर्मों को सामने ला‌ देता है।

(३३) सप्तोतरं मर्मशतं ।

गर्भ उपनिषद--५

भाव--शरीर में एक‌ सौ सात(१०७) मर्म स्थान हैं।

(३४) साशीतिकं सन्धिशतं। 

गर्भ उपनिषद--५

भाव--एक‌ सौ अस्सी(१८०) संधि स्थान हैं।

(३५) सनवकं स्नायुशतं।

गर्भ उपनिषद--५

भाव--एक सौ नौ (१०९) स्नायु हैं।

(३६) सप्तशिरा सतानि ।

गर्भ उपनिषद--५

भाव--सात‌ सौ(७००) शिराएँ हैं।

(३७) पञ्चमज्जाशतानि अस्थीनि।

गर्भ उपनिषद--५

भाव--पाँच सौ(५००) मज्जाएँ हैं।

(३८) अस्थीनि ह वै त्रीणि शतानि षष्टिः।

गर्भ उपनिषद--५

भाव--तीन सौ(३६०) अस्थियाँ हैं।

(३९) अर्धचतस्रो रोमाणि कोट्यो।

गर्भ उपनिषद--५

भाव--साढ़े चार‌ करोड़‌ रोम हैं।

(४०) हृदयं पलान्यष्टौ।

गर्भ उपनिषद--५

भाव--आठ पल(तोला) हृदय‌ है।

(४१) द्वादश पलानिजिह्वा 

गर्भ उपनिषद--५

भाव--बारह पल(तोला) जिह्वा है।

(४२) पित्तप्रस्थं।

गर्भ उपनिषद--५

भाव--एक सेर पित्त है।

(४२) कफ स्याढकं ।

गर्भ उपनिषद--५

भाव--ढाई सेर‌ कफ है।

(४३) शुक्लं कुडवं ।

गर्भ उपनिषद--५

भाव--पाव भर शुक्र है।

(४४) मेदःप्रस्थौ द्वावनियतं ।

गर्भ उपनिषद--दो सेर मेदा है।

(४५) मूत्रपुरीषमाहारपरिमाणात्। 

गर्भ उपनिषद--५

भाव-- मल-मूत्र भोजन के परिमाण पर निर्भर है

पैंगल्य उपनिषद की सूक्तियां---

(1) तत्त्वमसि
पैँगल्य उपनिषद--3/2
भाव-- वह तुम हो।
(2) त्वं तदसि
पैंगल्य उपनिषद--3/2
भाव--तुम वह हो।
(3) त्वं ब्रह्मासि
पैंगल्य उपनिषद--3/2
भाव--तुम ब्रह्म हो।
(4) अहं ब्रह्मास्मि 
पैंगल्य उपनिषद--3/2
भाव--मैं ब्रह्म हूं।
(5) तत्त्वमसीत्यहं ब्रह्मास्मीति वाक्यार्थविचार: श्रवणं भवति।
पैंगल्य उपनिषद-3/4
भाव--तत्त्वमसि और अहं ब्रह्मास्मि पर विचार करना श्रवण कहलाता है।
(6) एकान्तेनश्रवणार्थानुसन्धानं मननं भवति।
पैंगल्य उपनिषद--3/4
भावार्थ --
एकान्त में श्रवणं की हुयी बातों
का अनुसंधान करना मनन कहलाता है।
(7) ममेति  बध्यते जन्तुर्निरममेति विमुच्यते।
पैंगल्य-- 4/26
भावार्थ --
मेरा है यह भाव बन्धन में डालता है और मेरा नहीं है यह भाव मोक्ष प्रदान करता है। 
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