उपनिषद की सूक्तियाँ--
मुण्डकोपनिषद--१/१/५
भाव--जिससे वह अविनाशी परब्रह्म जाना जाता है, वह पराविद्या है।
(२) तथा अक्षरात सम्भवतीह विश्वम्।
मुण्डकोपनिषद--१/१/७
भाव--अविनाशी परब्रह्म से यहाँ इस सृष्टि में सब कुछ उत्पन्न होता है।
(३) कर्मसु चामृतम्।
मुण्डकोपनिषद--१/१/८
भाव-- कर्म से कर्म के फल सुख-दुख मिलते हैं।
(४) अन्धेनैव नीयमाना यथान्धाः।
मुण्डकोपनिषद--१/२/८
भाव-- अन्धों का समूह किसी अन्य अन्धे के नेतृत्व में चलता है। (और भटकता रहता है।)
(५) आविःसंनिहितं गुहाचरं नाम।
मुण्डकोपनिषद--२/२/१
भाव--वह प्रकाशमान ब्रह्म (हृदयमें) अत्यन्त समीप होने के कारण गुहाचर
नाम से जाना जाता है ।
(६) प्रणवो धनुः शारो ह्यात्मा ब्रह्म
तल्लक्ष्य मुच्यते।
मुण्डकोपनिषद-२/२/४
भाव--यहाँ ओमकार ही धनुष है। आत्मा ही बाण है और परब्रह्म परमेश्वर ही वह लक्ष्य कहा जाता है।
(७) हिरण्मये परे कोशे विरजं ब्रह्म निष्कलम्।
मुण्डकोपनिषद--२/२/९
भाव--वह परम हिरण्मय कोश में निष्कलंक, निरवयव ब्रह्म निवास करता है।
(८) न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं।
मुण्डकोपनिषदि--२/२/१०
भाव-- वहाँ न तो सूर्य प्रकाशित होता है, न चन्द्र तारे।
(९) तस्यभासा सर्वमिदं विभाति।
मुण्डकोपनिषद--२/२/१०
भाव--उसी के प्रकाश से सब प्रकाशित है।
(१०) ब्रह्मैवेदं विश्वमिदं वरिष्ठम्।
मुण्डकोपनिषद--२/२/११
भाव--यह जो सम्पूर्ण जगत है, यह सर्वश्रेष्ठ ब्रह्म ही है।
(११) द्वा सुपर्णा सयुजा सखायासमानं
वृक्षं परिषस्वजाते।
मुण्डकोपनिषद--३/१/१
भाव--दो सुन्दर पर वाले एक साथ सखा भाव से रहने वाले एक ही वृक्ष पर आश्रय लेकर रहते हैं।(जीवात्मा और परमात्मा एक ही शरीर में)
(१२) अन्तः शरीरे ज्योतिर्मयो हि शुभ्रो यं
पश्यन्ति यतयः क्षीणदोषाः।
मुण्डकोपनिषद--३/१/५
भाव-- शरीर के अन्दर प्रकाशस्वरूप विशुद्ध परमात्मा को सभी प्रकार के दोषों से रहित साधक ही देख पाता है।
(१३) सत्यमेव जयते नानृतम्।
मुण्डकोपनिषद--३/१/६
भाव-- सत्य ही विजयी होता है झूठ नहीं।
(१४) सत्येन पन्था विततो देवयानः।
मुण्डकोपनिषद--३/१/६
भाव--देवयान नामक मार्ग सत्य से युक्त है।
(१५) पश्यन्त्विहैव निहितं गुहायाम्।
मुण्डकोपनिषद--३/१/७
भाव--बाहर देखने वाले के हृदय में वह स्थित है।
(१६) न चक्षुसा गृह्यते नापि वाचा।
मुण्कोपनिषद--३/१/८
भाव-न वह आँख से देखा जा सकता है और न वाणी से बताया जा सकता है।
(१७) नायनात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुधा श्रुतेन।
मुण्डकोपनिषद--३/२/३
भाव--यह ब्रह्म न प्रवचन से, न बुद्धि से और न बहुत सुनने से प्राप्त होता है।
(१८) नायमात्मा बलहीनेन लभ्यो।
मुण्डकोपनिषद--३/२/४
भाव--यह ब्रह्म बलहीन द्वारा नहीं प्राप्त किया जा सकता है।
(६) माण्डूक्योपनिषद की प्रमुख सूक्तियाँ--
(१) ॐ इत्येतदक्षरमिदं सर्वं।
माण्डूक्योपनिषद--१
भाव--ॐ- यह अक्षर ही सर्व है।
(२) भूतं भवद् भविष्यदिति सर्वं ॐकार एव।
माण्डूक्योपनिषद--१
भाव--भूत, भविष्य, वर्तमान सब ओंकार ही है।
(३) सोअयमात्मा चतुष्पात्।
माण्डूक्योपनिषद--२
भाव--ऐसा यह आत्मा(ब्रह्म) चार पादों वाला है।
(४) स्थूलभुग्वैश्ववानरः प्रथमः पादः।
माण्डूक्योपनिषद--३
भाव--स्थूल विषय का भोक्ता वैश्वानर ही
प्रथम पाद है।
(५) प्रविविक्त भुक्तैजसो द्वितीयः पादः।
माण्डुक्योपनिषद--४
भाव--सूक्ष्म विषय का भोक्ता तैजस ही
दूसरा पाद है।
(६) ह्यानन्दभुक् प्राज्ञस्यतृतीयः पादः।
माण्डूक्योपनिषद--५
भाव--आनन्द का भोक्ता प्राज्ञ ही तीसरा पाद है।
(७) प्रपञ्चोपशमं शान्तं शिवं अद्वैतं चतुर्थं
मन्यन्ते स आत्मा स विज्ञेयः।
मण्डूक्योपनिषद--६
भाव--प्रमञ्च से रहित, शान्त, शिव अद्वैत ही चौथा पाद कहा जाता है। वही आत्मा है,वही जानने योग्य है।
(८) सोअयमात्माध्यक्षरंॐकारो अधिमात्रम्।
माण्डूक्योपनिषद--८
भाव--ऐसा वह आत्मा अक्षर दृष्टि से
मात्राओं का आश्रयरूप ॐकार ही है।
(९) पादामात्रा मात्राश्च पादा अकार उकारो मकार इति।
माण्डूक्योपनिषद--८
भाव--पाद ही मात्रा है और मात्रा ही पाद है है, जो कि अकार, उकार और मकार है।
(१०) जागरित स्थानो वैश्वानरो अकारः।
माण्डूक्योपनिषद--९
भाव--जाग्रत स्थान वाला वैश्वानर ही अकार है।
(१०) स्वप्नस्थानस्तैजस उकारो।
माण्डूक्योपनिषद--१०
भाव-- स्वप्न स्थानवाला तैजस ही उकार है।
(११) सुषुप्त स्थानः प्राज्ञो मकारः।
माण्डुक्योपनिषद --११
भाव--सुषुप्ति स्थान वाला प्राज्ञ ही मकार है।
(१) सर्वेषु देहेषु व्याप्तो वर्तते।
हंस उपनिषद--५
भाव--समस्त शरीरों में जीव व्यापत रहता है।
(२) अहोरात्रयोरेकविंशति सहस्राणि
षटशतान्यधिकानि भवन्ति।
हंसोपनिषद--११
भाव--एक अहोरात्र(२४ घण्टे) में इक्कीस हज़ार छः सौ श्वास लिए जाते हैं।
(३) अस्यैव जपकोट्यां नादमनुभवति एवं
सर्वं हंसवशान्नादो दशविधौ जायते।
हंस उपनिषद--१६
भाव--सोऽहं मन्त्र का दस कोटि का जाप कर लेने पर साधक को नाद का अनुभव होता है।
(४) चिणीति प्रथम।
हंस उपननिषद--१६
भाव-पहले शरीर में चुनचुनाहट होती है।
(५) चिञ्चिणीति द्वितीयः।
हंस उपनिषद--१६
भाव--दूसरे में बढ़ी हुयी चुनचनाहट होती है।
(६) घण्टानादस्तृतीयः।
हंस उपनिषद--१६
भाव--तीसरे में घण्टा बजने की आवाज़ आती है।
(७) शंखनादश्चतुर्थम्।
हंस उपनिषद--१६
भाव--चौथे मे शंख बजने की आवाज़ आती है।
(८) पञ्चमस्तन्वीनादः।
हंस उपनिषद--१६
भाव-- पाँचवे में तन्त्री बजने की आवाज़ आती है।
(९) षष्ठस्ताल नादः।
हंस उपनंषद--१६
भाव--छठे में ताल बजने की आवाज़ आती है।
(१०) सप्तमो वेणुनादः।
हंस उपनिषद--१६
भाव--सातवें में बाँसुरी की आवाज़ आती है।
(११) अष्टमो मृदंगनादः।
हंस उपनिषद--१६
भाव--आठवें में मृदंग बजने की आवाज़ आती है।
(१२)) नवमो भेरीनादः।
हंस उपनिषद--१६
भाव-- नवें में भेरी बजने की आवाज़ आती है।
(१३) दशमो मेघनादः।
हंसोपनिषद--१६
भाव-दसवें मे मेघ गर्जना होती है
(१४) नवमं परित्यज्य दसमेवाभ्यसेत्।
हंसोपनिषद--१७
भाव-- नवें को छोड़कर दसवें का आभ्यास करना चाहिए।
इसमें से नवम् का परित्याग करके दसवें नाद का अभ्यास करना चाहिए।
(१५) प्रथमे चिञ्चिणी गात्रं
हंस उपनिषद--१९
भाव--पहले शरीर में चिनचिनी होती है।
(१६) द्वितीये गात्र भञ्जनम्।
हंस उपवनिषद--१९
भाव--दूसरे शरीर अकड़न होती है।में
(१७)तृतीये खेदनं याति।
हंस उपनिषद--१९
भाव--तीसरा शरीर में पसीना होता है।
(१८) चतुर्थे कम्पते शिरः।
हंस उपनिषद--१९
भाव--चौथे सिर में कम्पन होती है।
(१९) पञ्चमे स्त्रवते तालु।
हंस उपनिषद--१९
भाव--पाँचवे तालू में सन्नाव उत्पन्न होता है।
(२०) षष्ठेऽमृतनिषेवणम्।
हंस उपनिषद--१९
भाव--छठे से अमृतवर्षा हेती है।
(२१) सप्तमे गूढ़विज्ञानं।
हंस उरनिषद--१९
भाव--सातवें से गूढ ज्ञान-विज्ञान का लाभ होता है।
(२२) परावाचा तथाऽष्टमे।।
हंसोपनिषद--१९
भाव--आठवें से परावाणी प्राप्त होती है। (२३) अदृश्यं नवमे देहं दिव्यं चक्षुस्तथाऽमलम्।
हंस उपनिषद--
भाव--नौवें से शरीर दिव्य होता है। इससे शरीर को अदृश्य करने(अन्तर्धान होने) की
तथा निर्मल दिव्यदृष्टि की विद्या प्राप्त होती है।
२४) दशमं परमं ब्रह्म भवेद्ब्रह्मात्मसंनिधौ।
हंसोपनिषद--२०
भाव-दसवें में साधक पारब्रह्म का ज्ञान प्राप्त करके ब्रह्म का साक्षात्कार करता है।
कालाग्निरुद्रोपनिषद की प्रमुख सूक्तियाँ--
(१) यद्द्रव्यं तदाग्नेयं भस्म।
कालाग्निरुद्रोपनिषद--३
भाव-यह (त्रिपुण्ड) सामग्री अग्नि की राख होनी चाहिए।
(२) सद्योजातादि पञ्चब्रह्ममन्त्रैः।
कालाग्निरुद्रोपनिषद--३
भाव--इस भस्म को पञ्चब्राह्मण के
सत्योजात भजन का पाठ करते हुए धारण करना चाहिए।
(३) परिगृह्याग्निरिति भस्म वायुरिति भस्म जलमिति भस्म स्थलमिति भस्म व्योमेति भस्मेत्यनेनाभिमन्त्र्य।कालाग्निरुद्रोपनिषद--३
भाव-- अग्निरिति भस्म, वायुरिति भस्म, जलमिति भस्म, स्थलमिति भस्म, व्योमिमिति भस्म, पञ्चभूतादि मन्त्रों से अभिमन्त्रित करें।
(४) मानस्तोक इति समुदधृत्यमा नो महान्तमिति जलेन संसृज्य।कालाग्निरुद्रोपनिषद--४
भाव--ऋगुवेद के मानस्तोके भजन का पाठ करते हुए पवित्र राख को पानी में मिलाया जाना चाहिए।
(५) प्रातः सवनं महेश्वरो देवतेति।
कालाग्निरुद्रोपनिषद--७
भाव--सोम का प्रातःकालीन निष्कर्षण
महेश्वर के तुल्य माना गया है।
(६) माध्यंदिनं सवनं सदाशिवो देवतेति।
कालाग्निरुद्रोपनिषद--८
भाव--मध्याह्न सोम निष्कर्षण सदाशिव के तुल्य होता है।
(७) तृतीय सवनं महादेवो देवतेति।
कालाग्निरुद्रोपनिषद--९
भाव--सन्ध्या के समय सोम निष्कर्षण
महादेव के तुल्य होता है।
(८) स महापातकोपापातकेभ्यः पूतो भवति
कालाग्निरुद्रोपनिषद--१०
भाव,--त्रिपुण्ड सभी पापों से मुक्ति दिलाता है।
(९) स सर्वेषु तीर्थेषु स्नातो भवति।
कालाग्निरुद्रोपनिषद--१०
भाव--त्रिपुण्ड सभी तीर्थों के स्नान का पुण्य दिलाता है।
(१०) स सर्वान्वेदानधीतो भवति।
कालाग्निरुदिरेपनिषद--१०
भाव--त्रिपुण्ड सभी धर्मशास्त्रों के स्वाध्याय का पुण्य दिलाता है।
(११) स सर्वान्देवाञ्ज्ञातो भवपर ।
कालाग्निरुद्रोपनिषद--१०
भाव--त्रिपुण्ड सभी देवों के स्मरण का पुण्य दिलाता है।
(१२) स सततं सकलरुद्रमन्त्रजापी भवति।
कालाग्निरनदंरोपनिषद--१०
भाव,--त्रिपुण्ड सभी रुद्रों के जाप का पुण्य दिलाता है।
(१३) सकलभोगान्भुंक्ते देहं त्यक्त्वा
शिवसायुज्यमेति।
कालाग्निरुद्रोपनिषद--१०
भाव-- त्रिपुण्ड सभी सुखों के भोगने के बाद शरीर छोड़ने पर मनुष्य को शिव बना देता है।
(१४) न सपुनरावर्तत इत्याह भगवान कालाग्निरुद्रः।
कालाग्निरुद्रोपनिषद--१०
भाव--भगवान कालाग्निरुद्र कहते हैं कि त्रिपुण्ड धारण करने वाला का पुनर्जन्म नहीं होता
है ।
गर्भ उपनिषद की प्रमुख सूक्तियाँ--
(१) सप्तधातुमिति कस्मात् ?
गर्भ उपनिषद--२
भाव--यह शरीर सप्त धातुओं से निर्मित कैसे है ?
(२) परस्परं सौम्यगुणत्वात् षटविधो रसो रसाच्छोणितं शोणितान्मांसं मांसान्मेदो मेदसः स्रावा स्राव्नोऽस्थीन्यस्थिभ्यो मज्जामज्ज्ञशुक्रं वर्तते।
गर्भ उपनिषद--२
भाव --परस्पर अनुकूल होने के कारण
षट पदार्थ बनते हैं। इनसे रस बनता है।
रस से रुधिर, रुधिर से मांस, मांस से मेद, मेद से स्रायु, स्रायु से अस्थि, अस्थि से मज्जा और मज्जा से शुक्र बनता है। ये सात धातुएँ उत्पन्न होती हैं।
(३) शुक्रशोणितसंयोगादावर्तते गर्भो।
गर्भ उपनिषद--२
भाव--पुरुष के शुक्राणु से और स्त्री के रुॉधिर (रज) से गर्भ धारण होता है।
(४) ऋतुकाले सम्प्रयोगादेकरात्रोषितं कलिलं भवति।
गर्भ उपनिषद--३
भाव--ऋतु काल में सम्यक प्रकार से गर्भाधान होने पर एक रात्रि में कलल बनता है।
(५) सप्तरात्रोषितं बुदबुदं भवति।
गर्भ उपनिषद--३
भाव--सात रात में बुदबुद बनता है।
(६) अर्धमासाभ्यन्तरेण पिण्डो भवति।
गर्भ उपनिषद--३
भाव--पन्द्रह दिन में पिण्ड बनता है।
(७) मासाभ्यन्तरेण कठिनो भवति।
गर्भ उपनिषद--३
भाव-- एक मास में पिण्ड कठोर बनता है।
(८) मासद्वयेन शिरः सम्पद्यते।
गर्भ उपनिषद--३
भाव--दो मास में सिर बनता है।
(९) मासत्रयेण पाद प्रवेशो भवति।
गर्भ उपनिषद-३
भाव--तीन मास में पैर बनता है।
(१०) चतुर्थे मासे जठर कटि प्रदेशो भवति।
गर्भ उपनिषद--३
भाव--चौथे महीने में पैर की गुट्ठियाँ बनती हैं। पेट तथा कटि प्रदेश तैयार होते हैं।
(११) पंचमे मासे पृष्ठवंशो भवति।
गर्भ उपनिषद--३
भाव--पाँचवे महीने में पीठ की रीढ़ तैयार होती है।
(१२) षष्ठे मासे मुख नासिकाक्षिश्रोत्राणि
भवन्ति।
गर्भ उपनिषद--३
भाव--छठे मास में मुख,नाक आँख और कान बनता है।
(१३) सप्तमेमासे जीवेन संयुक्तो भवति।
गर्भ उपनिषद --३
भाव--सातवें महीने में जीव से युक्त होता है।
(१४) अष्टमे मासे सर्वसम्पूर्णो भवति।
गर्भ उपनिषद--३
भाव--आठ महीने में सब लक्षणों से पूर्ण हो जाता है।
(१५) पितूरेतोअतिरिक्तात पुरुषो भवति।
गर्भ उपनिषद--३
भाव--पिता के शुक्र की अधिकतासे पुत्र
होता है।
(१६) मातुःरेतोअतिरिक्तात्स्त्रियोभवन्त्य।
गर्भ उपनिषद--३
भाव--माता के रज की अधिकता से पुत्री होती है।
(१७) उभयोर्बीजतुल्यत्वान्नपुंसको भवति।
गरंभ उपनिषद--३
भाव--शुक्र और रज के समान अनुपात में होने से नपुंसक सन्तान होती है।
(१८) व्याकुलितमनसो अन्धःखन्जाः कुब्जा वामना भवन्ति।
गर्भ उपनिषद--३
भाव--व्याकुल चित्त से समागम होने पर
उत्पन्न संतान अन्धी, लँगड़ी, कुबड़ी अथवा बौनी होती है।
(१९) अन्योन्यवायुपरिपीडित शुक्रद्वैध्याइविधा तनुः स्वायत्ततो युग्माः प्रजायन्ते।
गर्भ उपनिषद--३
भाव--परस्पर वायु के संघर्ष से जब शुक्र टूटकर दो भागों में बँट जाता है तो संतान जुड़वा होती है।
(२०)
नवमे मासि सर्वलक्षणसम्पूर्णो भवति।
गर्भ उपनिषद--३
भाव--नवे महीने वह संतान सभी ज्ञानेन्द्रियों से युक्त जन्म लेती है।
(२१) नानायोनिसहस्राणि दृष्ट्वा।
गर्भ उपनिषद--४
भाव-जीव गर्भ में सोचता है कि मैने सहस्रों पूर्व जन्मों को देखा।
(२२) आहारा विविधाभुक्ताः पीताश्च
विविधाः स्तनाः।
गर्भ उपनिषद--४
भाव--उनमें नाना प्रकार के भोजन किया और नाना योनियों में स्तन पान किया।
(२३) जातस्यैव मृतस्यैव जन्मचैव पुनः पुनः।
गर्भ उपनिषद--४
भाव--मैने बार-बार जन्म लिया और बार-बार मृत्यु को प्राप्त हुआ।
(२४) अहो दुःखोदधौ मग्नः न पश्यामि
प्रतिक्रियाम्।
गर्भ उपनिषद--४
भाव--अरे ! मैं दुख में जल रहा हूँ। कोई मार्ग नहीं दिखायी देता है।
(२५) यन्मया परिजनस्यार्थे कृतं कर्म शुभाशुभम्। एकाकी तेन दह्यामि गतास्ते फलभोगिनः।।
गर्भ उपनिषद--
भाव--अपने परिवार के लिए जो मैने शुभ अशुभ कर्म किए। उसके फल भोगने में मैं अकेला जल रहा हूँ।
(२५) यदि योन्यां प्रमुञ्चामि सांख्यं योगं
समाश्रये। अशुभक्षयकर्तारं फल मुक्ति
प्रदायकम्।।
गर्भ उपनिषद--४
भाव--यदि मैं इस योनि से बाहर आ गया तो अशुभ कर्मफल का नाश करने वाले और मुक्ति प्रदान करने वाले सांख्य योग
का अभ्यास करूँगा।
(२६) यदि योन्यां प्रमुञ्चीमि तं प्रपद्ये
महेश्वरम्।
गर्भ उपनिषद--४
भाव-- यदि मै योनि से बाहर आ गया तो मैं महेश्वर की शरण में जाऊँगा।
(२७) यदि योन्यां प्रमुञ्चामि तं प्रपद्ये
भगवन्तं नारायणं देवम्।
गर्भ उपनिषद--४
भाव--यदि मैं योनि से बाहर आ गया तो भगवान नारायण के शरण में जाऊँगा।
(२८) यदि योन्यां प्रमुञ्चामि ध्याये ब्रह्म सनातनम्।।
गर्भ उपनिषद--४
भाव--यदि मैं योनि से बाहर आ गया तो सनातन ब्रह्म का धंयान करूँगा।
(२९) वैष्णवेन वायुना संस्प्रश्यते तदा न स्मरति जन्ममरणं न च कर्म शुभाशुभम्।
गर्भ उपनिषद --4
भावार्थ--बाहर आने पर वैष्णवी वायु
(माया) के सम्पर्क में आने से न वह जन्म मरण और न शुभ-अशुभ कर्म याद रहा।
(३०) कोष्ठाग्निर्नामाशित
पीतलेह्यचोष्यं पचतीति।
गर्भ उपनिषद--५
भाव--जठराग्नि वह है जो खाए, पिए, चाटे और चूसे पदार्थों को पचाता है।
(३१) दर्शनाग्नी रूपादीनां दर्शनं करोति।
गर्भ उपनिषद--५
भाव--दर्शनाग्नि वह हैं जो रूपों को दिखलाता है।
(३२) ज्ञानाग्निः शुभाशुभं च कर्म विन्दति।
गर्भ उपनिषद--५
भाव--ज्ञानाग्नि वह है जो शुभ अशुभ कर्मों को सामने ला देता है।
(३३) सप्तोतरं मर्मशतं ।
गर्भ उपनिषद--५
भाव--शरीर में एक सौ सात(१०७) मर्म स्थान हैं।
(३४) साशीतिकं सन्धिशतं।
गर्भ उपनिषद--५
भाव--एक सौ अस्सी(१८०) संधि स्थान हैं।
(३५) सनवकं स्नायुशतं।
गर्भ उपनिषद--५
भाव--एक सौ नौ (१०९) स्नायु हैं।
(३६) सप्तशिरा सतानि ।
गर्भ उपनिषद--५
भाव--सात सौ(७००) शिराएँ हैं।
(३७) पञ्चमज्जाशतानि अस्थीनि।
गर्भ उपनिषद--५
भाव--पाँच सौ(५००) मज्जाएँ हैं।
(३८) अस्थीनि ह वै त्रीणि शतानि षष्टिः।
गर्भ उपनिषद--५
भाव--तीन सौ(३६०) अस्थियाँ हैं।
(३९) अर्धचतस्रो रोमाणि कोट्यो।
गर्भ उपनिषद--५
भाव--साढ़े चार करोड़ रोम हैं।
(४०) हृदयं पलान्यष्टौ।
गर्भ उपनिषद--५
भाव--आठ पल(तोला) हृदय है।
(४१) द्वादश पलानिजिह्वा
गर्भ उपनिषद--५
भाव--बारह पल(तोला) जिह्वा है।
(४२) पित्तप्रस्थं।
गर्भ उपनिषद--५
भाव--एक सेर पित्त है।
(४२) कफ स्याढकं ।
गर्भ उपनिषद--५
भाव--ढाई सेर कफ है।
(४३) शुक्लं कुडवं ।
गर्भ उपनिषद--५
भाव--पाव भर शुक्र है।
(४४) मेदःप्रस्थौ द्वावनियतं ।
गर्भ उपनिषद--दो सेर मेदा है।
(४५) मूत्रपुरीषमाहारपरिमाणात्।
गर्भ उपनिषद--५
भाव-- मल-मूत्र भोजन के परिमाण पर निर्भर है
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